क्या पहचान है साधक की ?क्या है सात शरीर और सात चक्र का रहस्य ?PART-01


साधक का अर्थ ;-

05 FACTS;-

1-इस पूरी धरती में आदिकाल से ही मानव जीवन के प्रति मुख्यतः दो दृष्टिकोण प्राप्त होते हैं । एक तो वे लोग हैं जो जीवन को भोग का अवसर मानकर तद् अनुरुप आचरण करते हैं । वे किसी परमसत्ता के अस्तित्व को, जो धरती पर के समस्त क्रियाकलापों का संचालन करता हो,.. स्वीकार नहीं करते । उनका तर्क है कि परमसत्ता के अस्तित्व का ऐसा कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं है जो सार्वकालिक होने के साथ ही निर्विवाद भी हो । यह लोगों के मन की कल्पना मात्र है ।

2-कुछ प्रबुद्धजनों ने अपना हित साधन के उद्देश्य से परमसत्ता के प्रति भय का वातावरण बनाया और अपने मन की कल्पना को जन सामान्य के हृदय में बड़े ही चतुराई से प्रतिस्थापित कर दिया है। दूसरे प्रकार के लोग परमात्म तत्व की सत्ता को न केवल स्वीकार करते हैं वरन् स्वयं को परमात्मा का अंश आत्मन् के रुप में मानकर आत्मा के परमात्मा में मिलन के लिये चेष्टा करते है, जिसे साधना कहते हैं।इसी भित्ती पर संसार के समस्त धर्म, सम्प्रदाय, आदि खड़े हैं ।

3-भारत में आदिकाल से ही निष्ठा के आधार पर साधकों, श्रद्धालुओं, भक्तों, संतों, महात्माओं को पाँच प्रकार में बाँटा गया है ।

1- शैव, जिनके आराध्य देव शिव जी हैं । 2- शाक्त, जिनके आराध्य देव शक्ति हैं । 3-वैष्णव, जिनके आराध्य देव श्री विष्णु हैं । 4- गाणपत्य, जिनके आराध्य देव गणेश हैं । 5-सौर, जिनके आराध्य देव सूर्य देव हैं ।

जो एकनिष्ठ देव आराधक नहीं हैं उनमें या विशेष प्रयोजनवश पँच देवोपासना भी प्रचलित है । 4-"साधक" -- एक शब्द है।व्यक्ति स्थूल है, जब उसकी चेतना स्थूलता के अतिरिक्त सूक्ष्मता की ओर बढने लगे,निराकार तत्त्व का संपर्क स्वयं करने लगे और दोनों स्थितियों में संतुलन बना ले तब वह 'साधक' शब्द को जीवित करने लगता है।फिर एक साधक का जन्म होता है।और उस निराकार तत्त्व (जो निहायत अपना है) की प्रेरणा को धारण करने लगता है। इस दरम्यान जीवन में ऐसी विपरीत स्थितियां उत्पन्न होती है कि साधना में अग्रसर व्यक्ति टूट कर बिखर जाए अथवा जगत की वासना में बह जाए;उसके पहले वह सिर्फ एक व्यक्ति है अथवा कर्मकाण्डीय है।वह साधना नहीं कर रहा ।

5-साधक का अर्थ है, कि प्यासा है सत्य के लिए।साधक का अर्थ है कि खोजी है,आकांक्षी है,

अभीप्सा से भरा है।संत कबीर,कहते हैं ''जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ, मैं बावरी डूबन डरी, रही किनारे बैठ''।

साधक की पहचान;-

11 FACTS;-

1-साधक अर्थात खोजी का अर्थ ही है कि उसे साधना में बाधाएं हैं। उसे पता नहीं है कि कैसे पात्र बने, कैसे तैयारी करे। सही मार्गदर्शन मिलना मुश्किल है।तो क्या वह मांगने जाए? साधक के मार्ग पर बाधाएं हैं। लेकिन वास्तव में, इसका अर्थ है कि साधक के भीतर बाधाएं हैं ;और मार्ग भी भीतर ही है। अपनी बाधाओं को समझ लेना बहुत कठिन नहीं है।साधक को पहले पात्र बनने की फिकर करनी चाहिए ..जगह -जगह मांगने नहीं जाना चाहिए।

2-वास्तव में, खोजना और मांगना दो अलग बातें हैं,विपरीत बातें हैं।। असल में,जो खोजने से बचना चाहता है;जो खोजना नहीं चाहता;वही मांगता है, खोजी कभी नहीं मांगता। और खोजने और मांगने की प्रक्रिया बिलकुल अलग है। मांगने में हमें दूसरे पर ध्यान रखना पड़ेगा ..जिससे मिलेगा। और खोजने में हमें अपने पर ध्यान रखना पड़ेगा ..जिसको मिलेगा।

सौ साधकों में निन्यानवे साधक होते नहीं, फिर भी साधन की दुनिया में उतर जाते हैं। इससे सारी उलझन खड़ी होती है।

3-तुम्हें प्यास न लगी हो और किसी दूसरे ने जिसने , प्यास की पीड़ा जानी है और फिर जल के पीने की तृप्ति जानी है, तुमसे अपनी तृप्ति की बात कही; बात-बात में तुम प्रभावित हो गए। तुम्हारे मन में भी लोभ जगा। तुमने भी सोचा, कि ऐसा आनंद हमें भी मिले, ऐसी तृप्ति हमें भी मिले। तुम यह भूल ही गए, कि बिना प्यास के तृप्ति का कोई आनंद संभव नहीं है।

उस आदमी ने जो तृप्ति जानी है, वह प्यास की पीड़ा के कारण जानी है। जितनी गहरी होती है पीड़ा, उतनी ही गहरी होती है तृप्ति। जितनी छिछली होती है पीड़ा, उतनी ही छिछली होती है तृप्ति। और पीड़ा हो ही न, और तुम लोभ के कारण निकल गए पानी पीने, तो प्यास तो है ही नहीं। पहचानोगे कैसे, कि पानी हैं?

4-प्यास न हो, तो पानी पीना खतरनाक है। भूख न हो, तो भोजन कर लेना मंहगा पड़ सकता है। सत्य को चाहा ही न हो, तो सदगुरु का मिलना खतरनाक हो सकता है।सौ में से

निन्यानवे लोग तो लोभ के कारण उत्सुक हो जाते हैं। उपनिषद गीत गाते हैं। कबीर उस परम आनंद की चर्चा करते हैं। सदियों-सदियों में मीरा , नानक, चैतन्य नाचे हैं। उनका नाच तुम्हें छू जाता है। उनके गीत की भनक तुम्हारे कान में पड़ जाती है। उन्हें देखकर तुम्हारा हृदय लोलुप हो उठता है। तुम भी ऐसे होना चाहोगे।

5-गौतमबुद्ध के पास जाकर किसका मन नहीं हो उठता, कि ऐसी शांति हमें भी मिले! लेकिन तुमने उतनी अशांति नहीं जानी है, जो गौतम बुद्ध ने जानी। वही अशांति तो तुम्हारी शांति का द्वार बनेगी। तुमने उस पीड़ा को नहीं झेला है, जो गौतम बुद्ध ने झेली हैं। तुम उस मार्ग से नहीं गुजरे हो--कंटकाकीर्ण--जिससे बुद्ध गुजरे हैं। तो जिस मंजिल पर आकर वो नाच रहे हैं, वह उस मार्ग के सारे के सारे दुखभरे अनुभव के कारण..।

6-तुम सीधे मंजिल पर पहुंच जाते हो; मार्ग का तुम्हें कोई पता नहीं। मंजिल भी मिल जाए, तो मिली हुई नहीं मालूम पड़ती। और संदेह तो बना ही रहेगा। पहली फिक्र यह कर लो, कि साधक हो?अगर साधक हो,तो जैसे ही गुरु मिलेगा, प्राण जुड़ जाएंगे;तार मिल जाएगा।

कोई बताने की जरूरत न पड़ेगी। अगर उजाला आ जाए, तो क्या कोई तुम्हें बताने आएगा..तब तुम स्वतः पहचानोगे कि यह अंधेरा नहीं, उजाला है। उजाला स्वतः प्रमाण है।

सदगुरु का मिलन भी स्वतः प्रमाण है। नहीं तो आखिर में तुम सवाल पूछोगे, कि जब परमात्मा मिलेगा तो कैसे पहचानेंगे कि यही परमात्मा है? कोई जरूरत ही नहीं है।

7-जब तुम्हारे सिर में दर्द होता है, तब तुम पहचान लेते हो दर्द। और जब दर्द चला जाता है तब भी तुम पहचान लेते हो, कि अब सब ठीक हो गया--स्वस्थ। दोनों तुम पहचान लेते हो। जब प्राणों में पीड़ा होती है, तब भी तुम पहचान लेते हो; जब प्राण तृप्त हो जाते हैं, तब भी पहचान लेते हो।कोई प्रत्यभिज्ञा/पहचान का शास्त्र नहीं है क्योकि जरूरत ही नहीं है।

लेकिन भूल पहली जगह ही हो जाती है। लोभ के कारण बहुत लोग साधना में प्रविष्ट हो जाते हैं। और अगर लोभ के कारण प्रविष्ट न हों, तो भय के कारण प्रविष्ट हो जाते हैं। वह एक ही बात है।

8-लोभ और भय एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। कोई परमात्मा की प्रार्थना इसलिए कर रहा है कि डरा हुआ है, भयभीत है। कोई प्रार्थना इसलिए कर रहा है कि लोभातुर है। पर दोनों एक ही एक सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों में कोई भी साधक नहीं है। साधक का तो अर्थ ही यह है, कि ''जीवन के अनुभव से जाना, कि जीवन व्यर्थ है। जीवन से गुजरकर पहचाना, कि कोई सार नहीं है। हाथ सिवाय राख लगी कुछ भी न लगा। सब जीवन के अनुभव देख लिए और खाली पाए; पानी के बबूले सिद्ध हुए ''।

