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उत्तर भारतीय संत बाबा कीनाराम का जीवन परिचय...


बाबा किनाराम का संक्षिप्त जीवन परिचय;-

06 FACTS;- 1-अघोरी सम्प्रदाय के बाबा कीनाराम वि.सं. 1658 के भाद्रमास में कृष्ण पक्ष की अघोर चतुर्दशी को सूर्योदय काल में ग्राम रामगढ़, चंदौली (वाराणसी) में जन्मे थे। उनके पिता रघुवंशी क्षत्रिय श्री अंकवर सिंह थे। महात्मा दत्तात्रेय से बाबा कीनाराम ने दक्षिण भारत में दीक्षा ली थी। उन्होंने 16 वर्ष की आयु में ही गृह त्याग दिया था। 421 वर्ष पूर्व उनके द्वारा प्रज्ज्वलित की गई धूनी आज भी काशी के क्रीं कुण्ड स्थल पर जल रही है। बाबा के बैठने का तख्त भी यहां यथावत है। यहीं बाबा का समाधि स्थल भी है। लोलार्क छठ पर प्रतिवर्ष यहां विशाल मेला लगता है। क्रीं कुण्ड के रोग-निवारक कई चमत्कार विख्यात हैं। कहा जाता है कि बाबा ने सं. 1856 वि. में 178 वर्ष की आयु में समाधि ली थी।

2-औघड़ (संस्कृत रूप अघोर) शक्ति का साधक होता है। चंडी, तारा, काली यह सब शक्ति के ही रूप हैं, नाम हैं। यजुर्वेद के रुद्राध्याय में रुद्र की कल्याण्कारी मूर्ति को शिवा की संज्ञा दी गई है, शिवा को ही अघोरा कहा गया है। शिव और शक्ति संबंधी तंत्र ग्रंथ यह प्रतिपादित करते हैं कि वस्तुत: यह दोनों भिन्न नहीं, एक अभिन्न तत्व हैं। रुद्र अघोरा शक्ति से संयुक्त होने के कारण ही शिव हैं।

3-बाबा किनाराम ने इसी अघोरा शक्ति की साधना की थी। ऐसी साधना के अनिवार्य परिणामस्वरूप चमत्कारिक दिव्य सिद्धियाँ अनायास प्राप्त हो जाती हैं, ऐसे साधक के लिए असंभव कुछ नहीं रह जाता। वह परमहंस पद प्राप्त होता है। कोई भी ऐसा सिद्ध प्रदर्शन के लिए चमत्कार नहीं दिखाता, उसका ध्येय लोक कल्याण होना चाहिए। औघड़ साधक की भेद बुद्धि का नाश हो जाता है। वह प्रचलित सांसारिक मान्यताओं से बँधकर नहीं रहता। सब कुछ का अवधूनन कर, उपेक्षा कर, ऊपर उठ जाना ही अवधूत पद प्राप्त करना है. 4-कीनाराम अपने तीन भाईयों में सबसे बड़े थे. बचपन से ही आध्यात्मिक संस्कार अत्यंत प्रबल थे। बचपन से ही आप राम के प्रति अनुरक्त थे. अवकाश के समय आप गाँव के अन्य साथियों समेत राम धुन गाया करते थे.उन दिनों बाल विवाह की प्रथा थी.इस प्रथा के अनुसार आपका 12 वर्ष की आयु में विवाह कर दिया गया. विवाह के तीन वर्ष के बाद गौना लाने की तिथी निश्चित की गयी. यात्रा के एक दिन पूर्व उन्होँने अपनी माँ से दूध भात खाने का आग्रह किया. 5-माँ बिगड़ गयी-“ कल तुम्हारा गौना है और आज दूध भात मांग रहे हो? दही भात खा लो“ कीनाराम ने हाथ पकड़ लिया. लाचारी में माँ को दूध भात देना पड़ा. दुसरे दिन जब यात्रा की तय्यारी हो चुकी तो ससुराल पक्ष से समाचार आया कि वधु की मृत्यु हो गयी है. माँ ने रोते हुवे कहा-“ कोई न कोई अशुभ होगा, सोच लिया था, तुमने दूध भात क्यूँ खाया. ऐसा जिद्दी लड़का है कि क्या कहूँ?“ 6-कीनाराम ने कहा-“ माँ, उसके मरने के बाद ही मैंने दूध भात खाया है, विश्वास न हो तो पिताजी से पूछ लो. वह कल शाम को ही मर गयी थी और मैंने दूध भात कल रात को खाया.“ माँ से ये समाचार पुरे गाँव में फ़ैल गया. लोग इस बात पे आश्चर्य करने लगे आखिर कीनाराम को इस बात का पता यहाँ बैठे कैसे चल गया?इस घटना के बाद वापिस विवाह की बात चलने लगे. कीनाराम ने इनकार किया, दबाव बढ़ने पर चुपचाप घर से निकल पड़े. संत शिवराम से दीक्षा ;-

