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परमात्मा की खोज


रंतु हजारों मनुष्यों में कोई ही मनुष्य मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करता है, और उन यत्न करने वाले योगियों में भी कोई ही पुरुष मेरे परायण हुआ मेरे को तत्व से जानता है अर्थात यथार्थ मर्म से जानता है।

प्रभु की यात्रा सरल भी है और सर्वाधिक कठिन भी। सरल इसलिए कि जिसे पाना है, उसे हमने सदा से पाया ही हुआ है। जिसे खोजना है, उसे हमने वस्तुतः कभी खोया नहीं है। वह निरंतर ही हमारे भीतर मौजूद है, हमारी प्रत्येक श्वास में और हमारे हृदय की प्रत्येक धड़कन में। इसलिए सरल है प्रभु को पाना, क्योंकि प्रभु की तरफ से उसमें कोई भी बाधा नहीं है। इसे ठीक से ध्यान में ले लेंगे।

प्रभु को पाना सरल है, क्योंकि प्रभु सदा ही अवेलेबल है, सदा ही उपलब्ध है। लेकिन प्रभु को पाना कठिन बहुत है, क्योंकि आदमी सदा ही प्रभु की तरफ पीठ किए हुए खड़ा है। आदमी की तरफ से सारी कठिनाइयां हैं, प्रभु की तरफ से कोई भी कठिनाई नहीं है। उसके मंदिर के द्वार सदा ही खुले हैं, लेकिन हम उन मंदिर के द्वारों की तरफ पीठ किए हैं। पीठ ही नहीं किए हैं, पीठ करके भाग भी रहे हैं। भाग ही नहीं रहे हैं, अपना पूरा जीवन, अपनी पूरी शक्ति, अपनी पूरी सामर्थ्य, किस भांति उस मंदिर से दूर निकल जाएं, इसमें लगा रहे हैं।

यद्यपि हम निकल न पाएंगे। हजारों-हजारों जन्मों में दौड़कर भी उस मंदिर से हम दूर न जा पाएंगे। और जिस दिन भी हम पीठ फेरकर देखेंगे, पाएंगे कि वह मंदिर वहीं का वहीं मौजूद है–वहीं, जहां से हमने दौड़ना शुरू किया था।

आदमी की तरफ से बहुत कठिनाइयां हैं। इसलिए कृष्ण के इस सूत्र में उन्होंने कहा, करोड़ों में कोई एक प्रयास करता है। और प्रयास करने वाले करोड़ों में कोई कभी एक मुझे उपलब्ध होता है।

दो बातें। करोड़ों में कभी कोई एक प्रयास करता है। इसे समझें। और फिर प्रयास करने वाले करोड़ों में भी कभी कोई एक मुझे परायण हुआ, मुझे समर्पित हुआ, उपलब्ध होता है।

क्यों करोड़ों लोगों में कभी कोई एक प्रयास करता है उसे पाने के लिए, जिसे पाए बिना कोई चारा नहीं, जीवन में कोई अर्थ नहीं? क्यों करोड़ों में कोई एक प्रयास करता है उसे पाने के लिए, जिसे पाकर सब पा लिया जा सकता है? क्या होगा कारण? होना तो ऐसा चाहिए कि करोड़ों में कभी कोई एक प्रयास न करे, बाकी सारे लोग प्रयास करें। क्योंकि परमात्मा आनंद है, जीवन है, अमृत है। तो करोड़ों में कोई एक क्यों प्रयास करता है? इसके कारण को थोड़ा ठीक से समझ लेना जरूरी है, क्योंकि वह उपयोगी है।

सबसे पहला कारण तो यह है कि जो हमें मिला ही हुआ है, उसे पाने के लिए हम क्यों कर चेष्टा करें? सागर की मछली सब कुछ खोजती होगी, सागर को कभी नहीं खोजती है। सागर की मछली सब खोजों पर निकलती होगी, लेकिन सागर की खोज पर कभी नहीं निकलती है। उसी में पैदा होती है, उसी में जीती है, बड़ी होती है, श्वास लेती है, उसी में समाप्त होती है। उसे पता भी नहीं चलता कि सागर है।

मछली को भी सागर का तभी पता चलता है, जब उसे सागर के बाहर निकालो। अगर मछली सागर के बाहर न आए, तो उसे कभी भी पता नहीं चलता कि सागर है। असल में सागर के साथ इतनी एक है कि पता भी कैसे चले! पता चलने के लिए दूरी चाहिए।

तो मछली तो कभी-कभी सागर के बाहर भी आ जाती है, आदमी तो परमात्मा के बाहर कभी नहीं आता है। मछली को तो कोई मछुवा कभी फांस भी लेता है जाल में और सागर के तट पर भी तड़फने को छोड़ देता है। आदमी के लिए तो ऐसा कोई तट नहीं है, जहां परमात्मा मौजूद न हो। आदमी जहां भी जाए, वहां परमात्मा मौजूद है। जो इतना ज्यादा मौजूद है, उसकी हम फिक्र छोड़ देते हैं, उसका हमें खयाल भूल जाता है।

ध्यान रहे, हमारे ध्यान की जो धारा है, वह जो गैर-मौजूद है, उसकी तरफ बहती है। जैसे आपका एक दांत टूट जाए, तो जीभ उस दांत की तरफ चलने लगती है। जो दांत मौजूद हैं, उनकी तरफ नहीं चलती। और भलीभांति एक दफे पता लगा लिया कि टूट गया, खाली जगह छूट गई, फिर भी दिनभर जीभ वहीं दौड़ती रहती है! जहां अभाव है, वहां हम खोजते हैं। जिसका अति भाव है, जो एकदम मौजूद है घना होकर, वहां हम नहीं खोजते।

