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भगवान श्री, श्रीकृष्ण कहते हैं कि निष्कामता और अनासक्ति से बंधनों का नाश होता है और परमपद की प्राप्त


सबसे पहले तो अनासक्ति का अर्थ समझ लेना चाहिए। अनासक्ति थोड़े-से अभागे शब्दों में से एक है जिसका अर्थ नहीं समझा जा सका है। अनासक्ति से लोग समझ लेते हैं--विरक्ति। अनासक्ति विरक्ति नहीं है। विरक्ति भी एक प्रकार की आसक्ति है। विरक्ति विपरीत आसक्ति का नाम है। कोई आदमी काम में आसक्त है, वासना में आसक्त है। कोई आदमी काम के विपरीत ब्रह्मचर्य में आसक्त है। कोई आदमी धन में आसक्त है। कोई आदमी धन के त्याग में आसक्त है। कोई आदमी शरीर के शृंगार में आसक्त है, कोई आदमी शरीर को कुरूप करने में आसक्त है। लेकिन शरीर को कुरूप करने वाला विरक्त मालूम पड़ेगा, धन का त्याग करने वाला विरक्त मालूम पड़ेगा, क्योंकि इनकी आसक्तियां "निगेटिव' हैं, नकारात्मक हैं। आसक्ति के दो रूप हैं--किसी के पक्ष में आसक्त होना; या किसी के विपक्ष में आसक्त होना। जो विपक्ष में आसक्त है, वह भी उतना ही आसक्त है जितना पक्ष में आसक्त है। अनासक्ति इन दोनों तरह की आसक्तियों से मुक्ति का नाम है। अनासक्ति का अर्थ है, आसक्त भी नहीं, विरक्त भी नहीं। अनासक्ति दोनों का अतिक्रमण है। इसलिए मैंने कहा कि अनासक्ति थोड़े-से अभागे शब्दों में एक है। वह विरक्ति के साथ पर्यायवाची हो गया। आध्यात्मिक जगत में ऐसे बहुत से शब्द हैं, जो इसी भांति भ्रांत हो गए हैं। वीतराग ऐसा ही शब्द है। वीतराग विराग का पर्यायवाची बन गया है। वीतराग का अर्थ है, राग और विराग दोनों के पार। महावीर की धारा में जो वीतराग का अर्थ है, कृष्ण की धारा में वह अनासक्ति का अर्थ है। अनासक्ति और वीतरागता पर्यायवाची हैं; लेकिन महावीर वीतराग होंगे राग और विराग दोनों को छोड़कर और कृष्ण अनासक्त होंगे दोनों को स्वीकार करके। उतना फर्क है। और ये दो ही ढंग हैं। इसलिए वीतराग और अनासक्ति की परिणति तो एक है, मार्ग भिन्न हैं। वीतराग का मतलब है, जिसने राग भी छोड़ा विराग भी छोड़ा--लेकिन छोड़ने पर जोर है। अनासक्त का अर्थ है, जिसने राग भी स्वीकारा, विराग भी स्वीकारा--स्वीकार पर जोर है। इसलिए बहुत गहरे में वीतराग शब्द भी निषेधात्मक है और अनासक्त शब्द विधेयात्मक है, वह "पाज़िटिव' बहुत गहरे में। यह जो अनासक्त चित्त है, जिसने सब स्वीकार किया--और यह बड़े मजे की बात है कि जिसने सब स्वीकार किया, जैसा है वैसे के लिए ही राजी हो गया, ऐसे व्यक्ति के चित्त पर किसी चीज की कोई रेखा नहीं छूटती। हम किसी चीज को जोर से पकड़ें, तो भी रेखा छूटती है चित्त पर, किसी चीज को जोर से छोड़ें तो भी रेखा छूटती है चित्त पर। लेकिन न हम पकड़ें, न हम छोड़ें, चित्त पर कोई रेखा न छूटे, ऐसे चित्त का नाम अनासक्त। यह अनासक्ति, पूछा है, कैसे साधारणजन को आए? सभी जन साधारण हैं जब तक अनासक्ति न आ जाए। इसलिए ऐसा सवाल नहीं है कि साधारणजन को कैसे आए। अनासक्ति जब तक न आए, तक तक सभी साधारण हैं। अनासक्ति आ जाए तभी असाधारणतया जीवन में फलित होती है। इसलिए ऐसा नहीं है कि साधारणजन के लिए अनासक्ति का और रास्ता होगा, असाधारणजन के लिए और होगा। क्योंकि असाधारण का एक ही अर्थ है कि वह अनासक्ति को उपलब्ध हुआ है। कैसे उपलब्ध हो, ऐसा ही पूछें। यह अनासक्ति कैसे उपलब्ध हो? इसको भी समझने के पहले जरा इसे समझ लें कि यह चूक कैसे गई है--यह अनासक्ति हमसे चूक कैसे रही है? अनासक्ति कृष्ण की दृष्टि में स्वभाव है। हम चूक कैसे गए हैं स्वभाव से? इसलिए ऐसा नहीं है कि हमें कुछ साधना है अनासक्ति में, इतना ही जानना है कि स्वभाव से हम चूक कैसे गए हैं। हमने अनासक्ति खोई कैसे? कोई व्यक्ति मेरे पास आया और उसने पूछा कि मैं ईश्वर को खोजता हूं। तो मैंने उससे पूछा कि तुमने खोया कब? और अगर खोया हो तो खोज सकते हो। उसने कहा, नहीं, मैंने खोया तो कभी भी नहीं। तो फिर मैंने कहा, खोजना पागलपन है। जिसे खोया ही न हो, उसे खोजा कैसे जा सकता है? इसलिए असली सवाल, मैंने उस व्यक्ति को कहा कि यह नहीं है कि तुम ईश्वर को कैसे खोजो, असली सवाल यह है कि तुम यह खोजो कि तुमने ईश्वर खोया भी है? और अगर तुम्हें, यह पता चल जाए कि मैंने खोया ही नहीं, तो खोज पूरी हो जाती है। अनासक्ति स्वभाव है। यह बहुत मजे की बात है। चूंकि अनासक्ति हमारा स्वभाव है इसलिए हम आसक्त भी हो सकते हैं और विरक्त भी हो सकते हैं। अगर आसक्ति हमारा स्वभाव हो, तो विरक्त हम कभी भी नहीं हो सकते। अगर विरक्ति हमारा स्वभाव हो, तो हम आसक्त कभी भी नहीं हो सकते। एक वृक्ष की शाखा है। हवा चलती है पश्चिम की तरफ तो शाखा पश्चिम में झुक जाती है। हवा चलती है पूरब की तरफ तो शाखा पूरब में झुक जाती है। वह इसलिए झुक जाती है कि शाखा न पूरब में है, न पश्चिम में है। वह बीच में है। हवाएं जिस तरफ चलती हैं, वह उसी तरफ झुक जाती है। पानी को हम गर्म करते हैं तो गर्म हो जाता है, ठंडा करते हैं तो ठंडा हो जाता है, क्योंकि पानी खुद न ठंडा है, न गरम है। अगर पानी गरम ही हो, तो फिर ठंडा न हो सकेगा; ठंडा ही हो, तो फिर गरम न हो सकेगा। पानी का स्वभाव ठंडे और गरम के पार है। इसलिए दोनों तरफ यात्रा संभव है। हमारा स्वभाव अगर आसक्ति हो, तो फिर विरक्ति संभव नहीं है। लेकिन हम विरक्त लोगों को देखते हैं। अगर हमारा स्वभाव पकड़ना ही हो, तो फिर त्याग संभव नहीं है, लेकिन हम त्याग करते लोगों को देखते हैं। अगर हमारा स्वभाव त्यागी हो, तो फिर आसक्ति कैसे संभव होगी, हम तो लोगों को जोर से चीजों को पकड़े देखते हैं। इसका अर्थ इतना ही कि हमारा स्वभाव दोनों नहीं है। इसलिए हम जिस तरफ जाना चाहें जा सकते हैं। हमारा स्वभाव दोनों का अतिक्रमण करता है इसलिए हम दोनों तरफ झुक सकते हैं। हम आंख खोल सकते हैं, आंख बंद कर सकते हैं, क्योंकि आंख का स्वभाव