04 FACTS;- 1-कीनाराम घूमते घूमते गाजीपुर आ गए. उन दिनों गाजीपुर में रामानंदी सम्प्रदाय के अनुयायी संत शिवराम रहते थे. नागरिकों में उनकी प्रसिद्धी थी. कीनाराम को पसंद आया. वे वहीँ रुक गए. सेवा करना और खाली समय में रामनाम जपना. वे चाहते थे कि शिवराम उन्हें दीक्षा दें. और शिवराम सोचते कि अगर कीनाराम दीक्षित हो गया तो मन्त्र लेकर चम्पत हो जाएगा. ऐसा सेवा करने वाला चेला कहाँ से मिलेगा. ये सोच कर टालते रहे. शिव राम जी हमेशा टालते रहे । 2-कई महीनों बाद शिवराम बोले -“चलो कीनाराम तुम्हें आज दीक्षा देता हूँ. “ आसन कमंडल देकर बोले, -“तुम गंगा तट पर चलो मैं शौच आदि से निवृत्त होकर आता हूँ.“ कीनाराम जी ख़ुशी ख़ुशी गंगा तट पर चले गए. नहाकर आसन पर बैठ गए. आचमनी लेकर ध्यान करते हुए अनुभव हुआ की गंगा की लहरें उनके चरण स्पर्श कर रही हैं, तो उठ कर कुछ और ऊंचाई पर बैठ गए. आँख बंद की कि फिर लगा की गंगा की लहरें उनके पैरों को छू रही हैं. फिर और ऊपर बैठ गए. तब भी गंगा की लहरें उनके पैरों तक पहुँच गयी. पीछे शिवराम ये सब देख रहे थे. उनको अपार आश्चर्य हुआ. कि कीनाराम के रूप में ये लड़का कौन आया है.इसके बाद शिवराम कीनाराम को लेकर स्थानीय मंदिर में गए और दीक्षा दी.

3-इसके बाद कीनाराम सेवा और केवल साधन भजन में लग गए.इस बीच एक घटना हो गयी. शिवराम की पत्नी का देहांत हो गया. पत्नी चले जाने के बाद शिवराम अस्थिर हो गए. पुनर्विवाह की सोचने लगे. मन में दुविधा होने पर कीनाराम को पूछा.कीनाराम ने तुरंत कहा-“महाराज इस उम्र में आपको विवाह शोभा नहीं देता. साधन भजन में समय लगायें तो बेहतर है.“शिवराम को ऐसे उत्तर की अपेक्षा नहीं थी. नाराज होकर बोले- “ पत्नी के बिना मेरा काम नहीं चलेगा. ये सब बखेड़ा मुझसे सम्हाला नहीं जाता. “ 4-गुरु शिष्य में विवाद बढ़ता ही गया. अंत में कीनाराम ने कहा-“अगर आप पुनर्विवाह करेंगे तो मैं अन्य किसी गुरु की सेवा में चला जाउंगा.“शिवराम खिज्लाकर बोले-“ जाना है तो चला जा मैं तेरे ऐसे कृतघ्न का मुख नहीं देखना चाहता.''गुरु के प्रति अश्रद्धा

होने पर कीनाराम तुरंत वहां से चल पड़े.

