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क्या है शिव के नटराज स्वरूप का वैज्ञानिक आधार?


क्या है शिव के नटराज स्वरूप का अर्थ?-

04 FACTS;-

1-सनातन धर्म के त्रिदेवों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण और शक्तिशाली माने जाने वाले भगवान शिव के विविध स्वरूप और उनकी लीलाएं हमेशा से जिज्ञासा का विषय रही है।शिव के नटराज स्वरूप की उत्पत्ति का आध्यात्मिक रहस्य है। शिव के इस विशेष स्वरूप का अर्थ जितना व्यापक है उतना ही ग्रहण करने वाला है। दूसरे अर्थों में इस चराचर जगत की जो सर्जना और विनाश है, उसके निर्देशक की भूमिका नटराज ही हैं।भगवान शंकर का नटराज रूप इस बात का सूचक है कि 'अज्ञानता को सिर्फ ज्ञान, संगीत और नृत्य से ही दूर किया जा सकता है।'

2-शिव के तांडव के दो स्वरूप हैं। पहला उनका क्रोध का जिन्हें प्रलयकारी रौद्र तांडव कहा जाता है और दूसरा आनंद प्रदान करने वाला जिसे आनंद तांडव स्वरूप कहा जाता है।भगवान शिव के नटराज स्वरूप का अर्थ है नट यानी नृत्य और राज मतलब राजा यानी नृत्य का राजा।नटराज का अर्थ नृत्य करने वालों का सम्राट से है। यानि समस्त संसार के नृत्यगत प्राणियों का नेतृत्वकर्ता। लेकिन ज्यादातर लोग शिव के तांडव शब्द को उनके क्रोध का स्त्रोत मानते हैं। रौद्र तांडव करने वाले शिव को रूद्र कहा जाता हैं, वहीं दूसरी तरफ आनंद तांडव करने वाले शिव को नटराज कहा जाता है। उन्हें नटराज स्वरूप इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस स्वरूप में शिव नृत्य अवस्था में रहते हैं।

3-नटराज शिव की सबसे प्रसिद्ध प्राचीन मूर्ति है जिसकी चार भुजाएं हैं, इसमें वे चारों ओर अग्नि से घिरे हुए हैं। उनके एक पैर से उन्होंने एक बौने(अकश्मा) को दबा रखा है, और उनका दूसरा पैर नृत्य मुद्रा में ऊपर की ओर उठा हुआ है। उन्होंने अपने पहले दाहिने हाथ में डमरू पकड़ा हुआ है और डमरू की आवाज सृजन का प्रतीक माना जाता है। ऊपर की ओर उठे हुए उनके दूसरे हाथ में अग्नि है यहां अग्नि को विनाश का प्रतीक माना जाता है।अर्थात, शिव

ही सृजनकृता हैं और वो ही विनाश कारक भी हैं। उनके एक हाथ से सृष्टि का सृजन होता हैं तथा दूसरे हाथ से वह सृष्टि का विनाश करते हैं।

4-उनका दूसरा दाहिना हाथ अभय (या आशीष) मुद्रा में उठा हुआ है जो कि हमें सभी बुराईयों से बचाता है।प्राचीन आचार्यों के अनुसार शिव के आनंद तांडव से ही सृष्टि अस्तित्व में आती है तथा उनके रौद्र तांडव में सृष्टि का विनाश हो जाता है। शिव का नटराज स्वरूप भी उनके अन्य स्वरूपों की ही भांति मनमोहक तथा उसकी अनेक व्याख्याएं हैं।

क्या आनंद तांडव है नटराज रूप?-

08 FACTS;-

1-संगीत प्रकृति के हर कण में मौजूद है। भगवान शिव को 'संगीत का जनक' माना जाता है। शिवमहापुराण के अनुसार शिव के पहले संगीत के बारे में किसी को भी जानकारी नहीं थी। नृत्य, वाद्य यंत्रों को बजाना और गाना उस समय कोई नहीं जानता था, क्योंकि शिव ही इस ब्रह्मांड में सर्वप्रथम आए हैं?नाट्य शास्त्र में उल्लेखित संगीत, नृत्य, योग, व्याकरण, व्याख्यान आदि के प्रवर्तक शिव ही हैं।

