समाधि या महासमाधि क्या है?कैसे पाते हैं योगी इस लक्ष्य को?क्या कूर्म नाड़ी प्राण की, श्‍वास की... वा


क्या है समाधि की परिभाषा ?-

02 FACTS;- 1-समाधि चित्त की सूक्ष्म अवस्था है जिसमें चित्त ध्येय वस्तु के चिंतन में पूरी तरह लीन हो जाता है।ध्यान का अभ्यास करते-करते साधक ऐसी अवस्था में पहुंच जाता है कि उसे स्वयं का ज्ञान नहीं रह जाता और केवल ध्येय मात्र रह जाता है, तो उस अवस्था को समाधि

कहते हैं।समाधि की अवस्था में सभी इन्द्रियां मन में लीन हो जाती है। जो व्यक्ति समाधि को प्राप्त करता है उसे स्पर्श, रस, गंध, रूप एवं शब्द इन 5 विषयों की इच्छा नहीं रहती तथा उसे भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी, मान-अपमान तथा सुख-दु:ख आदि किसी की अनुभूति नहीं होती।

2- मोक्ष या समाधि का अर्थ हैं अणु-परमाणुओं से मुक्त साक्षीत्व पुरुष हो जाना। तटस्थ या स्थितप्रज्ञ अर्थात परम स्थिर, परम जाग्रत हो जाना। ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का भेद मिट जाना। इसी में परम शक्तिशाली होने का 'बोध' छुपा है, जहाँ न भूख है न प्यास, न सुख, न दुख, न अंधकार न प्रकाश, न जन्म है, न मरण और न किसी का प्रभाव। हर तरह के बंधन से मुक्ति...परम स्वतंत्रता अतिमानव या सुपरमैन।संपूर्ण समाधि का अर्थ है मोक्ष अर्थात प्राणी

का जन्म और मरण के चक्र से छुटकर स्वयंभू और आत्मवान हो जाना है।

3-जब पूर्ण रूप से सांस पर नियंत्रण हो जाता है और मन स्थिर व सन्तुलित हो जाता है, तब समाधि की स्थिति कहलाती है।प्राणवायु को 5 सैकेंड तक रोककर रखना 'धारणा' है, 60 सैकेंड तक मन को किसी विषय पर केंद्रित करना 'ध्यान' है और 12 दिनों तक प्राणों का निरंतर संयम करना ही समाधि है।

समाधि क्या है?-

10 FACTS;-

1-ध्यान की उच्च अवस्था को समाधि कहते हैं। हिन्दू, जैन, बौद्ध तथा योगी आदि सभी धर्मों में इसका महत्व बताया गया है। जब साधक ध्येय वस्तु के ध्यान मे पूरी तरह से डूब जाता है और उसे अपने अस्तित्व का ज्ञान नहीं रहता है तो उसे समाधि कहा जाता है। पतंजलि के योगसूत्र में समाधि को आठवाँ (अन्तिम) अवस्था बताया गया है।समाधि में आप पूर्ण चेतना का अहसास करते हैं। निश्चित रूप से, यह चेतना इतनी तीक्ष्ण होगी कि सामान्य स्थिति से बिलकुल अलग होगी।

2-समाधि समयातीत है जिसे मोक्ष कहा जाता है। इस मोक्ष को ही जैन धर्म में कैवल्य ज्ञान और बौद्ध धर्म में निर्वाण कहा गया है। योग में इसे समाधि कहा गया है। इसके कई स्तर होते हैं। मोक्ष एक ऐसी दशा है जिसे मनोदशा नहीं कह सकते।समाधि योग का सबसे अंतिम

पड़ाव है।समाधि की प्राप्ति तब होती है, जब व्यक्ति सभी योग साधनाओं को करने के बाद मन को बाहरी वस्तुओं से हटाकर निरंतर ध्यान करते हुए ध्यान में लीन होने लगता है।

व्यक्ति जब तक शब्दों के अंधकार में फंसा रहता है, तब तक उसे कुछ दिखाई नहीं देता। 3-समाधि का अर्थ है ''उस एक परमात्मा के समान हो जाना, उस के बराबर हो जाना''।समाधि एक ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति स्वयं की वास्तविकता जान लेता है, अर्थात उसे ईश्वर और स्वयं में कोई अंतर नहीं दिखाई देता। व्यक्ति को यह अहसास होता है कि वह शरीर नहीं चेतन है। जैसे राजा जनक ने सत्य को साकार करने के बाद श्री अष्टावक्र गीता में कहा “मैं अद्भुत हूँ, मैं स्वयं को नमन करता हूँ”।परंतु समाधि की वास्तविक स्थिति को पूर्ण रूप से समझने के लिए उसे स्वयं उस अवस्था में जाना होगा। उसे स्वयं समाधि का अहसास करना होगा।

4-हमारा मन तालाब के झिलमिलाते पानी की तरह है। एक 'चांद' भी झिलमिलातेङिालमिलाते और हिलते-डुलते हुए पानी में अनेक होकर दिखता है।अगर पानी एकाएक शांत हो जाए, तो चांद एक ही दिखाई देता है। 'शांत तालाब' का पानी दर्पण बन जाता है। ठीक ऐसे ही मन कई बार हिलोरे तब लेता है, जब उस पर सोच और विचार की तंरगें यह तय करती हैं कि परमात्मा कैसा है? ऐसा करने से परमात्मा खंडों में बंट जाता है, परंतु पूर्ण रूप से मन और चित्त को शांत करने से व्यक्ति अतल गहराइयों में डुबकी लगाता है। वह शांत होता है, तो उसकी स्थिरता उसे समाधि की ओर ले जाती है। प्रभु का मिलन कराती है जैसा आदि शंकराचार्य, बुद्ध, नानक, महावीर आदि महापुरुषों ने किया। समाधि तक पहुंचने के लिए मन और मस्तिष्क को तैयार करना पड़ता है। जीवन की अनेकानेक चुनौतियों को समझना पड़ता है। तब जाकर कहीं उस परम तत्व की चरण-शरण मिलती है।

