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SHORT QUES. OF SADHANA-04


चक्र और नींद

जो व्यक्ति मूलाधार चक्र पर केंद्रित है उसकी नींद गहरी न होगी। उसकी नींद उथली होगी क्योंकि यह दैहिक तल पर जीता है। भौतिक स्तर पर जीता है। मैं इन चक्रों कि व्याख्या इस प्रकार भी कर सकता हूं। प्रथम, भौतिक—मूलाधार। दूसरा, प्राणाधार—स्वाधिष्ठान। तीसरा, काम या विद्युत केंद्र—मणिपूर। चौथा, नैतिक अथवा सौंदयपरक—अनाहत। पांचवां, धार्मिक—विशुद्ध। छठा, आध्यात्मिक—आज्ञा। सातवां, दिव्य—सहस्त्रार।

जैसे-जैसे ऊपर जाओगे तुम्हारी नींद गहरी हो जाएगी। और इसका गुणवता बदल जायेगी। जो व्यक्ति भोजन ग्रसित है और केवल खाने के लिए जीता है। उसकी नींद बेचैन रहेगी। उसकी नींद शांत न होगी। उसमें संगीत न होगा। उसकी नींद एक दु:ख स्वप्न होगी। जिस व्यक्ति का रस भोजन में कम होगा और जो वस्तुओं की बजाएं व्यक्तियों में अधिक उत्सुक होगा, लोगों के साथ जुड़ना चाहता है। उसकी नींद गहरी होगी। लेकिन बहुत गहरी नहीं। निम्नतर क्षेत्र में कामुक व्यक्ति की नींद सर्वाधिक गहरी होगी। यही कारण है कि सेक्स का लगभग ट्रैक्युलाइजर, नशे की तरह उपयोग किया जाता है। यदि तुम सो नहीं पार रहे हो तो और तुम संभोग में उतरते हो तो शीध्र ही तुम्हें नींद आ जायेगी। संभोग तुम्हें तनाव मुक्त करता है। पश्चिम में चिकित्सक उन सबको सेक्स की सलाह देते है जिन्हें नींद नहीं आ रहा है। अब तो वे उन्हें भी सेक्स की सलाह देते है जिन्हें दिल का दौरा पड़ने का खतरा है। क्योंकि सेक्स तुम्हें विश्रांत करता है। तुम्हें गहरी नींद प्रदान करता है। निम्न तल पर सेक्स तुम्हें सर्वाधिक गहरी नींद देता है।

जब तुम और ऊपर की और जाते हो, चौथे अनाहत चक्र पर तो नींद अत्यंत निष्कंप, शांत, पावन व परिष्कृत हो जाती है। जब तुम किसी से प्रेम करते हो तो तुम अत्यंत अनूठी विश्रांति का अनुभव करते हो। मात्र विचार कि कोई तुम्हें प्रेम करता है। और तुम किसी से प्रेम करते हो। तुम्हें विश्रांत कर देता है। सब तनाव मिट जाते है। एक प्रेमी व्यक्ति गहरी निद्रा जानता है। घृणा करो तो तुम सो न पाओगे। क्रोध करो तो तुम सो न पाओगे। तुम नीचे गिर जाओगे। प्रेम करो, करूणा करो। और तुम गहरी नींद आएगी।

पांचवें चक्र के साथ नींद लगभग प्रार्थना पूर्ण बन जाती है। इसी लिए सब धर्म लगभग आग्रह करते है कि सोने से पहले तुम प्रार्थना करो। प्रार्थना को निद्रा के साथ जोड़ दो। प्रार्थना के बिना कभी मत सोओ। ताकि निद्रा में भी तुम्हें उसके संगीत का स्पंदन हो। प्रार्थना की प्रतिध्वनि तुम्हारी नींद को रूपांतरित कर देती है। पांचवां चक्र प्रार्थना है—और यदि तुम प्रार्थना कर सकते हो तो और अगली सुबह तुम चकित होओगे। तुम उठोगे ही प्रार्थना करते हुए। तुम्हारा जागना ही एक तरह की प्रार्थना होगी। पांचवें चक्र में नींद प्रार्थना बन जाती है। यह साधारण नींद नहीं रहती। तुम निद्रा में नहीं जा रहे। बल्कि एक सूक्ष्म रूप से परमात्मा में प्रवेश कर रहे हो। निद्रा एक द्वार है जहां तुम अपना अहंकार भूल जाते हो। और परमात्मा में खो जाना आसान होता है। जो कि जाग्रत अवस्था में नहीं हो पाता। क्योंकि जब तुम जागे हुए होते हो तो अहंकार बहुत शक्तिशाली होता है।

