Recent Posts

Archive

Tags

No tags yet.

क्या है ध्यान का रहस्य ?कैसे है ध्यान में होने वाले अनुभव ?- PART-02


,

ध्यान

जब लोग आकर मुझसे पूछते हैं, 'ध्यान कैसे करें?' मैं उन्हें कहता हूं, ‘यह पूछने की कोई आवश्यकता नहीं है कि ध्यान कैसे करें, बस पूछें कि कैसे स्वयं को खाली रखें। ध्यान सहज घटता है। बस पूछो कि कैसे खाली रहना है, बस इतना ही। यह ध्यान की कुल तरकीब है - कैसे खाली रहना है। तब आप कुछ भी नहीं करेंगे और ध्यान का फूल खिलेगा।

जब तुम कुछ भी नहीं करते तब ऊर्जा केंद्र की तरफ बढ़ती है, यह केंद्र की ओर एकत्रित हो जाती है। जब तुम कुछ करते हो तो ऊर्जा बाहर निकलती है। करना बाहर की ओर जाने का एक मार्ग है। ना करना भीतर की ओर जाने का एक मार्ग है। किसी कार्य को करना पलायन है। तुम बाइबिल पढ़ सकते हो, तुम इसे एक कार्य बना सकते हो। धार्मिक कार्य और धर्मनिरपेक्ष कार्य के बीच कोई अंतर नही है: सभी कार्य, कार्य हैं, और वे तुम्हें तुम्हारी चेतना से बाहर की ओर ले जाने में मदद करते हैं। वे बाहर रहने के लिए बहाने हैं।

मनुष्य अज्ञानी और अंधा है, और वह अज्ञानी और अंधा बने रहना चाहता है, क्योंकि स्वयं के भीतर आना अराजकता में प्रवेश करने की भांती लगता है। और ऐसा ही है; अपने भीतर तुमने एक अराजकता निर्मित कर ली है। तुम्हें इसका सामना करना होगा और इससे होकर गुजरना होगा। साहस की आवश्यकता है – साहस- स्वयं होने का, साहस- भीतर जाने का। ध्यानपूर्वक होने का साहस – इस साहस से बड़ा साहस मैंने नहीं जाना है।

ओशो, Just Like That, Talk #6 अंग्रेजी में पढ़ना जारी रखने के लिए : यहां क्लिक करें

तो ध्यान क्या है? ध्यान है केवल स्वयं की उपस्थिति में आनंदित होना; ध्यान स्वयं में होने का आनंद है। यह बहुत सरल है - चेतना की पूरी तरह से विश्रांत अवस्था जहां तुम कुछ भी नहीं कर रहे होते। जिस क्षण तुम्हारे भीतर कर्ता भाव प्रवेश करता है तुम तनाव में आ जाते हो; चिंता तुरंत तुम्हारे भीतर प्रवेश कर जाती है। कैसे करें? क्या करें? सफल कैसे हों? असफलता से कैसे बचें? तुम पहले ही भविष्य में चले जाते हो।

यदि तुम विचार कर रहे हो, तो तुम क्या विचार कर सकते हो? तुम अज्ञात पर कैसे विचार कर सकते हो? तुम केवल ज्ञात पर विचार कर सकते हो। तुम इसे बार-बार चबा सकते हो, लेकिन यह ज्ञात है। यदि तुम जीसस के बारे में कुछ जानते हो, तो तुम इस पर बार-बार चिंतन कर सकते हो; अगर तुम कृष्णा के बारे में कुछ जानते हो, तो तुम इस पर बार-बार चिंतन कर सकते हो; तुम संशोधन, बदलाहट, सजावट किए जा सकते हो - लेकिन यह तुम्हें अज्ञात की ओर ले जाने वाला नहीं है। और "ईश्वर" अज्ञात है।

ध्यान मात्र होना है, बिना कुछ किए - कोई कार्य नहीं, कोई विचार नहीं, कोई भाव नहीं। तुम बस हो। और यह एक कोरा आनंद है। जब तुम कुछ नहीं करते हो तो यह आनंद कहां से आता है? यह कहीं से नहीं आता या फिर हर जगह से आता है। यह अकारण है, क्योंकि अस्तित्व आनंद नाम की वस्तु से बना है। इसे किसी कारण की आवश्यकता नहीं है। यदि तुम अप्रसन्न हो तो तुम्हारे पास अप्रसन्नता का कारण है; अगर तुम प्रसन्न हो तो तुम बस प्रसन्न हो - इसके पीछे कोई कारण नहीं है। तुम्हारा मन कारण खोजने की कोशिश करता है क्योंकि यह अकारण पर विश्वास नहीं कर सकता, क्योंकि यह अकारण को नियंत्रित नहीं कर सकता - जो अकारण है उससे दिमाग बस नपुंसक हो जाता है। तो मन कुछ ना कुछ कारण खोजने में लग जाता है। लेकिन मैं तुम्हें बताना चाहता हूं कि जब भी तुम आनंदित होते हो, तो तुम किसी भी कारण से आनंदित नहीं होते, जब भी तुम अप्रसन्न होते हो, तो तुम्हारे पास अप्रसन्नता का कोई कारण होता है - क्योंकि आनंद ही वह चीज है जिससे तुम बने हो। यह तुम्हारी ही चेतना है, यह तुम्हारा ही अंतरतम है। प्रसन्नता तुम्हारा अंतरतम है।

ओशो, Dang Dang Doko Dang, Talk #5 अंग्रेजी में पढ़ना जारी रखने के लिए : यहां क्लिक करें

ध्यान की शुरुआत खुद को मन से अलग करने से होती है, एक साक्षी बनने से। खुद को किसी भी चीज से अलग करने का यही एकमात्र तरीका है। यदि तुम प्रकाश को देखते हो, स्वाभाविक रूप से एक बात निश्चित है: की तुम प्रकाश नहीं हो, तुम ही वह हो जो इसे देख रहे हो। यदि तुम फूल को देखते हो, तो एक बात निश्चित है: तुम फूल नहीं हो, तुम देखने वाले हो।

देखना कुंजी है ध्यान की:

अपने विचारों को देखो।

कुछ भी मत करो – कोई मंत्र नहीं दोहराना है, भगवान के नाम को नहीं दोहराना है- बस जो भी मन कर रहा है उसे देखो। उसे परेशान मत करो, उसे रोको मत, उसे दबाओ मत; अपनी ओर से कुछ मत करो। तुम केवल द्रष्टा बने रहो, और देखने का चमत्कार ही ध्यान है। जैसे ही तुम देखते हो, धीरे-धीरे मन विचारों से खाली हो जाता है, लेकिन तुम सो नहीं जाते हो, तुम अधिक होशपूर्ण होने लगते हो, और अधिक जागरूक होने लगते हो।

जैसे ही मन पूरी तरह से खाली हो जाता है, तुम्हारी पूरी ऊर्जा जागरण की एक लौ बन जाती है। यह लौ ध्यान का परिणाम है। तो तुम कह सकते हो कि ध्यान बिना किसी भी मूल्यांकन के देखने का, साक्षी का, निरीक्षण का दूसरा नाम है। मात्र देखकर, तुम तुरंत मन से बाहर आ जाते हो।

जो भी महर्षि महेश योगी और उनके जैसे अन्य लोग कर रहे हैं वह अच्छा है, लेकिन वे जिस किसी चीज को भी ध्यान का नाम दे रहें हैं वह ध्यान नहीं है। इसी बात पर वे लोगों को गुमराह कर रहे हैं। अगर वे ईमानदार और प्रामाणिक बने रहते और लोगों से कहते कि इससे आपको मानसिक स्वास्थ्य, शारीरिक स्वास्थ्य, एक बेहतर आरामदायक जीवन, और एक शांतिपूर्ण जीवन मिलेगा, तो यह सही होता। लेकिन एक बार जब उन्होंने इसे 'ट्रान्सेंडैंटल मैडिटेशन' कह कर बुलाना शुरू किया, तो उन्होंने एक बहुत ही तुच्छ सी चीज को परम महत्व का बता दिया है जैसा कि बिलकुल भी नहीं है। लोग वर्षों से ट्रान्सेंडैंटल मैडिटेशन करते आ रहे हैं, और पूर्व में तो हजारों वर्षों से ट्रान्सेंडैंटल मैडिटेशन कर रहे हैं। लेकिन यह उनका आत्म-ज्ञान नहीं बना है, और ना ही इससे वे गौतम बुद्ध हो गए हैं।

अगर तुम समझना चाहते हो कि ध्यान वाकई में क्या है, तो गौतम बुद्ध वे पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने इसकी उचित, सटीक परिभाषा दि है - जो है साक्षी होना

ओशो, The Invitation, Talk #21 अंग्रेजी में पढ़ना जारी रखने के लिए : यहां क्लिक करें

ओशो,

ध्यान क्या है?