न खुला होना है न बंद होना है। अगर आंख का स्वभाव खुला होना हो तो फिर बंद कैसे करियेगा? अगर आंख का स्वभाव बंद होने का अतिक्रमण करती है। दोनों के पार है। खुलना और बंद होना बाहरी घटनाएं हैं। आंख भीतर न खुली है, न बंद है सिर्फ पलक ही झपकते और खुलते हैं। बहुत गहरे में चेतना हमारी अनासक्त है। सिर्फ पलक ही आसक्त होते हैं और विरक्त होते हैं। तो पहली बात समझ लेनी जरूरी है कि स्वभाव हमारा अनासक्ति है। और यह भी ध्यान रहे कि जो हमारा स्वभाव है उसे ही पाया जा सकता है, जो हमारा स्वभाव नहीं है उसे हम कभी भी पा न सकेंगे। सिर्फ हम वही पा सकते हैं जो बहुत गहरे में हैं ही। एक बीज फूल बन जाता है, क्योंकि गहरे में वह फूल है ही। एक पत्थर फूल नहीं बन जाता क्योंकि गहरे को छोड़ दे, उथले में भी वह फूल नहीं है। पत्थर को बो दें तो पत्थर ही रह जाता है, क्योंकि बहुत गहरे में वह पत्थर ही है। बीज को बो दें, देखने में दोनों एक से मालूम पड़ते थे--पत्थर का टुकड़ा और बीज--पत्थर की कंकड़ी और बीज, लेकिन जब बोया तब पता चलता है कि बीज पत्थर नहीं था, वह फूल हो गया। अब हम कह सकते हैं कि बीज फूल था ही, इसलिए फूल हो गया। अगर न होता, तो नहीं हो सकता था। जीवन के गहनतम सूत्रों में से एक है कि हम वही हो सकते हैं जो हम हैं ही--किसी गहरे तल पर हैं, फिर हम परिधि पर भी प्रकट हो जाएंगे। अनासक्ति हमारा स्वभाव है। आसक्ति या विरक्ति हमारा स्वभाव नहीं है। इसलिए हम आसक्त और विरक्त हो पाते हैं। और अनासक्ति हमारा स्वभाव है, इसलिए अनासक्ति पाई जा सकती है। जो बीज है, वह फूल बन सकता है। यह अनासक्ति सभी का स्वभाव है। ऐसा नहीं कि किसी का है और किसी का नहीं। जहां भी चेतना है, चेतना सदा अनासक्त है। हां, चेतना का व्यवहार, पलक का झपना और बंद होना, आसक्त हो जाता है या विरक्त हो जाता है। यह दूसरी बात ठीक से समझ लें--चेतना अनासक्त है, व्यवहार आसक्त या विरक्त है, व्यवहार। अगर मुझे निपट अकेला छोड़ दिया जाए, जहां सिर्फ मेरी चेतना ही है, तो उस क्षण में मैं आसक्त हूं या विरक्त हूं? नहीं, उस क्षण में मैं कोई भी नहीं हूं। आसक्ति या विरक्ति सदा दूसरे के संबंध में पैदा होती है। अगर मैं कहूं कि फलां आदमी आसक्त है, तो आप तत्काल पूछेंगे, किस चीज में? क्योंकि बिना किसी चीज के आसक्त कैसे होगा? अगर मैं कहूं, फलां आदमी विरक्त है, तो आप पूछेंगे, किस संबंध में? क्योंकि अकेली विरक्ति का कोई अर्थ नहीं होता। विरक्ति या आसक्ति, दोनों वस्तुओं या व्यक्तियों, "पर' से हमारे संबंध हैं, "रिलेशनशिप्स' हैं। वह हमारा व्यवहार है, वह हमारा "बिहेवियर' है, वह हम नहीं हैं। यह दूसरी बात ठीक से समझ लेनी जरूरी है कि आसक्त या विरक्त हमारा व्यवहार है। और इसलिए यह भी सुविधापूर्ण है कि जिसके प्रति आज हम आसक्त हैं, कल विरक्त हो सकते हैं। जिसके प्रति आज विरक्त हैं, कल आसक्त हो सकते हैं। और ऐसा