Recent Posts

Archive

Tags

No tags yet.

भगवत्गीता में निष्काम कर्मयोग


श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं...

''इस निष्काम कर्मयोग में आरंभ का अर्थात बीज का नाश नहीं है, और उलटा फलस्वरूप दोष भी नहीं होता है, इसलिए इस निष्काम कर्मयोगरूप धर्म का थोड़ा भी साधन, जन्म-मृत्युरूप महान भय से उद्धार कर देता है।''

श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि निष्काम कर्म का कोई भी कदम व्यर्थ नहीं जाता है। इसे समझना जरूरी है। निष्काम कर्म का छोटा-सा प्रयास भी व्यर्थ नहीं जाता है। लेकिन इससे उलटी बात भी समझ लेनी चाहिए। सकाम कर्म का बड़े से बड़ा प्रयास भी व्यर्थ ही जाता है।अब यह

सकाम बुद्धि सदा असफल होती है। लाभ हो, तो भी हानि होती है सकाम बुद्धि में। क्योंकि अपेक्षा का कोई अंत नहीं है। जो भी मिलता है, सदा छोटा पड़ता है। जो भी सफलता मिलती है, वह भी किसी बड़ी असफलता के सामने फीकी लगती है। कुछ भी मिल जाए, तो भी तृप्ति नहीं है। कुछ भी मिल जाए, तो भी संतोष की कहीं कोई झलक नहीं आती। सकाम कर्म असफल होने को बाध्य है। असफलता में नहीं है उसका राज, उसका राज सकाम होने में है।

अब श्रीकृष्ण कहते हैं, निष्काम कर्म का छोटा-सा भी कृत्य सफल ही होता है। होगा ही, क्योंकि असफलता का कोई उपाय नहीं है। जब निष्काम है, तो अपेक्षारहित है। इसलिए जो भी मिल जाए, वह भी बहुत है। क्योंकि कोई अपेक्षा नहीं थी, जिससे उसको छोटा बताया जा सके।

कहानी सुनी है हम सबने कि अकबर ने एक लकीर खींच दी थी दरबार में अपने, और कहा था अपने दरबारियों को कि बिना छुए इसे छोटा कर दो। वे सब हार गए थे और फिर बीरबल ने एक बड़ी लकीर उसके पास खींच दी। उसे छुआ नहीं, काटा नहीं, पोंछा नहीं, सिर्फ एक बड़ी लकीर पास खींच दी। और वह लकीर एकदम छोटी हो गई।

अपेक्षा की बड़ी लकीर जिनके मन में खिंची है, सफलता की सभी लकीरें छोटी पड़ती हैं। अपेक्षा एंडलेस है--वह जितनी बड़ी खींची थी बीरबल ने, वह कुछ बड़ी नहीं थी--अपेक्षा की जो लकीर है, उसका कोई अंत ही नहीं है। वह दोनों छोरों पर अनंत है। जो लोग ब्रह्म को जानते हैं, वे ब्रह्म को अनंत कहते हैं। लेकिन जिन्होंने ब्रह्म को नहीं जाना, वे भी एक अनंत चीज को जानते हैं। वह अपेक्षा है, एक्सपेक्टेशन है। उस अनंत अपेक्षा के पास खींची गई कोई भी सफलता सदा छोटी पड़ती है।

लेकिन श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि अपेक्षा की लकीर मिटा दो। निष्काम कर्म का अर्थ यही है--अपेक्षारहित, फल की आकांक्षारहित, कामनारहित। स्वभावतः, बड़ी होशियारी की बात उन्होंने कही है। वे कह रहे हैं कि अगर अपेक्षा की लकीर मिटा दो, तो फिर छोटा-सा भी कर्म तृप्ति ही लाता है। क्योंकि कितना ही छोटा हो, तो भी बड़ा ही होता है, क्योंकि तौलने के लिए कोई नीचे लकीर नहीं होती। इसलिए निष्कामकर्मी कभी भी विषाद को उपलब्ध नहीं होता है। सिर्फ सकामकर्मी विषाद को उपलब्ध होता है। फ्रस्टे्रशन जो है, वह सकाम कर्म की छाया है। निष्काम कर्म की कोई छाया नहीं बनती, कोई विषाद नहीं बनता।

इसलिए एक बहुत मजे की बात ध्यान में ले लेनी जरूरी है, गरीब आदमी ज्यादा विषाद को उपलब्ध नहीं होता, अमीर आदमी ज्यादा विषाद को उपलब्ध होता है। होना नहीं चाहिए ऐसा। बिलकुल नियम को तोड़कर चलती हुई बात मालूम पड़ती है। गरीब समाज ज्यादा परेशान नहीं होते, अमीर समाज बहुत परेशान हो जाते हैं। क्या कारण होगा?