9-जब सारा जीवन राख हो जाता है, तब जो भी तुम चाह सकते थे, जो भी तुम मांग सकते थे, जो भी तुम्हारी वासना थी, सब व्यर्थ हो जाती है।जब सब इंद्रधनुष टूट जाते हैं,जीवन का खंडहर रह जाता है।तब उस अनुभूति के क्षण में खोज शुरू होती है, कि फिर सत्य क्या है? सब जीवन तो सपना हो गया। न केवल सपना, बल्कि दुखभरा-सपना हो गया; अब सत्य

क्या है?जब तुम ऐसी उत्कंठा से भरते हो, तब मार्गनिर्देशक/गुरु को पहचानना न पड़ेगा। उसके पैरों की आवाज सुनकर तुम्हारे हृदय के घूंघर बज उठेंगे। उसकी आंख में आंख पड़ते ही सदा के बंद द्वार खुल जाएंगे।उसका एक शब्द ...और तुम्हारे भीतर ऐसी ओंकार की ध्वनि गूंजने लगेगी, जो तुमने कभी जानी ही नहीं थी। तुम एक नई पुलक, एक नए संगीत और नए जीवन से आपूरित हो उठोगे।

10-इसलिए पहले तुम खोज कर लो, कि साधक हो...तब पहचानने की कोई जरूरत न पड़ेगी।क्योकि हृदय की पहचान ही एकमात्र पहचान है।क्योंकि जितने मार्गनिर्देशक/गुरु हैं उतने ही

प्रकार के हैं। कोई परिभाषा काम नहीं आ सकती। महावीर अपने ढंग के हैं, बुद्ध अपने ढंग के, कृष्ण अपने ढंग के, क्राइस्ट अपने ढंग के, मुहम्मद की बात ही और है। सब अनूठे हैं। अगर तुमने कोई परिभाषा बनाई तो वह किसी एक ही मार्गनिर्देशक/गुरु के आधार पर बनेगी। और वैसा मार्गनिर्देशक/गुरु दुबारा पैदा होने वाला नहीं है। इसलिए तुम्हारी परिभाषा में कभी कोई मार्गनिर्देशक/ गुरु बैठेगा ही नहीं।

11-अगर तुमने किसी की परिभाषा पकड़ ली, तो तुम मुश्किल में पड़ोगे क्योंकि उस परिभाषा को पूरा करने वाला दुबारा न आएगा। वह आ चुका और जा चुका। और जब वह आया था, तब तुम पहचान न सके क्योंकि तब तुम कोई दूसरी पुरानी परिभाषा लिए बैठे थे।वास्तव में,साधक की आत्मा ही उसकी सदगुरु है। यदि हम सात शरीरों के संबंध में कुछ और बात समझेंगे तो यह भी समझ में आ सकेगा।

सात शरीर और सात चक्र ;-

जैसे सात शरीर हैं, ऐसे ही सात चक्र भी हैं। और प्रत्येक एक चक्र मनुष्य के एक शरीर से विशेष रूप से जुड़ा हुआ है।

क्या है भौतिक शरीर का मूलाधार चक्र ?-

02 FACTS;-

1- सात शरीर में पहले भौतिक शरीर /फिजिकल बॉडी का जो चक्र है, वह मूलाधार है; वह पहला चक्र है। इस मूलाधार चक्र का भौतिक शरीर से केंद्रीय संबंध है; यह भौतिक शरीर का केंद्र है। इस मूलाधार चक्र की दो संभावनाएं हैं ..पहली प्राकृतिक संभावना है, जो हमें जन्म से मिलती है; और दूसरी एक साधना की संभावना है, जो साधना से उपलब्ध होती है।

2-मूलाधार चक्र की प्राथमिक प्राकृतिक संभावना कामवासना है, जो हमें प्रकृति से मिलती है।अब साधक के सामने पहला ही सवाल यह उठेगा कि यह 'काम'जो उसके भौतिक शरीर का, केंद्रीय तत्व है... इसके लिए क्या करे? और इस चक्र की एक दूसरी संभावना है, जो साधना से उपलब्ध होगी, वह ब्रह्मचर्य है।कामवासना इसकी प्राकृतिक संभावना है और ब्रह्मचर्य इसका ट्रांसफामेंशन / रूपांतरण है। जितनी मात्रा में चित्त कामवासना से केंद्रित और ग्रसित होगा, उतना ही मूलाधार अपनी अंतिम संभावनाओं को उपलब्ध नहीं कर सकेगा। उसकी अंतिम संभावना ब्रह्मचर्य है।इस प्रकार उस चक्र की दो संभावनाएं हैं एक जो हमें प्रकृति से मिली, और एक जो हमें साधना से मिलेगी।

क्या है मूलाधार चक्र की संभावनाएं?-

03 FACTS;-

1-ट्रांसफामेंशन / रूपांतरण कैसे हो सकता है?-

जो हमें प्रकृति से मिली है उसके साथ हम दो काम कर सकते हैं ।हमें जो प्रकृति से मिला है; हम उसमें जीते रहें, लेकिन तब जीवन में साधना शुरू नहीं हो पाएगी। दूसरा काम जो संभव है वह यह कि हम इसे रूपांतरित करें। रूपांतरण के पथ पर जो बड़ा खतरा है, वह खतरा यही है कि कहीं हम प्राकृतिक केंद्र से लड़ने न लगें। जो प्राकृतिक व्यवस्था है वह उससे भागे, तब वह उठ नहीं पाता.. उस तक जो चरम संभावना है—जहां तक उठा जा सकता था। भौतिक शरीर जहां तक उसे पहुंचा सकता था ;वहां तक वह नहीं पहुंच पाता;और जहां से शुरू होता है वहीं अटक जाता है। तो एक तो भोग है और दूसरा दमन है, कि उससे लड़े। दमन बाधा है साधक के मार्ग पर। क्योंकि दमन के द्वारा कभी ट्रांसफामेंशन/ रूपांतरण नहीं होता।

2-दमन बाधा है तो फिर साधक का साधन क्या होगा?

समझ साधन बनेगी, अंडरस्टैंडिंग साधन बनेगी। कामवासना को जो जितना समझ पाएगा उतना ही उसके भीतर रूपांतरण होने लगेगा। उसका कारण है.... प्रकृति के सभी तत्व हमारे भीतर अंधे और मूर्च्छित हैं। अगर हम उन तत्वों के प्रति होशपूर्ण हो जाएं तो उनमें रूपांतरण होना शुरू हो जाता है। जैसे ही हमारे भीतर कोई चीज जागनी शुरू होती है वैसे ही प्रकृति के तत्व बदलने शुरू हो जाते हैं।जागरण / अवेयरनेस केमिस्ट्री है उनके बदलने की, रूपांतरण की।

3-तो अगर कोई अपनी कामवासना के प्रति पूरे भाव और पूरे चित्त, पूरी समझ से जागे, तो उसके भीतर कामवासना की जगह ब्रह्मचर्य का जन्म शुरू हो जाएगा। और जब तक कोई पहले शरीर पर ब्रह्मचर्य पर न पहुंच जाए तब तक दूसरे शरीर की संभावनाओं के साथ काम करना बहुत कठिन है।

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क्या है भाव शरीर के स्वाधिष्ठान चक्र की संभावनाएं?

07 FACTS;-

1-दूसरा शरीर हैं भाव शरीर या आकाश शरीर— ईथरिक बॉडी। दूसरा शरीर हमारे दूसरे चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र से संबंधित है,। स्वाधिष्ठान चक्र की भी दो संभावनाएं हैं। मूलत: प्रकृति से जो संभावना मिलती है, वह है भय, घृणा, क्रोध, हिंसा। ये सब स्वाधिष्ठान चक्र की प्रकृति से मिली हुई स्थिति है। अगर इन पर ही कोई अटक जाता है, तो इसकी जो दूसरी, इससे बिलकुल प्रतिकूल ट्रांसफामेंशन की स्थिति है—प्रेम, करुणा, अभय, मैत्री, वह संभव नहीं हो पाता।

2-साधक के मार्ग पर, दूसरे चक्र पर जो बाधा है, वह घृणा, क्रोध, हिंसा, इनके रूपांतरण का सवाल है। यहां भी वही भूल होगी जो सब तत्वों पर होगी। कोई चाहे तो क्रोध कर सकता है और कोई चाहे तो क्रोध को दबा सकता है। हम दो ही काम करते हैं कोई भयभीत हो सकता है और कोई भय को दबाकर व्यर्थ ही बहादुरी दिखा सकता है। दोनों ही बातों से रूपांतरण नहीं होगा।

3-भय है, इसे स्वीकार करना पड़ेगा; इसे दबाने, छिपाने से कोई प्रयोजन नहीं है। हिंसा है, इसे अहिंसा के बाना पहना लेने से कोई फर्क पड़नेवाला नहीं है; अहिंसा परम धर्म है, ऐसा चिल्लाने से इसमें कोई फर्क पड़नेवाला नहीं है। हिंसा है, वह हमारे दूसरे शरीर की प्रकृति से मिली हुई संभावना है। उसका भी उपयोग है, जैसे कि 'काम' का उपयोग है।यह भौतिक शरीर मिटे, इसके पहले दूसरे भौतिक शरीरों को जन्म मिल सके, इसलिए वह प्रकृति से दी हुई संभावना है।

