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संसार से विमुख होते ही परमात्मा से सन्मुखता हो जाती है। आखिर संसार कहां खत्म होता है, परमात्मा कहां


संसार का अर्थ है: आकांक्षा, तृष्णा, वासना, कुछ होने की चाह। संसार का अर्थ, ये बाहर फैले हुए चांदत्तारे, वृक्ष, पहाड़—पर्वत, लोग—यह नहीं है। संसार का अर्थ है भीतर फैली हुई वासनाओं का जाल। संसार का अर्थ है: मैं जैसा हूं, वैसे से ही तृप्ति नहीं; कुछ और होऊं, तब तृप्ति होगी। जितना धन है, उससे ज्यादा हो। जितना सौंदर्य है, उससे ज्यादा हो। जितनी प्रतिष्ठा है, उससे ज्यादा हो। जो भी मेरे पास है, वह कम है। ऐसा जो कांटा गड़ रहा है, वही संसार है। और ज्यादा हो जाए, तो मैं सुखी हो सकूंगा। जो मैं हूं, उससे अन्यथा होने की आकांक्षा संसार है। जिस दिन यह आकांक्षा गिर जाती है; जिस दिन तुम जैसे हो वैसे ही परम तृप्त; जहां हो वहीं आनंद रसविमुग्ध; जैसे हो वैसे ही गदगद—उसी क्षण संसार मिट गया। और संसार का मिटना और परमात्मा का होना दो चीजें नहीं हैं। ऐसा नहीं है कि पहले संसार मिटा, फिर बैठे राह देख रहे हैं कि अब परमात्मा कब होगा। संसार का मिटना और परमात्मा का होना एक ही बात को कहने के दो ढंग हैं। चाहे कहो रात मिट गई, चाहे कहो सुबह हो गई, एक ही बात को कहने के दो ढंग हैं। ऐसा नहीं है कि रात मिट गई, फिर लालटेन लेकर खोज रहे हैं कि सुबह कहां है। रात मिट गई तो सुबह हो गई। संसार गया कि परमात्मा हो गया। सच तो यह है यह कहना कि परमात्मा हो गया, ठीक नहीं। परमात्मा तो था ही; संसार के कारण दिखाई नहीं पड़ता था। तुम कहीं और भागे हुए थे, इसलिए जो निकट था वह चूकता जाता था। तुम्हारा मन कहीं दूर चांदत्तारों में भटकता था, इसलिए जो पास था वह दिखाई नहीं पड़ता था। पश्चिम के एक बड़े विचारक माइकल अदम ने अपने संस्मरण लिखे हैं। समझने योग्य संस्मरण हैं। लिखा है कि सब तरह से सुख को खोजने की कोशिश की; जैसा सभी करते हैं—धन में, पद में, यश में। कहीं सुख पाया नहीं। सुख को जितना खोजा उतना दुख बढ़ता गया। जितनी आकांक्षा की कि शांति मिले, उस आकांक्षा के कारण ही अशांति और सघन होती चली गई। अतीत में सुख खोजा; बीत गया जो, उसमें सुख खोजा और नहीं पाया; और भविष्य में सुख खोजा, कि अभी जो नहीं हुआ, कल जो होगा—वह कल कभी नहीं आया। जो कल आ गए, अतीत हो गए, उनमें सुख की कोई भनक नहीं मिली; और जो आए नहीं—आते ही नहीं—उनमें तो सुख कैसे मिलेगा! दौड़—दौड़ थक गया। सब दिशाएं छान डालीं। सब तारे टटोल लिए। सब कोने खोज लिए। फिर सोचा: सब जगह खोज चुका—अतीत में, भविष्य में, यहां—वहां; अब जहां हूं वहीं खोजूं; जो हूं उसी में खोजूं; इसी क्षण में खोजूं, वर्तमान में खोजूं—शायद वहां हो। और वर्तमान में खोजा और वहां सिवाय दुख के और कुछ भी नहीं था। तुम चकित होओगे। संस्मरण पढ़ते वक्त ऐसा लगता है कि यह आदमी यह कहने जा रहा है कि वर्तमान में खोजा और पाया। नहीं; लेकिन वह कहता है: वर्तमान में खोजा और वहां सिवाय दुख के और कुछ भी नहीं। वहां पीड़ा ही पीड़ा का अंबार है, राशि लगी है। तो फिर एक बात तय हो गई कि सुख है ही नहीं। जब कहीं मिलता नहीं, तो नहीं ही होगा। तो जो नहीं है, उसे क्या खोजना! तो फिर खोज छोड़ दी। फिर दुख के साथ रहना ही भाग्य है, तो दुख को स्वीकार कर लिया। दुख ही जीवन है, इस समीकरण को और इनकार करने का कोई उपाय न रहा। जैसा है वैसा है। वृक्ष हरे हैं। रात अंधेरी है। दिन उजाला है। आदमी दुखी है। दुख को स्वीकार कर लिया। सुख होता ही नहीं। सुख केवल सपना है, मृग—मरीचिका है। है दुख। गड़ता दुख है। तो हम सुख के सपने बना कर अपने को भुलाए रखते हैं, भरमाए रखते हैं। सुख मात्र आशा है। जब सुख होता ही नहीं तो खोजना क्या! तो व्यर्थ खोज क्या करनी! तो अदम ने कहा: दुख से राजी हो गया। दुख को भोगने लगा। दुख से कुछ भेद न रखा। दुख से कुछ दुश्मनी भी न रखी। यही