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SHORT QUES. OF SADHANA-03


शांडिल्य कहते है—प्रीति, भक्ति अद्वैत है। तो अद्वैत के नाम पर जो कहा जाता रहा है, वह क्या है?

अधिकतर शब्द ही हैं वे। क्योंकि जिस ने प्रीति नहीं जानी, वह अद्वैत नहीं जानेगा। अद्वैत प्रीति की परम दशा है। जिस ने प्रीति नहीं जानी, उस का अद्वैत तार्किक निष्पत्ति है। गणित उसने हल किया है! उस के अद्वैत में प्राण नहीं है। उस का अद्वैत रूखा—सूखा, निष्प्राण है। उस के अद्वैत मे फूल नहीं लगेंगे। और उस के अद्वैत में कोई स्वर पैदा नहीं होगा। उस का अद्वैत मरघट का अद्वैत है। जिस ने प्रीति जानी, उस ने ही असली अद्वैत जाना। असली अद्वैत का क्या अर्थ? असली अद्वैत का अर्थ होता है, दो मे से एक को छोड़ नहीं देना है, फिर तो अद्वैत हुआ ही नहीं। तुम्हारा अद्वैतवादी कहता है—संसार माया है, झूठ है, है ही नहीं। यह क्या अद्वैत हुआ! एक को काट दिया। फिर तो मार्क्सवादी भी अद्वैतवादी है। वह कहता है कोई परमात्मा नहीं, कोई आत्मा नहीं, बस जड़ है, पदार्थ है, कोई चेतना नहीं। यह भी अद्वैत है। आस्तिक, नास्तिक दोनों अद्वैतवादी है। और मैं मानता हूं कि दोनों केवल तर्क से चल रहे हैं, अनुभव नहीं है। भक्त को अनुभव है। भक्त कहता है—अद्वैत है और ऐसा अद्वैत है कि दोनों उस में समाये है, और दोनों उस मे जी सकते हैं। यह अनुभूति प्रेम में ही होती है। प्रेम बड़ी विचित्र अनुभूति है। प्रेमी और प्रेमिका दो होते है और फिर भी अनुभव करते हैं कि एक है। उनका अनुभव बड़ा समृद्ध अनुभव है। अगर प्रेमी अपनी हत्या कर ले और कहे कि बस प्रेयसी है मैं नहीं हूं;तो प्रेम समाप्त हो जाएगा। या प्रेयसी की हत्या कर दे और कहे कि मैं ही हूं;प्रेयसी कहा है, तो भी प्रेम समाप्त हो जाएगा। दो के बीच एक जीए, तो ही श्वास लेता है, नहीं तो श्वास नहीं ले सकेगा। और यही प्रेमी करते हैं जीवनभर। तुम्हारे तथाकथित प्रेमी इसी कोशिश में लगे रहते हैं। पति कोशिश में रहता है—पत्नी मिट जाए;पत्नी की कोई आवाज न हो, उस का कोई स्वर न हो, वह मेरी अनुगामिनी हो, मेरी छाया हो, मैं जंहा जाऊं वहा छाया की तरह मेरे पीछे जाए। पति चाहता है पत्नी की कोई स्वतंत्रता न हो, पत्नी दासी हो; मैं स्वामी, पत्नी दासी। यह प्रेम की हत्या शुरू हो गयी। प्रेम तो दोनो के जीते जी ही हो सकता है—दोनों परिपूर्ण स्वतंत्रता में हों और फिर भी दोनों के हृदय अनुभव करते हों कि हम एक है। एकता अनुभव हो। पत्नी भी यही कोशिश करती है कि पति को मिटा डाले। दोनो की कोशिश अलग—अलग ढंग की होती हैं, क्योंकि दोनों के मनोविज्ञान अलग होते हैं। पति के ढंग जरा स्थूल होते है —मारपीट कर देगा। पत्नी के ढंग जरा सूक्ष्म होते है—जरूरत पड़ेगी तो अपने को ही मारपीट लेगी। मगर चेष्टा दोनों की एक ही है। पत्नी जरा परोक्ष ढंग से पति को अपने कब्जे में लेना चाहती है। अक्सर यह होता है कि तुमने विवाह किया कि पत्नी तो नहीं मिलती है एक गुरु मिल गया, जो तुम्हें सुधारने में लग जाते है कि अब सिगरेट न पीओ, अब पान न खाओ, अब दस बजे के बाद जगो मत, अब ब्रह्ममुहूर्त में उठो, और अब ऐसा करो और अब वैसा करो। पत्नियां अक्सर अपना जीवन इसी मे नष्ट करती हैं कि पति को कैसे सुधार लें। लेकिन सुधारने के पीछे जो आकांक्षा है, वह मालकियत की है। सुधारना तो बहाना है। सुधारने का तो केवल मतलब इतना है कि शुभ के मार्ग से मैं मालकियत सिद्ध करती हूं। और मजा यह है कि न पति सुधरता, न पत्नी सुधार पाती। क्योंकि पत्नी जब सुधारने की कोशिश करती है—और यह उसका ढंग होता है मालकियत का—तो पति भी पूरी चेष्टा करता है अपनी स्वतंत्रता बचाने की, चाहे गलत ढंग से ही सही। अब सिगरेट पीना कोई बड़ी स्वतंत्रता नहीं है, मूढतापूर्ण है बात, मगर अगर पत्नी पीछे पड़ी है कि सिगरेट मत पीओ, तो पति फिर सिगरेट नहीं छोड़ सकेगा। उसे पीना ही पड़ेगा। पीते ही रहना पड़ेगा। क्यों? क्योंकि अब यही उसका एकमात्र मार्ग है घोषणा करने का कि मेरी भी आत्मा है, मैं स्वतंत्र हूं;मैं गुलाम नहीं हूं। पति—पत्नी एक—दूसरे को मिटाने में लग जाते हैं। इसलिए पति—पत्नी का जीवन एक दुखद जीवन हो गया है। दोनों अद्वैतवादी है। दोनों की चेष्टा यह है—एक बचे। दूसरे को नकार कर दो; छाया कर दो, माया कर दो। दूसरे का होना न—होने के बराबर कर दो। दूसरे का मूल्य शून्य कर दो। यही ज्ञानी कर रहा है, वह कहता है—ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या। यही तुम्हारा अनीश्वरवादी