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क्या रहस्य है परमात्मा की खोज का ?


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परमात्मा कहां है, खोजें तो कहां खोजें? जा कि चूके! खोजने में ही पहली भूल हो जाती है। खोजने का अर्थ है: यह मान ही लिया कि परमात्मा खो गया है। परमात्मा कहीं खो सकता है? जो खो जाये वह परमात्मा होगा? खोजने चले कि चूक की शुरुआत हुई। जितना खोजोगे उतना खो जायेगा। खोजने से कभी किसी ने परमात्मा पाया नहीं है। यही तो उदघोषणा है सरहपा के सहज-योग की। देखा तुमने, सरहपा ने परमात्मा का नाम भी उल्लेख नहीं किया! नाम उल्लेख करने तक में भूल हो जाती है, क्योंकि नाम उल्लेख किया कि लोग चले खोजने। परमात्मा वह है जो सब खोज छूट जाने पर मिलता है, खोज मात्र छूट जाये तो मिलता है। क्योंकि खोज का अर्थ हुआ: चित्त तना हुआ है। खोज का अर्थ है: वासना। खोज का अर्थ है: इच्छा। खोज का अर्थ है: अभी नहीं है, कभी होगा। खोज में समय आ गया। मैं यहां हूं और परमात्मा कहीं और है--खोज में फासला आ गया, अंतराल आ गया। परमात्मा वहीं है जहां तुम हो। जहां परमात्मा है वहीं तुम हो। हम परमात्मा के सागर की मछलियां हैं। मछली सागर को खोजने निकलेगी तो बड़ी मुश्किल में पड़ जायेगी। कैसे खोज पायेगी? खोजना नहीं है परमात्मा को--जीना है। और यही सहज-योग की अदभुत क्रांति है। परमात्मा है ही--पियो! परमात्मा है ही नाचो! परमात्मा में ही तुम हो, तुम्हारी श्वास-श्वास में रमा है--और तुम पूछते हो कि परमात्मा कहां है? कहां नहीं है? ऐसा कोई स्थान खोज सकते हो जहां परमात्मा न हो? जो सर्वव्यापक है उसका ही नाम परमात्मा है। दोहराते हो तोतों की तरह कि परमात्मा सर्वव्यापक है और फिर भी पूछते हो कि परमात्मा कहां है! सर्वव्यापक का अर्थ हुआ: वही बाहर, वही भीतर। सर्वव्यापक का अर्थ हुआ: वही बोलने वाले में, वही सुनने वाले में। सर्वव्यापक का अर्थ हुआ: जागो तो वही, सोओ तो वही। सर्वव्यापक का अर्थ हुआ: सत्य भी वही, सपना भी वही। ब्रह्म भी वही, माया भी वही। भटको तो भी उसी में भटक रहे हो। उससे बाहर नहीं भटक सकते, उससे बाहर कोई स्थान नहीं है। उससे बाहर जाना भी चाहो तो कोई उपाय नहीं है। जब तुम भ्रांतियों में पड़े हो तब भी तुम उसी में हो, क्योंकि भ्रांतियां भी उसी के सागर में उठी तरंगें हैं। इस बात को जो समझ ले वह सहज हो जाता है। उसकी सब खोज गई। अब कोई तीर्थ-यात्रा नहीं करनी है। अब तो जहां हैं वही तीर्थ है; जैसा है वैसे ही तीर्थ है। और फिर तुम्हें दिखाई पड़ना शुरू होगा। आंखें जब वासना से रहित होंगी, खोज से शून्य होंगी, फिर तुम्हें दिखाई पड़ना शुरू होगा। फिर वृक्षों में, चांदत्तारों में और चांद में ही नहीं झील में बनते चांद के प्रतिबिंब में भी वही, क्योंकि और किसका प्रतिबिंब बनेगा? जाग्रत पुरुष सदा से कहते रहे कि ब्रह्म और माया एक ही हैं। माया उसीकी ही ऊर्जा है, उसीकी ही शक्ति है, उसीकी छाया है। जो माया के विपरीत है उसे ब्रह्म का कोई पता नहीं है। जो माया का शत्रु है उसे ब्रह्म का कभी पता लगेगा भी नहीं। क्योंकि माया में वही रमा है, राम ही रमा है। जिस दिन तुम्हें स्वप्न में भी सत्य की ही झलक, छांह दिखाई पड़ने लगेगी, उसी दिन क्रांति घट जायेगी। मगर तुम हो खोजी। खोजी का अर्थ होता है; चित्त। और जहां चित्त है वहां अड़चन