मित्र है, यही संगी—साथी है, यही मैं हूं। और तब अचानक पाया कि सुख की एक तरंग उठ रही है। दुख की स्वीकृति में सुख की तरंग उठने लगी—जो कभी न उठी थी! तब अचानक पाया कि सुख था, लेकिन खोजने के कारण चूकता जाता था। तुम सुख को खोजने के कारण चूक रहे हो। संसार का अर्थ है: सुख को खोजने वाला मन। परमात्मा का अर्थ है: सुख नहीं है; जो है, उसकी स्वीकृति। जैसा है, वैसी ही स्वीकृति। उसी क्षण सुख की तरंग आने लगती है। फिर तुम्हें सुख को खोजने जाना नहीं पड़ता—किसी अनजाने द्वार से सुख तुम्हें खोजता आ जाता है। इस बात को खूब ध्यानपूर्वक समझना। इसमें ध्यान का सारा राज छिपा है। इससे अन्यथा ध्यान और कुछ भी नहीं है। जरा सोचो! जो है, जैसा है—उससे अन्यथा नहीं होगा। नहीं हो सकता है! नहीं कभी हुआ है। उपाय ही नहीं है! फिर करने को कुछ भी न बचा। फिर जहां थे, वहीं थिर रह गए। फिर दौड़ गई, तृष्णा गई। और जहां दौड़ गई, तृष्णा गई, क्या वहां सुख तुम पर बरस न जाएगा? फिर कमी क्या रही? कुछ भी तो कमी न रही। जब तुम पूरे के पूरे स्वीकार कर लिए जीवन को जैसा है, उसी स्वीकृति में तो स्वर उठ आता है सुख का। सुख तो चारों तरफ है, लेकिन तुम खोज रहे हो। कभी—कभी देखा, आदमी अपनी नाक पर चश्मा रखे होता है और उसी चश्मे से अपने खोए गए चश्मे को खोजता है! भागता है, खोजता है, यहां—वहां। जल्दबाजी में हो तो और मुश्किल हो जाती है। किताबें पलटता है, बिस्तर खोलता है। और चश्मा नाक पर चढ़ा है। कभी—कभी कान में तुम खोंस लेते अपनी कलम और फिर खोजने लगते। फिर तुम जब तक खोजते रहोगे तब तक पा न सकोगे। खोज ही बाधा हो जाएगी। संसार का अर्थ है: खोज। परमात्मा का अर्थ है: खोज गई; अब खोजना नहीं। परमात्मा को भी नहीं खोजना है। अगर परमात्मा को भी खोजना है तो संसार कायम है; नाम बदल गया। अगर तुम कहो कि ठीक है, धन न खोजेंगे, पद न खोजेंगे, प्रतिष्ठा न खोजेंगे, परमात्मा तो खोजें! खोजे कि चूके। खोजे कि गंवाया। खोजे तो...किसी ने कभी खोज कर नहीं पाया। संसारी खोज रहा है। त्यागी खोज रहा है। दोनों चूक रहे हैं। संसारी धन खोज रहा है, त्यागी धर्म खोज रहा है। दोनों चूक रहे हैं, क्योंकि दोनों खोज रहे हैं। पाता कौन है? पाता वह है, जो खोजता नहीं। लेकिन न खोजने की दशा पा लेना कठिन है; क्योंकि हमारे पास बुद्धि का इतना निखार भी नहीं है—मंदबुद्धि हैं। बुद्धि को साफ भी नहीं करते; कूड़ा—कर्कट अलग भी नहीं करते; घास—पात उखाड़ कर भी नहीं फेंकते। अक्सर ऐसा हो जाता है: एक खोज बंद हुई, दूसरी शुरू कर देते हैं। बंद नहीं हुई, उसके पहले ही शुरू कर देते हैं। भोग से चूके नहीं कि त्याग ने जकड़ा। इसलिए मैं अपने संन्यासी को कहता हूं: भोग से बचना और त्याग से बचना। भोग से चूके, त्याग में पड़ जाते हो। कुएं से बचे, खाई में गिर गए। मध्य में है मार्ग। खोज से बचना। धन तो खोजना ही मत; धर्म भी मत खोजना। खोज जाने दो, क्योंकि खोज तनाव पैदा करती है। खोज का मतलब ही यह होता है कि मैं यहां हूं और जिससे मुझे शांति मिलेगी, जिससे मुझे सुख मिलेगा, वह वहां है दूर! या तो दिल्ली में है या स्वर्ग में है—लेकिन दूर। मैं यहां, सुख वहां—दोनों के बीच लंबा फासला। इसी को जोड़ने—जोड़ने में जीवन गंवा दिया जाता है। संसार जाने का अर्थ पूछते हो, संसार कहां समाप्त होता है? जिस दिन तुम जहां हो, वहीं सब है। संतुष्टि संसार की मृत्यु है। संतोष। लेकिन फिर खयाल रखना, क्योंकि ये प्यारे शब्द खराब हो गए हैं। ये इतनी जबानों पर चले हैं कि नष्ट—भ्रष्ट हो गए हैं। इनके अर्थ विकृत हो गए हैं। आमतौर से "संतोष' शब्द सुनते ही ऐसा खयाल आता है कि ठीक है, जो है उसी में संतोष कर लो। अपने बस में भी नहीं है कि बहुत धन कमा लो, तो अब जितना है, इसी में संतोष कर लो। ऐसा मन मारने का नाम संतोष हो गया है। संतोष क्रांति है—मन मारने का नाम नहीं है। संतोष का मतलब यह नहीं है कि अब क्या करें? बड़ा