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जीसस, सुकरात और मंसूर जैसे साक्षात प्रेमावतारों के शरीर को जिस घृणापूर्ण ढंग से सूली, जहर और कत्ल दी


अस्तित्व तटस्थ भी है और अत्यंत प्रीतिपूर्ण भी।

तुम्हें विरोधाभासों को समझने की क्षमता जगानी ही होगी। और यह भी खयाल रख लेना कि

अस्तित्व इसीलिये तटस्थ है क्योंकि प्रीतिपूर्ण है। और तब तुम्हें मुश्किल हो जायेगी, क्योंकि तुम सोचते हो: जो तटस्थ है वह प्रीतिपूर्ण कैसे होगा? अगर अस्तित्व प्रीतिपूर्ण है तो जीसस को बचा लेता? बचाना ही था। वही तो जीसस के विरोधी मांग कर रहे थे। वे कहते थे कि तुम अगर ईश्वर के बेटे हो तो देख लेते हैं, परीक्षा हुई जाती है। अगर तुम्हारा ईश्वर से नाता है, संबंध है, जैसा तुम कहते हो, दावा करते हो, तो चलो निर्णय हो जायेगा, सूली पर निर्णय हो जायेगा। अगर उतर आता एक हाथ आकाश से और बरस जाते फूल और सूली सिंहासन बन जाती...यही तो दुश्मन मांग रहे थे। वे कहते थे: ये प्रमाण दे दो। सूली लग गई, न फूल बरसे, न सूली सिंहासन बनी, न कोई आकाश से दिव्य हाथ आया, न कोई चमत्कार हुआ, न पहाड़ हिले, न सूरज अस्त हुआ, कुछ भी न हुआ, कुछ भी न हुआ। जैसे किसी साधारण आदमी को सूली दे दी हो, ऐसे ही जीसस को भी सूली लग गई और सब समाप्त हो गया। स्वाभाविक है कि लगे कि अस्तित्व बिलकुल तटस्थ है, अस्तित्व को कुछ लेना-देना नहीं। लेकिन थोड़े गहरे चलो।

अस्तित्व तटस्थ है, क्योंकि प्रेमपूर्ण हैं। ऐसा मैं क्यों कहता हूं? अगर अस्तित्व प्रेमपूर्ण है, तो ही तुम्हारे जीवन में स्वतंत्रता हो सकती है। मगर स्वतंत्रता के लिये अस्तित्व का तटस्थ होना भी जरूरी है, नहीं तो स्वतंत्रता नष्ट हो जायेगी। अगर अस्तित्व हर कदम पर बाधाएं डालने लगे तो जीवन कारागृह हो जायेगा। जीवन कारागृह नहीं है।

परमात्मा ने तुम्हें पूरी स्वतंत्रता दी है, तुम जो होना चाहो, उसकी स्वतंत्रता दी है--पापी या पुण्यात्मा, अच्छे या बुरे, तुम जो होना चाहो। एडोल्फ हिटलर से लेकर गौतम बुद्ध तक तुम जो होना चाहो, परमात्मा ने तुम्हें पूरी स्वतंत्रता दी है।

यह मनुष्य की गरिमा है, यह गौरव है। और यह परमात्मा की अनुकंपा है, अपार अनुकंपा है कि मनुष्य स्वतंत्र है। यह स्वतंत्रता दी ही इसलिए है कि अस्तित्व प्रीतिपूर्ण है।

प्रेम ही तो स्वतंत्रता देता है और जो प्रेम स्वतंत्रता न दे सके, छोटा प्रेम है। परमात्मा का प्रेम बड़ा है, इतना बड़ा है कि तुम उसके विपरीत भी चले जाओ तो भी स्वतंत्रता है। इस प्रेम के बड़प्पन को समझो। इस प्रेम की विशालता को समझो।

तुम तो छोटे-छोटे प्रेम जानते हो। तुम तो ऐसे प्रेम जानते हो जो कि प्रे्रम नहीं हैं। पति जरा देर से आया सांझ घर कि पत्नी को संदेह है। इसको तुम प्रेम कहते हो? पत्नी पड़ोसी से हंसकर बात कर रही थी कि पति संदिग्ध हो गया। इसको तुम प्रेम कहते हो? स्वतंत्रता इसमें नाममात्र को नहीं है। प्रेम के नाम पर दूसरे के गले में फांसी लगानी है। प्रेम के नाम पर कब्जा है, मालकियत है। प्रेम के नाम पर राजनीति है।

परमात्मा का प्रेम ऐसा प्रेम नहीं है कि जरा रात देर से लौटे कि परमात्मा खड़ा है सामने कि कहां रहे कि जरा-सी भूल-चूक की, कि खड़ा हो गया सामने कि तुमने ऐसा क्यों किया? परमात्मा का प्रेम विराट है, पहली बात। और उसी विराट प्रेम के कारण परमात्मा तटस्थ मालूम होता है।