है। खोज से चित्त निर्मित होता है--यह पाऊं वह पाऊं, धन पाऊं पद पाऊं। तुम सोचते हो धन और पद को पाने की आकांक्षा अधार्मिक है और परमात्मा को पाने की आकांक्षा धार्मिक हैं? तो तुम भ्रांति में हो, बड़ी भ्रांति में हो। पाने की आकांक्षा मात्र ही चित्त की जन्मदात्री है। क्या तुम पाना चाहते हो, इससे जरा भी भेद नहीं पड़ता। तुम पत्थर पाना चाहते हो कि हीरा, कोई भेद नहीं पड़ता। तुम पृथ्वी पाना चाहते हो कि आकाश, कुछ भेद नहीं पड़ता। तुम काशी जाना चाहते हो कि काबा, कुछ भेद नहीं पड़ता। तुम्हें कुछ पाना है, कहीं जाना है, तो तुम्हारे भीतर उद्विग्नता होगी, तनाव होगा और तुम्हें भविष्य खींचेगा, भविष्य जो कि झूठ है; भविष्य जो कि नहीं है। जो है वह तो अभी है। तुम कहते हो: कल, वहां। और जो है वह है यहां और है अभी। चित्त तनाव है यहां और वहां के बीच। अभी और कभी के बीच जो तनाव है, उसका नाम चित्त है। जिस क्षण तुम्हारे मन में कुछ पाने का खयाल नहीं उठता उसी क्षण मन भी गया। फिर आता है विश्राम, फिर आती है शांति। उसी शांति में दिखाई पड़ता है। था तो तब भी जब दिखाई नहीं पड़ता था। था तब भी, लेकिन अब दिखाई पड़ता है, क्योंकि आंख अब धुएं से भरी नहीं है।

सारा जगत एक आह्लाद, एक उत्सव से भर जाता है, एक नाद से भर जाता है। सुनने को कान चाहिए--और जगत संगीत है। देखने को आंख चाहिए--और जगत सौंदर्य है। गुनने को शांत हृदय चाहिए--और सभी तरफ परमात्मा है। परमात्मा ही परमात्मा है। इस क्षण भी तुम परमात्मा से रत्ती-भर दूर नहीं हो। लेकिन अगर पूछा कि खोजने निकलेंगे, तो चूक शुरू हो गई। फिसले। अब बहुत मुश्किल हो जायेगी, कहां खोजोगे? कैसे खोजोगे? खोजनेवाला चित्त पानेवाला चित्त नहीं है। खोजने-वाला चित्त खोता चला जाता है। कुछ चीजें ऐसी हैं जो बिना खोजे पायी जाती हैं; जिन्हें खोजा कि खोने का उपाय हो जाता है। जैसे नींद, रात नींद न आती हो, क्या करोगे? जो कुछ भी करोगे उससे नींद में बाधा पड़ेगी। अगर कुछ न किया तो नींद आ जायेगी। अगर पड़े ही रहे, प्रतीक्षा करते रहे, कि आये जब आये, तो जरूर आ जायेगी। लेकिन अगर उठे, व्यायाम किया तंत्र-मंत्र पढ़े, दौड़-धूप की, कुछ किया कि फिर नींद मुश्किल हो जायेगी, क्योंकि कृत्य तो बाधा बन जायेगा। नींद तो विश्रांति है। परमात्मा ऐसे ही आता है जैसे नींद आती है। तुम नहीं खोजते परमात्मा को। तुम तो जरा शांत बैठ जाओ तो परमात्मा आ जाये; जैसे आ ही रहा है, मगर तुम्हारी अशांति की पर्त बीच में है और मिलन नहीं हो पाता! उसकी नाव तो तुम्हारे अंधेरे के किनारे लगने को तत्पर है। नाव है या छांह शशि की वह जलधि के नीर पर? कब लगेगी ज्योति की वह नाव तम के तीर पर? वह लगने को ही है, लगना ही चाहती है। तुम्हारे अंधेरे तट पर उसकी नाव लगी ही है, मगर तुम्हारी आंखें दूर, बहुत दूर क्षितिज पर उलझी हैं। तुम उसे परलोक में खोज रहे हो; वह इसी लोक में मौजूद है। तुम उसे मृत्यु के बाद खोज रहे हो; वह जीवन है। और तुम उसे किसी अशरीरी आत्मा में खोज रहे हो; वह पदार्थ भी है और चेतना भी। सभी कुछ वही है। सहज-योग की यह मूलभूत आधारशिला है कि परमात्मा खोजना नहीं है; खो जाने की कला सीखनी है और वह मिल जाता है। और विश्राम में तुम खो जाओगे। तनाव में ही तुम होते हो, इसलिये आदमी तना रहता है। एक तनाव छूटे तो दूसरा पकड़ लेता है। धन की दौड़ छूटे तो