ध्यान अ-मन की अवस्था है। ध्यान बिना किसी विचार के शुद्ध चेतना की स्थिति है। साधारणता, तुम्हारी चेतना, कचरे से बहुत अधिक भरी हुई है, बस धूल से ढके हुए दर्पण की तरह। मन एक निरंतर चलता ट्राफिक है: विचार चल रहे हैं, इच्छाएं चल रही हैं, स्मृतियां चल रही हैं, महत्वाकांक्षाएं चल रही हैं - यह रात-दिन निरंतर चलने वाला एक ट्राफिक है! यहां तक कि जब तुम सो रहे होते हो तो भी मन कोई न कोई काम कर रहा होता है, वह स्वप्न देख रहा होता है। वह अभी भी सोच रहा है; वह अभी भी चिंताओं और तनावों से भरा है। वह अगले दिन की तैयारी कर रहा है; अंदर ही अंदर तैयारी चल रही होती है।

यह गैर-ध्यान की अवस्था है - इसके ठीक विपरीत है ध्यान। जब कोई ट्राफिक नहीं होता और विचार रुक जाते हैं, कोई विचार नहीं चलते हैं, कोई इच्छा तुम्हें डगमगाती नहीं है, तुम पूरी तरह से मौन होते हो - वह मौन ही ध्यान है। और उस मौन में सत्य जाना जाता है, अन्यथा कभी नहीं। ध्यान अ-मन की अवस्था है।

और तुम मन के द्वारा ध्यान को नहीं पा सकते क्योंकि मन स्वयं को टिकाए रखेगा। तुम मन को अलग रखकर ही ध्यान को पा सकते हो, इसके प्रति शांत, उदासीन और स्वयं को उससे दूर हटाकर; मन को गुजरता देखकर, लेकिन इसके साथ बिना कोई तादात्म्य बनाए, बिना यह सोचे कि "यह मैं हूं।"

ध्यान एक बोध है कि "मैं मन नहीं हूं"। जब यह बोध तुम्हारे भीतर गहरा और गहरा हो जाता है, धीरे-धीरे कुछ क्षण आते हैं - मौन के क्षण, शुद्ध रिक्तता के क्षण, पारदर्शिता के क्षण ऐसे क्षण जब तुम्हारे भीतर कोई हलचल नहीं और सब कुछ ठहरा हुआ होता है। उन ठहरे हुए क्षणों में तुम जान लोगे कि तुम कौन हो, और तुम्हें पता चलेगा कि इस अस्तित्व का क्या रहस्य है।

ओशो, Philosophia Perennis, Vol. 2, Talk #5 अंग्रेजी में पढ़ना जारी रखने के लिए : यहां क्लिक करें

ध्यान क्या है? क्या यह कोई तकनीक है जिसका अभ्यास किया जा सकता है? क्या यह कोई प्रयास है जिसे तुम्हें करना है? क्या यह ऐसा कुछ है जिसे मन हासिल कर सकता है? ऐसा नहीं है।

जो कुछ भी मन कर सकता है वह ध्यान नहीं हो सकता - यह कुछ ऐसा है जो मन के पार है, यहां मन बिल्कुल असहाय है।

मन ध्यान में प्रवेश नहीं कर सकता, जहां मन समाप्त होता है, वहां ध्यान आरंभ होता है। इसे स्मरण रखना होगा, क्योंकि हमारे जीवन में, हम जो भी करते हैं, हम मन के द्वारा करते हैं; जो भी हम प्राप्त करते हैं, हम मन के द्वारा करते हैं।

और फिर, जब हम भीतर की ओर मुड़ते हैं, हम फिर से तकनीक, विधि, क्रिया के अनुसार सोचना शुरू कर देते हैं, क्योंकि पूरे जीवन का अनुभव हमें दिखाता है कि सब कुछ मन से किया जा सकता है। हां - ध्यान को छोड़कर, सब कुछ मन के द्वारा किया जा सकता है।

ध्यान को छोड़कर सब कुछ मन से किया जाता है। क्योंकि ध्यान एक उपलब्धि नहीं है – ऐसा पहले से ही है, यह तुम्हारा स्वभाव है। इसे हासिल नहीं करना है; इसे समझना ही नहीं, इसे स्मरण भर रखना है। यह तुम्हारे लिए प्रतीक्षारत है – बस भीतर की और लौटना, और यह उपलब्ध है। तुम हमेशा-हमेशा से इसे साथ लिए हुए हो।

ध्यान तुम्हारा आंतरिक स्वभाव है। वह तुम हो, वह तुम्हारी आत्मा है, इसका तुम्हारे कर्मों से कोई लेना-देना नहीं है। इसे तुम हासिल नहीं कर सकते। इस पर कब्जा नहीं हो सकता, यह कोई वस्तु नहीं है।

यह तुम हो। यह तुम्हारा होना हैै।

ओशो, Ancient Music in the Pines, Talk #7 अंग्रेजी में पढ़ना जारी रखने के लिए : यहां क्लिक करें

हम जिस ध्यान की बात कर रहें हैं वह किसी का ध्यान नहीं है: ध्यान की एक अवस्था है। अवस्था का मतलब ये है ध्यान का मतलब किसी को स्मरण में लाना नहीं है। ध्यान का मतलब जो सब हमारे स्मरण में है उनको गिरा देना है। और एक स्थिति लानी है कि केवल चेतना मात्र रह जाए, केवल जागरूकता मात्र रह जाए।

यहां हम एक दिया मात्र जलाएं और यहां से सारी चीजें हटा दें तो भी दिया प्रकाश करता रहेगा। वैसे ही अगर हम चित्त से सारे विचार हटा दें, चित्त से सारी कल्पनाएं हटा दें तो क्या होगा? जब सारे विचार, सारी कल्पनाएं हट जाएंगी तो क्या होगा? चेतना अकेली रह जाएगी। चेतना की वो अकेली अवस्था ध्यान है। ध्यान किसी का नहीं करना होता है, ध्यान एक अवस्था है जब चेतना अकेली रह जाती है।

जब चेतना अकेली रह जाए और चेतना के सामने कोई विषय न हो उस अवस्था का नाम ध्यान है। मैं ध्यान का उसी अर्थ में प्रयोग कर रहा हूं।

जो हम प्रयोग करते हैं वो ठीक अर्थों में ध्यान नहीं धारणा है; ध्यान तो उपलब्ध होगा उसके द्वारा जो हम प्रयोग कर रहे हैं। समझ लें रात्रि में हमने प्रयोग किया चक्रों पर, सुबह हम प्रयोग करते है स्वांस पर ये सब धारणा हैं, ये ध्यान नहीं हैं। इस धारणा के माध्यम से एक घड़ी आएगी की स्वांस भी विलीन हो जाएगी। इस धारणा के माध्यम से एक घड़ी आएगी की शरीर भी विलीन हो जाएगा, विचार भी विलीन हो जाएंगे। जब सब विलीन हो जाएगा तो क्या शेष रहेगा? जो शेष रहेगा उसका नाम ध्यान है।

ओशो, ध्यान सूत्र - The Path of Meditation, Talk #6 अंग्रेजी में पढ़ना जारी रखने के लिए : click here

ध्यान की स्थिति एक निर्दोष, मौन की अवस्था है। तुम आनंदपूर्वक अपनी जागरूकता के प्रति अजागरूक हो। तुम हो, लेकिन तुम पूरी तरह से विश्रांत हो। तुम नींद की अवस्था में नहीं हो; तुम पूरी तरह से सजग हो, पहले से कहीं ज्यादा सजग। बल्कि, तुम सजगता हो।

Osho, Walking in Zen, Sitting in Zen, Talk #1 अंग्रेजी में पढ़ना जारी रखने के लिए : यहां क्लिक करें

जब मैं "आंतरिक यात्रा" शब्द का प्रयोग करता हूं, तो मेरा सरल सा अर्थ यह होता है कि तुमने अपनी जीवन की यात्रा में केवल एक ही पहलू को देखा है जो "बाहरी" कहलाता है, अब उस यात्रा के दूसरे पहलु को देखने का प्रयास करो जो "आंतरिक" है। तुम पैसे के पीछे दौड़ते रहे हो, अब ध्यान के पीछे दौड़ो। तुम सत्ता के पीछे दौड़ते रहे हो, अब ईश्वर के पीछे दौड़ो। दोनों ही दौड़ हैं। एक बार तुम ध्यान के पीछे दौड़ना शुरू करोगे तो एक दिन मैं तुमसे कहूंगा, "अब ध्यान भी छोड़ दो। अब दौड़ना बंद करो।" और जब तुम दौड़ना बंद कर देते हो तो वास्तविक ध्यान घटता है।