मन के गहरे नियमों में एक यह है कि जो हमें उपलब्ध है, उसकी हम विचारणा छोड़ देते हैं। जो हमें उपलब्ध नहीं है, उसकी हम खोज करते हैं। जो हमारे पास है, उसे हम भूल जाते हैं। जो हम से दूर है, उसकी हम स्मृति से भर जाते हैं। जिसे हम खो देते हैं, उसका पता चलता है; और जिसे हम कभी नहीं खोते, उसका पता भी नहीं चलता।

परमात्मा की खोज पर निकलने में जो सबसे बड़ी बाधा है, वह मन का यह नियम है कि हमें उसका ही पता चलता है, जो नहीं है। निगेटिव का पता चलता है, पाजिटिव का पता नहीं चलता। टूट गया दांत, तो पता चलता है। वह दांत चालीस साल से आपके पास था, तब इस जीभ ने कभी उसकी फिक्र न की। आज नहीं है, तो उसकी तलाश है!

मन निगेटिविटी, मन जो है नकार की तरफ दौड़ता है। वैसे ही जैसे पानी गङ्ढों की तरफ दौड़ता है, ऐसा ही मन अभाव की तरफ, एब्सेंस की तरफ, जो नहीं है, उसकी तरफ दौड़ता है। जो है, उसकी तरफ मन नहीं दौड़ता।

और परमात्मा सर्वाधिक है। टू मच। इतना ज्यादा है कि उसके सिवाय और कुछ भी नहीं है। वही वही है। सब तरफ वही है। आंख खोलें तो, आंख बंद करें तो; जागें तो, सो जाएं तो। सब तरफ वही वही है। सागर की तरह हमें घेरे हुए है। इसलिए करोड़ों में एक उसकी खोज पर निकलता है।

अगर परमात्मा की खोज पर निकलना हो, करोड़ों में एक बनना हो, तो इस सूत्र से विपरीत चलेंगे तभी, अन्यथा कभी नहीं। जो आपके पास हो, उसका स्मरण रखें; और जो आपसे दूर हो, उसे भूल जाएं। जो दांत अभी मुंह में हो, उसे जीभ से टटोलें; और जो गिर जाए, उसे मत टटोलें। जो आज सुबह रोटी मिली हो, उसका आनंद लें; जो रोटी कल मिलेगी, उसके सपने मत देखें। जो नहीं है, उसे छोड़ दें; और जो है, उसे पूरे आनंद से जी लें। तो आप करोड़ों में एक बनना शुरू हो जाएंगे।

क्योंकि ध्यान रखना, यात्रा सीधी परमात्मा की नहीं हो सकती, जब तक आपके मन का ढंग, आपके मन की व्यवस्था न बदले।

कभी आपने खयाल किया कि आप सोचते हैं, एक मकान बना लें। जब तक नहीं बनाते, तब तक मन बिलकुल आर्किटेक्ट हो जाता है। कितनी कल्पनाएं करता है! कितने नक्शे बनाता है! फिर मकान बन जाता है। फिर उसी मकान में जीने लगते हैं, और मकान को भूल जाते हैं। हां, रास्ते से जो निकलते होंगे, उनके मन में आपके मकान के लिए विचार आता होगा। आपको भर नहीं आता, जो उसके भीतर रहता है!

पढ़ रहा था मैं, एक युवक का विवाह हो रहा है चर्च में। घंटियां बजी हैं, और मोमबत्तियां जली हैं। और मित्र उपहार लाए हैं, और धन्यवाद दे रहे हैं। लेकिन तभी अचानक वह युवक उदास हो गया। तो चर्च के जिस पादरी ने विवाह करवाया था, उसने पूछा कि इतने उदास क्यों हो गए हो? तुम्हें तो खुश होना चाहिए, क्योंकि जिसे तुमने चाहा था, वह स्त्री तुम्हें मिल गई!

वह युवक कहने लगा, इसीलिए तो उत्साह एकदम क्षीण हो गया है। उत्साह एकदम क्षीण हो गया है। जिसे चाहा था, वह मिल गई, इसीलिए तो उत्साह एकदम क्षीण हो गया है। उस युवक ने कहा कि आज मैं सोचता हूं कि मजनू के रास्ते में जिन लोगों ने बाधाएं डालीं और लैला को न मिलने दिया, उन्होंने बड़ी कृपा की। क्योंकि मजनू लैला को याद तो करता रहा। जिन मजनुओं को उनकी लैलाएं मिल जाती हैं, वे और दूसरों की लैलाओं की भला फिक्र करें, अपनी लैलाएं भूल जाते हैं!