गलत हुआ होता अगर परमात्मा ने जीसस पर फूल बरसा दिये होते और सूली सिंहासन बन गई होती, गलत हुआ होता। क्योंकि फिर मनुष्य की स्वतंत्रता न रह जाती। फिर मनुष्य को अपने जीवन को अपने ढंग से जीने का अधिकार न रह जाता।

तुम जरा सोचो, अगर ऐसा हुआ होता तो दुनिया से सारे धर्म खो गये होते, सिर्फ ईसाइयत बचती। फिर बुद्धों का क्या होता, महावीरों का क्या होता, जरथुस्त्रों का क्या होता? फिर ये जो इतने विभिन्न धर्मों के फूल हैं और इतना वैविध्य है जगत में, यह सब खो गया होता--एक उदास ईसाइयत होती।

नहीं, परमात्मा ने बाधा नहीं दी। लोग जो कर रहे थे करने दिया। और इस तरह जीसस को भी एक अवसर दिया।

जीसस के मन में भी इसी तरह का भाव था, एक क्षण को जीसस भी डगमगा गये थे। सूली जब लगी और हाथ पर जब खीले ठोंके गये तो जीसस ने भी आकाश की तरफ पुकार कर कहा था: हे प्रभु, यह तू क्या दिखला रहा है? कहीं भीतर अचेतन में छुपी एक कामना रही होगी कि समय जब पड़ेगा तो परमात्मा काम आयेगा। मानवीय कामना है, कौन नहीं करेगा! समझ में आती है कि जब समय पड़ेगा तो परमात्मा काम आयेगा। लेकिन मैं परमात्मा से काम लूं अपने हिसाब से, इसमें अहंकार भी है; और परमात्मा मेरी अपेक्षा पूरी करे, मेरे ढंग से व्यवहार करे इसमें परमात्मा पर आरोपण भी है। इसमें उसकी ही मर्जी अंतिम है, ऐसा भाव नहीं है। क्षण-भर को जीसस के मन भी संदेह कंप गया, एक लहर दौड़ गई और जीसस ने कहा: हे प्रभु, तू मुझे क्या दिखला रहा है? देखते हो, शिकायत हो गई!

पर जीसस बड़े संवेदनशील व्यक्ति थे, तत्क्षण समझ गये, एक क्षण में बात समझ में आ गई। वह जो लहर उठ गई थी जरा-सी संदेह की, पकड़ लिया उसे। समझ ली अपनी भूल, झुक गया सिर। और

जीसस ने दूसरे जो शब्द कहे तत्क्षण, वे थे: हे प्रभु, तेरी जो मर्जी हो वही पूरी हो। मेरी मर्जी पर ध्यान न देना। मैं क्या जानूं कि क्या ठीक है? मेरी मर्जी का मूल्य क्या? तू जानता है क्या ठीक है। तू जो करे वही ठीक! मैं नतमस्तक हूं!

यह समर्पण। यह असली चमत्कार है। अगर परमात्मा ने फूल बरसा दिये होते, जीसस जीसस ही रह जाते, क्राइस्ट न हो पाते।

अब तुम समझो थोड़ा। अगर फूल बरस गये होते तो जीसस का अहंकार भर गया होता, जीसस ने कहा होता कि लो देख लो अब, अब देख लो सब, सारे विरोधी, कि कौन सच्चा है! अब यह कसौटी हो गई। जीसस का अहंकार प्रबल हो गया होता और वहीं भूल हो गई होती। जीसस खो गये होते, भटक गये होते।

पापियों से भी बड़ा अहंकार पुण्य का होता है। और इतना बड़ा पुण्य कि परमात्मा उतरे आकाश से बचाने अपने प्यारे को, तो अकड़ कैसी न हो गई होती! उस अकड़ में परमात्मा से संबंध ही जीसस का सदा के लिए टूट गया होता। लेकिन चमत्कार हुआ। परमात्मा ने कुछ भी न किया; इस न करने में चमत्कार है। मगर इसे देखने के लिये बड़ी गहरी आंख चाहिये, सिद्धार्थ। ऊपर-ऊपर से तो ऐसा ही दिखा कि परमात्मा ने बड़ी उदासी रखी, बिलकुल तटस्थ रहा; जीसस मरे कि नहीं, कोई जैसे मतलब ही नहीं था। जरा भी बीच में आया नहीं। मगर और गहरे देखो। आया। बिना बीच में आये बीच में आया, जिसको

लाओत्सु ने कहा है: वह बिना किये करना। बिना कृत्य के करना। कृत्य कुछ भी न किया और क्रांति घटी।