मौन में बैठे हुए,

कुछ न करते हुए,

वसंत आता है,

और घास स्वयं ही उगती है।

तो ध्यान के दो अर्थ हैं। यही कारण है कि भारत में हमारे पास इसके लिए दो शब्द हैं: ध्यान और समाधि। ध्यान कुछ समय के लिए होता है, ध्यान कभी किया कभी नहीं किया; समाधि का अर्थ है कि अब तुम घर पहुंच गए, अब ध्यान करने की आवश्यकता नहीं रही। जब ध्यान करने की भी आवश्यकता नहीं होती, तो व्यक्ति ध्यानमय होता है - इससे पहले कभी नहीं। जब कोई ध्यान में जीता हो, ध्यान में चलता हो, ध्यान में सोता हो, जब व्यक्ति के होने का ढंग ही केवल ध्यान हो, तो व्यक्ति पहुंच गया।

;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;

क्या है ध्यान ?-

10 FACTS;-

ध्यान कोई भारतीय विधि नहीं है और यह केवल एक विधि मात्र भी नहीं है। तुम इसे सीख नहीं सकते। तुम्हारी संपूर्ण जीवन चर्या का, तुम्हारी संपूर्ण जीवन चर्या में यह एक विकास है। ध्यान कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे, जैसे कि तुम हो, उसमें जोड़ा जा सके। यह एक मौलिक रूपांतरण है जो कि तुम्हारे स्वयं के उपर उठने के द्वारा ही आ सकता है। यह एक खिलावट है, यह विकसित होना है। विकास सदा ही पूर्ण होने से होता है, यह कुछ और जोड़ना नहीं है। तुम्हें ध्यान की ओर विकसित होना पड़ेगा।

व्यक्ति की इस समग्र खिलावट को ठीक से समझ लेना चाहिए। अन्यथा कोई अपने साथ खेल, खेल सकता है, वह अपने ही मन की तरकीबों में उलझ सकता है। और बहुत सी तरकीबें है। उनके द्वारा न केवल तुम मूर्ख बनोगे, उनके द्वारा न केवल तुम कुछ नहीं पाओगे, बल्कि वास्तविक अर्थ में तुम्हें उनसे नुकसान ही होगा। यह मान लेना कि ध्यान की कोई तरकीब है- ध्यान की एक विधि के रूप में कल्पना करना- आधारभूत रूप से गलत है। और जब कोई व्यक्ति मन की चालाकियों में रस लेने लगता है तब मन की गुणवत्ता नष्ट होने लगती है।

जैसे कि मन है, यह गैर-ध्यान पूर्ण है। ध्यान के घटित होने से पूर्व संपूर्ण मन का रूपांतरण होना चाहिए। मन सदा व्याख्या करता है। तुम शब्दों को जान सकते हो, तुम भाषा को जान सकते हो, तुम विचार की प्रक्रिया को, उसकी संरचना को जान सकते हो, लेकिन यह विचारणा नहीं है। बल्कि इसके विपरीत यह विचारणा से पलायन है। तुम एक फूल देखते हो, और तुम इसकी व्याख्या करते हो। मन प्रत्येक आकार को, वस्तु को शब्दों में रूपांतरित कर सकता है। तब शब्द एक कारागृह, एक अवरोध बन जाते हैं।वस्तुओं का शब्दों में,उनके

होने का ; उनके अस्तित्व का, शब्दों में निरंतर बंध जाना ध्यान पूर्ण चित्त के लिए बाधा है।

इसलिये ध्यान पूर्ण चित्त के लिए प्रथम आवश्यकता है, चीजों की व्याख्या करने की इस आदत के प्रति सतत जागरुकता और इसको रोक सकने की योग्यता।

वस्तुओं को मात्र देखो, उनकी व्याख्या मत करो। उनकी उपस्थिति के प्रति बोध पूर्ण रहो; किंतु उनको शब्दों में मत बदलो। वस्तुओं को होने दो, भाषा के बिना, व्यक्तियों को होने दो, भाषा के बिना, परिस्थितियों को होने दो, भाषा के बिना। यह असंभव नहीं है, यह स्वाभाविक है। अभी जो स्थिति है कृत्रिम तो वह है, लेकिन हमारी ऐसी आदत पड़ गई है, यह सब इतना यांत्रिक हो गया है, कि हमें इसका बोध भी नहीं रहता कि हम निरंतर अनुभवों को शब्दों में रूपांतरित कर रहे हैं।

सूर्योदय है, तुम कभी इसको ‘देखने’ और ‘इसकी व्याख्या करने’ के अंतराल के प्रति जागरुक नहीं होते। तुम सूर्य को देखते हो, तुम इसे अनुभव करते हो और तुरंत ही तुम इसकी व्याख्या कर देते हो। देखने और व्याख्या के बीच का अंतराल खो जाता है। यह तथ्य; एक उपस्थिति है। मन स्वतः ही अनुभवों को शब्दों में रूपांतरित कर लेता है। तब ये शब्द, तुम्हारे और अनुभव के मध्य में आ जाते हैं।

ध्यान का अर्थ है- शब्दों के बिना जीना, भाषा रहित होकर जीना। कभी-कभी यह सहज स्फूर्त रूप से घटित हो जाता है। जब तुम प्रेम में होते हो, उपस्थिति अनुभव होती है, भाषा नहीं। जब दो प्रेमी एक दूसरे के प्रति आत्मीयता से भरे होते हैं, तो मौन हो जाते हैं। ऐसा नहीं है कि वहां अभिव्यक्त करने को कुछ नहीं है। इसके विपरीत इस समय अभिव्यक्ति के लिए बहुत कुछ उद्वेलित होता है। किंतु शब्द वहां कभी नहीं होते, वे हो भी नहीं सकते। वे सिर्फ तब आते हैं, जब प्रेम जा चुकता है।

यदि दो प्रेमी कभी मौन न हों, तो यह एक संकेत है कि प्रेम मर चुका है। अब वे उस अंतराल को शब्दों से भर रहे हैं। जब प्रेम जीवित होता है, शब्द वहां नहीं होते, क्योंकि प्रेम की उपस्थिति इतनी उद्वेलित करने वाली, इतनी पैनी होती है कि भाषा और शब्दों का अवरोध पार हो जाता है और सामान्यतः यह सिर्फ प्रेम में ही पार होता है।ध्यान प्रेम की पराकाष्ठा

है। किसी एक व्यक्ति के प्रति प्रेम नहीं, वरन समग्र अस्तित्त्व के प्रति जीवंत संबंध है, जो तुम्हें घेरे हुए है।

यदि तुम किसी भी परिस्थिति में प्रेममय रह सको तो तुम ध्यान में हो।और यह कोई मन की तरकीब नहीं है। यह कोई मन को स्थिर करने की विधि नहीं है। बल्कि इसके लिए मन की यंत्रवत होने की गहन समझ अनिवार्य है। जिस पल तुम व्याख्या की, अस्तित्त्व को शब्दों में बदलने की, अपनी यांत्रिक आदत को समझते हो, एक अंतराल उत्पन्न हो जाता है। यह सहज स्फूर्त आता है। यह समझ का एक छाया की भांति अनुगमन करता है।वास्तविक

समस्या यह नहीं है, कि ध्यान में कैसे हों, बल्कि यह जानना है कि ध्यान में तुम क्यों नहीं हो।ध्यान की पूरी प्रक्रिया निषेधात्मक है। यह तुममें कुछ जोड़ना नहीं है, यह कुछ घटाता है जो पहले से ही जोड़ दिया गया है।

समाज भाषा के बिना नहीं रह सकता, इसे भाषा चाहिए ही। किंतु अस्तित्त्व को इसकी जरूरत नहीं है। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि तुम्हें भाषा के बिना रहना चाहिए। तुम्हें इसका प्रयोग तो करना ही पड़ेगा। किंतु तुम्हें इस योग्य होना चाहिए कि व्याख्या करने की यांत्रिक आदत को रोक सको और जीना शुरू कर सको। जब तुम एक सामाजिक प्राणी के रूप में होते हो, तो भाषा की यांत्रिक आदत आवश्यक है; किंतु जब तुम अस्तित्त्व के साथ अकेले हो तो तुम्हें इस योग्य होना पड़ेगा कि इसे रोक सको। यदि तुम इसे बंद नहीं कर सकते तो यह लगातार चलती चली जाती है, और तुम इसे रोकने में असमर्थ हो, तब तुम इसके गुलाम बन गये हो।