मकान बनता तो है नहीं, चलो छोटे में ही रहेंगे। मगर भीतर—भीतर कीड़ा काट रहा है, भीतर—भीतर घुन लग रहा है। भीतर—भीतर आत्मा सड़ रही है। मन तो पीड़ा से भरा है कि होता बड़ा मकान! काश, कुछ कर लेते! कि लाटरी ही मिल जाती! कि राह चलते किसी का बटुवा पड़ा मिल जाता! अपने में सामर्थ्य तो नहीं है, इसलिए मन को मार लिया है। लेकिन सपना इतनी आसानी से नहीं मरता। सपना तो कायम रहेगा। सपना तो कहता है कि चमत्कार भी हो सकते हैं—किसी साधु महाराज की कृपा हो जाए, कि कोई ताबीज मिल जाए, कि चलो अब ऐसे तो कुछ नहीं होता, राम—राम जपने से शायद हो जाए! मैंने सुना है, एक प्रार्थना—सभा के बाद एक औरत अपनी सहेली से बात करने लगी। अचानक उसे याद आया कि वह अपना बटुवा मंदिर के अंदर ही भूल आई है। वह दौड़ कर अंदर पहुंची, पर बटुवा गायब था। महिला बड़ी हैरान हुई—भक्तों में और बटुवा गायब हो जाए! उसने पुजारी को कहा। पुजारी ने कहा: घबड़ाओ मत, मैंने बटुवा उठा कर रख लिया है, क्योंकि कुछ भक्त इतने भोले होते हैं कि इसे देख कर वे यह समझते हैं कि ईश्वर ने उनकी प्रार्थना सुन ली है। आते ही किसलिए हैं लोग मंदिर में? बटुवों के लिए ही प्रार्थनाएं की जा रही हैं। जो बटुवे अपनी मेहनत से नहीं मिले, अब शायद परमात्मा के कंधे पर सवार होकर मिल जाएं। फिर, संतोष...तथाकथित संतोष ऐसा ही है जैसा ईसप की कहानी में है। एक लोमड़ी छलांग लगाती है। अंगूर के गुच्छे—रस भरे हैं, हवा में झूलते हैं! सुबह का सूरज निकला है। और लोमड़ी के मुंह से लार टपकती है। उछलती है, कूदती है, मगर गुच्छे बड़े ऊपर हैं; पहुंच नहीं पाती। और तभी एक खरगोश छिपा देख रहा है—पास की ही झाड़ी में बैठा। लोमड़ी को जाते देख कर—उदास, थका—मांदा—वह कहता है: चाची, क्या बात? अंगूर मिले नहीं? और लोमड़ी अकड़ कर सीना फुला कर कहती है: मिले नहीं, किसने तुझे कहा नासमझ? खट्टे हैं। अभी खाने योग्य नहीं। यह भी संतोष है। जो अंगूर न मिलें, उन्हें हम खट्टे होने की घोषणा कर देते हैं। तुम भी कहते हो: पद में क्या रखा है! मगर जरा भीतर टटोलना! अंगूर खट्टे हैं, ऐसा तो नहीं? तुम भी कहते हो: धन में क्या रखा है! सब ठीकरे हैं! मगर यह बात तुम्हारे भीतर अनुभव से आ रही है? या कि अपने को झुठला रहे हो? या कि अपने को समझा रहे हो? कि मलहम—पट्टी कर रहे हो अपने घाव पर? धन नहीं मिला है, इसके घाव पड़ गए हैं। किसी तरह मलहम करके घावों को भुलाते हो। ऐसा तुम्हारा संतोष है। इसलिए मैं तो शब्दों का उपयोग करने में भी डरता हूं, क्योंकि तुम्हारे कुछ अर्थ और होते हैं। इधर मैंने कहा कि संतोष, और तुमने समझा कि अरे ठीक है, संतोषी सदा सुखी! हम तो पहले से संतोषी हैं। मगर तुम्हारे संतोष को ठीक से समझ लेना। संतोष बड़ी क्रांति है; इतना सस्ता नहीं, जैसा तुम समझते हो। संतोष केवल उन्हें मिलता है, जिनके पास दृष्टि है, जीवन को समझने की कला है। संतोष ऐसी मुर्दा चीज नहीं है, जैसा तुमने उसे बना दिया है। संतोष जीवंत अग्नि है। उससे जो गुजरा, वह परमात्मा में ही उतर जाता है। संतोष का फिर मैं क्या अर्थ करता हूं? अर्थ करता हूं: ऐसा नहीं कि मैं कमजोर हूं, इसलिए नहीं पहुंच सका, तो अब समझा लेता हूं अपने को। आखिर अहंकार को भी तो बचाना है! अब रोने से क्या फायदा! अब कहने से भी क्या सार कि दौड़ा तो बहुत था, पहुंच नहीं पाया। उछला तो बहुत था, अंगूर के गुच्छे दूर थे। इससे अब क्या सार है कहने से! वैसे ही तो पिट गई है प्रतिष्ठा, अब और क्या पिटवाना! तो अब ऐसे ही कह देते हैं कि दौड़ा ही कहां। दौड़ने में मुझे रस ही न था; वह तो मोहल्ले के लोगों ने कहा तो चुनाव में खड़ा हो गया। तो लोग नहीं माने। मेरी तो कोई इच्छा थी ही नहीं चुनाव में खड़े होने की। तो मैं तो खड़ा ही नहीं हुआ; हारने का सवाल ही क्या है! मोहल्ले वालों ने खड़ा कर दिया। अगर मैं हारा तो वे ही हारे। लेकिन, यह संतोष नहीं है। संतोष का