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क्या ज्ञान, भक्ति या कर्म से स्व-चेतन में जागरण होता है?


न, भक्ति और कर्म अलग बातें नहीं हैं। ऐसा समझा जाता रहा है कि तीनों अलग बातें हैं। मेरी दृष्टि में तीनों बातें अलग नहीं हैं।

अगर ज्ञान न हो, तो भक्ति अंधी होगी। और अंधी भक्ति कहीं भी नहीं ले जा सकती है। अगर भक्ति न हो, तो ज्ञान बिलकुल रूखा और मानसिक होगा,उसमें कोई गहराई नहीं हो सकती, हार्दिक उसके भीतर कोई जड़ें नहीं हो सकतीं। अगर अकेला कर्म हो, भक्ति न हो, ज्ञान न हो, तो कर्म अंधा होगा, रस-शून्य होगा, हृदय-रिक्त होगा, वैसा कर्म भी कहीं नहीं ले जाता है।

अगर अकेला ज्ञान हो, कर्म न हो, तो वैसा कर्म, वैसा ज्ञान वंध्वा होगा, उससे कोई सृजनात्मकता, कोई क्रिएटिविटी पैदा नहीं होती। वह केवल मानसिक खयाल होगा। जीवंत नहीं होगा, लिविंग नहीं होगा। कर्म उसे जीवंत गुण देता है।

ये तीनों अलग हैं, यह बात ही बड़ी गलत है। ये तीनों बिलकुल संयुक्त और इकट्ठे हैं।

ऐसा कोई मनुष्य देखा है जो केवल हृदय हो? ऐसा मनुष्य नहीं हो सकता। हां, कहीं किसी यंत्र में हृदय को निकाल कर रखा जा सकता है और कृत्रिम रूप से चलाया जा सकता है, लेकिन अकेला हृदय हो ऐसा कोई मनुष्य नहीं हो सकता।

ऐसा कोई मनुष्य देखा है जो अकेला मस्तिष्क हो? या ऐसा कोई मनुष्य देखा है जो अकेला कर्म हो? ऐसा कोई मनुष्य नहीं होता।

मनुष्य तीनों का जोड़ है, संयुक्त समन्वय है।

आप कहेंगे, किसी में कर्म की प्रभावना होती है, किसी में ज्ञान की, किसी में हृदय की, भाव की। मैं कहूंगा, अगर एक भी अंग इनमें से प्रधान है, तो वह मनुष्य अभी ठीक से संयम को, संतुलन को उपलब्ध नहीं हुआ। अभी वह आदमी बीमार है। जैसे एक बच्चे का सिर बहुत बड़ा हो जाए और हाथ-पैर बिलकुल छोटे रह जाएं, जैसे हमारे पंडित हैं। उनका सिर तो बहुत बड़ा हो जाता और सब छोटा रह जाता। जैसे किसी के हाथ-पैर तो बहुत बड़े-बड़े हो जाएं और सिर बिलकुल छोटा रह जाए, ऐसे हमारे कर्मयोगी हैं। वे जो कर्मनिष्ठ मालूम होते हैं, वे हैं। और जैसे किसी में केवल भाव ही भाव रह जाएं, रोता हो, गाता हो, कविता करता हो और जीवन में कुछ भी न हो। भजन करता हो, चिल्लाता हो, कूदता-फांदता हो, ऐसे हमारे तथाकथित भक्त हैं, कवि हैं। ये अपंग जीवन के उदाहरण हैं। ये कोई भी ठीक-ठीक संयम को, संतुलन को, बैलेंस को, जीवन की सिंथिसिस को उपलब्ध हुए लोग नहीं हैं। ये सब अधूरे विकास हैं।

मेरी दृष्टि में संपूर्ण रूप से मनुष्य का व्यक्तित्व तभी विकसित होता है, जब ये तीनों एक समवेत स्वर को उपलब्ध हो जाते हैं। जब एक हार्मनी को, एक संगीत को, इन तीनों के भीतर उपलब्ध हो जाता है। लेकिन उस संगीत का प्रारंभ, न तो मैं मानता हूं ज्ञान है, न मैं मानता हूं भक्ति है, न मैं मानता हूं कर्म है। मैं तो ध्यान को मानता हूं। ध्यान तीनों का प्राण है। अगर कर्म में ध्यान हो, तो कर्म करने योग्य हो जाता है। अगर प्रेम ध्यानयुक्त हो, तो प्रेम भक्ति हो जाता है। अगर ज्ञान ध्यानपूर्ण हो, तो ज्ञान ज्ञानयोग हो जाता है। ध्यान इन तीनों को जोड़ने वाला सेतु, इन तीनों के भीतर प्रवाहित होने वाला आंतरिक हृदय है।