कर रहा है, वह कहता है। जगत सत्य, ब्रह्म मिथ्या। एक को बचाएंगे, दूसरे को नष्ट कर देंगे। भक्त की कीमिया बड़ी अदभुत है। भक्त यह कहता है —दोनों को मिटाने की जरूरत ही नहीं है। दोनों जुड़ जाएं, आलिंगन मे बंध जाएं, दोनों के हृदय एक साथ धड़क सकते है, मालकियत का सवाल क्या है? दोनों की धड़कन इतनी एकसाथ हो सकती है कि एक का अनुभव होने लगे, दो के बीच में एक का अनुभव होने लगे। दोनों की स्वतंत्रता अछूती रहे और फिर भी दोनों एक में जुड़ जाएं, एक सेतु से जुड़ जाएं। नदी के दो किनारे एक सेतु से जैसे जुड़ जाते हैं, ऐसे ही असली प्रेमी दो रहते हैं, फिर भी जुड़ जाते है; अलग— अलग रहते हैं, और फिर भी एक हो जाते है। इसलिए भक्ति में वैविध्य है और भक्ति में समृद्धि है। एक को मारकर जो एकता बचती है, वह एकता कुछ बड़ी एकता नहीं क्योंकि वह दूसरे से डरी हुई एकता है। दूसरे की मौजूदगी में नहीं हो सकती थी। भक्त कहता है—संसार भी सत्य है, परमात्मा भी सत्य है; स्रष्टा भी सत्य, उसकी सृष्टि भी सत्य, दोनों सत्य है। यही शांडिल्य ने कहा—मिथ्या मत कहो संसार को। उस परम सत्य से मिथ्या का आविर्भाव कैसे होगा? उस सत्य से जो जन्मा है, वह भी सत्य ही होगा। सागर से जो लहर जन्मती है, वह उतनी ही सत्य है जितना सागर। सागर की ही लहर है, असत्य कैसे होगी? भक्त की छाती बड़ी है। भक्त कहता है —दोनो को सम्हालेगे; दोनो में से किसी को मिटाने की जरूरत नहीं, मिटाते ही जीवन एकरस हो जाएगा। इसलिए तुम तथाकथित अद्वैतवादी और ज्ञानी के चेहरे पर आनंद का भाव नहीं देखोगे। भक्त के चेहरे पर एक कौमल्य, एक प्रसाद एक आनंद, एक अनुग्रह का भाव मिलेगा। भक्त नाचता मिलेगा। ज्ञानी सिकुड़ा हुआ, भक्त फैला हुआ मिलेगा। भक्त को कोई अड़चन ही नहीं है। भक्त को सर्व स्वीकार है। भक्त ज्ञान की बातचीत में नहीं पड़ता, अनुभव मे उतरता है। इस भेद को ठीक से समझ लेना। तुम बैठकर विचार करो, तर्क करो, कुछ निष्पत्तिया ले लो, दर्शनशास्त्र निर्मित कर लो, यह एक बात। और तुम जीवन में उतरो, छलांग लगाओ, डुबकी मारो और वहा जानो—कबीर ने कहा है, ढाई आंखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय—यह अलग ही पाठशाला है। यह जीवन की, अस्तित्व की असली पाठशाला है। डूबा हुआ हूं सर से कदम तक बहार में न छेड़ उनके तसव्वुर में ऐं बहार मुझे कि बू—ए—गुल भी इस वक्त नागवार मुझे जो डुब जाता हैं उसके आनंद में उसके चारों तरफ बहार ही बहार हो जाती है, बसंत ही बसंत हो जाता है, पतझड़ में भी उसे बसंत दिखायी पड़ता है। डूबा हुआ हूं सर से कदम तक बहार मे न छेड़ उनके तसव्वुर में ऐं बहार मुझे बहार की भी चिंता नहीं है अब—बहार आए कि न आए, बहार बाहर न भी आए तो चलेगा, बहार भीतर आ गयी है, अब तो भक्त जंहा रहता है वहा बहार है। तुमने सुना होगा कि भक्त स्वर्ग जाता है। गलत सुना। भक्त जंहा जाता है, वहा स्वर्ग होता है। नर्क मे फेंक दो भक्त को, तुम उसे नर्क नहीं पहुंचा पाओगे —तुम भेजोगे नर्क, वह पहुंच जाएगा स्वर्ग। नर्क में भी स्वर्ग बसा लेगा। ज्ञानी को तुम स्वर्ग भी भेज दो तो शायद ही स्वर्ग पहुंचे। सुना नहीं कभी कि कोई पंडित, कई तानी स्वर्ग मे पहुंचा हो! वह जंहा जाएगा, वहीं अपना तर्कजाल ले जाएगा। वह जंहा जाएगा वहीं अपने शब्दों से दबा हुआ पहुंचेगा। वह जंहा जाएगा, अपनी पोथियां ले जाएगा। उस के पास वही शब्दों की मुर्दा दुनिया बसी रहेगी। पापी भी पहुंच जाते हैं, पंडित नहीं पहुंचते। पापी विनम्र होते हैं, पंडित अहंकारी होते है। अगर पंडित और पापी में चुनना हो, तो पापी हो जाना बेहतर है; पंडित तो भूलकर मत होना। क्योंकि पंडित का मतलब है, जिस ने नहीं जाना और जो सोचता है—मैंने जान लिया। जानता तो प्रेमी है; पंडित कैसे जानेगा? प्रेमी होना; तो ही अनुभव करोगे अद्वैत क्या है। धन्य हो जाओगे अनुभव से। विचार से कोई धन्य नहीं होता। तुम जानते हो जीवन के सामान्य क्रम में, कितना ही सोचो मिष्ठान्न, सुस्वादु भोजन, उस से पेट नहीं भरता। प्यास लगी हो और तुम्हें जल का पूरा शास्त्र आता हो, तुम्हें जल का पूरा विज्ञान आता हो, तुम्हें मालूम हो कि जल यानी एच. टू. ओं. कि ऑक्सीजन और उदजन से मिलकर बनता है कि उदजन के दो हिस्से और आक्सीजन का एक हिस्सा और जल बनता है, लिखते रहो किताबों पर... मैं एक घर में मेहमान था। पूरा घर पोथियों से भरा था। मैंने पूछा—बड़ी लाइब्रेरी है, क्या—क्या इस लाइब्रेरी में है? घर के मालिक ने कहा—यह लाइब्रेरी नहीं है, इस में कापियों पर