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परा सजींवनी


हिन्दू धर्मग्रंथों में दो तरह की विद्याओं का उल्लेख किया गया है- परा और अपरा। वेदों से लेकर पुराणों तक इन विद्याओं के बारे में बहुत विस्तार से बताया गया है। खासकर उपनिषदों और योग ग्रंथों में इन विद्याओं के संबंध में विस्तार से जानकारी मिलेगी। धर्म में उल्लेखित यह परा और अपरा ही लौकिक और पारलौकिक कहलाती है।

दुनिया में ऐसे कई लोग हैं, जो इन विद्याओं को किसी न किसी रूप में जानते हैं। वे इन विद्याओं के बल पर ही भूत, भविष्य का वर्णन कर देते हैं और इसके बल पर ही वे जादू और टोना करने की शक्ति भी प्राप्त कर लेते हैं। यह परा और अपरा शक्ति 4 तरह से प्राप्त होती है- देवताओं द्वारा, योग साधना द्वारा, तंत्र-मंत्र द्वारा और किसी चमत्कारिक औषधि या वस्तुओं द्वारा। परा विद्या के पूर्व अपरा विद्या का ज्ञान होना जरूरी है। परा विद्या एक चमत्कारिक विद्या है तो दूसरी ओर यह ब्रह्मा को जानने का मार्ग।

जगत 3 स्तरों वाला है। एक, स्थूल जगत जिसकी अनुभूति जाग्रत अवस्था में होती है। दूसरा, सूक्ष्म जगत जिसका स्वप्न में अनुभव करते हैं तथा तीसरा, कारण जगत जिसकी अनुभूति सुषुप्ति में होती है। इन तीनों स्तरों में जो व्यक्ति जाग्रत हो जाता है, साक्षीभाव में ठहर जाता है वह परा और अपरा दोनों ही प्रकार की विद्याओं में पारंगत हो जाता है।

परा-अपरा का परिचय : मुंडकोपनिषद अनुसार परा यौगिक साधना है और अपरा अध्यात्मिक ज्ञान है। जिस विद्या से 'अक्षरब्रह्म' का ज्ञान होता है, वह 'परा' विद्या है और जिससे ऋग, यजु, साम, अथर्व, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद और ज्योतिष का ज्ञान होता है, वह 'अपरा' विद्या है। परा विद्या वह है जिसके द्वारा परलोक यानी स्वर्गादि लोकों के सुख-साधनों के बारे में जाना जा सकता है, इन्हीं विद्याओं के जरिए इन्हें पाने के मार्ग भी पता किए जाते हैं।

अपरा : जिसमें जानने वाला और जाना जाने वाला अलग-अलग होता है। इसमें सभी ज्ञान चाहे वह संसार के विषय में हो, वह ब्रह्म के विषय में आ जाता है। अपरा विद्या वह विद्या है, जो स्वप्न की बुद्धि से उत्पन्न होती है तथा निराकार तक का ज्ञान देती है।

10 अपरा विद्याएं हैं : शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद, नक्षत्र, वास्तु, आयुर्वेद, वेद, कर्मकांड। अन्य जगहों पर इनके भाग अलग-अलग हैं, जैसे 4 वेद और 6 वेदांग।

गीता में पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि एवं अहंकार को अपरा शक्ति कहा गया है, क्योंकि ये बनते और मिटते हैं। ये मिथ्या नाशवान शक्तियां हैं (गीता 7/4)। इसको पूर्ण रूप से जान लेना वाला ही अपरा शक्ति संपन्न व्यक्ति होता है।

परा विद्या : जिसमें जानने वाला और जाना जाने वाला अलग-अलग नहीं होता। इसमें अपना ज्ञान है, ब्रह्म-ज्ञान है। परा का अर्थ वह विद्या, जो इस नश्वर ब्रह्मांड से परे का ज्ञान दे। उपनिषद में कहा गया है कि परा विद्या वह विद्या है, जो जागृत बुद्धि है और उसी से अक्षर ब्रह्म को जाना जाता है (मुण्डक. 1/1/5)।

'परा' विद्या तो ज्ञान की एक अलग प्रक्रिया का ही वर्णन है जिसमें 'क्या-क्या' जाना जाता है, यह प्रश्न ही नहीं उठता। उपनिषदें ‘अपरा विद्या’, निम्नतर ज्ञान और ‘परा विद्या’, उच्चतर ज्ञान में अंतर करते हैं। अपरा विद्या से तात्पर्य वेदों और विज्ञानों में उपलब्ध ज्ञान से है। परा विद्या अविनाशी परमेश्वर और आत्मा के दिव्य स्वरूप का ज्ञान देती है।