भी नहीं है कि कल ही हों, कभी-कभी तो ऐसा होता है, एक ही क्षण में एक ही आदमी के किसी हिस्से के प्रति हम आसक्त हैं और किसी के प्रति विरक्त होते हैं। एक ही चीज के प्रति भी हमारी दुविधा होती है, द्वंद्व होता है। कहीं से वह पकड़ने योग्य लगती है, कहीं से वह छोड़ने योग्य लगती है, लेकिन एक बात तय है कि विरक्ति और आसक्ति हमारा व्यवहार है, हमारा स्वभाव नहीं। व्यवहार का मतलब है, जिस में "पर' अनिवार्य है, जो "पर' के बिना न हो सकेगा। जो अकेले में न हो सकेगा। और स्वभाव का मतलब है, जो निपट अकेले में ही है। अगर मुझे बिलकुल ही अकेला छोड़ दिया जाए सारी वस्तुओं से, सारे लोगों से, सारे विचारों से, मैं निपट अपने अकेलेपन में, "टोटल लोनलीनेस' में रह जाऊं, तो वहां मैं आसक्त रहूंगा कि विरक्त रहूंगा? नहीं, वहां ये दोनों बातें असंगत होंगी। "रेलिवेंस' नहीं होगा इनका कोई। वहां मैं कोई भी नहीं होऊंगा, क्योंकि सारे के सारे संबंधों के सूचक शब्द हैं। वहां मैं असंग होऊंगा या वहां मैं अनासक्त होऊंगा। यह मैं समझने के लिए कह रहा हूं कि आप इन शब्दों की पूरी अर्थवत्ता को समझ लें, तो फिर बहुत कठिनाई नहीं रहेगी कि कैसे उपलब्ध हों। आसक्ति विरक्ति संबंध है, "पर' अपेक्षित है। "पर' के बिना नहीं होगा। वह जो "द अदर' है, वह अनिवार्य है। इसलिए आसक्ति भी गुलामी है और विरक्ति भी गुलामी है। दासता है; क्योंकि जो दूसरे के बिना न हो सके, उसमें हम कभी स्वतंत्र नहीं हो सकते। इसलिए आसक्त भी एक तरह का गुलाम होता और विरक्त भी उलटी तरह का गुलाम होता है। आसक्त के पास तिजोड़ी न हो, तो मुश्किल में पड़ जाता है; विरक्त के कमरे में रात तिजोड़ी रख दो, तो उतनी ही मुश्किल में पड़ जाता है। लेकिन तिजोड़ी से दोनों का बड़ा गहरा संबंध है। आसक्त के पास स्त्री न हो, पुरुष न हो, तो मुश्किल में पड़ जाता है; विरक्त के कमरे में रात स्त्री को ठहरा दो, पुरुष को ठहरा दो, उतनी ही मुश्किल में पड़ जाता है। दोनों गुलाम हैं। दोनों दूसरों पर निर्भर हैं--दूसरे के होने, या न होने पर, इससे फर्क नहीं पड़ता, लेकिन दूसरा उनके होने में अनिवार्य है। वे दूसरे के बिना अपने को नहीं सोच पा सकते। लोभी धन के बिना नहीं सोच पाता, त्यागी धन के बिना नहीं सोच सकता। लेकिन दोनों के केंद्र पर कहीं "पर' सदा मौजूद रहता है। यह हमारा व्यवहार ठीक से समझ लें, तो फिर व्यवहार में परिवर्तन से कोई अंतर नहीं पड़ता कि आसक्त विरक्त हो जाए--अक्सर होता रहता है, आसक्त विरक्त हो जाते हैं, विरक्त आसक्त हो जाते हैं। जो लोग घनी आसक्ति में खड़े हैं, जब वे मुझे मिलते हैं तब वे सदा रोते मिलते हैं कि हम बहुत बंधन में पड़े हैं, इससे छुटकारे का उपाय क्या है? जो विरक्त हैं, जब वे मुझे मिलते हैं तो वे कहते हैं, कहीं हमने भूल तो नहीं कर दी? हम जिंदगी से भाग गए। कहीं ऐसा तो नहीं है कि जिंदगी में कुछ लोगों को मिल रहा हो और