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क्या रहस्य है सृष्टि-यज्ञ का?क्या यज्ञ के लिए ही कर्म होना चाहिए?


हममें बहुत कम लोग ही जानते हैं कि गिनती की सांसों के साथ हमें भेजा गया है, कर्मभूमि में। 21,600 प्रति अहोरात्र के हिसाब से ,360 दिनों वाले सौ वर्षो का हिसाब है हमारे पास जीवन के खाते में। 'कर्म' ही गिनती का हिसाब लेता-देता है। कर्म पर हमारा नियन्त्रण ही भावी भाग्य का लेखन करता है, और प्रारब्ध बनकर भोगने को विवश करता है। सोने और जागने का सांस भिन्न होता है। ध्यान और मैथुन का सांस भी भिन्न ही होगा, तय बात है। इस सांस की पूंजी को जितने हिसाब से व्यय करेंगे, जीवन उतना ही दीर्घ होगा।

'...योगी लोग कहते हैं कि अन्नमय कोश का जब सम्यक् शोधन हो जाता है, तब प्राणमय कोश का पट्ट स्वतः खुल जाता है, और उत्तरोत्तर साधना यदि जारी रहे तो साधक एक-एक कोशों को भेदता मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय के प्रकाश-पुञ्ज का दर्शन कर लेता है। '

होठों की हँसी और नाभी की हँसी में बहुत अन्तर है।आजकल लोग ठीक से हँसना भी कहाँ

जानते हैं।नीचे से ऊपर अनायास, स्वतः आना, और ऊपर से नीचे सायास ले जाना- दोनों बिलकुल ही अलग बात है। सांस छाती से लेंगे तो हँसी में भी सिर्फ होठों का ही इस्तेमाल हो सकेगा। पेट से सांस लेने की कला तो सभ्य समाज का शत्रु बन बैठा है। ऐसे हँसो, ऐसे बोलो, ऐसे चलो, ऐसे खाओ, ऐसे सोओ, ऐसे रहो...ये नियम सभ्यतायी चाबुक की मार है। सभ्य होते ही हम सांस भी सभ्यता वाली लेने लगते हैं। खैरियत है कि सांस कब कितना लेना है, यह जिम्मा प्रकृति ने हमारे अधीन छोड़ा ही नहीं है, अन्यथा जीवन की आपाधापी में हम इसे भी समय पर लेना भूल जाते।

कुम्हार घड़े को बनाते हुए- कितने नज़ाकत से निर्माण करता है। कोई माँ अपने बच्चे को क्या सहलायेगी इतने नाज़ुक हाथों से, जितना कि कुम्हार सहलाता है अपने कच्चे घड़े को। चाक पर घुमाता है, सूत की धार से बड़े चतुराई पूर्वक चाक से अलग करता है, मानों बच्चे का नाल-छेदन कर रहा हो, और फिर आहिस्ते से छांव में रखता है, जैसे माँ पालने में बच्चे को सुला रही हो। कपड़े की पोटली में गोइठे की राख भरकर, मिट्टी और लकड़ी के कड़े'थपकन'से, आहिस्ते-आहिस्ते थपथपा कर घड़े को सही आकार देता है। दो दिन तक कड़ी धूप भी नहीं लगने देता, उसे फटने-बिफरने से बचाने हेतु। और हम इन्सान?

अकसर इन्सान का सर्जन तैयारी से नहीं, बल्कि इत्तफाक से हो जाता है। कामातुर जोड़े आपस में टकराते हैं, आतुरता पूर्वक, बरबरता पूर्वक भी, और किसी कृत्रिम'अवरोधक की चूक' वश सृष्टि रचा जाती है, रची नहीं जाती। रचने और रचाने में बहुत फर्क होता है। आसमान और जमीन-सा फर्क। और जो तैयारी से, योजनावद्ध रुप से रची ही नहीं गयी, उसे पल्लवित करने में सृजनहार की कितनी लालसा होगी?

