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दिल्ली के टॉप 10 मंदिर ;-पांडवों द्वारा बनाए गये मंदिर..


दिल्ली के टॉप 10 मंदिर ;- 1-बिरला मंदिर दिल्ली के बिरला मंदिर को लक्ष्मी नारायण मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। मेट्रो के इस प्रमुख आकर्षण का निर्माण उद्योगपति जी. डी. बिरला द्वारा किया गया जो 1939 में पूर्ण हुआ और जिसका उद्घाटन महात्मा गाँधी ने किया। दिल्ली के सबसे सुंदर मंदिरों में से एक यह मंदिर देवी लक्ष्मी (धन और संपत्ति की देवी) और नारायण (उनके पति और त्रिमूर्ति के पालक) को समर्पित है। इसके अलावा इस मंदिर के चारों ओर भगवान कृष्ण, शिव, गणेश, हनुमान और बुद्ध को समर्पित छोटे मंदिर भी हैं। यहाँ देवी दुर्गा - शक्ति की देवी, को समर्पित एक मंदिर भी है। हिंदू मंदिर स्थापत्य कला की नगर शैली में बने इस मंदिर का निर्माण पंडित विश्वनाथ शास्त्री नाम के व्यक्ति के मार्गदर्शन में हुआ और इसके पूर्ण होने के बाद महात्मा गाँधी इसके उद्घाटन के लिए इस शर्त पर राज़ी हुए कि इस मंदिर में सभी धर्म और जातियों के लोगों को प्रवेश की अनुमति दी जाएगी। कनॉट प्लेस के पास मंदिर मार्ग पर स्थित इस मंदिर तक परिवहन के सभी साधनों द्वारा आसानी से पहुँचा जा सकता है और सप्ताह में सात दिन सुबह 6 बजे से रात 10 बजे तक खुला रहता है। 2-दिगंबर जैन मंदिर दिल्ली में लाल किले के पार स्थित दिगंबर जैन मंदिर यहाँ का सबसे पुराना जैन मंदिर है। श्री दिगंबर जैन लाल मंदिर के नाम से भी प्रसिद्द मंदिर दिल्ली के प्रसिद्द चाँदनी चौक क्षेत्र में भी पाया जा सकत है। सुंदर लाल बलुआ पत्थरों से बना यह मंदिर चाँदनी चौक और नेताजी सुभाष मार्ग के चौराहे पर स्थित है। ऐसा भी कहा जाता है कि यह दिल्ली का सबसे पुराना जैन मंदिर है जिसका निर्माण 1656 में किया गया। इस प्रसिद्ध मंदिर को रेड टेम्पल या लाल मंदिर भी कहा जाता है और इसकी स्थापना के बाद से इसमें कई परिवर्तन किये गए हैं। लाल मंदिर के मुख्य देवता भगवान महावीर हैं - जो जैन धर्म के 24 वीं तीर्थंकर थे। इस मंदिर में भगवान आदिनाथ - जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर और भगवान पार्श्वनाथ - भगवान महावीर के पूर्ववर्ती की मूर्तियां भी हैं। 3-कालकाजी मंदिर प्रसिद्ध कालकाजी मंदिर, भारत में सबसे अधिक भ्रमण किये जाने वाले प्राचीन एवं श्रद्धेय मंदिरों में से एक है। यह दिल्ली में नेहरू प्लेस के पास कालकाजी में स्थित है। यह मंदिर माँ दुर्गा की एक अवतार, देवी काली को समर्पित है।यह मनोकामना सिद्ध पीठ के नाम से भी जाना जाता है। मनोकामना का अर्थ है कि यहाँ भक्तों की सारी इच्छाएं पूर्ण होती हैं। इस मंदिर के पीछे की पौराणिक कथा भी बहुत रोचक है। यह मंदिर ईटों की चिनाई द्वारा बनाया गया था परन्तु वर्तमान में यह संगमरमर से सजा है एवं यह चारों ओर से पिरामिड के आकार वाले स्तंभ से घिरा हुआ है। मंदिर का गर्भगृह 12 तरफ़ा है जिसमें प्रत्येक पक्ष पर संगमरमर से सुसज्जित एक प्रशस्त गलियारा है। यहाँ गर्भगृह को चारों तरफ से घेरे हुए एक बरामदा है जिसमें 36 धनुषाकार मार्ग हैं।1- 4-स्वामीनारायण अक्षरधाम मंदिर अक्षरधाम या स्वामीनारायण अक्षरधाम मंदिर दिल्ली में स्थित भारतीय संस्कृति, वास्तुकला, और आध्यात्मिकता के लिए एक सच्चा चित्रण है। इस मंदिर परिसर को पूरा बनने में 5 साल का समय लगा जिसे श्री अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था के प्रमुख स्वामी महाराज के कुशल नेतृत्व में पूरा किया गया। इस मंदिर को 11,000 कारीगरों ने मिलकर बनाया है जिसमें 3000 से ज्यादा स्वयंसेवक भी शामिल थे, इस मंदिर परिसर का उदघाटन आधिकारिक तौर पर 6 नवम्बर, 2005 को किया गया। गौरतलब है की मंदिर वास्तु शास्त्र और पंचरात्र शास्त्र की बारीकियों को ध्यान में रख कर बनाया गया है। पूरा मंदिर परिसर 5 प्रमुख भागों में विभाजित है। मुख्य मंदिर परिसर ठीक बीचोंबीच यानी केंद्र में स्थित है। इस 141फीट उच्च संरचना में 234 शानदार नक़्क़ाशीदार खंभे, 9 अलंकृत गुंबदों, 20 शिखर , एक भव्य गजेंद्र 20,000 मूर्तियां शामिल हैं । 