पद की, पद की दौड़ छूटे तो धर्म की; मगर कोई न कोई दौड़ जारी रहती है। दौड़ जारी रहे तो मन जीता है। मन ऐसा ही है जैसे साइकिल पर पैडल मारना; जब तक पैडल चलाते रहोगे साइकिल चलती रहेगी, पैडल रुका कि गाड़ी रुकी! मन खोजता ही रहता है। वह कहता है कि कुछ खोजो, कुछ करो, क्या बैठो हो! और जो बैठ गया उसने पा लिया। जरा बैठना सीखो। खोज तो काफी रहे हो जन्मों-जन्मों से और खतरा यही है कि तुम अगर खोजोगे तो तुम्हें मार्गदर्शन देने वाले लोग भी मिल जायेंगे। इस जगत में यह अनिवार्य है। अर्थ-शास्त्र का नियम है कि जिस बात की मांग होती है उसकी पूर्ति करने वाले लोग पैदा हो जाते हैं। तुम मांगो भर, कोई न कोई फैक्ट्री खोल देगा। तुम मांगो भर, कोई न कोई उत्पादक सामान बनाकर तैयार कर देगा। जिस बात की मांग होगी उसकी पूर्ति करनेवाले मिल जायेंगे; उसका बाजार होगा तो बेचनेवाले मिल जायेंगे। तुमने पूछा ईश्वर को कहां खोजें और तुम्हें मिल जायेंगे मार्गदर्शक। उन्हें पता हो या न हो, इससे क्या अंतर पड़ता है? मैंने सुना है, अमरीका में एक दुकान पर ऐसे हेयर-पिन बिकते थे जो अदृश्य...। स्त्रियां तो दीवानी थीं। अदृश्य-हेयर-पिन दिखाई भी न पड़े किसी को और लगा भी है बालों में! कौन स्त्री न चाहेगी अदृश्य हेयर-पिन! भीड़ थी दुकान पर। एक स्त्री ने खरीदा। डब्बी खोली। अब दिखाई तो पड़ते नहीं थे। उसने पूछा कि हैं भी न? उस दुकानदार ने कहा कि अब आप से क्या छिपाना! (परिचित ही महिला थी।) तीन सप्ताह से नहीं हैं, मगर बिक्री जारी है। अदृश्य चीजों की बिक्री बड़ी आसान होती और परमात्मा से ज्यादा अदृश्य क्या? इसलिये सदियों से बिक्री चल रही है। दुकानें हैं, दुकानदार हैं, पंडित-पुरोहित हैं, वे बेच रहे हैं अदृश्य परमात्मा। और चूंकि अदृश्य सामान है, किसी को दिखाई तो पड़ता नहीं, इसलिए कोई झंझट खड़ी कर सकता नहीं। और फिर उसको देने के ढंग भी इस तरह से बनाये गये हैं कि मिलेगा मरने के बाद। अब मरने के बाद कोई लौटता नहीं। इसलिये किसी को मिलता है कि नहीं मिलता, इसका भी कुछ पता चलता नहीं। और फिर आदमी को इतना घबड़ा दिया है कि वह सोचता है कि इंतजाम कुछ कर ही लेना चाहिए।। थोड़ा पुण्य कर लो, थोड़ा दान कर लो। और दान उसीको करना है, उसी पुजारी को, उसी पंडित हो, उसी ब्राह्मण को--जो आश्वासन दे रहा है। पंडित-पुरोहित आश्वासनों पर जीते हैं--उसी तरह जैसे राजनीतिज्ञ आश्वासनों पर जीते हैं। अब तुम देखते हो मजा, हर पांच साल में चुनाव होते हैं। राजनेता आकर आश्वासन देता है और तुम फिर मान लेते हो कि इस बार पूरे होंगे। कभी पूरे नहीं होते। कहीं आश्वासन पूरे करने को दिये जाते हैं? आश्वासन देनेवाले को आश्वासन पूरे करने से कोई प्रयोजन नहीं है; उसे वोट चाहिए। तुम बिना आश्वासन के वोट नहीं देते, तो तुम जैसा आश्वासन चाहो वैसा आश्वासन देने को वह राजी होता है। एक बार वोट तो दो, फिर पांच साल के लिये मामला टला। पांच साल बीतते-बीतते तुम भूल ही जाओगे। जिंदगी की समस्याएं ही इतनी हैं कि कौन आश्वासनों को याद रखता है! पांच साल बाद वह फिर आकर खड़ा हो जायेगा। तुम अपनी मांगों में इस तरह ग्रसित हो कि तुम यह भी नहीं देख पाते कि तुम्हें झूठे आश्वासन दिये जा रहे हैं और कभी पूरे नहीं होते, फिर भी तुम जागते नहीं। मैंने सुना है, एक आदिवासी इलाके में राजनेता चुनाव का प्रचार करने आया था। आदिवासी सीधे-सादे लोग, नंग-धड़ंग, लंगोटी लगाये, मुश्किल से बैठे। मगर इकट्ठे कर लिया था गांव के सरपंच ने सबको तो राजनेता का व्याख्यान सुन रहे थे। राजनेता ने कहा कि भाइयो एवं बहनो! अगर मुझे तुमने वोट दिये तो तुम्हारे गांव में स्कूल खुलवा दूंगा। खूब ताली पिटी। आदिवासियों ने कहा: होया-होया! राजनेता बहुत प्रभावित हुआ। ऐसे तो उसने बहुत जिंदाबाद-मुर्दाबाद की आवाजें सुनी थीं, मगर "होया-होया'...