जब तुम गहरी निद्रावस्था में प्रवेश कर जाते हो तुम्हारी आरोग्यता प्रदान करने वाली शक्तियों की क्षमता सर्वाधिक होती है। इसीलिए चिकित्सक का कहना है कि यदि कोई व्यक्ति बीमार है और सो नहीं पाता तो उसके ठीक होने की संभावना कम हो जाती है। क्योंकि आरोग्यता भीतर से आती है। आरोग्यता तब आती है। जब अहंकार का आस्तित्व बिलकुल नहीं बचता। जो व्यक्ति पांचवें चक्र—प्रार्थना के चक्र तक पहुंच गया है। उसका जीवन एक प्रसाद बन जाता है। जब वह चलता है तो उसकी भाव भंगिमाओं में आप एक विश्रांति का गुण पाओगे। आज्ञा चक्र, अंतिम चक्र है जहां नींद श्रेष्ठतम हो जाती है। इसके पार नींद की आवश्यकता नहीं रहती, कार्य समाप्त हुआ। छटे चक्र तक निद्रा की आवश्यकता है। छठे चक्र में निद्रा ध्यान में रूपांतरित हो जाती है। प्रार्थना पूर्ण ही नहीं,ध्यानपूर्ण। क्योंकि प्रार्थना में द्वैत है। मैं और तुम, भक्त और भगवान। छठवें में द्वैत समाप्त हो जाता है। निद्रा गहन हो जाती है। इतनी जितनी की मृत्यु। वास्तव में मृत्यु और कुछ नहीं बल्कि एक गहरी नींद है और कुछ नहीं बल्कि एक छोटी-सी मृत्यु है। छठे चक्र के साथ नींद अंतस की गहराई तक प्रवेश हो जाती है। और कार्य समाप्त हो जाता है। जब तुम छठे से सातवें तक पहुंचते हो तो निद्रा की आवश्यकता नहीं रहती। तुम द्वैत के पार चले गए हो। तब तुम कभी थकते ही नहीं। इसलिए निद्रा की आवश्यकता नहीं रहती है। यह सातवीं अवस्था विशुद्ध जागरण की अवस्था है।

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साक्षी का मतलब है: देखने वाला, गवाह।

मैं शरीर नहीं हूं, ऐसा किसको अनुभव होता है? मैं मन नहीं हूं, ऐसा किसको अनुभव होता है? ऐसा कौन इनकार करता चला जाता है कि मैं यह नहीं हूं, मैं यह नहीं हूं, मैं यह नहीं हूं?

एक तत्व है हमारे भीतर दर्शन का, दृष्टि का, द्रष्टा का, देखने का। हम देख रहे हैं; हम जांच रहे हैं। वह जो देख रहा है, वही है साक्षी; जो दिखाई पड़ रहा है, वही है जगत। जो देख रहा है, वही हूं मैं; और जो दिखाई पड़ रहा है, वही है जगत। अभ्यास का अर्थ है कि जो देख रहा है, वह भूल से यह समझ लेता है कि जो दिखाई पड़ रहा है वह मैं हूं। यह अभ्यास है। एक हीरा मेरे हाथ में रखा है। उसे मैं देख रहा हूं। अगर मैं यह कहने लगूं कि मैं हीरा हूं तो अभ्यास होगा। क्योंकि हीरा मेरे हाथ पर रखा है, दिखाई पड़ रहा है, आब्जेक्ट है, एक विषय है, और मैं देखना वाला हूं, अलग हूं। देखना वाला सदा ही अलग है उससे जो दिखाई पड़ता है। देखने वाला कभी भी दृश्य के साथ एक नहीं है। देखने वाला सदा ही दिखाई पड़ने वाले से भिन्न है। मैं आपको देख रहा हूं क्योंकि आपसे भिन्न हूं, आप मुझे देख रहे हैं क्योंकि मैं आपसे भिन्न हूं। जो भी दिखाई पड़ता है वह आपसे भिन्न है। उसको ही अपने से अभिन्न समझ लेना अध्यास है। जिसको आप देख रहे हैं उसके साथ इतने मोहित हो जाना कि लगने लगे यह मैं ही हूं, यही भ्रांति है। इस भ्रांति को तोड़ना है और अंततः उस शुद्ध तत्व को खोज लेना है जो सदा ही देखने वाला है और कभी दिखाई नहीं पड़ता।

यह थोड़ा कठिन है। जो देखने वाला है वह कभी दिखाई नहीं पड़ सकता। क्योंकि वह किसको दिखाई पड़ेगा? आप सारी चीजों को देख सकते हैं जगत की, सिर्फ अपने को छोड़ कर। आप अपने को कैसे देखिएगा? क्योंकि देखने में दो की तो जरूरत पड़ेगी ही – जो देखे और जो दिखाई पड़े। आप सब कुछ देख सकते हैं, अपने भर को आप नहीं देख सकते हैं। कैसे देखिएगा? किसी चिमटे से हम उसी चिमटे को पकड़ने की कोशिश करने लगें! सब पकड़ सकते हैं उस चिमटे से, सिर्फ उसी चिमटे को पकड़ने की कोशिश असफल जाएगी। और तब बड़ी मुश्किल होगी कि यह चिमटा भी कैसा पागल है! सब कुछ पकड़ लेता है तो अपने को क्यों नहीं पकड़ पाता?

हम सब कुछ देख लेते हैं, अपने को नहीं देख पाते। देख भी नहीं पाएंगे। और जिसको भी हम देख लेंगे, जान लेना कि वह हम नहीं हैं। तो जिस चीज को भी आप देखने में समर्थ हो जाएं, आप समझ लेना कि इतनी बात तय हो गई कि यह मैं नहीं हूं। कोई आदमी अगर ईश्वर का दर्शन कर ले, तो समझ लेना एक बात पक्की हो गई कि आप ईश्वर नहीं हैं। आपको भीतर प्रकाश का दर्शन हो जाए, तो समझ लेना एक बात पक्की हो गई कि आप प्रकाश नहीं हैं। आपको भीतर आनंद का अनुभव हो जाए, तो आप एक बात पक्की समझ लेना कि आप आनंद नहीं हैं। जिस चीज का भी अनुभव हो जाए वह आप नहीं हैं। आप तो वह हैं जिसको अनुभव होता है। तो जो भी चीज अनुभव बन जाती है, उसके आप पार हो जाते हैं। इसलिए एक कठिन बात समझ लेनी उपयोगी होगी, कि अध्यात्म कोई अनुभव नहीं है। दुनिया में सब चीजें अनुभव हैं, अध्यात्म कोई अनुभव नहीं है। अध्यात्म तो उसकी तरफ पहुंच जाना है जिसको सब अनुभव होता है और जो स्वयं कभी अनुभव नहीं बनता – अनुभोक्ता, साक्षी, द्रष्टा।