राम—राम, राम—राम लिखता हूं। जिंदगीभर हो गयी लिखते, मेरे पिता भी यह करते थे, बड़े धार्मिक पुरुष थे, तो घर में सारी किताबें इकट्ठी हो गयी हैं, बस काम ही यही है, राम—राम लिखते रहते। मैंने कहा यह ऐसे ही फिजूल है जैसे किसी को प्यास लगी हो, वह किताब पर लिखे—एच. टू. ओं., एच. टू. ओ., जल का सूत्र लिखता रहे, लिखता रहे, लिखता रहे, इस से प्यास नहीं बुझेगी—न तुम्हारे पिता धार्मिक थे, न तुम धार्मिक हो। धर्म का किताब में राम—राम लिखने से क्या संबंध होगा? हृदय में अनुगूंज होनी चाहिए। प्राणों के प्राण में उसकी आभा प्रकट होनी चाहिए। मैंने उन से पूछा—तुम्हें राम का अनुभव हुआ? उन्होंने कहा—अनुभव ही हो जाता तो मैं ये पोथियां क्यों लिखता? अनुभव करने के लिए लिख रहा हूं। इस के लिखने से कैसे अनुभव होगा? इतना समय गंवाया, अब और न गवाओ, इन पोथियों को आग लगाओ। इतना लिख चुके, इस से नहीं हुआ, इतना ही और लिख डालोगे तब भी नहीं होगा। लिखने से क्या संबंध हो सकता है? जीवन में अनुभव होते हैं अनुभव से। भक्त धन्य हो जाता है। वह घड़ी जल्दी आ जाती है भक्त के जीवन में जब वह कहता है, गुंजार करता है— धन्योऽहं। मैं धन्य हूं। बहार ही बहार उसे घेर लेती है। परसों राधा मुझे मिलने आयी। उस से मैंने पूछा—कैसी है राधा? वह कहती है —बहार ही बहार है! अच्छा लगा मुझे उसका वचन। प्रेम जगे तो बहार ही बहार है।

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क्या अस्मिता के रहते हुए भी कोई परम सत्य में प्रतिष्ठित हो सकता है? और क्या अस्मिता के रहते भी कोई व्यक्ति संत व ज्ञानी कहा जा सकता है? अस्मिता की स्थिति मानसिक ही है या मन के पार आध्यात्मिक है? फिर आपने कहा कि अस्मिता के पूर्ण विसर्जन पर संत परमात्मा हो जाता है। तो क्या संत अस्मिता के रहने पर परमात्मा से वियुक्त रहता है?

तीन बातें हैं। दो शब्दों को ठीक से समझ लेना चाहिए। एक है अहंकार और दूसरा है अस्मिता। अहंकार का अर्थ है: मैं शरीर से एक हूं। जब शरीर से चेतना जुड़ जाती है, जुड़ा हुआ अनुभव करती है, तादात्म्य कर लेती है, एकता बना लेती है, तो अहंकार निर्मित होता है। जब चेतना शरीर से अपने को अलग जान लेती है, भिन्न पहचान लेती है, तादात्म्य टूट जाता है, तो अहंकार टूट जाता है। लेकिन शरीर से मैं अलग हूं, यह जान लेना जरूरी नहीं है, काफी नहीं है यह जानने के लिए कि मैं परमात्मा से एक हूं। मैं शरीर से अलग हूं, इस भाव में अगर कोई ठहर जाए और परमात्मा के साथ एकता को अनुभव न कर पाए, तो इस स्थिति का नाम अस्मिता है। मैं शरीर के साथ एक हूं, इस स्थिति का नाम अहंकार। मैं शरीर से अलग हूं, इस स्थिति का नाम अस्मिता। और मैं परमात्मा के साथ एक हूं, यह अस्मिता के भी पार। लाओत्से कहता है कि संत के लिए एक बात तो अनिवार्य है कि उसका अहंकार टूट जाए; वह जान ले कि मैं शरीर नहीं हूं, मन नहीं हूं। इतना पहचान ले, यह तो संत का लक्षण है। लेकिन संत यहां भी रुक सकता है। बहुत संत यहीं रुक जाते हैं। जिन संतों ने यह कहा है कि परमात्मा नहीं है, बस आत्मा ही है, वे संत इसी वर्ग के हैं। उन्होंने एक कड़ी तो तोड़ दी बंधन की, उन्होंने गलत से तो नाता तोड़ लिया--और यह बड़ी घटना है। उन्होंने क्षुद्र से तो संबंध अलग कर लिया--और यह बहुत बड़ी क्रांति है। लेकिन आधी है क्रांति। अभी एक काम और करना है: विराट से संबंध जोड़ना है। जब विराट से भी संबंध जुड़ता है, तो अस्मिता भी खो जाती है। मैंने आपसे कहा, मैं हूं; इसमें दो शब्द हैं। मैं अहंकार है और हूं अस्मिता है। संत का मैं तो गिर जाता है, सिर्फ हूं रह जाता है--एमनेस, हूं। लाओत्से कहता है, यह संत की परिभाषा है कि उसकी अस्मिता अभी है, अहंकार खो गया। यह अस्मिता अगर सघन होती रहे, मजबूत होती रहे, तो अहंकार वापस लौट सकता है। अगर अस्मिता और जम जाए, गहरी हो जाए, तो अहंकार वापस लौट सकता है। यह अस्मिता पिघलती रहे--इसलिए यह बात भी लाओत्से ने जोड़ी कि संत की अस्मिता बर्फ की तरह पिघलती रहेगी; जैसे धूप में पड़ी बर्फ हो, पिघलती रहेगी--पिघलती रहे, तो एक दिन अस्मिता भी खो जाएगी। मैं तो खो गया; हूं भी एक दिन खो जाएगा। उस दिन शुद्ध अस्तित्व बचेगा। उस दिन, लाओत्से कहता है कि फिर संत भी कहने का कोई अर्थ न रहा। उस दिन वह व्यक्ति, वह लहर सागर के साथ एक हो गई। संत होना भी तो दूरी है। असंत बहुत दूर होगा; संत निकट होगा। लेकिन निकटता भी एक दूरी है। निकटता भी एकता नहीं है। संत भी दूर है। पास है, बहुत पास है, असंत