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क्या पहचान है साधक की ?क्या है सात शरीर और सात चक्र का रहस्य ?PART-01


साधक का अर्थ ;-

05 FACTS;-

1-इस पूरी धरती में आदिकाल से ही मानव जीवन के प्रति मुख्यतः दो दृष्टिकोण प्राप्त होते हैं । एक तो वे लोग हैं जो जीवन को भोग का अवसर मानकर तद् अनुरुप आचरण करते हैं । वे किसी परमसत्ता के अस्तित्व को, जो धरती पर के समस्त क्रियाकलापों का संचालन करता हो,.. स्वीकार नहीं करते । उनका तर्क है कि परमसत्ता के अस्तित्व का ऐसा कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं है जो सार्वकालिक होने के साथ ही निर्विवाद भी हो । यह लोगों के मन की कल्पना मात्र है ।

2-कुछ प्रबुद्धजनों ने अपना हित साधन के उद्देश्य से परमसत्ता के प्रति भय का वातावरण बनाया और अपने मन की कल्पना को जन सामान्य के हृदय में बड़े ही चतुराई से प्रतिस्थापित कर दिया है। दूसरे प्रकार के लोग परमात्म तत्व की सत्ता को न केवल स्वीकार करते हैं वरन् स्वयं को परमात्मा का अंश आत्मन् के रुप में मानकर आत्मा के परमात्मा में मिलन के लिये चेष्टा करते है, जिसे साधना कहते हैं।इसी भित्ती पर संसार के समस्त धर्म, सम्प्रदाय, आदि खड़े हैं ।

3-भारत में आदिकाल से ही निष्ठा के आधार पर साधकों, श्रद्धालुओं, भक्तों, संतों, महात्माओं को पाँच प्रकार में बाँटा गया है ।

1- शैव, जिनके आराध्य देव शिव जी हैं । 2- शाक्त, जिनके आराध्य देव शक्ति हैं । 3-वैष्णव, जिनके आराध्य देव श्री विष्णु हैं । 4- गाणपत्य, जिनके आराध्य देव गणेश हैं । 5-सौर, जिनके आराध्य देव सूर्य देव हैं ।

जो एकनिष्ठ देव आराधक नहीं हैं उनमें या विशेष प्रयोजनवश पँच देवोपासना भी प्रचलित है । 4-"साधक" -- एक शब्द है।व्यक्ति स्थूल है, जब उसकी चेतना स्थूलता के अतिरिक्त सूक्ष्मता की ओर बढने लगे,निराकार तत्त्व का संपर्क स्वयं करने लगे और दोनों स्थितियों में संतुलन बना ले तब वह 'साधक' शब्द को जीवित करने लगता है।फिर एक साधक का जन्म होता है।और उस निराकार तत्त्व (जो निहायत अपना है) की प्रेरणा को धारण करने लगता है। इस दरम्यान जीवन में ऐसी विपरीत स्थितियां उत्पन्न होती है कि साधना में अग्रसर व्यक्ति टूट कर बिखर जाए अथवा जगत की वासना में बह जाए;उसके पहले वह सिर्फ एक व्यक्ति है अथवा कर्मकाण्डीय है।वह साधना नहीं कर रहा ।

5-साधक का अर्थ है, कि प्यासा है सत्य के लिए।साधक का अर्थ है कि खोजी है,आकांक्षी है,

अभीप्सा से भरा है।संत कबीर,कहते हैं ''जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ, मैं बावरी डूबन डरी, रही किनारे बैठ''।

साधक की पहचान;-

11 FACTS;-

1-साधक अर्थात खोजी का अर्थ ही है कि उसे साधना में बाधाएं हैं। उसे पता नहीं है कि कैसे पात्र बने, कैसे तैयारी करे। सही मार्गदर्शन मिलना मुश्किल है।तो क्या वह मांगने जाए? साधक के मार्ग पर बाधाएं हैं। लेकिन वास्तव में, इसका अर्थ है कि साधक के भीतर बाधाएं हैं ;और मार्ग भी भीतर ही है। अपनी बाधाओं को समझ लेना बहुत कठिन नहीं है।साधक को पहले पात्र बनने की फिकर करनी चाहिए ..जगह -जगह मांगने नहीं जाना चाहिए।

2-वास्तव में, खोजना और मांगना दो अलग बातें हैं,विपरीत बातें हैं।। असल में,जो खोजने से बचना चाहता है;जो खोजना नहीं चाहता;वही मांगता है, खोजी कभी नहीं मांगता। और खोजने और मांगने की प्रक्रिया बिलकुल अलग है। मांगने में हमें दूसरे पर ध्यान रखना पड़ेगा ..जिससे मिलेगा। और खोजने में हमें अपने पर ध्यान रखना पड़ेगा ..जिसको मिलेगा।

सौ साधकों में निन्यानवे साधक होते नहीं, फिर भी साधन की दुनिया में उतर जाते हैं। इससे सारी उलझन खड़ी होती है।

3-तुम्हें प्यास न लगी हो और किसी दूसरे ने जिसने , प्यास की पीड़ा जानी है और फिर जल के पीने की तृप्ति जानी है, तुमसे अपनी तृप्ति की बात कही; बात-बात में तुम प्रभावित हो गए। तुम्हारे मन में भी लोभ जगा। तुमने भी सोचा, कि ऐसा आनंद हमें भी मिले, ऐसी तृप्ति हमें भी मिले। तुम यह भूल ही गए, कि बिन