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क्या है कुंडलिनी शक्ति जागरण का रहस्य ?PART-02


कुंडलिनी जागरण में तो साधक के शरीर में स्थित कुंड से ही शक्ति ऊपर उठती है। तो क्या कुंड अलग— अलग हैं या कुंड एक ही है ?

ऐसा है, जैसे एक कुएं से तुम पानी भरो। तो तुम्हारे घर का कुआं अलग है, मेरे घर का कुआं अलग है, लेकिन फिर भी कुएं के भीतर के जो झरने हैं वे सब एक ही सागर से जुड़े हैं। तो अगर तुम अपने कुएं के ही झरने की धारा को पकड़कर खोदते ही चले जाओ, तो उस मार्ग में मेरे घर का कुआं भी पड़ेगा, औरों के घर के कुएं भी पड़ेंगे, और एक दिन तुम वहां पहुंच जाओगे जहां कुआं नहीं, सागर ही होगा। जहां से शुरू होती है यात्रा वहां तो व्यक्ति है, और जहां समाप्त होती है यात्रा वहां व्यक्ति बिलकुल नहीं है, वहां समष्टि है; इंडिविजुअल से शुरू होती है और एकोल्युट पर खतम होती है।

तो अगर यात्रा का प्रारंभिक बिंदु पकड़ोगे, तब तो तुम अलग हो, मैं अलग हूं; और अगर इस यात्रा का चरम बिंदु पकड़ोगे, तो न तुम हो, न मैं हूं। और जो है, हम दोनों उसके ही हिस्से और टुकड़े हैं। तो जब तुम्हारे भीतर कुंडलिनी का आविर्भाव होगा तो वह पहले तो तुम्हें व्यक्ति की ही मालूम पड़ेगी, तुम्हारी अपनी मालूम पड़ेगी। स्वभावत:, कुएं पर तुम खड़े हो गए हो। लेकिन जब कुंडलिनी का आविर्भाव बढ़ता चला जाएगा, तब तुम धीरे— धीरे पाओगे कि तुम्हारा कुआं तुम्हारा ही नहीं है, वह औरों से भी जुड़ा है। और जितनी तुम्हारी यह गहराई बढ़ती जाएगी उतना ही तुम्हारा कुआं मिटता जाएगा और सागर होता जाएगा। अंतिम अनुभव में तुम कह सकोगे कि यह कुंड सबका था। तो इसी अर्थ में मैंने कहा कि...... .इसी भांति हम व्यक्ति की तरह अलग—अलग मालूम हो रहे हैं।

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कुंडलिनी की प्रकृति कुछ ऐसी है कि जब यह शांत होती है तो आपको इसके होने का पता भी नहीं होता। जब यह गतिशील होती है तब अपको पता चलता है कि आपके भीतर इतनी ऊर्जा भी है। इसी वजह से कुंडलिनी को सर्प के रूप में चित्रित किया जाता है। कुंडली मारकर बैठा हुआ सांप अगर हिले-डुले नहीं, तो उसे देखना बहुत मुश्किल होता है।अगर आपकी कुंडलिनी जाग्रत है, तो आपके साथ ऐसी चमत्कारिक चीजें घटित होने लगेंगी जिनकी आपने कभी कल्पना भी नहीं की होगी। कुंडलिनी जाग्रत होने से ऊर्जा का एक पूरी तरह से नया स्तर जीवंत होने लगता है, और आपका शरीर और बाकी सब कुछ भी बिल्कुल अलग तरीके से काम करने लगता है। जब हमारी ऊर्जा सर की छोटी तक पहुँचती है तब तीसरी आँख खुलती है तीसरी आंख का अर्थ यह नहीं है कि किसी के माथे में कोई आंख निकल आई है। इसका सीधा सा मतलब यह है कि तीसरी आँख से हम सूक्ष्म चीजे भी देख सकते है जो अपनी बहरी आँखों से नहीं देख सकते ! कुंडलिनी आपके भीतर वह खजाना है, जिसका अब तक इस्तेमाल नहीं हुआ है, जिसका अब तक लाभ नहीं उठाया गया है। आप उस ऊर्जा का इस्तेमाल करके उसे बिल्कुल अलग आयाम में रूपांतरित कर सकते हैं, एक ऐसे आयाम में जिसकी आप कल्पना नहीं कर सकते।आज इंसान परमाणु विज्ञान की खोज में लगा हुआ है। परमाणु को आप देख भी नहीं सकते, लेकिन अगर आप इस पर प्रहार करें, इसे तोड़ दें तो एक जबर्दस्त घटना घटित होती है। जब तक परमाणु को तोड़ा नहीं गया था तब तक किसी को पता भी नहीं था कि इतने छोटे से कण में इतनी जबर्दस्त ऊर्जा मौजूद है। इसी तरह से इंसान भी एक जैविक परमाणु है, जीवन की एक इकाई है। इंसान के भीतर भी वैसी ही जबर्दस्त ऊर्जा मौजूद है। कुंडलिनी जागरण का मतलब यह है कि आपने उस अपार ऊर्जा के इस्तेमाल की तकनीक को पा लिया है।अगर आप कुंडलिनी को जाग्रत करना चाहते हैं तो आपको अपने शरीर, मन और भावना के स्तर पर जरूरी तैयारी करनी होगी, क्योंकि अगर आप बहुत ज्यादा वोल्ट की सप्लाई एक ऐसे सिस्टम में कर दें जो उसके लिए तैयार नहीं है तो सब कुछ जल जाएगा।अगर आप इस ऊर्जा को हासिल करना चाहते हैं, जो कि एक जबर्दस्त शक्ति है, तो आपको स्थिर होना होगा। यह नाभिकीय ऊर्जा (न्यूक्लियर एनर्जी) के इस्तेमाल की तकनीक सीखने जैसा है।

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कुंडलिनी शक्ति जागरण का गुप्त रहस्य -