जीसस को एक अवसर दिया कि तू अपनी आखिरी अपेक्षाएं भी छोड़ दे। तू आग्रह छोड़ दे। शिकायत का रेशा भी न रह जाये।

यह अवसर दिया जीसस को । यही असली घटना थी। यही महोत्सव है, जो जीसस के भीतर घटा। वे झुक गये। उस झुकने में जीसस क्राइस्ट हो गये, बुद्ध हो गये। उसी झुकने में वह महापर्व आ गया, समर्पित हो गये। बूंद सागर में गिर गई और सागर हो गई। फिर यह भी खयाल रखो कि तुम्हें जो मृत्यु मालूम पड़ती है वह परमात्मा के लिये मृत्यु नहीं है। तुम्हें लगती है अड़चन कि जीसस, सुकरात और मंसूर जैसे प्रेमावतारों को सूली दी गई, जहर पिलाया गया, हाथ-पैर काटे गये, गर्दनें काटी गईं, परमात्मा कैसे देखता रहा? यह तुम्हारा देखना और परमात्मा का देखना, तुम सोचते हो एक जैसा होगा? यह ऐसा ही है कि बच्चे ने अपने खिलौने की गर्दन तोड़ दी, बाप बैठा देखता रहा, कुछ भी न बोला। दूसरे बच्चे कहेंगे: यह बाप कैसा है! गर्दन तोड़ी गई और बाप बैठा देखता रहा! अब बाप जानता है कि खिलौना है और बच्चा आज नहीं कल गर्दन तोड़ेगा ही। खिलौने टूटने के लिए ही होते हैं। लेकिन छोटे बच्चे को तो खिलौना खिलौना नहीं है; उसे तो बड़ा जीवित मालूम होता है। छोटे बच्चे तो अपने खिलौनों को रात बिस्तर पर भी ले जाते हैं, उनको नहलाते भी हैं, उनको खिलाने की भी कोशिश करते हैं, घुमाने भी ले जाते हैं, उनसे बातचीत भी करते हैं। खिलौना गिर जाये तो उठाकर उसको पुचकारते हैं, समझाते भी हैं कि मत रो। छोटा बच्चा तो अपने खिलौनों को जीवित मानता है। हमारी भी बुद्धि उतनी ही है। तुम जब जीसस को सूली लगते देखते हो, तब तुम सोचते हो जीसस को सूली लग रही है! जीसस को तो सिंहासन ही मिल रहा है। देह गिर रही है। देह तो मिट्टी की है, खिलौना है।

परमात्मा की तरफ से देखने पर देह तो गिरेगी ही, आज नहीं कल। देह को कब तक बचाया जा सकता है? देह तो मरणधर्मा है। और अगर ऐसा समझो, तो फिर जीसस से बेहतर मरने का ढंग और क्या होगा? फिर सुकरात से बेहतर मरने का ढंग और क्या होगा? प्यारा ढंग चुना।

मृत्यु भी बड़ी महत्वपूर्ण हो गई, क्योंकि जीसस की मृत्यु से ही जीसस का प्रभाव पड़ा जगत पर, जीसस की छाया पड़ी जगत पर। जीसस की मृत्यु ने ही मनुष्य को जीसस के प्रति आकर्षित किया।

सुकरात के जहर ने ही तो सुकरात के नाम को आज तक जिंदा रखा है। ऐसे भी मरता, खाट पर मरता, बीमारी से मरता, मरता तो ही; लेकिन जहर देकर मारा गया, यह बात मनुष्य की छाती पर खुद गई अमिट अक्षरों में, जो कभी मिट न सकेगी। सुकरात को अब भुलाया न जा सकेगा। सुकरात सदा-सदा याद रहेगा। शायद इससे सुंदर और मृत्यु हो भी नहीं सकती थी। सुकरात को कहा गया था...अदालत ने कहा था कि हम तुम्हें क्षमा कर सकते हैं; तुम जिसको सत्य कहते हो वह बोलना बंद कर दो तो हम तुम्हें क्षमा कर सकते हैं। लेकिन वायदा करना होगा कि तुम चुप रहोगे, अब यह सत्य की बातचीत बंद कर दोगे। सुकरात ने कहा: बिना सत्य बोले जीने से सत्य बोलकर मरना बेहतर है। मृत्यु भी सत्य के काम आ जायेगी। मृत्यु भी सत्य की सेविका हो जायेगी। तुम जहर दो। तुम मुझे मारो। जीकर क्या करूंगा? अगर सत्य की उदघोषणा न कर सकूं, अगर सोयों को जगा न सकूं, अगर गङ्ढे में गिरते को रोक न सकूं, अगर बीमार का उपचार न कर सकूं, तो जीकर क्या करूंगा? मुझे तो जीकर जो जानना था वह जान लिया, अब बांटने के लिये जी रहा हूं। अगर बांटना ही नहीं हो सकता तो यह फूल अभी गिर जाये। अगर सुगंध बांटनी ही नहीं है, तो इस फूल को बचाने से प्रयोजन भी क्या है?

