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क्या है आद्यशक्ति भगवती श्री राधा जी के जन्मोत्सव की कथा ?

श्री राधा क्या है ?-

11 FACTS;-

1-श्रीराधा मात्र एक नाम नहीं जो श्रीकृष्ण के पूर्व हैं। श्रीराधा मात्र एक प्रेम स्तम्भ नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक पृष्ठ है, जहां द्वैत से अद्वैत का मिलन है। श्रीराधा एक सम्पूर्ण काल का उद्गम हैं, जो श्रीकृष्ण रुपी समुद्र से मिलती हैं। श्रीकृष्ण के जीवन में श्रीराधा प्रेम की मूर्ति बनकर आईं और विश्व में प्रेम का प्रतिमान बनकर बस गईं। जिस प्रेम को कोई नाप नहीं सका, उसकी आधारशिला श्रीराधा ने ही रखी थी। यही वजह है कि आज भी हर जगह श्रीकृष्ण राधारानी के संग ही नज़र आते हैं।

2-श्रीराधा को ही ब्रज की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है, पूरे ब्रज क्षेत्र में लोग राधे-राधे कहते ही नज़र आते हैं। श्रीराधा श्रीकृष्ण से पूर्व याद की जाती हैं। कहते हैं कि ये श्रीकृष्ण की ही इच्छा थी कि उनके नाम से पूर्व जो श्रीराधा का नाम लेता है या उनके बिना भी जो श्रीराधा को याद करता है, वो स्वयं उस पर कृपा करते हैं। ऐसे अद्भुत प्रेम का उदाहरण पूरे ब्रह्माण्ड में दूसरा नहीं मिलता। एक ऐसा प्रेम, जो कभी नहीं मिटा, सदियां भी इसे धूमिल न कर सकीं, बल्कि उस प्रेम की लोग पूजा करने लगे, जिसमें कुछ भी पाना न था, सिर्फ़ और सिर्फ़ खोना था। उन्होंने खोकर भी एक-दूजे को पा लिया।

3-श्री माँ राधा रानी जो श्री कृष्ण जी की आल्हादिनी शक्ति है, इस

मृत्युलोक में अवतरित हुई थीं।राधा और कृष्ण दोनों अभेद्य आत्मा “अवांगमनसगोचर”, परब्रह्म-परमात्मा हैं।श्रीराधा भगवान श्री कृष्ण के प्राणों की अधिष्ठात्री देवी हैं. इसलिए भगवान इनके अधीन रहते हैं।एक आद्या शक्ति (प्रकृति) हैं दूसरे परम पुरुष भगवान् ।

4-श्रीराधा कृष्ण तो एक आत्मा और दो शरीर हैं।एक सुर है तो दूसरे उस सुर की राग रागिनी, एक प्यास है तो दूसरे उस प्यास को शांत करने वाले जल की बूँद हैं।राधा कृष्ण दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। जो हर समय नित्य वृन्दावन धाम में रास लीला करते हैं।

5-श्री कृष्ण और राधा का प्रेम कोई शारीरिक प्रेम नहीं बल्कि, आत्मा से आत्मा का प्रेम था।दोनों का प्रेम.. समाधि में परिवर्तित हो जाता था।दोनों अपने असली महाशक्ति रूप एवं परम पुरुष परमात्मा के रूप में ही आत्म रमण करते थे।

6-क्या है गोपी का अर्थ?-गोपी को हम सामन्य रूप से समझे तो गोपी की व्याख्या इस प्रकार की गयी है–’गो’ अर्थात् इन्द्रियां और ‘पी’ का अर्थ पान करना।गोपी वही जो भक्ति रस का पान समस्त इन्द्रियों से करे। अर्थात जो समस्त इन्द्रियों के द्वारा केवल भक्तिरस का ही पान करे, वही गोपी है। गोपी भक्ति की पराकाष्ठा का है।गोपी कहना बहुत सरल है, परन्तु होना बहुत ही कठिन।