प्रथम शिष्य - बीजाराम;-

04 FACTS;-

1-मार्ग में नईडीह नामक एक गाँव आया. उन्होंने देखा कि एक वृक्ष के नीचे एक बुढिया बेतहाशा रो रही है । कारण पूछने पर बताया कि जमींदार का लगान बकाया हो गया था. उसके प्यादे उसके लड़के को पकड़ कर ले गए हैं और मार रहे हैं.कीनाराम ने कहा- इस तरह रोने से कहीं लगान चुकता होता है? चल मैं तेरे लड़के को बचा लूँगा? बुढिया ने कहा- महाराज वह बड़ा जालिम आदमी है. बिना रकम के मानेगा नहीं. आप बेकार में जाकर परेशान होने. 2-अब कीनाराम नाराज हो गए. उन्होंने कहा- इस तरह रोने से तेरा लड़का बच जाएगा? चल, मेरे साथ चल. मैं भी देखूं, कैसा जमींदार है.बाबा को लेकर बुढिया जमींदार के यहाँ पहुंची. कीनाराम ने देखा कि लड़के को हाथ बाँध कर धुप में बिठा रखा है. कीनाराम ने कहा- जमींदार साहब आप इस बेवा के लड़के को छोड़ दें. 3-जमींदार ने कहा- मेरा लगान बाकी है. रकम चुका दीजिये और लड़के को ले जाईये. कीनाराम ने कहा- लड़का जहाँ बैठा है वहां तेरी सारी रकम रखी है. किसी मजदूर से खोद कर निकलवा ले.इसके बाद उन्होंने लड़के से कहा- तू इधर आके बैठ बेटा.जमींदार को बाबा कि बातों पर विश्वास नहीं हुआ. मजदूर को कह कर खोदवाने पर वहां वांछित रकम मिलने पर उसको घोर आश्चर्य हुआ. और साथ ही भयभीत भी. बाबा कीनाराम के पैरों में आकर गिर पडा. 4-कीनाराम ने कहा- लो माताजी अपने लड़के को सम्हालो कई सालों का लगान चुकता हो गया.इस चमत्कार को देखकर बुढिया भी स्तंभित हो गयी. वापिस आते समय भाव विव्हल होकर बोली- बाबाजी अब से मेरा लड़का आपकी सेवा में. लगान ना दे पाने पर मेरा लड़का पता नहीं कितने समय तक जमींदार के यहाँ बेगार करता अब आपकी सेवा में रहेगा तो जीवन सफल हो जाएगा.पहले तो कीनाराम बाबा राजी नहीं हुए. बुढिया की जिद्द को देखते हुए भगवान् की इच्छा को माना और लड़के को साथ ले लिया. यही उनका प्रथम शिष्य हुआ जिसका नाम था- बीजाराम । ये भी एक बहुत सिद्ध साधक हुये ।

गिरनार पर्वत पर साधना;-

02 FACTS;- 1-घूमते हुए दोनों गिरनार पर्वत पर पहुंचे. आबू पर्वत, गिरनार, हिंगलाज, पुष्कर, वीरभूमि, कामाख्या और हिमालय के अनेक क्षेत्र संतों की साधना भूमी हैं. आज भी संत लोग अलक्ष्य रूप में यहाँ साधना करते हैं.कीनाराम ने कहा- बीजाराम मैं पर्वत पर जा रहा हूँ. जब तक न लौटूं तुम यहाँ इंतज़ार करना. और एक बात याद रखना केवल तीन घर से भिक्षा मांगना, इससे अधिक नहीं. भिक्षा में जितना मिले उससे काम चलाना चौथे घर में मत जाना. 2-कहा जाता है इसी पर्वत पर कीनाराम की मुलाक़ात भगवान् दत्तात्रेय महाराज से हुई थी. और उन्हें योग का उपदेश दिया था । कहा जाता है कि नाथ सम्प्रदाय के संत गोरखनाथ तथा वारकरी सम्प्रदाय के संत एकनाथ ने भी यहीं दत्तात्रेय ऋषि का दर्शन किया था. औघड़ों के मान्य स्थल गिरनार पर किनाराम जी को दत्तात्रेय के स्वयं दर्शन हुए थे जो रुद्र के बाद औघड़पन के द्वितीय प्रतिष्ठापक माने जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि परम सिद्ध औघड़ों को भगवान् दत्तात्रेय के दर्शन गिरनार पर आज भी होते है. वर्तमान काल में, किनारामी औघड़पंथी परमसिद्धों की बारहवीं पीढ़ी में, वाराण्सीस्थ औघड़ बाबा भगवान राम को भी गिरनार पर्वत पर ही दत्तात्रेय जी का प्रत्यक्ष दर्शन हुआ था।

