Recent Posts

Archive

Tags

No tags yet.

उपनिषद--कठोपनिषद-


जैसे दर्पण में (सामने आई हुई वस्तु दिखती है), वैसे ही शुद्ध अंतःकरण में ( ब्रह्म के दर्शन होते हैं) जैसे स्वप्न में (वस्तुएं स्पष्ट दिखलाई देती हैं), उसी प्रकार पितृलोक में ( परमेश्वर दिखता है)। जैसे जल में ( वस्तु के रूप की झलक पड़ती है), उसी प्रकार गंधर्वलोक में परमात्मा की झलक— सी पड़ती है। (और) ब्रह्मलोक में ( तो ) छाया और धूप की भांति (आत्मा और परमात्मा दोनों का स्वरूप पृथक— पृथक स्पष्ट दिखलाई देता है)।।5।।

(अपने—अपने कारण से) भिन्न—भिन्न रूपों में उत्पन्न हुई इंद्रियों की जो पृथक—पृथक सत्ता है और जो उनका उदय और लय हो जानारूप स्वभाव है उसे जानकर (आत्मा का स्वरूप उनसे विलक्षण समझने वाला) धीर पुरुष शोक नहीं करता।।6।।

इंद्रियों से (तो) मन श्रेष्‍ठ है, मन से बुद्धि श्रेष्ट है, बुद्धि से उसका स्वामी जीवात्मा श्रेष्ठ है, (और) जीवात्मा से अव्यक्त शक्ति श्रेष्ठ है।।7।।

परंतु अव्यक्त से ( भी वह) व्यापक और सर्वथा आकाररहित परमपुरुष श्रेष्ठ है जिसको जानकर जीवात्मा मुक्त हो जाता है और अमृतस्वरूप आनंदमय ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है।।8।।

परमात्मा : परम तटस्थता

थोड़ी सी बातें कल के सूत्र के संबंध में और।

जर्मनी के एक बहुत बड़े विचारक रुडोल्फ ओटो ने एक बड़ी महत्‍वपूर्ण पुस्‍तक लिखी है—दि आइडिया आफ होली: उस परम पवित्र का प्रत्‍यय। उसमें एक शब्‍द का रूडोल्‍फ ओटो ने बार-बार प्रयोग किया है—ट्रिमेंडम। वह परमात्‍मा अत्‍यंत भयंकर है। यम ने भी नचिकेता को परमात्मा भयस्वरूप है, ऐसी दृष्टि दी। यह दृष्टि थोड़ी और गहराई से समझ लेने जैसी है, क्योंकि भांति हो जाने की संभावना है।

पहली तो बात यह कि परमात्मा का भयस्वरूप होना, वस्तुत: परमात्मा का स्वरूप नहीं है, वरन हमारा ही भय है। हम भयभीत होते हैं। परमात्मा भयानक है, ऐसा कहने की बजाय, हम भयभीत होते हैं, ऐसा कहना ज्यादा उचित है। और हमारे भयभीत होने का कारण समझ लेना चाहिए। जैसे बूंद सागर में गिरने के पहले डरेगी, क्योंकि सागर में गिरने का अर्थ मिटना है, समाप्त होना है। बूंद का भयभीत होना स्वाभाविक है।

सागर से मिलने का अर्थ मृत्यु है। मृत्यु भय देती है। लेकिन अगर बूंद जान पाए कि सागर में मिटने का एक दूसरा पहलू भी है—बूंद की तरह तो बूंद मिट जाएगी, लेकिन सागर की तरह हो जाएगी; क्षुद्र की भांति तो खो जाएगी,लेकिन विराट की भाति हो जाएगी। काश, बूंद को यह दिखाई पड़ सके कि उसकी मृत्यु विराट से मिलन भी है, तो बूंद का भय खो जाए। और अगर बूंद को यह दिख सके कि मेरी मृत्यु परम जीवन का द्वार है, तो बूंद परमात्मा को प्रेमस्वरूप अनुभव कर सके।

परमात्मा भयस्वरूप है या प्रेमस्वरूप, यह हमारी दृष्टि पर निर्भर है। आदमी भी जब परमसत्ता की खोज में जाता है, तो मिटने की घड़ी आती है। वह क्षण आता है, जब स्वयं को खोना पड़ेगा। और जहा भी स्वयं को खोने की बात उठती है, वहां हृदय भय से कंपित हो जाए, स्वाभाविक है।

हम मृत्यु से किस लिए डरते हैं? हम मृत्यु से इसीलिए डरते हैं कि वह हमें मिटा देगी। लेकिन मृत्यु भी इस भांति नहीं मिटा पाती, जिस भांति परमात्मा मिटाता है। क्योंकि मृत्यु के बाद भी हम बचेंगे, नई देह लेंगे, नई योनियों में यात्रा करेंगे। हमारी देह ही छूटेगी मृत्यु में, हमारा होना नहीं छूटेगा। लेकिन परमात्मा हमारे होने को भी पोंछ डालेगा। हमारी सब आकृति खो जाएगी उस निराकृति में, उस निराकार में, हमारा सब रूप खो जाएगा। मृत्यु शायद हमारी देह को ही छीनती है, परमात्मा हमारी अस्मिता को, हमारे अहंकार को भी छीन लेगा। वह बड़ी मौत है, वह महामृत्यु है।

तो जब हम मृत्यु से डरते हैं, तो स्वाभाविक है कि हम परमात्मा से भी डरें। वह डर परमात्मा का स्वभाव नहीं है, हमारे अहंकार का भय है। लेकिन जो मिटने को राजी है, परमात्मा उसके लिए भयस्वरूप नहीं है। जो मिटने को राजी है, परमात्मा उसके लिए प्रेमस्वरूप है।