अर्थ होता है: जीवन को सब तरफ से देखा, सब तरफ से परखा, सब तरफ से स्वाद लिया—और कड़वा पाया। स्वाद लिया और कड़वा पाया। अंगूर के गुच्छे दूर थे; स्वाद लेने का मौका न मिला इसलिए खट्टा कहा, तो काम नहीं होगा। संतोष जीवन का सार—निचोड़ है; जीवन की सबसे बड़ी संपदा है। लेकिन उन्हीं को मिलता है संतोष, जो जीवन को चखते हैं; जीवन को चखने की कठिनाई से गुजरते हैं। तिक्त है स्वाद। मन—प्राण कड़वे हो जाते हैं। सब तरफ से दौड़ कर देख लिया कि भविष्य की आकांक्षा व्यर्थ है; न कभी आता है कल, न कभी आएगा—इस बोध से दौड़ गई, तृष्णा गई। इस बोध से अब जहां हूं, जैसा हूं, उसी में मगन—भाव हुआ। इस मगन—भाव का नाम संतोष है। संतोष बड़ी अदभुत बात है। जहां संतोष आया संसार गया। संसार गया संतोष आया। कहने का ही भेद है। और जहां कोई दौड़ न रही, वहां तुम परमात्मा को बिना देखे कैसे रहोगे? क्योंकि दौड़ से ही आंखें अंधी हैं। यूनान में पुरानी कथा है कि एक ज्योतिषी रात आकाश के तारों का अध्ययन करता हुआ चल रहा था, एक कुएं में गिर पड़ा। चिल्लाया, घबड़ाया। पास कोई किसान बूढ़ी औरत ने दौड़ कर रात में इंतजाम किया, लालटेन लाई, रस्सी लाई, उसे निकाला। वह बड़ा प्रसिद्ध ज्योतिषी था। उसकी फीस भी बहुत बड़ी थी। सम्राटों का ज्योतिषी था। साधारण आदमी तो उसके पास पहुंच नहीं सकते थे। उसने कहा: बूढ़ी मां, तुझे पता है मैं कौन हूं? तेरा सौभाग्य है कि तूने यूनान के सबसे बड़े ज्योतिषी को सहायता देकर कुएं से बाहर निकाला है। मेरी फीस इतनी है कि सिर्फ सम्राट चुका सकते हैं। मगर तेरा हाथ और तेरा भविष्य मैं बिना फीस के देख दूंगा। तू सुबह आ जाना। वह बूढ़ी हंसने लगी। उसने कहा: बेटा, तुझे अपने सामने का कुआं नहीं दिखाई पड़ता, तू मेरा भविष्य कैसे देखेगा? तुझे अपना ही...भविष्य तो छोड़, वर्तमान भी दिखाई नहीं पड़ता। तू पहले रास्ते पर चलना सीख। तू चांदत्तारों पर चलता है! जिसकी आंखें चांदत्तारों पर लगी हैं, अक्सर हो जाता है कुएं में गिरना। तुम सब भी ऐसे कुएं में ही गिरे हो। आंखें चांदत्तारों पर लगी हैं, यहां देखो तो कैसे देखो! पास देखे तो कौन देखे! तुम्हारे सारे प्राण तो वहां अटके हैं। और बचपन से ही यह दौड़ शुरू हो जाती है। तुम्हारे चारों तरफ जो लोग हैं, वे सब पागल हैं। वही पागलपन छोटे बच्चों के प्राणों में भी हम डाल देते हैं। छोटा बच्चा सोचता है: बस परीक्षा पास हो जाऊंगा, तो बड़ा सुख होगा। परीक्षा अभी साल भर दूर है, अभी तो दुख उठा रहा है; आशा है कि परीक्षा पास होगा तो सुखी होगा। फिर पहली कक्षा पास हो जाता है; एकाध —दो दिन फूला—फूला सा रहता है, फिर पिचक जाता है। फिर सोचता है: इस साल तो वह बात नहीं घटी, शायद अगले साल घटे; शायद प्राइमरी स्कूल से निकल आऊं, तब सुख हो। और चारों तरफ लोग हैं कहने वाले। वे कहते हैं: फिकर मत करो, एक दफा पास हो गए, स्कूल से निकल आए तो सुख ही सुख है। फिर कालेज से निकल आए तो सुख ही सुख है। फिर विश्वविद्यालय से निकल आए तो सुख ही सुख है। फिर शादी हो गई तो सुख ही सुख है। फिर बच्चे हो गए तो सुख ही सुख है। सुख कभी होता नहीं। बस लोग आगे सरकाए जाते हैं। वे कहते हैं: जरा और चले चलो। सुख ऐसा ही है...जैसा बुद्ध एक बार यात्रा करते थे। राह भटक गए। जंगल था। एक लकड़हारे से पूछा कि गांव कितनी दूर है? उसने कहा: बस पहुंचे जाते, दो मील समझो। दो मील गुजर गए, गांव का कोई पता नहीं। फिर एक घसियारिन से पूछा कि मां, कितनी दूर होगा गांव? उसने कहा: यही कोई दो मील। दो मील फिर निकल गए, लेकिन गांव का कोई पता नहीं। एक लकड़हारे से पूछा कि भाई गांव कितनी दूर होगा? उसने कहा: यही कोई दो मील। आनंद से न रहा गया। बुद्ध का शिष्य था। उसने कहा कि भगवान, इन लोगों को कुछ होश है? पहला आदमी भी बोला दो मील, दूसरा भी बोला दो मील, यह तीसरा भी बोल रहा है। छह मील तो हम चल ही चुके। बुद्ध ने कहा: तू यही गनीमत