असल में गरीब आदमी अनंत अपेक्षा की हिम्मत नहीं जुटा पाता। वह जानता है अपनी सीमा को। वह जानता है कि क्या हो सकता है, क्या नहीं हो सकता है। अपने वश के बाहर है बात, वह अनंत अपेक्षा की रेखा नहीं बनाता। इसलिए फ्रस्ट्रेशन को उपलब्ध नहीं होता। इसलिए विषाद को उपलब्ध नहीं होता। अमीर आदमी, जिसके पास सुविधा है, संपन्नता है, अपेक्षा की रेखा को अनंत गुना बड़ा करने की हिम्मत जुटा लेता है। बस, उसी के साथ विषाद उत्पन्न हो जाता है।

पाल गुडमेन ने अमेरिका के संबंध में एक किताब लिखी है, ग्रोइंग अप एब्सर्ड। उसमें उसने एक बहुत मजे की बात कही है। उसने कहा है कि मनुष्य जाति ने जिन-जिन सुविधाओं की आकांक्षा की थी, वे सब पूरी हो गई हैं अमेरिका में। मनुष्य जाति ने जो-जो सपने देखे थे, उनसे भी आगे अमेरिका में सफलता मिल गई। लेकिन अमेरिका में जो आदमी है, आज उससे दुखी आदमी बस्तर के जंगल में भी नहीं है। क्या, हो क्या गया? यह एब्सर्डिटी कहां से आई? यह अजीब बात है कि जो-जो आदमी करोड़ों साल से अपेक्षा कर रहा था, वह सब फलित हो गई है। सब सपने पूरे हो गए हैं। यह क्या हो गया लेकिन? हुआ क्या?

हुआ यह कि सब शक्ति हाथ में होने पर अपेक्षाएं एकदम अनंत हो गईं। इसलिए जो भी पास में है, एकदम छोटा पड़ गया। बस्तर के आदिवासी की बहुत बड़ी अपेक्षा की सामर्थ्य नहीं है, जो भी हाथ में है, काफी बड़ा है।

इसलिए दुनिया में गरीब आदमी कभी बगावत नहीं करते। गरीब आदमी अपेक्षा ही नहीं करते कि बगावत कर सकें। दुनिया में बगावत शुरू होती है, जब गरीब आदमी के पास अपेक्षाएं दिखाई पड़ने लगती हैं निकट; तब उपद्रव शुरू होता है। दुनिया में अशिक्षित आदमी बगावत नहीं करते, क्योंकि अपेक्षा बांध नहीं पाते। शिक्षित आदमी उपद्रव शुरू करते हैं। क्योंकि जैसे ही शिक्षा हुई, अपेक्षाएं एकदम विस्तार लेने लगती हैं। शिक्षित आदमी को शांत करना मुश्किल है। मैं नहीं कहता कि शिक्षित नहीं करना चाहिए; यह मैं नहीं कह रहा हूं। शिक्षित आदमी को शांत करना मुश्किल है। अभी तक तो कोई उपाय नहीं खोजा जा सका।

एक बहुत बड़े विचारक ने तो एक किताब लिखी है, कंपल्सरी मिसएजुकेशन। जिसको हम अनिवार्य शिक्षा कहते हैं, वह उसको अनिवार्य कुशिक्षा...। क्योंकि अगर अंततः आदमी सिर्फ दुखी और अशांत ही होता हो, तो अ, ब, स, द सीख लेने से भी क्या हो जाने वाला है! अगर समृद्धि सिर्फ विषाद ही लाती हो, तो ऐसी समृद्धि से दरिद्रता बेहतर मालूम पड़ सकती है।

लेकिन राज क्या है? सीक्रेट सिर्फ इतना-सा है, समृद्धि से कोई लेना-देना नहीं है, अगर अपेक्षा की धारा बहुत ज्यादा न हो, तो समृद्ध आदमी भी शांत हो सकता है। और अगर अपेक्षा की धारा बहुत बड़ी हो, तो दरिद्र भी अशांत हो जाएगा। अगर अपेक्षा शून्य हो, तो शिक्षित भी शांत हो सकता है। अगर अपेक्षा विराट हो, तो अशिक्षित भी अशांत हो जाता है। प्रश्न शिक्षित-अशिक्षित, धन और दरिद्रता का नहीं है। प्रश्न सदा ही गहरे में अपेक्षा का है, एक्सपेक्टेशन का है।

तो वह श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि निष्काम कर्म की तुझसे मैं बात कहता हूं और इसलिए कहता हूं, क्योंकि निष्काम कर्म को करने वाला व्यक्ति कभी भी असफलता को उपलब्ध नहीं होता है। यह पहली बात। और दूसरी बात वे यह कह रहे हैं कि निष्काम कर्म में छोटा-सा भी विघ्न, छोटी-सी भी बाधा नहीं आती। क्यों नहीं आती? निष्काम कर्म में ऐसी क्या कीमिया है, क्या केमिस्ट्री है कि बाधा नहीं आती, कोई प्रत्यवाय पैदा नहीं होता!

है। बाधा भी तो अपेक्षा के कारण ही दिखाई पड़ती है। जिसकी अपेक्षा नहीं है, उसे बाधा भी कैसे दिखाई पड़ेगी? गंगा बहती है सागर की तरफ, अगर वह पहले से एक नक्शा बना ले और पक्का कर ले कि इस-इस रास्ते से जाना है, तो हजार बाधाएं आएंगी रास्ते में। क्योंकि कहीं किसी ने मकान बना लिया होगा गंगा से बिना पूछे, कहीं कोई पहाड़ खड़ा हो गया होगा गंगा से बिना पूछे, कहीं चढ़ाई होगी गंगा से बिना पूछे। और नक्शा वह पहले बना ले, तो फिर बाधाएं हजार आएंगी। और यह भी हो सकता है कि बाधाओं से लड़-लड़कर गंगा इतनी मुश्किल में पड़ जाए कि सागर तक कभी पहुंच ही न पाए।

लेकिन गंगा बिना ही नक्शे के, बिना प्लानिंग के चल पड़ती है। रास्ता पहले से अपेक्षा में न होने से, जो भी मार्ग मिल जाता है, वही रास्ता है। बाधा का कोई प्रश्न ही नहीं है। अगर पहाड़ रास्ते में पड़ता है, तो किनारे से गंगा बह जाती है। पहाड़ से रास्ता बनाना किसको था, जिससे पहाड़ बाधा बने!