5- व्यक्ति परिस्थितियों एवं समाज से प्रभावित हो जाता है, इसी कारण समाधि की अवस्था की अनुभूति नहीं कर पाता है। यदि वह इस अनुभवातीत स्थिति की प्राप्ति कर ले तो उस के बाद उसे केवल स्वयं को प्रभावित ना होने की अवस्था में रखना है, तब समाधि की स्थिति बने रहेगी। इसके अतिरिक्त – अतुलनीय संवेदना एवं उत्तेजना शरीर से उभरेगी, विशेष रूप से आज्ञा चक्र और सहस्रार में। उत्तेजना इतनी गहरी होगी कि आपको बाहरी कुछ भी दिलचस्प नहीं लगेगा। बाहरी दुनिया आपके आंतरिक स्थिति से अनभिज्ञ रह सकतीं है, परंतु उत्तेजना और अद्वितीय आनंद आप के भीतर बहता रहेगा। जागृत अवस्था में आप लगातार ऐसी उत्तेजना महसूस करेंगे। यही समाधि की अवस्था है और जो भी प्रयत्न करने के लिए तैयार है वह भी अनुभव कर सकता है। 6-समाधि का अर्थ है, पूर्णता को प्राप्त करना, प्रभु से मिलना, सत्य से जुड़ना। सोचने मात्र से सत्य उपलब्ध नहीं हो सकता है। सोचना लक्ष्य प्राप्ति में सहयोगी हो सकता है, उपयोगी हो सकता है, लेकिन सिर्फ सोच-सोचकर व्यक्ति लक्ष्य हासिल नहीं कर सकता। जितने भी दुनिया में सिद्ध साधक या विचारवान मनुष्य हुए हैं, सबने सोचने के साथ-साथ तत्वज्ञान को पाने के लिए कठोर साधना की, तप किया। जानने और सोचने में अंतर है। समुद्र का पानी खारा है, यह जानने के लिए उसे पीना पड़ेगा। सोचने मात्र से हाथ में मात्र विचारों की राख मिलती है।जिस प्रकार जल में लहर गठित हो सकता है परंतु बर्फ में नहीं, उसी प्रकार समाधि में आप बिना चंचलता के स्थायी रूप से परमानंद का अनुभव करते हैं। क्रोध, वासना, घृणा और अन्य नकारात्मक भावनाएं आप के अंदर उभर ही नहीं सकतीं। 7-प्रेम भी मात्र सोचने से नहीं मिलता है, प्रेम में डूबना पड़ता है। प्रेम के बारे में जो मात्र सोचते हैं, उनका प्रेम भी असफल होता है। मीरा ने कृष्ण प्रेम में गोता लगाया। मात्र सोचने वाले व्यक्ति पर कथा-प्रवचन का प्रभाव भी क्षणिक ही रहता है। क्या मात्र प्रवचन सुनकर आत्म सम्मोहित हो जाने से मोक्ष की प्राप्ति संभव है? कुछ ज्ञान एकत्र करने मात्र से समूचे अस्तित्व को जानना बड़ा मुश्किल कार्य है। जो प्रकृति के, अस्तित्व के जितना करीब है- वह मौन है। वह शब्दों और विचारों के जाल से बाहर निकलकर सत्य की तलाश में सदैव सजग व तत्पर रहता है। जो साधक शांत और मौन रहते हैं, उनका संबंध शब्दों से कम और नि:शब्द शून्य से ज्यादा होता है।

8-जब व्यक्ति प्राणायाम, प्रत्याहार को साधते हुए धारणा व ध्यान का अभ्यास पूर्ण कर लेता है तब वह समाधि के योग्य बन जाता है।व्यक्ति का मन पूर्ण स्थिर रहकर आंतरिक आत्मा में लीन हो जाता है तब समाधि घटित होती है।

9-समाधि प्राप्त व्यक्ति का व्यवहार सामान्य व्यक्ति से अलग हो जाता है, वह सभी में ईश्वर को ही देखता है और उसकी दृष्टि में ईश्वर ही सत्य होता है। समाधि में लीन होने वाले योगी को अनेक प्रकार के दिव्य ज्योति और आलौकिक शक्ति का ज्ञान प्राप्त स्वत: ही होता है।

10-मोक्ष मार्ग पर कदम बढ़ाते ही बहुत-सी चमत्कारिक शक्तियाँ प्राप्त होती हैं, जिन्हें सिद्धियाँ कहते हैं, किंतु इनके प्रलोभन में उलझने वाला अंतत: पछताता है।केवल ज्ञान कर सकते कि अट्‍ठारह सिद्धियाँ होती हैं- (1)अणिमा, (2)लघिमा, (3)गरिमा, (4)प्राप्ति, (5)प्राकाम्य, (6) महिमा, (7)ईशित्व, (8)वशित्व, (9)सर्वकामवा सादिता (10)सर्वज्ञ, (11)दूरश्रवण, (12)परकाया प्रवेश, (13)वाक्य सिद्धि, (14)कल्पवृक्ष, (15)सृष्टि शक्ति, (16)सहांरशक्ति, (17)अमरत्व और (18)सर्वाग्रगण्यता।

क्या मिलेगा समाधि से ?-

समाधि से मिलतीं है...आँखों के बगैर देखने की ताकत, कानों के बगैर सुनने की ताकत, मन और मस्तिष्क के बगैर बोध करने की ताकत, शरीर के जन्म और मरण के चक्र से बाहर निकलकर स्वयं को कहीं भी किसी भी रूप में अभिव्यक्त करने की ताकत और वास्तव में,तो इस ब्रह्मांड से अलग रहने की ताकत।और ब्रह्मांड से अलग वही रह सकता है, जो ब्रह्म स्वरूप शुद्ध चैतन्य है।

क्या है समाधि के दो प्रकार-संप्रज्ञात और असंप्रज्ञातॽ-

03 FACTS;- 1-समाधि के कई स्तर होते हैं ;योग में समाधि के दो प्रकार बताए गए हैं..

1-1-सम्प्रज्ञात

1-2-असम्प्रज्ञात

2-उन्हें ही दूसरे शब्दों में सविकल्प और निर्विकल्प समाधि के नाम से पुकारा जाता है ।जिस अवस्था में सूक्ष्म मन की सहायता से साधक को कोई दिव्य दर्शन होता है या दैवी वाणी सुनाई पडती है उस अवस्था को संप्रज्ञात समाधि कहा जाता है।इस अवस्था में सूक्ष्म मन विद्यमान रहता है, कोई अनुभव होता है और उसका आनंद भी बना रहता है ।

3-इससे आगे बढ़कर जिस अवस्था में सूक्ष्म मन भी शांत हो जाता है और आत्मानुभव के बाद केवल आत्मा ही शेष रहती है उस अवस्था को असंप्रज्ञात समाधि के नाम से विभूषित किया जाता है ।

1.सम्प्रज्ञात समाधि का अर्थ;-

वैराग्य द्वारा योगी सांसारिक वस्तुओं (भौतिक वस्तु) के विषयों में दोष निकालकर उनसे अपने आप को अलग कर लेता है और चित्त या मन से उसकी इच्छा को त्याग देता है, जिससे मन एकाग्र होता है और समाधि को धारण करता है। यह सम्प्रज्ञात समाधि कहलाता है।सम्प्रज्ञात समाधि वितर्क, विचार, आनंद और अस्मितानुगत होती है।