इसे हम इस भांति भी समझें। भय के कारण ही लोग प्रेम करने में समर्थ नहीं हो पाते। क्योंकि प्रेम भी मिटाता है, प्रेमी को पोंछ डालता है। उसकी सारी अस्मिता डूब जाती है। और जो प्रेमी अपने प्रेम में अपने को खोने को राजी नहीं है, वह प्रेम को कभी उपलब्ध नहीं हो पाता।

प्रेम का अर्थ ही है विसर्जन, अपने को डुबाने की तैयारी, मिटाने की तैयारी। प्रेम भी थोड़े अर्थों में अहंकार का विनाश है। भयभीत व्यक्ति प्रेम भी नहीं कर पाता। और जो अपने को खोने को राजी है, उसके जीवन में महाप्रेम का उदय होता है और आनंद की बड़ी वर्षा हो जाती है। तो भय और प्रेम इस बात पर निर्भर हैं कि हम मिटने को राजी हैं या नहीं।

ध्यान में जो लोग गहरे जाते हैं, वे एक न एक दिन मेरे पास आकर निश्चित ही कहते हैं कि एक ऐसी घड़ी आ गई थी कि जहां हमें डर लगने लगा कि हम मिट तो न जाएंगे। फिर हम भयभीत होकर वापस लौट आए। वही घड़ी थी, जहां से परमात्मा निकट था। और अनेक ध्यान करने वाले लोग आखिरी क्षण में वापस लौट जाते हैं। छलांग के ठीक पहले, बूंद गिरती सागर में कि वापस हो जाती है। तट से ही वापस हो जाती है। लेकिन सभी को ऐसा होना स्वाभाविक है।

ध्यान भी मृत्यु है, क्योंकि ध्यान छलांग है विराट में। जब आपको घबड़ाहट पकड़ ले तब आप समझना कि ठीक क्षण आया, उससे लौटना मत। उस समय ही जो साहस रख पाता है, वही साधक है। उस समय जो डरा, मन में वापस लौट आया, अपने को सम्हाल लिया वापस अपनी स्थिति में. वह एक बड़ा अवसर चूक गया। फिर न मालूम वह अवसर कितने दिनों बाद आए! अगर आप ऐसा कोई अवसर चूक गए हों, तो दुबारा जब अवसर आए तो उसे चूके नहीं। उसकी ही तो तलाश है, उस मिटने की ही हम खोज कर रहे हैं।

लेकिन अहंकार आखिरी समय तक पकड़ता है। और डर, भय मन में पैदा हो जाता है कि मैं मिट तो न जाऊंगा,मै मर तो न जाऊंगा। उस भय की झंकार में हम वापस अपने शरीर में खड़े हो जाते हैं, फिर से पकड़ लेते हैं किनारे को जोर से कि नदी खो न जाए।

परमात्मा भयस्वरूप है, क्योंकि परमात्मा महामृत्यु है। लेकिन जितनी बड़ी मृत्यु, उतने बड़े जीवन का उससे जन्म होता है। छोटी मृत्यु से छोटा जीवन पैदा होता है।

जिस मृत्यु को हम जानते हैं, वह छोटी मृत्यु है, केवल शरीर मरता है। और तो मन भी बचता है, अहंकार भी बचता है, सब बचता है। और बड़ी मृत्यु हो, तो और बड़े जीवन का जन्म है। जितनी मिटने की तैयारी, उतनी ही मात्रा में पुनर्जीवन उपलब्ध होता है। जो पूरी तरह मिटने को राजी है, उसे परिपूर्ण जीवन उपलब्ध हो जाता है।

जीसस ने कहा है, जब तक तुम अपने को खोओगे नहीं, तब तक तुम उसे नहीं पा सकते हो। और जो अपने को बचाने की कोशिश करेगा, वह खो जाएगा। और जो अपने को खो देगा, वही केवल बच रहता है। जीसस ने बार—बार बीज का उदाहरण लिया है और कहा है, बीज जैसे मिट्टी में खो जाता है तो अंकुरित होता है, ऐसे ही तुम जिस दिन विराट में खो जाओगे, महाजीवन तुम्हारे भीतर जन्मेगा।

उस जीवन का फिर कोई अंत नहीं है। जिसका अंत हो सकता था, उसे तो तुमने खो ही दिया। जो मिट सकता था, उमे तुमने खुद ही छोड़ दिया। सिर्फ वही बच रहा है अब, जो मिट नहीं सकता है। सिर्फ वही बच रहा है, जिसे खोने का कोई उपाय ही नहीं है।

इसीलिए परमात्मा भयस्वरूप मालूम पड़ता है। लेकिन वह भय हमारा प्रोजेक्यान है। और चूंकि ये वचन मृत्यु के देवता ने कहे हैं, इसलिए ये वचन अधूरे होंगे ही। अगर कोई जन्म का देवता हो तो वह कहेगा, परमात्मा प्रेमस्वरूप है।

इसे भी थोड़ा समझ लें।

अगर कोई जन्म का देवता हो तो वह कहेगा, परमात्मा प्रेमस्वरूप है। क्योंकि जन्म की प्रक्रिया प्रेम से है; जन्म का अकुरण प्रेम से है। जीवन की शुरुआत प्रेम से है। जीवन की पहली पुलक, पहली स्फुरणा प्रेम से है। अगर कोई प्रेम का देवता हो तो वह आधी ही बात जानेगा। वह कहेगा, परमात्मा प्रेमस्वरूप है। अगर नचिकेता ने यम से न पूछकर ब्रह्मा से पूछा होता, जो कि जन्म का देवता है, सृष्टि का देवता है, तो परमात्मा भयस्वरूप है, ऐसा वचन नहीं आता;तो परमात्मा होता प्रेमस्वरूप। लेकिन वह भी आधी ही बात होती।