जो लोग भी भविष्य की अपेक्षा को सुनिश्चित करके चलते हैं, अपने हाथ से बाधाएं खड़ी करते हैं। क्योंकि भविष्य आपका अकेला नहीं है। किस पहाड़ ने बीच में खड़े होने की पहले से योजना कर रखी होगी, आपको कुछ पता नहीं है।

जो भविष्य को निश्चित करके नहीं चलता, जो अभी कर्म करता है और कल कर्म का क्या फल होगा, इसकी कोई फिक्स्ड, इसकी कोई सुनिश्चित धारणा नहीं बनाता, उसके मार्ग में बाधा आएगी कैसे? असल में उसके लिए तो जो भी मार्ग होगा, वही मार्ग है। और जो भी मार्ग मिलेगा, उसी के लिए परमात्मा को धन्यवाद है। उसको बाधा मिल ही नहीं सकती।

इसलिए कृष्ण कहते हैं, अर्जुन, निष्काम कर्म की यात्रा पर जरा-सा भी प्रत्यवाय नहीं है, जरा-सी भी बाधा नहीं है, जरा-सा भी हिंडरेंस है ही नहीं। पर बड़ी होशियारी की, बड़ी कलात्मक बात है, बहुत आर्टिस्टिक बात है। एकदम से खयाल में नहीं आएगी। एकदम से खयाल में नहीं आएगी कि बाधा क्यों नहीं है? क्या निष्काम कर्म करने वाले आदमी को बाधा नहीं बची?

बाधाएं सब अपनी जगह हैं, लेकिन निष्काम कर्म करने वाले आदमी ने बाधाओं को स्वीकार करना बंद कर दिया। स्वीकृति होती थी अपेक्षाओं से, उनके प्रतिकूल होने से। अब कुछ भी प्रतिकूल नहीं है। निष्काम कर्म की धारणा में बहने वाले आदमी को सभी कुछ अनुकूल है। इसका यह मतलब नहीं है कि सभी कुछ अनुकूल है। असल में जो भी है, वह अनुकूल ही है, क्योंकि प्रतिकूल को तय करने का उसके पास कोई भी तराजू नहीं है। न बाधा है, न विफलता है। सब बाधाएं, सब विफलताएं सकाम मन की निर्मितियां हैं।

;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;

प्रश्न: भगवान श्री, श्लोक के उत्तरार्द्ध में-- स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्--इस धर्म का अति अल्प आचरण भी बड़े भय से बचाता है, इसे भी समझाएं।

निष्काम कर्म का अल्प आचरण भी बड़े-बड़े भयों से बचाता है। बड़े-बड़े भय क्या हैं? बड़े-बड़े भय यही हैं--असफलता तो नहीं मिलेगी! विषाद तो हाथ नहीं आएगा! दुख तो पल्ले नहीं पड़ेगा! कोई बाधा तो न आ जाएगी! निराशा तो नहीं मिलेगी! बड़े-बड़े भय यही हैं। कृष्ण कह रहे हैं, सूत्र के अंतिम हिस्से में, कि निष्काम कर्म का थोड़ा-सा भी आचरण, अंशमात्र आचरण भी, रत्तीभर आचरण भी, पहाड़ जैसे भयों से मनुष्य को मुक्ति दिला देता है।

असल में जब तक विपरीत दशा को न समझ लें, खयाल में नहीं आएगा। जरा-सी अपेक्षा पहाड़ों जैसे भय को निर्मित कर देती है। जरा-सी कामना, पहाड़ों जैसे दुखों का निर्माण कर देती है। जरा-सी इच्छा पर जोर, जरा-सा आग्रह कि ऐसा ही हो, सारे जीवन को अस्तव्यस्त कर जाता है। जिसने भी कहा, ऐसा ही हो, वह दुख पाएगा ही। ऐसा होता ही नहीं। जिसने भी कहा, ऐसा ही होगा, तो ही मैं सुखी हो सकता हूं, उसने अपने नर्क का इंतजाम स्वयं ही कर लिया। वह आर्किटेक्ट है अपने नर्क का खुद ही; उसने सब व्यवस्था अपने लिए कर ली है।

हम जितने दुख झेल रहे हैं, कभी आपने सोचा कि कितनी छोटी अपेक्षाओं पर खड़े हैं! कितनी छोटी अपेक्षाओं पर! नहीं देखा कभी। हम जो दुख झेल रहे हैं, कितनी छोटी अपेक्षाओं पर खड़े हैं!

एक आदमी रास्ते से निकल रहा है। आपने सदा उसको नमस्कार किया था, आज आप नमस्कार नहीं करते हैं, ये दो हाथ ऊपर नहीं उठे आज। उसकी नींद हराम है, वह परेशान है, उसे बुखार चढ़ आया है! अब वह सोचने लगा कि क्या हो गया, कोई बदनामी हो गई, इज्जत हाथ से चली गई, प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल गई। जिस आदमी ने सदा नमस्कार की, उसने नमस्कार नहीं किया! क्या होगा? क्या नहीं होगा? अब उसको कैसे बदला चुकाना, और क्या नहीं करना--वह हजार-हजार चक्करों में पड़ गया है। इस आदमी के ये दो हाथों का न उठना, हो सकता है उसकी जिंदगी के सारे भवन को उदासी से भर जाए।

पति घर आया है और उसने कहा, पानी लाओ। और पत्नी नहीं लाई दो क्षण। सब दुख हो गया! पति घर से बाहर निकला; राह चलती किसी स्त्री को उसने आंख उठाकर देख लिया; पत्नी के प्राण अंत हो गए! पत्नी मरने जैसी हालत में हो गई; जीने का कोई अर्थ नहीं रहा, जीना बिलकुल बेकार है!