7-वैष्णव सम्प्रदाय, भगवान विष्णु को ईश्वर मानने वालों का सम्प्रदाय है।वैष्णव धर्म के अंदर भक्ति का प्रमुख स्थान है वैष्णव धर्म का दृष्टिकोण सार्वजनिक और व्यापक था ।गीता के अनुसार मोक्ष प्राप्ति के लिए तपस्या और सन्यास अनिवार्य नहीं है ।मनुष्य गृहस्ती में रहते हुए भी मोक्ष को प्राप्त कर सकता है। इसके अन्तर्गत चार सम्प्रदाय मुख्य रूप से आते हैं। पहले हैं आचार्य रामानुज, निमबार्काचार्य, बल्लभाचार्य, माधवाचार्य। चैतन्य महाप्रभु भी वैष्णव आचार्य है जो बंगाल में हुए।

8-वैदिक और पौराणिक साहित्य में, राधा और इस धातु के अन्य रूप का अर्थ है 'पूर्णता', 'सफलता' और 'संपदा' भी. सफलता के देवता, इंद्र को राधास्पति के रूप में सन्दर्भित किया गया था। शब्द ''राधा,'' अथर्ववेद, तैत्रीय ब्राह्मण और तैत्रीय संहिता में मिलता है।

शक्ति और शक्तिमान की आम व्युत्पत्ति, अर्थात भगवान में स्त्री और पुरुष सिद्धांत का अर्थ है कि शक्ति और शक्तिमान एक ही हैं।

9- हर देवता का अपना साथी, 'अर्धांगिनी' या शक्ति होती है और उस शक्ति के बिना उन्हें कभी-कभी अपरिहार्य शक्ति के बिना माना जाता है। हिन्दू धर्म में यह असामान्य बात नहीं है कि जब किसी एक व्यक्तित्व की बजाय एक जोड़ी की पूजा से भगवान की पूजा की जाती

है, राधा कृष्ण की पूजा ऐसी ही है।इस विचार को स्वीकार किया जाता है कि राधा और कृष्ण का संगम, शक्ति के साथ शक्तिमान के संगम को इंगित कर सकता है ।

10- वैष्णव दृष्टिकोण से दैवीय स्त्री ऊर्जा (शक्ति), ऊर्जा के एक दिव्य स्रोत को प्रतिबिंबित करती है, ईश्वर या शक्तिमान।चूंकि कृष्ण को ईश्वर के सभी रूपों का स्रोत माना जाता है, श्री राधा, उनकी सहचरी, सभी शक्तियों का मूल स्रोत हैं अथवा दैवीय ऊर्जा का स्त्री रूप हैं। परंपरा के अनुसार, आराधना को समझने के लिए विभिन्न व्याख्याओं में एक निजवादी समान मूल है। विशेष रूप से चैतन्य गौड़ीय वैष्णव सिद्धांत ...जीव गोस्वामी ने अपने प्रीति सन्दर्भ में कहा है कि प्रत्येक गोपी भिन्न स्तर के मनोभाव की तीव्रता को व्यक्त करती है, जिसमें से राधा का सर्वोच्च है।

11-इस ब्रह्मविद्या का केंद्र बिंदु ''रस ''शब्द से संबंधित है। इस शब्द का धार्मिक प्रयोग आरंभिक काल में देखा जा सकता है, निम्बार्क या चैतन्य सम्प्रदाय से दो हजार साल पहले, एक वाक्यांश ''ब्रह्म सूत्र ''में उद्धृत किया गया है: "वास्तव में, ईश्वर रस है" । यह पंक्ति इस विचार को व्यक्त करती है कि, भगवान ही ऐसा जो परम रस या आध्यात्मिक उत्साह, भावावेश का आनंद लेता है।

''श्रीराधा''...निम्बार्क सम्प्रदाय के अनुसार;-

03 FACTS;-

1-निम्बार्क सम्प्रदाय, चार वास्तविक वैष्णव परंपराओं में से एक है।जो बाल कृष्ण की पूजा करता है, चाहे अकेले या उनकी सहचरी राधा के साथ। निम्बार्क के अनुसार राधा, विष्णु-कृष्ण की सदा की संगिनी थीं और ऐसा भी मत है, कि वह अपने प्रेमी कृष्ण की पत्नी बन गई। निम्बार्क को, उसी काल का माना जाता है जिस काल में शंकराचार्य हुए थे और वे प्रथम आचार्य थे जो कृष्ण के साथ राधा की आराधना सखी भाव उपासना पद्धति में करते थे।