आपको मैं देखता हूं; उधर आप हैं, इधर मैं हूं। उधर आप हैं जो दिखाई पड़ रहा है; इधर मैं हूं जो देख रहा है। ये दो हैं। अपने को बांटने का कोई उपाय नहीं है कि मैं अपने को दो टुकड़े में कर लूं, और एक देखे और एक दिखाई पड़े। अगर टुकड़ा हो सके – दो टुकड़े हो सकें – तो जो टुकड़ा देखेगा, वही मैं हूं; और जो टुकड़ा दिखाई पड़ेगा, वह मैं नहीं रहा। वह बात समाप्त हो गई। वह मुझसे टूट गया। वह अलग हो गया।

उपनिषद की व्यवस्था, प्रक्रिया, विधि यही है: नेति – नेति। जो भी दिखाई पड़ जाए, कहो कि यह भी नहीं। जो भी अनुभव में आ जाए, कहो यह भी नहीं। और हटते जाओ पीछे, हटते जाओ पीछे, हटते जाओ पीछे। उस समय तक हटते जाओ, जब तक कि कोई भी चीज इनकार करने को बाकी रहे।

एक ऐसी घड़ी आती है, सब दृश्य खो जाते हैं। एक ऐसी घड़ी आती है, सब अनुभव गिर जाते हैं… सब। ध्यान रखना, सब। कामवासना का अनुभव तो गिरता ही है, ध्यान का अनुभव भी गिर जाता है। संसार के, राग-द्वेष के अनुभव तो गिर ही जाते हैं, आनंद, समाधि, इनके भी अनुभव गिर जाते हैं। बच रहता है खालिस देखने वाला। कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता, शून्य हो जाता है चारों तरफ। रह जाता है केवल देखने वाला और चारों तरफ रह जाता है खाली आकाश। बीच में खड़ा रह जाता है द्रष्टा, उसे कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता; क्योंकि उसने सब इनकार कर दिया। जो भी दिखाई पड़ता था, हटा दिया मार्ग से। अब उसे कुछ भी अनुभव नहीं होता। हटा दिए सब अनुभव। अब बच रहा अकेला, जिसको अनुभव होता था।

जब कोई भी अनुभव नहीं होता, और कोई दर्शन नहीं होता, और कोई दिखाई नहीं पड़ता, और कोई विषय नहीं रह जाता, और जब साक्षी अकेला रह जाता है, तब कठिनाई है भाषा में कहने की कि क्या होता है। क्योंकि हमारे पास अनुभव के सिवाय कोई शब्द नहीं है। इसलिए इसे हम कहते हैं आत्म-अनुभव, लेकिन अनुभव शब्द ठीक नहीं है। हम कहते हैं चेतना का अनुभव या ब्रह्म-अनुभव। लेकिन यह शब्द, कोई भी शब्द ठीक नहीं है; क्योंकि अनुभव उसी दुनिया का शब्द है, जिसको हमने तोड़ डाला। अनुभव उस द्वैत की दुनिया में अर्थ रखता है जहां दूसरा भी था, यहां अब कोई अर्थ नहीं रखता। यहां सिर्फ अनुभोक्ता बचा, साक्षी बचा।

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निर्विचार कैसे हुआ जाए?

जिसे निर्विचार होना हो, उसे व्यर्थ के विचारों को लेना बंद कर देना चाहिए । इसकी सजगता उसके भीतर होनी चाहिए कि वह व्यर्थ के विचारों का पोषण न करे, उन्हें अंगीकार न करे, उन्हें स्वीकार न करे और सचेत रहे कि मेरे भीतर विचार इकट्ठे न हो जाएं। इसे करने के लिए जरूरी होगा कि वह विचारों में जितना भी रस हो, उसको छोड़ दे।

हमें विचारों में बहुत रस है। अगर आप एक धर्म को मानते हैं, तो उस धर्म के विचारों में आपको बहुत रस है। जिसे निर्विचार होना है, उसे विचारों के प्रति विरस हो जाना चाहिए। उसे किसी विचार में कोई रस नहीं रह जाना चाहिए। उसे यह सोचना चाहिए कि विचार से कोई प्रयोजन नहीं, इसलिए उसमें कोई रस रखने का कारण नहीं। कैसे वह विरस होगा?

यह संभव होगा विचारों के प्रति जागरूकता से। अगर हम अपने विचारों के साक्षी बन सकें—और यह बन सकना कठिन नहीं है—अगर हम अपने विचारों की धारा को दूर खड़े होकर देखना शुरू करें, तो क्रमशः जिस मात्रा में आपका साक्षी होना विकसित होता है, उसी मात्रा में विचार शून्य होने लगते हैं।

विचार को शून्य करने का उपाय है विचार के प्रति पूर्ण सजग हो जाना। जो व्यक्ति जितना सजग हो जाएगा विचारों के प्रति, उतने ही विचार उसी भांति उसके मन में नहीं आते, जैसे घर में दीया जलता हो तो चोर न आएं। और घर में अंधकार हो तो चोर झांकें और अंदर आना चाहें।

भीतर जो होश को जगा लेता है, उतने ही विचार क्षीण होने लगते हैं। जितनी मूर्च्छा होती है भीतर, जितना सोयापन होता है भीतर, उतने ज्यादा विचारों का आगमन होता है। जितना जागरण होता है, उतने ही विचार क्षीण होने लगते हैं।