ऋषियों ने कुंडलिनी का जो स्वरूप बताया है, उसके अनुसार कुंडलिनी एक सर्पिणी की तरह है, जो रीढ़ की हड्डी के नीचे स्थित चतुष्फलक (टेट्राहेड्रन) आकार के एक स्फटिक के समान पत्थर, जिसे 'कूर्म' कहा गया है, और जिसके ऊपर हमारा मेरुदंड टिका होता है, से लिपटी हुई है. कुंडलिनी कूर्म के ऊपर साढ़े तीन बार लिपटी हुई है, और इसका मुख नीचे की ओर है.. अब कुंडलिनी के भौतिक स्वरूप के बारे में जो बताया गया है, वह सब किसी टोमोग्राफी या एम आर आई स्कैन में नहीं दिखता,. इस पर ऋषि-मुनियों का कथन है- यह सब इतना सूक्ष्म है कि भौतिक नेत्रों तथा सहायक उपकरणों से उनको देखना संभव नहीं है.कुंडलिनी के ही संदर्भ में और भी बहुत कुछ है, जो नहीं दिखता. मेरुदंड के भीतर नाड़ियों का एक तंत्र चलता है, जिनसे शरीर के दूर-दराज के अंग भी, जैसे हाथों और पैरों की उंगलियाँ तक सम्बद्ध हैं. कुछ नाड़ियाँ तो स्कैन में दिखती हैं. मेरुदंड के भीतर यह नाड़ियाँ कई जगह आपस में उलझी हुई दिखती हैं, जिनसे कुछ गाँठें बनी हुई हैं. इन गांठों के बारे में कहा गया है कि यह अन्नमय कोश की बन्धन-ग्रंथियाँ हैं-

अन्नमय कोश भौतिक शरीर से इन्हीं ग्रंथियों द्वारा बँधा रहता है. मृत्यु के साथ यह गाँठें खुल जाती हैं, और अन्नमय कोश इस शरीर से अलग हो जाता है. इनके अलावा कुछ और सूक्ष्म नाड़ियाँ हैं, जो किसी स्कैन में नहीं दिखतीं. इनके नाम हैं- इड़ा और पिंगला. इड़ा को चंद्रनाड़ी और पिंगला को सूर्यनाड़ी भी कहा गया है. यह नाड़ियाँ परस्पर लिपटी हुई मस्तिष्क से कूर्म तक चलती हैं. कूर्म पर आकर यह दोनो नाड़ियाँ मिल जाती हैं, और इस मिलन से एक तीसरी नाड़ी- सुषुम्ना की सृष्टि होती है. सुषुम्ना की एक धारा जो नीचे की तरफ चलती है, वह तो थोड़ी दूर चलने के बाद बंद हो जाती है, पर उसकी मुख्य धारा कूर्म से ऊपर वापस मस्तिष्क की ओर चल पड़ी है. मस्तिष्क के उच्चतम शिखर पर जाकर सुषुम्ना नाड़ी हज़ारों दिशाओं में फूट पड़ी है, और मस्तिष्क के चारो ओर बिखर गयी है. सुषुम्ना के अंदर भी तीन संकेंद्रित (concentric) नाड़ियाँ हैं. इनके नाम हैं- वज्रा, चित्रणी और ब्रह्मनाड़ी. वज्रा और चित्रणी एक प्रकार से ब्रह्मनाड़ी की सुरक्षा के लिये हैं. सुषुम्ना की जो धारा नीचे की ओर चली है, वह कूर्म को साढ़े तीन बार लपेट कर नीचे की तरफ मुंह किये हुए बंद पड़ी है. इसी संरचना को ऋषियों ने कुंडलिनी कहा है. एक बात जो ध्यान देने की है, वह यह है कि स्कैन

इत्यादि में दिखने वाली नाड़ियों में जिन्हें nerves कहा जाता है, रक्त का प्रवाह होता है, पर ईड़ा, पिंगला और सुषुम्ना में केवल ऊर्जा (conciousness) का प्रवाह होता है, अतः यह nerves नहीं हैं. अब जिसे कुंडलिनी जागरण कहा गया है, उसका प्रथम चरण है- कुंडलिनी को कूर्म से अलग करना- वह गाँठ, जो सुषुम्ना नाड़ी ने कूर्म पर लगा रखी है, उसे खोलना; उसके बिना ऊर्जा का प्रवाह सुषुम्ना में चढ़ेगा ही नहीं कुंडलिनी के स्वरूप का जो वर्णन ऋषियों ने किया है, वह संभवतः कुंडलिनी तक पहुंचने और उसे जागृत करने की दुरूहता को ध्यान में रख कर ही किया है. कुंडलिनी-जागरण कमज़ोर और अस्थिर मस्तिष्क वालों के लिये नहीं है, और ऐसे लोगों को इस मार्ग से दूर रखने के लिये ही शायद कुंडलिनी की गोपनीयता और उसकी जटिलता का इतना बढ़ा-चढ़ा कर वर्णन किया है. हैं, जो कुंडलिनी के तान्त्रिक पक्ष पर हैं, जिनकी चर्चा न करना ही ठीक होगा, पर लगभग सभी पुस्तकें साधक को एक बिंदु पर ले जा कर छोड़ देती हैं, जिसके बाद साधक को सलाह दी जाती है कि आगे की साधना के लिये वह गुरु की शरण में जाय. वास्तव में बिना प्रत्यक्ष गुरु के इन साधनाओं में उतरना दुस्साहस ही कहा जायेगा.

विद्वानों का वचन है कि अपने मन से किसी से सुनकर अथवा पढ़कर कुंडलिनी-जागरण की साधना में लग जाने में बड़े खतरे हैं. जिस प्रकार गंगा को पृथ्वी पर उतरने के लिये राजी करने

के बाद गंगा के वेग को धारण करने के लिये भगीरथ को भगवान शिव को तैयार करना पड़ा था, उसी प्रकार यदि साधक का शरीर