समझ, कि फासला बढ़ नहीं रहा है; दो मील का दो मील ही है। तीन भी हो सकता था, चार भी हो सकता था, छह भी हो सकता था। फिर सोच। ये भले लोग हैं। ऐसी ही जिंदगी है। इतनी ही गनीमत है कि तुम्हारा और तुम्हारे सुख का फासला उतना ही रहता है जितना पहले दिन था। अंतिम दिन भी उतना ही रहता है—दो मील। बढ़ता नहीं, यही काफी गनीमत है। मगर सुख कभी मिलता नहीं। फिर आदमी जब बिलकुल थक जाता है तो सोचता है: मृत्यु के बाद स्वर्ग में मिलेगा, परलोक में मिलेगा। अगले जनम में मिलेगा; इस जनम में शुभ कर्म कर लिए, अब अगले जनम में सुख मिलेगा। तुम मूढ़ता छोड़ोगे या नहीं छोड़ोगे? तुम अपनी मूढ़ता को फैलाए ही चले जाते हो। जीवन बीत जाता है, तो तुम मौत के पार रख लेते हो सुख को। मगर सदा आगे! अब यहां जगह भी नहीं है रखने की; आदमी मर रहा है, खाट पर पड़ा है, अब यहां कह भी नहीं सकता कि कल सुख मिलेगा, क्योंकि कल तो यहां होने वाला नहीं। आज का सूरज आखिरी सूरज है, कल सुबह नहीं उगेगा। तो वह कहता है: अगले जनम में मिलेगा। मगर मिलेगा जरूर! लेकर रहूंगा! इधर चूक गए, कोई हर्जा नहीं; कब तक चूकेंगे? कभी तो मिलेगा! इस तरह आदमी अपने सुख को आगे रखता जाता है। सुख को आगे रखने की प्रक्रिया का नाम—संसार। संसार यह नहीं है जो तुम्हें दिखाई पड़ रहा है फैला हुआ। लोग कहते हैं कि हमने संसार छोड़ दिया। एक वृद्ध संन्यासी कुछ दिन पहले आए थे। वे बोले कि मैंने बीस साल पहले संसार छोड़ दिया। मैंने उनसे पूछा: आनंदित हैं? उन्होंने कहा: खाक आनंदित! तो मैंने कहा: संसार छूट गया और आनंदित नहीं हैं? फिर कब आनंद होगा? तो संसार छूटा नहीं होगा। उन्होंने कहा: आप कह क्या रहे हैं? पत्नी छोड़ दी, बच्चे छोड़ दिए, घर—दुकान, सब छोड़ दिया। यह तो संसार है ही नहीं। इसको पकड़ने से सुख नहीं मिला था, इसको छोड़ने से भी सुख नहीं मिल सकता। पहले सोचते थे पकड़ने से मिलेगा; फिर सोचा कि छोड़ने से मिलेगा—लेकिन सुख सदा आगे रहा। कुछ करने से मिलेगा! बाद में मिलेगा! स्थगित होता रहा। अब ये बीस साल से राह देख रहे हैं कि पत्नी छोड़ दी, घर छोड़ दिया, दुकान छोड़ दी, अभी तक सुख नहीं मिला, अब धीरे—धीरे भीतर नाराज भी हो रहे होंगे परमात्मा पर, कि यह तो हद हो गई, यह तो धोखा हो गया। जो था, वह भी गया। हाथ कुछ आया नहीं। अब धीरे—धीरे नाराज हो रहे होंगे। इसलिए अगर तुम संन्यासियों को नाराज देखो तो आश्चर्य मत करना। उनकी नाराजगी का कारण है। अगर तुम संन्यासियों को क्रोधी पाओ, तो आश्चर्य मत करना। दुर्वासा होना उनकी नियति है। वे क्रोधित न हों तो क्या करें? संसार, जिसको सोचते थे, वह भी गया; और कुछ बदलाहट नहीं हुई। हाथ, धन इत्यादि से खाली हो गए—और धन से भरे नहीं। नहीं; न तो पत्नी में संसार है, न पति में संसार है, न धन में, न दुकान में, न बाजार में। संसार है तुम्हारी इस आशा में कि कल सुख मिलेगा। यह संसार का मनोविज्ञान है। यह उसका तत्व—शास्त्र है। सुख कल मिलेगा, यह भ्रांति जिस दिन छूट गई, फिर तुम्हें सुख मिलने से कोई रोक नहीं सकता। सुख तो है ही। चांदत्तारों से नजर वापस लौट आई। आस—पास देखने लगे। जरा इस घड़ी, इसी क्षण टटोलो: सुख नहीं है? यह वृक्षों में सन्नाटा, ये पक्षियों की आवाजें, ये सूरज की तुम पर उतरती किरणें! सुख और क्या है? सुख और क्या होगा? यह शांति, यह मौन, इतने शांत लोगों की मौजूदगी, यह शांति से भरा हुआ सरोवर—क्या सुख नहीं है? और सुख क्या होता है? यह मौन, यह सन्नाटा, यह सन्नाटे का संगीत, यह श्वासों का सरगम, यह हृदय की धड़कन—सब ठहरा है। जैसे ही तुम इस क्षण में जागे, सब ठहरा है। तरंग भी नहीं होती। लहर भी नहीं उठती। और क्या है? इससे ज्यादा की मांग ही गलत है। और जिसने ज्यादा मांगा वह संसार में गिर गया। और जिसने इसको भोगा, वह परमात्मा में उतरने लगा। जीसस का प्रसिद्ध वचन है: जिसके पास है, उसे और दिया जाएगा। और जिसके पास नहीं है, उससे