नहीं; सुकरात ने कहा था: सत्य बोलने का धंधा मैं बंद नहीं कर सकता, परिणाम कुछ भी हो। तुम्हें लगता है सिद्धार्थ कि इस तरह से सूली लगी जीसस को, ईश्वर के प्यारे बेटे को; सुकरात को, सत्य के इतने बड़े प्रेमी को; मंसूर को, इतने बड़े ब्रह्मज्ञानी को! इस तरह से! तुम्हें अड़चन लगती है, क्योंकि तुम्हें अभी पता नहीं कि इस मरणधर्मा देह में अमृत छिपा है।

मंसूर को जरा भी अड़चन न थी। मंसूर, जब सूली लगी, तो आकाश की तरफ देखकर खिलखिलाकर हंसा था। भीड़ इकट्ठी थी। भीड़ में से किसी ने पूछा कि मंसूर, यह हंसने का वक्त है? तुम होश में हो? पागल तो नहीं हो गये हो? किस लिये हंस रहे हो?

मंसूर ने कहा: मैं इसलिए हंस रहा हूं कि यह भी खूब रही! तुम सोच रहे हो, मुझे मार रहे हो, तुम मुझे मारोगे क्या, तुम मुझे छू भी नहीं सकते। तुम्हारे अस्त्र मुझे छू भी नहीं सकते। तुम मुझे मरोगे क्या? और जिसे तुम मार रहे हो, उसे तो मैं खुद ही छोड़ चुका था। वह मैं हूं, ऐसी तो धारणा मैंने कब की त्याग दी थी। मैं देह तो हूं ही नहीं। जिस दिन मैंने, देह नहीं हूं, ऐसा जाना, उसी दिन तो यह उदघोष उठा मेरे भीतर: अनलहक, कि मैं परमात्मा हूं! जिस अपराध के लिये तुम मुझे मार रहे हो...।

अपराध क्या था मंसूर का? यही कि उसने घोषणा कर दी कि मैं ईश्वर हूं। यही अपराध था मुसलमानों की नजर में कि कोई अपने को ईश्वर घोषित कर दे, यह कुफ्र हो गया! इस अपराध के लिये तुम मुझे मार रहे हो, मंसूर ने कहा कि मैंने कहा कि मैं ईश्वर हूं; मगर तुम्हें पता है कि यह अपराध मैं इसीलिए कर सका कि मुझे पता चल गया कि मैं देह नहीं हूं। जिस दिन जाना देह नहीं हूं, उसी दिन जाना अमृत हूं।