और मस्तिष्क कुंडलिनी का वेग और तेज सहन करने के लिये तैयार न हो, और वह मात्र हठ के बल पर कुंडलिनी को जागृत करने का प्रयास करता है, तो वह पागल होने अथवा अकस्मात् मृत्यु का खतरा उठा रहा है. अतः बिना गुरु के इन साधनाओं के चक्कर में न पड़ना ही यथेष्ट है.अब प्राणायाम द्वारा कुंडलिनी-जागरण के सिद्धान्त-पक्ष का वर्णन कर रहा हु प्राणायाम में प्रवीणता का प्रमुख मापदंड है- साधक की प्राण-शक्ति को ईड़ा और पिगला नाड़ियों में उतारने की योग्यता. जब साधक एक निश्चित स्तर की प्रवीणता को प्राप्त कर लेता है, अर्थात् 1:2:4:1 के अनुपात को बनाये रखते हुए एक निश्चित संख्या में और निश्चित समानुपातिक स्थिरांक के साथ बिना श्रम के सहज रूप में प्राणायाम होने लगें, तब प्राण को चेतना के साथ इन नाड़ियों में उतारने का प्रयास करना चाहिये. साधक को पसीना आता है, पर यह पसीना श्रम से उत्पन्न पसीने से कुछ अलग प्रकार का होता है. प्राणायाम के बाद इस पसीने को शरीर में मलने की सलाह दी जाती है. जब अभ्यास अगले स्तर तक पहुंचता है, तो शरीर में कंपन का अनुभव होता है. इससे उच्चतर स्तर पर जाने पर पहले कुछ धुएँ या कुहासे जैसी और तदुपरांत उनके पीछे से सूर्य के उगने जैसी अनुभूति होती है. जब यह अनुभूति होने लगे, तब यह समझना चाहिये कि अब साधक कुंडलिनी-जागरण की साधना के लिये तैयार है. अब सबसे पहले कुंडलिनी की ग्रंथि खोलने के लिये इड़ा और पिंगला मार्गों से प्राण को नीचे उतारकर उससे कुंडलिनी के मूल पर आघात करना पड़ता है. उसके साथ मूलबंध, उड्डियानबन्ध और जालंधरबन्ध लगाकर कूर्म पर नीचे से भी दबाव बनाया जाता है.

इन क्रियाओं के सतत अभ्यास के बाद किसी दिन अकस्मात् कुंडलिनी की ग्रंथि खुल जाती है, और प्राण सुषुम्ना नाड़ी में पहुंचने लगता है. अब थोड़ा ऊर्जा-चक्रों का वर्णन करना आवश्यक हो जाता है. इनके नाम हैं- मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्धि, आज्ञा और सहस्रार. इन चक्रों को मोटे तौर पर कुंडलिनी शक्ति के मार्ग में पड़ने वाले स्टेशनों के रूप में समझा जा सकता है. सुषुम्ना-मार्ग में चढ़ाई शुरु होने के बाद पहला पड़ाव मूलाधार चक्र का आता है, और अंतिम पड़ाव सहस्रार चक्र का. यह सहस्रार चक्र वही संरचना है जिसके बारे में ऊपर लिखा गया है कि व़हाँ सुषुम्ना नाड़ी सहस्रों दिशाओं में फैल गयी है. हमारा उद्देश्य क्रमशः इन चक्रों का वेधन करते हुए सहस्रार चक्र तक पहुंचना है. हर चक्र का एक स्थान, एक वर्ण, एक देवता, एक बीज, एक यंत्र होता है एक-एक चक्र के साथ एक-एक सिद्धि जुड़ी हुई है. अणिमा, लघिमा आदि सिद्धियाँ वैसे तो अपने-आप में बहुत बड़ी उपलब्धियाँ हैं, पर संतों ने इन्हें साधना-मार्ग के प्रलोभनों का ही दर्जा दिया है. कुछ साधक इन सिद्धियों को प्राप्त करने के बाद सोचते हैं कि यही वह बल है, जिसके लिये वह साधना कर रहे थे, और ऐसा सोचने के साथ वह साधना छोड़ बैठते हैं. ऐसे लोग अत्यंत दुर्भाग्यशाली कहे जायेंगे, क्योंकि थोड़ा और चलने के बाद उन्हें अथाह स्वर्ण-भंडार मिलने वाला था, पर वह कांसे से संतुष्ट होकर लौट गये. कुंडलिनी शक्ति के सहस्रार चक्र के वेधन के अनुभव और उसकी प्राप्ति पर क्या कहा जाय?! ऋषियों ने उस स्थिति का केवल आलंकारिक वर्णन ही किया है. किसी ने कहा है कि सहस्रार चक्र में शिव शयनावस्था में होते हैं, और नीचे से जब कुंडलिनी शक्ति उनपर आघात करती है, तो शिव और शक्ति का मिलन होता है. किसी ने सहस्रार चक्र को शेषनाग के तुल्य बताया है, जहाँ भगवान विष्णु का निवास है. हमारे लिये इतना जान लेना ही पर्याप्त है कि वहां जो कुछ प्राप्य है, वह अणिमा, लघिमा आदि सिद्धियों से भी कहीं मूल्यवान है, और अगर ऐसा कुछ है, तो उसे प्राप्त करने का प्रयास क्यों न किया जाय?

यद्यपि कुंडलिनी-जागरण की उपलब्धि गुरु के चरणों में बैठ कर श्रद्धा, विश्वास तथा अध्यवसाय के साथ साधना करने वाले को कुंडलिनी अपने आशीर्वाद से वंचित नहीं रखती, ऐसा ऋषियों का वचन है. कुंडलिनी योग का अभ्यास करने के लिए सबसे अच्छा वक्त सुबह का होता है आप इसे प्रातः ४ से ७ कर सकते है योग हमेशा आसान पर ही करे इसके लिए एक कम्बल, कुशा अथवा गर्म कपडे के आसान का चयन करे। सबसे पहले दिमाग को अच्छे से स्थिर कर लीजिए, उसके बाद दोनों भौंहों के बीच के स्थान पर ध्यान लगाना शुरू कीजिए। पद्मासन या सिद्धासन की मुद्रा में बैठकर बाएं पैर की एड़ी को जननेन्द्रियों के बीच ले जाते हुए इस तरह से सटाएं कि उसका तला सीधे जांघों को छूता हुआ लगे।उसके बाद फिर बाएं पैर के अंगूठे तथा तर्जनी को दाहिने जांघ के बीच लें अथवा आप पद्मासन की मुद्रा कीजिए।फिर आपने दाएं हाथ के अंगूठे से दाएं नाक को दबाकर नाभि से लेकर गले तक की सारी हवा को धीरे-धीरे बाहर निकाल दीजिए। इस प्रकार से सारी हवा को बाहर छोड़ दें।सांस को बाहर छोडते हुए दोनों हथेलियों को दोनों घुटनों पर रख लीजिए। फिर अपनी नाक के आगे के भाग पर अपनी नज़र को लगाकर रखिए।इसके बाद ”योगा” प्राणायाम की स्थिति में दूसरी मुद्राओं का अभ्यास करना चाहिए।कुंडलिनी शक्ति को जगाने के लिए कुंडलिनी योगा का अभ्यास किया जाता है। इसके लिए कोई निश्चित समय नहीं होता है। कुंडलिनी योगा का अभ्यास कम से कम एक घंटे करना चाहिए।