हम अगर अपने दुखों के पहाड़ को देखें, तो बड़ी क्षुद्र अपेक्षाएं उनके पीछे खड़ी मिलती हैं। यहीं से समझना उचित होगा। क्योंकि निष्काम कर्म का तो अंश भी हमें पता नहीं, लेकिन सकाम कर्म के काफी अंश हमें पता हैं। यहीं से समझना उचित होगा। उसके विपरीत निष्काम कर्म की स्थिति है। कितनी क्षुद्र अपेक्षाएं कितने विराट दुख को पैदा करती चली जाती हैं!

यह जो इतना बड़ा महाभारत हुआ, जानते हैं कितनी क्षुद्र-सी घटना से शुरू हुआ? इतना बड़ा यह युद्ध, यह इतनी-सी क्षुद्र घटना से शुरू हुआ! बहुत ही क्षुद्र घटना से, मजाक से, एक जोक। दुनिया के सभी युद्ध मजाक से शुरू होते हैं।

दुर्योधन आया है। और पांडवों ने एक मकान बनाया है। और अंधे के बेटे की वे मजाक कर रहे हैं। उसमें उन्होंने आईने लगाए हुए हैं। और इस तरह से लगाए हुए हैं कि दुर्योधन को, जहां दरवाजा नहीं है, वहां दरवाजा दिखाई पड़ जाता है; जहां पानी है, वहां पानी दिखाई नहीं पड़ता। उसका दीवार से सिर टकरा जाता है, पानी में गिर पड़ता है। द्रौपदी हंसती है। वह हंसी सारे महाभारत के युद्ध का मूल है। उस हंसी का बदला फिर द्रौपदी को नंगा करके चुकाया जाता है। फिर यह बदला चलता है। बड़ी ही क्षुद्र-सी घटना, जस्ट ए जोक, एक मजाक, लेकिन बहुत महंगा पड़ा है। मजाक बढ़ता ही चला गया। फिर उसके कोई आर-पार न रहे और उसने इस पूरे मुल्क को मथ डाला।

एक स्त्री का हंसना! एक घर में चचेरे भाइयों की आपसी मजाक! कभी सोचा भी न होगा कि हंसी इतनी महंगी पड़ सकती है। लेकिन उन्हें पता नहीं कि दुर्योधन की भी अपेक्षाएं हैं। चोट अपेक्षाओं को लग गई। चोट अपेक्षाओं को लग गई। दुर्योधन ने सोचा भी नहीं था कि उस पर हंसा जाएगा--निमंत्रण देकर। उसने सोचा भी नहीं था कि उसका इस तरह मखौल और मजाक उड़ाया जाएगा। वह आया होगा सम्मान लेने; मिला मजाक। उपद्रव शुरू हो गया।

फिर उस उपद्रव के भयंकर परिणाम हुए। जिन परिणामों से मैं नहीं सोचता हूं कि आज तक भी भारत पूरी तरह मुक्त हो पाया है। वह महाभारत में जो घटित हुआ था, उसके परिणाम की प्रतिध्वनि आज भी भारत के प्राणों में चलती है।

जगत में बड़े छोटे-से, छोटे-से कारण सब कुछ करते हैं।

सकाम का हमें पता है, निष्काम का हमें कुछ पता नहीं है। निष्काम कृत्य को भी ठीक ऐसे ही समझें, इसकी उलटी दिशा में। जरा-सा निष्काम भाव, और बड़े-बड़े भय जीवन के दूर हो जाते हैं।

प्रश्न: भगवान श्री, क्या निष्काम भावना से हमारी प्रगति नहीं रुक जाती है?

पूछ रहे हैं कि निष्काम भावना से हमारी प्रगति नहीं रुक जाती है?

प्रगति का क्या मतलब होता है? अगर प्रगति से मतलब हो कि बहुत धन हो, बड़ा मकान हो, जायदाद हो, जमीन हो, तो शायद--तो शायद--थोड़ी रुकावट पड़ सकती है। लेकिन अगर प्रगति से अर्थ है, शांति हो, आनंद हो, प्रेम हो, जीवन में प्रकाश हो, ज्ञान हो, तो रुकावट नहीं पड़ती, बड़ी गति मिलती है। इसलिए आपकी प्रगति का क्या मतलब है, इस पर निर्भर करेगा।

प्रगति से आपका क्या मतलब है? अगर प्रगति से यही मतलब है जो बाहर इकट्ठा होता है, तब तो शायद थोड़ी बाधा पड़ सकती है। लेकिन बाहर सब कुछ भी मिल जाए--सारा जगत, सारी संपदा--और भीतर एक भी किरण शांति की न फूटे, तो मैं तुमसे कहता हूं कि अगर कोई तुम्हें शांति की एक किरण देने को राजी हो जाए और कहे कि छोड़ दो यह सब राज्य और यह सब धन और यह सब दौलत, तो तुम छोड़ पाओगे। छोड़ सकोगे। एक छोटी-सी शांति की लहर भी इस जगत के पूरे साम्राज्य के समतुल नहीं है।