4-भय, हिंसा, क्रोध, ये सब भी दूसरे तल पर अनिवार्य हैं, अन्यथा मनुष्य बच नहीं सकता, सुरक्षित नहीं रह सकता। भय उसे बचाता है; क्रोध उसे संघर्ष में उतारता है; हिंसा उसे साधन देती है दूसरे की हिंसा से बचने का। वे उसके दूसरे शरीर की संभावनाएं हैं।लेकिन साधारणत:

हम वहीं रुक जाते हैं। इन्हें अगर समझा जा सके ,अगर कोई भय को समझे, तो अभय को उपलब्ध हो जाता है ।अगर कोई हिंसा को समझे, तो अहिंसा को उपलब्ध हो जाता है। और अगर कोई क्रोध को समझे, तो क्षमा को उपलब्ध हो जाता है।

5-असल में, क्रोध एक पहलू है और दूसरा पहलू क्षमा है, वह उसी के पीछे छिपा हुआ पहलू है, वह सिक्के का दूसरा हिस्सा है। लेकिन सिक्का उलटे तब। लेकिन अगर हम सिक्के के एक पहलू को पूरा समझ लें,तब सिक्का उलट जाता है।तब अपने आप ही हमारी जिज्ञासा दूसरी तरफ उलटकर देखने की हो जाती है ।

6-लेकिन हम उसे छिपा लें और कहें, हमारे पास है ही नहीं! भय तो हममें है ही नहीं! तो हम अभय को कभी भी न देख पाएंगे। जिसने भय को स्वीकार कर लिया और कहा, भय है; और जिसने भय को पूरा जांचा—पड़ताला, खोजा, वह जल्दी ही उस जगह पहुंच जाएगा जहां वह जानना चाहेगा भय के पीछे क्या है? जिज्ञासा उसे उलटाने को कहेगी कि सिक्के को उलटाकर भी देख लो। और जिस दिन वह उलटाएगा उस दिन वह अभय को उपलब्ध हो जाएगा। ऐसे ही हिंसा करुणा में बदल जाएगी। वे दूसरे शरीर की साधक के लिए संभावनाएं हैं।

7-इसलिए साधक को जो प्रकृति से,मिला है उसको रूपांतरण करना है। और इसके लिए किसी से बहुत पूछने जाने की जरूरत नहीं है, अपने ही भीतर निरंतर खोजने और पूछने की जरूरत है। हम सब जानते हैं कि क्रोध बाधा है, हम सब जानते हैं, भय बाधा है। क्योंकि जो भयभीत है वह सत्य को खोजने कैसे जाएगा? भयभीत मांगने चला जाएगा। वह चाहेगा कि बिना किसी अनजान रास्ते पर जाए.. कोई दे दे तो अच्छा।

क्या है कारण शरीर- के मणिपुर चक्र की संभावनाएं?-

07 FACTS;-

1-तीसरा शरीर, कारण शरीर / एस्ट्रल बॉडी है।तीसरे शरीर का केंद्र है मणिपुर चक्र। उस मणिपुर चक्र के.. ये दो रूप हैं. संदेह और श्रद्धा। संदेह रूपांतरित होगा तो श्रद्धा बनेगी।प्राथमिक रूप से कारण शरीर में संदेह, विचार...इनके आसपास ही रुका रहता है।'संदेह 'अगर रूपांतरित हो तो श्रद्धा बन जाता है; और 'विचार' अगर रूपांतरित हो तो विवेक बन

जाता है।अगर संदेह को किसी ने दबाया तो वह कभी श्रद्धा को उपलब्ध नहीं होगा।

2-हालांकि सभी तरफ ऐसा समझाया जाता है कि संदेह को दबा डालो, विश्वास कर लो। जिसने संदेह को दबाया और विश्वास किया, वह कभी श्रद्धा को उपलब्ध नहीं होगा; उसके भीतर संदेह मौजूद ही रहेगा -दबा हुआ; भीतर कीड़े की तरह सरकता रहेगा और काम करता रहेगा। उसका विश्वास संदेह के भय से ही थोपा हुआ होगा।

3-न केवल,संदेह को समझना पड़ेगा,बल्कि, संदेह को जीना पड़ेगा, संदेह के साथ चलना पड़ेगा। और संदेह एक दिन उस जगह पहुंचा देता है, जहां संदेह पर भी संदेह हो जाता है। और जिस दिन संदेह पर संदेह होता है उसी दिन श्रद्धा की शुरुआत हो जाती है। विचार को छोड्कर भी कोई विवेक को उपलब्ध नहीं हो सकता। विचार को छोड़नेवाले लोग हैं, छुड़ानेवाले लोग हैं; वे कहते हैं ..विचार मत करो, विचार छोड़ ही दो। अगर कोई विचार छोड़ेगा, तो विश्वास और अंधे विश्वास को उपलब्ध होगा। वह विवेक नहीं है। विचार की सूक्ष्मतम प्रक्रिया से गुजरकर ही कोई विवेक को उपलब्ध होता है।

4-विचार में सदा ही संदेह मौजूद है। विचार सदा इनडिसीसिव है। इसलिए बहुत विचार करनेवाले लोग कभी कुछ तय नहीं कर पाते। और जब भी कोई कुछ तय करता है, वह तभी तय कर पाता है जब विचार के चक्कर के बाहर होता है। डिसीजन जो है वह हमेशा विचार के बाहर से आता है। अगर कोई विचार में पड़ा रहे तो वह कभी निश्चय नहीं कर पाता। विचार के साथ निश्चय का कोई संबंध नहीं है।

5-इसलिए अक्सर ऐसा होता है कि विचारहीन बड़े ही निश्चयात्मक और बड़े ही निश्चयहीन होते हैं। दोनों से खतरा होता है। क्योंकि विचारहीन बहुत डिसीसिव होते हैं। वे जो करते हैं, पूरी ताकत से करते हैं। क्योंकि उनमें विचार होता ही नहीं ..जो जरा भी संदेह पैदा कर दे। दुनिया भर के डाग्मेटिक, फेनेटिक जितने लोग हैं, ये बड़े कर्मठ होते हैं । इनमें शक का तो सवाल ही नहीं है,क्योंकि ये कभी विचार तो करते ही नहीं है। अगर इनको ऐसा लगता है कि एक हजार आदमी मारने से स्वर्ग मिलेगा, तो एक हजार एक मारकर ही फिर रुकते हैं, उसके पहले वे नहीं रुकते। एक दफा उनको खयाल नहीं आता कि यह ऐसा -ऐसा होगा? उनमें कोई इनडिसीजन नहीं है।

6-विचारवान तो सोचता ही चला जाता है ;तो विचार के भय से अगर कोई विचार का द्वार ही बंद कर दे, तो सिर्फ अंधे विश्वास को उपलब्ध होगा। अंधा विश्वास खतरनाक है और साधक के मार्ग में बड़ी बाधा है।तो आंखवाला 'विवेक' चाहिए.. ऐसा विचार जिसमें डिसीजन हो। विवेक का मतलब इतना ही होता है। विवेक का मतलब है कि विचार पूरा है, लेकिन विचार से हम इतने गुजरे हैं कि अब विचार की जो भी संदेह की, शक की बातें थीं, वे विदा हो गई हैं; अब धीरे -धीरे निष्कर्ष में शुद्ध निश्चय साथ रह गया है।

7-लेकिन ध्यान रखें श्रद्धा संदेह के विपरीत नहीं है, शत्रु नहीं है। श्रद्धा संदेह का ही शुद्धतम विकास है, चरम विकास है; वह आखिरी छोर है जहां संदेह का सब खो जाता है। क्योंकि संदेह स्वयं पर संदेह बन जाता है और आत्मघात कर लेता है और श्रद्धा उपलब्ध होती है।

क्या है मनस शरीर के अनाहत चक्र की संभावनाएं?-

10 FACTS;-

1-हमारा चौथा शरीर है , मनस शरीर-- मेंटल बॉडी,साइक। इस चौथे शरीर के साथ हमारे चौथे चक्र, 'अनाहत' का संबंध है। मनस शरीर का जो प्राकृतिक रूप है, वह है कल्पना/ इमेजिनेशन,और स्वप्न /ड्रीमिंग। हमारा मन स्वभावत: यह काम करता रहता हैं -कल्पना करता है और सपने देखता है। रात में भी सपने देखता है, दिन में भी सपने देखता है और कल्पना करता रहता है।

2- अगर कल्पना पूरी तरह से, चरम रूप से विकसित हो, तो संकल्प बन जाती है, विल बन जाती है; और अगर ड्रीमिंग पूरी तरह से विकसित हो, तो विजन बन जाती है, तब वह साइकिक विजन हो जाती है।अगर किसी व्यक्ति की स्वप्न देखने की क्षमता पूरी तरह

से विकसित होकर रूपांतरित हो, तो वह आंख बंद करके भी चीजों को देखना शुरू कर देता है। सपना नहीं देखता तब वह, तब वह चीजों को ही देखना शुरू कर देता है।

3-वह दीवाल के पार भी देख लेता है। अभी तो दीवाल के पार का सपना ही देख सकता है, लेकिन तब दीवाल के पार भी देख सकता है। अभी तो आप क्या सोच रहे होंगे, यह सोच सकता है; लेकिन तब आप क्या सोच रहे हैं, यह देख सकता है। विजन का मतलब यह है कि इंद्रियों के बिना अब उसे चीजें दिखाई पड़नी और सुनाई पड़नी शुरू हो जाती हैं। टाइम और स्पेस के, काल और स्थान के जो फासले हैं, उसके लिए मिट जाते हैं।

4-सपने में भी आप जाते हैं। सपने में आप बंबई में हैं, कलकत्ता जा सकते हैं। और विजन में भी जा सकते हैं। लेकिन दोनों में फर्क होगा। सपने में सिर्फ खयाल है कि आप कलकत्ता गए, विजन में आप चले ही जाएंगे। वह जो चौथी साइकिक बॉडी है, वह मौजूद हो सकती है।