निर्विचार होने का उपाय है: विचारों के प्रति साक्षी-भाव को साधना। कोई एक क्षण में सध जाएगा, यह नहीं कहता। कोई एक दिन में सध जाएगा, यह भी नहीं कह रहा हूं। लेकिन अगर निरंतर प्रयास हो, तो थोड़े ही दिनों में आपको पता चलेगा कि जैसे-जैसे आप विचारों को देखने लगेंगे...कभी घंटे भर को किसी एकांत कोने में बैठ जाएं और कुछ भी न करें, सिर्फ विचारों को देखते रहें। कुछ भी न करें उनके साथ, कोई छेड़-छाड़ न करें, सिर्फ उन्हें देखते रहें। और देखते-देखते ही धीरे-धीरे आपको पता चलेगा,

वे कम होने लगे हैं। देखना जैसे-जैसे गहरा होगा, वैसे-वैसे वे विलीन होने लगेंगे। जिस दिन देखना पूरा हो जाएगा, जिस दिन आप अपने भीतर आर-पार देख सकेंगे, जिस दिन आपकी आंख बंद होगी और आपकी दृष्टि भीतर पूरी की पूरी देख रही होगी, उस दिन आप पाएंगे—कोई विचार का कोलाहल नहीं है, वे गए। और जब वे चले गए होंगे, उसी शांत क्षण में आपको अदभुत दृष्टि, अदभुत दर्शन, अदभुत आलोक का अनुभव होगा। वह अनुभव ही सत्य का दर्शन है। और वही अनुभव स्वयं का दर्शन है। स्वयं के माध्यम से ही सत्य जाना जाता है। और कोई द्वार नहीं है।

स्वयं के द्वार से ही सत्य को जाना जाता है। और सत्य को जान लेना आनंद में प्रतिष्ठित हो जाना है। असत्य में होना दुख में होना है। अज्ञान में होना दुख में होना है। और सत्य की उस ज्ञान-दशा में आनंद उपलब्ध होता है। आनंद और आत्मा अलग न समझें। आनंद और सत्य अलग न समझें। स्वयं और सत्य अलग न समझें। ऐसी जो प्रक्रिया का उपयोग क्रमशः अपने जीवन में करेगा, वह कभी निर्विचार को अनुभव कर लेता है। निर्विचार को जो अनुभव कर लेता है, उसकी पूरी विचार की शक्ति जाग्रत हो जाती है, उसे च्रु मिल जाते हैं।

जैसे किसी ने अंधेरे में प्रकाश कर दिया हो या जैसे किसी ने अंधे को आंख दे दी हों, ऐसा उसे अनुभव होता है। यह अगर क्रमिक साधना इसकी हो तो निश्चित ही उपलब्ध हो सकता है। प्रत्येक व्यक्ति अधिकारी है और हकदार है। जो अपने अधिकार, को मांगेगा, उसे मिल जाता है। जो उसे छोड़े रखता है, वह खो देता है। जिन खोजा तिन पाइया

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साक्षी की तलाश ही अध्यात्म है। ध्यान देना, ईश्वर की तलाश अध्यात्म नहीं है। पुराने योग—सूत्रों ने ईश्वर की चर्चा ही नहीं की, बात ही नहीं उठाई; कोई जरूरत न थी।

बाद में योग—सूत्रों ने ईश्वर की चर्चा भी की तो उसको भी एक अध्यात्म की खोज का साधन कहा, साध्य नहीं। उसे भी कहा कि यह साधना में सहयोगी होता है इसलिए ईश्वर को मान लेना अच्छा है। साधना में सहयोगी होता है, अध्यात्म की खोज में, इसलिए मान लेना अच्छा है। एक उपकरण है, ईश्वर भी एक विधि है, बस।

इसलिए बुद्ध ने इनकार कर दिया, महावीर ने ईश्वर को इनकार कर दिया। उन्होंने दूसरी विधिया खोज लीं। उन्होंने कहा, इस विधि की कोई भी जरूरत नहीं है। अगर विधि ही है ईश्वर, तो फिर दूसरी विधियों से भी काम चल सकता है।

लेकिन बुद्ध और महावीर भी साक्षी को इनकार नहीं कर सकते; ईश्वर को इनकार कर सकते हैं। सब कुछ इनकार किया जा सकता है, लेकिन अध्यात्म की जो आत्यंतिक आधारशिला है वह साक्षी है, उसे इनकार नहीं किया जा सकता।

इसलिए चाहे ईसाइयत, चाहे इस्लाम, चाहे हिंदू चाहे जैन, चाहे बौद्ध, एक बात आप खोज लेना — अगर किसी भी धर्म में साक्षी की कोई बात हो, तो समझना कि वह धर्म है; अगर साक्षी की बात ही न हो, तो समझना कि उसका धर्म से कोई भी संबंध नहीं है। और सब बातें गौण हैं; और सब बातें उपयोगी, गैर—उपयोगी हैं, और सब बातों में मतभेद हो सकता है, साक्षी के मामले में मतभेद नहीं हो सकता।

इसलिए अगर किसी दिन दुनिया में धर्म का विज्ञान निर्मित होगा तो उसमें ईश्वर, आत्मा, ब्रह्म, इन सबकी चर्चा नहीं होगी, क्योंकि ये सब स्थानीय बातें हैं, कोई धर्म मानता है, कोई नहीं मानता; लेकिन साक्षी की चर्चा जरूर होगी, क्योंकि साक्षी स्थानीय घटना नहीं है।