लेकिन हम प्रगति से एक ही मतलब लेते हैं। लेकिन इसका यह भी मतलब नहीं है कि मैं ऐसा कह रहा हूं कि जो निष्काम कर्म में गति करेगा, अनिवार्य रूप से दीन और दरिद्र हो जाएगा। यह मैं नहीं कह रहा हूं। क्योंकि मन शांत हो, तो दरिद्र होने की कोई अनिवार्यता नहीं है। क्योंकि शांत मन जिस दिशा में भी काम करेगा, ज्यादा कुशल होगा। धन भी कमाएगा, तो भी ज्यादा कुशल होगा। हां, एक फर्क पड़ेगा कि धन कमाने का अर्थ चोरी नहीं हो सकेगा। शांत मन के लिए धन कमाने का अर्थ धन कमाना ही होगा, चोरी नहीं। धन निर्मित करना होगा।

शांत मन हो, तो आदमी जो भी करेगा, कुशल हो जाता है। उसके मित्र ज्यादा होंगे, उसकी कुशलता ज्यादा होगी, उसके पास शक्ति ज्यादा होगी, समझ ज्यादा होगी। इसलिए ऐसा नहीं कह रहा हूं कि वैसा आदमी अनिवार्य रूप से दरिद्र होगा। भीतरी तो समृद्धि होगी ही, लेकिन भीतरी समृद्धि बाहरी समृद्धि को लाने का भी आधार बनती है, लेकिन गौण होगी। भीतरी समृद्धि के बचते, भीतरी समृद्धि के रहते हुए मिलती होगी--नाट एट दि कास्ट, कीमत न चुकानी पड़ती होगी भीतरी समृद्धि की--तो बाहरी समृद्धि भी आएगी। हां, सिर्फ उसी जगह बाधा पड़ेगी, जहां बाहरी समृद्धि कहेगी कि भीतरी शांति और आनंद खोओ, तो मैं मिल सकती हूं। तो वैसा निष्कामकर्मी कहेगा कि मत मिलो, यही तुम्हारी कृपा है। जाओ।

प्रगति का क्या अर्थ है, इस पर सब निर्भर करता है। अगर सिर्फ दौड़ना ही प्रगति है--कहीं भी दौड़ना, बिना कहीं पहुंचे--तब बात अलग है। लेकिन कहीं अगर पहुंचना प्रगति है, तो फिर बात बिलकुल अलग होगी। अगर आप यह कहते हों कि एक आदमी पागल है और हम उससे कहें कि तुम्हारे दिमाग का इलाज किए देते हैं। और वह कहे, दिमाग का इलाज तो आप कर देंगे, लेकिन इससे मेरी प्रगति में बाधा तो नहीं पड़ेगी? क्योंकि अभी मैं जितनी तेजी से दौड़ता हूं, कोई दूसरा नहीं दौड़ पाता। हम कहेंगे, बाधा पड़ेगी। अभी तुम्हारी जैसी तेजी से कोई भी नहीं दौड़ पाता, लेकिन तुम इतनी तेजी से दौड़कर भी कहीं नहीं पहुंचते और धीमे चलने वाले लोग भी पहुंच जाते हैं। बस, इतना ही खयाल हो, तो बात समझ में आ सकती है।

व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन।

बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्।। ४१।।

हे अर्जुन, इस कल्याणमार्ग में निश्चयात्मक-बुद्धि एक ही है और अज्ञानी (सकामी) पुरुषों की बुद्धियां बहुत भेदों वाली अनंत होती हैं।

मनुष्य का मन एक हो सकता है, अनेक हो सकता है। मनुष्य का चित्त अखंड हो सकता है, खंड-खंड हो सकता है। मनुष्य की बुद्धि स्वविरोधी खंडों में बंटी हुई हो सकती है, विभाजित हो सकती है, अविभाजित भी हो सकती है। साधारणतः विषयी चित्त, इच्छाओं से भरे चित्त की अवस्था एक मन की नहीं होती है, अनेक मन की होती है; पोलीसाइकिक, बहुचित्त होते हैं। और ऐसा ही नहीं कि बहुचित्त होते हैं, एक चित्त के विपरीत दूसरा चित्त भी होता है।

मैं कुछ दिन पहले दिल्ली में था। एक मित्र, बड़े शिक्षाशास्त्री हैं, किसी विश्वविद्यालय के पहले कुलपति थे, फिर अब और भी बड़े पद पर हैं। वे मुझसे पूछने आए कि हम शिक्षित तो कर रहे हैं लोगों को, लेकिन बेईमानी, झूठ, दगा, फरेब, सब बढ़ता चला जाता है! हम अपने बच्चों को बेईमानी, दगा, फरेब, झूठ से कैसे रोकें? तो मैंने उनसे पूछा कि दूसरों के बच्चों की पहले छोड़ दें। क्योंकि दूसरों के बच्चों को दगा, फरेब से रोकने को कोई भी तैयार हो जाता है। मैं आपके बच्चों की बात करना चाहता हूं। दूसरों के बच्चों को दगा, फरेब से रोकने में कौन सी कठिनाई है! दूसरे का बेटा संन्यासी हो जाए, तो सब मुहल्ले के लोग उसको स्वागत- धन्यवाद देने आते हैं। उनका बेटा हो, तब पता चलता है!

