Recent Posts

Archive

Tags

No tags yet.

क्या है समत्व योग?क्या दमन समत्व योग नहीं है?


समत्व/संयम का क्या अर्थ है?-

14 FACTS;-

1-समत्वं योग उच्यते...समत्व-योग का विवेचन करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि अति..चाहे निद्रा में, भोजन में,या जागरण में हो ..समता लाने में बाधा है। किसी भी बात की अति, व्यक्तित्व को असंतुलित कर जाती है।प्रत्येक वस्तु का एक अनुपात है; उस अनुपात से कम या ज्यादा हो, तो व्यक्ति को नुकसान पहुंचने शुरू हो जाते हैं।गीता में श्रीकृष्ण सफल ध्यान के लिए कुछ बाधाओं से बचने की ओर संकेत करते हैं जो शरीर व मन से जुड़ी हैं। योगेश्वर ने कहा ''हे अर्जुन किन्तु अधिक भोजन करने वाले का , योग , सिद्ध नहीं होता , और , न एकदम उपवास पर रहने वाले को ही योगसिद्ध हो पाता है। अत्यधिक सोने वाले व्यक्ति का भी नहीं और फिर न ही सदा जागने वाले का योग सिद्ध हो पाता है। जो आहार और विहार के कर्मों में अपनी चेष्टाओं को संतुलित रखता है तथा निद्रा जागरण में संयत होता है, उसके लिए ही यह ध्यान (योग) दुःखनाशक सिद्ध होता है।''

2-जो अतिवाद न बरते, समय पर जागे, समय पर सोये, समय पर खाए-अधिक न खाए-अत्यल्प भी न खाए, उतना ही ले जितना जरूरी है, तो ध्यान हेतु मनोभूमि बन जाती है। योगी होने के लिए हर विषय में विशेष संयम की आवश्यकता पड़ती है।

‘‘संयम का अर्थ है संतुलन। दोनों अतियों की ओर न सरकना। ठीक मध्य में रहना।समत्व ही योग है ... संतुलन दो छोरों के बीच। समत्व यही है कि हम किसी भी प्रकार के अतिवाद से बचें!

3-संतुलन को समत्व भी कहते हैं।साँसारिक पदार्थों में प्रवृत्ति की हममें जितनी शक्ति होती है, उतनी ही जब उनसे निवृत्त होने की भी शक्ति होती है, तो उस अवस्था को संतुलित और

समत्व की अवस्था कह सकते हैं।इस समत्व को आचरण में उतारने के लिए केवल विरागी अथवा रागहीन होने से ही कार्य नहीं चलता । संतुलित अवस्था तो तब होगी, जब रागहीन होने के साथ-साथ द्वेषहीन भी हुआ जाय। अपने देश के तथाकथित साधुओं ने यहीं भूल की। वे विरागी तो हो गये, पर साथ-साथ राग से बचने की धुन में उन्होंने द्वेष को भी अपना लिया। संसार के सुख-दुख से संबद्ध न होने की चाह में उन्होंने संसार से अपना संबंध विच्छेद कर लिया और उसकी सेवाओं से अपना मुख मोड़ लिया।

4-जब दो गुण ऐसे होते हैं, जो परस्पर विपरीत दिशाओं में प्रवृत्त करते हैं, तो उनके पारस्परिक संयोग से चित्त की जो अवस्था होती है, उसे भी संतुलित अवस्था कहते हैं। दया मनुष्य को दूसरों का दुःख दूर कराने में प्रवृत्त कराती है, पर निर्मोह या निर्ममत्व मनुष्य को दूसरों के सुख-दुःख से संबंधित होने से पीछे हटाता है। अतएव दया और निर्ममत्व दोनों के एक बराबर होने से चित्त संतुलित होता है। जहाँ दया मनुष्य को अनुरक्त करती है, वहाँ निर्ममता विरक्त।

5-दया में प्रवृत्तात्मक और निर्ममता में निवृत्तात्मक शक्ति है। उसी तरह संतोष और श्रमशीलता एक-दूसरे को संतुलित करते हैं। परिश्रमशीलता में प्रवृत्तात्मक और संतोष में निवृत्तात्मक शक्ति है। उसी तरह सत्यता और मृदुभाषिता, सरलता और दृढ़ता, विनय और निर्भीकता, नम्रता और तेज, सेवा और अनासक्ति, शुचिता और घृणा, स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व, तितिक्षा और आत्मरक्षा, दीर्घसूत्रता और आलस्यहीनता, अपरिग्रह और परिग्रह, शक्ति परस्पर एक दूसरे को संतुलित करते हैं। इन युग्मों में से यदि केवल एक का ही विकास हो और दूसरे के विकास की ओर ध्यान न दिया जाय, तो मनुष्य का व्यक्तित्व असंतुलित एवं एकाँगी हो जाएगा