फिर किसी ने पूछा कि आकाश की तरफ देखकर क्यों हंस रहे हो? तो उसने कहा कि मैं इसलिये आकाश की तरफ देखकर हंस रहा हूं कि कह रहा हूं परमात्मा से कि तू किसी भी रूप में आ, मैं तुझे पहचान लूंगा। आज तू मौत के रूप में आया है, मुझे धोखा न दे सकेगा। मैं तुझे हर रूप में जानता हूं। मौत भी तू है। उस परम दशा में जीवन और मृत्यु में कोई भी भेद नहीं है, कांटे और फूल में कोई भी भेद नहीं है। जो जानते हैं, उनकी भावदशा कुछ और होती है। सितम-पर-सितम कर रहे हैं वोह मुझ पर। मुझे शायद अपना समझने लगे हैं।। जो नहीं जानते वे कुछ और सोचते हैं। मुहब्बत नाम है ला हासिल औ न तमामी का। मुहब्बत है तो दिल को फारिगे सूदो जियां कर ले।। अपूर्व वचन है: मुहब्बत नाम है ला हासिल औ न तमामी का। प्रेम है अपूर्णता और असफलता का नाम। तुमने कभी सोचा भी न होगा, कि प्रेम अपूर्णता और असफलता का नाम है! प्रेम है: असफलता में भी सफलता जानना, अपूर्णता में भी पूर्णता जानना, मृत्यु में भी जीवन जानना। प्रेम है: हार में भी जीत जानना। प्रेम हार का नाम है। जीत तो परिणाम है। मुहब्बत नाम है ला हासिल औ न तमामी का। मुहब्बत है तो दिल को फारिगे सूदो जियां कर ले।। और अगर सच में तुम्हें प्रेम है तो अपने मन को लाभऱ्हानि के विचार से मुक्त कर लो। हानि-लाभ का भाव बना रहा तो कभी प्रेम न कर सकोगे। फिर मृत्यु में भी हानि नहीं है और जीवन में भी लाभ नहीं है। फिर असफलता में हानि नहीं है, सफलता में लाभ नहीं है। फिर फूलों की सेज पर मरे कि कांटों की सेज पर, भेद नहीं है। उस अभेद दशा का नाम प्रेम है। और प्रेम ही प्रार्थना है। प्रेम की दुनिया दीवानों की दुनिया है। ये मंसूर, ये सुकरात, ये जीसस, इस जगत के बड़े-से-बड़े दीवाने हैं, बड़े-से-बड़े प्रेमी हैं। इनको समझने के लिए तुम्हें प्रेम के थोड़े पाठ सीखने पड़ेंगे। ज़रा खुलकर पुकार ए सूर! मज्जूबाने-उल्फ़त को। यह दीवाने कहीं बैठे न रह जायें बयाबां में।। कयामत का दिन जब आयेगा...इस्लाम की धारणा है कि जब आखिरी कयामत का दिन आयेगा तो एक देवपुरुष उतरेगा और जोर से तुरही बजायेगा, क्योंकि सब जो मुर्दे कब्रों में लेटे हैं वे उठ जायें। एक तरह की सूचना मुर्दों को कि जाग जाओ। तुरही बड़ी भयंकर होगी, उसका तुमुल नाद होगा, दिल को दहला देने वाली होगी, नरसिंहा का नाद होगा। जरा खुलकर पुकार ऐ सूर! मज्जूबाने-उल्फत को। कवि कह रहा है कि जरा खुलकर बजा नरसिंहे को, क्योंकि बाकी लोग तो उठ जायेंगे, लेकिन यहां कुछ दीवाने भी सो रहे हैं, यहां कुछ प्रेमी भी सो रहे हैं, यह दीवाने कहीं बैठे न रह जायें बयाबां में। यहां ऐसे भी प्रेमी पड़े हैं कि जिनको फिकिर ही नहीं है, न जीवन की न मृत्यु की, न संसार की न कयामत की। जरा जोर से बजा तुरही को, नहीं तो यहां कुछ ऐसे लोग हैं, मंसूर जैसे कि वे मजे से लेटे ही रहेंगे। उन्हें पता ही न चलेगा कि कब तेरी तुरही बजी और कब तेरी तुरही समाप्त हो गई। उन्हें प्रलय का भी पता न चलेगा। सृष्टि का अंत आ गया, यह तुमुल-घोष होगा और वे अपनी मस्ती में पड़े रहेंगे, यहां ऐसे दीवाने भी हैं। ज़रा खुलकर पुकार ऐ सूर! मज्जूबाने-उल्फत को। यह दीवाने कहीं बैठे न रह जायें बयाबां में।। कहीं ऐसा न हो कि प्रलय आये और गुजर जाये और इनको पता ही न चले। मौत का क्या जीसस को पता चला होगा? मौत का क्या मंसूर को पता चला होगा? आई और गुजर गई। यही चमत्कार है। अस्तित्व अत्यंत प्रेमपूर्ण है और इसलिये अत्यंत तटस्थ है। यह प्रीतिपूर्ण तटस्थता है। यह तटस्थता उपेक्षा की नहीं है। यह तटस्थता प्रीति की है। अस्तित्व इतना प्रेम करता है कि कैसे तुम्हारे जीवन में बाधा डाले, कैसे अड़चन डाले? इसीलिये परमात्मा की उपस्थिति बिलकुल अनुपस्थिति जैसी है। तुम थोड़ा सोचो, परमात्मा जगह-जगह उपस्थित हो, जैसा कि पंडित-पुरोहित तुम्हें समझाते हैं, कि वह सब तरफ से देख रहा है, तुम कुछ भी करो, कहीं भी जाओ, उसकी आंख तुम पर गड़ी हुई है, वह देख रहा है। वे तुमको डरवा रहे हैं, वे तुम्हें घबड़ा रहे हैं, वे तुम्हारे भीतर भय बैठा रहे हैं--कि परमात्मा देख रहा है, देखो, सम्हलकर करना कोई काम करते हो तो। मैंने सुना है कि एक ईसाई संन्यासिन बाथरूम में भी कपड़े नहीं उतारती थी। पूछा किसी ने, क्यों? तो उसने कहा कि कहा नहीं है शास्त्रों में कि परमात्मा हर जगह देख रहा है।...तो वह तो बाथरूम में भी देख ही रहा होगा। मगर उस मूर्ख को कोई कहे कि जो बाथरूम में देख रहा होगा वह तो कपड़े के भीतर भी देख ही रहा होगा, वह तो हड्डी-मांस-मज्जा के भीतर भी देख ही रहा होगा। पंडित-पुरोहितों ने तुम्हें खूब डरवाया है कि परमात्मा तुम पर आंखें गड़ाये है; जरा सावधान, ऐसा मत करना, वैसा मत करना। लेकिन परमात्मा का प्रेम इतना विराट है, उसी विराट प्रेम के कारण वह उपस्थित है, मगर अनुपस्थित हो गया है। कहीं उसकी उपस्थिति बाधा न बन जाये, क्योंकि वह मौजूद हो तो कहीं ऐसा न हो कि तुम कुछ काम न कर सको जो तुम करना चाहते थे। अब परमात्मा सामने बैठा हो और तुम्हें धूम्रपान करना है, अब मुश्किल खड़ी हो जायेगी, अब अड़चन हो जायेगी। कैसे धूम्रपान करो? ऐसे तो कोई दूसरा आदमी भी बैठा होता है तो एकदम से धूम्रपान करने में अड़चन होती है। उस अड़चन को तो सुलझाने का उपाय है कि तुम पहले उसको पेश करते हो आप सिगरेट पियें। वह कहे नहीं हां या कुछ, इसके बाद फिर तुम पीना शुरू करते हो। अब परमात्मा को सिगरेट उपस्थित करो, यह भी बात जमती नहीं। मैं एक दफा यात्रा में था। पटना से लौटता था। मेरे डिब्बे में एक सज्जन और थे। अच्छे भले आदमी, डाक्टर थे बंबई के। अब उन्हें शराब पीनी थी। अब वे बड़ी जरा हैरानी में थे। रंग-ढंग से मैं साधु-संतों जैसा मालूम पड़ रहा था, तो उनको और जरा अड़चन थी। मैंने उन्हें जरा अड़चन में देखा। मैंने कहा: तुम फिकिर न करो। तुम ऐसा मानो कि मैं हूं ही नहीं। उन्होंने कहा: आपका मतलब? मैंने कहा: मैं तुम्हें कुछ अड़चन में देखता हूं। तुम कहो तो मैं दूसरे डब्बे में चला जाऊं। नहीं-नहीं--उन्होंने कहा--कैसे आप...