मैंने उनसे पूछा, दूसरों के बच्चों की बात छोड़ दें। आपके भी लड़के हैं! उन्होंने कहा, हैं। लेकिन वे कुछ डरे हुए मालूम पड़े, जैसे ही मैंने कहा कि आपके बच्चों की सीधी बात की जाए। मैंने उनसे पूछा कि मैं आपसे यह पूछता हूं, आप अपने बच्चों को दगा, फरेब, झूठ, खुशामद, बेईमानी--ये जो हजार बीमारियां इस समय मुल्क में हैं--इन सब से छुटकारा दिलाना चाहते हैं? उन्होंने बड़े डरते से मन से कहा कि हां, दिलाना चाहता हूं। लेकिन मैंने कहा, आप इतने कमजोर मन से कह रहे हैं हां, कि मैं फिर से पूछता हूं, थोड़ी हिम्मत जुटाकर कहिए। उन्होंने कहा कि नहीं-नहीं, मैं तो दिलाना ही चाहता हूं।

मैंने कहा, लेकिन आप हिम्मत नहीं जुटाते। आप जितनी ताकत से पहले मुझसे बोले कि सब बर्बाद हुआ जा रहा है, हम मुल्कभर के बच्चों को कैसे ईमानदारी सिखाएं! उतने जोर से आप अब नहीं कहते। उन्होंने कहा कि आपने मेरा कमजोर हिस्सा छू दिया है। आपने मेरी नस पकड़ ली है। मैंने कहा कि नस पकड़कर ही बात हो सकती है, अन्यथा तो कोई बात होती नहीं। इस मुल्क में हर आदमी बिना नस पकड़े बात करता रहता है, तो कोई मतलब ही नहीं होता है। तो मैं नस ही पकड़ना चाहता हूं।

तो उन्होंने कहा कि नहीं, इतनी हिम्मत से तो नहीं कह सकता। मैंने कहा, क्यों नहीं कह सकते? तो उन्होंने कहा कि मैं जानता हूं। इतना तो मैं चाहता हूं कि जितने ऊंचे पद तक मैं उठा, कम से कम मेरा लड़का भी उठे। और यह भी मैं जानता हूं कि अगर वह पूरा ईमानदार हो, नैतिक हो, तो नहीं उठ सकता। तो फिर मैंने कहा, दो मन हैं आपके। दो में से एक साफ तय करिए--या तो कहिए कि लड़का सड़क पर भीख मांगे, इसके लिए मैं राजी हूं, लेकिन बेईमानी नहीं। और या फिर कहिए कि लड़का बेईमान हो, मुझे कोई मतलब नहीं; लड़का शिक्षा मंत्रालय में होना चाहिए। एजुकेशन मिनिस्ट्री में पहुंचे बिना हमें कोई चैन नहीं है। बेईमानी से हमें कोई मतलब नहीं। साफ बात कहिए। और नहीं तो आप अपने लड़के में भी डबल माइंड पैदा कर देंगे।

वह लड़का भी समझ जाएगा कि बाप चाहता है कि शिक्षामंत्री होने तक पहुंचो। और देखता है कि शिक्षामंत्री होने तक की यात्रा, सीढ़ी दर सीढ़ी बेईमानी और चोरी की यात्रा है। दूसरी तरफ बाप कहता है कि ईमानदार बनो। और ईमानदार की इस जगत में हालत ठीक वैसी है, जैसी कि नाइबर ने एक किताब लिखी है, मारल मैन इन इम्मारल सोसाइटी--नैतिक आदमी अनैतिक समाज में। सड़क पर भीख मांगने की तैयारी होनी ही चाहिए। यद्यपि नैतिक होकर सड़क पर भीख मांगने में जितना आनंद है, उतना अनैतिक होकर सम्राट हो जाने में भी नहीं है। लेकिन वह दूसरी बात है।

ये दोनों बातें लड़के के दिमाग में होंगी, तो लड़के के दो मन हो जाएंगे। तब तो वह यही कर सकता है ज्यादा से ज्यादा, कि उसको कोई इंतजाम भीतरी करना पड़ेगा। कोई कोएलिशन गवर्नमेंट तो भीतर बनानी पड़ेगी न! इन सब उपद्रवी विरोधी तत्वों के बीच कोई तो समझौता करके, कोई संविद सरकार निर्मित करनी पड़ेगी! तो फिर यही होगा कि जब बाहर दिखाना हो तो ईमानदारी दिखाओ और जब भीतर करना हो तो बेईमानी करो। क्योंकि मंत्री के पद तक पहुंचना ही है और ईमानदारी बड़ी अच्छी चीज है, उसको भी दिखाना ही है।

चित्त हमारा बंट जाता है अनेक खंडों में, और विपरीत आकांक्षाएं एक साथ पकड़ लेती हैं। और अनंत इच्छाएं एक साथ जब मन को पकड़ती हैं, तो अनंत खंड हो जाते हैं। और एक ही साथ हम सब इच्छाओं को करते चले जाते हैं। एक आदमी कहता है, मुझे शांति चाहिए, और साथ ही कहता है, मुझे प्रतिष्ठा चाहिए। उसे कभी खयाल में नहीं आता कि वह क्या कह रहा है!