मन का नियम है, जो मिल जाता है, वह भूल जाता है। और परमात्मा तो मिला ही हुआ है। उसे तो याद करने की सुविधा भी नहीं बनती।

तो मन के नियम को बदलना पड़ेगा। मन का नियम अभी गङ्ढों की तरफ दौड़ना है। मन को पर्वतों की तरफ दौड़ाना शुरू करना पड़ेगा। और कोई कठिनाई नहीं है।

जिंदगी में बहुत कुछ मिला है, उसमें आह्लाद अनुभव करें। जो मिला है, उसमें प्रसन्न हों। जो है पास, उसमें संतुष्ट हों। जो पास है, उसके लिए प्रभु को धन्यवाद दें। जो है, उसे देखें; और जो नहीं है, उसे छोड़ें। बहुत शीघ्र आप पाएंगे कि आपकी परमात्मा की खोज शुरू हो गई।

इसलिए जिन लोगों ने परमात्मा की खोज में संतोष को अनिवार्य बताया है, उसका कारण भी आप समझ लें, वह इस सूत्र में छिपा हुआ है। संतोष में अपने आप कोई मूल्य नहीं है। संतोष अपने आप में कोई वेल्यू नहीं है; उसकी अपने आप में कोई कीमत नहीं है। क्योंकि मरा हुआ आदमी भी, मरा-मराया आदमी भी संतुष्ट दिखाई पड़ सकता है। ऐसा आदमी भी संतुष्ट मालूम पड़ सकता है, जिसमें जरा भी दौड़ने की हिम्मत नहीं है। कायर है, भयभीत है, चुनौती लेने से डरता है। नहीं; संतोष में अपने आप में मूल्य नहीं है, लेकिन संतोष का एक ही मूल्य है, वह परमात्मा की तरफ उन्मुख करने में कीमती है।

इसलिए मैं आपको कहता हूं कि संतोष का अब तक जो भी खयाल दुनिया में दिया गया कि संतोषी सदा सुखी, वह सब बच्चों की बातें हैं। सच तो यह है कि संतोषी के जीवन में एक नया दुख पैदा होता है, वह दुख परमात्मा को पाने का दुख है। वह और किसी की जिंदगी में पैदा नहीं होता। हां, संतोषी की जिंदगी में आस-पास की चीजों से सुख हो जाता है। क्योंकि जो उसे है, वह उसमें प्रसन्न है। वह उसे भोग रहा है। वह परमात्मा के प्रति अनुगृहीत है।

लेकिन इस संतोषी के जीवन में एक नई आग जलनी शुरू होती है, वह परमात्मा की खोज है। क्योंकि जब वह पाता है कि साधारण से भोजन में जो मुझे उपलब्ध है, अगर मैं उस पर ध्यान देता हूं, तो इतना रस मिलता है; साधारण-सा झोपड़ा जो मुझे उपलब्ध है, जब मैं उस पर ध्यान देता हूं, तो इतना रस मिलता है; साधारण-सा जीवन जो मुझे उपलब्ध है, जब मैं उस पर ध्यान देता हूं, तो इतना रस मिलता है–तो वह जो जीवन का मूलाधार है, जो मेरे होने के पहले से मेरे पास है, और मेरे न हो जाने पर भी मेरे पास होगा, मेरी लहर बनेगी और मिटेगी, और वह रहेगा, उसे पा लेने से क्या होगा! उसको पा लेने की एक नई पीड़ा, एक नई प्रसव-पीड़ा शुरू होती है।

संतोष को योग ने एक अनिवार्य सूत्र माना है परमात्मा की तलाश के लिए। अगर आप सोचते हों कि संतोष केवल संसार की दौड़ से बच जाने की तरकीब है, तो आपको संतोष की कीमिया का कोई पता नहीं। वह तो बड़ी गौण बात है। महत्वपूर्ण बात यह है कि जो अपने चारों तरफ जो मौजूद है, उससे संतुष्ट हो जाता है, उसके भीतर उसकी खोज शुरू होती है, जो सबसे ज्यादा गहराई में सदा से मौजूद है। उसके रस की खोज शुरू हो जाती है।

करोड़ों में इसीलिए एक आदमी! वह जिसके पास पाजिटिव माइंड है।

हमारे सबके पास निगेटिव माइंड है, हमारे पास नकारात्मक मन है। हमें मित्र तब दिखाई पड़ता है, जब वह घर से जा चुका होता है। हमें सुख का भी तब पता चलता है, जब वह हाथ से छूट गया होता है। हमें प्रेम का भी तब पता चलता है, जब प्रेम का दीया बुझने लगता है। हमें पता ही तब चलता है, जब कोई चीज समाप्त होती है। जब कोई मरता है, तभी हमें पता चलता है कि वह था। जब तक वह था, तब तक हमें पता ही नहीं चलता।

पिता घर में मौजूद है, बेटे को बिलकुल पता नहीं चलता कि है। जिस दिन मरेगा पिता, उस दिन पता चलेगा। उस दिन रोएगा, छाती पीटेगा। और जब तक पिता मौजूद था, तब कभी दो क्षण भी उसके पास नहीं बैठा था। बड़े आश्चर्य की बात है। तब तक कभी फुर्सत न मिली थी कि दो क्षण उसके पैरों पर हाथ रखकर बैठ जाए। अब मुर्दे की छाती पर सिर पटकेगा।

निगेटिव माइंड है। जो नहीं है, बस, वह हमारे लिए महत्वपूर्ण हो जाता है। जो है, वह गैर-महत्वपूर्ण हो जाता है।

इसीलिए दुनिया में कोई आदमी अमीर नहीं हो पाता। कितना ही धन मिल जाए, गरीबी नहीं मिटती। क्योंकि निगेटिव माइंड गरीब है। निगेटिव माइंड कभी अमीर नहीं हो सकता। क्योंकि जो भी मिल जाएगा, वह भूल जाएगा; और सदा मिलने को बाकी रहेगा, वह याद रहेगा।

भिखमंगे तो भिखमंगे होते ही हैं, अरबपति भी उतने ही भिखमंगे होते हैं। जहां तक भिखमंगेपन का सवाल है, भिखमंगे को जो उसके पास है, वह दिखाई नहीं पड़ता; अरबपति को भी, जो उसके पास है, वह दिखाई नहीं पड़ता। भिखमंगे को भी उसकी मांग रहती है, जो पास नहीं है; अरबपति को भी उसकी ही मांग रहती है, जो उसके पास नहीं है। फर्क क्या है?