इसलिए पुराने जगत में जो सपनों के संबंध में खयाल था ..वह धीरे -धीरे छूट गया और नये समझदार लोगों ने उसे इनकार कर दिया; क्योंकि हमें चौथे शरीर की चरम संभावना का कोई पता नहीं रहा -सपने के संबंध में पुराना अनुभव यही था कि सपने में आदमी का कोई शरीर निकलकर बाहर यात्रा पर चला जाता है ।

5-उदाहरण केलिए,स्वीडनबर्ग में एक आदमी था जिसे लोग सपना देखनेवाला आदमी ही समझते थे। क्योंकि वह स्वर्ग -नरक की बातें भी कहता था, और शायद स्वर्ग -नरक की बातें सपना ही हो सकती हैं। लेकिन एक दिन वह दोपहर में सोया था, और उसने एकदम उठकर कहा कि ''बचाओ, बचाओ,आग लग गई है! आग लग गई है!'' घर के लोग आ गए, वहां कोई आग नहीं लगी थी। तो उसको उन्होंने जगाया और कहा कि तुम नींद में हो या सपना देख रहे हो? आग कहीं भी नहीं लगी है! उसने कहा, नहीं, मेरे घर में आग लग गई है।

6-उसका घर तीन सौ मील दूर था , लेकिन उसके घर में उस वक्त आग लग गई थी। दूसरे -तीसरे दिन तक खबर आई कि उसका घर जलकर.. बिलकुल राख हो गया। और जब वह सपने में चिल्लाया था तभी आग लगी थी।अब यह सपना न रहा, यह विजन हो गया।अब

तीन सौ मील का जो फासला था वह गिर गया और इस आदमी ने तीन सौ मील दूर जो हो रहा था वह देखा।

7-अब तो वैज्ञानिक भी इस बात के लिए राजी हो गए हैं कि चौथे शरीर की बड़ी साइकिक संभावनाएं हैं। और चूंकि स्पेस ट्रेवेल की वजह से उन्हें बहुत समझकर काम करना पड़ रहा है; क्योंकि आज नहीं कल यह कठिनाई खड़ी हो जाने ही वाली है कि जिन यात्रियों को हम अंतरिक्ष की यात्रा पर भेजेंगे ...मशीन कितने ही भरोसे की हो, फिर भी भरोसे की नहीं है। अगर उनके रेडियो यंत्र जरा भी बिगड़ गए, तो हमसे उनका संबंध सदा के लिए टूट जाएगा; फिर वे हमें खबर भी न दे पाएंगे कि वे कहां गए और उनका क्या हुआ।

8-इसलिए वैज्ञानिक इस समय बहुत उत्सुक हैं कि यह साइकिक, चौथे शरीर का अगर विजन का मामला अगर संभव हो सके ...तो वे यात्री बिना रेडियो यंत्रों के हमें सीधी टेलिपैथक खबर दे सकें, जिससे कुछ बचाव हो सकता है। इससे टेलीपैथी का मामला भी संभव हो सकता है- वह भी चौथे शरीर की आखिरी संभावनाओं का एक हिस्सा है। इस पर

काफी काम हुआ है।आज से कोई तीस साल पहले एक यात्री उत्तर ध्रुव की खोज पर गया था। तो रेडियो यंत्रों की व्यवस्था थी जिनसे वह खबर देता, लेकिन एक और व्यवस्था थी जो अभी -अभी प्रकट हुई है।

9-और वह व्यवस्था यह थी कि ,एक ऐसे आदमी /एक साइकिक को जिसके चौथे शरीर की दूसरी संभावनाएं काम करती थीं, उसको भी नियत किया गया था कि वह भी

खबरें दे।और बड़े मजे की बात यह है कि जिस दिन पानी, हवा, मौसम खराब होता और रेडियो में खबरें न मिलती, उस दिन भी उसे तो खबरें मिलती। और जब पीछे सब डायरी मिलाई गईं, तो कम से कम अस्सी से पंचानबे प्रतिशत के बीच खबरें;जो साइकिक आदमी ने माध्यम की तरह ग्रहण की थीं, वे सही थीं। और रेडियो ने जो खबर की थीं, वह भी बहत्तर प्रतिशत से ज्यादा ऊपर नहीं गई थीं, क्योंकि इस बीच कभी कुछ गड़बड़ हुई, तो बहुत सी चीजें छूट गई थीं।

10-इस संबंध में अमेरिका आदि देश अति उत्सुक हैं इसलिए टेलीपैथी ,क्लेअरवायंस ,थॉट रीडिंग और थॉट प्रोजेक्शन आदि पर बहुत काम चलता है। वे हमारे चौथे शरीर की संभावनाएं हैं। स्वप्न देखना उसकी प्राकृतिक संभावना है; और सत्य देखना, यथार्थ देखना उसकी चरम संभावना है। यह अनाहत हमारा चौथा चक्र है।

क्या है आत्म शरीर का विशुद्ध चक्र ?-

11 FACTS;-

1-पांचवां चक्र है विशुद्ध; वह कंठ के पास है। और पांचवां शरीर है स्‍प्रिचुयूल बॉडी, आत्म शरीर। वह उसका चक्र है, और आत्म शरीर से संबंधित है। अब तक जो चार शरीर की और चार चक्रों की,विवेचना हुई.. वे द्वैत में बंटे हुए थे। पांचवें शरीर से द्वैत समाप्त हो जाता है।चार शरीर तक बॉडी में मेल और फीमेल का फर्क होता है ; पांचवें शरीर से मेल और फीमेल का -- स्त्री और पुरुष का फर्क समाप्त हो जाता है।वास्तव में, सब द्वैत स्त्री और पुरुष का है; द्वैत मात्र/ डुआलिटी मात्र स्त्री -पुरुष की है। और जिस जगह से स्त्री -पुरुष का फासला खत्म होता है, उसी जगह से सब द्वैत खत्म हो जाता है। पांचवां शरीर अद्वैत है। उसकी दो संभावनाएं नहीं हैं, उसकी एक ही संभावना है।

2-इसलिए चौथे के बाद साधक के लिए बड़ा काम नहीं है, सारा काम चौथे तक है। बड़ा काम का अर्थ है कि विपरीत कुछ भी नहीं है वहां। वहां प्रवेश ही करना है। और चौथे तक पहुंचते -पहुंचते इतनी सामर्थ्य इकट्ठी हो जाती है कि पांचवें में सहज प्रवेश हो जाता है।पांचवें शरीर में कोई द्वैत नहीं है।लेकिन कोई साधक जिसने अभी प्रवेश नहीं किया और जो प्रवेश कर गया है, उसमें क्याफर्क है?

3- इनमें फर्क होगा। वह फर्क इतना होगा कि जो पांचवें शरीर में प्रवेश करेगा उसकी समस्त तरह की मूर्च्छा टूट जाएगी; वह रात में नहीं सो सकेगा। सोएगा, शरीर ही सोया रहेगा;परन्तु भीतर उसके कोई सतत जागता रहेगा। अगर उसने करवट भी बदली है तो वह जानता है, नहीं बदली है तो जानता है, अगर उसने कंबल ओढ़ा है तो जानता है, नहीं ओढ़ा है तो जानता है। उसका जानना निद्रा में भी शिथिल नहीं होगा; वह चौबीस घंटे जागरूक होगा।

जिनका पांचवें शरीर में प्रवेश नहीं हुआ, उनकी स्थिति बिलकुल उलटी होगी। वे नींद में तो सोए हुए होंगे ही, जिसको हम जागना कहते हैं, उसमें भी एक पर्त उनकी सोई ही रहेगी।

4-लोग काम करते हुए दिखाई पड़ते हैं। आप अपने घर आते हैं, कार का घूमना बाएं और आपके घर के सामने आकर ब्रेक का लग जाना, तो आप यह मत समझ लेना कि आप सब होश में कर रहे हैं! यह सब बिलकुल आदतन, बेहोशी में होता रहता है। कभी -कभी किन्हीं क्षणों में हम होश में आते हैं, बहुत खतरे के क्षणों में!उदाहरण केलिए, एक आदमी आपकी छाती पर छुरा रख दे -तब आप एक सेकेंड को होश में आते हैं। एक सेकेंड को वह छुरे की धार आपको पांचवें शरीर तक पहुंचा देती है। लेकिन बस, ऐसे दो -चार क्षण जिंदगी में होते हैं, अन्यथा साधारणत: हम सोए -सोए ही जीते हैं।

5-भीतर देखने के लिए कोई जागा हुआ आदमी चाहिए।आपने तो अपने करीबियों का चेहरा भी ठीक से नहीं देखा है, कि अगर अभी आंख बंद करके सोचे तो खयाल कर पाए।रेखाएं थोड़ी देर में ही इधर -उधर हट जाएंगी और पक्का नहीं हो पाएगा कि यह मेरी माँ का चेहरा है जिसको मैंने तीस साल से देखा है;क्योंकि कभी देखा ही नहीं है ।सोया हुआ आदमी,

दिखाई पड रहा है कि देख रहा है, लेकिन वह देख नहीं रहा है। उसके भीतर तो नींद चल रही है, और सपने भी चल रहे हैं। उस नींद में सब चल रहा है।

6-आप क्रोध करते हैं और पीछे कहते हैं कि पता नहीं कैसे हो गया! मैं तो नहीं करना चाहता था। जैसे कि कोई और कर गया हो। आप कहते हैं, यह मुंह से मेरे गाली निकल गई, माफ करना, मैं तो नहीं देना चाहता था, कोई जबान खिसक गई होगी। आपने ही गाली दी, आप ही कहते हैं कि मैं नहीं देना चाहता था। हत्यारे हैं, जो कहते हैं कि पता नहीं, हत्या हो गई; हम तो करना ही नहीं चाहते थे, बस ऐसा हो गया।