5-पूजा का बहाई स्थान : 1986 में नई दिल्ली में इसकी स्थापना के बाद से पर्यटकों ने स्वयं यह सिद्ध किया है कि यह एक अवश्य घूमने योग्य आकर्षण है । कैसे? पूजा के इस स्थान को लोटस टेंपल (मंदिर) के नाम से जाना जाता है जो प्रतिवर्ष बहुत बड़ी संख्या में पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। बहापुर नाम के छोटे से गाँव में स्थित यह स्थान नई दिल्ली का प्रमुख आकर्षण स्थल है और यह भारतीय महाद्वीप में संप्रदाय का प्रमुख मंदिर है तथा इसने अपनी सुंदर स्थापत्य कला के लिए कई पुरस्कार भी जीते हैं। इस स्थान की सुंदरता के कारण अवश्य देखने के अलावा इसका वर्णन कई प्रकाशनों और टी. वी. के कई कार्यक्रमों में किया गया है, तथा इसने विभिन्न कार्यक्षेत्रों में कई पुरस्कार भी जीते हैं। 6-छतरपुर मंदिर छतरपुर मंदिर या श्री अध्‍य कात्‍यानी शक्ति पीठ, दक्षिण दिल्‍ली में छतरपुर में स्थित है जो भारत का दूसरा सबसे बड़ा मंदिर परिसर है। यह मंदिर देवी कात्‍यायनी, जो देवी दुर्गा का छठां स्‍वरूप है को समर्पित है। अन्‍य मंदिरों के विपरीत इस मंदिर में हर जाति और हर धर्म के श्रद्धालुओं को दर्शन करने की अनुमति है। इस मंदिर को देवी दुर्गा मां के एक उत्‍साही भक्‍त स्‍वामी नागपाल ने बनवाया था। यह मंदिर सफेद संगमरमर से बना हुआ है और आसपास खूबसूरत बगीचों से घिरा हुआ है। मंदिर की नक्‍काशी, दक्षिण भारतीय वास्‍तुकला में की गई है। इस विशाल मंदिर परिसर में हमेशा निर्माण चलता रहता है जो कभी समाप्‍त नहीं होता है। मंदिर परिसर लगभग 70 एकड़ भूमि में फैला हुआ है और इसके अंदर लगभग 20 छोटे और बड़े मंदिर भी तीन विभिन्‍न परिसरों में बने हुए हैं। 7-गौरी शंकर मंदिर दिल्‍ली के चांदनी चौक में दिगंबर जैन लाल मंदिर के नजदीक 800 साल पुराना गौरी शंकर मंदिर स्थित है। यह मंदिर भारत के शैव सम्‍प्रदाय के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है। इसे कॉस्मिक पिलर या पूरे ब्रह्मांड का केंद्र माना जाता है। इस मंदिर को एक मराठा सैनिक आपा गंगाधर के द्वारा बनाया गया था जो भगवान शिव का परम भक्‍त था। यह मंदिर 1761 में बनाया गया था। मंदिर के अंदर भगवान शिव, उनकी पत्‍नी देवी पार्वती और उनके पुत्र गणेश और कार्तिक की मूर्ति रखी हुई है। शिव और पार्वती की सुसज्जित मूर्ति, शिवलिंग के पीछे स्थित हैं। शिवलिंग के ऊपर एक चांदी का बर्तन रखा है जिससे सतत् रूप से पानी शिवलिंग पर गिरता रहता है। 8-श्री श्री राधा पार्थसारथी मंदिर या इस्कॉन मंदिर दक्षिणी दिल्ली के संतनगर, निकट नेहरू प्लेस के पास स्थित है। यह इस्कॉन समाज का मंदिर है। इस समाज के संस्थापक स्वामी प्रभुपाद जी है। 9-श्री उत्तरा गुरुवायुरप्पन मंदिर पूर्वी दिल्ली में एक मंदिर है जो भगवान कृष्ण को समर्पित है जिसका नाम श्री उत्तरा गुरुवायुरप्पन मंदिर है। मयूर विहार इस मंदिर का निर्माण वर्ष 1983 के दौरान किया गया थाजिसमें दिल्ली के अलावा दूसरे राज्यों से भी लोग दर्शन करने आते हैं। यह मंदिर केरल स्थित भगवान कृष्ण के मंदिर की तर्ज पर बनाया गया है। ये मंदिर अपने वार्षिक कार्यक्रमों के चलते स्थानीय लोगों में बहुत ज्यादा लोकप्रिय है। 10-योगमाया मंदिर योगमाया मंदिर जिसे योगमाया मंदिर जिसे जोगमाया के नाम से भी जाना जाता है दिल्ली का एक प्राचीन मंदिर है जो देवी योगमाया को समर्पित है। ग्रंथों के अनुसार योगमाया भगवान श्री कृष्ण की बहन थी। महरोली में स्थित और क़ुतुब कॉम्प्लेक्स के पास बना ये मंदिर हर साल देश दुनिया के पर्यटकों को अपनी तरफ आकर्षित करता है। इस मंदिर के बारे में लोगों का मत है कि ये महाभारतकाल का मंदिर है जहां आने वाले सभी भक्तों की मनोकामना पूरी होती है।