धर्म ही नहीं हो सकता बिना साक्षी के। तो साक्षी भर एक वैज्ञानिक आधारशिला है समस्त धर्म— अनुभव की, समस्त धर्म की खोज और यात्रा की। और इस साक्षी पर ही सारे उपनिषद घूमते हैं, इर्द —गिर्द।

सारे सिद्धात और सारे इशारे इस साक्षी को दिखाने के लिए हैं।

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भगवान, भक्त की चरम अवस्था ;-

चरम अवस्था के संबंध में कभी कुछ कहा नहीं जा सकता। और भक्त की चरम अवस्था के संबंध में तो और भी कुछ नहीं कहा जा सकता।

एक तो चरम अवस्था का अर्थ ही होता है, शब्दों के जो पर गयी। फिर भक्त भी चरम अवस्था, भाव की चरम अवस्था, वह तो शब्दों से बहुत दूर चली गयी, बहुत दूर चली गयी! शब्दों की पृथ्वी बहुत पीछे छूट गयी।

भक्त तो मिट ही जाता है अपनी चरम अवस्था में, भगवान ही शेष रह जाता है।

तो या तो कुछ भक्तों ने कहा है: मैं नहीं हूं, तू है।

या कुछ भक्तों ने कहा: मैं ही हूं, तू नहीं है।

दोनों बातें कही जा सकती हैं। दोनों का एक ही अर्थ है।

एक ही बचा, अब उसे भक्त कहो, या भगवान कहो, यह तुम्हारी मौज।

अहं ब्रह्मास्मि। मैं ही बचा हूं, मैं ही ब्रह्म हूं; या ब्रह्म ही बचा है, अब मैं कहां?

उस चरम अवस्था में तो सब शून्य हो जाता है।

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ईशावास्‍य उपनिषाद--

सूत्र :

ओम पूर्णमद: पूर्णमिद पूर्णात्पूर्णमुदव्यते।

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।

ओम शांति: शांति: शांति:।

ओम वह पूर्ण है और यह भी पूर्ण है; क्योंकि पूर्ण से पूर्ण की ही

उत्पत्ति होती है। तथा पूर्ण का पूर्णत्व लेकर पूर्ण ही बच रहता है।

ओम शांति, शांति, शांति।

यह महावाक्य कई अर्थों में अनूठा है। एक तो इस अर्थ में कि ईशावास्य उपनिषद इस महावाक्य पर शुरू भी होता है और पूरा भी। जो भी कहा जाने वाला है, जो भी कहा जा सकता है, वह इस सूत्र में पूरा आ गया है। जो समझ सकते हैं, उनके लिए ईशावास्य आगे पढ़ने की कोई भी जरूरत नहीं है। जो नहीं समझ सकते हैं,शेष पुस्तक उनके लिए ही कही गई है।

इसीलिए साधारणत: ओम शांति: शांति: शांति: का पाठ, जो कि पुस्तक के अंत में होता है, इस पहले वचन के ही अंत में है। जो जानते हैं, उनके हिसाब से बात पूरी हो गई है। जो नहीं जानते हैं,उनके लिए सिर्फ शुरू होती है।

इसलिए भी यह महावाक्य बहुत अदभुत है कि पूरब और पश्चिम के सोचने के ढंग का भेद इस महावाक्य से स्पष्ट होता है।

दो तरह के तर्क, दो तरह की लाजिक सिस्टम्स विकसित हुई हैं दुनिया में—एक यूनान में, एक भारत में।

यूनान में जो तर्क की पद्धति विकसित हुई उससे पश्चिम के सारे विज्ञान का जन्म हुआ और भारत में जो विचार की पद्धति विकसित हुई उससे धर्म का जन्म हुआ। दोनों में कुछ बुनियादी भेद हैं।

और सबसे पहला भेद यह है कि पश्चिम में, यूनान ने जो तर्क की पद्धति विकसित की, उसकी समझ है कि निष्कर्ष, कनक्सन हमेशा अंत में मिलता है। साधारणत: ठीक मालूम होगी बात।

हम खोजेंगे सत्य को, खोज पहले होगी, विधि पहले होगी, प्रक्रिया पहले होगी, निष्कर्ष तो अंत में हाथ आएगा। इसलिए यूनानी चिंतन पहले सोचेगा, खोजेगा, अंत में निष्कर्ष देगा।

इस महावाक्य मे बड़ी अजीब बातें कही गई हैं, हायर मैथमेटिक्स की। कहा है कि पूर्ण से पूर्ण निकल आता है, फिर भी पीछे पूर्ण शेष रह जाता है। साधारण गणित के हिसाब से बिलकुल गलत बात है। अगर हम किसी भी चीज में से कुछ निकाल लेंगे, तो उतना ही शेष नहीं रह सकता जितना था। कुछ कम हो जाएगा। हो ही जाना चाहिए; अन्यथा हमारे निकाले हुए का क्या हुआ?