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कुंडलिनी ::कुंडलिनी जागरण और उसकी शक्ति क्या आप कुंडलिनी जागरण और शारीरिक ऊर्जा चक्र से ब्रह्मांडीय ऊर्जा चक्र का सम्बन्ध जानते हैं |नहीं जानते तो ध्यान दें |कुंडलिनी जागरण ,शारीरिक ऊर्जा चक्र का ब्रह्मांडीय ऊर्जा संरचना से सम्बन्ध का ज्ञान ,सूक्ष्म शरीर की क्रियाविधि और उसका स्थूल शरीर से सम्बन्ध भारतीय मनीषियों का ज्ञान है जिसे हम भूलते जा रहे हैं किन्तु पाश्चात्य विज्ञानं अब उन्हें ही प्रमाणित कर रहा है |अभी भी नागा साधू ,अघोरी ,तांत्रिक आदि इसे जानते हैं |आज के वैज्ञानिकों ने पिछले कुछ सालों में मान लिया है कि इनकी जानकारी और सही उपयोग से आप अपने खुद के डीएनए को सुगठित व रिबिल्ड तक कर सकते हैं | सोचिये एक जिन्दा इंसान खुद का डीएनए रिबिल्ड कर सकता है जिसे नोबल पुरूस्कार प्राप्त वैज्ञानिक अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं में भी सिर्फ एक डीएनए कोडिंग पर सही ढंग से नहीं कर पाते |यह भारतीय सनातन ज्ञान की महानता है | आधुनिक विज्ञान का मानना है कि सारे आनुवांशिक और अन्य सभी रोगों का इलाज बिना किसी दवा के इस से संभव है | इसी के द्वारा हमारे पूर्वज बिना कुछ खाए पिए हजारों वर्ष तपस्या करते थे और जीवित रहते थे | आज हमें जरुरत है वेदों के रहस्यों को जानने की और अपने पुरातन ज्ञान को प्राप्त करने की आधुनिक विज्ञान वहीँ से निकल रहा है |आधुनिक और विक्सित कहे जाने वाले पाश्चात्य वैज्ञानिक और विज्ञान उन्ही जानकारियों को प्रमाणित करके उन्नत अपने को साबित कर रहा है जिसे हम हजारों साल पहले से जानते रहे हैं |

Korotkov नामक वैज्ञानिक ने आधुनिक उपकरणों व हमारे वैदिक साइंस का मिश्रण कर के रिसर्च की और योग का चक्रों पर प्रभाव व शरीर से निकलने वाले बायो मैग्नेटिक प्रभाव पे व्यापक अध्ययन किया |ये सब वही है जिसे हम वेदों में पढ़ते हैं |तंत्र शास्त्रों में पाते हैं | जब व्यक्ति का उर्जा चक्रों पर नियंत्रण हो जाता है तो उस व्यक्ति की हर भौतिक परेशानी का हल मिलने लगता है ,वह खुद उन्हें नियंत्रित कर पाता है |इससे कुंडली जागरण आदि संभव है ,और संभव है उस व्यक्ति की हर भौतिक परेशानी का हल अच्छा भी और बुरा भी |

हमारी प्राण शक्ति के केंद्र कुंडलिनी को अंग्रेजी भाषा में 'serpent power' कहते हैं। पहले विज्ञान भी इसको नहीं मानता था , क्यूँ की वो खुद कर के देख नहीं सकते थे पर आज उर्जा चक्रों की उर्जा वो देख चुके हैं तो वो आगे खोज कर रहे है कुंडलिनी शक्ति सुषुम्ना नाड़ी में नाभि के निचले हिस्से में मूलाधार के केंद्र में सोई हुई अवस्था में रहती है। इससे सभी नाड़ियों का संचालन होता है। योग में मानव शरीर के भीतर 7 चक्रों का वर्णन किया गया है। कुंडलिनी को जब ध्यान के द्वारा जागृत किया जाता है, तब यही शक्ति जागृत होकर मस्तिष्क की ओर बढ़ते हुए शरीर के सभी चक्रों को क्रियाशील करती है। योग अभ्यास से सुप्त कुंडलिनी को जाग्रत कर इसे सुषम्ना में स्थित चक्रों का भेदन कराते हुए सहस्रार तक ले जाया जाता है। यह कुंडलिनी ही हमारे शरीर, भाव और विचार को प्रभावित करती है।

शरीर में मूलत: सात चक्र होते हैं |मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्धि, आज्ञा और सहस्रार।इनके साथ दो और चक्र यद्यपि होते हैं किन्तु प्रमुखता इन्ही की होती है |शरीर की प्राण वायु का नियमन तीन नाड़ियों द्वारा होता है |ये नाड़ीयाँ इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना हैं | नाड़ियों को शुद्ध करने के लिए विभिन्न तरह के प्राणायाम का अभ्यास करना होता है | इनके शुद्ध होने से शरीर में स्थित 72 हजार नाड़ियाँ भी शुद्ध होने लगती हैं। कुंडलिनी जागरण में नाड़ियों का शुद्ध और पुष्ट होना आवश्यक है। स्वर विज्ञान में इसका उल्लेख मिलता है। सुषुम्ना नाड़ी मूलाधार (Basal plexus) से आरंभ होकर यह सिर के सर्वोच्च स्थान पर अवस्थित सहस्रार तक आती है। सभी चक्र सुषुम्ना में ही विद्यमान हैं। इड़ा को गंगा, पिंगला को यमुना और सुषुम्ना को सरस्वती कहा गया है। इन तीन ना‍ड़ियों का पहला मिलन केंद्र मूलाधार कहलाता है। इसलिए मूलाधार को मुक्तत्रिवेणी और आज्ञाचक्र को युक्त त्रिवेणीकहते हैं।