यह बिलकुल नया ही मामला था! और इस भाव से आदिवासियों ने कहा था, ऐसी प्रसन्नता से कि वह समझा कि उसकी बड़ी स्तुति की जा रही है। जोश बढ़ गया राजनेता का, तो उसने कहा कि इतना ही नहीं कि स्कूल खुलवा दूंगा, अस्पताल भी खुलवा दूंगा। तब तो बिलकुल धूम-धड़ाक मच गई। होया-होया! और जोर से। जोश राजनेता का बहुत बढ़ गया। उसने कहा कि ट्रेन भी चलवा दूंगा। फिर तो आदिवासी खड़े होकर ताली बजाकर नाचने लगे--होया-होया! राजनेता की प्रसन्नता का कोई अंत नहीं। जोश इतना आ गया उसे कि उसने मुखिया से कहा गांव के कि जरा मुझे गांव में भ्रमण भी करवा दो, ये बड़े भले लोग हैं और इनकी सब मांगें पूरी कर दी जायेंगी। जो-जो आश्वासन मैंने दिये, पांच साल में तुम देखना, सब पूरे हो जायेंगे। जरा मैं गांव का एक चक्कर लगा लूं। मुखिया उसे लेकर चला। छोटी पगडंडियां, रास्ते तो थे नहीं गांव में, जंगली गांव। पगडंडियों के पास ही लोग मल-मूत्र करते हैं तो मल-मूत्र के ढेर लगे हैं। मुखिया ने कहा कि नेता जी, जरा सम्हलकर चलना, कहीं होया-होया में पैर न पड़ जाये! तब राजनेता को अकल आई कि होया-होया का मतलब क्या है। आदिवासी सीधे-सादे लोग! उनको तुम धोखा न दे सकोगे। वे समझ रहे हैं कि यह स्कूल होया-होया...; अस्पताल और होया-होया; ट्रेन, बिलकुल ही होया-होया। कुछ होनेवाला नहीं है। जब मुखिया ने कहा कि जरा बचकर चलना, नेता जी कहीं होया-होया में पैर न पड़ जाये, तब उसे अकल आई। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। राजनेता झूठे आश्वासनों पर जी रहा है। पंडित-पुरोहित सदियों से झूठे आश्वासन पर जी रहे हैं--स्वर्ग मिलेगा, बैकुंठ मिलेगा, बहिश्त मिलेगी। फिर तुम्हें जो चाहिये हो बैकुंठ में बहिश्त में, सबका तुम्हें इंतजाम कर देता है। जो चाहिये हर चीज मिल जायेगी। मगर मौत के बाद मिलेगा यह सब। तुम भी उससे राजी रहते हो, क्योंकि तुम भी परमात्मा की झंझट अभी नहीं लेना चाहते। तुम भी कहते हो कि अभी तो जो कर रहे हैं, यह पूरा कर लें, मौत के बाद परमात्मा भी मिल जायेगा। यह संसार भी एक हाथ से सम्हाल लें, दूसरा भी दूसरे हाथ से सम्हाल लें। तुम भी यही चाहते हो कि परमात्मा अभी न मिल जाये, क्योंकि अभी मिल जाये तो तुम्हारी जिंदगी बदलेगी। तुम्हें जिंदगी बदलनी ही पड़ेगी। जरा सोचो कि परमात्मा आज मिल जाये तो कैसी अड़चन न आ जायेगी! तुम्हारी सारी योजनायें अस्त-व्यस्त हो जायेंगी। तुमने अब तक जो सब पुल बांध रखे थे सपनों के, धूल-धूसरित हो जायेंगे। तुम्हारे ताश के महल सब गिर जायेंगे। तुम्हारी कागज की नावें डूब जायेंगी। अगर परमात्मा आज मिल जाये तो तुम सोचते हो, कैसी मुसीबत न हो जायेगी! मैं तुमसे पूछता हूं कि अगर परमात्मा आज मिले, अभी मिलता हो, तो तुम ईमानदारी से हृदय पर हाथ रखकर कह सकोगे कि आज और अभी तुम उससे मिलने को राजी हो? तुम कहोगे कि इतने जल्दी नहीं। अभी दुकान भी चलानी