क्या है परा विद्या : परा प्राकृतिक शब्द उन व्यक्तियों, वस्तुओं या घटनाओं के लिए प्रयुक्त होता है जिसे कुछ लोग वास्तविक मानते हैं, लेकिन जो प्रकृति का भाग नहीं होते या सामान्य प्रकृति से परे होते हैं। 'अलौकिक' या 'पारलौकिक' शब्द भी इसके लिए प्रयुक्त होता है।

पराशक्ति या अलौकिक शक्तिसंपन्न व्यक्ति को चमत्कारिक व्यक्ति माना जाता है, जो भूत, वर्तमान और भविष्य की घटनाओं का ज्ञान रखता है और जो कभी भी किसी भी प्रकार का चमत्कार करने की क्षमता रखता है।

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विज्ञानं भैरव तंत्र के पांचवी विधी को समझे तो पता चलता है की यहाँ हम इस विधि के माध्यम से साधना करें तो आप के सपने....

अपनी ऊर्जा को हिलींग और मेनिस्टेशन में परिवरतीत करना जाने*

1. *पहला दिन*: आभा मण्डल क्लिन्जींग - (नकारात्मक ऊर्जा को आभा मण्डल से निकालने की विधि) – यहाँ हम एक शक्तिशाली विधि से अपना आभा मंडल साफ़ कर अपने आस पास से नकारात्मक उर्जा को दूर करते है.

2. *दुसरा दिन*: ॐ सिम्बल दिक्शा - (ॐ सिम्बल को शरीर मे स्थापित करना) – यहाँ हम ॐ संकेत के माध्यम से अपनी हीलिंग करेंगे और ॐ संकेत को अपने शारीर में स्थापित करेंगे. यहाँ हम ॐ संकेत के माध्यम से दूसरो को हीलिंग करना भी जानेंगे.

3. *तीसरा दिन*: गणेश सिम्बल दिक्शा – (गणेश सिम्बल को शरीर मे स्थापित करना) – यहाँ हम गणेश संकेत के माध्यम से अपनी हीलिंग करेंगे और इसे अपने शारीर में स्थापित करेंगे. यह एक शक्ति शाली विधि है जिससे हमारे बिच आने वाली सारी रूकावटे और समस्याएं दूर हो जाती है इसे करने के बाद हमारें कामो में आने वाली साडी बाधाएं दूर हो जाती है और काम आसानी से होने लगते है.

4. *चौथा दिन*: श्री विष्णु सिम्बल दिक्शा – (श्री विष्णु सिम्बल को शरीर मे स्थापित करना) – यहाँ हम श्री विष्णु संकेत के माध्यम से अपनी हीलिंग और इसे अपने शारीर में स्थापित करेंगे. यह एक शक्ति शाली संकेत है जिस से हम अपने जीवन की धन संपत्ति सम्बन्धी रुकावटों को दूर कर पाते है. और लक्ष्मी को प्रसन्न कर पाते है.

5. *प्राणायाम और सूक्ष्म क्रियाएं* – (video) – यहाँ हम video के माध्यम से प्राणायाम और शुष्म क्रियाएँ सीखेंगे जिस को की हमे रोजाना करनी होगी. सिर्फ ३० मिनट अगर आप इस को करते हो तो हमेशा आप फिट और स्वस्थ रह सकते है.

6. *भूत शुद्धी* – (तत्व स्वास और तत्व ध्यान) - यहां हम अपने पंच तत्वों को संतुलित करना और सात चक्रों को जागृत करेगें। यह क्रियाएँ क्रिया योग से ली गयी है. यहाँ पर हम तत्व स्वांस विधि के माध्यम से पंच तत्वों को इस ब्रह्माण्ड से ग्रहण करते है. आज कल हम पंच तत्वों से दूर हो रहे है. जैसे की हम बारिश में नहीं भीगते है, और अपने बच्चो को भी मना करते है सुबह की धुप ग्रहण नहीं करते है, और बहुत सारे करनो से हम पंच तत्वों से दूर हो रहे है. जिस के करान हम बीमार होते है. यह बहुत सुंदर विधि है जिस से हम इन तत्वों को सीधे ब्रह्माण्ड से ग्रहण करते है. और साथ ही हमारें सात चक्र भी जाग्रत हो जाते है. यहाँ और एक बात समझनी जरुरी है की इस ब्रह्माण्ड की रचना भी इन पंच तत्वों से ही हूवी है अथार्थ अगर हम इस विधि के माध्यम से पंच तत्वों को ग्रहण कर रहे है तो आप की सारी इच्छाएं भी अपने आप पूरी होने लगेगी क्यूंकि वो सब भी पंच तत्वों के भीतर ही आती है. और साथ ही तत्व ध्यान विधि से हम अपनी हिलिंग्स करे पायेंगे.