2.अस्प्रज्ञात समाधि का अर्थ;-

असम्प्रज्ञात में सात्विक, राजस और तामस सभी वृत्तियों का निरोध हो जाता है।इसमें व्यक्ति को कुछ भान या ज्ञान नहीं रहता। मन जिसका ध्यान कर रहा होता है उसी में उसका मन लीन रहता है। उसके अतिरिक्त किसी दूसरी ओर उसका मन नहीं जाता।वास्तव में ,यह अमनी दशा है।

संप्रज्ञात समाधि के चार प्रकार ;-

1.वितर्कानुगत समाधि;-

सूर्य, चन्द्र, ग्रह या श्रीराम, श्रीकृष्ण आदि मूर्तियों को, किसी स्थूल वस्तु या प्राकृतिक पंचभूतों की अर्चना करते-करते मन को उसी में लीन कर लेना वितर्क समाधि कहलाता है।

2.विचारानुगत समाधि;-

स्थूल पदार्थों पर मन को एकाग्र करने के बाद छोटे पदार्थ, छोटे रूप, रस, गन्ध, शब्द आदि भावनात्मक विचारों के मध्य से जो समाधि होती है, वह विचारानुगत अथवा सविचार समाधि कहलाती है।

3.आनन्दानुगत समाधि;-

आनन्दानुगत समाधि में विचार भी शून्य हो जाते हैं और केवल आनन्द का ही अनुभव रह जाता है।

4.अस्मितानुगत समाधि;-

अस्मित अथार्त अहंकार ..इसमें केवल अहंकार ही रहता है।इस प्रकार की समाधि में आनन्द भी नष्ट हो जाता है। इसमें अपनेपन की ही भावनाएं रह जाती है और सब भाव मिट जाते है। इसे अस्मित समाधि कहते हैं। पतंजलि इस समाधि को सबसे उच्च समाधि मानते हैं।

NOTE;-

1-शैव मार्ग में/पुराणों में समाधि के 6 प्रकार बताए गए हैं जिन्हें छह मुक्ति कहा गया है-

(1) साष्ट्रि, (ऐश्वर्य), (2) सालोक्य (लोक की प्राप्ति), (3) सारूप (ब्रह्मस्वरूप), (4) सामीप्य, (ब्रह्म के पास), (5) साम्य (ब्रह्म जैसी समानता) (6) लीनता या सायुज्य (ब्रह्म में लीन होकर ब्रह्म हो जाना)।

2-भक्ति सागर में समाधि के 3 प्रकार बताए गए है-

1.भक्ति समाधि,

2.योग समाधि,

3.ज्ञान समाधि

महासमाधि क्या है?कैसे पाते हैं योगी इस लक्ष्य को?-

09 FACTS;- 1-जब कोई अपनी इच्छा से पूरी तरह शरीर को छोड़ता है, तो हम उसे महासमाधि कहते हैं। इसे आम तौर पर मुक्ति या मोक्ष के रूप में जाना जाता है।यह ऐसी चीज है, जिसकी चाह हर योगी को है और यह ऐसी चीज है जिसके लिए हर मनुष्य प्रयास कर रहा है, चाहे जानबूझकर या अनजाने में।आप समभाव के एक असाधारण अनुभव पर पहुंच गए हैं, जहां शरीर के अंदर क्या है और बाहर क्या है, उसमें कोई अंतर नहीं है। खेल खत्म हो चुका है। यह ऐसी चीज है, जिसकी चाह हर योगी को है और यह ऐसी चीज है जिसके लिए हर मनुष्य प्रयास कर रहा है, चाहे जानबूझकर या अनजाने में।जो व्यक्ति समाधि को प्राप्त करता है वही महासमाधि ले सकता है। 2-वे किसी न किसी रूप में अपना विस्तार करना चाहते हैं और यह परम विस्तार है। बस इतना है कि वे ईश्वर की ओर किस्तों में जा रहे हैं, जो एक बहुत लंबी और असंभव प्रक्रिया है।अगर आप 1, 2, 3, 4 गिनती करते रहें तो आप लगातार गिनती करते रहेंगे।आप कभी अनंत तक नहीं पहुंच पाएंगे। जैसे ही व्यक्ति को इसकी निरर्थकता समझ में आती है, वह स्वाभाविक रूप से इसके लिए अपने अंदर की ओर मुड़ जाता है, जीवन की प्रक्रिया को शरीर से अलग करते हुए। 3-भारत में ‘महासमाधि’ शब्द आम तौर पर कब्र या स्मारक के लिए इस्तेमाल किया जाता है। जब‍ किसी स्थान पर किसी व्यक्ति को दफनाया जाता है और उसके ऊपर किसी तरह का स्मारक बनाया जाता है, तो उसे महासमाधि कहा जाता है। 4-‘वह जो नहीं है’ को समय या स्थान का बोध नहीं होता क्योंकि वह असीम और शाश्वत है। वह समय और स्थान की सीमाओं की बेड़ियों से मुक्त है। जब अस्तित्व की मूल प्रक्रिया से आजाद होने की यह लालसा पैदा होती है, तो मन और भावना की आशंकापूर्ण प्रकृति इसे आत्म-विनाश के रूप में देखने लगती है – यही आध्यात्मिक प्रक्रिया है। 5-एक विचारशील मन के लिए आध्यात्मिक प्रक्रिया जानते बूझते हुए आत्महत्या करने जैसा है। मगर यह आत्महत्या नहीं है, उससे कहीं आगे की चीज है। आत्महत्या अपना अंत करने की चाह का एक खराब तरीका है। खराब से मतलब है कि यह तरीका असफल होता है। यह कारगर नहीं होता।हर योगी का एक ही परम लक्ष्य होता है - अस्तित्व के साथ एकाकार हो जाना। इसे ही महासमाधि कहते हैं। 6-समाधि समय की स्थिति...जब पूर्ण रूप से सांस पर नियंत्रण हो जाता है और मन स्थिर व सन्तुलित हो जाता है, तब समाधि की स्थिति कहलाती है। प्राणवायु को 5 सैकेंड तक रोककर रखना 'धारणा' है, 60 सैकेंड तक मन को किसी विषय पर केंद्रित करना 'ध्यान' है और 12 दिनों तक प्राणों का निरंतर संयम करना ही समाधि है।