'...सृष्टि का इतना महत्त्वपूर्ण कार्य- सन्तानोत्पत्ति, और नियम-सिद्धान्त की ऐसी धज्जियां उड़ती हैं कि पूछो मत। गर्भाधान पर ही विचार नहीं, फिर पुंसवन-सीमन्त की बात कौन सोचे! अब तो ये शब्द सिर्फ सिसक रहे हैं, कोशों में पड़े-पड़े। संस्कार चालीस से सिमट कर सोलह हुए, और अब उनका भी ठीक पता नहीं। हाँ मोमबत्तियों से घिरा केक और 'हैप्पीबर्थडे टू यू' नहीं भूलता।

गर्भाधान सम्बन्धी नियम

हमने सुन रखा है कि पुरुष वीर्य(शुक्र)में कुछ क्रोमोजोम होते हैं जो जिम्मेवार हैं नर वा मादा सन्तति के लिए। स्त्री का डिम्ब तो न्यूट्रल होता है।यह केवल X+ X,X+Y क्रोमोजोमों का ही कमाल है ,पर अलग-अलग ग्रह-स्थितियां और रात्रियां इसके लिए जिम्मेवार है- यह सैद्धान्तिक भेद है... ’’ ‘‘ शास्त्रों ने हर चीज की मर्यादा निश्चित की है। हर काम के लिए नियम बनाये हैं। धर्मशास्त्र से लेकर आयुशास्त्र,तथा कामशास्त्र तक ने काम की मर्यादा सुनिश्चित की है। कृष्ण ने तो मर्यादित काम को अपना स्वरुप ही कह दिया है। ऋतुस्नान के पश्चात् अपनी विवाहिता पत्नी के साथ शास्त्र-मर्यादित सम्भोग करने को भी गृहस्थ-धर्म कहा गया है। पारस्करगृह्यसूत्रम्,तथा धर्मसिन्धु आदि ग्रन्थों में इसका विस्तार से वर्णन है।ज्योतिष में लग्न और चन्द्र को सर्वाधिक महत्त्व पूर्ण कहा गया है। ज्योतिषीय भविष्यवाणी का मूलाधार ये ही दोनों हैं।चन्द्रमा को मन का अधिपति माना गया है। इन्हीं बातों का सार- मुहूर्तचिन्तामणि नामक ज्योतिष ग्रन्थ में सु सम्भोगकाल का निर्देश कुछ इस प्रकार किया गया है-

'''तीनों प्रकार के गण्डान्त,दम्पति का वधतारा,दम्पति का जन्मनक्षत्र,मूल,भरणी,अश्विनी,रेवती,मघा आदि चन्द्रनक्षत्र,सूर्य-चन्द्र के ग्रहण- काल, व्यतिपात, वैधृति योग,माता-पिता के निधन दिवस, श्राद्ध-दिवस, किसी भी दिन का दिवाकाल, संध्या,गोधूलि,उषादि काल में,जन्म राशि से अष्टम लग्न,और पापयुक्त लग्न-नक्षत्रों में समागम न करे। भद्रा,षष्ठी, अमावश्या, पूर्णिमा, एकादशी, पंचमी, चतुर्दशी आदि तिथियां,पर्व के दिन, रिक्ता तिथि, रवि,मंगल,गुरु,शनिवार तथा रजोदर्शन की चार रात्रियों में गर्भाधान त्याज्य है।

तथा तीनों उत्तरा, मृगशिरा,हस्ता,अनुराधा,रोहिणी,स्वाती,श्रवण,धनिष्ठा,शतभिष नक्षत्र गर्भाधान के लिए उत्तम हैं। गर्भाधान के समय शुभग्रह केन्द्रत्रिकोण में हों तो अति उत्तम है। चित्रा,पुनर्वसु,पुष्य,और अश्विनी नक्षत्र गर्भाधान के लिए मध्यम कहे गये हैं। इस प्रकार अन्य भी बहुत से नियम कहे गये हैं,जिनका यथा सम्भव पालन करना चाहिए। ध्यान देने की बात है कि ऊपर कहे गये नियमों में सम्भोग के लिए अनुकूल समय,और गर्भाधान के लिए अनुकूल समय दोनों बातों पर इशारा है। सिर्फ सन्तान कामना से ही सम्भोग करना सर्वश्रेष्ठ नियम है,किन्तु सिर्फ कामोन्माद में उन्मत्त होकर अवसर तलाशना .. जो लोग विशेष कर मनोनुकूल सन्तानेच्छु हैं,उन्हें तो और भी नियमों का ध्यान रखना चाहिए। ‘‘ श्रीवासुदेव ने कहा है-