से बहुत ज्यादा पास है। लेकिन कितने ही पास हो, फासला अभी कायम है। लाओत्से का अंतिम जो लक्ष्य है, वह है जब इतना फासला भी न रह जाए, पास होना भी मिट जाए। दूर होना तो मिट ही गया, पास होना भी मिट जाए। दूरी तो खो गई, निकटता भी खो जाए। तभी, तभी एकता उपलब्ध होगी। साधारणतः हमें दिखाई पड़ता है: दूरी खो गई, तो एकता हो गई। दूरी खोने से एकता नहीं होती, बल्कि सच तो यह है कि जितने निकट आते हैं, उतनी दूरी मालूम पड़ती है। असंत को कभी भी नहीं अखरती ईश्वर की दूरी। ईश्वर की दूरी असंत को अखरती ही नहीं। दूरी इतनी बड़ी है कि उसे पता भी नहीं चलता। वह पूछता है, कहां है ईश्वर? दूरी इतनी बड़ी है कि उसे ईश्वर कहीं दिखाई भी नहीं पड़ता। संत की पीड़ा बढ़ जाती है। निकट इतने होता है कि हाथ बढ़ाए और ईश्वर है, श्वास ले और ईश्वर है, हिले और ईश्वर से धक्का लगता है। इतनी निकटता है! और तभी, जिसको संतों ने विरह कहा है...। असंत को विरह पैदा नहीं होता। वह इतने दूर है कि विरह का कोई सवाल नहीं है। संत को विरह पैदा होता है। इतने निकट है, फिर भी एक नहीं हो पाता। वह निकटता भी कष्ट देने लगती है। बहुत झीना सा पर्दा रह जाता है। लेकिन दीवार हो बीच में, तो हमें दिखाई भी नहीं पड़ता उस पार। आकांक्षा भी नहीं होती; आशा भी नहीं उमड़ती; प्यास भी नहीं जगती। अहंकार पत्थर की दीवार है। अस्मिता बहुत ट्रांसपैरेंट, पारदर्शी कांच की दीवार है। उस पार सब दिखाई पड़ता है, जैसे बीच में कोई दीवार ही न हो। लेकिन जब भी संत बढ़ने की कोशिश करता है, तभी वह दीवार टकराती है। तब पीड़ा भारी हो जाती है और विरह सघन हो जाता है। संतों ने ही ईश्वर का विरह जाना है। संत भी वियुक्त है, अभी संयुक्त नहीं है। एक पारदर्शी दीवार संत को भी दूर करती है। जिस दिन यह पारदर्शी दीवार भी पिघल जाती है, उस दिन न दूरी रहती है, न निकटता रहती है। उस दिन एकता सधती है। उस दिन संत खो जाता है और परमात्मा ही शेष रह जाता है। यह जो अस्मिता है, यह आध्यात्मिक स्थिति है या मन की? यह भी पूछा है। यह मन की अंतिम स्थिति है और अहंकार मन की प्रथम स्थिति है। अहंकार मन की स्थूलतम स्थिति है, अस्मिता मन की सूक्ष्मतम। हम ऐसा समझें कि मन है बीच में। एक तरफ जगत है और एक तरफ परमात्मा है, और मन है बीच में। जहां मन जगत से जुड़ता है, वहां अहंकार पैदा होता है। और जहां मन परमात्मा से जुड़ता है, वहां अस्मिता खड़ी है। ये दो जोड़ हैं। जहां मन जगत से जुड़ता है, उस जोड़ का नाम है अहंकार। और जहां मनुष्य का मन परमात्मा से जुड़ता है या टूटता है--क्योंकि सब जोड़ तोड़ भी होते हैं; जहां चीजें जुड़ती हैं, वहीं टूटती भी हैं--वह है अस्मिता। संत लाओत्से कहता है उसे, जिसका पहला जोड़ टूट गया, जगत से संबंध विच्छिन्न हुआ; लेकिन जिसका अभी दूसरा तोड़ कायम है, अभी परमात्मा से एकता नहीं सधी। तो अस्मिता कायम है। अस्मिता मन का सूक्ष्मतम रूप है और अहंकार मन का स्थूलतम। लेकिन दोनों ही मन की घटनाएं हैं। ध्यान रहे, असंत भी मन है और संत भी। मन के बाहर जाकर तो दोनों नहीं रह जाते। श्रेष्ठतम भी मन के भीतर है और निकृष्टतम भी। क्योंकि मन के पार जाकर तो न श्रेष्ठ रहता है और न निकृष्ट। अशुभ भी मन का है, शुभ भी। बुरा भी मन का है, भला भी। मन के पार जाकर न तो बुरा रह जाता है और न भला। द्वंद्व खो जाते हैं। जब तक द्वंद्व है, तब तक जानना कि मन है। जहां द्वंद्व नहीं, वहां मन नहीं। संत भी द्वंद्व का हिस्सा है। असंत और संत दो छोर हैं द्वंद्व के। अगर यह खयाल में आ जाए, तो अंतिम छलांग! पहली छलांग अहंकार से और अंतिम छलांग अस्मिता से। पहली छलांग "मैं' से और अंतिम छलांग "होने' से। इसलिए बुद्ध अनात्मा की बात कहते हैं। बुद्ध ने अस्मिता की जगह आत्मा शब्द का उपयोग किया है। बुद्ध कहते हैं, अहंकार छूटे और फिर आत्मा भी छूटे; तभी परम सत्य में प्रवेश है। इस सारी बात में जो कठिनाई हमारे मन में होती है, वह यह कि फिर क्या ऐसे व्यक्ति को हम संत कहेंगे जो अभी मन में ही हो? क्या हम कहेंगे कि उसने परम सत्य को पा लिया? भाषा में सभी बातें सापेक्ष हैं, रिलेटिव हैं। जब हम कहते हैं, संत ने परम सत्य पा लिया, तो उसका इतना ही मतलब होता है कि जहां हम खड़े हैं, वहां से संत परम सत्य के बहुत निकट पहुंच गया। हमारे और सत्य के बीच पत्थर की दीवार है; उसके और सत्य के बीच कांच की दीवार है, जो दिखाई भी नहीं पड़ती। अब सत्य उसे इतना ही साफ है, जैसे कि दीवार न हो। लेकिन दीवार अभी है। वह दीवार