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पांडवों द्वारा बनाए गये मंदिर;-

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1-प्राचीन श्री बटुक भैरव मंदिर पांडवों द्वारा बनाए गये मंदिरों मे सर्व प्रथम है। जिनके बिग्रह मे भैरव बाबा का चेहरा और दो बड़ी-बड़ी आँखों के साथ बाबा का त्रिशूल दिखाई पड़ता है।

2-श्री किलकारी बाबा भैरव नाथ जी पांडवों कालीन मंदिर

3-श्री दूधिया बाबा भैरव नाथ जी पांडवों कालीन मंदिर, बाबा भैरव नाथ जी को समर्पित है, जिन्हें भैरों तथा भैरव नाम से भी जाना जाता है।

4- सिद्धपीठ श्री दूधेश्वरनाथ महादेव मठ मंदिर(Ancient Puranas varnit Hiranyagarbha Jyotirlinga is pray as It was the age of treta yuga before the birth of Shri Ram.)

5- श्री योगमाया मंदिर ( is taken care by 16th generation of same family of vatsh gotra. Temple is dedicated to Shri Yogmaya sister of Lord Krishna, Near by Qutub Minar)

1-प्राचीन श्री बटुक भैरव मंदिर

प्राचीन श्री बटुक भैरव मंदिर पांडवों द्वारा बनाए गये मंदिरों मे सर्व प्रथम है। जिनके बिग्रह मे भैरव बाबा का चेहरा और दो बड़ी-बड़ी आँखों के साथ बाबा का त्रिशूल दिखाई पड़ता है।

पौराणिक कथा:

1-पांडवों ने अपने किले की सुरक्षा हेतु कई बार यज्ञ का आयोजन किया था। लेकिन राक्षस यज्ञ को बार-बार भंग कर दिया करते थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने सुझाव दिया कि किले की सुरक्षा हेतु भगवान भैरव को किले में स्थिपित करें। बटुक भैरव नाथ की लगभग दो फुट की प्रतिमा नेहरू पार्क स्थित एक प्राचीन कुएं की मुंडेर पर गदाधारी भीमसेन द्वारा स्थापित की गई थी। इस मंदिर की स्थापना से जुड़ी पूरी चर्चा का वर्णन स्कंद पुराण में भी आता है। काशी जाकर, भीम ने बाबा की अराधना की और बाबा को इन्द्रप्रथ चलने का