6- स्वतंत्रता प्राप्त व्यक्ति पर अंकुश न होने से उसमें निरंकुशता और उच्छृंखलता बढ़ सकती है। दृढ़ प्रकृति व्यक्ति में हठ करने की प्रवृत्ति हो सकती है। उपरोक्त युग्मों में से प्रत्येक गुण एक-दूसरे को मर्यादित करते हैं और एक-दूसरे का पूरक है।दो विपरीत गुण साथ-

साथ होने चाहिए।पराक्रम के साथ व्यक्ति में दयालुता, क्षमाशीलता के गुण न हों, तो वह अत्याचार ही बरतेगा।पराक्रम सदा क्षमाशीलता के कारण शोभा पाता है जबकि साहसिकता की प्रशंसा शालीनता में निहित है।

7-आत्म सुख की भावना बहुधा मनुष्य को स्वार्थमय कर्मों में प्रवृत्त करती है और लोक सुख की भावना लोककल्याण के कार्यों में। अतएव आत्म सुख और लोक सुख दो विभिन्न दृष्टिकोण हुए। इनके समन्वय से जो मध्यम स्थिति उत्पन्न होती है, वही संतुलित विचार पद्धति है।जब मनुष्य में दंड की सामर्थ्य रहते हुए भी अपमान सहन करने की क्षमता होती है, तब वह मान-सम्मान की परवाह न करते हुए भी लोक कल्याण करने वाले शुभ कर्मों के करने में पूर्ण उत्साही होता है और किसी कार्य में प्रवृत्त होने के साथ-साथ उससे निवृत्त भी हो सकता है। तब उसके चरित्र और गुण में संतुलन आता है।

8-जब दो विचारधाराएँ मनुष्य से भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में कार्य कराती हैं, तब उनके समन्वय से जो स्थिति होती है, उसे संतुलित विचारधारा कहते हैं। उसी प्रकार जिसकी विचारधारा में पूर्व और पश्चिम के आदर्शों का समन्वय, भौतिकवाद और अध्यात्मवाद का समन्वय, आदर्श और यथार्थ का समन्वय हुआ है और जो मध्यम मार्ग को अपनाये हुए हैं, उसी की विचारधारा संतुलित है।भगवान बुद्ध ने “मंझम मग्न” का मध्यम मार्ग का आचरण करने के लिए सर्वसाधारण को उपदेश किया है। बहुत तेज दौड़ने वाले जल्दी थक जाते हैं। और बहुत धीरे चलने वाले अभीष्ट लक्ष्य तक पहुँचने में पिछड़ जाते हैं। जो मध्यम गति से चलता है, वह बिना थके, बिना पिछड़े उचित समय पर अपने गंतव्य स्थान तक पहुँच जाता है।

9-मन के संबंध में भी यही बात लागू होती है। उसमें भी मध्यम स्थिति-संतुलित-अवस्था का सदा ध्यान रखना पड़ता है, तभी व्यक्तित्व की साम्यावस्था प्राप्त की जा सकती है।

जब हम किसी एक ही कार्य के पीछे पड़ जाते हैं, अथवा जब हम किसी कार्य में अति करने के कारण दूसरे करणीय कार्यों को भूल जाते हैं, तब हमारी कार्य पद्धति असंतुलित होती हैं। यदि हम एकदम धन कमाने के पीछे पड़ जायँ अथवा यदि हम केवल पढ़ने-पढ़ाने में ही अपना सारा समय बिताने लगें, तो हमारी कार्य पद्धति असंतुलित होगी।

10-हमारी प्राचीन-शास्त्रकारों तथा नीतिकारों ने जगह-जगह इस बात पर जोर दिया है कि किसी भी काम में ‘अति’ नहीं करनी चाहिए। यह नियम बुरी बातों पर ही नहीं अनेक अच्छी बातों पर भी लागू होता है। जैसे कहा गया है कि अति दानवृत्ति के कारण बलि को पाताल में बँधना पड़ा। संभव है कि कुछ विशिष्ट आत्माओं के लिए, जो किसी असाधारण उद्देश्य की पूर्ति के लिए पृथ्वी पर अवतीर्ण होती है, यह नियम आवश्यक न माना जाय, पर सर्वसाधारण के लिए सदैव मध्यम मार्ग-संतुलित जीवन का नियम ही उचित सिद्ध होता है।