हमें दिखाई नहीं पड़ेगी, एक बात समझ लें। जो स्वयं संत नहीं हो गए हैं, उन्हें वह दीवार बिलकुल दिखाई नहीं पड़ेगी। वे तो कहेंगे कि संत के लिए अब कोई दीवार न रही। लेकिन जो उस दीवार के पास पहुंच गया है, स्वयं संत, उसे वह दीवार पता चलेगी। क्योंकि दीवार पारदर्शी है; दिखाई नहीं पड़ती, लेकिन स्पर्श होता है। पार होना चाहो, तो सिर टकराता है। उस पार का सब कुछ दिखाई पड़ता है; लेकिन दिखाई ही पड़ता है, अगर उसमें प्रवेश करना चाहो, तो दीवार बीच में खड़ी हो जाती है। अस्मिता इतनी सूक्ष्म दीवार है कि सिर्फ संत को दिखाई पड़ती है। संत के भक्तों को भी दिखाई नहीं पड़ सकती। संत के भक्तों को तो लगता है कि संत परमात्मा हो गया। स्वाभाविक! संत के भक्तों ने कांच की कोई दीवार नहीं देखी, पत्थर की दीवारें देखी हैं। लेकिन संत को स्वयं प्रतिपल अनुभव होता है कि एक सूक्ष्म दीवार अभी भी उसे घेरे हुए है। अभी वह मिट नहीं गया है। अभी भी वह है। लाओत्से संत के अनुभव से कह रहा है कि अस्मिता भी पिघल जाए, पिघल जाए, खो जाए, तभी; उसके पहले नहीं। लेकिन हमारे अनुभव से हम कह सकते हैं कि संत ईश्वर हो गया। सापेक्ष है। हम भी जब संत होंगे, तब हम पाएंगे कि नहीं, अभी एक दीवार और रह गई है। अभी होना भी बाधा है। वह भी खो जाना चाहिए; वह भी मिट जाना चाहिए। जब तक संत की जगह शून्य न आ जाए, तब तक वह दीवार भी नहीं गिरती।

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जिस दिन तुम इस सत्य को समझ लेते हो कि इतना विराट जगत बिना कर्ता के चल रहा है, उस दिन अपनी इस छोटी सी जिंदगी मे क्यो यह कर्ता को बनाना, यह भी चलने दो, यह भी होने दो! इन दो बातों को समझकर कि इस संसार का न कोई प्रारंभ है, न अंत; और इस संसार को न कोई चलाने वाला है, न कोई नियोजन करने वाला है, यह विराट अपनी ही ऊर्जा से बहा जाता है, यह स्वयंभू है, भक्त भी मुक्त हो जाता है। ‘जन्म कर्म विदच अजन्म शब्दात्। इन दो शब्दों का अर्थ समझ में आ जाए, जन्म और कर्म, कि सब समझ में आ गया। तत् च दिव्यं स्व शक्ति मात्र उदभवात्। उनका जन्म कर्म आदि सभी दिव्य और असाधारण हैं;उनकी ही शक्ति से वे नाना रूप दिखाई पड़ते है। लेकिन हमें उस परमात्मा का तो कुछ पता नहीं है, वह परमात्मा तो बहुत दूर है, शायद हमारे पास उसे पकड़ने की आंख भी नहीं है, हाथ भी नहीं है, समझने की बुद्धि और प्रतिभा भी नहीं है, इसलिए शांडिल्य कहते है— भगवान के अवतारों को समझने की कोशिश करो। भगवान तो पकड़ में नहीं आता, लेकिन राम पकड़ मे आ जाते है, कृष्ण पकड़ में आ जाते हैं, बुद्ध पकड़ में आ जाते हैं, मोहम्मद पकड़ में आ जाते हैं, इनको पकड़ो, इनको समझो। बुद्ध के होने का क्या प्रयोजन है? बुद्ध को कौन चला रहा है? बुद्ध के भीतर ऐसा कोई भाव उठता है कि मैं अब ऐसा करूं, या जो होता है, होता है? इसमें बीच—बीच में बुद्ध कुछ बाधा डालते हैं, या निर्बाध इस जीवन की धारा को बहने देते हैं? परमात्मा दूर है, उसका अवतार निकट है। जिन्होंने परमात्मा को जान लिया है, उनका जीवन समझो, तो वहां भी तुम यही पाओगे कि समर्पण है, परम समर्पण है। जैसे वृक्ष में पत्ते लगते हैं और वृक्ष में फूल आते हैं, ऐसा कवि गीत को गाता है, बस ऐसे ही;ऐसे कृष्ण चलते हैं, उठते हैं, बैठते हैं;ऐसे ही बुद्ध बोलते हैं, समझाते हैं; हेएसे। ही बुद्ध जीते हैं और विदा हो जाते हैं;इसमें कहीं भी कोई अहंकार बैठकर आयोजन—नियोजन नहीं कर रहा है। उनका जन्म—कर्म आदि सभी दिव्य और असाधारण है। अवतारों को देखो तो बड़ी असाधारणता पाओगे। क्या असाधारणता है? क्या दिव्यता है? करने वाला कोई नहीं और विराट घटता है। करने वाला कोई भी नहीं। वही तो कृष्ण अर्जुन को बार—बार गीता में समझा रहे हैं कि तू करने वाला मत बन, तू होने दे, जो हो रहा है होने दे, तू उपकरण रह, निमित्त मात्र;तेरी कोई जिम्मेवारी नहीं है, तू अपने को बीच में मत ला, तू शुभ—अशुभ का निर्णय मत कर, तू कौन; तू अपने को विदा कर दे और फिर जो हो, जो परिस्थिति करवाए, कर, वही शुभ है। फल की भी आकांक्षा मत कर, क्योंकि फल की आकांक्षा में कर्ता आ जाता है —कर्ता जीता ही फल की आकांक्षा से है। मैं ऐसा करूं तो ऐसा होगा, मैं ऐसा करूं तो ऐसा मुझे मिलेगा, ऐसा करूं तो यह फल हाथ मे आएगा। फल की आकांक्षा छोड़ दे। फल की आकांक्षा छोड़ते ही कर्ता का भाव चला जाता है। फिर प्रयोजन क्‍या है, जब फल की ही कोई आकांक्षा नहीं है तो जो भी होगा ठीक ही है। होगा तो ठीक है, नहीं होगा तो ठीक है। इधर मैं