इतना ही फर्क है कि भिखमंगे के पास जो है, वह कम है भूलने को; अरबपति के पास भूलने को ज्यादा है। लेकिन भूलने को ही ज्यादा है, और तो कुछ अर्थ नहीं है। भिखमंगा अपने भिक्षा के पात्र को भूलता है, अरबपति अपनी तिजोड़ी को भूलता है। लेकिन भूलने में आप तिजोड़ी भूलें कि भिक्षा का पात्र भूलें, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। न तो भिखमंगा अपने भिक्षा के पात्र का आनंद ले पाता है, न करोड़पति अपनी तिजोड़ी का आनंद ले पाता है।

जो है, वह हमें दिखाई नहीं पड़ता। और परमात्मा अतिशय है। एक इंचभर जगह नहीं है, जहां वह नहीं है। इसीलिए करोड़ में कभी कोई एक उसकी खोज पर निकलता है। पाजिटिव माइंड, एक विधायक चित्त ही परमात्मा की खोज पर जा सकता है।

उसे देखना शुरू करें, जो है। उसे भूलना शुरू करें, जो नहीं है। खाली स्थानों में मत भटकें; भरे स्थानों में जीएं। और ध्यान रहे, हर आदमी के पास इतना है कि काश, वह देखने लगे, तो शायद इस जमीन पर गरीब आदमी खोजना मुश्किल है।

सुना है मैंने कि एक आदमी रो रहा है, छाती पीट रहा है। और एक फकीर उसके पास से निकला है और उसने पूछा कि तुम इतने परेशान हो रहे हो कि मुझे मालूम पड़ता है कि तुम बड़े गरीब आदमी हो। लेकिन मेरे गुरु ने कहा है कि इस जमीन पर कोई आदमी गरीब नहीं है। या तो मेरे गुरु गलत हैं, या तुम कुछ गलती समझे हो।

उस आदमी ने कहा, मुझसे गरीब आदमी खोजना मुश्किल है। आज मैं दो दिन से भूखा हूं। मेरे पास कुछ भी नहीं है। उस फकीर ने कहा, लेकिन मेरे गुरु ने कुछ जांचने की तरकीबें बताई हैं; मैं पहले उनका प्रयोग कर लूं। उस आदमी ने कहा, तुम कब प्रयोग करोगे? मैं मरने के करीब हूं। मैं नदी में जा रहा हूं गिरने के लिए। आत्महत्या की तैयारी करके निकला हूं। अब मेरे पास कुछ भी नहीं है।

उस फकीर ने कहा, तुम थोड़ा समय मुझे दो। तुम थोड़ी देर बाद भी मर जाओगे, तो दुनिया का कोई हर्ज होने वाला नहीं है। तुम मेरे साथ आओ। कम से कम मैं अपने गुरु की परीक्षा कर लूं।

उस आदमी को ले गया सम्राट के पास। और सम्राट से जाकर भीतर उसने कुछ बात की। लौटकर उस आदमी को ले गया और रास्ते में उससे कहा कि सम्राट से मैंने तय कर लिया है; तुम्हारी एक-एक आंख के लिए वह एक-एक लाख रुपया देने को तैयार है। तुम दोनों आंखें बेच दो। दो लाख रुपए तुम्हारे हाथ में पड़ते हैं। उस आदमी ने कहा, तुमने मुझे क्या पागल समझा हुआ है? मैं और आंखें बेच दूं! उस फकीर ने कहा, लाख रुपए मिल रहे हैं, अगर तुम्हारा इरादा कुछ और ज्यादा का हो, तो बोलो। उसने कहा, तुम करोड़ भी दो, तो मैं आंख नहीं बेच सकता।

क्योंकि जैसे ही खयाल आया अंधे होने का, तब पता चला कि आंख है। जब तक आंख थी, तब तक थी; बेकार थी। वह मरने जा रहा था। मरने में आंख भी मिट जाती। और भी सब कुछ मिट जाता।

तो फकीर ने कहा, छोड़ो आंख को। हो सकता है, तुम्हें मरने जाना है नदी पर, तो आंख की जरूरत पड़े। इतना रास्ता पार करना पड़े। लेकिन कई चीजें ऐसी हैं, जो बिलकुल बेकार हैं; मरने के लिए जिनका कोई उपयोग नहीं है। कान ही बेच दो। हाथ ही बेच दो। कुछ तो बेच दो। क्योंकि मैं तुम्हारे लिए ग्राहक खोज लिया हूं। उस आदमी ने कहा कि तू आदमी किस तरह का है! मैं नहीं मरना चाहता हूं।

क्योंकि उस आदमी को पहली दफा खयाल आया कि अगर हाथ भर कट जाए, तो कितनी कमी हो जाएगी। तो मौत कितनी बड़ी कमी होगी!