7. *पंच शरीर की अनुभूतियां* – हम सुनते है की हमारे पांच शारीर है यहाँ हम इसे अनुभव करेंगे. यह एक हिलीगं विधी भी है यहां हम अपने पांचो शरीरों को जानेगें और शरीर के बाहर शुन्य मे प्रवेश करेगें। इस विधि के माध्यम से हमे यह ज्ञात हो जाता है की हम सिर्फ स्थूल शारीर नहीं है

8. *प्राणा हिलिंग* – हमारी पांच प्राण वायु है जिस से की हम जीवन व्यापन करते है. हमारी पांच प्राण वायु इस प्रकार है. १. प्राण वायु, २. सामना प्राण वायु, ३. अपाना प्राण वायु ४. उड़ना प्राण वायु, ५. व्यान प्राण वायु. यह सब अपने अपने विभाग के मालिक होते है. जब हम सो जाते है तब हमारी ज्ञान इन्द्रियां और कर्म इन्द्रियां भी सो जाती है लेकिन यह पंच प्राण वायु जाग्रत रहती है. यह एक बहुत बेहतर हिलींग विधी है यहां हम अपने पंच प्राण वायू के द्वारा हिलींग करेगें।

9. *अपनी संकल्प शक्ती को बडाना* – यहाँ हम अपनी संकल्प शक्ति को बढ़ाते है. इस विधि के माध्यम से हम् अपने विचारों को शक्ति प्रदान करते है. हम सब ने सुना होगा की विचार भी एक उर्जा है हम इस विधि के माध्यम से अपने विचारों को शक्ति प्रदान करते है जिस से की हमारी बातों का प्रभाव हो और हमारी इच्छा के हिसाब से काम पूर्ण हो. इस विधी के द्वारा हम अपनी संकल्प शक्ति को बडाना और विचारों को शक्ती देना सिखेगें।

10. *विचारों को रोकना* – हमारें मन में कही विचार चलते ही रहते है हमारा उन पर कोई भी कंट्रोल नहीं रहता है. यहां हम अपने विचार को तुरंत कैसे रोक सकते है जानेंगे और शांत होना सिखेगें।

11. *रेचन क्रिया* – यह बहुत ही सुंदर विधि है जिसे हर किसी को करना ही चाहिए. हमारे अभी तक कई जनम हो चुके है और हम ने जाने अनजाने कई पाप कर्म कियें है जिसके कारन ही इस जीवन में हम दुख झेलते है. हमारे जीवन में जो भी दुख और समस्याएं आती है वो इन्ही कर्मो के कारन आती है. हमारा स्वांस लेने इस तरीका होता है जैसे आप के अन्घुठे के निशान किसी और से नहीं मिलता है, वैसे ही आप के स्वांस लेने का pattern भी किसी और से नहीं मिलता है. यह pattern हमारे पिचलें जन्मो और संस्कारो से बनती है. यहाँ हम इस विधि के माध्यम से अपने कर्मो से निकलना जानेंगें। जिस से की हमारें इस जीवन में कोई दुःख और समस्यांए नहीं रहे. यही सभी गुरु अलग अलग नाम से कारते है. ओशो - सक्रिय ध्यान नित्यानंद जी - नित्या ध्यान शिवयोग - प्रति प्रसर्व साधना आर्ट ऑफ़ लिविंग - सुदर्शन क्रिया कौलान्तक पीठ - कौलाचार

12. *दुखद घटनाओ से छुटकारा* - यहां हम अपनी मस्तिक्ष से दुखद और बुरी घटनाओं को निकालना सिखेगें, जिससे हम अपना भविष्य को सवांर सखे। जब हम कोई कार्य शुरू करते है और अगर उस कार्य में सफल नहीं होते है तो दुबारा उस कार्य को शुरू नहीं कर पाते है क्यूंकि असफलता की चाप हमारें मश्तिक्ष में होती है. इस विधि के माध्यम से हम असलता की चाप को अपने मश्तिक्ष से निकाल पाते है.