7-तो हम यंत्रवत चल रहे हैं ।जो नहीं बोलना है वह बोलते हैं, जो नहीं करना है वह करते हैं। सांझ को तय करते हैं : सुबह चार बजे उठेंगे! कसम खा लेते हैं। सुबह चार बजे हम खुद ही कहते हैं कि क्या रखा है! अभी सोओ, कल देखेंगे। सुबह छह बजे उठकर फिर पछताते हैं और हम ही कहते हैं कि बड़ी गलती हो गई। ऐसा कभी नहीं करेंगे, अब कल तो उठना ही है, जो कसम खाई थी उसको निभाना था।

8-आश्चर्य की बात है, शाम को जिस आदमी ने तय किया था, सुबह चार बजे वही आदमी बदल कैसे गया? फिर सुबह चार बजे तय किया था तो फिर छह बजे कैसे बदल गया? फिर सुबह छह बजे जो तय किया है, फिर सांझ तक बदल जाता है। सांझ बहुत दूर है, वह बीच पच्चीस दफे बदल जाता है।ये निर्णय, ये खयाल, हमारी नींद में आए हुए खयाल हैं,

सपनों की तरह। बस बबलों की तरह बनते हैं और टूट जाते हैं। कोई जागा हुआ , कोई होश से भरा हुआ आदमी पीछे नहीं है।

9-तो नींद आत्मिक शरीर में प्रवेश के पहले की सहज अवस्था है—नींद, सोया हुआ होना। और आत्म शरीर में प्रवेश के बाद की सहज अवस्था है जागृति। इसलिए चौथे शरीर के बाद हम व्यक्ति को बुद्ध कह सकते हैं। चौथे शरीर के बाद जागना आ गया। अब आदमी जागा हुआ है। बुद्ध, गौतम ..सिद्धार्थ का नाम नहीं है, पांचवें शरीर की उपलब्धि के बाद दिया गया विशेषण है—गौतम दि बुद्धा! गौतम जो जाग गया, यह मतलब है उसका। नाम तो गौतम ही है, लेकिन वह 'गौतम' सोए हुए आदमी का नाम था। इसलिए फिर धीरे - धीरे उसको गिरा दिया और बुद्ध ही रह गया।

10-यह हमारे पांचवें शरीर का फर्क हैं, कि उसमें प्रवेश के पहले आदमी सोया -सोया है,सोए हुए आदमियों की दुनिया से है। वह जो भी कर रहा है, वे नींद में किए गए कृत्य हैं। उसकी बातों का कोई भरोसा नहीं, वह जो कह रहा है, वह विश्वास के योग्य नहीं, उसके दिए गए वचन को मानने का कोई अर्थ नहीं। वह कहता है कि मैं जीवन भर प्रेम करूंगा.. और अभी दो क्षण बाद हो सकता है कि वह गला घोंट दे। वह कहता है, यह संबंध जन्मों -जन्मों तक रहेगा! यह दो क्षण न टिके। उसका कोई कसूर भी नहीं है, नींद में दिए गए वचन का क्या मूल्य है? रात सपने में वह किसी को वचन दे कि जीवन भर यह संबंध रहेगा, इसका क्या मूल्य है? सुबह वह कहता हैं कि सपना था।

11-सोए हुए आदमी का कोई भी भरोसा नहीं है। और हमारी पूरी दुनिया सोए हुए आदमियों की दुनिया है। इसलिए इतना कनक्यूजन, इतनी कांफ्लिक्ट, इतना द्वंद्व, इतना झगड़ा,

इतना उपद्रव, ये सोए हुए आदमी पैदा कर रहे हैं।सोए हुए आदमी और जागे हुए आदमी में एक और फर्क हैं। चूकि सोए हुए आदमी को यह कभी पता नहीं चलता कि मैं कौन हूं इसलिए वह पूरे वक्त इस कोशिश में लगा रहता है कि मैं किसी को बता दूं कि मैं यह हूं! उसे खुद ही पता नहीं कि मैं कौन हूं इसलिए पूरे वक्त वह हजार -हजार रास्तों से… कभी राजनीति के किसी पद पर सवार होकर लोगों को दिखाता है कि 'मैं यह हूं'। कभी एक बड़ा मकान बनाकर दिखाता है कि मैं यह हूं कभी पहाड़ पर चढ़कर दिखाता है कि 'मैं यह हूं' वह सब तरफ से कोशिश कर रहा है कि लोगों को बता दे कि 'मैं यह हूं'।और इस सब कोशिश से वह घूमकर अपने को जानने की कोशिश कर रहा है कि 'मैं हूं कौन'?यह उसे पता नहीं है।

क्या है आत्म शरीर के विशुद्ध चक्र की संभावनाएं?-

12 FACTS;-

1-‘क्या उत्तर है-'मैं कौन हूं का'?..इस जीवन में ज़िंदगी जीने के अलावा भी बहुत कुछ है।जीवन का कोई ऊँचा हेतु होना चाहिए। जीवन का हेतु इस प्रश्न के सही जवाब तक पहुँचना है कि ' मैं कौन हूँ? ' यह प्रश्न कितने ही जन्मों से निरुत्तर है।पांचवें शरीर को आत्म शरीर

इसीलिए कह रहे हैं कि वहां तुम्हें पता चलेगा कि तुम कौन हो। इसलिए पांचवें शरीर के बाद ‘मैं’ की आवाजें एकदम बंद हो जाएंगी। क्योंकि अब वह जानता है, अब दावे करने की ,किसी के सामने सिद्ध करने की कोई जरूरत नहीं।अब अपने ही सामने सिद्ध हो गया है कि 'मैं कौन

हूं'।इसलिए पांचवें शरीर के भीतर कोई द्वंद्व नहीं है; लेकिन पांचवें शरीर के बाहर और भीतर गए आदमी में बुनियादी फर्क है; द्वंद्व अगर है तो ...बाहर और भीतर में।पांचवें शरीर में भीतर गए ,आदमी में कोई द्वंद्व नहीं है।

2-क्या आत्मा से परमात्मा में छलांग ही होश है?-

उदाहरण के लिए, एक वृक्ष का एक पत्ता होश में आ जाए, तो उसे पडोस का जो पत्ता लटका हुआ दिखाई पड़ रहा है, वह दूसरा मालूम पड़ेगा। उसी वृक्ष की दूसरी शाखा पर लटका हुआ पत्ता उसे स्वयं कैसे मालूम पड़ सकता है कि यह मैं ही हूं! दूसरी शाखा भी छोड़ दें, उसी शाखा पर लगा हुआ दूसरा पत्ता भी उस वृक्ष के पत्ते को कैसे लग सकता है कि मैं ही हूं! उतनी दूरी भी छोड़ दें, उसी के बगल में, पड़ोस में लटका हुआ जो पता है, वह भी दूसरा ही मालूम पड़ेगा; क्योंकि पत्ते का भी जो होश है, वह व्यक्ति का है।फिर पत्ता अपने भीतर प्रवेश करे, तो बहुत शीघ्र वह पाएगा कि मैं जिस डंठल से लगा हूं उसी डंठल से मेरे पड़ोस का पत्ता भी लगा है, और हम दोनों की प्राणधारा एक ही डंठल से आ रही है।

2-1-वह और थोड़ा प्रवेश करे, तो वह पाएगा कि मेरी शाखा ही नहीं, पड़ोस की शाखा भी एक ही वृक्ष के दो हिस्से हैं और हमारी जीवनधारा एक है। वह और थोड़ा नीचे प्रवेश करे और वृक्ष की रूट्स पर पहुंच जाए, तो उसे लगेगा कि सारी शाखाएं और सारे पत्ते और मैं, एक ही के हिस्से हैं। वह और वृक्ष के नीचे प्रवेश करे और उस भूमि में पहुंच जाए जिस भूमि से पड़ोस का वृक्ष भी निकला हुआ है, तो वह अनुभव करेगा कि मैं, मेरा यह वृक्ष, मेरे ये पत्ते, और यह पडोस का वृक्ष, ये हम एक ही भूमि के पुत्र हैं, और एक ही भूमि की शाखाएं हैं। और अगर वह प्रवेश करता ही जाए, तो यह पूरा जगत अंततः उस छोटे से पत्ते के अस्तित्व का अंतिम छोर होगा। वह पत्ता इस बड़े अस्तित्व का एक छोर था! लेकिन छोर की तरह होश में आ गया था तो व्यक्ति था, और समग्र की तरह होश में आ जाए तो व्यक्ति नहीं है।

3-लेकिन पांचवें शरीर का एक अपना ही खतरा है कि पांचवां शरीर बहुत ही तृप्तिदायी है।चाहो तो तुम वहां रुक सकते हो; क्योंकि तुमने अपने को जान लिया है। और यह इतनी तृप्तिदायी और इतनी आनंदपूर्ण स्थिति है, कि शायद तुम आगे की गति न करो।पांचवें शरीर के पहले जितने खतरे थे वे सब दुख के थे, अब जो खतरा शुरू होता है वह आनंद का है। यह इतना आनंदपूर्ण है कि अब शायद तुम आगे खोजो ही न।