अगर मरने वालों को, स्युसाइड करने वालों को करने के बाद एक मौका और दिया जाए, तो वे सब पछताते हुए वापस लौटेंगे। लेकिन मौका नहीं मिलता, इसलिए नहीं लौटते हैं। इसलिए अगर आपको स्युसाइड करनी हो, तो जल्दी कर लेना; देर मत लगाना। क्योंकि पांच-सात मिनट भी रुक गए, फिर आप न कर पाएंगे। उतनी देर में तो शायद अभाव का खयाल आ जाएगा कि यह मैं क्या कर रहा हूं! सब मिट जाएगा।

इसलिए जो लोग भी आत्मघात करते हैं, वे तीव्र भावावेश में और क्षण में कर लेते हैं। कंसीडर्ड, सोच-विचारकर कभी भी कोई आत्महत्या नहीं कर पाता।

इस पृथ्वी पर कुछ बहुत विचारशील लोग हुए हैं, जिन्होंने आत्महत्या की तारीफ की है। उनमें यूनान का एक विचारक था, पिरहो। पिरहो कहता था कि आत्मघात एकमात्र करने जैसी चीज है, क्योंकि जिंदगी बेकार है। लेकिन वह नब्बे वर्ष का होकर मरा। और जब वह मर रहा था, तब किसी ने संदेह उठाया कि आश्चर्य कि कम से कम पचास साल से आप लोगों को समझा रहे हैं कि जिंदगी-मौत सब बराबर हैं। मर जाने के सिवाय कोई ठीक काम नहीं है। देअर इज़ नो डिफरेंस बिटवीन लाइफ एंड डेथ। आप यह समझाते रहे, कोई अंतर नहीं जीवन और मृत्यु में। आप नब्बे साल तक कैसे जीए? आप मर क्यों न गए?

पिरहो ने आंख खोली और उसने कहा, बिकाज देअर इज़ नो डिफरेंस, क्योंकि कोई अंतर नहीं है मरने-जीने में। मैंने बहुत सोचा और पाया, कोई अंतर नहीं है। तो मरने से भी क्या फायदा! तो मैंने कहा, ठीक है, जो होता है, होने देना।

पिरहो बहुत विचारशील आदमी था। और जिंदगीभर मरने के संबंध में सोचता रहा। मरा नब्बे वर्ष का होकर!

बहुत सोच-विचार वाले लोग आत्मघात नहीं करते। तीव्र भाव के क्षण में घटना घट जाती है। क्योंकि उस भाव के क्षण में आप इतने आविष्ट होते हैं कि आपका निगेटिव माइंड सोच नहीं पाता कि कितना बड़ा गङ्ढा पैदा होने जा रहा है। बस एक क्षण में हो जाता है।

कृष्ण कहते हैं, करोड़ में कोई एक कभी प्रभु की खोज पर निकलता है। क्योंकि करोड़ में एक आदमी के पास विधायक चित्त है।

कल मैंने कहा था, संदेह से भरा चित्त। आज आपको और मैं संदर्भ बता दूं। संदेह से भरा चित्त निगेटिव होगा, नकारात्मक होगा। श्रद्धा से भरा चित्त विधायक होगा, पाजिटिव होगा।

अगर संदेह से भरे चित्त वाले आदमी को हम कहें कि दुनिया के संबंध में कुछ वक्तव्य दो, तो वह जो वक्तव्य देगा, वे नकारात्मक होंगे। वह कहेगा, दुनिया बिलकुल बेकार है। यहां दो अंधेरी रात के बीच में एक छोटा-सा उजाले का दिन होता है। दो अंधेरी रात बड़ी घटना मालूम होगी। अगर हम विधायक चित्त के व्यक्ति से पूछें, तो वह कहेगा, यह दुनिया बड़ी अदभुत है। यहां दो उजेले दिनों के बीच में एक छोटी-सी अंधेरी रात होती है!

अगर हम निषेधात्मक चित्त के व्यक्ति से पूछें, तो वह गुलाब के फूल के पास खड़े होकर सिवाय परमात्मा की निंदा के और कुछ न कर पाएगा। क्योंकि वह कहेगा, जहां इतने कांटे हैं, वहां मुश्किल से एक फूल खिलता है। फूल बेकार हो गया इतने कांटों की वजह से। अगर हम विधायक चित्त के आदमी से पूछें, तो वह कहेगा, आश्चर्य! प्रभु का धन्यवाद है। वह गुलाब के पास खड़े होकर घुटने टेककर प्रभु की प्रार्थना में लीन हो जाएगा। और वह कहेगा, अदभुत है तेरी लीला कि जहां इतने कांटे हैं, वहां भी फूल पैदा होता है। चमत्कार है, मिरेकल है।

तो विधायक चित्त जिस व्यक्ति के पास है, वह प्रभु की खोज पर निकलता है।

लेकिन कृष्ण फिर एक और बात कहते हैं कि करोड़ लोग प्रयत्न करें, तो कभी एक मुझे उपलब्ध होता है।

इसका क्या अर्थ होगा? इसे भी ठीक से समझ लें।

जो लोग भी प्रभु की दिशा में यात्रा शुरू करते हैं, करोड़ में से एक ही समर्पण करता है। करोड़ में से एक यात्रा करता है। अगर करोड़ यात्रा करें, तो एक समर्पण करता है। बाकी लोग संकल्प करते हैं, समर्पण नहीं। बाकी लोग कहते हैं, हम प्रभु को पाकर रहेंगे। तू कहां है, हम खोजकर रहेंगे। हम अपनी पूरी ताकत लगाएंगे। जीवन लगा देंगे दांव पर, लेकिन तुझे पाकर रहेंगे।

कभी एक आदमी ऐसा होता है, जो कहता है कि मेरी क्या सामर्थ्य! मैं असहाय हूं। मेरी कोई शक्ति नहीं है। मैं तुझे कैसे खोज पाऊंगा! अगर तू ही मुझे खोज ले, तो शायद घटना घट जाए। मैं तुझे कैसे खोज पाऊंगा! मेरी शक्ति बड़ी छोटी है। एक छोटी-सी बूंद हूं। न मालूम किस रेगिस्तान में खो जाऊं! अगर सागर ही मुझ तक आ जाए, तो ठीक। अन्यथा मैं सागर को खोज पाऊं, इसकी कोई संभावना नहीं है।