मन को एक उपकरण होना चाहिए, मालिक नहीं। जब मन मालिक होता है, यह एक गैर ध्यान पूर्ण अवस्था होती है। जब तुम मालिक होते हो, तुम्हारी चेतना मालिक होती है, तब यह एक ध्यान पूर्ण अवस्था होती है। इसलिये ध्यान का अर्थ है, मन की यांत्रिक आदत का मालिक हो जाना। मन और मन की भाषा संसार में उपयोगी है लेकिन परम सत्य को जानने में बाधा है। तुम इसके पार हो, अस्तित्त्व इसके पार है। चेतना भाषा से परे है, अस्तित्त्व भाषा से परे है। जब चेतना और अस्तित्त्व एक हों, वे संवाद में होते हैं। यह संवाद ही ध्यान है।

भाषा को छोड़ना पड़ेगा। मेरा अर्थ यह नहीं है कि तुम्हें इसे दमित या फेंक देना पड़ेगा। मेरा अर्थ सिर्फ इतना है कि यह तुम्हारे लिए दिन के चौबीसो घंटो की आदत न बनी रहे। जब तुम चलते हो तो तुम अपने पांवो को गतिमान करते हो। किंतु यदि तुम बैठे हो और तब भी वे गतिमान रहें तो तुम पागल हो। तुम्हें इस योग्य होना पड़ेगा कि उन्हें रोक सको। ठीक इसी तरह जब तुम किसी से बातचीत नहीं कर रहे हो भाषा को वहां नहीं होना चाहिए। यह तो संवाद का माध्यम है। जब तुम किसी के साथ संवाद नहीं कर रहे हो, तो यह वहां नहीं होनी चाहिए।

यदि तुम ऐसा करने में समर्थ हो तो तुम ध्यान में विकसित हो सकते हो। ध्यान एक विकसित होने की सतत प्रक्रिया है, कोइ ठहरी हुइ स्थिती या विधी नहीं। विधी सदा ही मृत होती है, इसलिये यह तुममें जोड़ी जा सकती है, किंतु प्रक्रिया सदा जीवंत है। यह विकसित होती है, इसका विस्तार होता है।भाषा आवश्यक है, किंतु तुम्हें सदा इसमें नहीं रहना

चाहिए। कुछ पल ऐसे होने चाहिए, जब कोई व्याख्या न हो, बस तुम हो। इसका अर्थ यह नहीं है कि तुम मात्र पौधों की तरह हो। चेतना तो वहां है ही और यह अधिक पैनी, अधिक जीवंत होती है, क्योंकि भाषा इसे मंद कर देती है। भाषा पुनरूक्त होने के लिए बाध्य है, इसलिये यह ऊब पैदा करती है। तुम्हारे लिए भाषा जितनी अधिक महत्त्व पूर्ण होगी, उतना ही तुम अधिक ऊबोगे।

इसलिये मेरे लिए ध्यान कोई विधि नहीं बल्कि एक प्रक्रिया है; ध्यान कोई विधि नहीं , बल्कि एक समझ है। यह सिखाया नहीं जा सकता, इसका मात्र संकेत दिया जा सकता है। तुम्हें इसके बारे में सूचित नहीं किया जा सकता क्योंकि कोई सूचना, वास्तविक रूप से सूचना नहीं है। क्योंकि यह बाहर से है, और ध्यान तुम्हारी अपनी भीतरी गहराइयों से आता है।

इसलिये खोजो, खोजी हो जाओ, और शिष्य मत बनो। तब तुम किसी एक गुरु के शिष्य नहीं होगे बल्कि समस्त जीवन के शिष्य होगे। तब तुम मात्र शब्दों को नहीं सीख रहे होगे। आध्यात्मिक सीख शब्दों से नहीं आ सकती, बल्कि अंतरालों से, उस मौन से जो तुम्हें सदा घेरे हुए है, आती है। वे भीड़ में, हाट में, बाजार में भी हैं। मौन को खोजो, अंदर और बाहर अंतरालों को खोजो और एक दिन तुम पाओगे कि तुम ध्यान में हो।

ध्यान तुम तक आता है। यह सदा आता है, तुम इसे ला नहीं सकते। किंतु तुम्हें इसकी खोज में होना पड़ेगा, क्योंकि जब तुम खोज में होते होगे, तभी तुम इसके प्रति खुल जाआगे, उपलब्ध होओगे, अब तुम इसके मेजबान हो। ध्यान अतिथि है। तुम इसे निमंत्रित कर सकते हो और इसकी प्रतीक्षा कर सकते हो। यह बुद्ध के पास आता है, जीसस के पास आता है, यह हर उस व्यक्ति के पास आता है, जो तैयार है, जो खुला है और खोज रहा है।

किंतु इसे कहीं और से मत सीखो; अन्यथा तुम धोखा खा जाओगे। मन सदा किसी सुगमतर को खोजता है। यह शोषण का कारण बन जाता है। तब गुरु हैं और गुरु परंपरायें हैं, और आध्यात्मिक जीवन विषाक्त हो जाता है। सर्वाधिक खतरनाक व्यक्ति वह है जो किसी की आध्यात्मिक मांग का शोषण करता है। यदि कोई तुम्हारी संपदा पर डाका डाले, तो यह इतना खतरनाक नहीं है, यदि कोई तुम्हें असफल करता है, तो यह इतनी गंभीर बात नहीं है, किंतु यदि कोई तुम्हें मूर्ख बनाकर और तुम्हें तुम्हारी ध्यान की, दिव्यता की, समाधि की ओर जो प्यास है उसको मिटाता है या स्थगित भी करता है, तो यह पाप बहुत बड़ा और अक्षम्य है।

किंतु ऐसा किया जा रहा है। इसलिये इसके प्रति सावधान रहो और किसी से मत पूछो, ध्यान क्या है? मैं ध्यान कैसे करूं? इसके स्थान पर पूछो, बाधायें क्या हैं? रुकावटें क्या हैं? पूछो, हम सदा ध्यान में क्यों नहीं होतेः विकास कहां रुक गया हैः हम कहां पंगु हो गये हैं? और गुरु मत खोजो क्योंकि गुरु पंगु बना रहे हैं। कोई भी जो तुम्हें पूर्व निर्मित सूत्र देता है, मित्र नहीं अपितु शत्रु है।

अंधःकार में टटोलो क्योंकि और कुछ भी नहीं किया जा सकता। यह टटोलना ही समझ बनेगा जो तुम्हें अंधकार से मुक्त करेगा। जीसस ने कहा है, ‘सत्य स्वतंत्रता है।’ इस स्वतंत्रता को समझो। सत्य सदा समझ के माध्यम से आता है। यह कुछ ऐसा नहीं है कि तुम इससे मिलो और साक्षात्कार करो, यह कुछ ऐसा है जिसमें तुम विकसित होते हो। इसलिये समझ की खोज में रहो, क्योंकि जितना अधिक समझपूर्ण तुम होगे, उतना ही तुम सत्य के निकटतर होगे। और किसी अज्ञात, अनपेक्षित, अ-पूर्व कल्पनीय पल में, जब समझ अपनी चरमावस्था पर आती है, तुम खाई मे होते हो। अब तुम नहीं रहते और ध्यान घटित हो जाता है।

जब तुम नहीं होते, तब तुम ध्यान में हो। ध्यान तुम्हारा न होना है, यह सदा तुमसे पार है। जब तुम खाई में होते हो, ध्यान वहां होता है। तब अहंकार नहीं होता; तब तुम नहीं होते। तब अस्तित्त्व होता है। यही है, जो धर्मों का परमात्मा से, परम अस्तित्त्व से अर्थ है। यह सार है, सारे धर्मों का, सारी खोजों का किंतु यह तुम्हें कहीं भी पूव-निर्मित नहीं मिलेगा। इसलिये उनसे सावधान रहो, जो इसके बारे में दावा करते हैं।

टटोलते रहो और असफलता से मत डरो। असफलता को स्वीकार करो, किंतु वे ही असफलतायें फिर-फिर मत दोहराओ। एक बार पर्याप्त है, यही काफी है।

;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;

ध्यान का मूलभूत सूत्र;-

निर्विचार चेतना ध्यान है। और निर्विचार होने के लिए विचारों के प्रति जागना ही विधि है।

विचारों का सतत प्रवाह है मन। इस प्रवाह के प्रति मूर्च्छित होना - सोये होना , अजाग्रत होना -साधारणतः हमारी स्थिति है। इस मूर्च्छा से पैदा होता है तादात्म्य। " मैं " मन ही मन मालूम होने लगता है।

जागें और विचारों को देखें । जैसे कोई राह चलते लोगों को किनारे खडे़ होकर देखे । बस , इस जागकर देखने से क्रांति घटित होती है ।