है। अभी एक चुनाव भी लड़ना है। अभी बच्चे स्कूल में पढ़ रहे हैं। और अभी-अभी तो मेरी शादी हुई है। आप सिर्फ तरकीब बता दें परमात्मा के मिलने की कि कहां मिलेगा, कब मिलेगा, जब मुझे सुविधा होगी तब मैं खोज लूंगा। इसलिये तुम पूछते हो: परमात्मा कहां है? परमात्मा यहां है! और तुम पूछते हो कहां है! और तुम पूछते हो कि परमात्मा कैसे मिलेगा? परमात्मा मिला हुआ है! तुम कैसे उसे नहीं देख रहे हो, यही आश्चर्य है। तुम कैसे उसकी तरफ पीठ किये खड़े हो, यही आश्चर्य है। मगर तुम्हें भी राहत इसी में है कि फिर कभी मिले तो अच्छा । यह बिबूचन आज ही न आ जाये। और पंडित भी इससे प्रसन्न हैं कि तुम अभी नहीं चाहते, तुम कल चाहते हो। कल तक की सुविधा उसको देते हो, इस बीच वह तुम्हारा शोषण कर लेता है। पंडित का काम भी चलता रहता है, तुम्हारी धार्मिकता भी चलती रहती है और जगत जैसा है वैसा का वैसा बना रहता है, उसमें रत्ती-भर, रंच-मात्र भेद नहीं करना पड़ता। यह बड़ी सुविधापूर्ण व्यवस्था है। पंडित पूजा करता रहता है, मंदिर-मस्जिदों में अजान और घंटनाद होता रहता है, आरती उतारी जाती रहती है और तुम अपने संसार की आपाधापी में लगे रहते हो, सब वैसा ही चलता चला जाता है। और एक मजा और मन में रख लेते हो भीतर ही भीतर कि मरने के बाद परमात्मा मिलेगा, कि इतना पुण्य किया कि इतना दान किया, कि इतने उपवास किये, व्रत किये, कि इतना मंत्र-जाप किया, कि इतनी माला फेरी। परमात्मा भी तय हो गया। न तो कुछ छोड़ना पड़ा, न कुछ परिवर्तित होना पड?ा, न किसी आग से गुजरना पड़ा। और पंडित ने तुम्हें सुविधा जुटा दी, उसने तुम्हें कल का आश्वासन दे दिया कि जरूर मिलेगा, कि तुम देखो जनेऊ पहनते हो न, जरूर मिलेगा; चुटइया बढ़ा रखी है न, जरूर मिलेगा; तिलक लगाते हो न, जरूर मिलेगा। उसने सस्ते आश्वासन दे दिये और तुम सस्ते आश्वासन से राजी हो गये। न तुम पाना चाहते हो न उसकी देने की क्षमता है। परमात्मा को कोई दे सकता है? और जिसे पाना हो उसे क्षण-भर रुकने की आवश्यकता है? अभी आंख खोलो, इसी क्षण शांत हो जाओ--और फिर वही है। दिशाएं पखवाज, स्वर आकाश, गाता काल है, चंद्र-रवि की वेणु-वीणा नखत के मंजीर पर! फिर ओंकार का नाद तुम्हें इसी क्षण सुनाई पड़ने लगे। सहज होओ। खोजने वाला सहज नहीं होता। वासना करने वाला सहज नहीं होता। छोड़ो सब वासना, साधारण हो जाओ। धार्मिक होने की भी अस्मिता मत बनाओ, वह भी अहंकार है। साधारण हो जाओ। इसलिये सरहपा ने नहीं प्रयोग किया परमात्मा शब्द का--सहज हो जाने को कहा है। साधारण होकर जी लो, जैसे पशु जीते हैं, पक्षी जीते हैं, पौधे जीते हैं, चांदत्तारे जीते हैं--ऐसे साधारण होकर जीओ। इतना जरूर भेद रहेगा तुममें पक्षी और पौधे में, कि तुम्हारी सहजता में एक चैतन्य रहेगा, एक बोध रहेगा, एक जागृति रहेगी। वही जागृति और तुम्हारी सहजता का मिलन हो जाये तो परमात्मा घट गया। तुम परमात्मा हो! और तुम पूछते हो परमात्मा कहां खोजें! खोजनेवाले में छिपा है वह, जिसे तुम खोजना चाहते हो।

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विरह का, प्रभु-विरह का कष्ट सहा नहीं जाता है;-