आग्रह किया और किले की रक्षा करने के लिए आग्रह किया। भीम का आग्रह स्वीकार कर बटुक भैरव उनके साथ चलने का तैयार हो गए। रास्ते में भीम को कोई समस्या न हो इसके लिए भैरव नाथ ने अपना वजन बेहद हल्का कर लिया और उनके कंधों पर सवार हो गए।

2-लेकिन उन्होंने भीम के सामने एक शर्त भी रखी कि वह रास्ते में उन्हें जहां कहीं भी रखेगा, वह वहीं पर विराजमान हो जाएंगे। भीम ने इसे स्वीकार किया और बटुक भैरव को अपने कंधे पर बैठाकर इंद्रप्रस्थ की ओर चल दिए। काशी से इंद्रप्रस्थ का रास्ता बहुत लंबा था। जब भीम इंद्रप्रस्थ की सीमा में आ गए तो भैरव नाथ ने उनकी परीक्षा लेनी चाही। भीम सेन को अचानक से तेज प्यास लगने लगी। पांडवों का किला ज्यादा दूर तो नहीं था, लेकिन भीम से प्यास सहन नहीं हुई और उन्होंने अपने कंधे पर बैठे भैरव नाथ को उतार कर एक कुएं की मुंडेर पर सुरक्षित रख दिया।

शर्त के मुताबिक़ भैरव जी बोले की वह इससे आगे नहीं जायँगे।भीम ने भैरव जी को बोला की वह पांडवो को वादा करके आये है की मै आपको लेकर आऊंगा और आप सभी दैत्यों को यहाँ से दूर करेंगे परन्तु आप मेरे साथ आगे नहीं गए तो मै असफल हो जाऊंगा। यह सुनकर भैरव जी बोले मै यही से तुम्हारा काम कर दूंगा ।और

दैत्य आएगी तो उनकी जटाएं किलकारी करेंगी, जिसे सुनकर वह स्वयं किले की सुरक्षा के लिए वहां उपस्थित हो जाएंगे। भीमसेन ने वैसा ही किया। आज भी दिल्ली के पुराने किले पर किलकारी भैरव नाथ मंदिर मौजूद हैं। इन दोनों मंदिरों का परस्पर संबंध भी हैं और दोनों ही पांडव कालीन तथा भीम द्वारा स्थापित किए हुए हैं।

कहा है मंदिर?

चाणक्यपुरी के नेहरू पार्क में स्थित बटुक भैरव नाथ मंदिर में मंगलवार, शनिवार और रविवार को श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। कुएं पर प्रतिष्ठित भैरव की मान्यता बहुत है। यह मंदिर बिड़ला मंदिर ट्रस्ट द्वारा संचालित है। मान्यता है कि यहां आने वाले हर श्रद्धालु को उसकी श्रद्धा अनुसार फल मिलता है।

2-श्री किलकारी बाबा भैरव नाथ जी मंदिर;-

भैरव नाथ महाराज जिन्हे देव भूमि काशी का कोतवाल भी कहा गया है वह भगवन शिव के गण और माँ पारवती के अनुचर है। भैरव का अर्थ है भय का हरण करने वाला। भैरव नाथ महाराज तीनो देव ब्रह्मा, विष्णु और महेश की शक्तिया अपने अंदर समाये बैठे है। माना जाता है भैरव नाथ की सिद्धि बेहद कठिन होती है परंतु जो व्यक्ति भैरव नाथ की सिद्धि प्राप्त कर ले उसका जीवन समझो धन्य हो गया।

श्री किलकारी भैरव मंदिर का इतिहास।

युधिष्ठिर ने कौरवो से युद्ध जितने के बाद एक महा शिवलिंग की स्थापना करना चाहा पर दानवीय शक्तियों ने इसमे अनेको विध्न डाले तब भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें कशी के कोतवाल भैरव से सहायता लेने की युक्ति बताई | भीम ने बाकि भाईओ से वादा किया की वह भैरव जी को लेके आयंगे जिससे यह सभी दैत्य यहाँ से भाग खड़े होंगे। भीम वादा करके जब भैरव जी के पास पहुंचे तभी भैरव जी ने भीम के आगे एक शर्त रखी की मै तभी तुम्हारे साथ चलूँगा जब तुम मुझे अपनी पीठ पर बिठा कर ले जाओगे और रास्ते में यदि तुम कही रुक गए तो वह उससे आगे नहीं जायेंगे। भीम ने यह शर्त स्वीकार की और भैरव नाथ जी को अपनी पीठ पर बिठा निकल पड़े परन्तु दिल्ली के पुराने किले तक पहुँच कर भीम थक गए और रुक गए और शर्त के मुताबिक़ भैरव जी बोले की वह इससे आगे नहीं जायँगे।