वह हमें मिल रहा है? विरक्त को सदा खयाल बना रहता है कि पता नहीं आसक्त तो कुछ नहीं लूट रहा! आसक्त को सदा खयाल बना रहता है कि कहीं विरक्त तो कुछ नहीं लूट रहा है! पता नहीं विरक्त को क्या मिल रहा है, जो आसक्त सोचता रहता है, मुझे नहीं मिल रहा। दोनों की स्थितियां भर अलग हैं, परिस्थितियां भर अलग हैं, मनःस्थितियां अलग नहीं हैं। दोनों की मनःस्थितियां पर-निर्भर हैं। और पर-निर्भरता से न कोई स्वतंत्रता है न कोई सत्य है। पर-निर्भरता से न कोई आनंद है न कोई मुक्ति है। "पर' ही बंधन है। लेकिन विरक्त कहता है, तो हम "पर' को छोड़कर भाग जाते हैं। लेकिन उसे पता नहीं कि जिसे वह छोड़कर भागता है, उससे उसके संबंध नहीं टूटते, सिर्फ भागने के संबंध हो जाते हैं। और जिसे हम छोड़कर भागते हैं वह हमारा पीछा करता है। वह नहीं करता पीछा लेकिन हम छोड़कर भगे हैं, उस कारण ही हम उससे भयभीत हैं, हम उससे डरे हैं, हम उससे चिंतित हैं, वही हमारा पीछा करती है। और फिर "पर' को छोड़कर जाइयेगा कहां, सब जगह "पर' मौजूद है। सिर्फ एक जगह को छोड़कर, स्वयं के भीतर को छोड़कर, और तो सब जगह "पर' मौजूद है। घर छोड़कर जाइयेगा तो आश्रम मौजूद है। पत्नी-पति को छोड़कर जाइयेगा तो शिष्य-शिष्यायें मौजूद हैं। गांव को छोड़कर जाइयेगा तो जंगल मौजूद है। महलों को छोड़कर जाइयेगा तो झोपड़ियां मौजूद हैं। कीमती वस्तु छोड़कर जाइयेगा तो लंगोटियां मौजूद हैं, नंगापन मौजूद है। वह सब मौजूद है। "पर' को छोड़कर इस जगत में भागा नहीं जा सकता क्योंकि जगत ही "पर' है; तो भागियेगा कहां? जगत तो होगा। जहां भी जाइयेगा वहां जगत होगा। इसलिए जगत को छोड़कर नहीं भागा जा सकता, इसलिए "पर' को भी छोड़कर नहीं भागा जा सकता। क्योंकि "पर' तो रहेगा ही। हां, नये रूपों में प्रगट होगा। नये-नये रूप लेगा, लेकिन नये रूपों से "पर' नहीं बदलता। हम जहां भी होंगे जगत में, वहां "पर' होगा, सिर्फ एक जगह को छोड़कर। स्वयं के बहुत गहरे केंद्र पर ही "पर' नहीं है। लेकिन इसलिए नहीं कि वहां "पर' प्रवेश नहीं कर सकता, बल्कि इसलिए कि स्वयं के बहुत गहरे केंद्र पर "स्व' भी मिट जाता है। "मैं' भी मिट जाता है, इसलिए "पर' के होने का उपाय मिट जाता है। इसको अब ऐसे समझिये कि जब "आप' हैं तब तक "पर' से नहीं बच सकते हैं। एक मैंने कहा कि जब तक आप जगत में हैं, कहीं भी भागिये "पर' होगा। अब मैं दूसरी बात आपसे कहता हूं कि जब तक "आप' हैं, अगर आंख भी बंद कर लीजिये और जगत न हो, तो भी "पर' होगा। हां, बंद आंख में होगा, सपने में होगा, कामना में होगा, कल्पना में होगा, वासना में होगा, लेकिन "पर' होगा। जब तक आप हैं तब तक "पर' भी होगा। स्वभाव का मतलब है जहां "स्व' भी मिट जाता है। इसलिए स्वभाव भी अभागे शब्दों में एक है, क्योंकि उसका मतलब होता है, स्वयं का भाव। लेकिन जहां स्वभाव शुरू होता है, वहां "स्व' मिट जाता है। स्वभाव का स्वयं से कोई संबंध