मेरुरज्जु (spinal card) में प्राणों के प्रवाह के लिए सूक्ष्म नाड़ी है जिसे सुषुम्ना कहा गया है। इसमें अनेक केंद्र हैं। जिसे चक्र अथवा पदम कहा जाता है। कई ना‍ड़ियों के एक स्थान पर मिलने से इन चक्रों अथवा केंद्रों का निर्माण होता है। कुंडलिनी जब चक्रों का भेदन करती है तो उस में शक्ति का संचार हो उठता है, मानों कमल पुष्प प्रस्फुटित हो गया और उस चक्र की गुप्त शक्तियाँ प्रकट हो जाती हैं।चक्र की क्रियाशीलता बढने से वहां से तरंगों का उत्सर्जन बढ़ जाता है जो पूरे शरीर ,ऊर्जा परिपथ और व्यक्ति को प्रभावित करने के साथ ही आसपास का वातावरण भी प्रभावित करती है |

कुंडलिनी जागरण ऐसी क्रिया है, जिसमें व्यक्ति अपने भीतर मौजूद कुंडलिनी शक्ति को जगाकर दिव्यशक्ति को प्राप्त कर सकता है। कुंडलिनी के साथ 7 चक्रों का जागरण होने से मनुष्य को शक्ति और सिद्धि का ज्ञान होता है। वह भूत और भविष्य का जानकार बन जाता है। वह शरीर में बाहर निकल कर कहीं भी भ्रमण कर सकता है। वह अपनी सकारात्मक शक्ति के द्वारा किसी के भी दुख दर्द-दूर करने में सक्षम होता है। सिद्धियों की कोई सीमा नहीं होती।शक्तियों की कोई सीमा नहीं होती |कुंडलिनी जागरण के विभिन्न मार्गों में विभिन्न नियम हैं |योग इसके जागरण हेतु सहस्त्रार से चलता है और मूलाधार तक आकर फिर ऊपर जाता है |इसमें सख्त वर्जनाएं होती हैं |जबकि तंत्र मूलाधार से चलकर सहस्त्रार तक जाता है |यह भौतिकता में रहकर भी मुक्ति ,सिद्धि या जागरण में विश्वास करता है |

कुंडलिनी जागरण के सामान्य नियम :: स्वयं को शुद्ध और पवित्र रखें । शुद्धता और पवित्रता आहार और व्यवहार से आती है। आहार अर्थात सात्विक और सुपाच्चय भोजन तथा उपवास और व्यवहार अर्थात अपने आचरण को शुद्ध रखते हुए सत्य बोलना और सभी से विनम्रतापूर्वक मिलना। स्वयं की दिनचर्या में सुधार करते हुए जल्दी उठना और जल्दी सोना। प्रात: और संध्या को संध्यावंदन करते हुए नियमित रूप से प्राणायाम, धारणा और ध्यान का अभ्यास करना। कुंडलिनी जागरण के लिए कुंडलिनी प्राणायाम, अत्यन्त प्रभावशाली सिद्ध होते हैं। अपने मन और मस्तिष्क को नियंत्रण में रखकर कुंडलिनी योग का लगातार अभ्यास किया जाए तो 6 से 12 माह में कुंडलिनी जागरण होने लगती है। लेकिन यह सब किसी योग्य गुरु के सानिध्य में ही संभव होता है। संयम और सम्यक नियमों का पालन करते हुए लगातार ध्यान करने से धीरे धीरे कुंडलिनी जाग्रत होने लगती है और जब यह जाग्रत हो जाती है तो व्यक्ति पहले जैसा नहीं रह जाता। वह दिव्य पुरुष बन जाता है।

कुंडलिनी एक दिव्य शक्ति है जो सर्प की तरह साढ़े तीन फेरे लेकर शरीर के सबसे नीचे के चक्र मूलाधार में स्थित है। जब तक यह इस प्रकार नीचे रहती है तब तक व्यक्ति सांसारिक विषयों की ओर भागता रहता है। परन्तु जब यह जाग्रत होती है तो ऐसा प्रतीत होने लगता है कि कोई सर्पिलाकार तरंग है जो घूमती हुई ऊपर उठ रही है। यह बड़ा ही दिव्य अनुभव होता है। हमारे शरीर में सात चक्र होते हैं। कुंडलिनी का एक छोर मूलाधार चक्र पर है और दूसरा छोर रीढ़ की हड्डी के चारों तरफ लिपटा हुआ जब ऊपर की ओर गति करता है तो उसका उद्देश्य सातवें चक्र सहस्रार तक पहुंचना होता है, लेकिन यदि व्यक्ति संयम और ध्यान छोड़ देता है तो यह छोर गति करता हुआ किसी भी चक्र पर रुक सकता है। जब कुंडलिनी जाग्रत होने लगती है तो पहले व्यक्ति को उसके मूलाधार चक्र में स्पंदन का अनुभव होने लगता है। फिर वह कुंडलिनी तेजी से ऊपर उठती है और किसी एक चक्र पर जाकर रुकती है उसके बाद फिर ऊपर उठने लग जाती है। जिस चक्र पर जाकर वह रुकती है उसको व उससे नीचे के चक्रों में स्थित नकारात्मक उर्जा को हमेशा के लिए नष्ट कर चक्र को स्वस्थ और स्वच्छ कर देती है। यद्यपि कुंडलिनी सहस्त्रार से मूलाधार तक फैली होती है ,किन्तु इसका कोई भौतिक अस्तित्व व्यक्ति के भौतिक शरीर में नहीं पाया जाता |यह उर्जात्मक सर्पिल संरचना है ,जिसका मूल सम्बन्ध सूक्ष्म शरीर से होता है |यही कारण है की आज तक वैज्ञानिक इसको प्रमाणित नहीं कर पाए और शुरू में इस पर अविश्वास का भी यह एक कारण था |आज तक वैज्ञानिक और आधुनिक विज्ञानं सूक्ष्म शरीर ,भूत-प्रेतों का उर्जा शरीर ही नहीं पकड़ पाए तो यह तो उससे भी उच्च स्थिति है |इसका सम्बन्ध भौतिक शरीर की ऊर्जा संरचना [इलेक्ट्रानिक बाडी] से जुड़े सूक्ष्म शरीर से होता है |यह सूक्ष्म शरीर का नियंत्रक है और सूक्ष्म शरीर ,भौतिक शरीर की ऊर्जा शरीर का ,ऊर्जा शरीर ,भौतिक शारीर का नियामक है |