2-वर्तमान में शास्त्रीय नृत्य से संबंधित जिनती भी विद्याएं प्रचलित हैं। वह तांडव नृत्य की ही देन हैं। तांडव नृत्य की तीव्र प्रतिक्रिया है। वहीं लास्य सौम्य है। लास्य शैली में वर्तमान में भरतनाट्यम, कुचिपुडी, ओडिसी और कत्थक नृत्य किए जाते हैं जो लास्य शैली से प्रेरित हैं। जबकि कथकली तांडव नृत्य से प्रेरित है।

3-पुराणों के अनुसार सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मनाद से जब शिव प्रकट हुए तो उनके साथ 'सत', 'रज' और 'तम' ये तीनों गुण भी जन्मे थे। यही तीनों गुण शिव के 'तीन शूल' यानी

'त्रिशूल'कहलाए।भगवान भोलेनाथ दो तरह से तांडव नृत्य करते हैं। पहला जब वो गुस्सा होते हैं, तब बिना डमरू के तांडव नृत्य करते हैं। लेकिन दूसरे तांडव नृत्य करते समय जब, वह डमरू भी बजाते हैं तो प्रकृति में आनंद की बारिश होती थी। ऐसे समय में शिव परम आनंद से पूर्ण रहते हैं। लेकिन जब वो शांत समाधि में होते हैं तो नाद करते हैं।

4-नाद और भगवान शिव का अटूट संबंध है। दरअसल नाद एक ऐसी ध्वनि है जिसे 'ऊं' कहा जाता है। पौराणिक मत है कि 'ऊं' से ही भगवान शिव का जन्म हुआ है। संगीत के सात स्वर तो आते-जाते रहते हैं, लेकिन उनके केंद्रीय स्वर नाद में ही हैं। नाद से ही 'ध्वनि' और ध्वनि से ही 'वाणी की उत्पत्ति' हुई है। शिव का डमरू 'नाद-साधना' का प्रतीक माना गया है।

नटराज में नृत्य का जो रूपक है वह नाद से भी जुड़ा है। बिना संगीत के नृत्य भला कहां संभव है? नट और नाट्य दोनों शब्द एक ही धातु से बने हैं और शिव और शक्ति के एकीकरण को हृदय में धारण करने के लिए चैतन्य के नाद से स्वयं को जोड़ना होगा।

5-यह नाद क्या है? यह कोई ध्वनि मात्र नहीं, बल्कि चराचर में चेतना की गूंज है। यह नाद है प्रेम का, जो हमें अविभाजित चैतन्य में ले जाता है- जहां कोई दूसरा नहीं होता, जहां कोई भेद नहीं होता, जहां सिर्फ अपनत्व होता है। उस हृदय में नाद स्वयं बज उठता है, नटराज का नृत्य थिरक उठता है और शिव-शक्ति का संगम हो जाता है।

6-भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र का पहला अध्याय लिखने के बाद अपने शिष्यों को तांडव का प्रशिक्षण दिया था। उनके शिष्यों में गंधर्व और अप्सराएं थीं।भरतमुनि के अनुसार नाट्य में संगीत तो अनिवार्य ही है। नाट्यवेद के आधार पर प्रस्तुतियां भगवान शिव के समक्ष प्रस्तुत

की जाती थीं।भरत मुनि के दिए ज्ञान और प्रशिक्षण के कारण उनके नर्तक तांडव भेद अच्छी तरह जानते थे और उसी तरीके से अपनी नृत्य शैली परिवर्तित कर लेते थे।माता पार्वती ने यही नृत्य बाणासुर की पुत्री को सिखाया था। धीरे-धीरे ये नृत्य युगों- युगान्तरों से वर्तमान काल में भी जीवंत है।

7- -भगवान शिव के अनेकों स्वरूप हैं, जिसमें से एक नटराज स्वरूप है जो शिव की आनंदित अवस्था है।नटराज जिसे 'प्राण शक्ति' का प्रतीक भी माना जाता है। तांडव के सात भेद हैं, आनंद तांडव, संध्या तांडव, उमा तांडव, गौरी तांडव, कालिका तांडव, त्रिपुर तांडव, संहार तांडव। वहीं लास्य यौवत और छुरित दो प्रकार का होता है। शिव के आनंदित होकर नृत्य करते आनंद तांडव रूप को ही नटराज कहते हैं।