7- महासमाधि की चाह हर योगी को है और यह ऐसी चीज है जिसके लिए हर मनुष्य प्रयास कर रहा है, चाहे जानबूझकर या अनजाने में।जब कोई अपनी इच्छा से ...पूरी तरह शरीर को छोड़ता है, तो हम उसे महासमाधि कहते हैं।इसे आम तौर पर मुक्ति या मोक्ष के रूप में जाना जाता है।आप समभाव के एक असाधारण अनुभव पर पहुंच गए हैं, जहां शरीर के अंदर क्या है और बाहर क्या है, उसमें कोई अंतर नहीं है। खेल खत्म हो चुका है। वे किसी न किसी रूप में अपना विस्तार करना चाहते हैं और यह परम विस्तार है।

8-संपूर्ण समाधि का अर्थ है मोक्ष अर्थात प्राणी का जन्म और मरण के चक्र से छुटकर स्वयंभू और आत्मवान हो जाना है। समाधि चित्त की सूक्ष्म अवस्था है जिसमें चित्त ध्येय वस्तु के चिंतन में पूरी तरह लीन हो जाता है। जो व्यक्ति समाधि को प्राप्त करता है उसे स्पर्श, रस, गंध, रूप एवं शब्द इन 5 तन्मात्राओ / विषयों की इच्छा नहीं रहती तथा उसे भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी, मान-अपमान तथा सुख-दु:ख आदि किसी की अनुभूति नहीं होती।

9-सामान्य जन ईश्वर की ओर किस्तों में जा रहे हैं, जो एक बहुत लंबी और असंभव प्रक्रिया है। अगर आप 1, 2, 3, 4 गिनती करते रहें तो आप लगातार गिनती करते रहेंगे। आप कभी अनंत तक नहीं पहुंच पाएंगे। जैसे ही व्यक्ति को इसकी निरर्थकता समझ में आती है, वह स्वाभाविक रूप से इसके लिए जीवन की प्रक्रिया को शरीर से अलग करते हुए ;अपने अंदर की ओर मुड़ जाता है, ।

क्या इस लक्ष्य को पाने के लिए सांसों पर अधिकार जरुरी है ?-

07 FACTS;- 1-चिकित्सक कहते हैं, “सांस लेना अपने आप होने वाली क्रिया है। बस सामान्य तरीके से सांस लीजिए।” योग से जुड़े लोग कहते हैं, “गहरी सांस लीजिए, उसका अच्छा असर होता है।आप कैसे सांस लेते हैं, यह आपके अस्तित्व के कई पहलुओं को तय करता है।सांस सिर्फ ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड की अदला-बदली नहीं है। आप जब अलग-अलग तरह के विचारों और भावनाओं से गुजरते हैं, तो आपकी सांस की बनावट अलग-अलग तरह की होती है?

2-जब आप क्रोधित होते हैं, तो आप एक तरीके से सांस लेते हैं। अगर आप शांत होते हैं, तो दूसरे तरीके से सांस लेते हैं। अगर आप बहुत खुश होते हैं, तो दूसरे तरीके से सांस लेते हैं। अगर आप दुखी होते हैं, तो आप दूसरे तरीके से सांस लेते हैं। आप जिस तरीके से भी सांस लेते हैं, उसी तरीके से सोचते हैं। आप जिस तरीके से सोचते हैं, उसी तरीके से सांस लेते हैं। 3-इस सांस को कई रूपों में शरीर और मन के साथ दूसरी चीजें करने के लिए एक माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। सांस सिर्फ एक माध्यम है; वह सिर्फ एक आरंभ है। जो घटता है, वह सांस से संबंधित नहीं है। प्राणायाम वह विज्ञान है, जहां सजग होकर एक खास तरीके से सांस लेने पर, आपके सोचने, महसूस करने, समझने और जीवन का अनुभव करने का तरीका बदला जा सकता है। 4-आप सांस पर ध्यान देते हैं ..लेकिन असल में ऐसा नहीं होता। आप सिर्फ हवा की आवाजाही से उत्पन्न संवेदनों पर ध्यान दे पाते हैं।यह उसी तरह है कि अगर कोई आपके हाथ का स्पर्श करे, तो आपको लगता है कि आप उस व्यक्ति के स्पर्श को जानते हैं, लेकिन असल में आप सिर्फ अपने शरीर के अंदर उत्पन्न संवेदनों को जानते हैं, आप नहीं जानते कि दूसरा व्यक्ति कैसा महसूस करता है। सांस ईश्वर के हाथ की तरह है। आप उसे महसूस नहीं करते।

5-आप जिस सांस को महसूस नहीं करते, उसे कूरमा नाडी कहा जाता है।कूरमा नाडी एक ऐसी डोर मानी जाती है जो आपको इस शरीर से बांधती है। एक अटूट डोर जो आगे बढ़ती रहती है। अगर आपकी सांस को बाहर निकाल दिया जाये , तो आप और आपका शरीर अलग-अलग हो जाएंगे क्योंकि जीव और शरीर कूरमा नाडी से बंधे हैं। यह एक बड़ा छल है। ये दो हैं, लेकिन एक लगते हैं। ये दो लोग हैं.. शरीर और जीव, दो बिल्कुल विपरीत लोग लेकिन वे दिखाते हैं कि वे एक हैं। 6-अगर आप सांस के रास्ते अपने अंदर गहराई तक जाते हैं, सांस के सबसे गहरे केंद्र तक, तो वह आपको उस बिंदु तक ले जाएगा जहां आप असल में शरीर से बंधे हुए हैं। एक बार आप जान जाएं कि आप कहां पर बंधे हुए हैं और कैसे बंधे हुए हैं, तो आप अपनी इच्छा से उसे खोल सकते हैं। आप जागरूकता के साथ शरीर को उतनी ही आसानी से छोड़ सकते हैं, जैसे अपने कपड़ों को। जब आप जानते हैं कि आपके कपड़े कहां बंधे हुए हैं, तो उन्हें निकालना आसान होता है। जब आप नहीं जानते कि वह कहां बंधा हुआ है, तो आप कहीं से उन्हें खींचे, वह नहीं निकलता। यही बात शरीर पर लागू होती है।

7-अगर आप नहीं जानते कि आपके कपड़े कैसे बंधे हुए हैं, और अगर आप उन्हें उतारना चाहें तो आपको उन्हें फाड़ना पड़ेगा। इसी तरह, अगर आप नहीं जानते कि आपका शरीर कहां पर आपसे बंधा है, तो अगर आप उसे छोड़ना चाहें तो आपको उसे किसी न किसी रूप में नष्ट करना या तोड़ना होगा। लेकिन अगर आप जानते हैं कि वह कहां पर बंधा हुआ है, तो आप बहुत स्पष्ट रूप से उसे एक दूरी पर पकड़ सकते हैं। आप जब भी उसे छोड़ना चाहें, तो जागरूकता के साथ उसे छोड़ सकते हैं। जीवन बहुत भिन्न हो जाता है।

क्या राज छिपा है हमारी श्वासों में?