अगर मैं एक तिजोरी में से दस रुपए निकाल लूं उसमें अरबों रुपए भरे हों, तो भी कम हो गए। दस पैसे भी निकाल लूं तो भी कम हो गए। उतना ही शेष नहीं रह सकता जितना पहले था। कितनी ही बड़ी तिजोरा हो — कुबेर का खजाना हो कि सोलोमन का — अगर दस नार पैसे भी हमने उसमें से निकाले, तो अब तिजोरी उतनी ही नही है जितनी थी, कुछ कम हो गई। और कितना ही बड़ा खजाना हो,अगर हम दस कोड़ी भी उसमें डाल दें, तो अब उतनी ही नहीं रही जितनी थी। कुछ जुड़ गई और ज्यादा हो गई।

लेकिन यह सूत्र कहता हूँ कि पूर्ण सै पूर्ण निकल आता है,थोड़ा भी नहीं — दस पैसे नहीं निकालते, पूरी तिजोरी ही बाहर निकाल लेते हैं — पूर्ण से पूर्ण ही बाहर निकाल लेते हैं, फिर भी पीछे पूर्ण ही शेष रह जाता है। या तो किसी पागल ने कहा है, जिसे गणित का कोई भी पता नहीं। पहली कक्षा का विद्यार्थी भी जानता है किं हम कुछ निकालेंगे, तो पीछे कमी हो जाएगी। और थोड़ा निकालेंगे, तो भी कमी हो जाएगी। अगर पूरा निकाल लेगे, तब तो पीछे कुछ भी नहीं बचना चाहिए। पर यह सूत्र कहता है कि कुछ नहीं, पूरा ही बच जाता है। तब निश्चित ही, तिजोरी को ही जो समझते हैं, वे इसे नहीं समझ पाएंगें। तब किसी और दिशा से समझना पड़ेगा।

जब आप किसी को प्रेम देते हैं, तो आपके पास प्रेम कम होता है? आप पूरा ही प्रेम दे डालते हैं, तब भी आपके पास कुछ कमी हो जाती है? नहीं। आदमी के पास इस सूत्र को समझने के लिए जो निकटतम शब्द है वह प्रेम है। उससे ही हमें पकड़ना पड़ेगा। सच तो यह है कि प्रेम आप कितना ही दे डालें, उतना ही बच रहता है जितना था। उसमें कोई भी कमी, नहीं आती। बल्‍कि कुछ तो कहते हैं कि वह और बढ़ जाता है। जितना आप देतें हैं, उतना बढ़ जाता है। जितना आप बांटते हैं, उतना गहन होता चला जाता है। जितना लुटाते हैं, उतना ही पाते हैं कि और—और उपलबध होता चला जा रहा है। जों अपने सारे प्रेम को फैंक दे बाहर, वह अनंत प्रेम का मालिक हो जाता है। पूर्ण से पूर्ण निकल आए और पीछे पूर्ण ही शेष रह जाए, तो इसका अर्थ हुआ कि यh गणित सै नहीं समझाया जा सकेगा, प्रेम से समझना पड़ेगा। इसलिए जो आइंस्टीन के पास समझने जाएंगे, वे नहीं समझ पाएंगे। मीरा के पास समझने जाएं, तो शायद समझ मैं आ जाए। चैतन्य के पास समझने जाएं तो शायद समझ में आ जाए। क्योंकि यह किसी और ही आयाम, किसी और ही डायमेंशन की बात है, जहां देने से घटता नहीं।

आपके पास सिवाय प्रेम के और कोई ऐसा अनुभव नहीं है जिससे समझने की पहली चोट हो सके। पता नहीं, प्रेम का अनुभव भी है या नहीं, क्योंकि सौ में से निन्यानबे को वह भी नहीं है। अगर आपको प्रेम दे देने से कुछ कमी मालूम पड़ती हो, तो आप समझ लेना कि आपको प्रेम का कोई अनुभव नहीं हैं। अगर आप प्रेम किसी को देते हों और भीतर लगता हो कि कुछ खाली हुआ, तो आप समझ लेना कि जो आपने दिया है वह कुछ और होगा, प्रेम नहीं हो सकता। वह फिर तिजोरी की ही दुनिया की कोई चीज होगी। वह पैसे लगते में तुलने वाली चीज होगी। आंकड़ों में आकी जा सके, तराजू में तोली जा सके, गजों से नापी जा सके, ऐसी कोई चीज — मेजरेबल..।

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आदमी गौण है, चेतना का विकास महत्वपूर्ण है। लेकिन एक संतुलन होना चाहिए। अन्यथा पेंडुलम स्वाभाविक रूप से दूसरी अति पर जाता है।

मोहम्मद ने अपने धर्म को नाम दिया इस्लाम। इस्लाम यानी शांति। और दुनिया में इस्लाम ने जितना उपद्रव पैदा किया है, उतना किसी धर्म ने नहीं किया। निश्चित ही, मोहम्मद उसके लिए जिम्मेदार होंगे। उन्होंने अपनी तलवार पर लिख रखा था, शांति मेरा संदेश है—यह कोई तलवार पर लिखने की बात नहीं है। क्योंकि तलवार शांति का संदेश नहीं है। ज्यादा से ज्यादा वह सुरक्षा बन सकती है, लेकिन संदेश नहीं बन सकती। वे आदमी बड़े प्यारे थे। बहुत व्यावहारिक और प्रयोगात्मक थे। और अरब देशों में उन्होंने देखा कि वहां निरंतर युद्ध चलते थे और वे स्वयं सतत युद्ध में उलझे रहते थे, तो पुरुष मारे जाते थे, और पुरुषों और स्त्रियों का अनुपात बड़ा विचित्र हो गया था।

प्रकृति एक संतुलन बनाए रखती है। प्रकृति में स्त्रियों की और पुरुषों की संख्या करीब—करीब समान होती है। यह इस बात का निदर्शक है कि प्रकृति एक प्रतीक है। तुम बच्चों की जन्म दर की जांच करो तो तुम्हें आश्चर्य होगा। 110 लड़के पैदा होते हैं और 100 लड़कियां पैदा होती हैं। तुम कहोगे, यह बात जरा अजीब मालूम पड़ती है। शायद तुम सोचोगे कि पुरुष श्रेष्ठ है इसलिए 110 लड़के पैदा होते हैं और स्त्री कनिष्ठ है इसलिए 100 लड़कियां पैदा होती हैं।

