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क्या है सात लोक , सात धातुऔर मनुष्य के सात शरीरों का रहस्य ?PART-02




क्या है स्थूल से सूक्ष्म,सूक्ष्म से अति सूक्ष्म तथा अति सूक्ष्म से महा सूक्ष्म?-

07 FACTS;-

1-अध्यात्म शास्त्र में 14 लोकों का वर्णन है। इन्हें किसी ग्रह नक्षत्र में अवस्थित अथवा अधर में लटका हुआ स्थान नहीं माना जाना चाहिए, वरन् स्थूलता से सूक्ष्मता की गहराई में प्रवेश करते हुए उपलब्ध होने वाली स्थिति भर माना जाना चाहिए।

पुराणों अनुसार सात लोक को मूलत: दो लोक में विभाजित किया गया हैं- कृतक लोक और 2.अकृतक लोक। कृतक लोक में ही प्रलय और उत्पत्ति का चक्र चलता रहता है जबकि अकृतक लोक समय और स्थान से शून्य है।

(A) कृतक लोक :

कृतक त्रैलोक्य जिसे त्रिभुवन या मृत्युलोक भी कहते हैं। इसके बारे में पुराणों की धारणा है कि यह नश्वर है, कृष्ण इसे परिवर्तनशील मानते हैं। इसकी एक निश्‍चित आयु है। उक्त त्रैलोक्य के नाम हैं- भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्गलोक। यही लोक पाँच तत्वों से निर्मित है- आकाश, अग्नि, वायु, जल और जड़। इन्हीं पाँच तत्वों को वेद क्रमश: जड़, प्राण, मन, विज्ञान और आनंदमय कोष कहते हैं।

(1)भूलोक : जितनी दूर तक सूर्य, चंद्रमा आदि का प्रकाश जाता है, वह पृथ्वी लोक कहलाता है, लेकिन भूलोक से तात्पर्य जिस भी ग्रह पर पैदल चला जा सकता है।

(2)भुवर्लोक : पृथ्वी और सूर्य के बीच के स्थान को भुवर्लोक कहते हैं। इसमें सभी ग्रह-नक्षत्रों का मंडल है।

(3)स्वर्गलोक : सूर्य और ध्रुव के बीच जो चौदह लाख योजन का अन्तर है, उसे स्वर्गलोक कहते हैं। इसी के बीच में सप्तर्षि का मंडल है।

(B) अकृतक लोक :

जन, तप और सत्य लोक तीनों अकृतक लोक कहलाते हैं।अकृतक त्रैलोक्य अर्थात जो नश्वर नहीं है अनश्वर है। जिसे मनुष्य स्वयं के सद्‍कर्मों से ही अर्जित कर सकता है। कृतक और अकृतक लोक के बीच स्थित है 'महर्लोक' जो कल्प के अंत के प्रलय में केवल जनशून्य हो जाता है, लेकिन नष्ट नहीं होता। इसीलिए इसे कृतकाकृतक लोक कहते हैं। 'महर्लोक' जनशून्य अवस्था में रहता है जहा आत्माएं स्थिर रहती हैं, यहीं पर महाप्रलय के दौरान सृष्टि भस्म के रूप में विद्यमान रहती है।यह लोक त्रैलोक्य और ब्रह्मलोक के बीच स्थित है।इस प्रकार उपरी या ऊर्ध्व सात लोक हैं