05 FACTS;-

1-मनुष्य के दोनों नासिका छिद्रों से एकसाथ श्वास-प्रश्वास कभी नहीं चलती है। कभी वह बाएं तो कभी दाएं नासिका छिद्र से श्वास लेता और छोड़ता है। बाएं नासिका छिद्र में इडा यानी चंद्र नाड़ी और दाएं नासिका छिद्र में पिंगला यानी सूर्य नाड़ी स्थित है। इनके अलावा एक सुषुम्ना नाड़ी भी होती है जिससे श्वास प्राणायाम और ध्यान विधियों से ही प्रवाहित होती है।प्रत्येक 1 घंटे के बाद यह 'श्वास'.... नासिका छिद्रों में परिवर्तित होते रहती है।

2-शिवस्वरोदय ज्ञान के अनुसार चंद्र नाड़ी से श्वास-प्रश्वास प्रवाहित होने पर वह मस्तिष्क को शीतलता प्रदान करती है। चंद्र नाड़ी से ऋणात्मक ऊर्जा प्रवाहित होती है। जब सूर्य नाड़ी से श्वास-प्रश्वास प्रवाहित होती है तो शरीर को ऊष्मा प्राप्त होती है यानी गर्मी पैदा होती है। सूर्य नाड़ी से धनात्मक ऊर्जा प्रवाहित होती है।प्राय: मनुष्य उतनी गहरी श्वास नहीं लेता और छोड़ता है जितनी एक स्वस्थ व्यक्ति के लिए जरूरी होती है। प्राणायाम मनुष्य को वह तरीका बताता है जिससे मनुष्य ज्यादा गहरी और लंबी श्वास ले और छोड़ सकता है।

3-सुषुम्ना को कैसे जगाएं ?....''कबहु इडा स्वर चलत है कभी पिंगला माही।सुष्मण इनके बीच बहत है गुर बिन जाने नाही।।'' वास्तव में,व्यक्ति उचित रीति से श्वास लेना भूल गया है। हम जिस तरीके और वातावरण में श्वास लेते हैं उसे हमारी इड़ा और पिंगला नाड़ी ही पूर्ण

रूप से सक्रिय नहीं हो पाती तो सुषुम्ना कैसे होगी?दोनों नाड़ियों के सक्रिय रहने से किसी भी प्रकार का रोग और शोक नहीं सताता और यदि हम प्राणायाम के माध्यम से सुषुम्ना को सक्रिय कर लेते हैं, तो जहां हम श्वास-प्रश्वास की उचित विधि से न केवल स्वस्थ, सुंदर और दीर्घजीवी बनते हैं, वहीं हम सिद्ध पुरुष बनाकर ईश्वरानुभूति तक कर सकते हैं।

4-अनुलोम-विलोम आदि प्राणायाम की विधि से दोनों नासिका छिद्रों से बारी-बारी से वायु को भरा और छोड़ा जाता है। अभ्यास करते-करते एक समय ऐसा आ जाता है, जब चंद्र और सूर्य नाड़ी से समान रूप से श्वास-प्रश्वास प्रवाहित होने लगती है। उस अल्पकाल में सुषुम्ना नाड़ी से श्वास प्रवाहित होने की अवस्था को ही 'योग' कहा जाता है।

5-प्राणायाम का मतलब है- प्राणों का विस्तार। दीर्घ श्वास-प्रश्वास से प्राणों का विस्तार होता है। एक स्वस्थ मनुष्य को 1 मिनट में 15 बार सांस लेनी चाहिए। इस तरह 1 घंटे में उसके श्वासों की संख्या 900 और 24 घंटे में 21,600 होनी चाहिए।स्वर विज्ञान के अनुसार

चंद्र और सूर्य नाड़ी से श्वास-प्रश्वास के जरिए कई तरह के रोगों को ठीक किया जा सकता है। उदाहरण के लिए यदि चंद्र नाड़ी से श्वास-प्रश्वास को प्रवाहित किया जाए तो रक्तचाप, हाई ब्लड प्रेशर सामान्य हो जाता है।

क्या है सांसों का महत्व ?-

05 FACTS;-

1-योग के कई अभ्यास सांसों पर आधारित होते हैं। हम सांसों को 'हवा के आवागमन' की

तरह जानते हैं। व्यक्ति के आध्यात्मिक विकास में सांस की भूमिका होती है । योग की

भाषा में सांस को कूर्म नाड़ी कहा जाता है। कूर्म नाड़ी आपको एक जीव के रूप में शरीर के इस भौतिक रूप से बांधती है। शरीर सिर्फ पांच तत्वों का एक ढेर है।यह सिर्फ धरती का एक टुकड़ा है, जिसे हमने जमा किया है मगर अभी यह आपके रूप में काम कर रहा है क्योंकि यह बहुत अच्छी तरह बंधा हुआ है। कूर्म नाड़ी ही वह धागा है जो आपको शरीर से बांधता है।

2-इसलिए किसी आध्यात्मिक प्रक्रिया में सांस की अहमियत यही है कि यह आपको उस बिंदु या उस आयाम तक ले कर जाती है, जहां भौतिक और अभौतिक, स्थूल और सूक्ष्म एक साथ मिलते हैं, जहां स्थूल और सूक्ष्म आपस में बंधे हुए हैं।वास्तव में, अभी आप सांस को नहीं जानते, आप केवल हवा के आने-जाने से पैदा हुई हलचल को ही जानते हैं। यह सांस नहीं है।

3-अंग्रेजी भाषा में यह ब्रेथ या सांस है, मगर यह कूर्म नहीं है। कूर्म नाड़ी उस हवा से कहीं अधिक है, जिसमें आप सांस ले रहे हैं मगर उस हवा के बिना वह घटित नहीं होगी। हवा का रास्ता महत्वपूर्ण है मगर यह उसी तक सीमित नहीं है। यह अस्तित्व की जीवनी सांस है, जिसे आप ले रहे हैं और छोड़ रहे हैं। अगर इसे बाहर निकाल लिया जाए, तो आप और आपका शरीर साथ नहीं रह पाएंगे। वे अलग-अलग हो जाएंगे

4-इसलिए अपनी कूर्म नाड़ी के साथ यात्रा करना उस जगह को जानने की एक कोशिश है, जहां भौतिक और अभौतिक मिलते हैं – उस संधि क्षेत्र में होना जहां आप भौतिक में होते हैं मगर भौतिक के परे एक आयाम को छूते हैं – उस संधि क्षेत्र तक पहुंचने की कोशिश की जाती है। शांभवी महामुद्रा इसीलिए होती है। शांभवी का मतलब उस संधि क्षेत्र में होना है।