जूनागढ़ और कन्धार की यात्रा;-

04 FACTS;-

1-कुछ दिनों बाद गुरु शिष्य गिरनार पर्वत से जूनागढ़ आ गए. यहाँ नवाब का शासन था. नगर में भीख मांगने की मनाही थी. जो व्यक्ति भीख माँगता, उसे पकड़ कर जेल में डाल देते थे. वहां अपराधियों को चक्की चलानी पड़ती थी.बीजाराम भिक्षा मांगने गए और पकडे गए.और नियमानुसार उन्हें भी जेल हो गयी. इधर कीनाराम काफी देर हो जाने पर चिंतिति हो उठे. ध्यान लगाने पर देखा तो माजरा समझ में आया. अब वे भी बीजाराम की तरह भीख मांगने निकले. इन्हें भी पकड़ कर जेल में डाल दिया. 2-इन्हें भी एक चक्की चलाने को दी गयी. आपने अपनी चक्की पर एक डंडा मारते हुए कहा- चल बेटा, चक्की.चक्की चलने लगी. इसके बाद अन्य संतों की चक्कियों को भी डंडा मार कर उन्हें चालू कर दिया. इस अनहोनी को देखकर पहरेदार भाग भाग कर नवाब तक पहुंचे और सारी घटना बयान की. नवाब पहचान गया और डर गया कि आज फकीर से पाला पड़ा है. फ़टाफ़ट बाबा को दरबार में इज्जत के साथ बुलाया.ऊँचे दर्जे के फकीर हैं कहीं बद्दुआ ना दे दें इसलिए बाबा को प्रसन्न करने के लिए थाली में माफ़ी के रूप में हीरे जवाहरात पेश किये गए. बाबा ने एक उठा कर मुह में डाला और बोले- यह न तो मीठे हैं न ही खट्टे. मेरे किस काम के?नवाब बोला- हजरत जो हुक्म दें वही पेश किया जाएगा. 3-बाबा को नवाब की मनःस्थिति का ज्ञान हुआ. हंसकर बोले- संत और फकीर मांग कर गुजारा करते हैं.यह तेरे यहाँ का गुनाह है, ठीक है. अब आइन्दा भीख मांगने वाले फकीर और संत को शासन की ओर से अढाई पाव आटा मुफ्त देनें का हुक्म दे दो.इतने सस्ते में छूटते देख नवाब ने तुरंत इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया. 4-सन् 1638 में बाबा हिंगलाज से मुल्तान और मुल्तान से कन्धार पहँचे। कन्धार में मिट्टी का एक विशाल किला था जो व्यापारिक और सामरिक दृष्टि से भारत और फारस दोनों देशों के लिये बहुत महत्त्वपूर्ण था। बाबा के आशीर्वाद से शाहजहाँ ने किले को फारस के शाहअब्बास से जीत लिया। बाद में उसने वहाँ बुलाकर बाबा का भव्य सत्कार किया। कुछ दिनों बाद शाहजहाँ से बाबा की भेंट उत्तर भारत में हुई। इस समय शाहजहाँ अपनी प्रिय पत्नी मुमताज महल के ऊपर दीवाना था और राजकोष का बहुत अपव्यय कर रहा था। बाबा के प्रति उसने अवज्ञा और उद्दण्डता दिखायी। बाबा ने उसे शाप दे दिया- ‘तुमने साधु की अवज्ञा की है। तुम बीबी के गुलाम हो। अपनी ही औलाद के हाथों दु:ख पाओगे और अपनी करनी का फल चखोगे।’ वैसा ही हुआ। शाहजहाँ अपने पुत्र औरंगजेब के हाथों जेल में बन्द किया गया और यातना भोगता रहा।

हिंगलाज मन्दिर;-

02 FACTS;- 1-जूनागढ़ से चलकर बाबा कीनाराम खाड़ी और दलदलों को पार करते हुए कराँची से 70 किमी. दूर हिंगलाज पहुँचे। हिंगलाज मन्दिर से कुछ दूरी पर उन्होंने धूनी लगायी। हिंगलाज देवी स्वयं एक कुलीन महिला के रूप में वहाँ उन्हें प्रतिदिन भोजन पहुँचाती थी। धूनी की साफ-सफाई भैरव स्वयं एक वटुक के रूप में करते थे। कुछ दिनों के बाद बाबा ने उस महिला से परिचय पूछा तो देवी ने स्वयं अपने रूप का दर्शन दिया और कहा- ‘जिसके लिये आप तप कर रहे हैं मैं वही हूँ। मेरा यहाँ का समय पूरा हो गया है। अब मुझे मेरे स्थान काशी में ले चलो। मैं काशी में केदारखण्ड के क्रीं कुण्ड में निवास करूँगी।’ बाबा ने धूनी ठंडी की, और चल दिये।