विचारों से स्वयं का तादात्म्य टूटता है।

इस तादात्म्य - भंग के अंतिम छोर पर ही निर्विचार - चेतना का जन्म होता ह । ऐसे ही जैसे आकाश में बादल हट जावें तो आकाश दिखाई पड़ता है। विचारों से रिक्त चित्ताकाश ही स्वयं की मौलिक स्थिति है। वही समाधि है।

ध्यान है विधि। समाधि है उपलब्धि।

लेकिन ध्यान के संबंध में सोचें मत। ध्यान के संबंध में विचारना भी विचार ही है। उसमें तो जायें। डूबें

ध्यान को सोचें मत -- चखें

मन का काम है सोना और सोचना, जागने में उसकी मृत्यु है। और ध्यान है जागना

इसलिए मन कहता है : ' चलो -- ध्यान के संबंध में ही सोचें ! ' यह उसकी आत्मरक्षा का अंतिम उपाय है। इससे सावधान होना। सोचने की जगह, देखने पर बल देना।

विचार नहीं, दर्शन -- बस यही मूलभूत सूत्र है। दर्शन बढ़ता है, तो विचार क्षीण होते हैं। साक्षी जागता है, तो स्वप्न विलीन होता है।

ध्यान आता है तो मन जाता है। मन है द्वार , संसार का ध्यान है द्वार , मोक्ष का

मन से जिसे पाया है, ध्यान में वह खो जाता है। मन से जिसे खोया है, ध्यान में वह मिल जाता है।

;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;

'ध्यान कैसे करें?-

10 FACTS;-

'ध्यान कैसे करें?' यह पूछने की कोई आवश्यकता नहीं है कि ध्यान कैसे करें, बस पूछें कि कैसे स्वयं को खाली रखें। ध्यान सहज घटता है। बस पूछो कि कैसे खाली रहना है, बस इतना ही। यह ध्यान की कुल तरकीब है ...कैसे खाली रहना है। तब आप कुछ भी नहीं करेंगे और ध्यान का फूल खिलेगा।

जब तुम कुछ भी नहीं करते तब ऊर्जा केंद्र की तरफ बढ़ती है, यह केंद्र की ओर एकत्रित हो जाती है। जब तुम कुछ करते हो तो ऊर्जा बाहर निकलती है। करना बाहर की ओर जाने का एक मार्ग है। ना करना भीतर की ओर जाने का एक मार्ग है। किसी कार्य को करना पलायन है। तुम बाइबिल पढ़ सकते हो, तुम इसे एक कार्य बना सकते हो। धार्मिक कार्य और धर्मनिरपेक्ष कार्य के बीच कोई अंतर नही है: सभी कार्य, कार्य हैं, और वे तुम्हें तुम्हारी चेतना से बाहर की ओर ले जाने में मदद करते हैं। वे बाहर रहने के लिए बहाने हैं।

मनुष्य अज्ञानी और अंधा है, और वह अज्ञानी और अंधा बने रहना चाहता है, क्योंकि स्वयं के भीतर आना अराजकता में प्रवेश करने की भांती लगता है। और ऐसा ही है; अपने भीतर तुमने एक अराजकता निर्मित कर ली है। तुम्हें इसका सामना करना होगा और इससे होकर गुजरना होगा। साहस की आवश्यकता है – साहस- स्वयं होने का, साहस- भीतर जाने का। ध्यानपूर्वक होने का साहस; –

इस साहस से बड़ा साहस मैंने नहीं जाना है।

तो ध्यान क्या है? ध्यान है केवल स्वयं की उपस्थिति में आनंदित होना; ध्यान स्वयं में होने का आनंद है। यह बहुत सरल है - चेतना की पूरी तरह से विश्रांत अवस्था जहां तुम कुछ भी नहीं कर रहे होते। जिस क्षण तुम्हारे भीतर कर्ता भाव प्रवेश करता है तुम तनाव में आ जाते हो; चिंता तुरंत तुम्हारे भीतर प्रवेश कर जाती है। कैसे करें? क्या करें? सफल कैसे हों? असफलता से कैसे बचें? तुम पहले ही भविष्य में चले जाते हो।

यदि तुम विचार कर रहे हो, तो तुम क्या विचार कर सकते हो? तुम अज्ञात पर कैसे विचार कर सकते हो? तुम केवल ज्ञात पर विचार कर सकते हो। तुम इसे बार-बार चबा सकते हो, लेकिन यह ज्ञात है। यदि तुम जीसस के बारे में कुछ जानते हो, तो तुम इस पर बार-बार चिंतन कर सकते हो; अगर तुम कृष्णा के बारे में कुछ जानते हो, तो तुम इस पर बार-बार चिंतन कर सकते हो; तुम संशोधन, बदलाहट, सजावट किए जा सकते हो - लेकिन यह तुम्हें अज्ञात की ओर ले जाने वाला नहीं है। और "ईश्वर" अज्ञात है।

ध्यान मात्र होना है, बिना कुछ किए - कोई कार्य नहीं, कोई विचार नहीं, कोई भाव नहीं। तुम बस हो। और यह एक कोरा आनंद है। जब तुम कुछ नहीं करते हो तो यह आनंद कहां से आता है? यह कहीं से नहीं आता या फिर हर जगह से आता है। यह अकारण है, क्योंकि अस्तित्व आनंद नाम की वस्तु से बना है। इसे किसी कारण की आवश्यकता नहीं है। यदि तुम अप्रसन्न हो तो तुम्हारे पास अप्रसन्नता का कारण है; अगर तुम प्रसन्न हो तो तुम बस प्रसन्न हो - इसके पीछे कोई कारण नहीं है। तुम्हारा मन कारण खोजने की कोशिश करता है क्योंकि यह अकारण पर विश्वास नहीं कर सकता, क्योंकि यह अकारण को नियंत्रित नहीं कर सकता - जो अकारण है उससे दिमाग बस नपुंसक हो जाता है। तो मन कुछ ना कुछ कारण खोजने में लग जाता है।

लेकिन मैं तुम्हें बताना चाहता हूं कि जब भी तुम आनंदित होते हो, तो तुम किसी भी कारण से आनंदित नहीं होते, जब भी तुम अप्रसन्न होते हो, तो तुम्हारे पास अप्रसन्नता का कोई कारण होता है - क्योंकि आनंद ही वह चीज है जिससे तुम बने हो। यह तुम्हारी ही चेतना है, यह तुम्हारा ही अंतरतम है। प्रसन्नता तुम्हारा अंतरतम है।

ध्यान की शुरुआत खुद को मन से अलग करने से होती है, एक साक्षी बनने से। खुद को किसी भी चीज से अलग करने का यही एकमात्र तरीका है। यदि तुम प्रकाश को देखते हो, स्वाभाविक रूप से एक बात निश्चित है: की तुम प्रकाश नहीं हो, तुम ही वह हो जो इसे देख रहे हो। यदि तुम फूल को देखते हो, तो एक बात निश्चित है: तुम फूल नहीं हो, तुम देखने वाले हो।

देखना कुंजी है ध्यान की:

अपने विचारों को देखो।

कुछ भी मत करो – कोई मंत्र नहीं दोहराना है, भगवान के नाम को नहीं दोहराना है- बस जो भी मन कर रहा है उसे देखो। उसे परेशान मत करो, उसे रोको मत, उसे दबाओ मत; अपनी ओर से कुछ मत करो। तुम केवल द्रष्टा बने रहो, और देखने का चमत्कार ही ध्यान है। जैसे ही तुम देखते हो, धीरे-धीरे मन विचारों से खाली हो जाता है, लेकिन तुम सो नहीं जाते हो, तुम अधिक होशपूर्ण होने लगते हो, और अधिक जागरूक होने लगते हो।

जैसे ही मन पूरी तरह से खाली हो जाता है, तुम्हारी पूरी ऊर्जा जागरण की एक लौ बन जाती है। यह लौ ध्यान का परिणाम है। तो तुम कह सकते हो कि ध्यान बिना किसी भी मूल्यांकन के देखने का, साक्षी का, निरीक्षण का दूसरा नाम है। मात्र देखकर, तुम तुरंत मन से बाहर आ जाते हो।

जो भी महर्षि महेश योगी और उनके जैसे अन्य लोग कर रहे हैं वह अच्छा है, लेकिन वे जिस किसी चीज को भी ध्यान का नाम दे रहें हैं वह ध्यान नहीं है। इसी बात पर वे लोगों को गुमराह कर रहे हैं। अगर वे ईमानदार और प्रामाणिक बने रहते और लोगों से कहते कि इससे आपको मानसिक स्वास्थ्य, शारीरिक स्वास्थ्य, एक बेहतर आरामदायक जीवन, और एक शांतिपूर्ण जीवन मिलेगा, तो यह सही होता। लेकिन एक बार जब उन्होंने इसे 'ट्रान्सेंडैंटल मैडिटेशन' कह कर बुलाना शुरू किया, तो उन्होंने एक बहुत ही तुच्छ सी चीज को परम महत्व का बता दिया है जैसा कि बिलकुल भी नहीं है। लोग वर्षों से ट्रान्सेंडैंटल मैडिटेशन करते आ रहे हैं, और पूर्व में तो हजारों वर्षों से ट्रान्सेंडैंटल मैडिटेशन कर रहे हैं। लेकिन यह उनका आत्म-ज्ञान नहीं बना है, और ना ही इससे वे गौतम बुद्ध हो गए हैं।

अगर तुम समझना चाहते हो कि ध्यान वाकई में क्या है, तो गौतम बुद्ध वे पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने इसकी उचित, सटीक परिभाषा दि है - जो है साक्षी होना

ध्यान क्या है?

