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क्या है समत्व योग?क्या दमन समत्व योग नहीं है?


समत्व/संयम का क्या अर्थ है?-

14 FACTS;-

1-समत्वं योग उच्यते...समत्व-योग का विवेचन करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि अति..चाहे निद्रा में, भोजन में,या जागरण में हो ..समता लाने में बाधा है। किसी भी बात की अति, व्यक्तित्व को असंतुलित कर जाती है।प्रत्येक वस्तु का एक अनुपात है; उस अनुपात से कम या ज्यादा हो, तो व्यक्ति को नुकसान पहुंचने शुरू हो जाते हैं।गीता में श्रीकृष्ण सफल ध्यान के लिए कुछ बाधाओं से बचने की ओर संकेत करते हैं जो शरीर व मन से जुड़ी हैं। योगेश्वर ने कहा ''हे अर्जुन किन्तु अधिक भोजन करने वाले का , योग , सिद्ध नहीं होता , और , न एकदम उपवास पर रहने वाले को ही योगसिद्ध हो पाता है। अत्यधिक सोने वाले व्यक्ति का भी नहीं और फिर न ही सदा जागने वाले का योग सिद्ध हो पाता है। जो आहार और विहार के कर्मों में अपनी चेष्टाओं को संतुलित रखता है तथा निद्रा जागरण में संयत होता है, उसके लिए ही यह ध्यान (योग) दुःखनाशक सिद्ध होता है।''

2-जो अतिवाद न बरते, समय पर जागे, समय पर सोये, समय पर खाए-अधिक न खाए-अत्यल्प भी न खाए, उतना ही ले जितना जरूरी है, तो ध्यान हेतु मनोभूमि बन जाती है। योगी होने के लिए हर विषय में विशेष संयम की आवश्यकता पड़ती है।

‘‘संयम का अर्थ है संतुलन। दोनों अतियों की ओर न सरकना। ठीक मध्य में रहना।समत्व ही योग है ... संतुलन दो छोरों के बीच। समत्व यही है कि हम किसी भी प्रकार के अतिवाद से बचें!

3-संतुलन को समत्व भी कहते हैं।साँसारिक पदार्थों में प्रवृत्ति की हममें जितनी शक्ति होती है, उतनी ही जब उनसे निवृत्त होने की भी शक्ति होती है, तो उस अवस्था को संतुलित और

समत्व की अवस्था कह सकते हैं।इस समत्व को आचरण में उतारने के लिए केवल विरागी अथवा रागहीन होने से ही कार्य नहीं चलता । संतुलित अवस्था तो तब होगी, जब रागहीन होने के साथ-साथ द्वेषहीन भी हुआ जाय। अपने देश के तथाकथित साधुओं ने यहीं भूल की। वे विरागी तो हो गये, पर साथ-साथ राग से बचने की धुन में उन्होंने द्वेष को भी अपना लिया। संसार के सुख-दुख से संबद्ध न होने की चाह में उन्होंने संसार से अपना संबंध विच्छेद कर लिया और उसकी सेवाओं से अपना मुख मोड़ लिया।

4-जब दो गुण ऐसे होते हैं, जो परस्पर विपरीत दिशाओं में प्रवृत्त करते हैं, तो उनके पारस्परिक संयोग से चित्त की जो अवस्था होती है, उसे भी संतुलित अवस्था कहते हैं। दया मनुष्य को दूसरों का दुःख दूर कराने में प्रवृत्त कराती है, पर निर्मोह या निर्ममत्व मनुष्य को दूसरों के सुख-दुःख से संबंधित होने से पीछे हटाता है। अतएव दया और निर्ममत्व दोनों के एक बराबर होने से चित्त संतुलित होता है। जहाँ दया मनुष्य को अनुरक्त करती है, वहाँ निर्ममता विरक्त।

5-दया में प्रवृत्तात्मक और निर्ममता में निवृत्तात्मक शक्ति है। उसी तरह संतोष और श्रमशीलता एक-दूसरे को संतुलित करते हैं। परिश्रमशीलता में प्रवृत्तात्मक और संतोष में निवृत्तात्मक शक्ति है। उसी तरह सत्यता और मृदुभाषिता, सरलता और दृढ़ता, विनय और निर्भीकता, नम्रता और तेज, सेवा और अनासक्ति, शुचिता और घृणा, स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व, तितिक्षा और आत्मरक्षा, दीर्घसूत्रता और आलस्यहीनता, अपरिग्रह और परिग्रह, शक्ति परस्पर एक दूसरे को संतुलित करते हैं। इन युग्मों में से यदि केवल एक का ही विकास हो और दूसरे के विकास की ओर ध्यान न दिया जाय, तो मनुष्य का व्यक्तित्व असंतुलित एवं एकाँगी हो जाएगा

6- स्वतंत्रता प्राप्त व्यक्ति पर अंकुश न होने से उसमें निरंकुशता और उच्छृंखलता बढ़ सकती है। दृढ़ प्रकृति व्यक्ति में हठ करने की प्रवृत्ति हो सकती है। उपरोक्त युग्मों में से प्रत्येक गुण एक-दूसरे को मर्यादित करते हैं और एक-दूसरे का पूरक है।दो विपरीत गुण साथ-

साथ होने चाहिए।पराक्रम के साथ व्यक्ति में दयालुता, क्षमाशीलता के गुण न हों, तो वह अत्याचार ही बरतेगा।पराक्रम सदा क्षमाशीलता के कारण शोभा पाता है जबकि साहसिकता की प्रशंसा शालीनता में निहित है।

7-आत्म सुख की भावना बहुधा मनुष्य को स्वार्थमय कर्मों में प्रवृत्त करती है और लोक सुख की भावना लोककल्याण के कार्यों में। अतएव आत्म सुख और लोक सुख दो विभिन्न दृष्टिकोण हुए। इनके समन्वय से जो मध्यम स्थिति उत्पन्न होती है, वही संतुलित विचार पद्धति है।जब मनुष्य में दंड की सामर्थ्य रहते हुए भी अपमान सहन करने की क्षमता होती है, तब वह मान-सम्मान की परवाह न करते हुए भी लोक कल्याण करने वाले शुभ कर्मों के करने में पूर्ण उत्साही होता है और