8-हरिहर स्वरूप के बारे में ये कहा जाता है कि इसका प्रवर्तन शैव और वैष्णव धर्मों के बीच जारी भारी रक्तपात के समापन के लिए हुआ था। जबकि अर्धनारीश्वर का प्रवर्तन नर-नारी को एक-दूसरे के पूरक के रूप में दिखाने के लिए हुआ। इसी तरह शिव के नटराज स्वरूप की उत्पत्ति विषयक धारणा “आनंदम तांडवम” से जुड़ी है।उदाहरण के लिए, चिदंबरम स्थित

नटराज की भव्य मूर्ति को योगसूत्र के प्रणेता पतंजलि ने बनवाया था। इस मूर्ति को पतंजलि ने योगेश्वर शिव के रूप में निरूपित करने की कोशिश की, जिसका अर्थ बेहद व्यापक है।

नटराज के स्वरूप में शामिल प्रतीक चिन्ह;-

05 FACTS;-

1-आनंदम तांडवम/नटराज के स्वरूप में शामिल प्रतीक चिन्ह भी अपने आप में बेहद खास

अर्थों को समाहित किए हुए हैं।शक्ति के साथ एकाकार होने वाला यह शिव-तत्व क्या है? वह शक्ति कौन है जो शिवत्व में विलीन हो जाती है? कर्मकांड और परंपराओं की परतों के नीचे झांकेंगे तो उस निर्मल स्रोत तक पहुंच सकेंगे जो अमृत-स्वरूप है , मूल में सत् है और शिव यानी कल्याणकारी भी है। रुद्र भी है- रुलाने वाला। अद्वैत है, लेकिन द्वैत में भी प्रतिष्ठित है और दोनों से परे होकर दोनों का अधिष्ठान भी है।

2-शिव और शक्ति की इस लीला को समझना है, तो हमें सबसे पहले उनका नटराज स्वरूप समझना होगा। वह रूप जिसमें शिव नृत्यरत हैं। शिव का नृत्य है तांडव, जिसके दो रूप हैं- रौद्र तांडव और आनंद तांडव। जब शिव रौद्र तांडव करते हैं तो वे रुद्रत्व को प्राप्त होते हैं। वही शिव जब आनंद तांडव के उल्लास में मग्न होकर नाचते हैं तो वे नटराज कहलाते हैं। जहां रौद्ररूप में वे संहार का कार्य करते हैं, वहीं नटराज के रूप में वे सृजन करते हैं।

3-शिव हैं अविभाजित चैतन्य जिनमें दोनों ही- रौद्र व आनंद प्रकट हो रहे हैं, जिस तरह किसी शांत झील में लहरें पैदा हो रही हों। यह संसार ही इन दोनों तांडवों की अभिव्यक्ति है। यहां प्रतिपल सृजन चलता रहता है, साथ ही विनाश भी। इस संसार की पृष्ठभूमि हैं शिव... वह अनादि चेतना जिसमें निर्माण-संहार का खेल होता हुआ जान पड़ रहा है। संसार का अर्थ है जो निरंतर सरकता रहे, परिवर्तित होता रहे। लेकिन बदलाव तभी देखा जा सकता है, जब उसके पीछे एक ऐसी पृष्ठभूमि हो जिसमें बदलाव न हो रहा हो- यही अपरिवर्तनीय चेतना शिव है।

4-मानवीय भाषा में शिव का यह जो ‘करना’ व ‘होना’ है, उनकी जो अभिव्यक्ति है- वही शक्ति है। उसी अविभाजित पृष्ठभूमि में बदलाव की प्रतीति शक्ति है। यूं कहें कि शिव और शक्ति कोई दो अलग सत्ताएं नहीं हैं।जब शिव अभिव्यक्त होता है तो शक्ति हो जाता है और जब शक्ति अभिव्यक्ति समेट ले तो शिव हो जाती है। नटराज रूप में हमें शिव और शक्ति ..एक साथ मिल जाते हैं।