4-इसलिए पांचवें शरीर में गए व्यक्ति के लिए जो अत्यंत सजगता रखनी है वह यह कि आनंद कहीं पकड़ न ले, रोकनेवाला न बन जाए।यहां आनंद अपनी पूरी ऊंचाई पर प्रकट होगा; अपनी पूरी गहराई में प्रकट होगा और आनंद परम है।। एक बड़ी क्रांति घटित हो गई है तुमने अपने को जान लिया है। लेकिन केवल अपने को.. और तुम ही नहीं हो, और भी सब हैं। लेकिन बहुत बार ऐसा होता है कि दुख रोकनेवाले सिद्ध नहीं होते, सुख रोकनेवाले सिद्ध हो जाते हैं; और आनंद तो बहुत रोकनेवाला सिद्ध हो जाता है। बाजार की भीड़— भाड़ तक को छोड़ने में कठिनाई थी, अब इस मंदिर में बजती वीणा को छोड़ने में तो बहुत कठिनाई हो जाएगी। इसलिए बहुत से साधक आत्मज्ञान पर रुक जाते हैं और ब्रह्मज्ञान को उपलब्ध नहीं हो पाते।

5-तो इस आनंद के प्रति भी सजग होना पडेगा।आनंद लीन करता है, तल्लीन करता है, डुबा लेता है। यहां भी काम वही है कि आनंद में लीन मत हो जाना। आनंद के अनुभव को भी जानना कि वह भी एक अनुभव है ..जैसे सुख के अनुभव थे, दुख के अनुभव थे, वैसा आनंद का भी अनुभव है। लेकिन तुम अभी भी बाहर खड़े रहना, तुम इसके भी साक्षी बन जाना। क्योंकि जब तक अनुभव है, तब तक उपाधि है; और जब तक अनुभव है, तब तक अंतिम छोर नहीं आया। अंतिम छोर पर सब अनुभव समाप्त हो जाएंगे। सुख और दुख तो समाप्त होते ही हैं, आनंद भी समाप्त हो जाता है। लेकिन हमारी भाषा फिर इसके आगे नहीं जा पाती। इसलिए हमने परमात्मा का रूप सच्चिदानंद कहा है। यह परमात्मा का रूप नहीं है, यह जहां तक भाषा जाती है वहां तक का रूप है। आनंद हमारी आखिरी भाषा है।

असल में, पांचवें शरीर के आगे फिर भाषा नहीं जाती। तो पांचवें शरीर के संबंध में कुछ कहा जा सकता है ..जहां आनंद है वहां पूर्ण जागृति है ,वहां स्वबोध है .. यह सब कहा जा सकता है, इसमें कोई कठिनाई नहीं है।

6-इसलिए जो आत्मवाद पर रुक जाते हैं उनकी बातों में रहस्यवाद/ मिस्टिसिज्म नहीं होगा। उनकी बातें बिलकुल साइंस जैसी मालूम पड़ेगी; क्योंकि रहस्य/मिस्ट्री की दुनिया तो इसके आगे है । यहां तक तो चीजें साफ हो सकती हैं क्योंकि आत्म तक विज्ञान भी पहुंच

सकेगा।और आमतौर से साधक जब खोज पर निकलता है तो उसकी खोज सत्य की नहीं होती, आमतौर से आनंद की होती है। वह कहता है सत्य की खोज पर निकला हूं लेकिन खोज उसकी आनंद की होती है। क्योकि,दुख से परेशान है, अशांति से परेशान है, वह आनंद खोज रहा है। इसलिए जो आनंद खोजने निकला है, वह तो निश्चित ही इस पांचवें शरीर पर रुक जाएगा। इसलिए साधक को आनंद की नहीं, सत्य की खोज करना चाहिए। तब फिर रुकना नहीं होगा।

7-तब एक सवाल नया उठेगा कि आनंद है, यह ठीक है, मैं अपने को जान रहा हूं यह भी ठीक है; लेकिन ये वृक्ष के फूल हैं, वृक्ष के पत्ते और जड़ें कहां हैं? मैं अपने को जान रहा हूं यह भी ठीक; मैं आनंदित हूं यह भी ठीक, लेकिन मैं कहां से हूं? फ्रॉम व्हेयर?... मेरी जड़ें कहां हैं? मैं आया कहां से? मेरे अस्तित्व की गहराई कहां है? कहां से मैं आ रहा हूं। यह जो मेरी लहर है,

यह किस सागर से उठी है?अगर सत्य की जिज्ञासा है, तो पांचवें शरीर से आगे जा सकोगे। इसलिए बहुत प्राथमिक रूप से ही, प्रारंभ से ही जिज्ञासा सत्य की होनी चाहिए, आनंद की नहीं। नहीं तो पांचवें तक तो बड़ी अच्छी यात्रा होगी, पांचवें पर बात एकदम रुक जाएगी। सत्य की अगर खोज है तो यहां रुकने का सवाल ही नहीं है।

8-तो पांचवें शरीर में जो सबसे बड़ी बाधा है, वह उसका अपूर्व आनंद है। और हम एक ऐसी दुनिया से आते हैं, जहां दुख और पीड़ा और चिंता और तनाव के सिवाय कुछ भी नहीं जाना। और जब इस आनंद के मंदिर में प्रविष्ट होते हैं तो मन होता है कि अब बिलकुल डूब जाओ, अब खो ही जाओ, इस आनंद में नाचो और खो जाओ।लेकिन यह खो जाने की जगह नहीं है।

खो जाने की जगह भी आएगी, लेकिन ..तब खोना न पड़ेगा, खो ही जाओगे। वह बहुत और है ..खोना और खो ही जाना। यानी वह जगह आएगी जहां बचाना भी चाहोगे तो नहीं बच सकोगे।अपने को देखोगे खोते हुए , कोई उपाय न रह जाएगा। लेकिन यहां खोना हो सकता है लेकिन उसमें भी हमारा प्रयास, हमारी चेष्टा रह जाएगी। और बहुत गहरे में पांचवें शरीर में ,अहंकार तो मिट जाएगा ...अस्मिता नहीं मिटेगी।

9-इसलिए अहंकार और अस्मिता का फर्क समझ लेना जरूरी है।अहंकार तो मिट जाएगा,

‘ मैं ‘ का भाव तो मिट जाएगा। लेकिन ‘ हूं? का भाव नहीं मिटेगा।' मैं हूं 'इसमें दो चीजें हैं— ‘ मैं’ तो अहंकार है, और ‘ हूं अस्मिता है—होने का बोध। ‘ मैं’ तो मिट जाएगा पांचवें शरीर में, सिर्फ होना रह जाएगा, लेकिन ‘ हूं’ रह जाएगा; अस्मिता रह जाएगी।इसलिए इस जगह

पर खड़े होकर अगर कोई दुनिया के बाबत कुछ कहेगा तो वह कहेगा, अनंत आत्माएं हैं, सबकी आत्माएं अलग हैं; आत्मा एक नहीं है, प्रत्येक की आत्मा अलग है। इस जगह से आत्मवादी अनेक आत्माओं को अनुभव करेगा; क्योंकि अपने को वह अस्मिता में देख रहा है, अभी भी अलग है।

10-अगर सत्य की खोज मन में हो और आनंद में डूबने की बाधा से बचा जा सके.. और बचा जा सकता है; क्योंकि जब सतत आनंद रहता है तो उबानेवाला हो जाता है।यदि आनंद का एक ही स्वर बजता रहे तो वह भी उबानेवाला हो जाता है।बर्ट्रेड रसेल ने कहीं मजाक में यह

कहा है कि मैं मोक्ष जाना पसंद नहीं करूंगा, क्योंकि मैं सुनता हूं कि वहां सिर्फ आनंद है, और कुछ भी नहीं। तो वह तो बहुत मोनोटोनस होगा, कि आनंद ही आनंद है, उसमें एक दुख की रेखा भी बीच में न होगी, उसमें कोई चिंता और तनाव न होगा। तो कितनी देर तक ऐसे आनंद को झेल पाएंगे?

11-पांचवें शरीर में 'आनंद की लीनता '..बाधा है। फिर, अगर आनंद की लीनता से बच सकते हो ,जो कि कठिन है, और कई बार जन्म तक लग जाते हैं। पहली चार सीढ़ियां पार करना इतना कठिन नहीं, पांचवीं सीढ़ी पार करना बहुत कठिन हो जाता है; बहुत जन्म लग सकते हैं ..आनंद से , स्वयं से , आत्म से ऊबने के लिए,और वह जो सेल्फ है उससे ऊबने के लिए।

तो अभी पांचवें शरीर तक जो खोज है, वह दुख से छूटने की हैं ..घृणा से छूटने की हैं, हिंसा से छूटने की हैं, वासना से छूटने की हैं। पांचवें के बाद जो खोज है, वह स्वयं से छूटने की है।

12-तो दो बातें हैं ..किसी चीज से मुक्ति, यह एक बात है; यह पांचवें तक पूरी होगी। फिर दूसरी बात है—किसी से नहीं,बल्कि अपने से ही मुक्ति। और इसलिए पांचवें शरीर से एक

नया ही जगत शुरू होता है।पांचवें शरीर को उपलब्ध करने के बाद व्यक्ति का इस शरीर में जन्म नहीं होगा। पर और शरीर हैं। असल में, जिनको हम देवता कहते रहे हैं, उस तरह के शरीर हैं।तो पांचवें के बाद उस तरह के शरीर उपलब्ध हो सकते हैं।लेकिन छठवें के बाद उस

तरह के शरीर भी उपलब्ध नहीं होंगे। गॉड्स के नहीं, बल्कि जिसको हम गॉड कहते रहे हैं, ईश्वर कहते रहे हैं, उस तरह का शरीर उपलब्ध हो जाएगा।लेकिन शरीर उपलब्ध होते

रहेंगे; वे किस तरह के हैं, यह बहुत गौण बात है। सातवें के बाद ही शरीर उपलब्ध नहीं होंगे। सातवें के बाद ही अशरीरी स्थिति होगी। उसके पहले सूक्ष्म से सूक्ष्म शरीर उपलब्ध होते रहेंगे।