लेकिन ऐसा नहीं है। तथ्य तो इससे बिलकुल उल्टा है। पुरुष कमजोर होते है और स्त्री ताकतवर होती है—मांसपेशियों की दृष्टि से नहीं कह रहा हूं। तो जब तक ये लड़के विवाह की उम्र के योग्य बनते हैं तब तक वे अतिरिक्त 10 लड़के मर चुके होते हैं। लेकिन 100 लड़कियां अभी भी जिंदा होती हैं। तो विवाह के समय ठीक 100 लड़के और 100 लड़कियां होती हैं।

प्रकृति की अपनी प्रज्ञा है। स्त्रियां पुरुषों से पांच साल अधिक जीती हैं। लेकिन पुरुष का अहंकार बड़ा विचित्र है। कोई पुरुष अपने से पांच साल बड़ी स्त्री से विवाह करने को राजी नहीं होता। हर देश में लोग चाहते हैं कि लड़कियां लड़कों से कुछ साल छोटी हों। अगर लड़का 25 साल का है तो लड़की 20 की होनी चाहिए। पर यह पूर्णतः प्रकृति के खिलाफ हैं। 5 साल लड़की ज्यादा जीने वाली है लड़के से। तो जब लड़का 75 साल का होगा तब वह मरेगा, और उसकी पत्नी सिर्फ 70 साल की होगी। और वह व्यर्थ ही बुढ़ापे के दस साल पीड़ा और एकाकीपन से भरे हुए बिताएगी।

अपने से चौदह साल बड़ी स्त्री से शादी करके मोहम्मद ने बहुत हिम्मत का काम किया। बात थोड़ी विचित्र लगती है लेकिन प्रकृति से अधिक मेल खाती है। और चूंकि स्त्रियां चार गुना ज्यादा थी, परिस्थिति बहुत खतरनाक थी। अगर प्रत्येक पुरुष एक ही स्त्री से शादी करता तो बाकी जो 3 स्त्रियां बचतीं, उनका क्या होता? वे वेश्या बनेंगी। क्योंकि तुमने उन्हें कोई और शिक्षा नहीं दी है। तुमने उन्हें कोई आर्थिक स्थिरता नहीं दी है। तो मोहम्मद ने यह तय किया कि हर पुरुष 4 या 5 स्त्रियों से शादी कर सकता है। यह बड़ी सुंदर व्यवस्था थी। उन्होंने खुद नौ स्त्रियों से शादी की। लेकिन उससे उनके अनुयायियों को जैसे अनुज्ञा मिल गई। हैदराबाद के निजाम की पांच सौ पत्नियां थी। क्योंकि चार या चार से ज्यादा...फिर उसकी कोई सीमा नहीं है।

मोहम्मद पढ़े लिखे नहीं थे। उनके पास यह समझ नहीं थी कि वे जो कर रहे हैं, उसकी गलत ढंग से व्याख्या की जा सकती है। उन्होंने सोचा भी नहीं होगा कि उनके अनुयायी पांच सौ औरतों से शादी करने लगेंगे। और अब जब अनुपात बराबर हैं, स्त्रियों और पुरुषों की संख्या समान है, इसलिए मोहम्मद के खयाल का निषेध होना चाहिए और उसे अस्वीकृत किया जाना चाहिए। वह उस समय, चौदह सौ साल पहले ठीक था, लेकिन आज नहीं।

ये सारे महापुरुष, जो इस पृथ्वी पर हुए, उनके प्रति मेरा दृष्टिकोण इतना ही है: उनमें हमारे लिए जो संगत है उसे चुनें और असंगत है उसे छोड़ दें।

इस्लाम धर्म उस देश में पैदा हुआ था जो ज्यादा सुसंस्कृत नहीं था। उसे सिर्फ एक ही तर्क मालूम था—तलवार का तर्क। और तलवार कोई तर्क नहीं है। और इस्लाम धर्म ठीक उसी बिंदु पर अटका रह गया है, जहां मोहम्मद छोड़ गए थे। क्योंकि कहा है, और मैं उसका निषेध करता हूं, कि मैं अल्लाह का आखिरी पैगंबर हूं; कि अल्लाह के पूर्ववर्ती संदेशों में कुरान अंतिम सुधार है। अब इसके बाद कोई और पैगंबर नहीं होगा और अन्य कोई परिवर्तन नहीं होंगे।

अब यह धर्मांधता है। और यह किसने कहा है कि इसको कोई सवाल नहीं है—बात ही गलत है। जीवन विकसित होता रहेगा और लोगों को नए संदेशों की जरूरत पड़ेगी और नए लोगों की जरूरत पड़ेगी जो नई समस्याओं का हल खोजेंगे। और कुरान कोई बहुत बड़ा धर्म ग्रंथ नहीं है। उसमें उपनिषद की वह उड़ान नहीं है। उसमें गौतम बुद्ध की विचार संपदा नहीं है। लेकिन यह स्वाभाविक भी था क्योंकि मोहम्मद अशिक्षित लोगों से बोल रहे थे। लेकिन वे अशिक्षित लोग अब भी वही ढोए चले जा रहे हैं। एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में कुरान। या तो कुरान को स्वीकार करो या तलवार को।