ध्यान अ-मन की अवस्था है। ध्यान बिना किसी विचार के शुद्ध चेतना की स्थिति है। साधारणता, तुम्हारी चेतना, कचरे से बहुत अधिक भरी हुई है, बस धूल से ढके हुए दर्पण की तरह। मन एक निरंतर चलता ट्राफिक है: विचार चल रहे हैं, इच्छाएं चल रही हैं, स्मृतियां चल रही हैं, महत्वाकांक्षाएं चल रही हैं - यह रात-दिन निरंतर चलने वाला एक ट्राफिक है! यहां तक कि जब तुम सो रहे होते हो तो भी मन कोई न कोई काम कर रहा होता है, वह स्वप्न देख रहा होता है। वह अभी भी सोच रहा है; वह अभी भी चिंताओं और तनावों से भरा है। वह अगले दिन की तैयारी कर रहा है; अंदर ही अंदर तैयारी चल रही होती है।

यह गैर-ध्यान की अवस्था है - इसके ठीक विपरीत है ध्यान। जब कोई ट्राफिक नहीं होता और विचार रुक जाते हैं, कोई विचार नहीं चलते हैं, कोई इच्छा तुम्हें डगमगाती नहीं है, तुम पूरी तरह से मौन होते हो - वह मौन ही ध्यान है। और उस मौन में सत्य जाना जाता है, अन्यथा कभी नहीं। ध्यान अ-मन की अवस्था है।

और तुम मन के द्वारा ध्यान को नहीं पा सकते क्योंकि मन स्वयं को टिकाए रखेगा। तुम मन को अलग रखकर ही ध्यान को पा सकते हो, इसके प्रति शांत, उदासीन और स्वयं को उससे दूर हटाकर; मन को गुजरता देखकर, लेकिन इसके साथ बिना कोई तादात्म्य बनाए, बिना यह सोचे कि "यह मैं हूं।"

ध्यान एक बोध है कि "मैं मन नहीं हूं"। जब यह बोध तुम्हारे भीतर गहरा और गहरा हो जाता है, धीरे-धीरे कुछ क्षण आते हैं - मौन के क्षण, शुद्ध रिक्तता के क्षण, पारदर्शिता के क्षण ऐसे क्षण जब तुम्हारे भीतर कोई हलचल नहीं और सब कुछ ठहरा हुआ होता है। उन ठहरे हुए क्षणों में तुम जान लोगे कि तुम कौन हो, और तुम्हें पता चलेगा कि इस अस्तित्व का क्या रहस्य है।

ध्यान क्या है? क्या यह कोई तकनीक है जिसका अभ्यास किया जा सकता है? क्या यह कोई प्रयास है जिसे तुम्हें करना है? क्या यह ऐसा कुछ है जिसे मन हासिल कर सकता है? ऐसा नहीं है।

जो कुछ भी मन कर सकता है वह ध्यान नहीं हो सकता - यह कुछ ऐसा है जो मन के पार है, यहां मन बिल्कुल असहाय है।

मन ध्यान में प्रवेश नहीं कर सकता, जहां मन समाप्त होता है, वहां ध्यान आरंभ होता है। इसे स्मरण रखना होगा, क्योंकि हमारे जीवन में, हम जो भी करते हैं, हम मन के द्वारा करते हैं; जो भी हम प्राप्त करते हैं, हम मन के द्वारा करते हैं।

और फिर, जब हम भीतर की ओर मुड़ते हैं, हम फिर से तकनीक, विधि, क्रिया के अनुसार सोचना शुरू कर देते हैं, क्योंकि पूरे जीवन का अनुभव हमें दिखाता है कि सब कुछ मन से किया जा सकता है। हां - ध्यान को छोड़कर, सब कुछ मन के द्वारा किया जा सकता है।

ध्यान को छोड़कर सब कुछ मन से किया जाता है। क्योंकि ध्यान एक उपलब्धि नहीं है – ऐसा पहले से ही है, यह तुम्हारा स्वभाव है। इसे हासिल नहीं करना है; इसे समझना ही नहीं, इसे स्मरण भर रखना है। यह तुम्हारे लिए प्रतीक्षारत है – बस भीतर की और लौटना, और यह उपलब्ध है। तुम हमेशा-हमेशा से इसे साथ लिए हुए हो।

ध्यान तुम्हारा आंतरिक स्वभाव है। वह तुम हो, वह तुम्हारी आत्मा है, इसका तुम्हारे कर्मों से कोई लेना-देना नहीं है। इसे तुम हासिल नहीं कर सकते। इस पर कब्जा नहीं हो सकता, यह कोई वस्तु नहीं है।यह तुम

हो। यह तुम्हारा होना हैै।

हम जिस ध्यान की बात कर रहें हैं वह किसी का ध्यान नहीं है: ध्यान की एक अवस्था है। अवस्था का मतलब ये है ध्यान का मतलब किसी को स्मरण में लाना नहीं है। ध्यान का मतलब जो सब हमारे स्मरण में है उनको गिरा देना है। और एक स्थिति लानी है कि केवल चेतना मात्र रह जाए, केवल जागरूकता मात्र रह जाए।

यहां हम एक दिया मात्र जलाएं और यहां से सारी चीजें हटा दें तो भी दिया प्रकाश करता रहेगा। वैसे ही अगर हम चित्त से सारे विचार हटा दें, चित्त से सारी कल्पनाएं हटा दें तो क्या होगा? जब सारे विचार, सारी कल्पनाएं हट जाएंगी तो क्या होगा? चेतना अकेली रह जाएगी। चेतना की वो अकेली अवस्था ध्यान है। ध्यान किसी का नहीं करना होता है, ध्यान एक अवस्था है जब चेतना अकेली रह जाती है।

जब चेतना अकेली रह जाए और चेतना के सामने कोई विषय न हो उस अवस्था का नाम ध्यान है। मैं ध्यान का उसी अर्थ में प्रयोग कर रहा हूं।

जो हम प्रयोग करते हैं वो ठीक अर्थों में ध्यान नहीं धारणा है; ध्यान तो उपलब्ध होगा उसके द्वारा जो हम प्रयोग कर रहे हैं। समझ लें रात्रि में हमने प्रयोग किया चक्रों पर, सुबह हम प्रयोग करते है स्वांस पर ये सब धारणा हैं, ये ध्यान नहीं हैं। इस धारणा के माध्यम से एक घड़ी आएगी की स्वांस भी विलीन हो जाएगी। इस धारणा के माध्यम से एक घड़ी आएगी की शरीर भी विलीन हो जाएगा, विचार भी विलीन हो जाएंगे। जब सब विलीन हो जाएगा तो क्या शेष रहेगा? जो शेष रहेगा उसका नाम ध्यान है।

ध्यान की स्थिति एक निर्दोष, मौन की अवस्था है। तुम आनंदपूर्वक अपनी जागरूकता के प्रति अजागरूक हो। तुम हो, लेकिन तुम पूरी तरह से विश्रांत हो। तुम नींद की अवस्था में नहीं हो; तुम पूरी तरह से सजग हो, पहले से कहीं ज्यादा सजग। बल्कि, तुम सजगता हो।

जब मैं "आंतरिक यात्रा" शब्द का प्रयोग करता हूं, तो मेरा सरल सा अर्थ यह होता है कि तुमने अपनी जीवन की यात्रा में केवल एक ही पहलू को देखा है जो "बाहरी" कहलाता है, अब उस यात्रा के दूसरे पहलु को देखने का प्रयास करो जो "आंतरिक" है। तुम पैसे के पीछे दौड़ते रहे हो, अब ध्यान के पीछे दौड़ो। तुम सत्ता के पीछे दौड़ते रहे हो, अब ईश्वर के पीछे दौड़ो। दोनों ही दौड़ हैं। एक बार तुम ध्यान के पीछे दौड़ना शुरू करोगे तो एक दिन मैं तुमसे कहूंगा, "अब ध्यान भी छोड़ दो। अब दौड़ना बंद करो।" और जब तुम दौड़ना बंद कर देते हो तो वास्तविक ध्यान घटता है।

तो ध्यान के दो अर्थ हैं। यही कारण है कि भारत में हमारे पास इसके लिए दो शब्द हैं: ध्यान और समाधि। ध्यान कुछ समय के लिए होता है, ध्यान कभी किया कभी नहीं किया; समाधि का अर्थ है कि अब तुम घर पहुंच गए, अब ध्यान करने की आवश्यकता नहीं रही। जब ध्यान करने की भी आवश्यकता नहीं होती, तो व्यक्ति ध्यानमय होता है - इससे पहले कभी नहीं। जब कोई ध्यान में जीता हो, ध्यान में चलता हो, ध्यान में सोता हो, जब व्यक्ति के होने का ढंग ही केवल ध्यान हो, तो व्यक्ति पहुंच गया।

क्या है अशरीरी अनुभव ?