11-मानसिक क्रियाओं को प्रायः तीन भागों में विभाजित किया गया है-(1) भावना (2) विचार (3) क्रिया। ऐसे बहुत कम व्यक्ति हैं, जिनमें उपरोक्त तीनों क्रियाओं का पूर्ण सामंजस्य, पूर्ण संतुलन हो। किसी में भावना का अंश अधिक है तो वह भावुकता से भरा है, आवेशों का विचार रहता है। उसकी कमजोरी अति संवेदनशीलता है। वह जरा सी भावना को तिल का ताड़

बनाकर देखता है।विचार प्रधान व्यक्ति दर्शन की गूढ़ गुत्थियों में ही डूबते-उतराते रहते हैं। नाना कल्पनाएँ उनके मानस क्षितिज पर उदित और अस्त होती रहती है, योजनाएँ बनाने का काम तो वे खूब करते हैं, पर असली काम के नाम पर वे शून्य हैं।

11-1-तीसरे प्रकार के व्यक्ति सोचते कम हैं, भावना में नहीं बहते, पर काम खूब करते रहते हैं। इन कार्यों में कुछ ऐसे भी काम वे कर डालते हैं, जिनकी आवश्यकता नहीं होती तथा जिनके बिना भी उनका काम चल सकता है।पूर्ण संतुलित वही व्यक्ति है, जिसमें भावना, विचार, तथा कार्य-इन तीनों ही तत्वों का पूर्ण सामंजस्य हो। ऐसा व्यक्ति मानसिक दृष्टि से पूर्ण स्वस्थ माना जाता है।

12-हमें चाहिए कि हम ‘अति’ से अपनी रक्षा करें और इस प्रकार असंतुलन से बचे रहें। तात्पर्य यह कि अति भावुकता में आकार ऐसा कुछ न कह डालें, ऐसे वायदे न कर बैठें, जिन्हें बाद में पूर्ण न कर सकें। इतने विचार प्रधान भी न बन जायँ कि संपूर्ण समय सोचते-विचारते, चिंतन करते-करते ही व्यतीत हो जाय। विचार करना उचित है, किंतु विचारों ही में निरंतर डूबे रहना और कार्य न करना, हमें मानसिक रूप से आलसी बना डालेगा। इसी प्रकार दो विरोधी गुणों में से किसी एक को जीवन में इतना प्रश्रय न दिया जाय कि व्यक्तित्व एकमुखी और एकाँगी बन जाय। यह भी असंतुलन दर्शाता है। संतुलित अवस्था वह है, जिसमें दोनों गुणों का पूर्ण विकास हो।

13-मन के परिष्कार की साधना मानव में समत्व भाव का उदय कर सकेगी जिससे वास्तविक जीवन जीने की सहज अनुभूति होगी। जीवन की संपूर्णता के लिए समत्व योग की साधना प्रारंभिक सोपान है।समत्व की साधना के द्वारा राग-द्वेष जैसे दोषों का क्षरण होने लगता है। अहंकार का भाव दुर्बल होता जाता है। परिणाम स्वरूप दूसरों के प्रति सहज रूप से समत्व भाव, करुणा और संवेदनशीलता की निष्पत्ति होने लगती है।

14-श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि सुख-दुख, लाभ-हानि, जय-पराजय को समान समझकर ही युद्ध में आरूढ़ होने से ही मनुष्य पाप का भागी नहीं बनेगा। इन विरोधाभासी स्थितियों में समभाव रखना चाहिए।सुख-दुख, लाभ-हानि, जय पराजय आदि को समान मानने की साधना इन्हें मूल्यों से रिक्त करने की साधना है। यह स्थिति राग और द्वेष के परित्याग के बिना पूरी नहीं की जा सकती। राग-द्वेष मन में बसे हुए हैं, यदि इनका परित्याग हो जाता है तो प्रत्यक्षत: मन का भी परिष्कार हो जाता है। यही वह साधना की सीढ़ी है जो साधक की जीवन दृष्टि को बदल देती है।

क्या है समत्व योग साधना?-

12 FACTS;-

1- समत्व का अर्थ समझाते हुए श्रीकृष्ण ने दो निष्ठाओं की बात कही है।एक वे साधक, जो इंद्रियों का संयम कर लेते हैं। जिनकी इंद्रियां विषयों की तरफ दौड़ती ही नहीं हैं।विषयों की तरफ ..इंद्रियों की जो यात्रा है, उसे विदा कर देते हैं;अथार्त यात्रा ही समाप्त कर देते हैं।दूसरे वे, जो विषयों को भोगते रहते हैं, फिर भी लिप्त नहीं होते। ये दोनों ही यज्ञ में रत हैं।