एक मित्र मेरे पास आए। आते ही से मुझसे बोले कि मैं अरविंद आश्रम हो आया, रमण आश्रम हो आया, शिवानंद के आश्रम हो आया, सब आश्रम छान डाले, कहीं शांति नहीं मिलती है। अभी मैं पांडिचेरी से सीधा चला आ रहा हूं। किसी ने आपका नाम ले दिया, तो मैंने कहा आपके पास भी जाकर शांति--तो मुझे शांति दें।

तो मैंने कहा कि इसके पहले कि तुम मुझसे भी निराश होओ, एकदम उलटे लौटो और वापस हो जाओ। मैं तुम्हें शांति नहीं दूंगा। और तुम कुछ इस तरह कह रहे हो कि जैसे अरविंद आश्रम ने तुम्हें शांति देने का कोई ठेका ले रखा है। सब जगह हो आया, कहीं नहीं मिली! जैसे कि मिलना कोई आपका अधिकार था। बाहर हो जाओ दरवाजे के!

उन्होंने कहा, आप कैसे आदमी हैं! मैं शांति खोजने आया हूं। मैंने कहा, अशांति खोजने कहां गए थे? अशांति खोजने किस आश्रम में गए थे, यह मुझे पहले बता दो। कहा, कहीं नहीं गया था। तो मैंने कहा, जब तुम अशांति तक पैदा करने में कुशल हो, तो शांति भी पैदा कर सकते हो। मेरी क्या जरूरत है? जिस रास्ते से अशांत हुए हो, उसी रास्ते से वापस लौट पड़ो तो शांत हो जाओगे। मैं कहां आता हूं बीच में? अशांति के वक्त मुझसे तुमने कोई सलाह न ली थी, शांति के वक्त तुम मुझसे सलाह लेने चले आए हो! मैंने पूछा कि शांति की बात बंद। अगर मेरे पास रुकना है, तो अशांति की चर्चा करो कि अशांत कैसे हुए हो? क्या है अशांति, उसकी मुझसे बात करो। अशांति तुम्हारी स्पष्ट हो जाए, तो शांति पाना जरा भी कठिन नहीं है।

वे दो दिन मेरे पास थे। उनकी अशांति फिर धीरे-धीरे उन्होंने खोलनी शुरू की। वही थी, जो हम सब की है। एक ही लड़का है उनका। बहुत पैसा कमाया। ठेकेदारी थी। एक ही लड़का है। उस लड़के ने एक लड़की से शादी कर ली, जिससे वे नहीं चाहते थे कि शादी करे। तलवार लेकर खड़े हो गए दरवाजे पर--लाश बिछा दूंगा; बाहर निकल जाओ! लड़का बाहर निकल गया। अब मुसीबत है। अब मौत करीब आ रही है। अब किस मुंह से लड़के को वापस बुलाएं, तलवार दिखाकर निकाला था। और मौत पास आ रही है। और जिंदगीभर जिस पैसे को हजार तरह की चोरी और बेईमानी से कमाया, उसका कोई मालिक भी नहीं रह जाता और हाथ से सब छूटा जा रहा है!

तो मैंने उनसे पूछा, वह लड़की खराब थी, जिसने तुम्हारे लड़के से शादी की है? उन्होंने कहा, नहीं, लड़की तो बिलकुल अच्छी है, लेकिन मेरी इच्छा के खिलाफ...।

तुम्हारी इच्छा से तुम शादी करो, तुम्हारा लड़का क्यों करने लगा? अशांत होने के रास्ते खड़े कर रहे हो। फिर जब उसने शादी अपनी इच्छा से की और तुमने उसे घर से बाहर निकाल दिया, तो अब परेशान क्यों हो रहे हो? बात समाप्त हो गई। उसने तो आकर नहीं कहा कि घर में वापस लो।

कहने लगे, यही तो अशांति है। वह एक दफा आकर माफी मांग ले, अंदर आ जाए।

नहीं मानी, ठीक है। जब उसने आपकी बात नहीं मानी, तो ठीक है। बात खतम हो गई। अब आप क्यों परेशान हैं?

तो इस धन का क्या होगा?

मैंने कहा, धन का सबके मर जाने के बाद क्या होता है? और तुम्हें क्या फिक्र है? तुम मर जाओगे, धन का जो होगा, वह होगा।

कहा कि नहीं, मेरे ही लड़के के पास मेरा धन होना चाहिए। तो मैंने कहा, फिर मेरे लड़के के पास मेरी ही पसंद की औरत होनी चाहिए, यह खयाल छोड़ो। तुम्हारा लड़का धन छोड़ने को राजी है अपने प्रेम के लिए, तुम भी कुछ छोड़ने को राजी होओ।

दो दिन मेरे पास थे, सारी बात हुई। देखा कि सब हजार तरह की उलटी-सीधी इच्छाएं मन को पकड़े हुए हैं, तो चित्त अशांत हो गया है। हम सब का मन ऐसा ही अशांत है।

कृष्ण कह रहे हैं कि विषय-आसक्त चित्त--चूंकि विषय बहुत विपरीत हैं--एक ही साथ विपरीत विषयों की आकांक्षा करके विक्षिप्त होता रहता है और खंड-खंड में टूट जाता है। जो व्यक्ति निष्काम कर्म की तरफ यात्रा करता है, अनिवार्यरूपेण--क्योंकि कामना गिरती है, तो कामना से बने हुए खंड गिरते हैं। जो व्यक्ति अपेक्षारहित जीवन में प्रवेश करता है, चूंकि अपेक्षा गिरती है, इसलिए अपेक्षाओं से निर्मित खंड गिरते हैं। उसके भीतर एकचित्तता, यूनिसाइकिकनेस, उसके भीतर एक मन पैदा होना शुरू होता है।

और जहां एक मन है, वहां जीवन का सब कुछ है--शांति भी, सुख भी, आनंद भी। जहां एक मन है, वहां सब कुछ है--शक्ति भी, संगीत भी, सौंदर्य भी। जहां एक मन है, उस एक मन के पीछे जीवन में जो भी है, वह सब चला आता है। और जहां अनेक मन हैं, तो पास में भी जो है, वह भी सब बिखर जाता है और खो जाता है। लेकिन हम सब पारे की तरह हैं--खंड-खंड, टूटे हुए, बिखरे हुए। खुद ही इतने खंडों में टूटे हैं, कि कैसे शांति हो सकती है!