मृत्यु के देवता को सिर्फ मृत्यु का ही अनुभव है। जीवन की पहली झलक का नहीं, आखिरी बुझते हुए दीए का ही अनुभव है। और मृत्यु के देवता ने जब भी किसी को बुझते देखा है, तो उसे भय से कंपते देखा होगा, स्वभावत:। अरबों—खरबों लोग मरे हैं, मृत्यु का देवता उन सबका गवाह है। जिसको भी मिटते देखा है, उसको भय से कंपते देखा है। तो मृत्यु के देवता की यह गवाही अर्थपूर्ण है, लेकिन अधूरी।

और मृत्यु का देवता जानता है कि परमात्मा तो महामृत्यु है। जब मेरी मौजूदगी में लोग कंपते हैं और भयभीत होते हैं, और मरना नहीं चाहते और मिटना नहीं चाहते, और हर कोशिश करते हैं बचे रहने की। सब खो जाए, किसी तरह बचे रहें। अंधा हो आदमी, लंगड़ा हो, लूला हो, कोढ़ी हो, का हो, बीमार हो, सड़क पर पड़ा हो, खाने को न हो, कुछ भी न हो, लेकिन तो भी आदमी बचना चाहता है। मरने के लिए कोई भी राजी नहीं होना चाहता। सब खो जाए, सिर्फ श्वास ही चलती रहे। और महानर्क हो, दुख हो, पीड़ा हो, तो भी कोई मरने को राजी नहीं है।

मृत्यु के देवता का यह अनुभव स्वभावत: उसे यह निष्कर्ष देता है कि परमात्मा तो और भी भयस्वरूप होगा। क्योंकि वहां तो सभी कुछ मिट जाता है। वहा तो शून्य ही रह जाता है। जहां आप थे, वहां सिर्फ एक रिक्तता रह जाती है। वह आपको पूरी तरह बहाकर ले जाता है।

मृत्यु के देवता का वचन है, इसलिए अधूरा है। जन्म का देवता कहेगा, तो भी अधूरा। लेकिन जिन्होंने जन्म और मृत्यु दोनों को जाना है—बुद्धपुरुषों ने—जिन्होंने जन्म और मृत्यु दोनों को जाना है, वे दो बातें कहेंगे। या तो वे कहेंगे कि परमात्मा दोनों है—प्रेमस्वरूप और भयस्वरूप। या वे कहेंगे कि परमात्मा दोनों नहीं है, हमारी दृष्टि के अनुसार हमें प्रतीत होता है, या तो प्रेमस्वरूप, या भयस्वरूप।

दूसरी बात सत्य के निकटतम है। परमात्मा तटस्थ है। हम उसमें वही देख लेते हैं, जो हमारी मनोदशा होती है। हमारा ही मन, हमारी ही वृत्तियां, हमारे ही विचार, हमारी ही समझ उसको रंग देती है। परमात्मा रंगहीन है, आकारहीन है। न तो भयस्वरूप है और न प्रेमस्वरूप है; तटस्थ है। अगर हम डरते हैं मिटने से, तो भयस्वरूप मालूम होगा। अगर हम तैयार हैं मिटने को, तो प्रेमस्वरूप मालूम होगा।

जीसस को परमात्मा प्रेमस्वरूप मालूम पड़ा। और जीसस ने परमात्मा की परिभाषा में कहा कि वह प्रेम है,क्योंकि जीसस मिटने को तैयार थे। सूली 'पर हमने अनुभव कर लिया कि जीसस मिटने से जरा भी भयभीत नहीं थे। वे सूली पर मिटने को इतनी आसानी से तैयार थे कि क्रास उनका प्रतीक हो गया। सूली उनकी प्रतीक हो गई। मरने की ऐसी तैयारी थी कि जीसस का प्रतीक सूली हो गई। मृत्यु जैसे स्वीकृत थी, सहज थी। इसलिए जीसस को अगर परमात्मा प्रेमस्वरूप मालूम पड़ा, तो बिलकुल स्वाभाविक है।

आपका परमात्मा आपके मन का प्रतिबिंब होगा। आपका परमात्मा आपकी ही निर्मिति है। उसका प्रत्यय, उसकी धारणा आप ही करेंगे।

मेरे देखे परमात्मा दोनों नहीं है। परमात्मा तो एक विराट, निराकार, शून्य जैसा अस्तित्व है। उसमें हम अपने को देख लेते हैं। इसलिए जैसे —जैसे आदमी विकसित होता है, उसका परमात्मा विकसित होता चला जाता है।

परमात्मा विकसित नहीं होता, परमात्मा तो जैसा है, है। लेकिन आदमी विकसित होता है, तो परमात्मा विकसित होता चला जाता है—उसकी धारणा, हमारा प्रत्यय, हमारा कनसेप्ट विकसित होता चला जाता है। अलग—अलग जातियां परमात्मा की अलग—अलग धारणा करती हैं। अलग— अलग युग परमात्मा की अलग— अलग धारणा करते हैं। अलग—अलग व्यक्ति परमात्मा की अलग—अलग प्रतीति, प्रतिमा निर्मित करते हैं।

