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क्या रहस्य है परमात्मा की खोज का ?


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परमात्मा कहां है, खोजें तो कहां खोजें? जा कि चूके! खोजने में ही पहली भूल हो जाती है। खोजने का अर्थ है: यह मान ही लिया कि परमात्मा खो गया है। परमात्मा कहीं खो सकता है? जो खो जाये वह परमात्मा होगा? खोजने चले कि चूक की शुरुआत हुई। जितना खोजोगे उतना खो जायेगा। खोजने से कभी किसी ने परमात्मा पाया नहीं है। यही तो उदघोषणा है सरहपा के सहज-योग की। देखा तुमने, सरहपा ने परमात्मा का नाम भी उल्लेख नहीं किया! नाम उल्लेख करने तक में भूल हो जाती है, क्योंकि नाम उल्लेख किया कि लोग चले खोजने। परमात्मा वह है जो सब खोज छूट जाने पर मिलता है, खोज मात्र छूट जाये तो मिलता है। क्योंकि खोज का अर्थ हुआ: चित्त तना हुआ है। खोज का अर्थ है: वासना। खोज का अर्थ है: इच्छा। खोज का अर्थ है: अभी नहीं है, कभी होगा। खोज में समय आ गया। मैं यहां हूं और परमात्मा कहीं और है--खोज में फासला आ गया, अंतराल आ गया। परमात्मा वहीं है जहां तुम हो। जहां परमात्मा है वहीं तुम हो। हम परमात्मा के सागर की मछलियां हैं। मछली सागर को खोजने निकलेगी तो बड़ी मुश्किल में पड़ जायेगी। कैसे खोज पायेगी? खोजना नहीं है परमात्मा को--जीना है। और यही सहज-योग की अदभुत क्रांति है। परमात्मा है ही--पियो! परमात्मा है ही नाचो! परमात्मा में ही तुम हो, तुम्हारी श्वास-श्वास में रमा है--और तुम पूछते हो कि परमात्मा कहां है? कहां नहीं है? ऐसा कोई स्थान खोज सकते हो जहां परमात्मा न हो? जो सर्वव्यापक है उसका ही नाम परमात्मा है। दोहराते हो तोतों की तरह कि परमात्मा सर्वव्यापक है और फिर भी पूछते हो कि परमात्मा कहां है! सर्वव्यापक का अर्थ हुआ: वही बाहर, वही भीतर। सर्वव्यापक का अर्थ हुआ: वही बोलने वाले में, वही सुनने वाले में। सर्वव्यापक का अर्थ हुआ: जागो तो वही, सोओ तो वही। सर्वव्यापक का अर्थ हुआ: सत्य भी वही, सपना भी वही। ब्रह्म भी वही, माया भी वही। भटको तो भी उसी में भटक रहे हो। उससे बाहर नहीं भटक सकते, उससे बाहर कोई स्थान नहीं है। उससे बाहर जाना भी चाहो तो कोई उपाय नहीं है। जब तुम भ्रांतियों में पड़े हो तब भी तुम उसी में हो, क्योंकि भ्रांतियां भी उसी के सागर में उठी तरंगें हैं। इस बात को जो समझ ले वह सहज हो जाता है। उसकी सब खोज गई। अब कोई तीर्थ-यात्रा नहीं करनी है। अब तो जहां हैं वही तीर्थ है; जैसा है वैसे ही तीर्थ है। और फिर तुम्हें दिखाई पड़ना शुरू होगा। आंखें जब वासना से रहित होंगी, खोज से शून्य होंगी, फिर तुम्हें दिखाई पड़ना शुरू होगा। फिर वृक्षों में, चांदत्तारों में और चांद में ही नहीं झील में बनते चांद के प्रतिबिंब में भी वही, क्योंकि और किसका प्रतिबिंब बनेगा? जाग्रत पुरुष सदा से कहते रहे कि ब्रह्म और माया एक ही हैं। माया उसीकी ही ऊर्जा है, उसीकी ही शक्ति है, उसीकी छाया है। जो माया के विपरीत है उसे ब्रह्म का कोई पता नहीं है। जो माया का शत्रु है उसे ब्रह्म का कभी पता लगेगा भी नहीं। क्योंकि माया में वही रमा है, राम ही रमा है। जिस दिन तुम्हें स्वप्न में भी सत्य की ही झलक, छांह दिखाई पड़ने लगेगी, उसी दिन क्रांति घट जायेगी। मगर तुम हो खोजी। खोजी का अर्थ होता है; चित्त। और जहां चित्त है वहां अड़चन है। खोज से चित्