वह भी ले लिया जाएगा जो उसके पास है। बड़ा बेबूझ वचन है! अन्याय मालूम पड़ता है कि जिसको है, उसको और दिया जाएगा। और जिसके पास नहीं है, उससे और ले लिया जाएगा। यह तो हद्द हो गई! गरीब को और गरीब बना दोगे, अमीर को और अमीर बना दोगे! मगर यह वचन बड़ा अदभुत है, बड़ा बहुमूल्य है! इस क्षण का सुख भोगो। इस भोगने में ही तुम पाओगे—और सुख बरसने लगा। सुख सुख को खींचता है। दुख दुख को खींचता है। एक दुख तुम बनाओ, दस दुख और चले आते हैं। दुख अकेला नहीं आता। सुख भी अकेला नहीं आता। एक कांटा तुम बुलाओ, दस उसके पीछे चले आते हैं। एक सुख तुम उतरने दो, और तुम पाओगे—पंक्तिबद्ध सुख चले आ रहे हैं! सब द्वार—दरवाजों से चले आ रहे हैं। सब दिशाओं से उतरने लगे। वर्तमान में होना संसार के बाहर हो जाना है। भविष्य में होना संसार में होना है। तुमने पूछा: "आपने कहा कि संसार से विमुख होते ही परमात्मा से सन्मुखता हो जाती है।' एक ही बात है। संसार से विमुख हुए यानी तृष्णा गई; यानी संतोष आया। अब और क्या देरी रही? संतोष में ही तो झलक आ जाती है परमात्मा की, सत्य की। शांति में ही तो उसके स्वर उतरने लगते हैं। उतर ही रहे थे। ऐसा ही समझो कि तुम्हारे घर में आग लगी है। तुम रो रहे हो, चिल्ला रहे हो। और पास में कोई बांसुरी बजा रहा है। तुम्हें बांसुरी सुनाई पड़ेगी? जिसके घर में आग लगी है, उसे बांसुरी सुनाई पड़ेगी? जिसका घर धूं—धूं करके जल रहा है, उसे बांसुरी सुनाई पड़ेगी? लेकिन तभी कोई आया और उसने कहा कि क्यों परेशान होते हो? तुम्हारे बेटे ने तो घर का इंश्योरेंस कर रखा था। बस ये दो शब्द शास्त्र बन गए, आप्त—वचन हो गए। ये दो शब्द...आंसू उड़ गए। घर अब भी जल रहा है, लेकिन अब चिंता न रही और अचानक तुम पाओगे कि बांसुरी के स्वर सुनाई पड़ने लगे। बांसुरी पहले भी बज रही थी, मगर तुम उद्विग्न थे। तुम छाती पीट रहे थे। जिंदगी भर की कमाई मिट्टी में मिल गई। अब क्या होगा! अब कैसे होगा! अब कहां जाऊंगा! तुम्हारे भीतर इतना हाहाकार था! यह आग जो जलती थी, बाहर ही नहीं जलती थी; तुम्हारे भीतर भी जल रही थी, धू—धू करके जल रही थी। कहां बांसुरी! लेकिन किसी ने कहा कि क्यों घबड़ा रहे हो, बेटे ने इंश्योरेंस कर रखा है। कल ही तो किस्त भरी है, पैसे सब मिल जाएंगे। तो शायद जलने का दुख तो दूर हुआ, अब मन में योजना उठने लगेगी कि नया मकान बना लेंगे, पुराने से बेहतर बना लेंगे। इसके द्वार—दरवाजे भी सड़ गए थे, अच्छा ही हुआ कि जल गया। चलो, परमात्मा की कृपा है। एक शांति आई। अब भीतर कोई आपाधापी नहीं है, चिंताओं का शोरगुल नहीं है। बांसुरी की आवाज सुनाई पड़ने लगी। बांसुरी पहले भी बज रही थी। बांसुरी बजती ही रही है। अनहत बाजत बांसुरी! कृष्ण की बांसुरी बज ही रही है। वह कभी रुकी नहीं। वह रुकती ही नहीं। वह रुक सकती नहीं। वह शाश्वत है। लेकिन तुम्हारे कान कैसे उसे पकड़ें? तुम्हारे भीतर इतना शोरगुल है! तुम्हारे भीतर बाजार है। बाहर बाजार है, उससे चिंता मत लो। बाहर कुछ भी नहीं है। तुम्हारे भीतर बाजार है। तुम्हारे भीतर हजार वासनाओं का तुमुल नाद है। तुम्हारे भीतर महाभारत छिड़ा है: यहां जाऊं, वहां जाऊं; यह करूं, वह करूं? इसमें धन लगाऊं, उसमें धन लगाऊं? जिस दिन तुम्हारे भीतर यह तुमुल नाद शांत हो जाएगा, परमात्मा कभी भी कहीं गया नहीं—घेरे तुम्हें खड़ा है। बाहर—भीतर वही है; उसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। संसार से विमुख होते ही परमात्मा से सन्मुखता हो जाती है। इसलिए मैं कहता हूं: जहां संसार खत्म हुआ वहीं परमात्मा शुरू हो जाता है। बाहर से भीतर की तरफ आ गए तो संसार से परमात्मा की तरफ आ गए। भविष्य से वर्तमान की तरफ आ गए तो संसार से परमात्मा की तरफ आ गए। तृष्णा से, वीतत्तृष्णा में आ गए। असंतोष से संतोष में आ गए। समझो। करने का बहुत कुछ नहीं है। समझ लेने की बात है। समझ आ जाए तो करना अपने आप इसके