2-एक वे, जो इंद्रियों को विषयों तक जाने ही नहीं देते--उसकी अलग साधना है।वे इंद्रियों और विषयों के बीच में जो सेतु है, उसे ही तोड़ देते हैं। दूसरे वे, जो इंद्रियों को विषयों तक जाने देते हैं, लेकिन इंद्रियों और लिप्त हो जाने में जो सेतु है, उसे तोड़ देते हैं। अब यह दो सेतुओं का जो तोड़ना है, वह समझना जरूरी है। वास्तव में,दोनों ही स्थितियों से एक ही परम-अवस्था उपलब्ध होती है।

3-पहले साधक, इंद्रियों को विषयों तक नहीं जाने देते।वास्तव में,

इंद्रियां विषयों की तरफ भागती ही रहती हैं। आप रास्ते पर गुजरते हैं ..सुंदर भवन दिखाई पड़ गया, कि सुंदर चेहरा दिखाई पड़ गया, कि सुंदर कार दिखाई पड़ गई--आदि-आदि।आपको पता ही नहीं चलता कि जब आपने सुंदर कहा, तभी इंद्रियां दौड़ चुकीं होती है। ऐसा नहीं कि सुंदर है, ऐसा जानने के बाद इंद्रियां दौड़ना शुरू करती हैं।उनका निष्कर्ष/कनक्लूजन.. यह है कि 'यह सुंदर है'।

4-आप ऐसा मत सोचना कि आप सुंदर चेहरा देख कर आकर्षित होते हैं; आप आकर्षित होते हैं, इसलिए चेहरा सुंदर दिखाई पड़ता है। आकर्षण की घटना सूक्ष्म है और बड़े अदृश्य में घट जाती है। सौंदर्य की घटना सूक्ष्म नहीं है और विचार में पता चलती है।सुंदर हमारी निष्पत्ति

है,कारण नहीं।सुंदर की वजह से कोई आकर्षित नहीं होता; आकर्षित होने की वजह से सुंदर का निष्कर्ष लेता है। यह हमारा बौद्धिक निष्कर्ष है।

5-इंद्रियों ने तो 'आकर्षण का' अनुभव किया है ; बुद्धि ने 'सुंदर का' निर्णय लिया है और इंद्रियां पहुंच चुकीं; क्योकि इंद्रियों ने स्पर्श कर लिया।इंद्रियों की गति सूक्ष्म है।ऐसा नहीं कि जब

आप किसी के शरीर को छूते हैं, तभी इंद्रियां छूती हैं। इंद्रियों के छूने के अलग-अलग मार्ग हैं। आंख देखती है, और छू लेती है। देखना आंख के छूने का ढंग है। सुनना कान के छूने का ढंग है। स्पर्श हाथ के छूने का ढंग है। ये सब छूने के ढंग हैं। सब इंद्रियां छूती हैं।

6-इंद्रिय का अर्थ है, स्पर्श की व्यवस्था, उपकरण। सब इंद्रियां स्पर्श करती हैं। सूक्ष्म स्पर्श दूर से हो जाते हैं। स्थूल स्पर्श पास से करने पड़ते हैं।इससे विपरीत काम भी चलता है पूरे

समय। शरीर से सबको नहीं छुआ जा सकता। लेकिन एक परफ्यूम डाल कर बड़े सूक्ष्म तल पर, गंध से, सब को छुआ जा सकता है। आवाज, गंध, ध्वनि, दृश्य, दर्शन--वे सब छूते हैं। यह खयाल में भी नहीं आता कि..जब आप सज-संवर कर घर से निकलते हैं, तो आप दूसरों की आंख से छुए जाने का निमंत्रण लेकर निकल रहे हैं। और अगर कोई आंख से न छुए, तो आप बड़े उदास लौटेंगे। यह दोहरा काम चल रहा है, छूने का, छुए जाने का। इंद्रियां प्रतिपल इस काम में संलग्न हैं।और आपको पता भी नहीं चलता कि यह हो रहा है।इंद्रियां पूरे समय स्पर्श को लालायित और स्पर्श देने को और लेने को आतुर हैं।

7-तो जिस व्यक्ति को इंद्रियों को विषयों तक जाने से रोकना है, उसे इंद्रियों की इस सूक्ष्म स्पर्श-व्यवस्था के प्रति जागरूक होना पड़ेगा। अत्यंत सूक्ष्म व्यवस्था है। आपको पता चलने के पहले घटित हो जाता है।''इंद्रिय का स्पर्श'', इतना शीघ्रता से घटित होता है कि आपको पता ही तब चलता है, जब घटित हो जाता है।

8-तुम्हारी आंख सिर्फ देख रही है या स्पर्श भी कर रही है, इन दोनों में फर्क है। फर्क कैसे पता चलेगा...