भौतिक से अभौतिक तक का संधि क्षेत्र होता है। अगर आप भौतिक को छोड़कर अभौतिक की ओर जाना चाहते हैं तो यह बहुत आसान है।अपने सिर में एक गोली मारने से ऐसा हो सकता है, मगर यह एक इंसान की आकांक्षा नहीं होती। इंसान की आकांक्षा होती है कि वे भौतिक में जमे रहकर जो परे है, उसका स्वाद ले सकें।

5-इस तरह से सांस महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि सांस वहां तक पहुंचने के सबसे आसान उपकरणों में से एक है। ऐसा करने के दूसरे तरीके भी हैं, मगर दूसरे तरीकों के लिए बहुत ज्यादा ध्यान रखने, निर्देश, मार्गदर्शन और सहायता की जरूरत पड़ती है। सांस की प्रक्रिया से यह काफी आसानी से घटित हो जाती है।

क्या कूर्म-नाड़ी प्राण की, श्‍वास की वाहिका है?-

07 FACTS;-

1-सांस आपके जीवन का आधार है,सांस ही आपको आपके शरीर से जोड़ती है।परन्तु सांस आसानी से अनुभव में नहीं आती। अधिकतर लोगों ने कभी अपनी सांस का अनुभव नहीं किया।जब आप सांस अंदर लेते हैं, तो जरूरी नहीं है कि आप सिर्फ सांस अंदर ले रहे हों, सांस छोड़ने की प्रक्रिया भी आंशिक तौर पर घटित हो सकती है। इसी तरह, जब आप सांस छोड़ते हैं, तो जरूरी नहीं है कि आप सिर्फ सांस छोड़ रहे हों, आंशिक तौर पर आप सांस ले भी रहे हैं। लेकिन जब तक आप सांस की दिशा को नहीं जानते, तब तक आपको इसका पता नहीं चलेगा।

2- आपकी संवेदना आपकी बाहरी परत है। इन संवेदनाओं को जानना सबसे बुनियादी चीज है। चाहे आप बैठें हों या खड़े, आप जिस चीज को भी छुएं, आपकी शरीर में संवेदना होगी। सांस अधिक गहन और गूढ़ आयाम है, जो आसानी से आपके अनुभव में नहीं आएगी जब हम कूर्म नाड़ी के अर्थ में सांस की बात करते हैं, तो हम ऑक्सीजन-कार्बन डाइऑक्साइड की आवाजाही की बात नहीं करते। वह तो श्वास प्रक्रिया का एक परिणाम है।चाहे कोई

व्यक्ति मेडिकली मर गया हो, हवा की गति, हृदयगति और मस्तिष्क की क्रिया रुक गई हो, फिर भी वह कुछ समय तक एक तरह से सांस लेता रहता है - उसकी कूर्म नाड़ी सक्रिय रहती है। 3- कूर्म नाड़ी की प्रक्रिया अब भी चलती रहती है, बस वह हवा खींचने और कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ने में सक्षम नहीं होता। अथार्त हवा का आदान-प्रदान बंद हो जाने के बावजूद कूर्म नाड़ी सक्रिय रहती है।हम सांस के प्रति चेतन होते हैं,तो शरीर के साथ अपने संबंध के प्रति जागरूक हो जाते हैं।अगर आप अपनी सांस को निकाल लें तो जाहिर है कि आप और आपका शरीर अलग-अलग हो जाएंगे। सांस के साथ चलकर आप उस आयाम तक पहुंच सकते हैं। अगर आप अपने शरीर को खुद से थोड़ी दूरी पर रखना सीख लें, तो आप जान जाएंगे कि आप शरीर नहीं हैं।

4-अगर आपने ढीले कपड़े पहने हुए हैं, तो आप जानते हैं कि ये कपड़े आप नहीं हैं। अगर आपने बहुत चुस्त और शरीर से चिपके हुए कपड़े पहने हुए हैं तो कुछ समय बाद आप भूल जाएंगे कि वे आप हैं या नहीं। आप अपनी त्वचा को ‘मैं’ के रूप में अनुभव करते हैं। कुछ समय बाद ही आपकी त्वचा का कुछ हिस्सा गायब हो जाएगा मगर फिर भी आप ‘आप’ ही रहेंगे। चाहे आप शरीर की अधिक गहरी परतों में चले जाएं, फिर भी आप ‘आप’ ही रहेंगे। ‘मैं शरीर नहीं हूं, मैं मन नहीं हूं’ का इस्तेमाल कीजिए।‘मैं शरीर नहीं हूं, मैं मन नहीं हूं’ को बहुत सूक्ष्म तरीके से घटित होना चाहिए ताकि सांस आपकी जागरूकता में आ सके।

5-यह ''महावाक्य''आपको कूर्म नाड़ी या सांस के प्रति जागरूकता लाने के साधन के रूप में दिया गया है।उस विचार के साथ आप अपनी सांस में एक सुगंध डाल रहे हैं ताकि आपका ध्यान उस पर जा सके। यह इस तरह है, मानो आप हवा की दिशा देखने के लिए अगरबत्ती जलाते हैं। अगर हवा हल्की चल रही हो, तो आप वैसे उसकी दिशा जान नहीं पाएंगे।पतंजलि के अनुसार''अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-कूर्म-नाड़ी पर संयम संपन्‍न करने से योगी पूर्ण रूप से स्थिर हो जाता है''।

6- कूर्म-नाड़ी प्राण की, श्‍वास की वाहिका है। अगर हम चुपचाप, शांतिपूर्वक अपने श्वसन पर ध्‍यान दें, किसी भी ढंग से श्‍वास की लय न बिगड़े, न तो स्‍वास तेज हो, और न ही धीमी हो, बस उसे स्‍वाभाविक और शिथिल रूप से चलने दें। तब अगर हम केवल श्‍वास को देखते रहे, तो हम धीरे-धीरे स्थिर होने लगेंगे। फिर भीतर किसी तरह की कोई हलन-चलन नहीं होगी।

क्‍योंकि सभी हलन-चलन, गति श्‍वास के द्वारा ही होती है। श्‍वास से ही पूरी की पूरी गति होती है। श्‍वास ही सारी हलन-चलन और गतियों का संचरण करती है। जब श्‍वास रूक जाती है। तो व्‍यक्‍ति मर जाता है। फिर वह चल फिर नहीं सकता। हिल-डुल नहीं सकता।

7-अगर व्‍यक्‍ति निरंतर श्‍वास पर ही संयम करता है, कूर्म-नाड़ी पर ही केंद्रित रहे, तो धीरे-धीरे एक ऐसी अवस्‍था आ जाएगी जहां पर स्‍वास करीब-करीब रूक ही जाती है।