पीछे उतर आता है। जब भी अवसर मिले, तभी संतुष्ट होकर बैठ जाओ। संतुष्ट होकर यानी स्वयं में समाहित होकर। समाधान में! न कहीं जाना, न कहीं आना। न कुछ पाने को, न कुछ खोने को। बस वहीं ध्यान, वहीं बज उठेगी बांसुरी। और जितनी तुम बांसुरी सुनने लगोगे, उतनी ही साफ होने लगेगी; उतने ही स्वर स्पष्ट होने लगेंगे। सुनते—सुनते एक दिन तुम पाओगे कि यह बांसुरी बाहर नहीं बज रही है—यह बांसुरी तुम ही हो। तत्त्वमसि! यह तुम ही हो। परमात्मा तुम्हारे ही प्राणों में नाद उठा रहा है। समझ की बात है। नासमझी में कुछ कर लोगे तो कुछ भी न होगा। नासमझी में तुम धन छोड़ दो, मकान छोड़ दो, पत्नी छोड़ दो, हिमालय भाग जाओ—करोगे क्या हिमालय में बैठ कर? तुम्हारा मन वहां भी वासनाओं में ही रचा—पचा रहेगा। बैठ कर हिमालय की गुफा में तुम सोचोगे कि अहा, सब छोड़ आया! अब स्वर्ग आने ही वाला है! अब थोड़े ही दिन की बात और है। आते ही होंगे रामजी, पुष्पक विमान पर ले जाएंगे! अप्सराएं तैयार ही हो रही होंगी। स्वर्ग में बंदनवार बांधे जा रहे होंगे कि महात्मा आ रहे हैं! यही बैठे—बैठे सोचोगे कि कौन सी अप्सरा चुननी है—उर्वशी ठीक रहेगी कि कोई और ठीक रहेगी? और फिर बैठे—बैठे थोड़ी देर में नाराजगी भी आएगी कि रामजी अभी तक नहीं आए; पुष्पक विमान का कुछ पता भी नहीं चल रहा है। कम से कम हनुमानजी को तो भेज ही देते! कोई संदेशवाहक तो आ जाता। इधर हम बैठे—बैठे परेशान हो रहे हैं। और सब छोड़ कर आ गए हैं। घर—द्वार छोड़ा; धन, पत्नी, बच्चे छोड़े—अब और क्या चाहिए! ऐसे गुस्सा बढ़ेगा। क्रोध भभकेगा। शिकायत उठेगी, प्रार्थना नहीं। जहां वासना है, वहां शिकायत है। जहां वासना है, वहां प्रार्थना हो भी तो झूठी है। मैंने सुना है, दिल्ली की घटना है। कुछ लोगों का एक दल मोरारजी भाई—जिंदाबाद, जिंदाबाद चिल्ला रहा था। बड़े जोरों से, बड़ी ताकत से! फिर अचानक मोरारजी भाई—मुर्दाबाद चिल्लाने लगा। वही दल! और उतनी ही ताकत से! इस आकस्मिक परिवर्तन को देख कर पत्रकारों ने उधर रुख किया और पूछा कि भाई, माजरा क्या है? अभी जिंदाबाद, अभी मुर्दाबाद! उन लोगों ने कहा कि हमें जिंदाबाद चिल्लाने के लिए सिर्फ आधे घंटे के पैसे दिए गए थे; और अब इकतीस मिनट हो गए हैं। तुम्हारी प्रार्थनाएं, तुम्हारी स्तुतियां, तुम्हारी पूजा—अगर उनके पीछे कुछ वासना है, कुछ मिलने का लोभ है—ज्यादा देर टिकने वाली नहीं। तीस मिनट पूरे हो जाएंगे, फिर? फिर तुम टूट पड़ोगे। क्योंकि जहां वासना है, वहां क्रोध है। क्योंकि जहां काम है, वहां क्रोध है। क्रोध काम की छाया है। प्रार्थना और वासना का फर्क यही है। प्रार्थना का अर्थ होता है: जो दिया है, इतना है कि धन्यवाद मेरा ले। वासना का अर्थ होता है: जो दिया है, यह कुछ भी नहीं है। मेरी योग्यता के योग्य ही नहीं है। कहां मैं पात्र आदमी, और क्या मुझे दिया है! अन्याय हो रहा है। सुध ले मेरी! बहुत हो चुका। सुनते थे कि तेरे द्वार पर देर है, अंधेर नहीं। देर भी हो गई, अब अंधेर भी हुआ जा रहा है। जहां वासना है, जहां मांग है—वहां क्रोध खड़ा ही है, तत्पर है। क्योंकि वासना का मतलब यह है कि मुझे कुछ मिले; जब तक मिलता रहे तब तक ठीक। कल मैं एक कहानी पढ़ रहा था, एक यहूदी कहानी। दो यहूदी मित्र, दोनों ने धंधा शुरू किया। एक तो गरीब ही था बीस साल के बाद। दूसरा बहुत अमीर हो गया था। कभी—कभी अमीर मित्र गरीब के द्वार पर आकर रुकता था। एक सांझ आकर रुका। रविवार है। उसने अपनी केडिलक गाड़ी आकर रोकी मित्र के द्वार पर। अंदर आया। उसके कपड़े शानदार। इत्र की खुशबू। मित्र की दुकान तो हालत खस्ता। आधी दुकान तो खाली सी पड़ी। अलमारियों में भी कुछ नहीं, धूल जमी। धनी मित्र ने कहा कि भई, बात क्या है? हम दोनों ने एक सा ही काम शुरू किया था और एक सी पूंजी से काम शुरू किया था। मेरी हालत देख—धन है कि बढ़ता चला जाता है। तू गरीब क्यों हुआ चला जाता है? उस गरीब