2-अपने वेदांत कामधेनु दशश्लोकी में, यह स्पष्ट कहा गया है: - परमपिता परमेश्वर के शरीर का बायां हिस्सा श्रीमती राधा हैं, जो हर्ष के साथ बैठी हैं और स्वयं परमेश्वर जैसी ही सुंदर हैं; जिनकी सेवा में हज़ारों गोपियां हैं: हम उस सर्वोच्च देवी का ध्यान करते हैं, जो सभी इच्छाओं की पूर्ती करने वाली हैं।''

3-15वीं सदी के जगद्गुरु स्वामी श्री हरिव्यास देवाचार्य द्वारा लिखित महावाणी के अनुसार ''मैं निरंतर राधा का गुणगान करता हूं जो कोई और नहीं बल्कि कृष्ण हैं और श्री कृष्ण, राधा ही हैं, जिनके योग को कामबीज द्वारा दर्शाया गया है और जो सदा निकुंज गोलोक वृन्दावन में निवास करते हैं।''

राधा कृष्ण की जोड़ी... प्रेम का आदर्श;-

06 FACTS;-

1-श्रीकृष्ण के साथ, श्रीराधा को सर्वोच्च देवी स्वीकार किया जाता है और यह कहा जाता है कि वह अपने प्रेम से श्रीकृष्ण को नियंत्रित करती हैं। यह माना जाता है कि श्रीकृष्ण संसार को मोहित करते हैं, लेकिन श्रीराधा "उन्हें भी मोहित कर लेती हैं। इसलिए वे सभी की सर्वोच्च देवी हैं।सभी भक्त मानते हैं, … शरीर यदि कृष्ण है तो राधा आत्मा है।

2-श्रीराधा ही एक मात्र ऐसा नाम है, जो श्रीकृष्ण के पहले लिया जाता है। ये दो नाम.. दो नहीं एक है, इसलिए कहा जाता है श्रीराधे कृष्ण। जैसे परमात्मा का ही अंश आत्मा है। ठीक वैसा ही संबंध श्रीकृष्ण और श्री राधा का है। जिस तरह परमात्मा के बिना आत्मा नहीं रह सकती है। वैसे ही श्रीकृष्ण के बिना श्रीराधा और श्रीराधा के बिना श्रीकृष्ण नहीं रह सकते हैं। 3-राधा-कृष्ण से खूबसूरत प्रेम इस धरती पर किसी नहीं किया, क्योंकि आत्मा और परमात्मा के प्रेम से गहरा कोई प्रेम हो ही नहीं सकता है। राधा कृष्ण का प्रेम सिर्फ वही समझ सकता है जो ईश्वर के करीब हो। दरअसल इस संसार की हर वो आत्मा.. जो कृष्ण को पाने की चाह रखे और दिन भर उसके बारे में सोचे वह गोपी है, लेकिन जो आत्मा कृष्ण से एक रूप होकर अभिमान से दूर हो.. बस वही राधा है। जब ये स्थिति आती है तो फिर राधा-कृष्ण से दूर रह सके या न रह सके, लेकिन कृष्ण-राधा से दूर नहीं रह सकते।

4-श्रीराधा कृष्ण की जोड़ी प्रेम का आदर्श है। इनके प्रेम से जुड़ी कई दंत कथाएं भी इसलिए आज भी प्रचलित हैं। ऐसी ही एक कथा है जिसमें राधा जी ने भक्तों को खुद का नाम कृष्ण से पहले लेते देख कृष्ण…कृष्ण कहलवाया।व्यास मुनि के पुत्र शुकदेव जी तोता बनकर श्रीराधा के महल में रहने लगे। शुकदेव जी हमेशा राधा-राधा रटा करते थे। एक दिन राधा ने शुकदेव जी से कहा कि अब से तुम सिर्फ कृष्ण-कृष्ण नाम जपा करो। शुकदेव जी ऎसा ही करने लगे। इन्हें देखकर दूसरे तोते भी कृष्ण-कृष्ण बोलने लगे।