2-देवी हिंगलाज ने गिरनार में बाबा कीनाराम को आर्शीवाद दिया और मां हिंगलाज बाबा कीनाराम के साथ क्रीं कुंड वाराणसी तक आई। बाबा कीनाराम वाराणसी के प्राचीन अघोर गद्दी के संस्थापक पिता के समान है। मां हिंगलाज वहां मंत्र के रूप में, उस दैवीय शक्ति देवत्व का प्रतीक उस रहस्यमय ज्योतिर्मय रूप में, विग्रह के रूप में विद्यमान हैं। बाबा कीनाराम की पुस्तक और औघड़ गद्दियाँ ;-

02 FACTS;- 1-बाबा कीनाराम ने अपनी पुस्तक "विवेकसार" "रामगीता" "रामरसाल" "उन्मुनीराम" ग्रंथो में अघोर के सिद्धांतो का उल्लेख किया है।उनकी पुस्तक " विवेकसार " को अघोर सिद्धांतों एवं क्रियाओं का सबसे प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है।

2-अपने प्रथम गुरु वैष्णव शिवाराम जी के नाप पर उन्होंने चार मठ स्थापित किए तथा दूसरे गुरु, औघड़ बाबा कालूराम की स्मृति में कींकुड (वाराणसी), रामगढ़ (चंदौली तहसील, वाराणसी), देवल (गाजीपुर) तथा हरिहरपुर (जौनपुर) में चार औघड़ गद्दियाँ कायम कीं। वाराणसी और क्रीं कुण्ड ;-

03 FACTS;- 1-वाराणसी में पवित्र देवनदी गंगा के तट पर उन्होंने "धूनी" (पवित्र जलने वाली अग्नि) की स्थापना की और सेवा की एवं अपनी साधना को चलायमान रखा। वो अखंड़ धूनी, अनवरत् जलने वाली अग्नि और बाबा कीनाराम तथा अन्य अघोर संतो की समाधियां भी क्रीं कुण्ड परिसर में हैं।

2-किनाराम जी वाराणसी के हरिश्चंद्र घाट के श्मशान पर रहनेवाले औघड़ बाबा कालूराम (कहते हैं, यह स्वयं भगवान दत्तात्रेय थे) के पास पहुँचे। कालूराम जी बड़े प्रेम से दाह किए हुए शवों की बिखरी पड़ी खोपड़ियों को अपने पास बुला-बुलाकर चने खिलाते थे। किनाराम को यह व्यर्थ का खिलवाड़ लगा और उन्होंने अपनी सिद्धि शक्ति से खोपड़ियों का चलना बंद कर दिया। कालूराम ने ध्यान लगाकर समझ लिया कि यह शक्ति केवल किनाराम में है। इन्हें देखकर कालूराम ने कहा-भूख लगी है। मछली खिलाओ। किनाराम ने गंगा तट की ओर मुख कर कहा-गंगिया, ला एक मछली दे जा। एक बड़ी मछली स्वत: पानी से बाहर आ गई।

3-थोड़ी देर बाद कालूराम ने गंगा में बहे जा रहे एक शव को किनाराम को दिखाया। किनाराम ने वहीं से मुर्दे को पुकारा, वह बहता हुआ किनारे आ लगा और उठकर खड़ा हो गया। बाबा किनाराम ने उसे घर वापिस भेज दिया पर उसकी माँ ने उसे बाबा की चरणसेवा के लिए ही छोड़ दिया।इन सब के बाद, कहते हैं, कालूराम जी ने अपने स्वरूप को दर्शन दिया और किनाराम को साथ, कीकुंड, (कृमिकुंड) (भदैनी, वाराणसी) ले गए जहाँ उन्हें बताया कि इस स्थल को ही गिरनार समझो। समस्त तीर्थों का फल यहाँ मिल जाएगा। किनाराम तबसे मुख्यश: उसी स्थान पर रहने लगे।