जो लोग प्रभु की खोज पर निकलते हैं, वे भी अस्मिता को, अहंकार को लेकर निकलते हैं। वे कहते हैं, हम प्रभु को पाकर रहेंगे। साधना करेंगे। योग करेंगे। आसन करेंगे। ध्यान करेंगे। लेकिन पीछे वह मैं खड़ा रहेगा।

जैन परंपरा में एक बहुत मीठी कथा है। ऋषभ के सौ पुत्र थे। अनेक पुत्रों ने ऋषभ से दीक्षा ले ली। वे संन्यास की यात्रा पर निकल गए। बाहुबली भी ऋषभ के एक पुत्र थे। उन्होंने जरा देर की दीक्षा लेने में; कुछ सोच-विचार किया। लेकिन तब तक बाहुबली से छोटे बेटे दीक्षित हो गए। और जब बाहुबली के मन में दीक्षा का खयाल आया, तो उसके अहंकार को बड़ी पीड़ा हुई कि अपने छोटे भाइयों को संन्यास के जगत में तो मुझे प्रणाम करना पड़ेगा। क्योंकि वे मुझसे अग्रणी हो गए। उनके संन्यास की यात्रा बड़ी हो गई। अपने से छोटों को और मैं नमस्कार करूं, यह न हो सकेगा! तो उसने सोचा, ऐसी भी क्या जरूरत है। मैं खुद ही साधना क्यों न कर लूं!

बलशाली व्यक्ति था। कमजोर तो हारते ही हैं, कभी-कभी बलशाली बुरी तरह हारते हैं। बल ही उनके हारने का कारण हो जाता है।

तो बाहुबली एकांत में जाकर गहन तपश्चर्या में, सघन तपश्चर्या में लीन हुए। शायद इस पृथ्वी पर कम ही लोगों ने ऐसी तपश्चर्या की होगी और ऐसी साधना की होगी। सब कुछ दांव पर लगा दिया। सब कुछ। बस, एक छोटी-सी चीज छोड़कर; वह मैं पीछे खड़ा रहा।

उनकी तपश्चर्या की ख्याति कोने-कोने तक पहुंच गई। जहां भी लोग सोचते-समझते थे, वहां तक बाहुबली की खबर पहुंची। और लोग हैरान हुए कि इतना पवित्रतम व्यक्ति, इतना शुद्धतम व्यक्ति, सब कुछ दांव पर लगाए खड़ा है, फिर भी कोई दर्शन नहीं हो रहा है सत्य का! क्या बात है?

ऋषभ के पास भी खबर पहुंची। ऋषभ मुस्कुराए और उन्होंने बाहुबली की एक बहन को, जो दीक्षित हो गई थी, बाहुबली के पास भेजा और कहा, बस, जरा-सा तिनका अटका हुआ है। लेकिन वह तिनका पहाड़ों से भी भारी है। सब दांव पर लगा दिया है, सिर्फ मैं को बचा लिया है!

और आप कुछ भी दांव पर न लगाएं, सिर्फ मैं को दांव पर लगा दें, तो हल हो जाए। लेकिन सब दांव पर लगा दें–धन, दौलत, यश, शरीर, मन–लेकिन एक पीछे मैं बच जाए, तो सब बेकार है। वह दांव पर लगाने वाला पीछे बच जाए, तो आप परमात्मा से संघर्ष कर रहे हैं; आप परमात्मा से प्रार्थना नहीं कर रहे हैं। तो आप सत्य को भी विजय करने निकले हैं; सत्य के साथ एक होने नहीं निकले हैं। यह कोई प्रेम की यात्रा नहीं है; यह कोई युद्ध, आक्रामक चित्त की दशा है।

सब दांव पर है बाहुबली का। कुछ बचा नहीं लगाने को। वह भी चिंता में पड़ा, अब और क्या करने को बचा है? जितने उपवास कहे हैं तीर्थंकरों ने, सब पूरे कर डाले। जितने जागरण के लिए कहा है, उतनी रातें जागकर बिता दीं। कहा है खड़े रहो, तो महीनों खड़ा रहा हूं। कहा है कि चित्त को एकाग्र कर लो, तो चित्त एकाग्र है। सब शर्तें पूरी हैं। फिर कुछ हो तो नहीं रहा है। कहीं कोई कमी तो नहीं दिखाई पड़ती।

फिर ऋषभ के द्वारा भेजी गई बाहुबली की बहन ने–बाहुबली आंख बंद किए। विशालकाय व्यक्ति था। सुंदरतम शरीर वाला व्यक्ति था। गोमटेश्वर में बाहुबली की प्रतिमा है, कभी आपने चित्र देखे होंगे। विशालकाय! जिसमें शरीर पर बेलाएं चढ़ गई हैं। और पक्षियों ने कान में घोंसले बना लिए थे। और शरीर पर बेलाएं चढ़ गई थीं, उसका उन्हें पता भी नहीं था। क्योंकि वह तो अंतर के संघर्ष में इतना लीन था कि शरीर पर क्या घट रहा है, उसे पता भी नहीं था।

बहन ने चारों तरफ से जाकर बाहुबली को देखा। इतना घोर तपस्वी तो कभी देखा नहीं गया! कान पर पक्षियों ने घोंसले बना लिए हैं; अंडे रख दिए हैं। सुरक्षित जगह है। बाहुबली हिलता भी नहीं। बेलाएं चढ़ गई हैं। बेलाओं में फूल आ गए हैं। न मालूम कब से बाहुबली ऐसा ही खड़ा है पत्थर की तरह। अब और क्या बाकी है?