परमात्मा एक है, लेकिन सभी उसे अलग— अलग अर्थों में देखेंगे। और जब तक आपको परमात्मा में कोई भी अर्थ दिखाई पड़ता रहे, तब तक आप समझना कि अभी परमात्मा नहीं देखा, अभी आप अपने को ही परमात्मा में झांक रहे हैं।

जिस दिन आपको परमात्मा में कोई भी अर्थ न दिखाई पड़े; जिस दिन परमात्मा में कोई प्रतिबिंब न बने, दर्पण बिलकुल कोरा रह जाए; कोई भी दिखाई न पड़े वहां, परम शून्य रह जाए—उस दिन आप जानना कि जो आपने जाना वह अब सत्य है। वह मन का आरोपण नहीं है।

इसलिए बुद्ध उस परम सत्य को शून्य कहते हैं। और जब तक वह परम सत्य शून्य की तरह प्रगट न हो जाए,तब तक हम अपने को उस पर आरोपित करते चले जाते हैं। यह स्वाभाविक है मनुष्य के लिए। यम के लिए भी स्वाभाविक है।

परमात्मा तटस्थ ऊर्जा है, किसी तरफ झुकी हुई नहीं। परमात्मा का होना कोई भी चुनाव से भरा हुआ नहीं है,चुनावरहित है। कोई पक्ष नहीं है उसका। उस अवस्था में किसी तरह का रंग—रूप नहीं है। इसलिए जो भी हम उसमें देखें, इसे स्मरण रखना कि वह देखना हम पर निर्भर है।

जिस दिन हमें वहां कुछ भी न दिखाई पड़े, एक विराट कोरापन रह जाए—न कृष्ण बनें वहां, न राम बनें वहा, न बुद्ध की प्रतिमा उभरे, न जीसस वहा दिखाई पड़े; न वहा भय, न वहां प्रेम; वहा कुछ भी न दिखाई पड़े। यह उसी दिन होगा जिस दिन आपका मन इतना निर्विकार हो जाएगा कि उस मन से कोई भी विकार परमात्मा पर प्रतिफलित न हो। जिस दिन आप भीतर शून्य हो जाएंगे, उस दिन परमात्मा शून्य हो जाएगा। मैं आपसे यह कहना चाहता हूं कि जैसे आप हैं, वैसा ही आपका परमात्मा होगा। यह यम का वक्तव्य है, अधूरा है। ब्रह्मा का वक्तव्य होगा, वह भी अधूरा होगा। दोनों एक—एक छोर से परिचित हैं। एक जन्म के छोर से, एक मृत्यु के छोर से।

लेकिन अगर आप, जो कि दोनों हैं, जन्म भी और मृत्यु भी, जन्मे भी हैं और मरेंगे भी, जो दोनों छोर को छू रहे हैं, स्पर्श कर रहे हैं, अगर आप सजग हो जाएं, तो आप पाएंगे कि परमात्मा तटस्थ है। वह न प्रेमस्वरूप है और न भयस्वरूप है।

अब हम सूत्र में प्रवेश करें।

जैसे दर्पण में सामने आई हुई वस्तु दिखती है वैसे ही शुद्ध अंतःकरण में ब्रह्म के दर्शन होते हैं।

शुद्ध अंतःकरण में ब्रह्म के दर्शन होते हैं। जितना शुद्ध होगा अंतःकरण, उतना ही ब्रह्म का दर्शन भी शुद्ध होगा। परम शुद्ध होगा अंतःकरण, तो परम शुद्ध दर्शन होगा। दर्पण विकृत होगा, तो उतने ही विकार प्रतिबिंब में भी हो जाएंगे। दर्पण टूटा—फूटा होगा, तो उतनी ही टूट—फूट प्रतिबिंब में भी हो जाएगी। दर्पण आड़ा—तिरछा होगा, तो वही प्रतिबिंब में भी प्रवेश कर जाएगा।

दर्पण का परम शुद्ध होना, अंतःकरण का परम शुद्ध होना, ब्रह्म के शुद्ध दर्शन के लिए अनिवार्य है। लेकिन ब्रह्म के दर्शन बहुत तरह से हो सकते हैं। क्योंकि दर्पण बहुत स्थितियों में हो सकता है। ये दर्पण की स्थितियां हैं।

जैसे स्वप्न में वस्तुएं स्पष्ट दिखलाई देती हैं उसी प्रकार पितृलोक में परमेश्वर दिखता है।

ये लोक प्रतीक हैं अलग—अलग स्थितियों के। पहली तो बात, अगर शुद्ध अंतःकरण हो तो यहीं पृथ्वीलोक पर परमात्मा के सीधे दर्शन हो जाते हैं। अगर अंतःकरण बहुत शुद्ध न हो, तो शरीर के छूटने पर जो लोक है, पितृलोक,जहा देहरहित आत्माओं का वास है, वहां भी परमात्मा के दर्शन होते हैं। शरीर के छूट जाने से, शरीर के कारण जो विकृतियां आती हैं मन पर, वे वहां नहीं होतीं। वहां जो परमात्मा के दर्शन होते हैं, वे इतने स्पष्ट होते हैं, जैसे स्वप्न स्पष्ट होता है।

जैसे जल में वस्तु के रूप की झलक पड़ती है उसी तरह गंधर्वलोक में परमात्मा की झलक सी पड़ती है लेकिन स्वर्ग में, गंधर्वों के लोक में, जैसे जल में झलक पड़ती है किसी वस्तु की, हल्की सी झलक, एक आभास, ऐसा स्वर्गलोक में भी आभास भर मालूम होता है।