क्या है ब्रह्म शरीर के आज्ञा चक्र की संभावनाएं?-

05 FACTS;-

1-छठवां शरीर ब्रह्म शरीर है, कास्मिक बॉडी है; और छठवां केंद्र आज्ञा है। अब यहां से कोई द्वैत नहीं है। आनंद का अनुभव पांचवें शरीर पर प्रगाढ़ होगा, अस्तित्व का /इग्ज़िस्टन्स का, बीइंग का अनुभव छठवें शरीर पर प्रगाढ़ होगा। अस्मिता खो जाएगी छठवें शरीर पर।पांचवें को पार करते ही.. ‘ हूं ‘, भी चला जाएगा .. मैं हूं ..तो ‘ मैं ‘ चला जाएगा ।तथाता का , इज़नेस का बोध होगा, होगा । उसमें ''मैं '' / अस्मिता कहीं नहीं आएगी। जो है, दैट व्हिच इज, बस वही हो जाएगा।

2-तो यहां सत् का बोध होगा, बीइंग का होगा, चित् का बोध होगा, कांशसनेस का बोध होगा। लेकिन यहां चित् मुझसे मुक्त हो गया। ऐसा नहीं होगा..कि मेरी चेतना मेरा अस्तित्व।

और कुछ लोग छठवें पर रुक जाएंगे। क्योंकि कास्मिक बॉडी आ गई, ब्रह्म हो गया मैं, 'अहं ब्रह्मास्मि' की हालत आ गई। अब मैं नहीं रहा, ब्रह्म ही रह गया है। अब और.. कहां खोज? .. कैसी खोज? अब किसको खोजना है? अब तो खोजने को भी कुछ नहीं बचा, अब तो सब पा लिया; क्योंकि ब्रह्म का मतलब है—दि टोटल; ''सब''।

3-इस जगह से खड़े होकर जिन्होंने कहा है, वे कहेंगे कि ब्रह्म अंतिम सत्य है, वह एब्लोल्युट है, उसके आगे फिर कुछ भी नहीं। और इसलिए इस पर तो कोई अनंत जन्म रुक सकता है। आमतौर से रुक जाता है; क्योंकि इसके आगे तो सूझ में ही नहीं आता कि इसके आगे भी

कुछ हो सकता है।तो ब्रह्मज्ञानी इस पर अटक जाएगा, इसके आगे वह नहीं जाएगा। और इसको पार करना ..इस जगह को पार करना ..बहुत कठिन है। क्योंकि अब कोई जगह बचती ही नहीं जहां इसको पार करो। सब तो घेर लिया, जगह भी चाहिए न! अगर मैं इस कमरे के बाहर जाऊं, तो बाहर जगह भी तो चाहिए! अब यह कमरा इतना विराट हो गया— अंतहीन, अनंत हो गया; असीम, अनादि हो गया; अब जाने को भी कोई जगह नहीं,.. नो व्हेयर टु गो। तो अब खोजने भी कहां जाओगे? अब खोजने को भी कुछ नहीं बचा, सब आ गया। तो यहां अनंत जन्म तक रुकना हो सकता है।

4-तो साधक की परम खोज में ब्रह्म आखिरी बाधा है—दि लास्ट बैरियर।। बीइंग रह गया है अब, लेकिन अभी भी नॉन—बीइंग भी है शेष; ‘ अस्ति’ तो जान ली, ‘ है’ तो जान लिया, लेकिन ‘ नहीं है’, अभी वह जानने को शेष रह गया। इसलिए सातवां शरीर है निर्वाण काया। उसका चक्र है सहस्रार। और उसके संबंध में कोई बात नहीं हो सकती।केवल ब्रह्म तक ही बात जा सकती है-खींच ..तानकर।पांचवें शरीर तक बात बड़ी वैज्ञानिक ढंग से चलती है;सारी बात

साफ हो सकती है। छठवें शरीर पर बात की सीमाएं खोने लगती हैं, शब्द अर्थहीन होने लगता है, लेकिन फिर भी इशारे किए जा सकते हैं। लेकिन अब अंगुली भी टूट जाती है, अब इशारे गिर जाते हैं; क्योंकि अब खुद का होना ही गिर जाता है।

5-तो ऐब्सॅल्यूट बीइंग को छठवें शरीर तक और छठवें केंद्र से जाना जा सकता है।

इसलिए जो लोग ब्रह्म की तलाश में हैं, आज्ञा चक्र पर ध्यान करेंगे। वह उसका चक्र है। इसलिए भृकुटी -मध्य में /आज्ञा चक्र पर वे ध्यान करेंगे; वह उससे संबंधित चक्र है उस शरीर का। और वहां जो उस चक्र पर पूरा काम करेंगे, तो वहां से उन्हें जो दिखाई पड़ना शुरू होगा विस्तार अनंत का, उसको वे तृतीय नेत्र / थर्ड आई कहना शुरू कर देंगे। वहां से वह तीसरी आंख उनके पास आई, जहां से वे अनंत को, कास्मिक को देखना शुरू कर देते हैं।

क्या है निर्वाण काया के सहस्रार चक्र की संभावनाएं?-

15 FACTS;-

1-लेकिन अभी एक और शेष रह गया—नास्ति/न होना, नॉन -बीइंग। अस्तित्व जो है वह आधी बात है, अनस्तित्व भी है; प्रकाश जो है वह आधी बात है, अंधकार भी है, जीवन जो है वह आधी बात है, मृत्यु भी है। इसलिए आखिरी अनस्तित्व को, शून्य को भी जानने की…..क्योंकि परम सत्य तभी पता चलेगा जब दोनों जान लिए— अस्ति भी और नास्ति भी; आस्तिकता भी जानी उसकी संपूर्णता में और नास्तिकता भी जानी उसकी संपूर्णता में; होना भी जाना उसकी संपूर्णता में और न होना भी जाना उसकी संपूर्णता में, तभी हम पूरे को जान पाए, अन्यथा यह भी अधूरा है। ब्रह्मज्ञान में एक अधूरापन है कि वह ‘ न होने ‘ को नहीं जान पाएगा। इसलिए ब्रह्मज्ञानी ‘ न होने’ को इनकार ही कर देता है; वह कहता है वह माया है, वह है ही नहीं। वह कहता है होना सत्य है, न होना झूठ है, मिथ्या है; वह है ही नहीं, उसको जानने का सवाल कहां है।

2-निर्वाण काया का मतलब है शून्य काया, जहां हम ‘ होने ‘ से ‘ न होने’ में छलांग लगा जाते हैं। क्योंकि वह और जानने को शेष रह गया, उसे भी जान लेना जरूरी है कि न होना क्या है? मिट जाना क्या है? इसलिए सातवां शरीर जो है, वह एक अर्थ में महामृत्यु है और निर्वाण का.. दीये का बुझ जाना है। वह जो हमारा होना था, वह जो हमारा ‘ मैं’ था, मिट गया; वह जो हमारी अस्मिता थी, मिट गई। लेकिन अब हम सर्व के साथ एक होकर फिर हो गए हैं, अब हम ब्रह्म हो गए हैं, अब इसे भी छोड़ देना पड़ेगा। और जिसकी जितनी छलांग की तैयारी है, वह जो है, उसे तो जान ही लेता है, जो नहीं है, उसे भी जान लेता है।और यही हैं हमारे सात

शरीर और सात चक्र और इन सात चक्रों के भीतर ही हमारी सारी बाधाएं और साधन हैं। कहीं किसी बाहरी रास्ते पर कोई बाधा नहीं है। इसलिए किसी से पूछने जाने का उतना सवाल नहीं है।