और तब गहरे और गहरे घूमकर बहन ने भीतर तक झांकने की कोशिश की। और उसे दिखाई पड़ा कि भीतर बस एक चीज बाकी रह गई, वह मैं। तो एक गीत बाहुबली की बहन ने गाया कि सब कर चुके तुम, अब जरा सिंहासन से नीचे उतर आओ! बस, और कुछ न करो, जरा सिंहासन से नीचे उतर आओ। यह हाथी की पालकी पर कब तक बैठे रहोगे! जरा नीचे उतर आओ।

और बाहुबली को यह सुनाई पड़ा कि हाथी की पालकी पर कब तक बैठे रहोगे! जरा नीचे उतर आओ। सब शुद्ध था। बस, वह एक पालकी अहंकार की भारी थी। और उसी क्षण घटना घट गई। इतनी बड़ी तपश्चर्या से जो न हुआ था, पालकी से उतरते ही हो गया। बाहुबली ने झुककर बहन को नमस्कार कर लिया। बात समाप्त हो गई। घटना घट गई।

करोड़ लोग प्रयास करते हैं, एक पहुंचता है। क्योंकि वह एक ही अपनी अस्मिता को और अहंकार को खोता है।

इसलिए कृष्ण ने कहा, मुझको परायण हुआ, मेरी तरफ झुक गया, समर्पित हुआ, मेरे चरणों में आ गया!

यहां सवाल बड़ा यह नहीं है कि कृष्ण के चरणों में आ जाओ। बड़ा सवाल यह है कि झुक जाओ। ध्यान रहे, असली सवाल है झुका हुआ मन, समर्पित, सरेंडर्ड।

करोड़ में से एक करता है कोशिश। करोड़ कोशिश करते हैं, एक पहुंच पाता है। कोशिश करता है वह, जिसके पास विधायक मन है। लेकिन विधायक मन का खतरा है कि वह अहंकार को मजबूत कर दे। पहुंच पाता है वह, जो मैं को समर्पित कर देता है। तब फिर, तब फिर कोई बाधा नहीं रह जाती।

परमात्मा की तरफ से कोई बाधा नहीं है। आदमी की तरफ से दो बाधाएं हैं। एक, नकारात्मक मन; और दूसरा, अस्मिता से भरा हुआ भाव, अहंकार से भरा हुआ भाव। इन दो दरवाजों को जो पार कर जाता है, कृष्ण कहते हैं, वह मुझको उपलब्ध हो जाता है।

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा।।४।।

और हे अर्जुन, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश तथा मन, बुद्धि और अहंकार भी, ऐसे यह आठ प्रकार से विभक्त हुई मेरी प्रकृति है।

इस सूत्र में दोत्तीन बातें समझने जैसी हैं। पहली बात, कृष्ण ने प्रकृति को आठ हिस्सों में विभाजित किया। पंच महाभूत–पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश।

पहले तो पंच महाभूत को थोड़ा समझ लें, क्योंकि पंच महाभूत की धारणा के कारण भारतीय चिंतन को पश्चिम में बहुत धक्का पहुंच रहा है। इस मुल्क में भी जो लोग सुशिक्षित हैं, उनको भी बड़ी कठिनाई होती है। चूंकि अब तो पंच महाभूत का कोई सवाल न रहा। अब तो वैज्ञानिक कहते हैं कि एक सौ आठ तत्व हैं। फिर और थोड़े गहरे गए हैं, तो वे कहते हैं, एक ही तत्व है–एक सौ आठ तो उसके प्रकार हैं–वह है विद्युत।

कृष्ण जैसा व्यक्ति जब कहता है, पंच महाभूत, तो यह सिर्फ कोई लोकोक्ति नहीं हो सकती। लोग सदा ऐसा कहते रहे हैं, पांच महाभूत। मोटा हिसाब है कि इन पांच चीजों से सारा जगत बना हुआ है। लेकिन कृष्ण जब ऐसा वक्तव्य देते हैं, तो उस वक्तव्य के पीछे थोड़ा गहरे उतरना पड़ेगा। कृष्ण का वक्तव्य बहुत वैज्ञानिक है। और इसलिए इन पंच महाभूत की व्याख्या जैसी मैं देखता हूं, और जैसी आज के पूरे वैज्ञानिक चिंतन के बाद की जानी चाहिए, वह मैं आपसे कहना चाहता हूं।

पंच महाभूत केवल लोगों की प्रचलित शब्दावली का उपयोग है। और इसलिए भारत के भी जो लोग सिर्फ शब्दों को सोचते हैं, शास्त्रों को सोचते हैं, वे भी इस पंच महाभूत की धारणा में गहरे नहीं उतर सके।

अगर ठीक से समझें, तो पश्चिम में विज्ञान ने जो तत्वों की धारणा पैदा की है, वह तो प्रयोगशालाओं में की गई है। और भारत ने जो पंच महाभूत की धारणा की है, वह प्रयोगशालाओं में नहीं, अंतस अनुभूति में की गई है। जो लोग भी अंतस जीवन की गहराइयों में उतरेंगे, उन्हें एक तत्व का साक्षात्कार जरूर ही होगा; वह है फायर, वह है अग्नि। जो लोग भी अपने भीतर गहरे में जाएंगे, अंततः उन्हें अग्नि का अनुभव होगा, विराट अग्नि का अनुभव होगा।