Out of Body Experience;-

धर्म है जीवन और मृत्यु की कला। अगर जानना है कि जीवन क्या है और मृत्यु क्या है, तो आपको स्वेच्छा से शरीर से ऊर्जा को खींचने की कला सीखनी होगी, तभी आप जान सकते हैं, अन्यथा नहीं। और यह ऊर्जा खींची जा सकती है। इस ऊर्जा को खींचना कठिन नहीं है। इस ऊर्जा को खींचना सरल है। यह ऊर्जा संकल्प से ही फैलती है और संकल्प से ही वापस लौट आती है। यह ऊर्जा सिर्फ संकल्प का विस्तार है, विल फोर्स का विस्तार है।

संकल्प हम करें तीव्रता से, टोटल, समग्र, कि मैं वापस लौटता हूं अपने भीतर। सिर्फ आधा घंटा भी कोई इस बात का संकल्प करे कि मैं वापस लौटना चाहता हूं, मैं मरना चाहता हूं? मैं डूबना चाहता हूं अपने भीतर, मैं अपनी सारी ऊर्जा को सिकोड़ लेना चाहता हूं, तो थोड़े ही दिनों में वह इस अनुभव के करीब पहुंचने लगेगा कि ऊर्जा सिकुड़ने लगी है भीतर। शरीर छूट जाएगा बाहर पड़ा हुआ। एक तीन महीने का थोड़ा गहरा प्रयोग, और आप शरीर अलग पड़ा है, इसे देख सकते हैं। अपना ही शरीर अलग पड़ा है, इसे देख सकते हैं। सबसे पहले तो भीतर से दिखाई पड़ेगा कि मैं अलग खड़ा हूं भीतर—एक तेजस, एक ज्योति की तरह और सारा शरीर भीतर से दिखाई पड़ रहा है जैसा कि यह भवन है। और फिर थोड़ी और हिम्मत जुटाई जाए, तो वह जो जीवंत—ज्योति भीतर है, उसे बाहर भी लाया जा सकता है। और हम बाहर से देख सकते हैं कि शरीर अलग पड़ा है।

एक अदभुत अनुभव मुझे हुआ, वह मैं कहूं। अब तक उसे कभी कहा नहीं। अचानक खयाल आ गया कहता हूं। कोई सत्रह— अट्ठारह साल पहले बहुत रातों तक मैं एक वृक्ष के ऊपर बैठकर ध्यान करता था। ऐसा बार—बार अनुभव हुआ कि जमीन पर बैठकर ध्यान करने पर शरीर बहुत प्रबल होता है। शरीर बनता है पृथ्वी से और पृथ्वी पर बैठकर ध्यान करने से शरीर की शक्ति बहुत प्रबल होती है। वह जो ऊंचाइयों पर, हाइट्स पर, पहाड़ों पर, और हिमालय जाने वाले योगियों की चर्चा है, वह अकारण नहीं है, बहुत वैज्ञानिक है। जितनी पृथ्वी से दूरी बढती है शरीर की, उतना ही शरीरतत्व का प्रभाव भीतर कम होता चला जाता है। तो एक बड़े वृक्ष पर ऊपर बैठकर मैं ध्यान करता था रोज रात। एक दिन ध्यान में कब कितना लीन हो गया, मुझे पता नहीं और कब शरीर वृक्ष से गिर गया, वह मुझे पता नहीं। जब नीचे गिर पड़ा शरीर, तब मैंने चौंक कर देखा कि यह क्या हो गया। मैं तो वृक्ष पर ही था और शरीर नीचे गिर गया —कैसा हुआ अनुभव कहना बहुत मुश्किल है।

मैं तो वृक्ष पर ही बैठा था और शरीर नीचे गिरा था और मुझे दिखाई पड़ रहा था कि वह नीचे गिर गया है। सिर्फ एक रजत —रज्‍जु, एक सिलवर कार्ड नाभि से मुझ तक जुड़ी हुई थी। एक अत्यंत चमकदार शुभ्र रेखा। कुछ भी समझ के बाहर था कि अब क्या होगा रूम कैसे वापस लौटूंगा?

कितनी देर यह अवस्था रही होगी, यह पता नहीं, लेकिन अपूर्व अनुभव हुआ। शरीर के बाहर से पहली दफा देखा शरीर को और शरीर उसी दिन से समाप्त हो गया। मौत उसी दिन से खतम हो गई। क्योंकि एक और देह दिखाई पड़ी जो शरीर से भिन्न है। एक और सूक्ष्म शरीर का अनुभव हुआ। कितनी देर यह रहा, कहना मुश्किल है। सुबह होते —होते दो औरतें वहां से निकलीं दूध लेकर किसी गांव से, और उन्होंने आकर पड़ा हुआ शरीर देखा। वह मैं सब देख रहा हूं ऊपर से कि वे करीब आकर बैठ गई हैं। कोई मर गया! और उन्होंने सिर पर हाथ रखा और एक क्षण में जैसे तीव्र आकर्षण से मैं वापस अपने शरीर में आ गया और आख खुल गई।

ध्यान की शुरुआत

विचार हमारा शत्रु है- ध्यान की शुरुआत के पूर्व की क्रिया- 'मैं क्यों सोच रहा हूं' इस पर ध्यान दें।' हमारा 'विचार' भविष्य और अतीत की हरकत है। विचार एक प्रकार का विकार है। वर्तमान में जीने से ही जागरूकता जन्मती है। भविष्य की कल्पनाओं और अतीत के सुख-दुख में जीना ध्यान विरूद्ध है। स्टेप- 1 : ध्यान शुरू करने से पहले आपका रेचन हो जाना जरूरी है अर्थात आपकी चेतना (होश) पर छाई धूल हट जानी जरूरी है। इसके लिए चाहें तो योग का भस्त्रिका, कपालभाति प्राणायाम कर लें। स्टेप 2 : शुरुआत में शरीर की सभी हलचलों पर ध्यान दें और उसका निरीक्षण करें। बाहर की आवाज सुनें। आपके आस-पास जो भी घटित हो रहा है उस पर गौर करें। उसे ध्यान से सुनें। स्टेप 3 : फिर धीरे-धीरे मन को भीतर की ओर मोड़े। विचारों के क्रिया-कलापों पर और भावों पर चुपचाप गौर करें। इस गौर करने या ध्यान देने के जरा से प्रयास से ही चित्त स्थिर होकर शांत होने लगेगा। भीतर से मौन होना ध्यान की शुरुआत के लिए जरूरी है।

स्टेप 4 : अब आप सिर्फ देखने और महसूस करने के लिए तैयार हैं। जैसे-जैसे देखना और सुनना गहराएगा आप ध्यान में उतरते जाएंगे।

ध्यान की शुरुआती विधि :- प्रारंभ में सिद्धासन में बैठकर आंखें बंद कर लें और दाएं हाथ को दाएं घुटने पर तथा बाएं हाथ को बाएं घुटने पर रखकर, रीढ़ सीधी रखते हुए गहरी श्वास लें और छोड़ें। सिर्फ पांच मिनट श्वासों के इस आवागमन पर ध्यान दें कि कैसे यह श्वास भीतर कहां तक जाती है और फिर कैसे यह श्वास बाहर कहां तक आती है।

पूर्णत: भीतर कर मौन का मजा लें। मौन जब घटित होता है तो व्यक्ति में साक्षी भाव का उदय होता है। सोचना शरीर की व्यर्थ क्रिया है और बोध करना मन का स्वभाव है।

ध्यान की अवधि : उपरोक्त ध्यान विधि को नियमित 30 दिनों तक करते रहें। 30 दिनों बाद इसकी समय अवधि 5 मिनट से बढ़ाकर अगले 30 दिनों के लिए 10 मिनट और फिर अगले 30 दिनों के लिए 20 मिनट कर दें। शक्ति को संवरक्षित करने के लिए 90 दिन काफी है। इसे जारी रखें।