यज्ञ के साथ प्रजा की सृष्टि करके प्रजापति ने पहले कहा कि इसी से तुमलोग बढ़ो,यह तुमलोगों के लिए कामधेनु हो...। उस यज्ञरुपी कामधेनु के अनादर और त्याग के कारण ही संसार विपत्तियों घिरा हुआ है आज। जिस सन्तान के लिए पूर्व पुरुषों ने बड़ी-बड़ी तपस्यायें की हैं,उन्हीं सन्तान-वृद्धि से आज का संसार उब रहा है,उनके आचरण से त्रस्त है,और कृत्रिम विधियों का पालन कर गर्भनिरोध पर बल दे रहा है। इसे ही अपना परम कर्तव्य समझ रहा है। गर्भनिरोध के लिए अनेक उपायों का सहारा ले रहा है। इसका दुश्परिणाम मानव समाज को भुगतना पड़ रहा है,विशेष कर महिलायें इसका शिकार अधिक हो रही है। व्यभिचार भी बढ़ रहा है। स्त्रियों में प्रदर,रजोरोध, युटेरिनकैंसर,स्तनकैंसर,हिस्टिरीया,कामोन्माद वा कामशैथिल्य जैसी बीमारियां बढ़ रही हैं। सच पूछा जाय तो कृत्रिम साधनों से गर्भ का अवरुद्ध करना गर्भपातन के दुष्कर्म से जरा भी कम नहीं है।

श्रीकृष्ण कहते हैं- ''यज्ञ के लिए ही कर्म होना चाहिए''। गर्भाधान भी एक कर्म ही है,एक महान यज्ञ ही है। छान्दोग्यश्रुति कहती है- '' हे गौतम ! पुरुष अग्नि है,उसकी वाणी समित् है, प्राण धूम है,जिह्वा ज्वाला है,आँख अंगारे हैं,कान चिनगारियां हैं,उसी अग्नि में देवता अन्न का होम करते हैं। उसी आहुति से वीर्य बनता है। पुनः कहते हैं- हे गौतम ! स्त्री अग्नि है। उसका उपस्थ समित् है। उस समय जो बातें करता है वही धूम है। स्त्री की योनि ही ज्वाला है। सम्भोग अंगारा है। मुख चिनगारियां हैं। उसी अग्नि में देवता लोग वीर्य का होम करते हैं। उसी आहुति से गर्भ बनता है।) जरा सोचो- कितना पवित्र कर्म है यह सम्भोग...यदि यह मर्यादित हो। किन्तु बिडम्बना ये है कि अपने उत्पन्न सन्तान के सुख-दुःख के लिए माता-पिता सदैव चिन्तित रहते हैं,और ज्योतिषियों के पास दौड़ लगाते रहते हैं,उनकी ग्रहदशा जानने को,परन्तु इन सभी के मूल में जो बात है उस पर जरा भी ध्यान नहीं जाता। यह परम्परा ही लुप्त हो गयी है।

गर्भाधान-काल के महत्त्व और चमत्कार ;-

यूं तो शास्त्रों में चालीस संस्कार कहे गये हैं,जिनमें वाल्य संस्कार आठ हैं,और उनमें प्रथम और प्रधान है गर्भाधान संस्कार। उसके बाद क्रमशः पुंसवन,सीमन्त,जातकर्म,नामकरण, अन्नप्राशन, चौल, और उपनयन की बारी आती है। ये सब संस्कार माता-पिता द्वारा किये जाने वाले संस्कार हैं।

अब भला इनमें बीजारोपण ही गलत तरीके से,गलत समय में हो जायेगा तो भविष्य की बातों पर कितना नियन्त्रण रखा जा सकेगा ! गर्भाधान के कालदोष का ही कमाल है कि कश्यप जैसे पिता से हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु सरीखे राक्षस पैदा हुए। इस काल का ही बल हावी हुआ और उच्चकुल पुलस्त्य के पुत्र विसश्रवा के घर रावण पैदा हुआ। इस काल ने ही विभीषण भी बनाया। ध्रुव और प्रह्लाद भी इसी गर्भाधान काल के अप्रतिम उदाहरण कहे जा सकते हैं। गर्भाधान काल में माता-पिता की मनःस्थिति और परिवेश के साथ-साथ काल भी प्रबल होता है ।