8-1-अगर सिर्फ देखा हो, तो पीछे कोई लकीर नहीं छूटेगी। और अगर स्पर्श भी किया हो, तो पीछे लकीर छूटेगी।

8-2-अगर सिर्फ देखा हो, तो लौट कर नहीं देखना पड़ेगा; अगर स्पर्श भी किया हो, तो लौट कर भी देखना पड़ेगा।

8-3-अगर सिर्फ देखा हो, तो स्मृति नहीं बनेगी; अगर स्पर्श भी किया हो, तो स्मृति बनेगी। अगर सिर्फ देखा हो, तो कल भी देखूं, ऐसी आकांक्षा नहीं जगेगी; अगर स्पर्श किया हो, तो फिर-फिर देखूं, ऐसी आकांक्षा जगेगी।

9-आंख से सिर्फ देखने का काम लें, स्पर्श करने का नहीं।तब जो श्रीकृष्ण कह रहे हैं, पहली घटना घट सकती है। हाथ से सिर्फ छूने का काम लें, स्पर्श करने का नहीं। अब आप कहेंगे, छूना और स्पर्श करना तो बिलकुल एक ही बात है।वास्तव में, वही फर्क है,जो आंख के लिए है । आंख से सिर्फ देखने का काम लें, स्पर्श करने का नहीं। कान से केवल सुनने का काम लें, स्पर्श करने का नहीं। कोई आवाज कान सुनता है, ठीक। लेकिन मीठी लग गई, तो छू ली गई। फिर आकांक्षा जगेगी, --और.. और.. और सुनने की। 'और सुना'.. गया , तो स्पर्श हो गया। इंद्रिय ने रस लेना शुरू कर दिया।

10-अब इंद्रिय सिर्फ उपकरण न रही, मालिक हो गई। इंद्रिय ने न सिर्फ देखा बल्कि

इंद्रिय ने पकड़ भी लिया।जो योगी इंद्रिय को विषय से तोड़ता है, वह विषय और इंद्रिय के बीच स्पर्श को, संस्पर्श को तोड़ता है। देखना तो नहीं तोड़ा जा सकता। देखने से ,तोड़ने से कुछ फर्क नहीं पड़ता। आंख से स्पर्श विदा होना चाहिए। लेकिन कब होगा? जब आप जागेंगे, तो स्पर्श विदा हो जाएगा।

11-क्या करें.. जब भी देखें, तब होश से यह भी देखें कि सिर्फ देख रहे हैं या स्पर्श भी हो रहा है।धीरे, धीरे, धीरे, फासला साफ दिखाई पड़ने लगेगा। और साफ दिखाई पड़ने लगता है कि मैंने स्पर्श किया कि देखा। और जब आप पाएंगे कि दिखाई पड़ने लगा, स्पर्श किया, तभी आपको अनुभव हो जाएगा कि इंद्रियां जहां-जहां स्पर्श करती हैं, वहीं-वहीं बंधन को निर्मित करती हैं। जहां-जहां स्पर्श नहीं करतीं, वहां-वहां बंधन निर्मित नहीं होता।

12-समत्व का अर्थ है, जो इंद्रियों से उपकरण का काम लेता है, भोग का नहीं ; जो इंद्रियों से भोगता नहीं, केवल उपयोग लेता है। असंयमी का अर्थ है, जो इंद्रियों से उपयोग कम लेता है, परन्तु भोग ज्यादा लेता है। आंख से देखना उपयोग है। आंख से भोगना, स्पर्श करना, उपयोग नहीं है; ..भोग है। भोग बंधन है, उपयोग बंधन नहीं है।इस

स्पर्श की सूक्ष्म व्यवस्था को स्मरणपूर्वक देखने से व्यवस्था क्रमशः टूटती चली जाती है।

क्या दमन समत्व/संयम नहीं है?-

09 FACTS;-

1-साधारणतः वैराग्य की भाषा में संयम का अर्थ दमन ही है। शरीर को दबाना है, दमन करना है।इसलिए जैन 'शरीर-दमन' शब्द का भी उपयोग करते हैं। लेकिन श्री कृष्ण की भाषा में समत्व का अर्थ दमन नहीं हो सकता। उनकी भाषा में समत्व का अर्थ बिलकुल और है। शब्द भी बड़ी दिक्कत देते हैं। क्योंकि शब्द तो एक ही होते हैं--चाहे श्रीकृष्ण के मुंह पर हों