इसीलिए जैसे-जैसे व्यक्ति ध्यान में भीतर प्रवेश करता है, प्रकाश, और ऐसे जैसे हजारों सूरज उतर आए हों, दिखाई पड़ने लगते हैं। ध्यान में प्रकाश का अनुभव अंतर्गमन की सूचना है। यह प्रकाश उस अंतर-अग्नि की बहुत दूर की किरण है। जब हम बहुत गहरे में पहुंचेंगे, तभी हमें पूरी अग्नि का आभास होगा।

हां, अग्नि शब्द से सिर्फ आपके घर में जो आग जलती है, उससे ही कृष्ण का प्रयोजन नहीं है। अग्नि से अर्थ है, जीवन का समस्त रूप अग्नि का ही रूप है।

अब तो वैज्ञानिक कहते हैं कि आपके भीतर भी जो जीवन चल रहा है, वह भी आक्सीडाइजेशन से ज्यादा नहीं है। पूरे समय हवाओं में से जाकर आक्सीजन आपके भीतर की जीवन-ज्योति को जला रही है।

अगर आप, एक दीया जल रहा हो और उसके ऊपर एक कांच का बर्तन ढांक दें, तब आपको पता चलेगा। कभी ऐसा हो जाता है कि तूफान जोर का होता है, तो घर में कोई कांच के गिलास को दीए पर ढांक दे। एक क्षण को तो लगेगा कि दीए को आपने बचा लिया तूफान से। लेकिन ध्यान रखना, तूफान में तो दीया बच भी सकता था, गिलास के भीतर दीया नहीं बचेगा। क्योंकि थोड़ी ही देर में आक्सीजन चुक जाएगी। और आक्सीजन के बिना दीया जल नहीं सकेगा। थोड़ी ही देर में ग्लास के भीतर जितनी हवा है, उसकी आक्सीजन जल जाएगी। और फिर तो कार्बन डाइ आक्साइड रह जाएगा, जो दीए को बुझा देगा। तूफान तो झेल सकता है दीया, लेकिन आक्सीजन की कमी नहीं झेल सकता। क्योंकि आक्सीजन ही फायर है, अग्नि है।

आप भी नहीं झेल सकते। आपकी भी श्वास बंद कर दी जाए; नाक तो छोड़िए, अगर नाक आपकी चलने भी दी जाए, और पूरे शरीर पर ठीक से डामर पोत दिया जाए; रोएं-रोएं सब बंद कर दिए जाएं, नाक चलने भी दी जाए, तो भी आप पंद्रह मिनट से ज्यादा जिंदा नहीं रह पाएंगे। क्योंकि आपका रोआं-रोआं श्वास ले रहा है। वह श्वास जाकर आपके भीतर की जीवन अग्नि को जला रही है। और अगर श्वास बंद कर दी जाए, तब तो आप अभी ही समाप्त हो जाएंगे। क्योंकि भीतर भी जीवन एक दीए की भांति है, जिसको पूरे समय आक्सीजन चाहिए।

जो अग्नि के जलने का नियम है, वही जीवन के जलने का नियम भी है। जीवन की गहराई में, समस्त तत्वों की गहराई में अग्नि है। अग्नि महाभूत है। आधारभूत है।

आज विज्ञान की खोज इलेक्ट्रिसिटी पर ले गई है। वे जिसे आज विद्युत कह रहे हैं, भारत के अंतर्मनीषी ने उसे अग्नि कहा था। और ठीक था, क्योंकि अग्नि उन दिनों सुपरिचित शब्द था। और उसी से बात प्रकट की जा सकती थी।

विद्युत भी अग्नि का ही रूप है। तो अग्नि मूल तत्व है। पृथ्वी अग्नि का एक रूप है, सालिड। अग्नि का ठोस रूप पृथ्वी है। अग्नि का दूसरा रूप है, जल, लिक्विड, प्रवाह। अग्नि का तीसरा रूप है, वायु।

विज्ञान कहता है, पदार्थ की तीन स्थितियां हैं, सालिड, लिक्विड और गैसीय। पदार्थ की तीन स्थितियां हैं, या तो ठोस, जैसे कि पत्थर है या पानी का बर्फ। फिर जलीय, द्रवीय, जैसे कि जल है। और फिर वायुवीय, जैसे कि पानी की भाप है। प्रत्येक अस्तित्ववान चीज तीन रूपों में प्रकट हो सकती है।

पृथ्वी, जिसे आज विज्ञान कहता है, सालिड। उन दिनों पृथ्वी से सालिड और कोई चीज खयाल में आ भी नहीं सकती थी। वह प्रतीक शब्द है। जल, जल से ज्यादा और प्रवाहवान कोई चीज खयाल में नहीं आ सकती थी। और वायु; वायु से ज्यादा वाष्पीय, गैसीय और कोई तत्व खयाल में नहीं आ सकता था।

हां, अग्नि है मूल तत्व। अग्नि जब प्रकट होती है, तो तीन रूपों में प्रकट होती है। पदार्थ का एक रूप ठोस, दूसरा रूप जलीय, तीसरा रूप गैसीय।

और यह अग्नि के प्रकट होने के लिए जो जगह चाहिए, वह जगह है आकाश। आकाश से अर्थ है, स्पेस। आकाश से अर्थ स्काई नहीं है। आकाश से, आपके ऊपर जो चंदोवा तना हुआ है, उससे प्रयोजन नहीं है। आकाश शब्द बहुत अदभु