5-राधा की सखी सहेलियों पर भी श्रीकृष्ण नाम का असर होने लगा। पूरा नगर कृष्णमय हो गया, कोई राधा का नाम नहीं लेता था। एक दिन कृष्ण उदास भाव से राधा से मिलने जा रहे थे। राधा कृष्ण की प्रतीक्षा कर रही थी। तभी नारद जी बीच आ गए। श्रीकृष्ण के उदास चेहरे को देखकर नारद जी ने पूछा कि प्रभु आप उदास क्यों है। श्रीकृष्ण कहने लगे कि राधा ने सभी को कृष्ण नाम रटना सिखा दिया है। कोई राधा नहीं कहता, जबकि मुझे राधा नाम सुनकर प्रसन्नता होती है। कृष्ण के ऎसे वचन सुनकर श्रीराधा की आंखें भर आई। महल लौटकर श्रीराधा ने शुकदेव जी से कहा कि अब से आप राधा- कृष्ण ही जपा कीजिए। उस समय से ही राधा का नाम पहले आता है फिर कृष्ण का। 6-कहते हैं श्रीकृष्ण और राधा रास किया करते थे। लोग इसका अर्थ लौकिक रूप से लगा लेते हैं, जबकि यह रास द्वैत और अद्वैत का मिलन है। जब दो आत्माएं एक रस हो जाए बस वही प्रेम है और वही रास भी। जिसमें जीवन के सारे रस समाहित हो ..फिर भी वह स्वार्थ से कोसों दूर हो ..बस वही प्रेम रास है।

रावल गांव में कमल के फूल में प्रकट हुई थी लाडलीजी;-

07 FACTS;-

1-बरसाना में ब्रहमाचल पर्वत के शिखर पर प्राकृतिक सौन्दर्य के बीच निर्मित राधारानी (लाडलीजी) मन्दिर में प्राचीन रीति रिवाज और परंपरा के अनुसार राधारानी का जन्मोत्सव धूमधाम से मनाया जाता है. इस अवसर पर श्रीजी के मंदिर में स्थापित राधारानी की मूर्ति को खास श्रृंगार और आभूषण धारण कराए जाते हैं और विशेष भोग लगाया गया है.

2-राधा रानी की सबसे प्रिय सखी व अष्टसखियों में प्रधान सखी ललिता जी का जन्मोत्सव राधा रानी के जन्मोत्सव से दो दिन पहले भाद्रपक्ष की छठ के दिन को मनाया जाता है । ऊंचागाव स्थित ,अटा अटोर नामक पहाड़ी पर बने ,अकबर कालीन प्राचीन ललिता जी के मंदिर में इस अवसर पर भव्य आयोजन होंते हैं।

3-राधा जी के बारे में प्रचलित है कि वह बरसाना की थीं लेकिन, हकीकत है कि उनका जन्म बरसाना से 50 किलोमीटर दूर हुआ था। यह गांव रावल के नाम प्रसिद्ध है। यहां पर राधा जी का जन्म स्थान है। कमल के फूल पर जन्मी थीं हमारी राधा रानी ! रावल गांव में राधारानी का मंदिर है। यहां पर पांच हजार साल पहले यमुना बहती थी।शास्त्रों के अनुसार कृति जी ने यमुना में स्नान करते हुए अराधना करती थी और पुत्री की लालसा रखती थी।एक दिन पूजा करते समय यमुना जी से कमल का फूल प्रकट हुआ। कमल के फूल से रोशनी निकल रही थी। यह सोने सा चमक रहा था।

4- कालांतर में इस ग्राम में रसखान ने युगल का साक्षात्कार किया। इसके बाद रसखान जी ने लिखा कि ''करील की कुंजन ऊपर बारौ''।वहा आप मंदिर के उप्पर जाओगे तो आपको खेजड़ी का पेड़ दिखेगा जो की उसी वक़्त से है जब से श्री राधा रानी का प्राकट्य हुआ जिसकी फोटो नीचे है और इस पेड़ की कोई जड़ नहीं है।