मित्र ने कहा कि जो कुछ मैं कर सकता हूं, करता हूं। आप ही बताओ राज क्या है? तुम्हारी सफलता का राज क्या है? तो धनी मित्र ने कहा कि मेरी सफलता का राज यह है कि जिस दिन मैंने धंधा शुरू किया, मैंने परमात्मा की याद से शुरू किया। मैंने उसको साझीदार बना लिया है। मैं अकेला नहीं हूं; उसको साझीदार बना लिया है। और दस रुपये महीने चर्च को भी देता हूं। और हर साल एक दिन उपवास भी करता हूं। इसी से सब ठीक चल रहा है। परमात्मा की कृपा है। उसको साझीदार बना लिया; अब उसकी ही इज्जत का सवाल है। मेरी हार, उसकी हार; मेरी जीत, उसकी जीत। गरीब चुप रहा। सोचने जरूर लगा कि यह कैसा मामला हुआ। यद्यपि उसने जब दुकान शुरू की थी तो परमात्मा को याद करके शुरू की थी, लेकिन परमात्मा को साझीदार नहीं बनाया था। क्योंकि बात ही बेहूदी है। हम तो पड़े ही हैं कीचड़ में, उसे भी कीचड़ में खींचें! प्रार्थना यह की थी कि मुझे कीचड़ से निकालना; मगर सोचा कि यह कुछ समझ में नहीं आया। और जितना भी कमाता था, उसमें से आधा पैसा तो गरीबों को जाता, अस्पताल को देता, चर्च को देता, मंदिरों को देता, जहां जरूरत होती वहां देता। इसलिए गरीब भी रह गया था। हर महीने उपवास भी करता। हर रोज जाकर पूजागृह में पूजा भी करता। सोचने लगा कि यह खूब हुआ कि एक आदमी कहता है कि एक दिन उपवास करता है साल में और दस रुपये महीने दान भी करता है—और लाखों कमा रहा है! और कहता है मैंने परमात्मा को भागीदार बना लिया है। वह हंसा, मुस्कुराया। कहा कि जैसी तेरी मर्जी, जरूर इसमें ही मेरा हित होगा, नहीं तो तू मुझे गरीब रखता? इसमें ही मेरा हित होगा। धन्यवाद। उस रात भी हृदयपूर्वक उसने प्रार्थना की। दूसरे दिन, हैरानी की बात, संयोग की बात, अमीर का मकान जल गया, उसमें आग लग गई, दुकान जल गई। सब राख हो गया। तो इस गरीब ने उसे पत्र लिखा कि मेरी कोई सामर्थ्य तो नहीं है कि तुम्हें साथ दूं, लेकिन जो भी मेरे पास है, उसमें से आधा तुम ले लो। फिर काम शुरू कर दो। और भगवान तुम्हारे साथ है, तो जल्दी ही सब फिर ठीक हो जाएगा। अमीर ने उत्तर में सिर्फ इतना ही लिखा: कोई भगवान नहीं। सब धोखा है। मैंने इतना भरोसा किया और वक्त पर दगा दे गया। कोई भगवान नहीं। ईश्वर इत्यादि सब बकवास है। यह अंतरतम बात है। वह जो साझीदार इत्यादि बनाया था, वह सब ऊपर—ऊपर था। सफलता मिल रही थी तो ठीक था; असफलता आई तो कठिन हो गया। कामी भी परमात्मा को याद करता है, लेकिन उसकी याद झूठी है, वह याद कर ही नहीं सकता। उसके पास ओंठ नहीं, जिनसे प्रार्थना हो सके। उसके पास प्राण नहीं, जिनसे प्रार्थना हो सके। प्राण तो उसी के पास होते हैं, ओंठ तो उसी के पास होते हैं, जिसने एक सत्य जीवन का समझ लिया कि काम, कामना कहीं नहीं ले जाती, सिर्फ भटकाती है—अरण्य में भटकाती है। अरण्यरोदन है कामना। जिसको ऐसी प्रतीति हो गई, प्रगाढ़ प्रतीति हो गई...और खयाल रखना, मेरे कहने से तुम्हें प्रतीति नहीं हो जाएगी, न बुद्ध के कहने से प्रतीति होगी। तुम्हारा ही जीवन—अनुभव तुम्हें प्रतीति करवाएगा। अपने ही जीवन के अनुभव में तलाशो। तुम परमात्मा को खोजने शास्त्र में जाते हो, वहीं भूल हो जाती है। परमात्मा यहीं सब तरफ पड़ा है। अपने जीवन में ही खोजो। अपने ही जीवन के अनुभव में उलटो, पलटो। अपने ही जीवन का विश्लेषण करो। तुम्हारे जीवन भर की कथा अगर एक बात कहती है तो यही, कि दौड़ने से कहां पहुंचे, कि दौड़ने से क्या मिला! अब जरा बैठ कर देखो! उस बैठने का नाम: ध्यान। उस बैठने का नाम: संतोष। उस बैठने का नाम: प्रार्थना। अब जरा बैठ कर देखो! अब जरा चुप होओ, सन्नाटे में उतरो। जिस क्षण भी तुम्हारे भीतर कोई भाग—दौड़ न होगी, कोई ताना—बाना न बुना जा रहा होगा वासना का—एक क्षण को ही सही, ऐसा हो जाए—उसी क्षण तुम पाओगे: हवा के झोंके की तरह परमात्मा तुममें प्रवेश कर गया। कर गया ताजा। उड़ा गया सब धूल। कर गया कंचन अपने स्पर्श से।