स्वर्गलोक सुख की उत्तेजना से भरा हुआ लोक है। दुख एक उत्तेजना है, यह हम जानते हैं, सुख भी एक उत्तेजना है, यह हम नहीं जानते हैं। दुख में भी मन विचलित होकर कंपित हो जाता है, सुख में भी मन विचलित होकर कंपित हो जाता है। इसलिए जो लोग आनंद की तलाश में हैं, वे उत्तेजना से मुक्त होना चाहते हैं—वह चाहे दुख की हो और चाहे सुख की हो।

आपको खयाल है कि सुख में भी आप कैप जाते हैं? यह बड़े आश्चर्य की बात है। मेडिकल साइंस का कथन है कि दुख में हृदय का दौरा कम पड़ता है, सुख में ज्यादा पड़ता है। और हार्टफेल के, हृदय—अवरुद्ध हो जाने की घटनाएं दुख में नहीं घटतीं, सुख में घटती हैं। होना नहीं चाहिए ऐसा। उलटा है यह। होना तो यह चाहिए कि दुखी आदमी मर जाए एकदम घबड़ाकर, लेकिन दुखी आदमी नहीं मरता। सुखी आदमी सुख की चोट में मर जाता है।

इसलिए जितना मुल्क सुखी होता जाता है, उतना हृदय—रोग बढ़ता चला जाता है। गरीब और दुखी मुल्कों में हृदय—रहो नहीं होता। आदिवासियों को हृदय—रोग का पता ही नहीं है। दुख बहुत है, लेकिन हृदय—रोग का पता नहीं है। हृदय—रोग के लिए संपन्न होना जरूरी है, सुखी होना जरूरी है।

चिकित्साशास्त्र का कहना है कि यह बड़ी अनूठी बात है कि सुख में आदमी का हृदय इतना कैप जाता है कि टूट जातो है। दुख में इतना नहीं कंपता। दुख को सहना आसान है, सुख को सहना बहुत मुश्किल है। दुख से तो बहुत लोग बचकर निकल आते हैं। सुख से बचकर निकलने में बड़ी कुशलता चाहिए, नहीं तो आदमी टूट जाता है।

आपको भी खयाल होगा कि अगर सुख की कोई अचानक घटना घट जाए, तो कैसा आघात पहुंचता है। अभी कोई खबर आकर दे दे कि पांच लाख की लाटरी मिल गई। डर यह है कि लाटरी लेने तक आप पहुंच नहीं पाएंगे। एकदम कैप जाएंगे, इतना ज्यादा हो जाएगा। लेकिन पांच लाख रुपये आपके खो जाएं, तो भी आप कपेंगे, लेकिन इतने नहीं। पांच लाख मिलने से जितना हृदय को धक्का पहुंचने वाला है, उतना पांच लाख खोने से नहीं पहुंचता।

सुख एक तरह की तीव्र उत्तेजना है। गंधर्वलोक, जहां सुख की वर्षा हो रही है.। सिर्फ प्रतीक हैं ये लोक। हममें से कई लोग गंधर्वलोक में हैं, यहीं। कई लोग पितृलोक में हैं, यहीं। कई लोग नर्कलोक में हैं, यहीं। कई लोग ब्रह्मलोक में हैं, यहीं। ये लोक भौगोलिक स्थितियां कम, मनोवैज्ञानिक अवस्थाएं ज्यादा हैं।

जहां सुख बहुत है, वहां परमात्मा की कभी—कभी आभास की स्थिति भर हो सकती है। क्योंकि दर्पण हमेशा कंपता रहेगा, उत्तेजित रहेगा। इसे आप ऐसा भी समझें : इसीलिए सुखी लोग परमात्मा को भूल जाते हैं। जब आप सुख में होते हैं, तब प्रार्थना, पूजा, मंदिर, सब विस्मृत हो जाते हैं। दुख मैं होते हैं, तब शायद याद भी आ जाए, सुख में याद भी नहीं आती। दुख से आदमी छूटना चाहता है, तो परमात्मा की तलाश करता है। सुख से छूटना ही नहीं चाहता, तो परमात्मा की तलाश का सवाल क्या है?

जुन्नैद एक सूफी फकीर हुआ। कभी कोई बीमारी, कभी कोई और बीमारी, कभी फिर कोई और बीमारी उसे पकड़े रहती थी। उसके शिष्यों ने कहा, जुन्नैद, तुम और बीमार रहो! तुम तो परमात्मा को इशारा भी कर दो कि मैं बीमार नहीं होना चाहता, तो बात खतम हो गई। जुन्नैद ने कहा कि मैं उससे यह प्रार्थना ही करता रहता हूं कि तू मुझे एकाध न एकाध बीमारी चलाए रख। तो शिष्यों ने कहा, तुम पागल तो नहीं हो गए हो? यह भी कोई बात हुई!