आप बैठें, कहीं जाने की जरूरत नहीं। फिर थोड़ी देर बाद उन्होंने कहा कि आप ठीक ही कह रहे हैं। असल में मुझे शराब पीने की आदत है और बिना पीये यह चौबीस घंटे का सफर मैं न कर सकूंगा। आप पीयेंगे? मैंने कहा कि मैं तो नहीं पीऊंगा, लेकिन आप मजे से पीयें, मुझे कोई अड़चन नहीं है। फिर भी उन्हें थोड़ी-सी दुविधा बनी रही। सज्जन-चित्त आदमी थे। उन्होंने सिगरेट निकाली। कहा: आप सिगरेट पीयेंगे? मैंने कहा कि सिगरेट मैं पीता नहीं। तो उन्होंने पान का बटुआ निकाला कि आप कम-से-कम पान लें। मैंने कहा: मैं पान भी नहीं खाता। तो उन्होंने जो बात कही, वह मुझे भूली नहीं। उन्होंने कहा: तो फिर आपसे मित्रता बनाने का कोई उपाय नहीं? तो मैंने कहा: फिर मैं तीनों पी लूंगा। अगर मित्रता का मामला हो तो शराब भी पीऊंगा, सिगरेट भी पीऊंगा, और पान भी खा लूंगा। अगर मित्रता का मामला हो! मगर इनकी कोई जरूरत नहीं, मित्रता है ही। मैं भर दूंगा तुम्हारी प्याली शराब से, और क्या करूं? मैं तुम्हारी सिगरेट जला दूंगा, और क्या करूं? मैं तुम्हारा पान तुम्हारे मुंह दे दूंगा, और क्या करूं? मित्रता इतने से ही हो जाये तो ठीक है और नहीं होती हो तो मैं तीनों लेने को भी तैयार हूं। परमात्मा तुम्हारे सामने बैठा हो तो बड़ी मुश्किल हो जायेगी, क्या करोगे? नहीं, उसने खूब उपाय खोजा है कि बिलकुल तिरोहित हो गया है। चारों तरफ वही है। उसी ने तुम्हें घेर रखा है--भीतर भी वही, बाहर भी वही, लेकिन बिलकुल अनुपस्थिति है। यह उसके प्रेम का प्रतीक है। तुम्हारे जीवन में बाधा न हो। तुम्हें पूरी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। परमात्मा की अनुपस्थिति तुम्हारी स्वतंत्रता की आधारशिला है। वह जगह-जगह खड़ा मिल जाये, तुम्हारे जीवन से सारा गौरव, सारी गरिमा तिरोहित हो जायेगी। फिर तुम साधु भी हुए तो झूठे होओगे। नहीं, अभी तुम्हें असाधु भी होना हो तो परमात्मा कहता है: हो लो, तुम्हारा हक है। और असाधु होकर असाधु की पीड़ा पाकर जब तुम साधु होओगे तो असली साधुता पैदा होती है--असली साधुता भय से पैदा नहीं होती--असाधुता के कष्ट, नर्क से पैदा होती है। परमात्मा तटस्थ है, क्योंकि प्रेमपूर्ण है। और परमात्मा प्रेमपूर्ण है क्योंकि तटस्थ है। परमात्मा के संबंध में सदा याद रखो। बार-बार तुम्हें याद दिलाता हूं कि वहां विरोधाभास समाप्त हो जाते हैं, वहां तटस्थता और प्रेम में विरोध नहीं रह जाता। भरपूर है उसकी तटस्थता प्रेम से, आपूर है। और उसका प्रेम बिलकुल तटस्थ है। फिर तुम्हारी दृष्टि से जो मृत्यु है उसकी दृष्टि से मृत्यु नहीं है। कौन कहता है कि मौत अंजाम होना चाहिए। जिंदगी का जिंदगी पैगाम होना चाहिए।। जिंदगी कहीं मौत पर समाप्त हो सकती है? कैसे? यह उल्टा हो कैसे जायेगा? जिंदगी मौत बन सकती है? असंभव है। जिंदगी तो और बड़ी जिंदगी बनती है। जिंदगी तो जिंदगी ही बन सकती है। आम के वृक्ष में आम के फल लगते हैं, नीम के वृक्ष में नीम के फल लगते हैं। जीवन के वृक्ष में मृत्यु के फल लग कैसे सकते हैं? और अगर तुम्हें दिखाई पड़ते हों कि मृत्यु के फल लग रहे हैं, तो तुम्हारे देखने में कहीं भूल-चूक होगी। मृत्यु सिर्फ परिधान का बदलना है, अपने वस्त्रों का बदलना है। वस्त्र जराजीर्ण हो जाते हैं तो आदमी बदल लेता है, लेकिन वस्त्रों की बदलाहट मृत्यु नहीं है। कौन कहता है कि मौत अंजाम होना चाहिए। मौत परिणाम नहीं है जीवन का। कौन कहता है कि मौत अंजाम होना चाहिए। जिंदगी का जिंदगी पैगाम होना चाहिए। है भी। जिंदगी और बड़ी जिंदगी में प्रवेश करती जाती है। जिंदगी और बड़ी जिंदगी होती चली जाती है। तुम देह में सीमित नहीं हो। तुम देह में आवास कर रहे हो, मगर तुम देह ही नहीं हो। घड़ा टूट गया, इससे घड़े का जल थोड़े ही टूट जाता है। घड़े का जल मुक्त हो जाता है। बंधा था, अब मुक्त हो गया। ऐसे ही जीसस का घड़ा टूट गया सूली पर। लोगों ने घड़ा फोड़ा और समझे कि जीसस को मार लिया। इतना आसान नहीं है। जीसस के साथ दो चोरों को भी सूली लगी थी, बीच में जीसस, एक तरफ चोर, दूसरी तरफ चोर। अपमान के लिये जीसस के, कि तुम्हें हम चोरों से ज्यादा नहीं गिनते। चोरों के साथ सूली दी गई थी। जीसस को तो पता है कि भीतर शाश्वत विराजमान है। उनके बाएं एक चोर है, दाएं एक चोर है; उनको पता नहीं। वे जरूर मर रहे हैं। वे जरूर पीड़ित हो रहे हैं। वे जरूर हैरान हो रहे हैं। उनका कष्ट असीम है। लेकिन उन दो चोरों में भी भेद है। एक चोर न तो जानता है कि आत्मा है, न मानता है कि आत्मा है। दूसरा चोर जीसस को देखता है, उनके चेहरे पर गुलाब के फूल जैसी लालिमा देखता है। मृत्यु के क्षण में भी! उनकी आंखों में गहरी शांति देखता है। उनके चारों तरफ प्रेम की आभा देखता है। जीसस के अंतिम वचन थे परमात्मा से कि हे प्रभु, इन सबको माफ कर देना, जो लोग मुझे सूली दे रहे हैं, क्योंकि इन्हें पता नहीं कि ये क्या कर रहे हैं! एक चोर जो कि आत्मा को मानता भी नहीं, जानता भी नहीं, वह तो हंस रहा है, वह तो जीसस की मजाक उड़ा रहा है। उसने तो जीसस से मरने के पहले कहा कि हम तो खैर चोर हैं, सो ठीक, सूली लग रही है, आपका क्या? आप तो बड़े संत, आप तो दावेदार थे कि आप ईश्वर के बेटे हो, इकलौते बेटे हो। आपका क्या हुआ? मर रहा है खुद लेकिन फिर भी अपना व्यंग्य किये जा रहा है। जीसस की मजाक उड़ा रहा है। वह यह कह रहा है कि ठीक हम को लग रही है सूली, वह तो हम चोर हैं, लगनी चाहिये, तुम्हें क्यों लग रही है? एक अर्थ में वह प्रसन्न है कि जीसस को भी लग रही है, क्योंकि तब बुरा और भला सब बराबर हो जाता है। मौत में न कोई पुण्य का भेद है न पाप का भेद है। झंझट सब खतम हो जाती है। आगे कुछ भी नहीं है। यह जीसस तक मर रहा है। उसके भीतर जो अपने जीवन के प्रति पश्चात्ताप होगा, वह भी इस कारण नहीं हो रहा है कि जब जीसस की भी यह गति हो रही है तो अच्छा करके भी क्या कर लिया? हमने ही बुरा किया तो कौन बुरा किया? फल तो बराबर हुआ जा रहा है, दोनों की मौत घट रही है।