तुम्हें रोज समझाता हूं। तुम समझे तो ठीक है, तुम नहीं समझे तो ठीक है। तुम सोचते हो मैं इसका हिसाब रखता हूं कि तुमने समझा कि नहीं समझा। इससे कोई प्रयोजन नहीं है। जैसे वृक्ष में फूल लग जाते हैं, ऐसे ये शब्द मुझ में लग जाते हैं। अगर तुम भी इस तरह जीओ तो तुम्हारे जीवन में असाधारण दिव्यता आ जाए। थोड़ा इस तत्व का रस लेना शुरू करो। उठो, बैठो, मगर न कोई उठने वाला हो, न कोई बैठने वाला हो। काम भी करो, दुकान पर भी जाओ, बाजार में भी, दफ्तर मे भी, मगर न कोई करने वाला हो, न कोई जाने वाला हो। घर की देख—रेख भी करो, जो भी दायित्व है सिर पर पूरा भी करो, लेकिन कोई करने वाला न हो। दुनिया में दो उपाय हैं बोझ से मुक्त होने के—एक तो यह है कि दायित्व छोड़ दो, भगोड़ा संन्यासी वही करता है। वह दायित्व ही छोड़ देता है; वह कहता है कि न रहेगा बांस, न बजेगी बासुरी;बात खतम; पत्नी—बच्चों को छोड़कर भाग गए जंगल! वह दायित्व छोड़ देता है। यह कोई असली संन्यास न हुआ। असली संन्यास है दायित्व तो होने दो, कर्ता छोड़ दो। तो भी बोझ चला जाता है। वही असली क्रांति है। यह कोई असली क्रांति न हुई, तुम अगर घर—बच्चे छोड़कर भाग गए, ज्यादा देर न लगेगी, पहाड़ की गुफा में भी बच्चे और पत्नी आ जाएंगे। किसी पहाड़ी स्त्री से लगाव बन जाएगा। तुम अपने से कहा जाओगे? शिष्य इकट्ठे हो जाएंगे, उन्हीं से तुम्हारा भाव हो जाएगा, वही जो तुम्हारा अपने बच्चों से था। उन्हीं से मोह लग जाएगा। कल तुम्हारा शिष्य मर जाएगा तो तुम उसी तरह रोओगे जिस तरह तुम्हारे बेटे के मरने से रोते। तो फर्क क्या हुआ? मकान छोड़कर चले गए, गुफा में बैठ गए, कल गुफा में भूकंप आ जाए और गुफा टूट जाए, तो तुम उसी तरफ दुखी होओगे जैसे मकान के आग लग जाने से हो जाते। भेद क्या पड़ा? तुमने स्थिति बदल ली, मनस्थिति तो वही की वही है। सब छोड़कर चले गए, एक भिक्षापात्र ले गए और रात किसी ने गुफा से चुरा लिया, तो तुम्हारे सुबह मन में वही होगा, वही भाव उठेंगे जो किसी ने तुम्हारी तिजोड़ी खोलकर सारा धन निकाल लिया होता तब उठते। कुछ भेद नहीं पड़ेगा। असली संन्यास कर्ता का त्याग है, दायित्व का नहीं। वही गीता का अपूर्व संदेश है। गीता ने जगत को ठीक संन्यास की पहली परिभाषा दी। गलत संन्यास बहुत पुराना था, गीता ने एक अनूठे संन्यास की परिभाषा दी। गीता ने कहा—रहो यहीं, जीओ यहीं, और फिर भी भीतर से सब शून्य हो जाए। अर्जुन से वे कह रहे है—तू लड़ और भीतर से शून्य भाव से लड़। तू परमात्मा के हाथ मे अपने को सौप दे—परमात्मा यानी समग्र के हाथ में अपने को सौप दे, फिर उसे जो करवाना हो, करवा ले। जीत होगी कि हार, यह भी विचारणीय नहीं है। तू है ही नहीं करने वाला, तो फिर फल विचारणीय नहीं हो सकता। अगर परमात्मा का जन्म और कर्म बहुत दूर की बात मालूम पड़े, बहुत एब्सटैरक्ट, हवाई बात मालूम पड़े, तो इस पृथ्वी पर जो कभी—कभी परमात्मा की थोड़ी सी झलक मिलती है, उनमें पहचानने को कोशिश करना। उनमे भी तुम वही पाओगे। वही शून्य भाव। भीतर कोई भी नहीं। कर्म का विराट जाल और कर्ता का अभाव। ‘मुख्य तस्य हि कारुण्यम्। उनकी करुणा ही उनके जन्म आदि का प्रधान कारण है। बुद्ध क्यों बोले? इसलिए नहीं कि बोलने से प्रसिद्ध होना है, इसलिए नहीं कि बोलने से शिष्यों की भीड़ इकट्ठी करनी है, इसलिए नहीं कि बोलने से कुछ लाभ है, इसलिए बोले कि बोलने से किसी को शायद लाभ हो जाए। इसलिए बोले कि जो मुझे मिल गया है, वह बंटे, शायद किसी के भीतर पड़ा हुआ बीज मेरे शब्दों की चोट से उमग आए;शायद किसी के भीतर पड़ा हुआ तार जिसे कभी छेड़ा नहीं गया, जग जाए—करुणा! जीवन के दो सूत्र है—एक वासना और एक करुणा। अज्ञानी वासना से जीता है, ज्ञानी करुणा से। और पृथ्वी और आसमान का फर्क हो जाता है दोनो में। वासना का अर्थ होता है, मैं यह कर रहा हूं ताकि मुझे वह मिले। करुणा का अर्थ होता है, यह मैं कर रहा हूं ताकि यह मैं दे सकूं। करुणा यानी दान। वासना भिखारी बनाती है, करुणा सम्राट। मुख्य तस्य हि कारुण्यम्। उनकी करुणा ही उनकी जीवन क्रिया—कलाप का आधार है। प्राणित्वात् न विभूतिषु। विभूतियों के प्रति की हुई भक्ति पराभक्ति नहीं है, क्योंकि वे प्राणधारी जीव हैं। शांडिल्य कहते हैं—लेकिन एक बात खयाल रखना किसी भी विभूति संपन्न व्यक्ति को तुम कितना ही आदर दो, भक्ति दो, वह श्रद्धा तक जाएगी, पराभक्ति नहीं हो पाएगी। मैंने तुम्हें शुरुआत में कहा—प्रीति—तत्व के चार रूप है। स्नेह;अपने से छोटे के प्रति, बच्चे के