13. *आज्ञा चक्र पर पहुंचना* - यहां हम ३ रास्तो के माध्यम से आज्ञा चक्र पर पहुंचना जानेगें। आज्ञा चक्र जैसे की नाम से ही पता चलता है की यहाँ पर अगर आदेश दो तो पूरा हो जायें. यहाँ पर ध्यान करना बहुत आसान और प्रभावी होता है. विज्ञानं भैरव तंत्र के पांचवी विधी को समझे तो पता चलता है की यहाँ हम इस विधि के माध्यम से साधना करें तो आप के सपने और हकीकत में कोई फर्क नहीं रह जाता. आप ने सोचा वो तुरंत हो जाता है. इसीलिए कहा जाता है की यहाँ पर साधना तब ही करनी चाहिए जब आप बहुत ज्यादा सकारात्मक हो. यहाँ पर साधना करने से आप के विचारों को बल मिलता है, लोगों पर आप की बातों का असर होता है.

14. *सजींवनी हिलींग मंत्र दिक्षा* - यहां हम संजीवनी मंत्र दिक्षा प्राप्त करेगें। हम सभी एक ही समय पर बैठते है साधना के लिए, और हम आप को अपने गुरु मंडल से संबंध जोड़ते हुवे आप की दीक्षा को संपन किया जाता है. समय और दुरी जैसे कोई चीज नहीं होती है जैसे की सूर्य पृथ्वी से एक करोड़ पचास लाख किलो मीटर दुरी पर है लेकिन हम उसे सिर्फ एक सेकंड में देख पाते है.

15. *सजींवनी हिलींग साधना* - यहां हम स्वयं कि हिलींग संजीवनी हीलिंग साधना के माध्यम से करेगें। 16. सजींवनी हिलींग साधना लेवल १ और लेवल २ – यहाँ हम संजीवनी हीलिंग साधना के लेवल 1 और 2 सीखेंगे. और यह भी जानेंगे की दूसरों की हीलिंग कैसे करें.

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*लेवल 2:

1. *पहला दिन*: अपने विचारों को शक्ती देना - यहां हम अपनी ईच्छाओं को पुरा करने का विज्ञान जानेगें। कारण और परिणाम का विज्ञान भी जानेगें। - आप ने सुना होगा “law of attraction” के बारें में. यहाँ पर हम ब्रह्माण्ड के रहस्य को जानेंगे. जैसे की पृथ्वी अपनी सतह पर 24 घंटो में एक चक्कर लगाती हुवी 365 दिनों में सूर्य का चक्कर लगाती है और चन्द्रमा पृथ्वी का चक्कर लगता है यह सृष्टि गुणात्मक है. गुलाब का बींज बोने से गुलाब का ही वृक्ष उगता है, किसी और का नहीं. अगर हम इस विज्ञानं को समंझेंगे तो हम इस के सहारे से अपने जीवन को अपने हिसाब से बना सकते है. यह ब्रह्माण्ड का विज्ञान हम समझने का प्रयत्न करेगें। इसे जानने के बाद हम अपने जिवन को अपनी स्वेच्छा से चला सकते है।

2. *दूसरा दिन*: हस्थ मुद्राऐं – (36 विडीयो) – यहाँ हम 36 videos के माध्यम से सारी मुद्राएं समझेंगे. यहाँ हम मुद्राएं कैसे बनायीं जाती है, उनके फायदे क्या है यह सब जानेगें.

3. *तीसरा दिन*: शरीर मे चक्रो का स्थान - यहां हम अपने शरीर मे चक्रो के स्थान को अनुभव करेगें और फिर हर चक्र मे भ्रमण अपनी हस्थ मुद्राओं द्वारा करेगें। हम सुनते आये है की हमारे 7 महत्वपूर्ण चक्र होते है. यहाँ हम सही में अपने चक्रों को अनुभव कर पाते है और अपनी मुद्राओ के माध्यम से अपनी चक्रों को यात्रा कर पाते है.