कुंडलिनी के जाग्रत होने पर व्यक्ति सांसारिक विषय भोगों से दूर हो जाता है और उसका रूझान आध्यात्म व रहस्य की ओर हो जाता है। कुंडलिनी जागरण से शारीरिक और मानसिक ऊर्जा बढ़ जाती है और व्यक्ति खुद में शक्ति और सिद्धि का अनुभव करने लगता है। जब कुंडलिनी जाग्रत होने लगती है तो व्यक्ति को देवी-देवताओं के दर्शन होने लगती हैं। ॐ या हूं हूं की गर्जना सुनाई देने लगती है। आंखों के सामने पहले काला, फिर पील और बाद में नीला रंग दिखाई देना लगता है। उसे अपना शरीर हवा के गुब्बारे की तरह हल्का लगने लगता है। वह गेंद की तरह एक ही स्थान पर अप-डाउन होने लगता है। उसके गर्दन का भाग ऊंचा उठने लगता है। उसे सिर में चोटी रखने के स्थान पर अर्थात सहस्रार चक्र पर चींटियां चलने जैसा अनुभव होता है और ऐसा लगता है कि मानो कुछ है जो ऊपर जाने की कोशिश कर रहा है। रीढ़ में कंपन होने लगता है। इस तरह के प्रारंभिक अनुभव होते हैं।

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परमपिता का अर्द्धनारीश्वर भाग शक्ति कहलाता है यह ईश्वर की पराशक्ति है (प्रबल लौकिक ऊर्जा शक्ति)। जिसे हम राधा, सीता, दुर्गा या काली आदि के नाम से पूजते हैं। इसे ही भारतीय योगदर्शन में कुण्डलिनी कहा गया है। यह दिव्य शक्ति मानव शरीर में मूलाधार में (रीढ की हड्डी का निचला हिस्सा) सुषुप्तावस्था में रहती है। यह रीढ की हड्डी के आखिरी हिस्से के चारों ओर साढे तीन आँटे लगाकर कुण्डली मारे सोए हुए सांप की तरह सोई रहती है। इसीलिए यह कुण्डलिनी कहलाती है।

जब कुण्डलिनी जाग्रत होती है तो यह सहस्त्रार में स्थित अपने स्वामी से मिलने के लिये ऊपर की ओर उठती है। जागृत कुण्डलिनी पर समर्थ सद्गुरू का पूर्ण नियंत्रण होता है, वे ही उसके वेग को अनुशासित एवं नियंत्रित करते हैं। गुरुकृपा रूपी शक्तिपात दीक्षा से कुण्डलिनी शक्ति जाग्रत होकर ६ चक्रों का भेदन करती हुई सहस्त्रार तक पहुँचती है। कुण्डलिनी द्वारा जो योग करवाया जाता है उससे मनुष्य के सभी अंग पूर्ण स्वस्थ हो जाते हैं। साधक का जो अंग बीमार या कमजोर होता है मात्र उसी की यौगिक क्रियायें ध्यानावस्था में होती हैं एवं कुण्डलिनी शक्ति उसी बीमार अंग का योग करवाकर उसे पूर्ण स्वस्थ कर देती है।

इससे मानव शरीर पूर्णतः रोगमुक्त हो जाता है तथा साधक ऊर्जा युक्त होकर आगे की आध्यात्मिक यात्रा हेतु तैयार हो जाता है। शरीर के रोग मुक्त होने के सिद्धयोग ध्यान के दौरान जो बाह्य लक्षण हैं उनमें यौगिक क्रियाऐं जैसे दायं-बायें हिलना, कम्पन, झुकना, लेटना, रोना, हंसना, सिर का तेजी से धूमना, ताली बजाना, हाथों एवं शरीर की अनियंत्रित गतियाँ, तेज रोशनी या रंग दिखाई देना या अन्य कोई आसन, बंध, मुद्रा या प्राणायाम की स्थिति आदि मुख्यतः होती हैं ।

मानव शरीर आत्मा का भौतिक घर

हमारे ऋषियों ने गहन शोध के बाद इस सिद्धान्त को स्वीकार किया कि जो ब्रह्माण्ड में है, वही सब कुछ पिण्ड (शरीर) में है। इस प्रकार मूलाधार चक्र से आज्ञा चक्र तक का जगत माया का और आज्ञा चक्र से लेकर सहस्त्रार तक का जगत परब्रह्म का है।

वैदिक ग्रन्थों में लिखा है कि मानव शरीर आत्मा का भौतिक घर मात्र है। आत्मा सात प्रकार के कोषों से ढकी हुई हैः- १- अन्नमय कोष (द्रव्य, भौतिक शरीर के रूप में जो भोजन करने से स्थिर रहता है), २- प्राणामय कोष (जीवन शक्ति), ३- मनोमय कोष (मस्तिष्क जो स्पष्टतः बुद्धि से भिन्न है), ४- विज्ञानमय कोष (बुद्धिमत्ता), ५- आनन्दमय कोष (आनन्द या अक्षय आनन्द जो शरीर या दिमाग से सम्बन्धित नहीं होता), ६- चित्मय कोष (आध्यात्मिक बुद्धिमत्ता) तथा ७- सत्मय कोष (अन्तिम अवस्था जो अनन्त के साथ मिल जाती है)। मनुष्य के आध्यात्मिक रूप से पूर्ण विकसित होने के लिये सातों कोषों का पूर्ण विकास होना अति आवश्यक है।

प्रथम चार कोष जो मानवता में चेतन हो चुके हैं शेष तीन आध्यात्मिक कोश जो मानवता में चेतन होना बाकी हैं उपरोक्त सातों काषों के पूर्ण विकास को ही ध्यान में रखकर महर्षि श्री अरविन्द ने भविष्यवाणी की है कि “आगामी मानव जाति दिव्य शरीर (देह) धारण करेगी”।

श्री अरविन्द ने अपनी फ्रैन्च सहयोगी शिष्या के साथ, जो माँ के नाम से जानी जाती थीं, अपनी ध्यान की अवस्थाओं के दौरान यह महसूस किया कि अन्तिम विकास केवल तभी हो सकता है जब लौकिक चेतना (जिसे उन्होंने कृष्ण की अधिमानसिक शक्ति कहा है) पृथ्वी पर अवतरित हो।

साधक की कुण्डलिनी चेतन होकर सहस्त्रार में लय हो जाती है, इसी को मोक्ष कहा गया है।