योगी इस ध्‍यान की प्रक्रिया को दर्पण के सामने करते है, क्‍योंकि योगी की श्‍वास धीरे-धीरे इतनी शांत हो जाती है। कि उसे श्‍वास चल रही है या नहीं इसकी प्रतीति भी नहीं रह जाती है। अगर दर्पण पर श्‍वास की कुछ धुंध आ जाए, तो ही उन्‍हें मालूम पड़ता है कि उनकी श्‍वास चल रही है।

क्या है कूर्म-नाड़ी का गुप्त रहस्य ?-

05 FACTS;-

1-ऋषियों ने कुंडलिनी का जो स्वरूप बताया है, उसके अनुसार कुंडलिनी एक सर्पिणी की तरह है, जो रीढ़ की हड्डी के नीचे स्थित चतुष्फलक (टेट्राहेड्रन) आकार के एक स्फटिक के समान पत्थर, जिसे 'कूर्म' कहा गया है, और जिसके ऊपर हमारा मेरुदंड टिका होता है, से लिपटी हुई है।कुंडलिनी कूर्म के ऊपर साढ़े तीन बार लिपटी हुई है, और इसका मुख नीचे की ओर है..

2-कुंडलिनी के भौतिक स्वरूप के बारे में जो बताया गया है, वह सब किसी टोमोग्राफी या एम आर आई स्कैन में नहीं दिखता,. इस पर ऋषि-मुनियों का कथन है- यह सब इतना सूक्ष्म है कि भौतिक नेत्रों तथा सहायक उपकरणों से उनको देखना संभव नहीं है। मेरुदंड के भीतर नाड़ियों का एक तंत्र चलता है, जिनसे शरीर के दूर-दराज के अंग भी, जैसे हाथों और पैरों की उंगलियाँ तक सम्बद्ध हैं। कुछ नाड़ियाँ तो स्कैन में दिखती हैं। मेरुदंड के भीतर यह नाड़ियाँ कई जगह आपस में उलझी हुई दिखती हैं, जिनसे कुछ गाँठें बनी हुई हैं।इन गांठों के बारे में कहा गया है कि यह अन्नमय कोश की बन्धन-ग्रंथियाँ हैं।

3-अन्नमय कोश भौतिक शरीर से इन्हीं ग्रंथियों द्वारा बँधा रहता है। मृत्यु के साथ यह गाँठें खुल जाती हैं, और अन्नमय कोश इस शरीर से अलग हो जाता है। इनके अलावा कुछ और सूक्ष्म नाड़ियाँ हैं, जो किसी स्कैन में नहीं दिखतीं। इनके नाम हैं- इड़ा (चंद्रनाड़ी )और पिंगला(सूर्यनाड़ी)। यह नाड़ियाँ परस्पर लिपटी हुई मस्तिष्क से कूर्म तक चलती हैं। कूर्म पर आकर यह दोनो नाड़ियाँ मिल जाती हैं, और इस मिलन से एक तीसरी नाड़ी- सुषुम्ना की सृष्टि होती है। सुषुम्ना की एक धारा जो नीचे की तरफ चलती है, वह तो थोड़ी दूर चलने के बाद बंद हो जाती है, पर उसकी मुख्य धारा कूर्म से ऊपर वापस मस्तिष्क की ओर चल पड़ती है।

4-मस्तिष्क के उच्चतम शिखर पर जाकर सुषुम्ना नाड़ी हज़ारों दिशाओं में फूट पड़ी है, और मस्तिष्क के चारो ओर बिखर गयी है। सुषुम्ना के अंदर भी तीन संकेंद्रित (concentric) नाड़ियाँ हैं। इनके नाम हैं- वज्रा, चित्रणी और ब्रह्मनाड़ी।वज्रा और चित्रणी एक प्रकार से ब्रह्मनाड़ी की सुरक्षा के लिये हैं। सुषुम्ना की जो धारा नीचे की ओर चली है, वह कूर्म को साढ़े तीन बार लपेट कर नीचे की तरफ मुंह किये हुए बंद पड़ी है।इसी संरचना को ऋषियों ने कुंडलिनी कहा है।

5-एक बात जो ध्यान देने की है, वह यह है कि स्कैन इत्यादि में दिखने वाली

नाड़ियों में जिन्हें nerves कहा जाता है, रक्त का प्रवाह होता है, पर ईड़ा, पिंगला और सुषुम्ना में केवल ऊर्जा (conciousness) का प्रवाह होता है, अतः यह nerves नहीं हैं ।अब जिसे कुंडलिनी जागरण कहा गया है, उसका प्रथम चरण है- कुंडलिनी को कूर्म से अलग करना- वह गाँठ, जो सुषुम्ना नाड़ी ने कूर्म पर लगा रखी है, उसे खोलना; उसके बिना ऊर्जा का प्रवाह सुषुम्ना में चढ़ेगा ही नहीं कुंडलिनी के स्वरूप का जो वर्णन ऋषियों ने किया है, वह संभवतः कुंडलिनी तक पहुंचने और उसे जागृत करने की दुरूहता को ध्यान में रख कर ही किया है।

क्या योग के द्वारा सुषुम्ना को जाना जा सकता है ?-

09 FACTS;-

1-योग का अर्थ है, एक होने की विधि ;जो कुछ अलग-अलग जा पडा है,उसे फिर से जोड़ना। योग का अर्थ है जोड़..एकता। लाभ की प्राप्‍त तभी होती है ..जब हम दो को एक कर

सकें।और योग का पूरा प्रयास ही इसके लिए है कि शाश्‍वतता को , वस्तुओ के पीछे छिपी एकात्‍मकता को कैसे पा सकें। सभी परिवर्तनों, सभी गतियों के पीछे छिपी स्थिरता को कैसे प्राप्‍त कर सकें अमृत को कैसे उपल्‍बध हो सकें, मृत्‍यु का अतिक्रमण कैसे कर सकें।

2- हमारे मन का गलत आदतों के साथ तालमेल बैठ गया है। इसी कारण हम हमेशा हर चीज को खंड-खंड में तोड़ देते है। आदमी की बुद्धि इसी के लिए प्रशिक्षित हुई है कि पहले हर चीज को विभक्‍त कर दो और फिर चीजों का विश्‍लेषण करो और एक चीज को बहुत रूपों में विभाजित कर दो। मनुष्‍य आज तक बुद्धि से ही जीता आया है, और वह भूल ही गया है कि चीजों को कैसे जोड़ना है, कैसे एक करना है।