प्रभु-विरह का कष्ट तो एक सौभाग्य है। वह कष्ट है ही नहीं। वह वरदान है, अभिशाप नहीं। वह तो केवल सौभाग्यशालियों को मिलता है, धन्यभागियों को मिलता है। वह तो बड़ी मीठी पीड़ा है, बड़ी मधुर! जिन्होंने उसे जाना है वे ऐसा नहीं कहेंगे कि प्रभु-विरह का कष्ट नहीं सहा जाता। वे तो नाचेंगे। वे तो कहेंगे: यही क्या कम है कि हमारे भीतर उसकी विरह की अग्नि जली। अनंत हैं अभागे जिनके भीतर उसका भाव ही नहीं गूंजा। अनंत हैं अभागे, जिनके कानों में उसके स्वर का एक कण भी नहीं पड़ा, जिनकी आंखों में उसका रूप जरा भी दिखाई नहीं पड़ा, जो बिलकुल अपरिचित जी रहे हैं--ऐसे अपरिचित कि उन्हें पता ही नहीं है कि परमात्मा भी है! तुम धन्यभागी हो, अगर तुम्हारे भीतर खलबली मची है, अगर तुम्हारे भीतर प्यास उठी है। इसको तुम कष्ट न कहो। इसे कष्ट कहने में भूल हो जायेगी। लेकिन अगर तुमने परमात्मा को भी कोई वस्तु समझा हुआ है और तुम उसे पाने के लिये आतुर हो रहे हो वस्तु समझकर, तो कष्ट होगा। तब तो वैसा ही कष्ट होगा जैसे किसी को मकान बनाना है और नहीं बना पा रहा है, तो अहंकार को चोट लगती है; कि किसी को कार खरीदनी है, नहीं खरीद पा रहा, अहंकार को चोट लगती है; कि किसी को कुछ और करना है और नहीं कर पा रहा है तो लगता है मैं भी नाकुछ, दो कौड़ी का आदमी हूं, इतना भी नहीं कर पा रहा! अगर परमात्मा को भी तुमने कोई वस्तु समझा है, कोई अहंकार का आभूषण समझा है, तो कष्ट होगा। लेकिन परमात्मा कोई वस्तु नहीं है और न अहंकार का कोई आभूषण। परमात्मा तो एक मस्ती है। और निश्चित ही यह मस्ती ऐसी है कि शुरू तो होती है, अंत नहीं होती। तो परमात्मा के प्यारे तो सदा ही विरह की पीड़ा में जीते हैं, सदा ही क्योंकि मिल-मिलकर लगता है, और मिलने को है। विरह का अंत नहीं होता। ऐसा थोड़े ही है कि एक दिन पता चलता है कि मिल गया पूरा। परमात्मा के मिलने की शुरुआत होती है, पूरा तो परमात्मा कभी नहीं मिलता। हमारे हाथ बड़े छोटे हैं। हमारा हृदय बड़ा छोटा है। उतने बड़े आकाश को हम समा भी कैसे पायेंगे? हमारी गागर में सागर बनेगा कैसे? गागर भर भी जायेगी तो भी विराट सागर बाहर मौजूद रहेगा। परमात्मा की प्यास ऐसी प्यास है कि जितना तुम पियोगे उतनी ही प्यास प्रज्वलित होती जायेगी। मगर यह कोई दुर्भाग्य नहीं, यह कोई पीड़ा नहीं यह मधुर पीड़ा है।उदासी के क्षण आते हैं, बदलियां घिर जाती हैं, लेकिन तब भी मुस्कुरा कर देखने की कला भूल मत जाना। मुस्कुरा कर देखते ही बदलियां छट जाती हैं, सूरज निकल आता है।बस हम ही अपनी नजरें झुकाये खड़े हैं, जमीन में गड़ाये खड़े हैं। वह सामने खड़ा है और उसने अपना घूंघट भी उठा लिया है। सच तो यह है, उसके ऊपर घूंघट कभी रहा नहीं। हमारी आंख पर ही परदा है। हमारी आंख ही धुंधली है। परमात्मा तो प्रतिपल आने को आतुर है, हम ही लेने को तैयार नहीं हैं। जरा पहचानो, अपनी ही नजर की भूल पहचानो। कहीं चूक हो रही है। या तो तुम परमात्मा को किसी शक्ल में देखना चाहते हो तो चूक हो गई, फिर तुम न देख पाओगे। कोई चाहता है कि धनुष-बाण लिये हुए रामचंद्र जी दिखाई पड़ें, बस फिर तुम्हें कभी मिलना न हो पायेगा। और अगर कभी मिलना हो जाये तो समझ लेना कि तुम्हारी कल्पना का ही जाल है। कोई चाहता है कि बांसुरी बजाते हुए कृष्ण मिलें। तुमने अपेक्षा आरोपित कर दी। तुम परमात्मा को वैसा न आने दोगे जैसा वह आना चाहता है। तुम उसे उसकी नग्नता में न आने दोगे; उसकी सत्यता में न आने दोगे वह तुम्हारा लिबास ओढ़कर आये, वह तुम्हारा रंग-ढंग लेकर आये, वह तुम्हारी अपेक्षा पूरी करे तो फिर विरह की