साधना विधि-

रोज सुबह ब्रम्ह-मुहूर्त मे स्नान आदि क्रियाओसे निवृत्त होकर पूर्व दिशा की और मुख करके गुरुमंत्र,चेतना मंत्र,गायत्री मंत्र का जाप करे माला स्फटिक/रुद्राक्ष का होना चाहिये आसान,वस्त्र पीले/लाल रंग के हो,यह सारी क्रिया होने के बाद 9-10 मिनट तक कुंडलिनी के प्रत्येक चक्र पर ध्यान केन्द्रित करना है और इस तरहा से रोज ध्यान के क्रिया का समय आगे बढ़ाना है,ध्यान क्रिया के बाद नित्य 1 माला तन्त्रोक्त कुंडलिनी जागरण मंत्र का जाप प्रारम्भ करना है,अभी तो गर्मी के दिन चल रहे है इसलिये 1 ही माला करे,जब गर्मी के दिन समाप्त होने लगेगे तो आप इस मंत्र का ज्यादा-से-ज्यादा माला मंत्र जाप कर सकते है॰इस साधना मे आपको नित्य सदगुरुदेवजी का मानसिक रूप मे आज्ञा लेना जरूरी है यह मेरा आपसे निवेदन है॰

तन्त्रोक्त कुंडलिनी जागरण मंत्र-

॥ ॐ ऐं ह्रां ह्रीं हुं ह्रै ह्रौं ह: कुल-कुंडलिनी जगन्मात: सिद्धि देही देही स्वाहा ॥

Om aim hraam hreem hum hraim hroum h: kul-kundalini jaganmaat: siddhi dehi dehi swaaha

मंत्र जाप समाप्ती के बाद साधना गुरुचरनोमे समर्पित कीजिये,इस साधना मे पहिले ही दिन से अनुभूतिया मिलने लगता है॰

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आध्यात्म जगत की सभी विविध प्रणाली में कुण्डलिनी का स्थान अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान है. मनुष्य के अंदर ब्रह्मांडीय मुख्य शक्ति के रूप में कुण्डलिनी अवस्थित है. इसी कुण्डलिनी के अनंत क्रम को सम्प्पन करने के लिए विविध मार्ग में विविध पद्धतियाँ है और यही कुण्डलिनी मनुष्य का उसकी स्वयं की विराट सत्ता का साक्षात्कार कराता है. चाहे वह पारदविज्ञान हो सूर्यविज्ञान मंत्र, योग तंत्र या कोई भी क्षेत्र, इन सभी का आधार कुण्डलिनी ही है. और इसी कुण्डलिनी के सप्तम चक्र को सहत्रार चक्र कहा गया है. कुण्डलिनी के मूल स्थान को मूलाधार कहा गया है जिसे शक्ति का स्थान कहा जाता है, जब की उसकी यात्रा एक एक चक्र का चेतन, जागरण, भेदन, विकास आदि विविध चरणों में होता है, तथा कुण्डलिनी शक्ति की यह मूल यात्रा उसके शिव के साथ मिलन के लिए है यह सर्व तंत्र ग्रन्थ स्वीकार करते है. यही चक्र सहस्त्रार है, जिसको सहस्त्र पद्मदल अर्थात १००० कमल पंखुड़ी वाला स्थान कहा जाता है, जिसे शिव का स्थान माना जाता है. सहस्त्रार चक्र सर्वोच्च तत्व, परम तत्व का स्थान है. इसी स्थान से मनुष्य स्व भाव की वासना से मुक्त हो कर ब्रह्म भाव के सत्य की और बढ़ता है तथा समाधि अवस्था को प्राप्त करता है. अगर शरीर का पूर्ण प्राण एक हो कर सहस्त्रार चक्र में केंद्रित हो जाता है तो व्यक्ति निश्चय ही समाधी अवस्था को प्राप्त कर लेता है, जहां पर उसका अस्तित्व ब्रह्म में विलीन हो जाता है. आध्यात्मिक द्रष्टि से यह एक अत्यंत ही उच्चतम अवस्था कही जा सकती है जहां से व्यक्ति विविध ब्रह्मांडीय रहस्यों तथा सत्यों से परिचित होने लगता है. निश्चय ही अगर साधक अपना आध्यात्मिक स्तर इतने उच्च स्तर को प्राप्त करा सकता है तो फिर भौतिक जीवन की तो बात ही क्या. फिर भी अगर कहा जाए तो व्यक्ति के स्मरण शक्ति में उच्चतम विकास होता है, साधक आगंतुक व्यक्ति के मानस में चल रहे विचारों को जानने लगता है, ध्यान में लिन हो सकता है तथा अभ्यास के साथ साथ व्यक्ति कई प्रकार की सिद्धियों की प्राप्ति कर सकता है. लेकिन इन सब के मूल में सर्व प्रथम चेतन तथा जागरण प्रक्रियाए है. साधक को यह समजना चाहिए की अगर कोई पिंड में चेतना नहीं है तो उसका जागरण संभव नहीं हो पता. और जो जागृत नहीं है, उसका विकास नहीं किया जा सकता और अगर वह विकास हो भी जाए तो सुसुप्त अवस्था होने के कारण यह विकास अर्थहिन् ही है. कुण्डलिनी क्रम में पहले कुण्डलिनी को चेतन कर सभी चक्रों को धीरे धीरे चेतन किया जाता है तथा उसके बाद जागरण किया जाता है. यह क्रिया अत्यंत ही पेचीदी तथा जटिल है. लेकिन प्रस्तुत देव दुर्लभ प्रयोग अपने आप में एक आश्चर्य है. इसका कारण यह है की यह सीधे ही सहस्त्रार चक्र अर्थात शिव स्थान को चेतन और जागरण करने की साधना है. अगर व्यक्ति इस साधना को सम्प्पन कर ले तो निश्चय ही वह सहस्त्रार चक्र से सबंधित सभी प्रारंभिक लाभों की प्राप्ति करने में समर्थ होने लगता है. सहस्त्रार से जरने वाले अमृत तत्व का उसको भान होने लगता है तथा शरीर में तत्वों का संचारण योग्य होने से साधक के रोग शोक भी शांत होने लगते है. साथ ही साथ साधक को कई प्रकार की आध्यात्मिक उपलब्धिया तो होती ही है. ऐसे गुप्त प्रयोग को प्राप्त करना निश्चय ही सौभाग्य ही है क्यों की प्राचीन तंत्र मत में मात्र कुछ ही व्यक्तियो को गुरु मुखी प्रणाली से ऐसे प्रयोगों का ज्ञान कराया जाता था. इस देव दुर्लभ प्रयोग को पारदशिवलिंग अथवा सौंदर्य रस कंकण के माध्यम से सम्प्पन किया जाता है. यह प्रयोग साधक किसी भी शुभदिन शुरू कर सकता है.या पूणिमा पर ये साधना करे | समय दिन या रात्रि का कोई भी हो लेकिन साधक को रोज एक ही समय पे यह प्रयोग करना चाहिए. साधक स्नान आदिसे निवृत हो कर सफ़ेद वस्त्रों को धारण करे तथा सफ़ेद आसान पर बैठ जाए. साधक का मुख उत्तर दिशा की तरफ रहे.