प्रति, शिष्य के प्रति। प्रेम;अपने से समान के प्रति, पति के प्रति, पत्नी के प्रति, मित्र के प्रति, भाई—बंधु के प्रति, पड़ोसी के प्रति। श्रद्धा;अपने से श्रेष्ठ के प्रति, मा के प्रति, पिता के प्रति, गुरु के प्रति। और भक्ति;परमात्मा के प्रति, समग्र के प्रति। विभूतियों के प्रति जो तुम्हारा भाव है, वह श्रद्धा है। शांडिल्य इस बात को इसलिए कह देना चाहते हैं कि अक्सर यह हो जाता है कि अवतारों से तुम इतने अभिभूत हो जाते हो कि तुम भूल ही जाते हो कि अभी एक कदम और लेना है। गुरु से तुम इतने आक्रात हो जाते हो कि तुम भूल ही जाते हो कि अभी एक कदम और लेना है। गुरु पर रुकना नहीं है, गुरु पर शुरुआत है। गुरु संसार और परमात्मा की बीच की कड़ी है। गुरु सेतु है, मगर सेतु पर घर नहीं बनाना होता, सेतु से आगे जाना है। सेतु का यही प्रयोजन है। इसलिए सदगुरु तुम्हें रुकने भी नहीं देगा। सदगुरु तुम्हें धक्के देगा। बुद्ध ने कहा है—अगर मैं रास्ते में मिल जाऊं, तो तलवार उठाकर मेरे दो टुकड़े कर देना। अगर मैं भी बाधा आऊं परमात्मा और तुम्हारे मिलने में, बीच में खड़ा हो जाऊं, तो मुझे हटा देना।

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श्री, स्थितप्रज्ञ और भक्त में क्या समानता है और क्या भिन्नता है, यह भी प्रश्न के पिछले अंश में था।'

स्थितप्रज्ञ और भक्त में क्या भेद या समानता है? स्थितप्रज्ञ का अर्थ है, जो अब भक्त नहीं रहा, भगवान हो गया। भक्त का अर्थ है, जो भगवान होने की यात्रा पर है। भक्त रास्ते में है, स्थितप्रज्ञ पहुंच गया है। रास्ता वही है, पहुंचना वहीं है। लेकिन यह मुकाम पर पहुंचे हुए आदमी का नाम है, स्थितप्रज्ञ। और भक्त यात्री का नाम है जो चल रहा है। समानता होगी ही, क्योंकि रास्ता और मंजिल जुड़े होते हैं--अन्यथा रास्ता मंजिल तक कैसे पहुंचेगा। समानता होगी ही, क्योंकि मंजिल सिर्फ रास्ते की पूर्णता है। जहां रास्ता पूरा हो जाता है, वहां मंजिल आ जाती है। समानता होगी ही, क्योंकि जो रास्ते पर है वह एक अर्थ में मंजिल पर ही है, थोड़ा फासला है, बस। "डिस्टेंस' का फासला है। अंतर जो है, वह पहुंचने का और पहुंचते होने का है। भक्त चल रहा है, स्थितप्रज्ञ बैठ गया, पहुंच गया। इसलिए भक्त के लिए वे सारी अपेक्षाएं हैं, जो स्थितप्रज्ञ की उपलब्धि बनेंगी। क्योंकि तभी वह वहां तक पहुंच सकेगा। भक्त की आखिरी मंजिल उसका भक्त होना मिट जाने की है। जब तक वह भगवान न हो जाए, तब तक तृप्ति नहीं हो सकती। भक्त कितना ही चिल्लाए और रोए परमात्मा के मिलन को और मिलन हो भी जाए और दोनों आलिंगनबद्ध खड़े भी हो जाएं, तो भी भक्त का चिल्लाना बंद नहीं होगा। क्योंकि आलिंगन कितने ही निकट हो फिर भी दूर है। और हम किसी को कितने ही छाती से लगा लें, फिर भी दोनों के बीच फासला है। अंतर तो पूर्ण तभी मिट सकता है जब एक ही हो जाएं। इंच भर का अंतर भी उतना ही है जितना लाख मील का अंतर है। अंतर में कोई फर्क नहीं पड़ता। इंच के हजारवें हिस्से का अंतर भी उतना ही अंतर है जितना कि लाख मील का अंतर है। तो भक्त की तृप्ति तब भी नहीं हो सकती जब भगवान की छाती से लगकर वह बैठ जाए, तब भी नहीं हो सकती। तब भी फासला है। यह तकलीफ तो प्रेमी की है। प्रेमी का कष्ट यही है कि वह कितने ही पास आ जाए, तो भी दुखी रहेगा। प्रेमी को कितना ही पा ले तो भी दुखी रहेगा। अगर यह बात समझ में आ जाए तो उसका दुख असल में यह है कि जब तक वह प्रेमी ही न हो जाए तब तक दुखी रहेगा, और यह होना बड़ा मुश्किल है। प्रेम के तल पर तो होना मुश्किल है। बहुत मुश्किल है। कैसे यह होगा! कितने ही पास आते हैं, इसलिए प्रेमी जितने पास जाएंगे उतना ही कष्ट शुरू होने लगेगा। क्योंकि जितने पास आएंगे उतना "डिसइलूज़नमेंट' होगा। दूर थे तो यह खयाल था कि पास आने से सुख मिल जाएगा। फिर जब पास ही आ गए, अब कैसे सुख मिलेगा! अब और पास आने का कोई उपाय ही न रहा। और तब प्रेमी एक-दूसरे पर क्रोधित होना शुरू हो जाते हैं। शायद सोचते हैं कि दूसरा कुछ बाधा डाल रहा है; दूसरा कोई नुकसान पहुंचा रहा है, दूसरा शायद ठीक से प्रेम नहीं कर रहा है; दूसरा शायद धोखा दे गया, दूसरा शायद किसी और के प्रेम में पड़ गया है, यह प्रेमी की चिंता शुरू हो जाती है पास आने पर। असली कारण यह है कि प्रेमी तब तक तृप्त नहीं हो सकता जब तक कि वह इतने निकट न आ जाए कि दूरी ही न बचे। यह तो तभी हो सकता है जब वह एक हो जाए। इसलिए जो भी प्रेमी हैं, वे आज नहीं कल भक्त बनने शुरू हो जाएंगे, क्योंकि