5-अन्य प्रतीक;-

06 POINTS;-

1-आनंदम तांडवम की अवस्था संपूर्ण यूनिवर्स के आनंदित होकर नृत्य करने की अवस्था है, जहां पर अज्ञानता व अहंकार का विनाश तथा पंचमहाभूतों सहित समस्त जैव-अजैव का एकीकरण होता है।यानि शिव के इस विशेष स्वरूप का अर्थ जितना व्यापक है, उतना ही ग्रहणीय भी है।नटराज के शांत मुख-मण्डल में सृजन एवं विसृजन की ध्रुवीयता विलीन होकर अतिक्रमित हो जाती है।

2-नटराज की मूर्ति की चार भुजाओं में ऊपर की दायींं भुजा में डमरू है,जो उत्पत्ति के अनहद नाद का प्रतीक है।अभय-मुद्रा में उठी दूसरी दायीं भुजा शांति, सुरक्षा एवं पोषण का प्रतीक है।दो भुजाओं का संतुलन विश्व के सृजन-विसृजन के गतिशील संतुलन को दर्शाता है।

3-ऊपर की बायीं भुजा में उन्होंने घोर तप की आध्यात्मिक अग्नि को धारण किया है, जो बिना इंधन के प्रज्वलित है।इसे विनाश का प्रतीक भी मानते हैं। यानि अप्रिय सर्जना को अग्नि के द्वारा नष्ट कर शिव भगवान ब्रह्मा को पुनर्निर्माण का आमंत्रण देते हैं।

4-दूसरा बायां हाथ ऊर्ध्व-मुखी बायें चरण की ओर संकेत करता दिखता है ,जो संसार अथवा माया-चक्र का प्रतीक है। जिसका अर्थ स्वतंत्रता और उठान से है। यानि शिव अपने इस स्वरूप द्वारा सार्वभौमिक स्वतंत्रता का उद्घोष करते हैं, जो मनुष्यता के सर्वाधिक गरिमामयी स्थिति का उद्घोषक है।

5-तांडव स्वरूप में स्थित नटराज एक बौने राक्षस के ऊपर नृत्यरत हैं। यहां बौने राक्षस को अहंकार,अज्ञानता का प्रतीक माना गया तथा शिव का उसके ऊपर मग्न होकर एक लय से नृत्य करने को ...अज्ञानता के ऊपर विजय से जोड़ा गया है।

6-नटराज की लयबद्ध नृत्यरत स्थिति स्वयं में ब्रहाण्ड की लयबद्धता की उद्घोषणा करती है। अपनी इस स्थिति के द्वारा नटराज ये सिद्ध करते हैं बिना गति के कोई भी जीवन नहीं और जीवन के लिए लयबद्धता अनिवार्य है।

नटराज का वैज्ञानिक आधार क्या हैं?-

क्या नटराज शिव आध्यात्मिकता एवं वैज्ञानिकता के अद्भुत प्रतीक हैं?

आध्यात्मिकता के अद्भुत प्रतीक;-

03 FACTS;-

1-नटराज, दो शब्दों 'नट' यानी कला और राज से मिलकर बना है। इस स्वरूप में शिव कलाओं के आधार हैं।आनंद तांडव नृत्यनटराज शिव की प्रसिद्ध प्राचीन मूर्ति की चार भुजाएं हैं। उनके चारो ओर अग्नि का घेरा है। अपने एक पांव से शिव ने एक बौने को दबा रखा है। दूसरा पांव नृत्य मुद्रा में ऊपर की ओर उठा हुआ है। शिव अपने दाहिने हाथ में डमरू पकड़े हुए हैं। डमरू की ध्वनि यहां सृजन का प्रतीक है। ऊपर की ओर उठे उनके दूसरे हाथ में अग्नि है। यहां अग्नि विनाश का प्रतीक है। इसका अर्थ यह है कि शिव ही एक हाथ से सृजन और दूसरे से विनाश करते हैं।

2-शिव का तीसरा दाहिना हाथ अभय मुद्रा में उठा हुआ है। उनका चौथा बांया हाथ उनके उठे हुए पांव की ओर इशारा करता है, इसका अर्थ यह भी है कि शिव के चरणों में ही मोक्ष है। शिव के पैरे के नीचे दबा बौना दानव अज्ञान का प्रतीक है, जो कि शिव द्वारा नष्ट किया जाता है। चारो ओर उठ रही लपटें इस ब्रह्माण्ड का प्रतीक है। शिव की संपूर्ण आकृति ओंकार स्वरूप दिखाई पड़ती है जो यह इस बात की ओर इशारा करती है कि 'ॐ' '' शिव'' में ही निहित है।

3-नटराज प्रतीक है शिव के आनंद तांडव स्वरूप का।रुद्र रूप में शिव समूचे ब्रह्माण्ड के संहारक बन जाते हैं जबकि नटराज प्रतिमा 'सृष्टि निर्माण' का प्रतीक है।आनंद तांडव के

पांच रूप हैं ...