भीम ने भैरव जी से आग्रे किया और कहां की मैं अपने भाईयों को वचन दे कर आया हुँ कि आपको इन्द्रप्रथ लेकर आऊंगा इसलिए मेरी विनती है कि आप इन्द्रप्रस्थ चले। परन्तु बाबा आगे नहीं गये और भीम का मान रखने के लिए उन्हें भीम को किले की सुरक्षा हेतु अपनी जटा काट कर दे दी और कहां कि इन्हें किल में विस्थपित करे और मैं यहीं से किलकारी मार कर किले की सुरक्षा करूंगा और वहा स्थान आज किलकारी बाबा भैंरो नाथ मंदिर के नाम से जाना जाता है।

उसी दिन से किले की उस जगह का नाम "श्री किलकारी बाबा भैरो नाथ जी पांडवो कालीन मंदिर" पडा और भीम ने वहां भैरो नाथ जी का विशाल मंदिर का निर्माण करवाया।

तांत्रिको के बीच प्रसिद्द है श्री किलकारी भैरव मंदिर।

तंत्र विद्या में भैरो नाथ जी का विशेष स्थान है। यहाँ साल भर तांत्रिको का ताँता लगा रहता है जो की भैरव नाथ जी की सिद्धि प्राप्त करने का प्रयत्न करते है व कुछ अपने यजमानो की पूजा करवाते है। यहाँ हर शनिवार व रविवार को तांत्रिको को मंदिर परिसर में देखा जा सकता है।

क्या चढ़ता है श्री किलकारी भैरव को भोग?

बाबा भैरो नाथ जी को इस मंदिर में शराब का भोग लगाया जाता है। भक्त बेहद श्रद्धा से शराब लेकर आते है और बाबा को भोग लगाते है। यहाँ एक ज्वाला भी जलती है जिसमे तेल या घी नहीं बल्कि शराब डालके उसे प्रज्वलित रखा जाता है।

ध्यान दे - यदि आप बाबा को शराब का भोग लगाना चाहते है तो आप वह बहार से ले कर आये, मंदिर में इसकी कोई वयस्था नहीं है।

किन लोगो को ज़रूर आना चाहिए इस मंदिर में?

वैसे तो भगवान के आगे हर व्यक्ति को सर झुकाने आना चाहिए परन्तु जिन लोगो को कोई ऊपरी बाधा सता रहीं हो या काम काज में परेशानी हो तो उन्हें बाबा की शरण में निश्चित रूप से आना चाहिए और उनकी आराधना करनी चाहिए।

कैसे होते है बाबा प्रसन्न?

यदि आप भैरव नाथ जी को प्रसन्न करना चाहते है तो बाबा के मंदिर में शनिवार को चार मुखी दीपक जलाये और उड़द की दाल के भल्लो का और शराब का भोग लगाए। कुछ भक्त जो शराब का सेवन नहीं करते वह दूध का भी भोग लगा सकते है।

भैरव नाथ जी की सवारी।

बाबा भैरव नाथ जी की सवारी है कुत्ते। आप मंदिर परिसर में बहुत सारे कुत्तो को देख सकते है यहाँ तक की मंदिर के कक्ष में जहा भैरव नाथ जी ने स्थान लिया है वहां भी कुत्ते हमेशा बैठे देखे जा सकते है व मंदिर के बहार भी काले कुत्तो की बड़ी सी प्रतिमा दोनों तरफ बानी हुई है।

कहा है मंदिर?

श्री किलकारी बाबा भैरो नाथ जी पांडवो कालीन मंदिर दिल्ली के पुराने किले के पीछे स्तिथ है।यह मंदिर प्रगति मैदान के गेट नंबर 1 के सामने है व सबसे नज़दीकी मेट्रो स्टेशन भी प्रगति मैदान का ही पड़ता है।

श्री दूधिया बाबा भैरव नाथ जी;-

श्री दूधिया बाबा भैरव नाथ जी पांडवों कालीन मंदिर, बाबा भैरव नाथ जी को समर्पित है, जिन्हें भैरों तथा भैरव नाम से भी जाना जाता है। महाभारत के युद्ध से पहले भीम ने इस क्षेत्र में निवास करते हुए सिद्धियाँ प्राप्त की थी। दूधिया भैरव नाथ मंदिर इंद्रप्रस्थ, पुराण किला और प्रगति मैदान मेट्रो स्टेशन के निकट है।