काशी नरेश को बाबा कीनाराम का श्राप;-

06 FACTS;- 1- वाराणसी के दक्षिणी भाग में स्थित काशी नरेश के महल में हलचल मची हुई थी. सवेरे से ही वेदपाठी वेड के चारों अंगों का पाठ कर रहे थे. नगर के गणमान्य नागरिकों के अलावा अनेक साधू संत उपस्थित थे. राजा चेतसिंह यहाँ शिव मंदिर बनवाकर आज यहाँ शिवलिंग की प्रतिष्ठा करा रहे थे.चेतसिंह ने आदेश दे रखा था की ऐसे शुभ अवसर पर कोई अवांछनीय व्यक्ति समारोह में ना आ पाए. वंश परम्परा से काशी नरेश शिव भक्त थे. सहसा महल में चेतसिंह का वज्र कंठ कम्पित हो उठा-“यह नरपिशाच यहाँ कैसे आ गया? बाहर निकालो इस चांडाल को.“ 2-सभी कर्मचारी भयभीत हो उठे. सामने कीनाराम बाबा खड़े थे. कई कर्मचारी बाबा की ओर लपके. तभी कीनाराम बाबा ने कहा-“ तू ने मेरा अपमान किया ? इसका फल तुझे शीघ्र मिलेगा. यह मत भूल की तुने विदेशियों को शिकस्त दी है. वे तुझे ऐसा सबक सिखायेंगे कि मेरी तरह तुझे भी इस महल से बिदा होना पड़ेगा.''कीनाराम की इतनी बातें सुनने के बाद चेतसिंह आपे से बाहर हो गए. राजा को क्रुद्ध देखकर पहरेदारों ने जबरन कीनाराम को घसीटना प्रारम्भ किया. 3-बाबा कीनाराम ने कहा-“ देख लेना, यह बाबा का श्राप है, -''तेरा राज्य नष्ट हो जाएगा. इस महल में उल्लू चमगादड़ रहेंगे. तेरा वंश भी समाप्त हो जाएगा. ''ठीक इसी समय महल के भीतर मुंशी सदानंद बक्शी ने प्रवेश किया. बाबा कीनाराम के प्रति इनकी गहरी आस्था थी . वे बाबा को आदर पूर्वक उनके आश्रम तक पहुंचा आये. महल वापस आने के बाद सदानंद को सारी बातें मालुम हुई.उन्हें समझते देर नहीं लगी कि जो कुछ भी हुआ,अनुचित हुआ. बाबा कीनाराम सिद्ध पुरुष हैं. नगर के लोग आपको श्रद्धा की दृष्टी से देखते हैं. जरुरु किसी मतलब से आये होंगे. कहीं उनका शाप फलीभूत हुआ तो क्या होगा? 4-दुसरे दिन सदानंद क्रीम कुंड स्थित बाबा के आश्रम में आये और राजा को दिए श्राप के लिए क्षमा करने की प्रार्थना करने लगे.बाबा कीनाराम ने कहा-“ अब जो बात जबान से निकल गयी है, वह तो होकर रहेगी. उसे अपनी बहादुरी का गर्व हो गया है. लेकिन मैं साफ़ देख रहा हूँ कि उसका पतन होने वाला है''सदानंद ने भयभीत स्वर में कहा-“ तब हम लोगों का क्या होगा? मेरा अनुरोध है कि आप राजा साहब पर कृपा कीजिये.''

5-बाबा ने कहा-“ साधू का वचन कभी टलता नहीं.बाबा ने कहा,“अब काशी पर अंग्रेज कब्जा करेंगे।राज परिवार उनके आधीन रहेगा।जब विदेशी शासक चले जाएंगे तब दिल्ली में इस देश के लोगों का राज्य शुरू होगा तब स्थिति बदलेगी और तेरे घर की स्थिति भी बदलेगी। जा बक्शी, तू घर जा। जब तक तेरे वंशजों के नाम से “आनन्द” शब्द जुड़ा रहेगा तब तक तेरा वंश चलेगा।मैं तुम्हारे मनोविशय को समझ रहा हूँ. तुम्हारे वंश को कोई हानि नहीं होगी. समझे सदानंद. एक काम करना, भविष्य में तुम्हारे वंशधर अपने नाम के पीछे ''आनंद'' शब्द अगर जोड़ लेंगे तो तुम्हारा वंश अनादी काल तक चलेगा. अब तुम जा सकते हो.'' 6-कीनाराम के श्राप ने प्रभाव दिखाया. राजा चेतसिंह को शिवाले के किले से भागना पड़ा. राज्य ईस्ट इंडिया कम्पनी के हाथों चला गया. सदानंद के वशंज डा.सम्पूर्णानन्द उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। आज भी उनके परिवार में “आनन्द” शब्द प्रचलित है. बाबा कीनाराम जी का महाप्रयाण ;-