मनुस्मृति का कथन है कि रजस्वला होने के सोलह दिन तक का काल ऋतुकाल है। इनमें पहली चाररात्रि,और बाद में ग्यारहवीं और तेरहवीं रात्रि गर्भधारण के अयोग्य हैं,शेष रात्रियों में समागम प्रशस्त है।(३-४५,४७,५०) इस सम्बन्ध में ज्योतिषशास्त्र बड़ा ही सरल तरीका सुझाता है। चतुर लोग इसी की वर्जना करके गर्भनिरोध को भी अपना सकते हैं,और वांछित गर्भाधान भी कर सकते हैं,जो कि निरापद और स्वास्थ्यकर होगा। ज्योतिर्विद वराहमिहिर कहते हैं- गर्भाधान काल में लग्न,पंचम,नवम में पुंग्रह यानी सूर्य,मंगल,गुरु होंगे तो सुपुत्र की प्राप्ति होगी,और तत्स्थानों में चन्द्रमा वा शुक्र (स्त्रीग्रह) होंगे तो कन्या सन्तान होगी। इसी भांति लग्न,सूर्य और चन्द्रमा विषम राशिस्थ वा नवांश में होंगे तो पुत्र और सम में पुत्री के सूचक होते हैं। लग्न एवं चन्द्रमा पर जिस तरह के ग्रह की दृष्टि होगी तदनुरुप ही सन्तान भी होने की सम्भावना होती है।

गर्भाधान सम्बन्धी एक और नियम(तथ्य)ध्यान रखने योग्य है कि स्त्री की कुण्डली में लग्न, सूर्य, चन्द्रमा के जो-जो नक्षत्र होंगे,उससे सातवें चौदहवें और इक्कीसवें नक्षत्र पर गोचर के चन्द्रमा के आने पर ही स्त्री गर्भधारण कर सकती है,अन्यथा नहीं। हां,कभी-कभी उससे ठीक एक नक्षत्र आगे और पीछे भी स्थिति बन जाती है। इस प्रकार सूक्ष्म गणना करके देखने पर किसी भी स्त्री के लिए किसी भी महीने में केवल तीन दिन(रात्रि)ही गर्भाधान के योग्य हो सकते हैं।’’

स्वरसिद्धान्त से गर्भाधान की प्रक्रिया;- 1-नर-मादा सन्तान के लिए एक और सिद्धान्त है ।स्वरोदय स्वरसिद्धान्त से गर्भाधान की प्रक्रिया का निर्देश है ... पुरुष-स्त्री दोनों के दक्षिण स्वर जारी हों (या जारी कराये जायें) सम्भोग काल में तो पुत्र की प्राप्ति होगी,और इसके विपरीत यानी वामस्वर जारी हों तो कन्या की प्राप्ति होगी। परन्तु इसके लिए स्वर परीक्षण और मनोवांछित परिवर्तन का ज्ञान करके अभ्यास करना होगा,और भोगकाल में भी सांस पर नियन्त्रण रखना होगा।

2-दीर्घायु और सर्वगुणसम्पन्न सन्तान-प्राप्ति हेतु माता-पिता को खान-पान,रहन-सहन आदि अन्य बातों का भी ध्यान रखना चाहिए। पुरुष को चाहिए कि सात्विक(वा सामान्य राजसिक)आहार ले, साथ ही आवश्यकतानुसार असगन्ध,शतावरी,श्वेत-श्याम मुसली, मुलहठी, तुलसी बीज, रेवन्दचीनी,पोस्तादाना आदि का सेवन गोदुग्ध के साथ किया करें, ताकि ओजस्वी सन्तान प्राप्त हो। तथा स्त्री को गर्भधारण की योजना बनाते समय तीन वा छः माह तक गर्भाशय एवं शोणित-शोधन हेतु कशीस,मुसब्बर, हींग,सुहागा,अरिष्ठा,ऐंठा,चित्रक,इन्द्रवारुणी,लक्ष्मणा,मालकांगनी आदि द्रव्यों का सेवन करना चाहिए।