जोसुआ लिएबमेन ने अपने संस्मरण लिखे हैं। संस्मरण की किताब को जो नाम दिया है, वह बहुत अच्छा है। और किताब के पहले ही हिस्से में उसने जो उल्लेख किया है, वह कीमती है। कहा कि जवान था, विश्वविद्यालय से पढ़कर लौटा था, तो मेरे मन में हुआ कि अब जीवन का एक नक्शा बना लूं कि जीवन में क्या-क्या पाना है! स्वभावतः, जीवन का एक नक्शा हो, तो जीवन को सुव्यवस्थित चलाया जा सके।

तो उसने एक फेहरिस्त बनाई। उस फेहरिस्त में लिखा कि धन चाहिए, सुंदर पत्नी चाहिए, यश चाहिए, सम्मान चाहिए, सदाचार चाहिए...। कोई बीस-बाइस बातों की फेहरिस्त तैयार की। उसमें सब आ गया, जो आदमी चाह सकता है। जो भी चाह चाह सकती है, वह सब आ गया। जो भी विषय की मांग हो सकती है, वह सब आ गया। जो भी कामना निर्मित कर सकती है, वे सब सपने आ गए। पर न मालूम, पूरी फेहरिस्त को बार-बार पढ़ता है, कि इसमें और कुछ तो नहीं जोड़ा जाना है; क्योंकि वह जीवनभर का नक्शा बनाना है।

सब खोज लेता है, कुछ जोड़ने को बचता नहीं। सब आ गया, फिर भी, समथिंग इज़ मिसिंग। कुछ ऐसा लगता है कि कोई कड़ी खो रही है। क्यों लगता है ऐसा? क्योंकि रात सोते वक्त उसने सोचा कि मैं देखूं कि सब मुझे समझ लो कि मिल गया, जो-जो मैंने फेहरिस्त पर लिखा है, सब मिल गया--हो जाएगा सब ठीक? तो मन खाली-खाली लगता है। मन में ऐसा उत्तर नहीं आता आश्वासन से भरा, निश्चय से भरा, कि हां, यह सब मिल जाए, जो फेहरिस्त पर लिखा है, तो बस, सब मिल जाएगा। नहीं, ऐसा निश्चय नहीं आता; ऐसी निश्चयात्मक लहर नहीं आती भीतर।

तो गांव में एक बूढ़े फकीर के पास वह गया। उसने कहा कि इस गांव में सबसे ज्यादा बूढ़े तुम हो, सबसे ज्यादा जिंदगी तुमने देखी है। और तुमने जिंदगी गृहस्थ की ही नहीं देखी, संन्यासी की भी देखी है। तुमसे बड़ा अनुभवी कोई भी नहीं है। तो मैं यह फेहरिस्त लाया हूं, जरा इसमें कुछ जोड़ना हो तो बता दो।

उस बूढ़े ने पूरी फेहरिस्त पढ़ी, फिर वह हंसा और उसने कलम उठाकर वह पूरी फेहरिस्त काट दी। और पूरी फेहरिस्त के ऊपर बड़े-बड़े अक्षरों में तीन शब्द लिख दिए, पीस आफ माइंड, मन की शांति। उसने कहा, बाकी ये सब तुम फिक्र छोड़ो; तुम यह एक चीज पा लो, तो यह बाकी सब मिल सकता है। और यदि तुमने बाकी सब भी पा लिया, तो भी ये जो तीन शब्द मैंने लिखे, ये तुम्हें कभी मिलने वाले नहीं हैं। और आखिर में निर्णय यही होगा कि यह पीस आफ माइंड, यह मन की शांति मिली या नहीं!

तो लिएबमेन ने अपनी आत्मकथा लिखी है, उसको नाम दिया है, पीस आफ माइंड। किताब को नाम दिया, मन की शांति। और लिखा कि उस दिन तो मुझे लगा कि यह बूढ़े ने सब फेहरिस्त खराब कर दी। कितनी मेहनत से बनाकर लाया हूं और इस आदमी ने सब काट-पीट कर दिया। जंची नहीं बात कुछ उसकी। लेकिन जिंदगी के अंत में लिएबमेन कहता है कि आज मैं जानता हूं कि उस बूढ़े ने फेहरिस्त काटी थी, तो ठीक ही किया था। उसने फाड़कर क्यों न फेंक दी! बेकार। आज जीवन के अंत में वे ही तीन शब्द पास घूम रहे हैं। काश, उस दिन मैं समझ जाता कि मन की शांति ही सब कुछ है, तो शायद आज तक पाया भी जा सकता था। लेकिन जिंदगी उसी फेहरिस्त को पूरा करने में बीत जाती है सबकी।