06 FACTS;- 1-अघोरियों के तीर्थ -स्थान, विश्व-विख्यात पीठ, बाबा कीनाराम स्थल (वाराणसी जिले के भेलूपुर थाना अंतर्गत शिवाला/ रविन्द्रपुरी कालोनी में स्थित) है. कीनाराम जी का महाप्रयाण भी एक अद्भुत घटना है.इस जगह को परिभाषित करते हुए अघोराचार्य महाराज श्री बाबा कालूराम जी ने कहा था- “ये स्थान सभी तीर्थों का तीर्थ है” ! 2-सदियों पुराने इस अध्यात्मिक स्थान का महत्व पौराणिक काल से ही बना हुआ है ! मान्यता है कि – यही वो स्थान है, जहां (परीक्षा के मद्देनज़र) राजा हरिश्चंद्र के पुत्र राहुल को सर्प-दंश हुआ था ! यही वो स्थान है , जहां महान सुमेधा ऋषी ने तपस्या की थी ! इसी जगह अघोर परम्परा के आधुनिक स्वरुप के जनक , अघोराचार्य महाराज श्री बाबा कीनाराम जी ने समाधी ली !श्रद्धालु जनों की निगाह में- “ये स्थान सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का कंट्रोल रूम है, जिसकी चाभी यहाँ के पीठाधीश्वर के हाथ में रहती है. 3-इस स्थान की महत्ता के बारे में बींसवीं सदी के विश्व-विख्यात महान संत अघोरेश्वर भगवान् राम जी ने बताया- कि- “ये स्थान दुर्लभ है ! यहाँ अध्यात्मिक जगत की इतनी पुनीत आत्माएं हर पल निवास करती हैं , जो साधकों को इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में कई जगह एक साथ दर्शन दे सकती हैं , ये स्थान सृष्टि की उत्पत्ति और समापन के साथ रहा है और हमेशा रहेगा, औघड़-अघोरी का प्रकृति पर सम्पूर्ण नियंत्रण रहता है , उनके द्वारा , भावावेश में आकर कुछ भी कह देने पर घटनाएं तत्काल घटनी शुरू हो जाती हैं ” . 4-21 सितंबर 1771 ई. को बाबा कीनाराम जी ने ,काशी के अपने शिष्यों, विद्वानों तथा वेद पाठियों और वीर क्षत्रियों को बुलाया और कहा, "आप सब मेरे पार्थिव शरीर को हिंगलाज देवी के यंत्र के समीप पूर्वाभिमुख स्थापित करें। जो समय-समय पर मेरे पार्थिव शरीर के सन्निकट हिंगलाज देवी के यंत्र की परिधि प्रार्थना करेगा, वह फलीभूत होगी।" 5-इसके उपरान्त उन्होंने सब के सामने हुक्का पिया। तभी आकाश में बिजली जैसी कोई चीज चमकी, जोर की गर्जना हुई, जैसे भूचाल आया हो।उसी के साथ इनके ऊर्ध्वरन्ध्र से तेजोमय प्रकाश निकला और देखते-देखते ब्रह्माण्ड में विलीन हो गया।उपस्थित सारे लोग रोने बिलखने लगे। तभी आकाश को चीरती हुई आवाज आयी , "व्याकुल न हो, मैं क्रीं कुण्ड स्थित हिंगलाज देवी के यंत्र की परिधि में ,जलती हुई अखण्ड धूनी के निकट ,सदैव एक रुप से रहूँगा।"काशी का यह क्रीं कुण्ड अघोर साधना का केन्द्र बिन्दु रहा है।यहाँ अनेक औघड़ साधकों ने साधना की और देश की समस्याओं के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।

6-योगी अपनी चेतना में साँस मेरुदंड में सुषुम्ना नाड़ी में लेते है| नाक या या मुंह से ली गई साँस तो एक प्रतिक्रया मात्र है उस प्राण तत्व की जो सुषुम्ना में प्रवाहित है| जब सुषुम्ना में प्राण तत्व का सञ्चलन बंद हो जाता है तब साँस रुक जाति है और मृत्यु हो जाती है| इसे ही प्राण निकलना कहते हैं| अतः अजपा-जप का अभ्यास नित्य करना चाहिए|यह साधना उन को स्वतः ही समझ में आ जाती है जो नियमित ध्यान साधना करते हैं|

...... SHIVOHAM.....