प्रत्येक व्यक्ति को अपना दर्शन अभिव्यक्त करने की छूट होनी चाहिए। और प्रत्येक व्यक्ति को उसे स्वीकार या अस्वीकार करने की छूट होनी चाहिए। उसका अस्वीकार करना उसका अपमान नहीं है। धर्म केवल स्वतंत्रता की आबोहवा में विकसित होता है। इस्लाम ने खुद मुस्लिमों को भी यह स्वतंत्रता नहीं दी है।

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सत्य एक अनुभूति है, वस्तु नहीं! इसलिए कोई दूसरा उसे दे नहीं सकता, वस्तुएं दी जा सकती हैं! अनुभव नहीं दिए जा सकते। वस्तु पात्रता की चिंता नहीं करतीं, कोहिनूर किसके पास है! कोहिनूर को इसकी जरा भी चिंता नहीं, एक भिखमंगे के पास हो तो ठीक, महारानी विक्टोरिया के पास हो तो ठीक; कोहिनूर व्यक्तियों की चिंता नहीं करता, क्योंकि कोहिनूर एक जड़ पदार्थ है। सत्य कोई जड़ता नहीं है! सत्य तो तुम्हारी संवेदनशीलता पर निर्भर है। सत्य हर किसी के पास नहीं हो सकता! सत्य को एक हाथ से दूसरे हाथ में लिए जाने का कोई उपाय नहीं है। सत्य तो वहीं होगा जहां सत्य को झेलने की पात्रता होगी। इसलिए वास्तविक खोजी अपने को तैयार करता है। वह इसकी चिंता नहीं करता कि सत्य कहाँ है। वह इसकी चिंता करता है क्या मैं योग्य हूँ? वह इसकी बिलकुल चिंता नहीं करता कि कौन मुझे सत्य देगा! वह इसकी चिंता करता है कि सत्य मेरे द्वार आयेगा तो मेरा द्वार खुला होगा या नहीं! सत्य मेरे द्वार पर दस्तक देगा तो मेरे कान सुन सकेंगे या नहीं। सत्य पर आक्रमण नहीं किया जा सकता, सत्य को केवल ग्रहण किया जा सकता है। सत्य के लिए तुम्हारा पुरुष जैसा होना जरूरी नहीं; स्त्री जैसा होना भी जरूरी नहीं है। सत्य तुम में प्रवेश करेगा, लेकिन तुममें गर्भ की योग्यता चाहिए !!

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बुद्धत्व का अर्थ है: जो आदमी जागा हुआ जी रहा है। ध्यान का अर्थ है: जहां मन न के बराबर रह जाए। समाधि का अर्थ है: जहां मन बिलकुल शून्य हो जाए, तुम ही तुम बचो। ध्यान का अर्थ है--अपने पर ध्यान, दूसरे पर नहीं। मन का अर्थ है--दूसरे पर ध्यान। और ध्यान का अर्थ है: निर्विचार चैतन्य। निर्वाण का अर्थ है--निर्वाण शब्द का अर्थ है: दीये का बुझ जाना। बुद्ध को वह शब्द प्रिय था। वे कहते, जैसे दीया बुझ जाता है, तो तुम पूछो कि उसकी ज्योति कहां गई? क्या कहोगे, कहां गई? अब तुम ज्योति को कहीं भी इशारा करके न बता सकोगे। होगी तो कहीं; क्योंकि इस अस्तित्व में कुछ भी जो है, नष्ट नहीं हो सकता। जो है, वह है; जो नहीं है, वह नहीं है। जो नहीं है, उसके होने का उपाय नहीं है; जो है, उसके मिटने का उपाय नहीं है। वह कहीं न कहीं तो ज्योति होगी। तुमने दीया फूंक कर बुझा दिया, ज्योति खो थोड़े ही जाएगी; जाएगी कहां खोकर? विराट में एक हो गई! अब तक उसका रूप था, अब अरूप हो गई! दीये से छुटकारा हो गया है। इसका यह मतलब नहीं है कि खो गई। ध्यान में गुरु यही कर रहा है: तुम्हें धक्का दे रहा है। और अगर तुम्हारी श्रद्धा हो, तो तुम्हारे भीतर बीज टूट जाएगा और वृक्ष का जन्म हो जाएगा। तर्क से तुम भरे रहे, तो तुम व्यर्थ ही भटकते रहोगे। श्रद्धा द्वार है। -

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वासना बोध की अनुपस्थिति है

एक गुफा एक पहाड़ की कंदरा में छिपी थी सदियों से, सदियों सदियों से; अनंतकाल से। गुफाओं की आदत छिपा होना होता है। अंधेरे में ही रही थी। कुछ ऐसी आडू में छिपी थी पत्थरों और चट्टानों के, कि सूरज की एक किरण भी कभी भीतर प्रवेश न कर पाई थी। सूरज रोज द्वार पर दस्तक देता लेकिन गुफा सुनती न। सूरज को भी दया आने लगी कि बेचारी गुफा जन्मों जन्मों से बस अंधेरे में रही है। इसे रोशनी का कुछ पता ही नहीं। एक दिन सूरज ने जोर से आवाज दी। ऐसी सूरज की आदत नहीं कि जोर से आवाज दे। लेकिन बहुत दया आ गई होगी। जन्मों जन्मों से गुफा अंधेरे में पड़ी है। तो सूरज ने कहा, बाहर निकल पागल!

देख, बाहर कैसी रोशनी है। फूल खिले, पक्षी गीत गाते, किरणों का जाल फैला है। और मैं तेरे द्वार पर खड़ा हूं और बार बार दस्तक देता हूं। तू बहरी है? बाहर आ।