जुन्नैद ने कहा, बीमारी रहती है तो मैं उसका स्मरण कर पाता हूं। बीमारी दुख बनी रहती है; उस दुख में मैं उसकी प्रार्थना कर पाता हूं। एक बार ऐसा हुआ था कि बहुत दिन तक मैं बीमार नहीं रहा था, तो मैं उसे भूल गया था। तब से मेरी यही प्रार्थना है कि तू मुझे दुख देते रहना।

दुख में तो उसकी स्मृति भी आ जाती है, सुख में उसकी स्मृति खो जाती है। सुख में कभी—कभी उसका कोई आभास मिल जाए तो मिल जाए, जैसे जल में पड़ी हुई कोई झलक।

लेकिन अगर कोई व्यक्ति विदेह हो जाए, जिसको पितृलोक कह रहा है यम...। विदेह का मतलब जरूरी नहीं है कि आपकी देह छूट ही जाए; जरूरी इतना है कि आपको देह का स्मरण न रहे। इसलिए हमने जनक को विदेह कहा है,जीते—जी। देह का कोई स्मरण नहीं है, देह की कोई प्रतीति नहीं है। जैसे देह है या नहीं है, कोई फर्क नहीं है; देह भूल गई है।

तो ऐसी विदेह अवस्था में उसकी झलक इतनी साफ होती है, जैसे स्वप्न में चीजें साफ होती हैं। लेकिन स्वप्न में, आंख बंद करके उसके विजन हैं, उसकी प्रतीतिया होती हैं। लेकिन आंख खोलते ही उसकी प्रतीतिया खो जाती हैं। स्वभ जैसी।

और ब्रह्मलोक में तो छाया और धूप की भांति आत्मा और परमात्मा दोनों का स्वरूप पृथक— पृथक स्पष्ट दिखाई' देता है

तो एक विदेह अवस्था है, जहां स्वप्न जैसी स्पष्ट प्रतीति होती है। पर बस, स्वप्न जैसी, आंख खोलते ही खो जाती है। संसार के दिखाई पड़ते ही धूमिल हो जाती है।

एक दूसरी अवस्था है, जहां सुख की उत्तेजनाओं से भरा हुआ चित्त है, वहां सिर्फ कभी उसकी आभास, भनक, दूर से आती हुई ध्वनि की तरह सुनाई पड़ती है। या पानी में पड़े हुए प्रतिबिंब की तरह। और पानी तो प्रतिपल कंप रहा है। प्रतिबिंब कभी भी थिर नहीं हो पाता।

तीसरी ब्रह्मलोक की अवस्था है। उस अवस्था का नाम ब्रह्मलोक है, जब आप सब भांति शुद्ध हैं अंतःकरण पूरी तरह शुद्ध है, ब्रह्म जैसे हो गए हैं। कोई विकार नहीं है, वहां चीजें बिलकुल दो और दो की तरह साफ हो जाती हैं। वहां स्वप्न की तरह साफ नहीं होतीं, वहां जागृति की तरह साफ हो जाती हैं, जैसे जागने में सब साफ दिखाई पड़ रहा हो। यह जो अवस्था है ब्रह्मलोक की, अंतःकरण की शुद्धता की आखिरी ऊंचाई है।

यह अंतःकरण क्या है, इसे हम थोड़ा समझ लें। क्योंकि जिसे हम अंतःकरण समझते हैं, वह अंतःकरण है ही नहीं। अंतःकरण के साथ बड़ी भूल—चूक जुड़ी हुई है। अंग्रेजी में शब्द है कान्यायिन्स, संस्कृत का शब्द है अंतःकरण।

आप चोरी करने जाते हैं। भीतर से कोई आवाज आती है, चोरी बुरी है, मत करो। इसे हम अंतःकरण कहते हैं। यह अंतःकरण नहीं है, यह स्थूडो कान्यायिन्स है, यह मिथ्या अंतःकरण है। यह समाज के द्वारा सिखाया हुआ है, यह आपका नहीं है। क्योंकि ऐसी जातियां हैं, जो चोरी को पाप नहीं मानतीं। बल्कि ऐसी जातियां हैं, राजस्थान में भी जाटों का समूह है, जो सैकड़ों वर्षों से चोरी को पाप नहीं मानता रहा है। बल्कि पुराने दिनों में जाट युवक की शादी ही नहीं हो सकती थी, जब तक वह दो—चार चोरी नहीं कर ले और सफल न हो जाए। युवक की शादी करते वक्त पूछते थे कि वह कितनी चोरियों में सफल हो चुका! वह उसकी कुशलता का प्रमाण था।

चोरी कुशलता तो है ही। हर कोई नहीं कर सकता। थोड़ी बुद्धि चाहिए। बुद्ध के बस का काम नहीं है। और बुद्धि प्रखर चाहिए। फिर साहस भी चाहिए, भीरु का धंधा नहीं है वह। कमजोर की वहां गति नहीं है। कमजोर तो अपनी ही संपत्ति हाथ में लेते कंपता है। दूसरे की संपत्ति को अपनी की तरह मान लेने के लिए बड़ा कड़ा हृदय चाहिए। अपने ही घर में अंधेरे में चलना मुश्किल हो जाता है, दूसरे के घर में अंधेरे में चलने के लिए कदमों में आंखे चाहिए। और बड़ा निष्कंप हृदय चाहिए कि कंपे नहीं। एक तरह की एकाग्रता भी चाहिए।

चोर बड़ा एकाग्र होता है। उसका मस्तिष्क एक ही बिंदु पर टिका रहता है। अगर चोर का मन बहुत ज्यादा यहां—वहां भटके, तो मुसीबत में पड़ जाएगा। एक लक्ष्य और सारी प्राण—ऊर्जा उसी तरफ बहती है। तो चोरी सभी समाजों में बुरी नहीं रही है। तो जिस समाज में चोरी बुरी नहीं है, उस समाज में चोरी करते वक्त कभी भी यह खयाल पैदा नहीं होगा, कोई अंतःकरण नहीं कहेगा कि रुको।