मगर दूसरा चोर जीसस की शांति को देखा, पहचाना। उसने जीसस से कहा कि हे प्रभु, मैंने तो नहीं जानी आत्मा और मैंने तो नहीं जाना परमात्मा, न कभी प्रार्थना की, चूक ही गया; मगर यही क्या मेरा कम धन्यभाग कि आपकी छाया में मर रहा हूं! यही मेरा महापुण्य है! जीसस ने उसकी आंखों में देखा और कहा: तू घबड़ा मत, तू बचा लिया गया है। क्या मतलब है जीसस का कि तू बचा लिया गया है? इस भाव में ही बचाव हो गया है। सारे पाप धुल गये इस भाव में ही।

सदगुरु के पास क्षणभर भी बैठ जाना स्नान है। गंगा में बैठने से शायद पाप न भी धुलें, क्योंकि गंगा आखिर जल ही है--बाहरी जल है; धूल-धवांस धुल जाये शरीर की, आत्मा की तो कैसे धुलेगी? लेकिन ऐसी गंगाएं भी हैं जहां आत्मा की धूल-धवांस भी धुल जाती है। जीसस ने कहा: तू फिकिर मत कर, तू बचा लिया गया है। मरने के आखिरी क्षण उस चोर ने कहा कि प्रभु, फिर कब दर्शन होंगे? जीसस ने कहा: आज ही! शरीर को गिर जाने दे। दर्शन तो हो ही गये और दर्शन तो जारी रहेंगे। आज ही दर्शन होंगे। गिरने दे शरीर को। संबंध जुड़ गया। दर्शन जारी रहेगा।