तब फिर शरीरधारी व्यक्ति के इतने निकट आना असंभव है। तब अशरीरी परमात्मा के निकट ही इतना आया जा सकता है, जहां कि कोई फासला ही न बचे। तो सब प्रेमी आज नहीं कल भक्त बनेंगे और सब प्रेम-निवेदन आज नहीं कल प्रार्थना बन जाते हैं। अंततः बनने ही चाहिए। अन्यथा दुख देते रहेंगे। जो प्रेमी भक्त नहीं बन पाता, वह सदा दुखी रहेगा। क्योंकि आकांक्षा उसकी भक्त की है और मांग वह प्रेम से पूरी करना चाह रहा है। चाहता कुछ और है, कर कुछ और रहा है। चाहता वह यह है कि बिलकुल एक हो जाऊं, इतना फासला भी न रहे कि मैं और तू का फासला भी बचे, चाहता वह यह है। लेकिन जिससे वह यह करना चाह रहा है उससे यह नहीं हो सकता है। उससे मैं और तू का फासला बना ही रहेगा। दो व्यक्ति कभी इतने निकट नहीं आ सकते जहां कि मैं और तू का फासला गिर जाए, सिर्फ दो अव्यक्ति इतने निकट आ सकते हैं जहां मैं और तू का फासला मिट जाए। परमात्मा अव्यक्ति है। जिस दिन भक्त भी अव्यक्ति हो जाएगा, उस दिन उपलब्धि हो जाएगी। जब तक भक्त बचा है--परमात्मा तो है ही नहीं इस अर्थ में, जिस अर्थ में भक्त है। परमात्मा का तो होना न-होने जैसा है। उसकी उपस्थिति अनुपस्थिति जैसी है। यह बड़े मजे की बात है। यह थोड़ा खयाल में लेना जरूरी है। अगर हम निरंतर पूछते हैं--दुनिया में सारे भक्तों ने पूछा है--कि परमात्मा प्रगट क्यों नहीं होता? क्योंकि अगर परमात्मा प्रगट हो जाए तो उससे मिलन असंभव है। सिर्फ अप्रगट से ही पूर्ण मिलन हो सकता है। भक्तों ने निरंतर पूछा है कि तुम छिपे क्यों हो? सामने क्यों नहीं आते हो? अगर वह सामने आ जाए तो इतना बड़ा पर्दा गिर जाएगा कि फिर मिलन हो ही नहीं सकता है। वह छिपा है, इसलिए मिलने की संभावना है। वह अदृश्य है, इसलिए उसमें डूबा जा सकता है। वह दृश्य बन जाए तो दीवाल बन जाएगी और मिलन असंभव है। एक बहुत अदभुत फकीर इकहार्ट ने कहा है, परमात्मा को धन्यवाद दिया है कि तेरी अनुकंपा अपार है कि तू दिखाई नहीं पड़ता। तेरी अनुकंपा अपार है कि तू पकड़ में नहीं आता। तेरी अनुकंपा अपार है कि तू खोजे से कहीं भी नहीं मिलता, कहीं भी नहीं पाते हैं तुझे। क्यों है तेरी अनुकंपा अपार? क्योंकि इस भांति तू हमें भी यह निरंतर सिखाए जाता है कि जब तक तुम भी ऐसे न हो जाओ कि खोजे से न मिलो, कि जब तक तुम भी ऐसे न हो जाओ कि दिखाई न पड़ो, जब तक तुम भी ऐसे न हो जाओ कि न-होने जैसे हो जाओ, तब तक मिलन असंभव है। भगवान तो अरूप है, जिस दिन भक्त भी अरूप हो जाता है उस दिन मिलन हो जाता है। इसलिए बाधा सिर्फ भक्त की तरफ से है, भगवान की तरफ से कोई बाधा नहीं है। स्थितप्रज्ञ का अर्थ है, भक्त जो अरूप हो गया। अब वह भगवान को भी नहीं चिल्लाता, क्योंकि कौन चिल्लाए? अब वह प्रार्थना भी नहीं करता, क्योंकि कौन करे? किसकी करे? या अब हम ऐसा कह सकते हैं कि वह जो भी करता है वही प्रार्थना है। या अब वह जो भी चिल्लाता है या नहीं चिल्लाता है, वही भगवान के लिए निवेदन है। अब हम दोनों तरह से कह सकते हैं। स्थितप्रज्ञ का अर्थ है कि मनुष्य भी वैसा हो गया जैसा परमात्मा है। भक्त का अर्थ है कि उसने यात्रा तो शुरू की परमात्मा की तरफ, लेकिन अभी वह मनुष्य है। और उसकी सब आकांक्षाएं, अपेक्षाएं मनुष्य की हैं। मीरा कितनी चिल्ला रही है। उसके गीत बड़े अदभुत हैं। इस अर्थ में अदभुत हैं कि वे बड़े मानवीय हैं। उसकी सारी चिल्लाहट एक प्रेमी की चिल्लाहट है। एक भक्त की। वह कहती है कि सेज सजा दी और तुम आ जाओ। अब मैं तुम्हारे लिए द्वार खोल कर प्रतीक्षा कर रही हूं। ये सब मानवीय प्रतीक्षाएं हैं। भक्त का मतलब है, मनुष्य जो परमात्मा की तरफ चल पड़ा, लेकिन अभी मनुष्य है। स्थितप्रज्ञ का अर्थ है, मनुष्य अब मनुष्य नहीं रहा, अब वह किसी की तरफ नहीं जा रहा है, अब जाने का कोई सवाल नहीं रहा, अब वह जहां है वहीं है और वहीं परमात्मा तो सदा था, सिर्फ हम अरूप हो जाते, हम अदृश्य हो जाते, हम न हो जाते। जीसस का वचन है, जो अपने को बचाएगा, वह खो देगा। और जो अपने को खो देता है, वह पा लेता है। स्थितप्रज्ञ ने अपने को खो दिया, इसलिए पा लेता है। भक्त अभी पाने चला है, और खुद है। अनुभव उसे धीरे-धीरे मिटाएगा। कबीर का वचन है कि खोजते-खोजते फिर मैं ही खो गया। और कोई उपाय न था। खोजने निकले थे किसी को। आखिर में पाया कि खोज ने खुद को ही छीन लिया। "हेरत हेरत हे सखी, गया कबीर हेराय'। खोजने निकले थे सखी, लेकिन आखिर ऐसा हुआ कि वह तो मिला नहीं, खुद ही खो गए। लेकिन जिस दिन खो गए, उस दिन खोज पू