रात्रि चलती रहेगी। फिर उसका कोई अंत नहीं है। फिर कोई सुबह नहीं होने वाली है। तुम्हारी धारणाएं बाधा डाल रही हैं। तुम परमात्मा की कोई धारणा न रखो मन में। अपनी सब धारणाएं छोड़ दो। उससे कहो: जैसा तू है वैसा आ। नहीं हिंदू की तरह, नहीं ईसाई की तरह--तू जैसा है वैसा आ! मेरी कोई मांग नहीं है! मेरी कोई अपेक्षा नहीं है। तू जिस ढंग में आयेगा, अंगीकार है। तू जिस रंग में आयेगा, स्वीकार है। तेरा स्वागत है, तू आ। मैं तुझे हर रंग में और हर ढंग में पहचानने को राजी हूं। मैंने आंखें खोलकर रखी हैं। तू आ! लेकिन कोई हिंदू है, कोई ईसाई है, कोई मुसलमान है--और यहीं अड़चन है: धार्मिक तो कोई भी नहीं। तुमने बड़ा जाल खड़ाकर रखा है। तुम जरा देखो, तुमने अगर सोचा है कि पीतांबर पहने हुए कृष्ण आयें और अगर वे सफेद कपड़ों में खड़े हुए तो तुम्हें संदेह होने लगेगा: "अरे, कृष्ण महाराज और सफेद कपड़ा। पीतांबर?' तुम्हारी धारणा अनुकूल नहीं पड़ रही। तुमने मान रखा है धनुष-बाण लिये आएं। आज धनुष-बाण पिट गया, अब धनुष-बाण का कोई मूल्य है? कभी-कभी छब्बीस जनवरी को दिल्ली में आदिवासी लेकर पहुंच जाते हैं, और तो कहीं कोई दिखाई नहीं पड़ता धनुष-बाण लिये हुए। उनके भी किसी काम का नहीं है अब। वे भी रखे रहते हैं छब्बीस जनवरी के लिये। छब्बीस जनवरी को रंग-रोगन करके पहुंच जाते हैं दिल्ली धनुष-बाण लेकर। अब धनुष-बाण का क्या अर्थ रहा? अब क्या मूल्य है? और अगर अभी भी तुम्हारा परमात्मा धनुष-बाण लिये होगा तो थक गया होगा, बुरी तरह थक गया होगा। उसके कंधे भी दुखने लगे होंगे। तुम क्षमा करो उसे। उसे छुट्टी दो। उससे कहो कि अब तुम छोड़ो यह धनुष-बाण। मगर झगड़ा हो जाये, अगर परमात्मा धनुष-बाण छोड़ दे। एक नगर में मैं मेहमान था, वहां एक दंगा हो गया, क्योंकि उस कालेज के लड़कों ने एक नाटक किया। आधुनिक रामलीला! झगड़ा हो गया इस पर, क्योंकि गांव के पंडित-पुरोहित बहुत नाराज हो गये। दकियानूसी बहुत नाराज हो गये। क्योंकि रामचंद्र जी और लक्ष्मण जी और सीता मैया सब आधुनिक वेशभूषा में! सीता मैया ऊंची एड़ी का जूता पहने! झगड़ा हो गया। वह तो मजाक था उनका बस, मगर मूढ़ों की तो कोई गिनती नहीं; इस देश में तो एक गिनो और हजार मिल जायें। झगड़ा हो गया, वहीं झगड़ा हो गया कि अपमान हो गया। धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंच गई। व्यंग्य भी समझना लोग भूल गये हैं। थोड़ा-सा हंसी-मजाक समझना भी भूल गये हैं। वहीं मारपीट हो गई। कुर्सियां तोड़ डाली गईं, मंच के पर्दे फाड़ डाले गये और लड़कों की पिटाई कर दी--कि सीता मैया को और ऊंची एड़ी का जूता! लेकिन व्यंग्य प्यारा था, अर्थपूर्ण था। सब बदला जा रहा है, तो तुम सोचते हो परमात्मा नितनूतन, नया नहीं हो रहा होगा? फिर राम या कृष्ण या बुद्ध केवल परमात्मा की अनुभूतियां हैं। इन व्यक्तियों ने परमात्मा को जाना। ये खिड़कियां हैं, जिनसे परमात्मा देखा गया। लेकिन खिड़की की चौखट की पूजा करने मत बैठ जाना, नहीं तो आकाश तो भूल ही जायेगा, चौखट पकड़ में रह जायेगी। आकाश को देखो! खिड़की आकाश नहीं है; खिड़की से सिर्फ आकाश दिखा। राम से आकाश दिखा, कृष्ण से आकाश दिखा। अब खिड़की की पूजा करने से क्या होगा? आकाश देखो! वह जो राम में था विराट, वही विराट आयेगा--राम नहीं आयेंगे। वह जो कृष्ण में था विराट, वही विराट आयेगा--कृष्ण नहीं