5-ऐसा भी कहा जाता है कि महाराज वृषभानु और उनकी पत्नीे कीर्ति एक दिन जब वृषभानु जी जब एक सरोवर के पास से गुजर रहे थे,तब उन्हें एक बालिका “कमल के फूल” पर तैरती हुई मिली, जिसे उन्होंने पुत्री के रूप में अपना लिया। राधा रानी जी श्रीकृष्ण जी से ग्यारह माह बडी थीं। लेकिन श्री वृषभानु जी और कीर्ति देवी को ये बात जल्द ही पता चल गई कि श्री किशोरी जी ने अपने प्राकट्य से ही अपनी आँखे नहीं खोली है। इस बात से उन्हें बड़ा दुःख हुआ

6-जब गोकुल में श्री कृष्ण का जन्मोत्सव मनाया गया, तब बालकृष्ण को देखकर राधारानी के नेत्र खुले थे। यशोदा जी कान्हा को गोद में लिए राधा जी के पास आती है। जैसे ही श्री कृष्ण और राधा आमने-सामने आते है । तब राधा जी पहली बार अपनी आँखे खोलती है।

7-अपने प्राण प्रिय श्री कृष्ण को देखने के लिए , वे एकटक कृष्ण जी को देखती है, अपनी प्राण प्रिय को अपने सामने एक सुन्दर-सी बालिका के रूप में देखकर कृष्ण जी स्वयं बहुत आनंदित होते है। जिनके दर्शन बड़े बड़े देवताओ के लिए भी दुर्लभ है तत्वज्ञ मनुष्य सैकड़ो जन्मो तक तप करने पर भी जिनकी झाँकी नहीं पाते, वे ही श्री राधिका जी वृषभानु के यहाँ साकार रूप से प्रकट हुई।

शास्त्रों के अनुसार राधा रानी जन्म कथा; -

02 FACTS;-

1- नृग पुत्र राजा सुचन्द्र और पितरों की मानसी कन्या कलावती ने द्वादश वर्षो तक तप करके श्रीब्रह्मा से राधा को पुत्री रूप में प्राप्ति का वरदान मांगा। फलस्वरूप द्वापर में वे राजा वृषभानु और रानी कीर्तिदा के रूप में जन्मे। दोनों पति-पत्नी बने। धीरे-धीरे श्रीराधा के अवतरण का समय आ गया। सम्पूर्ण व्रज में कीर्तिदा के गर्भधारण का समाचार सुख स्त्रोत बन कर फैलने लगा, सभी उत्कण्ठा पूर्वक प्रतीक्षा करने लगे। वह मुहूर्त आया। भाद्रपद की शुक्ला अष्टमी चन्द्रवासर मध्यान्ह के समये आकाश मेघाच्छन्न हो गया। सहसा एक ज्योति प्रसूति गृह में फैल गई यह इतनी तीव्र ज्योति थी कि सभी के नेत्र बंद हो गए।

2-एक क्षण पश्चात् गोपियों ने देखा कि शत-सहस्त्र शरतचन्द्रों की कांति के साथ एक नन्हीं बालिका कीर्तिदा मैया के समक्ष लेटी हुई है। उसके चारों ओर दिव्य पुष्पों का ढेर है। उसके अवतरण के साथ नदियों की धारा निर्मल हो गई, दिशाएं प्रसन्न हो उठी, शीतल मन्द पवन अरविन्द से सौरभ का विस्तार करते हुए बहने लगी। इस तरह सुंदर राधा जी के जन्मोत्सव की कथा है।

पद्मपुराण में श्री राधा का अवतरण;-

02 FACTS;-

1-पद्मपुराण में भी एक कथा मिलती है कि श्री वृषभानुजी यज्ञ भूमि साफ कर रहे थे, तो उन्हें भूमि कन्या रूप में श्रीराधा प्राप्त हुई। यह भी माना जाता है कि विष्णु के अवतार के साथ अन्य देवताओं ने भी अवतार लिया, वैकुण्ठ में स्थित लक्ष्मीजी राधा रूप में अवतरित हुई। कथा कुछ भी हो, कारण कुछ भी हो राधा बिना तो कृष्ण हैं ही नहीं।