निकटतम श्री किलकरी बाबा भैरव नाथ जी मंदिर से बिल्कुल अलग! इस मंदिर की सबसे अद्भुत मान्यता है कि यहाँ, भक्तों द्वारा बाबा भैरव नाथ पर कच्चा (बिना पका) दूध चढ़ाया जाता हैं। कुत्तों को भगवान भैरव का वाहन माना गया है, इसलिए मंदिर परिसर में कई कुत्ते विचरण करते मिल जाएंगे।

4-श्री दूधेश्वरनाथ महादेव मंदिर;-

1-श्री दूधेश्वरनाथ महादेव मंदिर भगवान शिव को पूर्णतः समर्पित है। श्री दूधेश्वरनाथ महादेव मंदिर प्राचीन मंदिर है जोकि दिल्ली एनसीआर में बहुत प्रसिद्ध है। यह मंदिर भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के गाजियाबाद जिले में है जोकि दिल्ली एनसीआर की सीमा में आता है। ऐसा माना जाता है कि श्री दूधेश्वरनाथ महादेव मंदिर का इतिहास 5000 वर्ष पुराना है।

2-पौराणिक कथाओ के अनुसार हरनंदी (हिरण्यदा) नदी के किनारे हिरणयगर्भ में ज्योतिलिंग का वर्णन पुराणों में मिलता, जहां पुलस्त्य के पुत्र एवं रावण के पिता विश्वश्रवा ने घोर तपस्या की थी। इस मंदिर में रावण ने भी पूजा-अर्चना की थी। समय के साथ-साथ हरनंदी नदी का नाम खो गया। हिरण्यगर्भ ज्योतिर्लिंग ही दूधेश्वर महादेव मठ मंदिर में जमीन से साढ़े तीन फीट नीचे स्थापित स्वयंभू दिव्य शिवलिंग है।

3-इस मंदिर का मुख्य द्वार एक ही पत्थर को तराश कर बनाया गया है। दरवाजे के मध्य में गणेश जी विद्यमान है जिन्हें इसी पत्थर को तराश कर बनाया गया है। कुछ लोगों का मानना है कि इस मंदिर को छत्रपति शिवाजी महाराज ने बनवाया था।

4- श्रीदूधेश्वरनाथ महादेव मंदिर के लिए एक लोक कथा प्रचलित है कि पास ही के गावं कैला की गायें जब यहां घास आदि चरने के लिए आती थी तब टीले के ऊपर पहुंचने पर स्वतः ही दूध गिरने लगता था। इस घटना को देख गावं वालों ने जब इस टीले की खुदाई की तो उन्हें वहां शिवलिंग मिला जो मंदिर में स्थापित है। गायों के स्वतः दूध गिरने के कारण इस मंदिर व शिव लिंग नाम दूधेश्वर या दुग्धेश्वर महादेव रखा गया था।

5-इस मंदिर में हर समय एक धूना जलती रहती है, जिसके बारे में कहा जात है कि यह कलयुग में महादेव के प्रकट होने के समय से ही जलती आ रही है। यहां एक कुआं भी है, जिसके पानी का स्वाद कभी मीठा तो कभी गाय के दूध जैसा हो जाता है।

6-यहां गौशाला भी है जिसके बारे में कहा जाता है कि यहा रहने वाल गाये ‘लम्बो गाय’ है जो उन गायों की ही वंशज है जिन गायों का दूध अपने आप शिव लिंग पर गिरा करता था। इस मंदिर के आँगन में औषधालय भी है, जिसका उद्देश्य आयुर्वेद से गरीबों का मुफ्त इलाज करना है।

7-यहां वेद विद्यापीठ भी है, जिसकी स्थापना श्री शंकराचार्य जयंती वर्ष 2002 में की गई थी। इसके अंतर्गत मंदिर आँगन में बीस कक्षाओं वाली श्री दूधेश्वर विद्यापीठ का शुभारंभ हुआ। इस विद्यापीठ में पूरे भारत भर से आये पचास से अधिक छात्र गुरुकुल परंपरा के अनुसार विद्या अध्ययन करते हैं। यहां एक समृद्ध पुस्तकालय भी है, जिसमें लगभग आठ सौ से भी अधिक ग्रन्थ मौजूद हैं।