ध्यान न तो ज्ञान है, क्योंकि कोई ग्रंथ पढ़ने से ध्यान नहीं उपलब्ध होता। और न ध्यान भक्ति है। क्योंकि गिड़गिड़ाने से और प्रार्थना करने से, नाचने से,कूदने से और संगीत में अपने को भुलाने से कोई ध्यान उपलब्ध नहीं होता। वरन क्या होता है, वह मैं कहूंगा। और न ही ध्यान मात्र कर्म है कि कोई कर्मठ हो, सेवा करे या कुछ करे, तो ध्यान उपलब्ध हो जाता है। ध्यान तो एक अलग बिंदु है, वह तो जीवन में साक्षीभाव को स्थापित करने से उपलब्ध होता है। अगर कोई अपने कर्म के जीवन में साक्षीभाव को उपलब्ध हो जाए, जो भी करे, उसका साक्षी भी हो, तो कर्म ही धर्म का अंग हो जाएंगे। तब सेवा धर्म हो जाएगी। तब जो किया जा रहा है वह धर्म हो जाएगा। जापान में एक साधु था, लिंची। किसी ने उससे पूछा कि तुम क्या करते हो? क्या है तुम्हारी साधना?क्या है तुम्हारा योग?

लिंची ने कहा: पूछते हैं क्या करता हूं? नहीं; धर्म मेरे लिए कोई विशेषरूप का करना या कर्म नहीं है, वरन जो भी करता हूं उसे बोधपूर्वक करता हूं। सुबह झाडू लगाता हूं, तो उसे भी बोधपूर्वक लगाता हूं। बगीचे में जाकर गङ्ढा खोदता हूं, तो उसे भी बोधपूर्वक खोदता हूं। भोजन करता हूं तो भी और कपड़े पहनता हूं तो भी। चौबीस घंटे जो भी करता हूं उसे बोधपूर्वक करता हूं।

इस बोधपूर्वक करने में ही कर्म ध्यान का हिस्सा हो जाता है। प्रेम हम करते हैं, प्रेम अगर बोधपूर्वक न हो, तो वासना बन जाता है और मोह बन जाता है। प्रेम यदि बोधपूर्वक हो, तो इससे बड़ी मुक्ति इस जगत में दूसरी नहीं है, प्रेम भक्ति हो जाता है।

और भक्ति के लिए मंदिर जाने की जरूरत नहीं है। भक्ति के लिए प्रेम का ध्यानयुक्त होना जरूरी है। अगर आप अपनी बच्चे को, अपनी पत्नी को, अपनी मां को, अपने मित्र को, किसी को भी प्रेम करते हैं, अगर वही प्रेम ध्यान से संयुक्त हो जाए, अगर उसी प्रेम के आप साक्षी हो जाएं, तो वही प्रेम भक्ति हो जाएगा। प्रेम जब बोधपूर्वक हो, तो भक्ति हो जाता है। प्रेम जब अबोधपूर्वक हो, तो मोह हो जाता है। ज्ञान जब बोधपूर्वक हो, तो मुक्त करने लगता है और ज्ञान जब अंधा हो, मुर्छित हो, तो बांधने लगता है। वैसे ही अगर कोई विचारों को इकट्ठा करता रहे, शास्त्र पढ़ता रहे, व्याख्याएं पढ़ता रहे, विश्लेषण करता रहे, तर्क करता रहे और सोचे कि ज्ञान उपलब्ध हो गया, तो गलती में है। वैसे ज्ञान नहीं उपलब्ध होता, केवल ज्ञान का बोझ बढ़ जाता है। वैसे मस्तिष्क में कोई चैतन्य का संचार नहीं होता, केवल उधार विचार संगृहीत हो जाते हैं। लेकिन अगर ज्ञान के बिंदु पर ध्यान का संयोग हो, साक्षी का संयोग हो, तो फिर विचार तो नहीं इकट्ठे होते, बल्कि विचार-शक्ति जाग्रत होना शुरू हो जाती है। तब फिर बाहर से तो शास्त्र नहीं पढ़ने होते, भीतर से सत्य का उदघाटन शुरू हो जाता है।

मेरी दृष्टि में ध्यान एकमात्र योग है। न तो कर्म कोई योग है, न भक्ति कोई योग है और न ज्ञान कोई योग है। ध्यान योग है। और आपकी प्रकृति कुछ भी हो,ध्यान के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं है।