और चाहे महावीर के मुंह पर हों।संयम, शब्द एक ही है। लेकिन अर्थ बिलकुल भिन्न है। क्योंकि ओंठ भिन्न हैं और उनका प्रयोग करने वाला आदमी भिन्न है। और उसमें जो अर्थ है, वह उस व्यक्तित्व से आता है।

2-शब्द में जो अर्थ है, वह डिक्शनरी से नहीं आता। डिक्शनरी से सिर्फ उनके लिए आता है जिनके पास कोई व्यक्तित्व नहीं है। जिनके पास व्यक्तित्व है, उनके लिए शब्द का अर्थ

भीतर से आता है।श्रीकृष्ण के ओंठ पर संयम का क्या अर्थ है, यह श्रीकृष्ण को समझे बिना नहीं कहा जा सकता। महावीर के ओंठ पर संयम का क्या अर्थ है, यह महावीर को समझे बिना नहीं कहा जा सकता। संयम का अर्थ महावीर से निकलेगा, या श्रीकृष्ण से निकलेगा। अब श्रीकृष्ण को देखते हुए कहा जा सकता है कि संयम का अर्थ दमन नहीं हो सकता।

तो संयम का क्या अर्थ होगा?

3-संयम का बहुत गहरा अर्थ 'दमन' नहीं है। संयम शब्द बहुत अदभुत है। संयम का अर्थ है--संतुलन, बैलेंस अथार्त न इस तरफ, न उस तरफ...बीच में, मध्य में। त्यागी असंयमी है--त्याग की तरफ; भोगी असंयमी है--भोग की तरफ। भोगी एक छोर छू रहा है, त्यागी दूसरा छोर छू रहा है। ये दो एक्सट्रीम हैं। संयम का अर्थ है, अन-अति, एक्सट्रीम नहीं, बीच में। श्रीकृष्ण के ओंठों पर संयम का अर्थ है, मध्य में। न त्याग, न भोग। या त्यागपूर्ण भोग, या भोगपूर्ण त्याग ;या न त्याग, न भोग--संयम का ऐसा अर्थ होगा।जो कहीं भी अति पर,नहीं झुकता वह व्यक्तित्व संयमित है।

4-संयम जागरण है--होश, रिमेंबरिंग, स्मृति।इसे देखते रहें और प्रयोग करते रहें, तो

संयम की पहली घटना घट सकती है , अर्थात विषयों तक इंद्रियों का रस तिरोहित हो जाता है।विषय तक इंद्रियां जाती हैं उपयोग के लिए, भोग के लिए नहीं तब सेतु टूट गया।श्रीकृष्ण कहते हैं, जो ऐसा व्यक्ति है, वह संयमी है। कुछ साधक वर्षों से साधना में लगे हैं।

तन सूख कर हड्डी-हड्डी हो गया है और आंखें धूमिल हो गई हैं और गड्ढों में खो गई हैं। लगता है कि अपने को बहुत सताया है और उस आत्मपीड़न को ही साधना समझा है।

5-प्रभु के मार्ग पर चलने को जो उत्सुक होते हैं, उनमें अधिक का जीवन इसी भूल से विषाक्त हो जाता है। प्रभु को पाना, संसार के निषेध का रूप ले लेता है। और आत्मा की साधना, शरीर को नष्ट करने का। यह नकार-दृष्टि उन्हें नष्ट कर देती है और उन्हें खयाल भी नहीं आ पाता है कि पदार्थ का विरोध परमात्मा के साक्षात का पर्यायवाची नहीं है।सच तो यह है कि देह के

उत्पीड़क देहवादी ही होते हैं। और संसार के विरोधी, बहुत सूक्ष्म रूप से संसार से ही ग्रसित होते हैं।

6-संसार के प्रति भोग-दृष्टि जितना संसार में बांधती है, विरोध-दृष्टि उससे कम नहीं, ज्यादा

ही बांधती है।संसार और शरीर का विरोध नहीं, अतिक्रमण करना साधना है। और वह दिशा न भोग की है और न दमन की है। वह दिशा दोनों से भिन्न है।वह तीसरी दिशा है और वह दिशा संयम की है।दो बिंदुओं के बीच मध्य बिंदु खोज लेना संयम है।पूर्ण मध्य में जो है,वह

अतिक्रमण है। वह कहने को ही मध्य में है, वस्तुतः वह दोनों के अतीत है।भोग और दमन के

जो पूर्ण मध्य में है, वह कुछ भोग और कुछ दमन नहीं है। वह न भोग है और न दमन है। वह समझौता नहीं, संयम है।