4. *चौथा दिन*: अल्फा लेवल (स्वप्न अवस्था) - यहां हम सिर्फ १० मिनट मे अल्फा लेवल मे जाने की विधी जानेंगे। alpha लेवल का मतलब होता है जहाँ आप का शारीर स्वप्न अवस्था में पहुच जायें, सो जायें, और आप जागते रहो. यहाँ पर आप अपने आप को सोयी हुवी अवस्था में अनुभव कर पाते हो. इसे के माध्यम से हमे यह अनुभव में आ जाता है की हम शारीर नहीं है.

5. *पांचवा दिन*: आज्ञा चक्र पर प्रकाश देखना - यहां हम आज्ञा चक्र पर प्रकाश को देखने कि विधी जानेगें। यह बहुत ही सुंदर विधि है. कई लोग प्रयास करते है प्रकाश को देखने की लेकिन किसी कारण से नहीं देख पाते है. लेकिन इस विधि के माध्यम से आप सभी अपने आज्ञा चक्र पर प्रकाश को देखने में सक्षम हो जायेंगे.

6. *छेठा दिन*: ईडा, पिंघला और सुषुम्ना नाडीयो को शुध्द और जागृत करने कि विधी जानेगें – यह बहुत ही अच्छी विधि है. जब तक आप की सुषुम्ना नाडी साफ़ नहीं होती आप ध्यान में प्रवेश नहीं कर पाते हो. यहाँ हम कुछ ही पल में अपनी तीनो नाड़ियों को साफ़ कर पाते है जिसे आप सभी अनुभव कर पाते है. अगर हम सिर्फ इन तीनो नाड़ियों को साफ़ रखें तब भी कोई भी बीमारी हमारे पास नहीं आती है और हम पूर्ण रूप से स्वस्थ रह सकते है.

7. *सातवा दिन*: सात चक्र - यहां हम अपने चक्रो के बारे मे सब कुछ जानेंगे. कौन कौन से चक्र होते है, उनके रंग, बीज मंत्र, उनकी शक्तियों के नाम और मंत्र आदि. यहाँ पर सारी जानकारी प्राप्त करेंगे.

8. *आंठवा दिन*: चक्र ध्यान - यहां हम चक्रों के जागृत करना जानेंगे। इस ध्यान विधि के माध्यम से हम “क्लिं” मंत्र को अपने चक्र पर स्थापित करते है. और चक्रों को जाग्रत भी करते है. “क्लिं” मंत्र आकर्षण का मंत्र है और यही कृष्णा का भी मंत्र है और माँ काली का भी.

9. *नौवा दिन*: चक्रों के माध्यम से १०८ कि गणना - यहां हम अपने चक्रों के माध्यम से १०८ कि गणना सिखेंगे। इस विधि के माध्यम से हम किसी भी मंत्र का उच्चारण अपने चक्रों के माध्यम से कर सकते है, जिस से मंत्र तो जाग्रत होते ही है साथ ही आप के चक्र भी खुलते है और जाग्रत होते है.

10. *दसवां दिन*: नौ ग्रह साधना - यहां हम चक्रों के माध्यम से नौ ग्रह साधना करेंगे। यह बहुत ही अच्छी विधि है जिस के माध्यम से हम ग्रहों की साधना अपने चक्रों के माध्यम से करते है, जो की बहुत ही प्रभावी होती है. आप सभी किसी भी गृह की पूजा, प्राथना अपने चक्रों के माध्यम से कर पाओगे.

11. *ग्यारहवां दिन*: नौरंग औरा साधना - यह एक बहुत ही अच्छी हिलींग साधना है जिससे अपने आस पास की नकारात्मक ऊर्जा को तुरंत दूर किया जाता है। यह विधि भी क्रिया योग की ही है. यह हम कभी भी और कहीं भी कर पाते है.

12. *बारहवां दिन*: औरा स्क्यान (आभा मण्डल) - यहां हम अपने व‌ दुसरों के आभा मण्डल को मांपने की विधि जानेंगे। और आप अपने और दूसरों के सभी चक्रों को भी measure कर पाते है.

13. *तेरहवां दिन*: प्रकाश ध्यान - यहां हम अपने आज्ञा चक्र पर प्रकाश को देखते हुए ध्यान मे प्रवेश कि विधी को जानेंगे। यह भी क्रिया योग की एक विधि है. इस विधि से हम अपने आज्ञा चक्र पर प्रकाश को देखते हुवे ध्यान में प्रवेश करते है.