2-राधा का उल्टा होता है धारा, धारा का अर्थ है करंट, यानि जीवन शक्ति। भागवत की जीवन शक्ति राधा है। श्रीकृष्ण देह है, तो श्रीराधा आत्मा। कृष्ण शब्द है, तो राधा अर्थ। कृष्ण गीत है, तो राधा संगीत। कृष्ण वंशी है, तो राधा स्वर। भगवान् ने अपनी समस्त संचारी शक्ति राधा में समाहित की है। इसलिए कहते हैं-

जहां कृष्ण राधा तहां -जहं राधा तहं कृष्ण।

न्यारे निमिष न होत कहु- समुझि करहु यह प्रश्न।।

भागवत में राधिका-प्रसंग;-

04 FACTS;-

1-प्रश्न उठता है कि तीनों लोकों का तारक कृष्ण को शरण देनें की सामर्थ्य रखने वाला ये हृदय उसी आराधिका का है, जो पहले राधिका बनी। उसके बाद कृष्ण की आराध्या हो गई। राधा को परिभाषित करनें का सामर्थ्य तो ब्रह्म में भी नहीं।

2-श्री कृष्ण राधा से पूछते हैं- हे राधे ! भागवत में तेरी क्या भूमिका होगी ? राधा कहती है- मुझे कोई भूमिका नहीं चाहिए कान्हा ! मैं तो तुम्हारी छाया बनकर रहूंगी। श्री कृष्ण के प्रत्येक सृजन की पृष्ठभूमि यही छाया है, चाहे वह कृष्ण की बांसुरी का राग हो या गोवर्द्धन को उठाने वाली तर्जनी या लोकहित के लिए मथुरा से द्वारिका तक की यात्रा की आत्मशक्ति।

3-आराधिका में आ को हटाने से राधिका बनता है। इसी आराधिका का वर्णन महाभारत या श्रीमद्भागवत में प्राप्त है और श्री राधा नाम का उल्लेख नहीं आता। भागवत में श्रीराधा का स्पष्ट नाम का उल्लेख न होने के कारण एक कथा यह भी आती है कि शुकदेव जी को साक्षात् श्रीकृष्ण से मिलाने वाली श्री राधा है और शुकदेव जी उन्हें अपना गुरु मानते हैं।

कहते हैं कि भागवत के रचयिता शुकदेव जी राधाजी के पास शुक रूप में रहकर राधा-राधा का नाम जपते थे।

4-एक दिन राधाजी ने उनसे कहा कि हे शुक ! तुम अब राधा के स्थान पर श्रीकृष्ण ! श्रीकृष्ण ! का जाप किया करो। उसी समय श्रीकृष्ण आ गए। राधा ने यह कह कर कि यह शुक बहुत ही मीठे स्वर में बोलता है, उसे श्री कृष्ण के हाथ सौंप दिया। अर्थात् उन्हें ब्रह्म का साक्षात्कार करा दिया। इस प्रकार श्रीराधा शुकदेव जी की गुरु हैं और वे गुरु का नाम कैसे ले सकते थे..

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अष्‍टाक्षर राधामंत्र;-

इस मंत्र को सर्व कार्य सिद्धि मंत्र बताया गया है।इस मंत्र का 16 लाख बार जप करने से भक्‍तों को हर कार्य में सफलता प्राप्‍त होती है।

ऊं ह्नीं श्रीं राधिकायै नम:। श्रीराधा जी के 32 नामों का स्मरण ,देते हैं प्रेम का विशेष वरदान;-