7-वन-डायमेंशनल जितने भी व्यक्तित्व हैं, इनके साथ निरंतर अनाचार होगा।क्योंकि आप कुछ भी करें, उसके लिए वह राजी हो सकता है।बहुआयामी /मल्टी-डाइमेन्शनल व्यक्ति के साथ अनाचार आप नहीं कर सकते। श्रीकृष्ण के साथ हजार तरह के लोग राजी हो सकते हैं,लेकिन महावीर के साथ सिर्फ एक पर्टिकुलर टाइप राजी हो सकता है। वे जो चौबीस

तीर्थंकर हैं वे सब एक रूप हैं, एक ही यात्रा पर हैं। उन सबकी एक ही दिशा है, उनकी एक ही साधना है। अंतिम क्षणों में ऐसा नहीं है कि जो श्रीकृष्ण को मिलता है वह उन्हें नहीं मिलता। उन्हें भी वह मिल जाता है।नदी हजार धाराओं में बह कर सागर पहुंचे या एक धारा में पहुंचे, इससे क्या फर्क पड़ता है...क्योकि सागर में पहुंच कर तो सब बात समाप्त हो जाती है।

8-लेकिन एक धारा और एक मार्ग पर बहने वाली नदी सारी पृथ्वी को नहीं घेर सकती, यह समझना चाहिए। हजार धाराओं में बहने वाली नदी सारी पृथ्वी को भी घेर सकती है। एक धारा में बहने वाली नदी के तट पर जो वृक्ष हैं उनको पानी मिल सकता है; हजार धाराओं में बहने वाली नदी, हजार मार्गों पर जो वृक्ष हैं, उनकी जड़ों को पानी दे पाती है। वह फर्क है। उस फर्क को इनकार नहीं किया जा सकता। उतने फर्क को ध्यान में रखना जरूरी है।

9-अति असंयम है, मध्य संयम है। अति विनाश है, मध्य जीवन है। जो अति को पकड़ता है, वह नष्ट हो जाता है। भोग और दमन दोनों जीवन को नष्ट कर देते हैं। अति ही अज्ञान है और अंधकार है और मृत्यु है। संयम और संगीत ही साधना है।वीणा के तार जब न ढीले होते

हैं और न कसे ही होते हैं, तब संगीत पैदा होता है। बहुत ढीले तार भी व्यर्थ हैं और बहुत कसे तार भी व्यर्थ हैं। पर तारों की एक ऐसी भी स्थिति होती है जब वे न कसे कहे जा सकते हैं, न ढीले कहे जा सकते हैं। वह बिंदु ही उनमें संगीत के जन्म का बिंदु बनता है। जीवन में भी वही बिंदु संयम का है। जो नियम संगीत का है, वही संयम का है। संयम से सत्य मिलता है।सब तनाव छोड़ दें और फिर देखें। भोग छोड़ा है, तो दमन भी छोड़ दें ...सब छोड़ कर देखें। सहज होकर देखें--सहजता ही स्वस्थ करती है, स्वभाव में ले जाती है।’

क्या वृत्तियों को देखना/ऑब्जर्वेशन भी एक तरह का दमन/ सप्रेशन है?

09 FACTS;-

1- वृत्तियों को देखने के पूर्व आप एक पक्ष लेकर ही वृत्तियों को देखने जा रहे हैं कि ये वृत्तियां बुरी हैं,इनसे छुटकारा चाहिए; ये वृत्तियां नरक हैं, इनसे मुक्ति चाहिए; ये वृत्तियां ही दुख हैं, इनसे पार होना है।मुक्त होने की बात आपने पहले ही तय कर रखी है। इसलिए आपकी आंतरिक आकांक्षा पर निर्भर करता है कि वृत्तियों का देखना/ऑब्जर्वेशन भी दमन

बन जाए या न बने।यदि कोई व्यक्ति वृत्तियों का निरीक्षण/ऑब्जर्वेशन / साक्षी होना; इसीलिए कर रहा है कि वृत्तियों से मुक्त कैसे हो जाए, तो यह देखना दमन बन जाएगा, सप्रेशन बन जाएगा।

2-ऐसा आपने निरीक्षण के पहले ही तय कर रखा हुआ मत है।आपकी पहले से ही एक पक्षपात की दृष्टि है। वृत्तियों की प्रति शत्रुता /कंडेमनेशन/ निंदा आपके मन में है ..तो फिर वृत्तियों का देखना भी दमन बन जाएगा।और जो देखना दमन बन जाए, वह देखना नहीं है। क्योंकि ऑब्जर्वेशन का, निरीक्षण का, साक्षी होने का एक ही अर्थ है कि निष्पक्ष दर्शन हो सके।