14. *चोदहवां दिन*: मृत संजीवनी साधना लेवल 3 - यहां हम स्वयं की हिलींग मृत संजीवनी साधना के माध्यम से करते है. मृत संजीवनी का अर्थ होता है जी अगर हम मृत्यु सामान परिस्तिथि से गुजर रहे हो तब भी इस साधना के माध्यम से हम स्वस्थ हो सकते है. यह बहुत ही प्रभाव शाली विधि है. इस विधी के माध्यम से हम अपने पंच शारीर, पंच प्राण वायु और पंच तत्व को शुद्ध करते है. इसे करने से हम अपने कार्मिक blockages से भी बहार आ पाते है. इस विधि के माध्यम से हम किसी भी परिस्तिथि को भी heal कर सकते है यह विधी हर समस्या का हल कर सकती है.

15. *पंद्रहवां दिन*: मृत संजीवनी साधना - यहां हम मृत संजीवनी साधना के माध्यम से दूसरो की हिलींग की विधि जानेंगे। यह बहुत शक्ति शाली विधि है ओर हम किसी और की भी हीलिंग कर सकते है. अगर वो व्यक्ति कहीं और हो तब भी इस विधि के माध्यम से हम उस की हीलिंग कर पाते है. इस विधि में आप अपने आप को safe करते हुवे हीलिंग कर पाते है और आप किसी और की कार्मिक factor से effect नहीं होते हो.

16. *सोलहवां दिन*: चक्र ध्वनी - यहां हम अलग अलग चक्र ध्वनी को जानेंगे। यह भी क्रिया योग की विधि है. हमारे सात चक्र है उन सब की अलग अलग ध्वनि होती है यहाँ हम जानेगें की उनकी ध्वनि कैसी होती है और आप उन ध्वनि को सुन सकते है.

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*लेवल 3

1. *नाड़ि शुधि* – यह एक हिमालय योगियों की साधना विधि है जिस के माध्यम से हम 72 लाख नाड़ियों को शुद्ध और स्वच कर सकते है. ज्यादातर लोगो को उनके घुटनों में दर्द होता है इस विधि के माध्यम से आप को तुरंत ही फर्क महसूस करेंगे. यह बहुत ही प्रभाव शाली विधि है और इस के results भी तुरंत ही आने लगते है. इसे करने में सिर्फ 15 मिनट लगता है और कभी भी की जा सकती है.

2. *Manifestation ध्यान विधि* – यह विधि विज्ञानं भैरव तंत्र की पांचवी विधि है. यहाँ पर भगवन शंकर माँ पार्वती से इस विधि के बारें में बता रहे है. इस विधि में हम अपने आज्ञा चक्र पर साधना करते है और साधना करते समय अगर आप को कोई विचार आता है तो वह तुरंत ही फलीभूत हो जाता है आप के सोचने में और होने में बिलकुल भी फर्क नहीं रह जाता है इसी लिए इस विधि को तब ही करना चाहिए जब आप बहुत ज्यादा शुद्ध और सकारात्मक हो.

3. *परा शक्ति हीलिंग साधना* – यह माँ परा ललिताम्बा की साधना है. इसे 9 बीज मंत्रो के द्वारा की जाती है स्वांस भीतर लेते समय 9 बीज मंत्र और स्वांस को छोड़ते समय 9 बीज मंत्र का उच्चारण किया जाता है. यह अतियंत ही प्रभाव शाली विधि है. यहाँ पर चमत्कारी हीलिंग हो सकती है. इन बीज मंत्रो को स्वांस के माध्यम से किया जाता है. इस को 9 बार करते से आप का अध्यात्मिक growth एक साल का बड जाता है ऐसा कहा गया है. हीलिंग साधना में यह सर्वोपरि है. आप ने सुना होगा की श्री विध्या साधना सबसे ज्यादा प्रभाव शाली होती है, श्री विध्या के आगे सिर्फ यही साधना आती है. परा का मतलब है जो की सब से परे है उत्तम है. माँ परा, आदि शक्ति की हीलिंग साधना बहुत ही अच्छी साधना है यह भी क्रिया योग की एक विधि है.

4. *परा शक्ति हीलिंग साधना दूसरो के लिए* – यहाँ हम परा शक्ति हीलिंग साधना के माध्यम से दूसरों को हीलिंग करना सीखेंगे.