नहीं है। स्वभाव का मतलब ही है कि हमसे होने के पहले था। हमसे होने के बाद होगा; हम हैं तब भी है, हम नहीं हैं तब भी है। अगर मैं बिलकुल भी मिट जाऊं, मेरा "मैं' बिलकुल भी मिट जाए, तब भी शेष रह जाएगा वह स्वभाव है। स्वभाव में "स्व' शब्द खतरनाक है। उससे खतरा पैदा होता है, उससे लगता है कि स्वयं का होना। नहीं, स्वभाव का मतलब है, "द नेचर'। स्वभाव का मतलब है, प्रकृति। स्वभाव का मतलब है जो हमारे बिना भी है। जब आप रात सो गए होते हैं तब "स्व' नहीं होता है, लेकिन स्वभाव होता है। जब गहरी प्रषुप्ति में होते हैं, तब "स्व' नहीं होता, लेकिन स्वभाव होता है। जब एक आदमी मूर्च्छित पड़ा है? गहरी मूर्च्छा में, "स्व' नहीं होता, लेकिन स्वभाव होता है। सुषुप्ति और समाधि में इतना ही फर्क है कि सुषुप्ति में मूर्च्छा के कारण "स्व' नहीं होता, समाधि में अमूर्च्छा के कारण, जागरण के कारण, ज्ञान के कारण, "स्व' नहीं होता। तो जब तक "जगत' है, तब तक "पर' है और जब तक "मैं' हूं तब तक "पर' है। अब इसे हम और तरह से भी ले लें। जब तक "मैं' हूं, तभी तब जो मुझे दिखाई पड़ रहा है वह "जगत' है। "जगत' मेरे "मैं' के बिंदु से देखा गया कोण है। मेरे "मैं' के बिंदु से देखा गया सत्य है। इसलिए "पर'--अगर मेरा "मैं' मिट जाए तो "पर' कोई भी नहीं है, फिर मैं किससे बचूंगा और किससे बंधूंगा? फिर मैं ही हूं। अनासक्ति स्वभाव है। कैसे चलें इसकी तरफ? जो बड़ी-से-बड़ी भूल है वह यह है कि कोई विरक्ति की तरफ चल पड़े अनासक्ति को पाने के लिए। खयाल रहे, आसक्ति उतना बड़ा खतरा नहीं है अनासक्ति के मार्ग पर, क्योंकि आसक्ति का चेहरा साफ है। कोई भूल नहीं करेगा आसक्ति को अनासक्ति समझने की। कैसे करेगा? कोई भूल नहीं करेगा धन को पकड़ने को अनासक्ति समझने की। लेकिन धन को छोड़ने को अनासक्ति समझने की भूल होती रही है, होती है, हो सकती है। इसलिए बड़ा खतरा अनासक्ति की यात्रा में आसक्ति नहीं है, आसक्ति का चेहरा बिलकुल साफ है, बड़ा खतरा विरक्ति है, विरक्ति के चेहरे पर बुर्का है। विरक्ति को जो न पहचान पाए, वह अनासक्ति के नाम पर विरक्ति का खोटा सिक्का लेकर घूमता रहेगा। इसलिए अनासक्ति की यात्रा में विरक्ति से सावधान रहने की पहली जरूरत है। विरक्ति भी आसक्ति है। इतना समझते ही सावधानी उत्पन्न हो जाती है। दूसरी बात, "पर' कहीं भी हम जाएं तो रहेगा। इसलिए हम उसी जगह चलें, जहां "पर' नहीं रहेगा। हम भीतर चलें। हम स्वयं में चलें। हम अपने एकांत में चलें। हम अपने अकेलेपन में उतरें। लेकिन इसका क्या मतलब है? कि क्या मैं बाहर के जगत से आंख बंद कर लूं तो एकांत में उतर जाऊंगा? अकेला हो जाऊंगा? आंख तो हम रोज बंद करते हैं, लेकिन एकांत नहीं होता। क्योंकि आंख बंद करते ही वे चित्र, वे प्रतिमाएं, वे प्रतीक, "इमेजेज' जो हमने बाहर से ग्रहण किए थे, भीतर से उठने शुरू हो जाते हैं। विचार आते हैं, कल्पनायें आती