3-कई बार योगी ध्‍यान में इतनी शांत और स्थिर हो जाते है कि उन्‍हें यह मालूम हीं नहीं पड़ता कि वह भी जिंदा है या नहीं है। ध्‍यान की गहराई में ..तुम्‍हें भी यह अनुभव कभी न कभी घटेगा।जब होश अपनी परिपूर्णता पर होता है, उस समय श्‍वास लगभग ठहर जाती है..रूक सी जाती है। लेकिन उस समय परेशान , भयभीत मत होना, यह मृत्‍यु नहीं है। वह तो केवल शांत अवस्‍था है। योग का संपूर्ण प्रयास ही इस बात के लिए है कि व्‍यक्‍ति को

ऐसी गहन शांत अवस्‍था तक ले आए कि फिर उस शांति को कोई भी भंग न कर सके।'' चेतना ''ऐसी शांत अवस्‍था को उपलब्‍ध हो जाए कि फिर उसकी शांति भंग न हो सके।

4-हमारी पुरानी आदतें चीजों को विश्‍लेषित करने की, चीर फाड़ करने की है। हमारी आदतें यही है कि उसे खोजना है जो निरंतर परिवर्तनशील है। मन तो हमेशा नए में और परिवर्तन में ही रोमांच का अनुभव करता है। अगर कुछ भी बदले नहीं, सब कुछ वैसा का वैसा ही रहे, तो मन उदास हो जाता है, हमें मन की इन आदतों के प्रति सचेत होना होगा। अन्यथा आदतें तो किसी ने किसी रूप में बनी ही रहेंगी और मन बहुत चालाक है।

5-ध्यान रहे मन कि आदत विश्‍लेषण करने की है।और योग है संश्‍लेषण, तो जब कभी मन विश्लेषण करे, उसे उठाकर एक तरफ रख देना। विश्‍लेषण के द्वारा तुम अंतिम छोर तक, छोटे से छोटे, अणु परिमाणु तक पहुंच जाओगे। लेकिन संश्‍लेषण के द्वारा तुम विराट और समग्र तक पहुंच जाओगे। विज्ञान खोज करते-करते अणु तक जा पहुंचा। और योग खोजते-खोजते, आत्‍मा तक पहुंच गया। अणु का अर्थ है: लघु और छोटा, और आत्‍मा का अर्थ है, विराट। योग ने संपूर्ण को जाना है, समग्र हो अनुभव किया है। और विज्ञान ने छोटे और उससे भी छोटे तत्‍व को जाना है। और इसी तरह वह लघु की और चलता जा रहा है।

6-पहले तो विज्ञान ने पदार्थ को अणु में विभाजित किया। फिर विज्ञान ने पाया कि अणु को विभाजित करना कठिन है; फिर जब वे अणु का भी विभाजन करने में सफल हो गए, तो उन्‍होंने उसे परमाणु कहा। अणु का अर्थ ही होता है वह तत्‍व जो अविभाज्‍य जिसे अब और अधिक विभाजित न किया जा सके। लेकिन विज्ञान ने उसे भी विभाजित कर दिया। फिर विज्ञान इलेक्ट्रॉन -न्यूट्रॉन तक जा पहुंचा, और उसने सोचा कि अब और विभाजन संभव नहीं है। क्‍योंकि पदार्थ लगभग अदृश्‍य ही हो गया था। जब इलेक्ट्रॉन दिखाई ही नहीं देता, तो उसका विभाजन कैसे संभव हो सकता है।लेकिन अब विज्ञान उसे भी विभाजित

करने में सफल हो गया है। बिना इलेक्ट्रॉन को देखे, वैज्ञानिकों ने उसको भी विभक्‍त कर दिया है।वैज्ञानिक इसी तरह से चीजों को विभक्‍त करते चले जाएंगे......अब सभी कुछ

हाथ के बाहर हो गया है।

7-योग ठीक इसके विपरीत प्रक्रिया है: योग संश्‍लेषण की प्रक्रिया है। योग जुड़ते जाने की और अधिकाधिक जुड़ते जाने की प्रक्रिया है, जिससे अंत में व्‍यक्‍ति अपने पूर्ण स्‍वरूप तक जा पहुंचे, स्‍वयं के साथ एक हो जाए। अस्‍तित्‍व एक है।मन को भी सूर्य-मन, और चंद्र-मन

में विभक्‍त किया जा सकता है। सूर्य मन वैज्ञानिक होता है, चंद्र मन काव्यात्मक होता है। सूर्य-मन विश्‍लेषणात्‍मक होता है, चंद्र-मन संश्‍लेषणात्‍मक होता है। सूर्य-मन गणितीय, तार्किक, अरस्‍तुगत होता है। चंद्र-मन बिलकुल अलग ही ढंग का होता है—असंगत होता है। अतार्किक होता है। सूर्य-मन और चंद्र-मन दोनों इतने अलग-अलग ढंग से कार्य करते है कि उनके बीच कही कोई संवाद नहीं हो पाता।

8-इसको जानने का प्रयत्‍न करो,कि तुम कौन से केंद्र पर हो।अगर तुम सूर्य-मन हो—तब गणित और तर्क तुम्‍हारे जीवन की शैली है। अगर तुम चंद्र-मन हो तो—तो काव्‍य, कल्‍पनाशीलता तुम्‍हारी जीवन-शैली होगी। तो तुम क्‍या हो और तुम्‍हारी क्‍या स्‍थिति है, पहले इसे जानना जरूरी है।और ध्‍यान देना है कि,दोनों मन आधे-आधे होते है, तुम्‍हें दोनों

के ही पार जाना है। अगर तुम सूर्य मन हो तो पहले चंद्र मन तक आना होगा। फिर उसके भी आगे जाना है।

9-अगर तुम गृहस्‍थ हो, तो पहले घुमक्कड़ हो जाओ..यही है, संन्‍यास।अगर तुम बहुत ज्‍यादा तार्किक हो, तो श्रद्धा करो, समर्पण करो, त्‍याग करो, सर्व-स्‍वीकार भाव से झुको। अगर तुम बहुत ज्‍यादा तार्किक हो, तो तुम प्रेम में डूब जाओ।अगर तुम श्रद्धा में जी सकते हो, तो तुम्‍हारी ऊर्जा सूर्य से चंद्र की और सरक जाएगी।और जब तुम्‍हारी ऊर्जा सूर्य से चंद्र की ओर सरक जाती है। तो एक नयी ही संभावना का द्वार खुलता है। तुम फिर चंद्र के भी पार जा सकते हो, क्योकि तब सुषुम्ना जाग जाती है। तुम साक्षी हो जाते हो, और वही है उद्देश्‍य, वही है मंजिल।

.....SHIVOHAM...