दोनों चोर...लेकिन एक अंधा और एक आंखवाला। एक मर कर फिर पैदा होगा। फिर चोर हो जायेगा; लेकिन दूसरे ने खूब सम्हाला, खूब कुशलता से सम्हाला। आखिर-आखिर गिरते-गिरते सम्हल गया, फिसलते-फिसलते सम्हल गया। सारी जिंदगी के पाप धुल गये। तुम्हारी तरफ से मत सोचो--जीसस, मंसूर, सुकरात की तरफ से सोचो। गम एक इम्तहान था इन्सान के लिए। जो लोग अहले-जौक थे, वोह मुसकरा दिए।।

जो पारखी हैं वे तो जिंदगी में जब दुख आता है तो मुस्कराते हैं, क्योंकि हर दुख परीक्षा है और हर दुख कसौटी है। और हर दुख निखारता है और हर दुख तपश्चर्या है। और हर दुख से गुजरकर तुम्हारे जीवन का कुंदन रोज-रोज शुद्ध होता जाता है। और जो व्यक्ति जीवन के परम दुख से गुजरा...फांसी परम दुख है, एक क्षण में सारे जीवन की पीड़ा इकट्ठी हो गई...उससे जो गुजरा, उस गुजरने में, उस पार होने में, उसने आखिरी परीक्षा उत्तीर्ण कर ली।

तुम्हारी तरफ से देखने पर लगता है कि परमात्मा कुछ भी न बोला, चुप रहा, तटस्थ है। परमात्मा को जो करना था उसने किया। जो करने योग्य था किया। यह परीक्षा थी। यह परीक्षा जरूरी थी। जीसस, मंसूर, सुकरात इस परीक्षा से उत्तीर्ण हो गये--पताकायें फहराते परमात्मा में लीन हो गये होंगे! दुख जब आये तो ऐसे ही सोचना कि दुख निखारता है, कि दुख मांजता है, कि दुख से मंज-मंजकर ही वह घड़ी आती है जब सोने में सुगंध पैदा होती है।

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Chida Nanda

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