हैं, स्वप्न आते हैं, दिवास्वप्न आते हैं और फिर हम जगत को ही देखते रहते हैं। हां, अब जो जगत होता है, वह कल्पित होता है। जो बाहर आंख के था वह वास्तविक था, अब उसकी सिर्फ छायायें होती हैं, अब सिर्फ फिल्म होती है उसकी, अब वह खुद नहीं होता। हम अपनी आंखों और मन का उपयोग बिलकुल "मूवी' कैमरे की तरह कर रहे हैं--जो देखते हैं उसे उतारते चले जाते हैं; फिर आंख बंद करके उसको पर्दे पर देखते रहते हैं। फिर वह चलता रहता है, यह भी "पर' की छाया है। यह भी हट जाए तो हम "स्व' में उतरते हैं। हट सकती है, इसमें कोई कठिनाई नहीं है। हम इसे चलाते हैं, इसलिए यह चलती है। हम इसे चलाने में उत्सुक न रह जाएं, हमारी रुचि इसके चलाने में न रह जाए तो ये प्रतिमायें तत्काल गिर जाती हैं, इनका कोई अर्थ नहीं रह जाता। हमारा रस ही इन प्रतिमाओं को चलाने का मूल आधार है। विरस भी। ध्यान रहे, रस ही नहीं विरस भी। जिसे हम याद करना चाहते हैं वह भी याद आता है आता है और उससे भी ज्यादा वह याद आता है जिसे हम भूलना चाहते हैं। लेकिन जिसे न हम भूलना चाहते हैं, जिसे न हम याद करना चाहते हैं, वह अचानक गिर जाता है। वह हमारे चित्त से अर्थहीन हो जाता है। वह पर्दे से हट जाता है। तो इस भीतर चलती हुई फिल्म को अगर साक्षीभाव से देखें--सिर्फ देखें, न रस लें, न विरस लें; न आसक्त हों, न विरक्त हों इस भीतर की फिल्म पर तो थोड़े दिन में यह साक्षी का बोध इस फिल्म को गिराता जाता है। और एक क्षण आता है जब निपट चेतना अकेली रह जाती है और कोई "आब्जेक्ट', कोई विषय नहीं होता है--निर्विषय चेतना रह जाती है। इस निर्विषय चेतना में जिसका अनुभव होता है, वह अनासक्ति है। इस निर्विषय चेतना से जो व्यवहार निकलता है, उसका नाम अनासक्ति-योग है। निश्चित ही व्यवहार बिलकुल दूसरा होगा। जिस व्यक्ति ने अपने इस स्वभाव की अनासक्ति को पहचाना, जिसने जाना कि मुट्ठी बांध लेती है, खोल लेती है, लेकिन मुट्ठी के दोनों काम नहीं हैं इसलिए दोनों काम कर पाती है, अब ऐसा व्यक्ति बाहर के जगत में लौटकर, भीतर से बाहर आकर वही नहीं होगा जो बाहर से भीतर जाते वक्त था। अब इसने अपने चेतना के दर्पण को पहचाना, अब यह चित्त का उपयोग कैमरे की तरह नहीं, दर्पण की तरह करेगा। और अब इसके चित्त का संबंध पैदा नहीं होगा। संबंध बनेंगे लेकिन संबंध पैदा नहीं होगा। संबंध होंगे लेकिन असंगता होगी। यह प्रेम भी करेगा ऐसे ही जैसे पानी पर लकीर खींची जाती है। यह लड़ेगा भी जैसे पानी पर लकीर खींची जाती है। इसका दर्पण लड़ने को भी दिखलाएगा और प्रेम को भी दिखलाएगा। और यह दोनों के बाहर, पूरे समय दोनों के बाहर चलता रहेगा। इस व्यक्ति के व्यवहार की स्थिति अभिनय हो जाएगी, "एक्टिंग' की हो जाएगी। और यह व्यक्ति अब कर्ता नहीं होगा, अभिनेता हो जाएगा। कृष्ण अगर कुछ हैं, तो अभिनेता हैं। और उनसे कुशल अभिनेता पृथ्वी पर नहीं हुआ है। उन्होंने इस पूरे जगत को मंच