3-तो पहले से ही तय न करें कि वृत्तियों से मुक्त होना है ... वृत्तियां बुरी हैं।वृत्तियों के संबंध में निष्पक्ष भाव रखें। पता नहीं बुरी हों, न हों! और पता नहीं उनसे मुक्त होना है या मुक्त नहीं होना है! यह तो निरीक्षण से निष्कर्ष आने दें... निरीक्षण होने दें। यदि निरीक्षण गहरा जाएगा, तो आप वृत्तियों को समझने में सफल हो पाएंगे।

4-और यह निष्कर्ष.. निरीक्षण पर छोड़ें ''मुक्ति या अमुक्ति, वृत्तियों में रहना या पार हो जाना।'' और आश्चर्य की बात यह है कि जो व्यक्ति निरीक्षण के निष्कर्ष के लिए प्रतीक्षा करता है, और पहले से ही मत, निर्णय नहीं कर लेता, वह अचानक वृत्तियों से मुक्त हो जाता है। वृत्तियों से मुक्त होना नहीं पड़ता, हो जाता है। निरीक्षण का सहज फल वृत्तियों से मुक्ति में ले जाता है।

5-लेकिन हम पहले से ही तय कर लेते हैं। और फिर हम निरीक्षण में भी पक्षपाती की तरह खड़े हैं..साक्षी नहीं हैं ।हम सब अपने संबंध में कई तरह के निर्णय लिए हुए हैं।आपने शास्त्र में

पढ़ लिया है कि वृत्तियां बुरी हैं। शिक्षकों से सुन लिया है,महात्माओं के सत्संग में पकड़ लिया है कि वृत्तियां बुरी हैं। वृत्तियों का आपने कभी निरीक्षण नहीं किया और वृत्तियों को कभी मौका नहीं दिया कि वे अपनी पूर्ण सत्य स्वरूप में आपके सामने प्रकट हो जाएं।

6-आपके निर्णय पक्षपातग्रस्त हैं। वृत्तियों से बिना पूछे ,बिना जाने लिए गए हैं। तो अगर कोई आपसे कहे कि ऑब्जर्व करिए! तो आप ऑब्जर्व / निरीक्षण भी इसीलिए करते हैं कि कैसे छुटकारा हो।किसी ने कह दिया, क्रोध बुरा है।पिता ने कह दिया, यद्यपि पिता भी क्रोध करता था। मां ने कह दिया, यद्यपि मां भी क्रोध करती थी। स्कूल में शिक्षक ने कहा, क्रोध बुरा है, यद्यपि वह भी क्रोध करता था। तो बढ़ता हुआ बच्चा दो बातें सीख लेता है। वह सीख लेता है कि क्रोध बुरा है, सब कहते हैं, इसलिए बुरा होना चाहिए। और क्रोध सब करते हैं, इसलिए करना भी चाहिए।

7-इससे डबल तर्क,/दोहरी बातें,डबल माइंड हो जाता है। क्रोध करने जैसी चीज है, यह भी तय हो जाता है; और क्रोध बुरी चीज है, यह भी तय हो जाता है। अब यह फंस गया। अब यह जिंदगी भर क्रोध करेगा और जिंदगी भर क्रोध को गाली भी देगा।जिस दिन हमारी ठीक शिक्षा होगी, सम्यक, उस दिन हम 'क्रोध बुरा है', ऐसा सिखाएंगे नहीं; हम क्रोध की वृत्ति में प्रवेश सिखाएंगे। और जब भी क्रोध आए, तो क्रोध में कैसे प्रवेश करना है, इसकी प्रक्रिया सिखाएंगे। और प्रक्रिया ही बता देगी कि क्रोध क्या है।प्रक्रिया ऐसा नहीं बता देगी कि क्रोध बुरा है। जैसे ही यह जाना जाता है कि क्रोध क्या है, व्यक्ति क्रोध के पार हो जाता है।

8-पश्चिम में संत गुरजिएफ के पास कोई भी जाता था तो वह कहता था कि तुम्हारी मूल कमजोरी क्या है? अगर वह कहता, मेरी मूलवृत्ति है--क्रोध की, लोभ की, मोह की, काम की, तो जो भी मूल कमजोरी होती, वह कहता कि अब पंद्रह दिन तुम अपनी मूल कमजोरी को प्रकट करने की कोशिश करो, जितना कर सको।अगर वह कहता, क्रोध है। तो वह कहता कि तुम जितना क्रोध कर सकते हो, करो।

9-और संत गुरजिएफ ऐसी स्थितियां पैदा कर देता कि उस आदमी को क्रोध में बिलकुल पागल हो जाना पड़ता। और जब वह आदमी बिलकुल पागल होता और कंप रहा होता उसका रोआं-रोआं क्रोध की आग