03 FACTS;-

1-इस नाम की महिमा अपरंपार है। श्री कृष्ण स्वयं कहते है- जिस समय मैं किसी के मुख से ‘रा’ सुनता हूं, उसे मैं अपना भक्ति प्रेम प्रदान करता हूं और धा शब्द के उच्चारण करनें पर तो मैं राधा नाम सुनने के लोभ से उसके पीछे चल देता हूं। श्रीराधा कृष्ण की भक्ति का कालान्तर में निरन्तर विस्तार हुआ। निम्बार्क, वल्लभ, राधावल्लभ, और सखी समुदाय ने इसे पुष्ट किया। श्रीकृष्ण के साथ श्री राधा सर्वोच्च देवी रूप में विराजमान् है।श्रीकृष्ण जगत् को मोहते हैं और श्रीराधा श्रीकृष्ण को।

श्रीराधा जी के 32 नाम;-

2-जो भी श्रद्धापूर्वक राधा जी के नाम का आश्रय लेता है वह प्रभु की गोद मै बैठ कर उनका स्नेह पाता है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में स्वयं श्री हरि विष्णु जी ने कहा है कि जो व्यक्ति अनजाने मैं भी राधा कहता है उसके आगे मैं सुदर्शन चक्र लेकर चलता हूं। उसके पीछे स्वयं शिव जी त्रिशूल लेकर चलते हैं। उसके दाईं ओर इंद्र वज्र लेकर चलते हैं और बाईं तरफ वरुण देव छत्र लेकर चलते हैं। 3-श्री राधा जी के 32 नामों का स्मरण करने से जीवन में सुख, प्रेम और शांति का वरदान मिलता है। धन और संपंत्ति तो आती जाती है जीवन में सबसे जरूरी है प्रेम और शांति.. श्री राधा जी के यह नाम जीवन को बनाते हैं शांत और सुखमयी...

श्रीराधा जी के 32 नाम;-

1;मृदुल भाषिणी राधा ! राधा !! 2: सौंदर्य राषिणी राधा ! राधा !! 3 : परम् पुनीता राधा ! राधा !! 4 : नित्य नवनीता राधा ! राधा !! 5 : रास विलासिनी राधा ! राधा !! 6 : दिव्य सुवासिनी राधा ! राधा !! 7 : नवल किशोरी राधा ! राधा !! 8 : अति ही भोरी राधा ! राधा !! 9 : कंचनवर्णी राधा ! राधा !! 10 : नित्य सुखकरणी राधा ! राधा !! 11 : सुभग भामिनी राधा ! राधा !! 12 : जगत स्वामिनी राधा ! राधा !! 13 : कृष्ण आनन्दिनी राधा ! राधा !! 14 : आनंद कन्दिनी राधा ! राधा !! 15 : प्रेम मूर्ति राधा ! राधा !! 16 : रस आपूर्ति राधा ! राधा !! 17 : नवल ब्रजेश्वरी राधा ! राधा !! 18: नित्य रासेश्वरी राधा ! राधा !! 19 : कोमल अंगिनी राधा ! राधा !! 20 : कृष्ण संगिनी राधा ! राधा !! 21 : कृपा वर्षिणी राधा ! राधा !! 22: परम् हर्षिणी राधा ! राधा !! 23 : सिंधु स्वरूपा राधा ! राधा !! 24 : परम् अनूपा राधा ! राधा !! 25 : परम् हितकारी राधा ! राधा !! 26 : कृष्ण सुखकारी राधा ! राधा !! 27 : निकुंज स्वामिनी राधा ! राधा !! 28 : नवल भामिनी राधा ! राधा !! 29 : रास रासेश्वरी राधा ! राधा !! 30 : स्वयं परमेश्वरी राधा ! राधा !! 31: सकल गुणीता राधा ! राधा !! 32 : रसिकिनी पुनीता राधा ! राधा !! कर जोरि वन्दन करूं मैं_ नित नित करूं प्रणाम_ रसना से गाती/गाता रहूं_ श्री राधा राधा नाम !!

NOTE;-

जो हमारी किशोरी जी के यश का गान जाता है उस पर भगवान श्री कृष्ण साक्षात कृपा करते है और जो इनके प्रेम में डूबा रहता है वो सदैव ही निकुंज वास का अधिकारी बन जाता है। हमारा उन परम शक्ति को सत्-सत् नमन है।

प्रेम से कहिये श्री राधे!!