हिंदू है। एक पत्नी के रहते दूसरा विवाह करे तो भीतर से अंतःकरण कहता है कि पाप कर रहे हो, बुरा कर रहे हो। मुसलमान चार को करे, कोई दिक्कत नहीं मालूम होती। कुरान आशा देती है : चार विवाह कर सकते हो। मुहम्मद ने खुद नौ विवाह किए। जरा भी चिंता नहीं होती। पर इससे आप ऐसा मत सोचना कि मुहम्मद ने बहुत बुरा किया।

अपने कृष्ण की कथा आप स्मरण रखना। मुहम्मद तो कुछ भी नहीं हैँ, उस हिसाब में। लेकिन क्या की हमने कभी निंदा नहीं की है। सोलह हजार रानियों की कथा है। यह हमें कहानी मालूम पड़ सकती है कि सोलह हजार! एक स्त्री इतना उपद्रव खड़ा कर सकती है! कृष्ण बड़ी हिम्मत के आदमी रहे होंगे! लेकिन उस समाज में कोई अस्वीकृति नहीं थी। सम्राट सैकड़ों विवाह करते ही थे।

अभी निजाम हैदराबाद की पांच सौ पत्नियां थीं। जिस दिन भारत आजाद हुआ, उस दिन पांच सौ पत्नियां थीं। बीसवीं सदी में पांच सौ पत्नियां हो सकती हैं, तो कोई ज्यादा बड़ी संख्या नहीं है, सिर्फ बत्तीस गुनी, सोलह हजार। कोई बहुत बड़ा मामला नहीं है। कहानी बनाने की जरूरत नहीं है। यह हो सकता है। लेकिन कोई अड़चन नहीं थी। समाज की धारणा ही यही थी कि सम्राट की पत्नियां ज्यादा होंगी ही।

असल में जितना बड़ा सम्राट, उसका प्रमाण ही एक था कि कितनी पत्नियां! वह उसकी संपदा का गणित था कि कितनी पत्नियां! गरीब आदमी एक ही पत्नी नहीं रख सकता। पत्नी रखना खर्चीला मामला है। सभी एफोर्ड नहीं भी कर सकते। तो जितना बड़ा सम्राट, उतनी पत्नियां, यह स्वीकृत मान्यता थी।

तो कोई अड़चन नहीं होती थी किसी सम्राट को हजारों शादियां कर लेने में। कोई भाव भी नहीं उठता था। अंतःकरण कभी नहीं कहेगा कि यह तुम क्या कर रहे हो। या इसमें कुछ पाप है। इस बात पर निर्भर करता है कि समाज ने क्या सिखाया है।

जुआ स्वीकृत था, तो युधिष्ठिर जुआ खेलते रहे। लेकिन हमने कभी उनको धर्मराज के पद से नीचे नहीं उतारा। आज अधार्मिक आदमी भी जुआ खेलता है तो अंतःकरण में चोट पड़ती है। युधिष्ठिर को जरा भी न पड़ी! और जुआ कोई साधारण नहीं था, सब तो लगाया ही, पत्नी भी लगा दी। अभी आप जरा पत्नी को लगाकर देखें। छाती साथ नहीं देगी, अंतःकरण इनकार करेगा। लेकिन युधिष्ठिर को बिलकुल भी नहीं किया। और युधिष्ठिर के पीछे लिखने वालों ने कभी भी एतराज नहीं उठाया। उनके धर्मराज होने में कोई शंका पैदा नहीं हुई।

समाज को स्वीकार था, जुआ एक खेल था। और जितने बड़े खिलाड़ी थे, उतने बड़े दाव थे। युधिष्ठिर बड़े खिलाड़ी थे, पत्नी को भी दाव पर लगाने की हिम्मत उन्होंने जुटाई। इसमें कहीं कोई नीति—निषेध नहीं था। इसमें कोई कठिनाई नहीं आ रही थी।

द्रौपदी के पांच पति हैं। लेकिन हमने द्रौपदी को पांच महाकन्याओं में गिना है। जिन्होंने पांच महाकन्याओं में गिना, उनकी मान्यता और रही होगी। हम अगर आज एक स्त्री के पांच पति हों तो उसे कहां रखेंगे? उसे हम पांच प्रात: स्मरणीय कन्याओं में नहीं गिन सकते। लेकिन जिन्होंने गिना है, उन्हें कोई अड़चन न थी। पांच पति हो सकते थे। पांच पत्नियां हो सकती थीं, पांच पति हो सकते थे। बहुपत्नी, बहुपति प्रथा स्वीकृत थी, तो अंतःकरण में कोई चोट नहीं थी।

यह जो अंतःकरण है, यह समाज पर निर्भर है। यह जो अंतःकरण है, यह वास्तविक अंतःकरण नहीं है, यह समाज के द्वारा आरोपित है, प्लांटेड है। यह ऊपर से थोप दिया गया है। इस अंतःकरण की शुद्धि से परमात्मा का कोई संबंध नहीं। जिस अंतःकरण की बात उपनिषद कह रहे हैं, उसका अर्थ है..।

हमारे पास जितनी इंद्रियां हैं वे बहिर्करण हैं, उनके द्वारा बाहर का ज्ञान होता है। अंतःकरण वह है, जिसके द्वारा भीतर का ज्ञान होता है। जिसके द्वारा चेतना भीतर सजग होती है। इस भीतर के शान वाली स्थिति को, जिसको हम विवेक कह रहे हैं, प्रज्ञा कह रहे हैं, उसी का एक नाम अंतःकरण है।