आयेंगे। लेकिन विराट को झेलने की क्षमता नहीं है। अर्जुन चाहता था कि कृष्ण अपना विराट रूप दिखाएं और कथा है कि कृष्ण ने अपना विराट रूप दिखाया। और जब उसने विराट रूप देखा तो वह कंपने लगा। उसके हाथ से गांडीव छूट गया, थरथरा गया, पसीना आ गया। उसने कहा कि नहीं-नहीं, आप अपने वापिस उसी रूप में आइये, मेरे सखा के रूप में। यह कथा प्रीतिकर है। तुम चाहते हो परमात्मा उस तरह से आये तो तुम्हें रुचिकर हो। मगर परमात्मा तो उसी तरह से आ सकता है जैसा है। अगर तुम्हें देर हो रही है उसे पाने में तो उसका कुल कारण इतना ही होगा कि तुमने बहुत-सी शर्तें लगा रखी हैं कि ये-ये शर्तें पूरी करो। और परमात्मा किसी की शर्त पूरी करने को बंधा नहीं है। परमात्मा और शर्त पूरी करेगा! तुम बेशर्त हो जाओ। अपने ही शौक की ख़ता, अपनी ही आंख का कुसूर। वह तो उठा चुका नकाब, हम न नज़र उठा सके।। हिंदू की नजर नहीं उठ सकती और मुसलमान की नजर नहीं उठ सकती। नजर तो उसकी उठेगी जो न हिंदू है न मुसलमान है। हिंदू होना नजर पर पत्थर है, जैसे पलकों से पत्थर बंधा हो। नजर तो वह उठेगी जिस पर कोई पत्थर नहीं है, जिस पर कोई बोझ नहीं है; जो निर्भार है; जो बच्चे की तरह सरल और निर्दोष है। और जब वैसी नजर उठती है तो हैरान होकर पाया जाता है कि जिसे हम खोजना चाहते थे, जिसे हम पाना चाहते थे, वह सदा से मौजूद था; हम कभी भी पा लेते। इतने दिन न पाया तो अपनी ही नजर का कसूर था। और फिर, उसकी पीड़ा जो झेलेगा उसे यह सत्य भी जल्दी ही दिखाई पड़ जायेगा--लेकिन तुम्हारी आकांक्षा यह है कि मैं भी रहूं और परमात्मा भी मिले। बस वहीं चूक हो रही है। मैं भी रहूं और परमात्मा भी मिले, ये दोनों बातें एक साथ नहीं हो सकतीं। या तो तुम या परमात्मा; दो में से एक चुन लो। अगर तुम्हें अपने को बचाना है तो परमात्मा से तुम्हारा कभी संपर्क न हो पायेगा और अगर अपने को खोना है तो अभी संपर्क हो सकता है। जिन्होंने उसे चाहा, जिन्होंने थोड़ा समझा, जिन्होंने थोड़ा रस लिया है उसकी शराब का, जिन्होंने थोड़ा उसे चखा है, वे तो कुछ और कहते हैं। वे तो कहते हैं: उसका इंतजार भी इतना मधुर है, कि कौन फिकिर करता है मिलन की। प्रतीक्षा इतनी प्यारी है, कौन फिकिर करता है मिलन की! मिलन हो या न हो, किसे फिकिर पड़ी है! उसकी प्रतीक्षा इतनी प्यारी है! कहीं मेरी प्रार्थना स्वीकार न हो जाये, कभी-कभी यह डर आने लगता है। तो तुम कहते हो: विरह का, प्रभु-विरह का कष्ट सहा नहीं जाता। नहीं, तुम समझे ही नहीं अभी। नहीं तो मस्त हो जाते। सहने न सहने की बात नहीं है: यह तो बड़ा लुत्फ है। यह प्रतीक्षा तो बड़ी आनंदपूर्ण है। उसके पैरों की आहट सुनना कि अब आया, अब आया, कि द्वार पर हवा का धक्का लगा और लगा कि आ गया...कि सूखे पत्ते हवा ने उड़ाये और राह पर आवाज हुई और तुम दौड़े कि आ गया...कि चांद की छाया बनी झील में कि लगा उसकी नाव तिरी, कि वह आया। कि मेरे तम के किनारे पर उसकी नाव लगी, अब लगी! ऐसी प्रतीक्षा गदगद भाव से की गई हो तो क्या तुम कह सकोगे कि सहा नहीं जाता? तुम तो कहोगे कि प्रभु और भी दे यह पीड़ा, क्योंकि यह पीड़ा मधुर है। और यह पीड़ा निखारनेवाली है। इसी पीड़ा की अग्नि से जलकर तुम, इसी अग्नि से निकलकर तुम कुंदन बनोगे, शुद्ध स्वर्ण बनोगे। भक्त की भाषा सीखो। भक्त का सलीका सीखो। भक्त की शैली सीखो।

....SHIVOHAM....