मनोवांछित सन्तान-प्राप्ति हेतु सारणी ;- ‘ ध्यान देने योग्य बात ये है कि मासिक शुरु होने के तीन दिनों तक तो स्त्री अपवित्र ही कही गयी है,उसके साथ भोग कदापि नहीं करना चाहिए। चौथी रात्रि में स्त्री सम्भोग्य तो हो जाती है,फिर भी स्वस्थ सन्तान की कामना वाले व्यक्ति को इससे परहेज ही करना चाहिए। पहले इस सारणी को देखो-समझो,और विचार हो तो इसे नोट भी कर लो– क्रम -रात्रि>>>>>फल 1-चौथी रात्रि>>>>>>अल्पायु / दरिद्रपुत्र 2- पांचवीं रात्रि>>>>>पुत्रवती,योग्य पुत्री 3- छठी रात्रि>>>>>सामान्य आयु वाला पुत्र 4-सातवीं रात्रि>>>>>वंध्या पुत्री 5-आठवीं रात्रि>>>>>ऐश्वर्यवान पुत्र 6-नौवीं रात्रि>>>>>ऐश्वर्यवान पुत्री 7-दसवीं रात्रि>>>>>बुद्धिमान पुत्र 8-ग्यारहवीं रात्रि>>>>>दुश्चरित्रा पुत्री 9-बारहवीं रात्रि>>>>>उत्तम पुत्र 10-तेरहवीं रात्रि>>>>>कुलघातिनी पुत्री 11-चौदहवीं रात्रि>>>>>अति उत्तम पुत्र 12-पन्द्रहवीं रात्रि>>>>>सौभाग्यवती,सुचरित्रा पुत्री 13-सोलहवीं रात्रि>>>>>सर्वगुणसम्पन्न पुत्र

NOTE;-

सोलहवीं रात्रि के बाद यदि गर्भस्थापन करने का प्रयास किया जाय तो मरुभूमि में बीज बोने के समान है। या तो अंकुरण ही नहीं होगा,या होगा तो विकृतिपूर्ण ही। साधना-कक्ष हमतीनों वहां कक्ष से जाकर आसन ग्रहण किए। ठीक सामने बैठ कर बाबा ने एक साथ हमदोनों के सिर पर अपना दायां-बायां हाथ रख दिया,और आँखें बन्द कर तीब्र श्वांस-प्रश्वांस का निर्देश दिये। थोड़ी देर में ही मैंने अनुभव किया- ऊपर से लेकर नीचे तक मेरुदण्ड एक स्वर्णदण्ड भी भांति आलोकित हो रहा है,साथ ही क्षणभर के लिए सभी पद्म भी उद्भासित हो गये । इतना ही नहीं,कुछ देर के लिए ऐसा लगा मानों शरीर का सारा प्राणवायु खिंच कर तीब्र सनसनाहट के साथ मेरुरज्जु को पार करते हुए ऊपर की ओर चढ़ रहा है। बाबा ने अपने हाथ हटा लिए,पर हमारी स्थिति वैसी ही बनी रही काफी देर तक । करीब दो घड़ी बाद आदेश से हमलोगों ने आंखें खोली। उन्होंने कहा – ‘‘ इस अनुभूति को आत्मसात करने का नित्य अभ्यास करो । पहले भी बहुत तरह की अनुभूतियां हुयी हैं,उन्हें भी स्मरण में लाओ,और नित्य कम से कम तीन घंटे का अभ्यास अवश्य किया करो। हो सके तो ये अभ्यास दोनों संध्याओं में करो,और खास तिथियों में तो निशीथ बेला में भी। तुमदोनों के लिए अगले कुछ महीनों का यही अभ्यास क्रम रहेगा।

महर्षि याज्ञवल्क्य तो कहते हैं कि छः महीने के सतत अभ्यास से नाड़ियां पूर्ण शुद्ध हो जाती हैं,यानि कि फिर सामान्य झाड़न-पोछन से काम चल जाता है। सर्वांगीण नाड़ीशुद्धि के पश्चात् कुछ दिनों के लिए क्रमशः इडादि तीनों प्रधान नाडियों की शुद्धि का अभ्यास करना चाहिए। क्यों कि यही वो मार्ग है,जहां से होकर कुण्डलिनी शक्ति को गुजरना है। यदि ये मार्ग शोधित(जागृत) न हुए,और चक्र पर काम करना शुरु कर दिये,तो इसका परिमाम गलत होगा।