इस भीतर की प्रज्ञा को निखारने की जो व्यवस्था है, वह समाज के अंतःकरण के अनुकूल चलने से नहीं उपलब्ध होने वाली है। न ही प्रतिकूल चलने से उपलब्ध होने वाली है। इसका यह मतलब नहीं है कि आप समाज जो कहता है, उसको इनकार करके व्यर्थ उपद्रव में पड़े। उसकी भी कोई जरूरत नहीं है। वह एक समझौता है। वह समाज में जीने की एक व्यवस्था है।

जहां इतने लोग एक बात को मानकर चल रहे हैं, वहां चुपचाप उनकी बात मान लेने से कम उपद्रव होता है। और आप अपने भीतर की यात्रा पर आसानी से जा सकते हैं। अन्यथा व्यर्थ की छोटी—छोटी बातो में उलझाव खड़ा हो जाएगा और बाहर अटकाव हो जाएगा।

अगर साधुपुरुषों ने समाज की मान्यता स्वीकार की है, तो इसलिए नहीं कि वह ठीक है, बल्कि इसलिए कि उससे शाति में जाना आसान है। इस बात को ठीक से समझ लें। अगर साधुपुरुषों ने समाज की सारी व्यवस्था स्वीकार कर ली, तो इसलिए नहीं कि वह बिलकुल ठीक है। कोई समाज की व्यवस्था बिलकुल ठीक नहीं है। और बिलकुल ठीक समाज की व्यवस्था हो भी नहीं सकती। क्योंकि जब तक सारे व्यक्ति ठीक न हों, तो उनके जोड़ के ठीक होने का कोई उपाय नहीं है।

समाज तो अनिवार्यरूप से गलत है और गलत रहेगा। बस, कम गलत होता जाए इतनी ही आशा करनी काफी है। केवल व्यक्ति ही पूरा ठीक हो सकता है, समाज तो भीड़ है। और जैसे पानी अपना तल बना लेता है, ऐसे ही भीड़ भी अपना तल बना लेती है। भीड़ हमेशा अपने निम्नतम व्यक्ति के तल पर उतर जाती है।

समाज की धारणाएं सही हैं या गलत, यह महत्वपूर्ण नहीं है। साधुपुरुष उनको स्वीकार कर लेता है, सिर्फ इसलिए ताकि बाहर कोई उपद्रव खड़ा न हो और वह भीतर की यात्रा पर सुगमता से जा सके।

लेकिन यह अंतःकरण जीवन की चरम बात नहीं है। अंतःकरण तो भीतर की उस चेतना शक्ति का नाम है,जिससे हम बाहर नहीं देखते बल्कि भीतर देखने में समर्थ हो जाते हैं।

आप आंख बंद करते हैं, तो भीतर अंधेरा हो जाता है। उस अंधेरे में भी कोई जानता हुआ मालूम पड़ता है। आप कान बंद कर लें, तो भीतर सन्नाटे की आवाज आने लगती है। लेकिन उस सन्नाटे की आवाज में भी कोई सुनता हुआ मालूम पड़ता है।

यह जो भीतर जानता हुआ, सुनता, देखता हुआ मालूम पड़ता है, यह आपका अंतःकरण है। और इसको जितना आप प्रगाढ़ करते जाएं.। पहले तो बहुत धीमी झलक उसकी मिलेगी। क्योंकि हम बाहर देखने के इतने आदी हो गए हैं कि आंखे हमारी बाहर के लिए नियोजित हो गई हैं। अचानक भीतर आंख बंद करते हैं तो कुछ दिखाई नहीं पड़ता।

यह ठीक वैसे ही है, जैसे आप सूरज की रोशनी से एकदम अंधेरे कमरे में आ जाएं तो आपको कुछ दिखाई नहीं पडता। लेकिन थोड़ा बैठें। थोड़ी ही देर में आंखे अपने फोकस को बदल लेती हैं। वह कमरे के लिए एडजस्ट होती हैं,समायोजित होती हैं। फिर जितना अंधेरा दिखाई पड़ता था, उससे कम अंधेरा दिखाई पड़ता है। फिर आप बैठे ही रहें,चुपचाप कमरे के साथ एक होते जाएं। थोड़ी देर में कमरा प्रकाशित मालूम होने लगता है। अंधेरे से अंधेरे कमरे में भी अगर आप राजी होकर बैठें, तो थोड़ी देर में थोड़ा— थोड़ा दिखाई पड़ना शुरू हो जाता है। लेकिन हम अपने भीतर के अंधेरे कमरे में कभी बैठते ही नहीं। कभी थोड़ी—बहुत आंख बंद करते है,।

मेरे पास लोग आते हैं, वे कहते हैं कि क्या आप कहते हैं भीतर देखें, भीतर देखें! आंख बंद करते हैं, वहां तो कुछ दिखाई नहीं पड़ता।

आप जन्मों—जन्मों से बाहर देख रहे हैं। अनंत—अनंत काल से बाहर देख रहे हैं। इतने काल के बाद जब आप भीतर जाएंगे, तो अंधेरा तो दिखाइएए पड़ेगा। इसका यह मतलब नहीं है कि वहा अंधेरा है। आप जिस रोशनी को देखने के आदी हो गए हैं, वह रोशनी वहा नहीं है। वहां और तरह की रोशनी है। उस और तरह की रोशनी के लिए थोड़ा धीरज रखना जरूरी है।

इतना ही एक आदमी कर ले कि रोज एक घंटा आंख बंद करके बैठ जाए और भीतर देखता रहे, चाहे कुछ दिखे और चाहे न दिखे। तीन महीने के भीतर पाएगा कि भीतर रोशनी मालूम पड़ने लगी। सिर्फ एक घंटा। इतनी प्रतीक्षा ही करे