साधक को अपने सामने प्राणप्रतिष्ठित विशुद्ध पारदशिवलिंग को स्थापित करना चाहिए. इसके बाद साधक गुरुपूजन तथा पारदशिवलिंग का पूजन सम्प्पन करे.

साधक को पूजन करने के बाद गुरुमंत्र का जाप करना चाहिए. इसके बाद साधक शिवलिंग पर त्राटक करते हुवे निम्न मंत्र की ११ माला मंत्र का जाप करे. यह जाप साधक स्फटिक माला से करे.

ॐ शं शां शिं शुं वं वां विं वुं अमृत वर्चसे वर्चसे सोहं हंसः स्वाहा (Om sham shaam shim shum vam vaam vim vum amrit varchase varchase soham hansah swaha)

मंत्र जाप पूर्ण होने पर साधक थोड़ी देर आँखे बंद कर के शांत चित्त से बैठ जाए. इस प्रकार साधक को ५ दिन तक करना है. साधक को इन ५ दिन में कई प्रकार के अनुभव हो सकते है और कई द्रश्य दिखाई दे सकते है तथा विविध आवाजे सुने दे सकती है लेकिन साधक को विचलित नहीं होना चाहिए, यह सब साधना में सफलता के ही लक्षण है. माला का विसर्जन नहीं करना है, साधक भविष्य में भी इस माला का प्रयोग इस साधना को करने के लिए कर सकता है.

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कुण्डलिनी शक्ति-1

परमपिता का अर्द्धनारीश्वर भाग शक्ति कहलाता है यह ईश्वर की पराशक्ति है (प्रबल लौकिक ऊर्जा शक्ति)। जिसे हम राधा, सीता, दुर्गा या काली आदि के नाम से पूजते हैं। इसे ही भारतीय योगदर्शन में कुण्डलिनी कहा गया है। यह दिव्य शक्ति मानव शरीर में मूलाधार में (रीढ की हड्डी का निचला हिस्सा) सुषुप्तावस्था में रहती है। यह रीढ की हड्डी के आखिरी हिस्से के चारों ओर साढे तीन आँटे लगाकर कुण्डली मारे सोए हुए सांप की तरह सोई रहती है। इसीलिए यह कुण्डलिनी कहलाती है। जब कुण्डलिनी जाग्रत होती है तो यह सहस्त्रार में स्थित अपने स्वामी से मिलने के लिये ऊपर की ओर उठती है। जागृत कुण्डलिनी पर समर्थ सद्गुरू का पूर्ण नियंत्रण होता है, वे ही उसके वेग को अनुशासित एवं नियंत्रित करते हैं। गुरुकृपा रूपी शक्तिपात दीक्षा से कुण्डलिनी शक्ति जाग्रत होकर ६ चक्रों का भेदन करती हुई सहस्त्रार तक पहुँचती है। कुण्डलिनी द्वारा जो योग करवाया जाता है उससे मनुष्य के सभी अंग पूर्ण स्वस्थ हो जाते हैं। साधक का जो अंग बीमार या कमजोर होता है मात्र उसी की यौगिक क्रियायें ध्यानावस्था में होती हैं एवं कुण्डलिनी शक्ति उसी बीमार अंग का योग करवाकर उसे पूर्ण स्वस्थ कर देती है। इससे मानव शरीर पूर्णतः रोगमुक्त हो जाता है तथा साधक ऊर्जा युक्त होकर आगे की आध्यात्मिक यात्रा हेतु तैयार हो जाता है। शरीर के रोग मुक्त होने के सिद्धयोग ध्यान के दौरान जो बाह्य लक्षण हैं उनमें यौगिक क्रियाऐं जैसे दायं-बायें हिलना, कम्पन, झुकना, लेटना, रोना, हंसना, सिर का तेजी से धूमना, ताली बजाना, हाथों एवं शरीर की अनियंत्रित गतियाँ, तेज रोशनी या रंग दिखाई देना या अन्य कोई आसन, बंध, मुद्रा या प्राणायाम की स्थिति आदि मुख्यतः होती हैं ।

मानव शरीर आत्मा का भौतिक घर हमारे ऋषियों ने गहन शोध के बाद इस सिद्धान्त को स्वीकार किया कि जो ब्रह्माण्ड में है, वही सब कुछ पिण्ड (शरीर) में है। इस प्रकार मूलाधार चक्र से आज्ञा चक्र तक का जगत माया का और आज्ञा चक्र से लेकर सहस्त्रार तक का जगत परब्रह्म का है। वैदिक ग्रन्थों में लिखा है कि मानव शरीर आत्मा का भौतिक घर मात्र है। आत्मा सात प्रकार के कोषों से ढकी हुई हैः- १- अन्नमय कोष (द्रव्य, भौतिक शरीर के रूप में जो भोजन करने से स्थिर रहता है), २- प्राणामय कोष (जीवन शक्ति), ३- मनोमय कोष (मस्तिष्क जो स्पष्टतः बुद्धि से भिन्न है), ४- विज्ञानमय कोष (बुद्धिमत्ता), ५- आनन्दमय कोष (आनन्द या अक्षय आनन्द जो शरीर या दिमाग से सम्बन्धित नहीं होता), ६- चित्मय कोष (आध्यात्मिक बुद्धिमत्ता) तथा ७- सत्मय कोष (अन्तिम अवस्था जो अनन्त के साथ मिल जाती है)।