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उच्चस्तरीय साधना विधान के अन्तर्गत योग में आसन( सिद्धासन/सिद्धयोनि आदि ) का क्या महत्व है?


योग क्या है?- 03 FACTS;- 1-योग अनेक प्रकार के होते हैं। राजयोग , कर्मयोग ,हठयोग , लययोग , सांख्ययोग , ब्रह्मयोग , ज्ञानयोग , भक्ति योग ,ध्यान योग , क्रिया योग ,विवेक योग , विभूति योग व प्रकृति पुरुष योग ,मंत्र योग , पुरुषोत्तम योग , मोक्ष योग , राजाधिराजयोग आदि। मगर याज्ञवल्क्यजी ने जीवात्मा और परमात्मा के मेल को ही योग कहा है। वास्तव में योग एक ही प्रकार का होता है , दो या अनेक प्रकारका नहीं।शारीरिक लाभ से कहीं अधिक योग से व्यक्ति को मानसिक व आध्यात्मिक लाभ मिलता है । 2-याज्ञवल्क्य जी बहुत बड़े,ब्रह्मवेत्ता,परमात्मस्वरूप व महान ऋषि थे। उन्होंने योग को संपूर्ण रूप से पारिभाषित किया था। उनके मुताबिक जिस समय मनुष्य सब चिंताओं का परित्याग कर देता है , उस समय उसके मन की , उसकी उस लय अवस्था को योग कहते हैं।अर्थात चित्त की सभी वृत्तियों को रोकने का नाम योग है। 3-वासना और कामना से लिप्त चित्त को वृत्ति कहा गया है। यम नियम आदि की साधना से चित्तका मैल छुड़ा कर इस वृत्ति को रोकने का नाम योग है। योग के आठ अंग हैं। उन्हीं की साधनाकरनी होती है। साधना का अर्थ है अभ्यास। ऋषि याज्ञवल्क्य के अनुसार यम , नियम , आसन, प्राणायाम , प्रत्याहार , धारणा , ध्यान और समाधि... योग के ये आठ अंग हैं। पहले यम , नियम के साथ ही साथ आसन का भी अभ्यास करना उचित है। आसन का महत्व;- 06 FACTS;- 1- समस्त शरीर को सुस्थिर रखने की व्यवस्था आसन मुद्रा कहलाती है।राजयोग की अष्टांग साधना में ‘यम’ नियम के उपरान्त आसन को स्थान दिया गया है। यहाँ आसन का तात्पर्य मात्र बैठने की विधि से नहीं वरन् उस स्थान एवं वातावरण से है। जहाँ उपासना की जाय। आसन के नाम पर सिद्धासन, सर्वांगासन, पद्मासन आदि पंरो को मोड़ने-तोड़ने के विधि विशेष को शोभित नहीं किया जाना चाहिए, वरन् उस समूचे वातावरण का संकेत सन्निहित समझा जाना चाहिए। जहाँ कि उपासना की जा रहीं है या की जानी है। 2-साधना में मन न ल