अतः, प्रत्येक वैठक में एक से तीन चक्र नाड़ीशोधन आवश्यतानुसार कर लेना चाहिए। यह ठीक वैसे ही है,जैसे बन-बनाये घर में नित्य झाड़ू-पोछा तो लगाना ही पड़ता है न। अन्यथा गर्दगुब्बार,मकड़ियों के जाले अपना स्थान बना लेंगे। फिर तत्वों की शुद्धि पर आ जाओ,ध्यान रहे प्रत्येक पद्मों पर एक-एक तत्त्व हैं- उन बीजों से स्वांस प्रहार करो। सर्वाधिक समय दो प्रथम पर, और फिर इसी भांति आगे बढ़ते जाओ- पंचम तक। और इसके बाद, उनके स्थानों को,जैसा कि चित्र-संकेत मिला है- अभ्यास नित्य जारी रखो। शनैः-शनैः एक-एक पद्मों पर काम करते हुए आगे बढ़ो। तत्त्व,बीज,वाहन,आकृति, वर्ण, मात्रिका आदि सबका चिन्तन होना चाहिए। तुम पाओगे कि धीरे-धीरे सारे वर्ण स्पष्ट हो रहे हैं, और फिर वहां की अन्य चीजें भी।

क्रिया में जल्दबाजी और उत्सुकता जरा भी न हो। बस एक द्रष्टा की भूमिका में रहना है,भोक्ता और कर्ता बनने का प्रयास करोगे तो परेशानी में पड़ोगे। न आनन्द में मस्त होने की बात है, और न भय से भीत होने की। ये मत भूलो कि ये कोई बैगन-टमाटर का पौधा नहीं है, जिसमें तीसरे महीने फल लग ही जायेंगे। फल कब लगेंगे,कैसे लगेंगे- इस विषय पर सोचना ही व्यर्थ है,बेमानी है। तुम्हारा काम है सिर्फ और सिर्फ अभ्यास करना। शिवपंचाक्षर और देवी नवार्ण से विधिवत संस्कार करना अति आवश्यक है- इस विशेष विधि को तो आज के वैद्य भी बिलकुल विसार चुके हैं ,और सही परिणाम न मिलने पर पद्धति(शास्त्र)को दोष देते हैं। जगदम्बा की कृपा से, इन विधियों के पालन से सन्तान की मनोकामना अतिशीध्र पूरी हो । और हां, गर्भधारण हो जाने के बाद नित्य सन्तानगोपालस्तोत्र और नारायण कवच का पाठ अवश्य करना,साथ ही उक्त विधि से संस्कारित करके गर्भपाल रसायन का भी सेवन शुरु कर देना, ताकि किसी प्रकार की दिक्कत न हो।

‘‘ त्रिसंकटवृक्ष;-

वट,पीपल,पाकड़ का एकत्र रोपण त्रिसंकट कहलाता है। इसकी स्थापना बड़ा ही पुण्यदायी है,और बड़े सौभाग्यवान के हाथों ही लग पाता है यह पौधा । अलग-अलग तो बहुत लग जायेंगे,पर एकत्र तीनों को स्थापित होना जरा मुश्किल काम है। कोई न कोई सूख ही जायेगा। वट यानी शिव,पीपल यानी विष्णु, और पाकड़ यानी ब्रह्मा का प्रतीक है इस धरातल पर। त्रिदेवों का एकत्र वास त्रिगुणात्मिका शक्ति का पावन साधना-स्थली होता है,और त्रिगुण से त्राण पाने का माध्यम भी। त्रिसंकट की छाया अपने आप में किसी महान तीर्थ से कम नहीं, वो भी कालिन्दी के तीर पर हो फिर क्या कहना। तत्पश्चात् उपवीति बनाकर,वहीं लेजाकर छोड़ देना जहां, कालीखोह जाने के मार्ग में मूलप्रकृति राधा की दिव्य मूर्ति का दर्शन किया था तुमलोगों ने। तुम जब जाओगे,तो मार्ग खुला मिलेगा,किसी प्रकार की कठिनाई नहीं होगी। उस विन्ध्याचल यात्रा के पूर्व ही तुमलोगों को अपना संसार भी समेट लेना होगा,फिर दिल्ली आकर नौकरी-चाकरी के जंजाल में पड़ने की आवश्यकता नहीं है ।

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