बना लिया है। बाकी अभिनेता एक छोटे से मंच को मंच मानते हैं उन्होंने पूरी पृथ्वी को मंच बना लिया। इससे क्या फर्क पड़ता है? दस-पांच तख्त रखकर हम मंच बना दें, फिर उस पर अभिनय चलता है। यह पूरी पृथ्वी मंच क्यों नहीं हो सकती? इस पूरी पृथ्वी पर अभिनय क्यों नहीं चल सकता? और अभिनेता जो है उसे न तो आंसू बांधते हैं, न उसे मुस्कुराहट बांधती है। जब वह रोता है, तब भी रोता नहीं; जब हंसता है, तब भी हंसता नहीं; जब प्रेम करता है तब भी प्रेम करता नहीं, जब लड़ता है तब भी लड़ता नहीं; उसकी मित्रता मित्रता नहीं, उसकी शत्रुता शत्रुता नहीं। तब ऐसे व्यक्ति के जीवन को अगर हम कहें तो एक "ट्राइ-एंगल' बन जाता है। ऐसे व्यक्ति का जीवन त्रिभुज बन जाता है। "ट्राइ-एंगल'। हम त्रिभुज नहीं हैं। हमारा तीसरा जो कोण है, वह जो "थर्ड एंगल' है, अंधेरे में डूबा हुआ है। हमारे सिर्फ दो कोण हमें दिखाई पड़ते हैं--आसक्ति, विरक्ति। एक तीसरा इन दोनों को जोड़ने वाला "ट्राइ-एंगल' का तीसरा हिस्सा, वह हमारा अंधेरे में दबा है। अनासक्त व्यक्ति का वह भी प्रकाश में आ जाता है। उसकी पूरी जिंदगी--दोनों कोणों पर वह व्यवहार करता है। लेकिन रहता सदा अपने तीसरे कोण पर। जब भी दूसरों से संबंध होता है तब यह आसक्त दिखाई पड़ता है या विरक्त दिखाई पड़ता है। लेकिन वह सिर्फ दिखाई पड़ना है। वह "एपियरेन्स' है। रहता सदा अपने तीसरे कोण पर है। इस तीसरे कोण पर, इस "थर्ड एंगल' पर हो जाने का नाम अनासक्ति है। हम सब के पास तीनों कोण हैं, लेकिन दो कोण हमारे आंखों के सामने और एक कोण हमारी आंख के पीछे है। दो कोण स्पष्ट हैं, बायें और दायें साफ हैं; राग और विराग साफ हैं; इधर कुआं उधर खाई साफ हैं, और एक तीसरा कोण भीतर अंधेरे में डूबा है, वह तो जब अपने भीतर उतरेंगे एकांत में तभी हमें स्पष्ट होगा तभी रोशनी वहां पहुंचेगी। और जिसने अपने तीसरे कोण को पा लिया, उसने कृष्ण को पा लिया। उसने बुद्ध को पा लिया, उसने महावीर को पा लिया, उसको कुछ पाने को बचता नहीं। क्योंकि एक बार उसको यह पता हो गया कि आसक्त होते हुए मैं अनासक्त होता हूं, विरक्त होते हुए मैं अनासक्त होता हूं, तब फिर आसक्ति और विरक्ति खेल हो गए। एक विचारक ने एक किताब लिखी है, जिसका नाम है--"गेम दैट पीपुल प्ले', खेल जो लोग खेलते हैं। लेकिन उस बड़ी किताब में उसने सब खेलों की चर्चा की है, बुनियादी खेल की नहीं चर्चा कर पाया। बुनियादी खेल यह है कि अनासक्त रहते हुए आसक्ति और विरक्ति का जो खेल है वह बुनियादी खेल है, वह "अल्टीमेट प्ले' है। बहुत कम लोग खेल पाते हैं इसलिए उसको पता नहीं होगा, उसने उसकी कोई चर्चा नहीं की। अनासक्ति भीतर उतरने से उपलब्ध होती है और भीतर उतरना साक्षीभाव से संभव होता है। इसलिए जीवन के किसी भी कोण में साक्षी होना शुरू हो जाएं, आप भीतर पहुंच जाएं। और जिस दिन आप भीतर पहुंच जाएं, उस दिन आप अनासक्त हो जाते हैं।