ध्यान को छोड़ कर जो किसी भी मार्ग को पकड़ने के खयाल में हो, वह भूल में पड़ जाएगा। भूल में पड़ना सुनिश्चित है। क्योंकि तब ध्यान से रिक्त होकर,अगर उसने कर्म किया, तो कर्म ही उसके अहंकार को मजबूत करने का साधन हो जाएंगे। हम जो भी कर्म करते हैं, प्रत्येक कर्म की सफलता में हमें रस आता है। और असफलता में विषाद होता है, दुख होता है। यदि ध्यानयुक्त कर्म न हो तो। जैसा मैंने दोपहर को कहा: अगर ध्यान उपलब्ध हो तो कर्म अनासक्त हो जाएंगे। अगर ध्यान उपलब्ध न होगा, तो कर्म किसी न किसी रूप में आसक्त होंगे। और आसक्त कर्म यदि सफल हो, तो सुख मिलता है,असफल हो जाए तो दुख मिलता है। फिर चाहे वह दुकान हो, चाहे आश्रम हो। फिर चाहे वह पैसा कमाना हो, चाहे सेवा करना हो। अगर सफलता में सुख मिलता है, असफलता में दुख मिलता है, तो कर्म हमारा आसक्त है। और आसक्त कर्म मुक्ति नहीं ला सकता। लेकिन ध्यान उपलब्ध हो, तो कर्म अनासक्त हो जाएगा और कर्म मुक्ति लाने का मार्ग हो जाएगा। लेकिन मूलतः मार्ग होगा ध्यान, कर्म नहीं।

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शरीर और आत्मा—एक ही सत्य के दो छोर:

शरीर का ही अदृश्य छोर आत्मा है और

आत्मा का ही दृश्य छोर शरीर है, यह तो बहुत आखिरी अनुभव में शात होगा।

अब यह बड़े मजे की बात है. साधारणत: हम सब यही मानकर चलते हैं कि शरीर और आत्मा एक ही हैं। लेकिन यह भ्रांति है, हमें आत्मा का कोई पता ही नहीं है;

हम शरीर को ही आत्मा मानकर चलते हैं। लेकिन इस भ्रांति के पीछे भी वही सत्य काम कर रहा है। इस भ्रांति के पीछे भी कहीं अदृश्य हमारे प्राणों के कोने में वही प्रतीति है कि एक है।

उस एक की प्रतीति ने दो तरह की भूलें पैदा की हैं।

एक अध्यात्मवादी है, वह कहता है : शरीर है ही नहीं, आत्मा ही है।

एक भौतिकवादी है, चार्वाक है, एपीकुरस है, वह कहता है कि शरीर ही है, आत्मा है ही नहीं।

यह उसी गहरी प्रतीति की भ्रांतियां हैं; और प्रत्येक साधारणजन भी, जिसको हम अज्ञानी कहते हैं, वह भी यह एहसास करता है कि शरीर ही मैं हूं।

लेकिन जैसे ही भीतर की यात्रा शुरू होगी, पहले तो यह टूटेगी बात और पता चलेगा कि शरीर अलग है और आत्मा अलग है।

क्योंकि जैसे ही पता चलेगा आत्मा है, वैसे ही पता चलेगा कि शरीर अलग है और आत्मा अलग है। लेकिन यह मध्य की बात है।

और गहरे जब उतरोगे, और गहरे जब उतरोगे, और चरम अनुभूति जब होगी, तब पता चलेगा कि कहां! दूसरा तो कोई है नहीं! फिर आत्मा और शरीर दो नहीं हैं; फिर एक ही है; उसके ही दो रूप हैं।

जैसे मैं एक हूं और मेरा बायां हाथ है और दायां हाथ है। बाहर से जो देखने आएगा, अगर वह कहे कि बायां और दायां हाथ एक ही हैं, तो गलत कहता है; क्योंकि बायां बिलकुल अलग है, दायां बिलकुल अलग है। जब मेरे करीब आकर समझेगा तो पाएगा बायां अलग है, दायां अलग है; दायां दुखता है, बायां नहीं दुखता; दायां कट जाए तो बायां बच जाता है; एक तो नहीं हैं।

लेकिन मेरे भीतर और प्रवेश करे तो पाएगा कि मैं तो एक ही हूं जिसका बायां है और जिसका दायां है। और जब बायां टूटता है तब भी मैं ही दुखता हूं और जब दायां टूटता है तब भी मैं ही दुखता हूं; और जब बायां उठता है तब मैं ही उठता हूं और जब दायां उठता है तब मैं ही उठता हूं।

तो बहुत अंतिम अनुभूति में तो शरीर और आत्मा दो नहीं हैं, वे एक ही सत्य के दो पहलू हैं