5. *अद्वैत साधना* – हम सुनते आयें है अद्वैत साधना के बारें में, की दूसरा कोई नहीं है सिर्फ एक है जो की पर्त्मात्मा है. यहाँ पर हम यह अनुभव करेंगे. हम यह जानेगें की हम सभी में आत्म तत्व एक ही है. हम सब connected है.

6. *समय के पार* – यहाँ हम समय के पार जाने की 2 विधि को जानेगें. एक विधि जो की महर्षि वाल्मीकि जी द्वारा भगवन राम को दी गयी थी. यह बहुत ही अच्छी विधियाँ है. समय के पार जाने का अर्थ इतना ही है की समाधी में कैसे प्रवेश करें.

7. *चक्र ध्यान* – यहाँ हम ६ ऑडियो देंगे. मूलाधार से आज्ञा चक्र के बीज मंत्रो द्वारा साधना विधि. यह हमारे गुरु की आवाज़ में है और हर विधि ४० मिनट की है इस विधि के माध्यम से आप किसी भी चक्र की साधना कर उसे जागृत कर सकते हो.

8. *तुरीय क्रिया* – यह भी क्रिया योग की विधि है. इस विधि के माध्यम से हम तुरीय अवस्था का अनुभव कर पाते है. यह सिर्फ ३०मिनट की विधि है और हम सभी तुरीयां अवस्था की अनुभूति कर पाते है.

9. *शुष्म शरीर यात्रा* – तुरीयां क्रिया विधि के बाद हम शुष्म शरीर यात्रा की विधि कर सकते है. यह कोई धारणा नही है आप सच में अपने शरीर से बहार आ कर यात्रा कर पाते हो. हम अपने नाभि चक्र से सिल्वर तार से जुड़े रहते है.

10. *मृत संजीवनी साधना* - advance level – यहाँ पर हम मृत संजीवनी हीलिंग साधना के स्वर स्वयं की हीलिंग करेंगे.

11. *श्री विध्या* – यहाँ हम श्री यंत्र की स्थापना अपने हर चक्र पर करेंगे.

12. *समाधी अवस्था* – यहाँ पर समाधी की चार अवस्थाओ को जानेगें a. स्वप्न अवस्था b. शुशुप्ती अवस्था c. तुरीयां अवस्था d. तुरीया तीथ अवस्था या निर्गुण अवस्था

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'Meditation'.

To fully understand the significance of this explanation it would be better to re-read the earlier post on Mantra Japa and then read the Meditation post. Comments and questions are welcome:

"Meditation is the other vital half of practice. Mantra-chanting and meditation are the two vital sides of the same practice. What does meditation signify? The world is paying greater attention today to the idea of meditation. This is because material science has recognized that meditation yields better results (in holistic healing) than medical treatment if the person meditating is able to achieve complete concentration.

"But achieving this kind of concentration is rarely possible. Buddhist and Jain religions also lay great emphasis on meditation. However, they don’t go beyond meditation. There is a great deal of excitement over (the benefits of) meditation. Doctors talk about it; everybody (who matters) talks about it. But no one is able to really explain well what meditation signifies.

"(The fact is) Mediation is the stage prior to achieving Samadhi (the final of stage of the eightfold yoga as codified by sage Patanjali). Sage Patanjali has explained in detail about the state of meditation (as a part of spiritual practice) in his treatise, the “Yoga Sutra”, a very authentic book (on yoga). In this treatise, sage Patanjali has laid out a regimen that requires the seeker to follow the following eight sequences of spiritual practice: Yam (moral codes), Niyama (self purification and study), Asana (postures), Pranayama (breath control), Pratyahar (sense control), Dharna (intention / concentration), Dhyan (meditation) and Samadhi (contemplation).

"The first five stages fall within the material realm while the last three—Dharna, Dhyan and Samadhi in the subtle domain. Until the practitioner successfully passes through the Dharna stage, he cannot move into the next stage -- Dhyan. You cannot achieve the stage of meditation by simply imagining yourself to be in a meditative state. Your Dharna, the base, will be firm only when you have undergone some practical inner changes (and experiences) and you have found a practical material solution to your problems. It is only when you find this kind of practical solution through the inner change that you will successfully reach the stage of Dharna. And once you are firm in your Dharna, you will begin to achieve concentration in meditation. To achieve this concentration, you need to focus your mind on your Agyachakra. So, Dhyan is the stage prior to Samadhi, as sage Patanjali has explained. And when you go deep into meditation with concentration, you automatically move into the Samadhi stage."