3- शून्य और पूर्ण एक ही चीज के दो नाम हैं, इसलिए दोनों कनवटेंबल हैं। शून्य पूर्ण है। तुमने अधूरा शून्य न देखा होगा। आधा शून्य तुम नहीं कर सकते हो। अगर तुमसे कोई कहें कि शून्य को आधा कर दो, दो टुकड़े कर दो ..तो तुम कहोगे, यह कैसे हो सकता है? एक के दो टुकड़े हो सकते हैं, दो के दो टुकड़े हो सकते हैं, शून्य के दो टुकड़े नहीं हो सकते। शून्य के टुकड़े ही नहीं हो सकते। और जब तुम कागज पर एक शून्य बनाते हो तो वह सिर्फ प्रतीक है; वह तुम्हारे बनाते ही शून्य नहीं रह जाता, क्योंकि तुम रेखा बांध देते हो। शून्य हम उसे कहते हैं , जिसमें न लंबाई है, न चौड़ाई है। लेकिन तुम तो कितना ही छोटा सा बिंदु भी बनाओगे, तो उसमें भी लंबाई—चौड़ाई होगी। इसलिए वह सिर्फ प्रतीक है, वह असली बिंदु नहीं है, क्योंकि असली बिंदु में तो लंबाई -चौड़ाई नहीं हो सकती। लंबाई -चौड़ाई होगी तो फिर बिंदु नहीं रह जाएगा। 4-इसलिए उपनिषद कह सके कि शून्य से तुम निकाल लो शून्य भी, तो भी पीछे शून्य ही शेष रह जाता है। उसका मतलब यह है कि तुम निकाल नहीं सकते उसमें से कुछ। तुम अगर पूरे शून्य को भी लेकर भाग जाओ तब भी पीछे पूरा शून्य ही शेष रह जाएगा। तुम आखिर में पाओगे, चोरी बेकार गई; तुम उसे लेकर भाग नहीं सके, वह वहीं शेष रह गया। लेकिन जो शून्य के संबंध में सही है, वही पूर्ण के संबंध में भी सही है। असल में, पूर्ण की कोई कल्पना नहीं है सिवाय शून्य के.. और हो भी नहींसकती। 5-पूर्ण का मतलब है जिसमें अब और आगे विकास नहीं हो सकता। शून्य का मतलब है जिसमें अब और नीचे पतन नहीं हो सकता। शून्य के और नीचे उतरने का उपाय नहीं, पूर्ण के और आगे जाने का उपाय नहीं। तुम पूर्ण के भी खंड नहीं कर सकते; तुम शून्य के भी खंड नहीं कर सकते। पूर्ण की भी कोई सीमा नहीं हो सकती; क्योंकि जब भी किसी चीज की सीमा होगी तब वह पूर्ण नहीं हो सकेगा। क्योंकि उसका मतलब हुआ कि सीमा के बाहर फिर कुछ शेष रह जाएगा। और अगर कुछ बाहर शेष रह गया तो पूर्णता कैसी? फिर यह अपूर्णता हो जाएगी। 6-जहां किसी का घर खतम होता है, तुम्हारा घर शुरू हो जाता है।किसी के घर की सीमा पर किसी का घर समाप्त होता है और तुम्हारा शुरू होता है। अगर तुम्हारा घर पूर्ण है, तो तुम्हारा घर किसी के घर के बाहर नहीं हो सकता। तो पूर्ण की कोई सीमा नहीं हो सकती, क्योंकि कौन उसकी सीमा बनाएगा? सीमा बनाने के लिए हमेशा नेबर चाहिए; सीमा बनाने के लिए कोई पड़ोसी चाहिए। और पूर्ण है अकेला, उसका कोई पड़ोसी नहीं है, जिससे उसकी सीमा इंगित हो सके। 7- सीमा बनाने के लिए ''दो ''चाहिए। जहां मैं समाप्त होऊं और कोई शुरू हो, वहां सीमा बनेगी। अगर कोई शुरू ही न हो तो मैं समाप्त भी न हो सकूंगा। और अगर मैं समाप्त ही न हो सकूं, तो फिर मेरी कोई सीमा न बनेगी। पूर्ण की कोई सीमा नहीं है, क्योंकि कौन उसकी सीमा बनाए? शून्य की कोई सीमा नहीं है, क्योंकि जिसकी सीमा हो जाती है, वह कुछ हो गया, वह शून्य कैसे रहा? तो अगर इसे बहुत ठीक से समझोगे तो शून्य और पूर्ण जो हैं, वे एक ही चीज को कहने के दो ढंग हैं।

8-तो धर्म भी दो तरफ से यात्रा कर सकता है या तो तुम पूर्ण हो जाओ, या तुम शून्य हो जाओ। दोनों स्थितियों में तुम वही हो जाओगे जो होने की बात है। तो जो पूर्ण की यात्रा करनेवाला है, या पूर्ण शब्द को /पाजिटिव को प्रेम करता है, वह कहेगा—अहं ब्रह्मास्मि! मैं ब्रह्म हूं! वह यह कह रहा है कि मैं ही ब्रह्म हूं। यह सब जो है, यह मैं ही हूं। और मेरे अतिरिक्त कोई तू नहीं है।लेकिन अंतिम चरण में मैं को भी खोना पड़ेगा,क्योंकि जब कोई तू नहीं है तो तुम कैसे कहोगे कि मैं ही ब्रह्म हूं? क्योंकि मैं की उदघोषणा तू की मौजूदगी पर ही सार्थक है। और जब तुम ही ब्रह्म हो, तो यह कहना भी बहुत अर्थ का नहीं रह जाएगा कि मैं ब्रह्म हूं। क्योंकि इसमें भी दो की स्वीकृति है—ब्रह्म की और मेरी। तो अंत में मैं भी व्यर्थ हो जाएगा, ब्रह्म भी व्यर्थ हो जाएगा और चुप हो जाना पड़ेगा। 9-दूसरा एक मार्ग है कि तुम कहो...... .इतने मिट जाओ तुम कि तुम कह सको, मैं हूं ही नहीं। एक जगह तुम कह सके, मैं ब्रह्म हूं अर्थात मैं सब हूं। दूसरी यात्रा है जिसमें तुम कह सको कि मैं हूं ही नहीं, कुछ भी नहीं है; सब परम शून्य है। लेकिन इससे भी तुम वहीं पहुंच जाओगे। और पहुंचकर तुम यह भी न कह सकोगे कि मैं नहीं हूं। क्योंकि मैं नहीं हूं यह कहने के लिए भी मैं का होना जरूरी है। तो मैं खो जाएगा। तुम यह भी न कह सकोगे कि सब शून्य है; क्योंकि यह कहने के लिए भी सब भी होना चाहिए और शून्य भी होना चाहिए। तब तुम फिर चुप हो जाओगे। 10-तो यात्रा चाहे कहीं से हो—चाहे वह पूर्णता की तरफ से हो, चाहे शून्यता की तरफ से हों—लेकिन वह परम मौन में ले जाएगी, जहां बोलने को कुछ भी नहीं बचेगा। इसलिए कहां से कोई जाता है, यह बड़ा सवाल नहीं है; कहां पहुंचता है, यह जांचने की बात है। उसकी अंतिम मंजिल पकड़ी जा सकती है, पहचानी जा सकती है। अगर वह यहां पहुंच गया तो वह जहां से भी गया हो, ठीक ही रास्ते से गया है। कोई रास्ता गलत नहीं है, कोई रास्ता ठीक नहीं है—इस अर्थ में कि जो पहुंचा दे वह ठीक है। और पहुंचना यहां है। लेकिन प्राथमिक अनुभव कहीं से भी मैं से ही शुरू होगा, क्योंकि हमारी वह स्थिति है; वह गिवेन सिचुएशन है, जहां से हमको चलना है। 11-तो चाहे हम कुंडलिनी को जगाए, तो भी वह व्यक्तिगत मालूम पड़ेगी; चाहे ध्यान में जाएं, तो भी वह व्यक्तिगत मालूम पड़ेगा; चाहे शांत हों तो व्यक्तिगत होगा, जो कुछ भी होगा वह व्यक्तिगत होगा, क्योंकि अभी हम व्यक्ति हैं। लेकिन जैसे—जैसे इसमें प्रवेश करोगे, भीतर जितने गहरे उतरोगे, व्यक्ति मिटता जाएगा। और अगर बाहर गए, तो व्यक्ति बढ़ता चला जाएगा।

12-उदाहरण के लिए, एक आदमी कुएं पर खड़ा है। अगर वह कुएं में भीतर जाए, तो एक दिन सागर में पहुंच जाएगा। और अनुभव करे कि कुआं तो नहीं था... असल में कुआं है क्या? जस्ट ए होल सागर को झांकने के लिए। और क्या अर्थ है कुएं का ? एक छेद है जिससे तुम सागर को झांक लेते हो। अगर तुम पानी को कुआं समझते हो तो गलती समझते हो, पानी तो सागर ही है। हां, वह छेद जिससे तुमने झांका है, वह है कुआं। तो वह जो छेद है, वह जितना बड़ा होता जाए, सागर उतना बड़ा दिखाई पड़ने लगेगा। 13-लेकिन अगर तुम कुएं के भीतर प्रवेश न किए और कुएं से दूर हटते चले गए, तो तुम्हें कुएं का पानी भी दिखाई पड़ना.. थोड़ी देर में बंद हो जाएगा। फिर तो वह जो कुएं का छेद है और पाट है, वही दिखाई पड़ेगा। और उसका सागर से तुम कभी तालमेल न कर पाओगे।तुम एकदम सागर के किनारे भी पहुंच जाओ, तो भी तुम यह तालमेल न बिठा पाओगे कि वह जो कुएं में झांका था वह और यह सागर एक हो सकता है। 14-अंतर्यात्रा तो तुम्हें एकता पर ले जाएगी, बहिर्यात्रा तुम्हें अनेकता पर ले जाएगी। लेकिन सभी अनुभव का प्रारंभिक छोर व्यक्ति होगा, कुआं होगा; अंतिम छोर अव्यक्ति होगा ..या परमेश्वर कहो ..सागर होगा। अगर तुम गहरे जाओगे तो जो कुंड है वह तुम्हारा नहीं रह जाएगा; कुछ भी तुम्हारा नहीं रह जाएगा।तो कुंडलिनी के पहले जागरण का अनुभव तुम्हें आत्मा की तरह होगा और अंतिम अनुभव तुम्हें परमात्मा की तरह होगा। अगर तुम पहले जागरण पर ही रुक गए, और तुमने घेराबंदी कर ली अपने कुएं की, और तुमने भीतर खोज न की, तो तुम आत्मा पर ही रुक जाओगे।इसलिए बहुत से धर्म आत्मा पर ही रुक गए हैं। वह परम अनुभव नहीं है; वह अनुभव की आधी ही यात्रा है। और थोड़ा आगे जाएंगे तो आत्मा भी विलीन हो जाएगी और तब परमात्मा ही शेष रह जाएगा।

15- और अगर आगे गए तो परमात्मा भी विलीन हो जाएगा, और तब निर्वाण और शून्य ही शेष रह जाएगा ..या कहना चाहिए, कुछ भी शेष नहीं रह जाएगा।तो परमात्मा से भी जो एक कदम आगे जाने की जिनकी संभावना थी, वे निर्वाण पर पहुंच गए हैं; वे परम शून्य की बात कहेंगे। वे कहेंगे वहां- जहां कुछ भी नहीं रह जाता। असल में, सब कुछ का अनुभव जब तुम्हें होगा, तो साथ ही कुछ नहीं का अनुभव भी होगा। जो एबसोल्युट है, वह नथिंगनेस भी है।

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...SHIVOHAM...