3-1. 'सृष्टि' : निर्माण, रचना।

3-2. 'स्थिति' : संरक्षण, समर्थन।

3-3. 'संहार' : विनाश

3-4. तिरोभाव : मोह-माया

3-5. अनुग्रह : मुक्ति

वैज्ञानिकता के अद्भुत प्रतीक;-

09 FACTS;-

1-नटराज का नृत्य ब्रह्माण्ड का नृत्य है।यह ऊर्जा का अंतहीन प्रवाह है, जो एक-दूसरे में विलीन होते उन अनंत चित्रों में अभिव्यक्त होता है।शिव का आनंद-तांडव काल और दिशाओ ..दोनों को अपने में समाहित करता है।उनका यह नृत्य संपूर्ण ब्रह्मांड

को समावेशित करता सृजन एवं विसृजन का शाश्वत नृत्य है, जो पदार्थ के अस्तित्व का आधार है।

2-शिव के नटराज ही सभी तत्‍वों के होने का आधार है, आधुनिक भौतिकशास्त्र हमें बताता है कि हर उप-परमाणविक कण ना केवल एक 'ऊर्जा-नृत्य' करता है, बल्कि यह खुद भी एक 'ऊर्जा-नृत्य' ही है, सृजन और विनाश की एक सतत प्रक्रिया।''खुद भौतिकी के वैज्ञानिकों

के लिए शिव का 'आनंद-तांडव', उप-परमाणविक कणों का 'ऊर्जा-नृत्य' ही है, जो आधार है हर अस्तित्व और सभी प्राकृतिक घटनाओं का।

3-हिन्दू धर्म अकेला ऐसा धर्म है जो हमें यह बताता है कि हमारे दिन और रात की तरह ही स्वयं ब्रह्मा के भी दिन और रात होते हैं, हमारे 24 घंटे के दिन और रात की जगह ब्रह्मा के दिन और रात की अवधि तकरीबन 20 करौड वर्ष की होती है, हिन्दू धर्म एक अनवरत प्रक्रिया की बात करता है।शिव, अपनी इस मुद्रा से हमें हर पल याद दिलाते हैं कि कि ब्रह्मांड लगातार गतिमान है, खुद को परिवर्तित कर रहा है और स्थिर तो ये कभी नहीं रहा।हमें अभी भी इस ब्रह्मांड का सबसे बड़ा रहस्य नहीं पता है, हिन्दू धर्म विश्व के उन महान धर्मों में से एक है जिसके अनुसार इस ब्रह्माण्ड की उत्तपत्ति और विध्वंस की प्रक्रिया निरंतर जारी है।

4-वैज्ञानिकों को नटराज शिव के नृत्य एवं अवपरमाणविक पदार्थों के नृत्य में अद्भुत साम्य परिलक्षित हुआ है। उन्होंने ब्रह्माण्डिय नृत्य के चित्रों को आधुनिक परिष्कृत तकनीकों द्वारा चित्रित किया है।अन्योन्य-क्रियाओं में रत कणों के छाया-चित्र, ब्रह्मांड में सृजन-विसृजन की सतत् लय की पुष्टि करते हैं।

5-क्वांटम क्षेत्र सिद्धांत के अनुसार पदार्थ के घटकों में होनेवाली अन्योन्य-क्रियाओं का निष्पादन, आभासी कणों के उत्सर्जन एवं अवशोषण द्वारा होता है एवं सभी पदार्थीय कण

इसी प्रकार स्वतः अंतर्क्रिया करते हैं।प्रत्येक अवपरमाणविक कण ऊर्जा-नृत्य का निष्पादन करता है एवं यही सृजन-विसृजन की सतत् स्पंदन प्रक्रिया है।प्रत्येक कण की प्रकृति

तथा उसके विभिन्न गुणधर्मों के निर्धारण में इस ऊर्जा-नृत्य के चित्र अति अनिवार्य अंग है। विभिन्न कण अपने नृत्य में विभिन्न चित्रों को विकसित करते हैं।

6-भारत में तमिलनाडु प्रांत के चिदम्बरम में प्राचीन नटराज मंदिर स्थित है जबकि इन्हीं नटराज की विशाल प्रतिमा को स्विट्जरलैंड के जेनेवा स्थित दुनिया के सबसे बड़े भौतिकी प्रयोगशाला के बाहर लगाया गया है।

यूरोपियन ऑर्गनाइजेशन फॉर न्यूक्लियर रिसर्च (सर्न) वही प्रयोगशाला है, जहां कुछ वर्ष पहले 'गॉड पार्टिकल' जिसे हिग्स-बोसोन का नाम दिया गया है, का अनुसंधान हुआ। यहां अनुसंधान हुए हिग्स-बोसोन को 'ब्रह्मकण' के नाम से भी जाना जाता है। लेकिन, आखिर ऐसा क्यों हैं कि दुनिया की सबसे बड़ी भौतिकी प्रयोगशाला के बाहर भगवान शिव की नटराज प्रतिमा लगाई गई।

7-18 जून 2004, दो मीटर लंबी नटराज की प्रतिमा भारत सरकार की ओर से सर्न को भेंट स्वरूप दी गई और जब प्रतिमा यहां लगाई गई तो वैज्ञानिकों को आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ा। शिव के नृत्य स्वरूप को लेकर तब तक आपत्तियां उठाई गई ,जब तक वैज्ञानिकों ने हिग्स-बोसोन पार्टिकल की खोज नहीं कर ली। इसके बाद वैज्ञानिकों ने आलोचकों को स्पष्ट किया कि आखिर क्यों सृष्टि के 'संहारक' की प्रतिमा यहां लगाई गई है।

8-सर्न के बाहर स्थापित नटराज प्रतिमा के ठीक बगल में लगी पट्टिका

पर महान भौतिक वैज्ञानिक फ्रित्जोफ कैपरा ने उद्धरण के साथ यहां लिखा है, ''सैकड़ों वर्ष पूर्व भारतीय कलाकारों ने तांबे की श्रृंखला से भगवान शिव के नृत्य में लीन स्वरूप को बनाया। आज हमारे समय में तमाम भौतिक वैज्ञानिक फिर से उन्नत तकनीकों को इस्तेमाल करते हुए 'कॉस्मिक डांस' का प्रारूप तैयार कर रहे हैं। वर्तमान में वैज्ञानिकों की 'कॉस्मिक डांस' की थ्योरी, दरअसल प्राचीन मिथकों, धर्म, कला और भौतिकी की बुनियाद पर ही खड़ी है।

9-वह आगे लिखते हैं, ''आनंद तांडव करते शिव प्रतीक हैं सभी व्यक्त-अव्यक्त के आधार का। आधुनिक भौतिक विज्ञान हमें बताता है कि निर्माण और प्रलय की प्रक्रिया सिर्फ ब्रह्मांड में जीवन के आरंभ और अंत से ही नहीं जुड़ी हुई है, बल्कि ये पूरी सष्टि के कण-कण से जुड़ी हुई है।'' ''क्वांटम फील्ड थ्योरी के अनुसार 'डांस ऑफ क्रियेशन एंड डिस्ट्रक्शन' ही सभी तत्‍वों के होने का आधार है। आधुनिक भौतिकशास्त्र हमें बताता है कि हर उप-परमाणविक कण ना केवल एक 'ऊर्जा-नृत्य' करता है, बल्कि यह खुद भी एक 'ऊर्जा-नृत्य' ही है। सृजन और विनाश की एक सतत

प्रक्रिया।''''खुद हम भौतिकी के वैज्ञानिकों के लिए शिव का 'आनंद-तांडव', उप-परमाणविक कणों का 'ऊर्जा-नृत्य' ही है, जो आधार है हर अस्तित्व और सभी प्राकृतिक घटनाओं का।''

...SHIVOHAM....