सावधानी :- ध्यान किसी स्वच्छ और शांत वातावरण में करें। ध्यान करते वक्त सोना मना है। ध्यान करते वक्त सोचना बहुत होता है। लेकिन यह सोचने पर कि 'मैं क्यों सोच रहा हूं' कुछ देर के लिए सोच रुक जाती है। सिर्फ श्वास पर ही ध्यान दें और संकल्प कर लें कि 20 मिनट के लिए मैं अपने दिमाग को शून्य कर देना चाहता हूं।

अंतत: ध्यान का अर्थ ध्यान देना, हर उस बात पर जो हमारे जीवन से जुड़ी है। शरीर पर, मन पर और आस-पास जो भी घटित हो रहा है उस पर। विचारों के क्रिया-कलापों पर और भावों पर। इस ध्यान देने के जारा से प्रयास से ही हम अमृत की ओर एक-एक कदम बढ़ सकते है।

ध्यान और विचार : जब आंखें बंद करके बैठते हैं तो अक्सर यह शिकायत रहती है कि जमाने भर के विचार उसी वक्त आते हैं। अतीत की बातें या भविष्य की योजनाएं, कल्पनाएं आदि सभी विचार मक्खियों की तरह मस्तिष्क के आसपास भिनभिनाते रहते हैं। इससे कैसे निजात पाएं? माना जाता है कि जब तक विचार है तब तक ध्यान घटित नहीं हो सकता।

अब कोई मानने को भी तैयार नहीं होता कि निर्विचार भी हुआ जा सकता है। कोशिश करके देखने में क्या बुराई है। ध्यान विचारों की मृत्यु है। आप बस ध्यान करना शुरू कर दें। जहां पहले 24 घंटे में चिंता और चिंतन के 30-40 हजार विचार होते थे वहीं अब उनकी संख्या घटने लगेगी। जब पूरी घट जाए तो बहुत बड़ी घटना घट सकती है।

नादब्रह्म ध्यान;-

तिब्बत देश की यह बहुत पुरानी विधि है। बड़े भोर में, दो और चार बजे के बीच उठकर, साधक इस विधि का अभ्यास करते थे और फिर सो जाते थे। नादब्रह्म ध्यान सोने के पूर्व मध्य रात्रि में करे या फिर प्रातः काल करें। ध्यान रहे कि रात के अतिरिक्त जब भी इसे किया जाए, तब अंत में पंद्रह मिनट का विश्राम अनिवार्य है। पेट भरे रहने पर ध्यान नहीं करना चाहिए, क्योंकि तब आंतरकि नाद गहरा नहीं जाएगा। इसे अकेले करते समय कान में रुई या डाट लगाना उपयोगी होगा। यह ध्यान तीन चरणों का है। पहला चरण तीस मिनट का है और दूसरा तथा तीसरा पंद्रह-पंद्रह मिनट का।

पहला चरणः आंखें बंद कर बैठे। मुंह को बंद रखते हुए, भीतर ही भीतर, भंवरे की गुजार की भांति ऊं ऊं ऊं ऊं का नाद करें। यह नाद इतने जोर से शुरू करें कि इसका कंपन आपको पूरे शरीर में अनुभव हो। नाद इतना ऊंचा हो कि आसपास के लोग सुन सके। फिर श्वास भीतर ले जाएं। अगर शरीर हिलना चाहें तो उसे हिलनें दें, लेकिन गति अत्यंत धीमी हो। नाद करते हुए भाव करें कि आपका शरीर बांस की खाली पोंगरी है- जो सिर्फ गंुजार के कंपनों से भरी है। कुछ समय बाद वह बिंदु आएगा जब आप श्रोता भर रहेंगे और नाद आप ही आप गूंजता रहेगा। यह नाद मस्तिष्क के एक-एक तंतु को शुद्ध कर उन्हें सक्रिय करता है। इस तीन मिनट से अधिक तो कर सकते हैं, लेकिन कम नहीं।

दूसरा चरणः दोनों हाथों को अपने सामने नाभि के पास रखें और हथेलियों को आकाशोन्मुख ऊपर की ओर। तब दोनों हाथों को आगे की तरफ ले जाते हुए चक्राकार घुमाएं। दायां हाथ दाईं तरफ को जाएगा और बायां हाथ बाईं तरफ को। और अब वर्तुल पूरे करते हुए दोनों हाथों को अपने सामने उसी स्थान पर वापस ले आएं। ध्यान रखें कि जितना हो सके हाथों के घूमने की गति धीमी से धीमी रखनी है। वह इतनी धीमी रहे कि लगे जैसे गति ही नहीं हो रही है।

शरीर हिलना चाहे तो उसे हिलने दें, लेकिन उसकी गति भी बहुत धीमी और मृदु प्रसादपूर्ण हो। भाव करें कि ऊर्जा आप से बाहर जा रही है। यह क्रम साढ़े सात मिनट तक चलेगा। इसके बाद हथेलियों को नीचे की ओर, जमीन की ओर उलट दें और हाथों को विपरीत दिशा में घुमाना शुरू करें। पहले तो सामने रखे हुए हाथों को अपने शरीर की तरफ आने दें और फिर उसी प्रकार दाएं हाथ को दाई तरफ तथा दाएं हाथ को बाईं तरफ वर्तुलाकार गति करने दें जब तक कि वे वापस उसी स्थान पर सामने न आ जाएं। घूमने के लिए हाथों को अपने-आप न छोड़ें, बल्कि इसी वर्तुलाकार ढांचे में धीरे-धीरे घुमाते रहे और भाव करें कि आप ऊर्जा ग्रहण कर रहे हैं, ऊर्जा आपकी ओर आ रही है। यह क्रम भी साढ़े सात मिनट तक चलेगा।

तीसरा चरणः बिलकुल शांत और स्थिर बैठे रहें-साथी होकर। दंपतियों के लिए नादब्रह्म ध्यान की एक अन्य विधि भी है, जो इस प्रकार है- पहले कमरे को ठीक से अंधेरा कर मोमबत्ती जला लें। विशेष सुंगध वाली अगरबत्ती ही जलाएं, जिसे सिर्फ इस ध्यान के समय ही हमेशा उपयोग में लाएं। फिर दोनों अपना शरीर एक चादर ढंक लें बेहतर यही होगा कि दोनों के शरीर पर कोई वस्त्र न हो। अब एक दूसरे का तिरछे ढंग से हाथ पकड़ आमने-सामने बैठ जाएं। आंखें बंद कर लें और कम से कम तीस मिनट तक लगातार भंवरे की भांति ऊं ऊं ऊं ऊं का गुंजार करते रहें। गुंजार दोनों एक-सा करें। एक या दो मिनट के बाद दोनों श्वसन क्रिया और गुंजार करते रहें। गुंजार दोनों एक साथ करें। एक या दो मिनट के बाद दोनों की श्वसन क्रिया और गुंजार एक-दूसरे में घुलमिल जाएगी और दोनों को दो ऊर्जाओं के मिलन का अनुभव होगा।

विपश्यना ध्यान यह ध्यान विधि भगवान बुद्ध की अमूल्य देन है। ढाई हजार वर्षों के बाद भी उसकी महिमा में, उसकी गरिमा में जरा भी कमी नहीं हुई। ओशो का मानना है कि आधुनिक मनुष्य की अंतर्यात्रा की साधना में विपश्यना सर्वाधिक करागर सिद्ध हो सकती है। विपश्यना का अर्थ है अंतरदर्शन-भतर देखना। यह ध्यान पचास मिनट का है और बैठकर करना है। बैठें, शरीर और मन को तनाव न दें और आंखें बंद रखें फिर अपने ध्यान को आती-जाती श्वास पर केंद्रित करें। श्वास को किसी तरह की व्यवस्था नहीं देनी है, उसे उसके सहज ढंग से चलने दें। सिर्फ ध्यान को उसकी यात्रा के साथ कर दें। श्वास की यात्रा में नाभि-केंद्र के पास कोई जगह है, जहां श्वास अधिक महसूस होता है, वहां विशेष ध्यान दें। अगर बीच में ध्यान कहीं चला जाए तो उससे घबराएं नहीं। अगर मन में कोई विचार या भाव उठे तो उसे भी सुन लें, लेकिन फिर प्रेमपूर्वक ध्यान को श्वास पर लाएं। नींद से बचें।

गौरीशंकर ध्यान घंटे भर के इस ध्यान में चार चरण है और प्रत्येक चरण पंद्रह मिनट का है। पहले चरण को ठीक से करने पर आपके रक्त-प्रवाह में कार्बन डायआॅक्साइड का तल इतना ऊंचा हो जाएगा कि आप अपने को गौरीशंकर-एवरेस्ट शिखर पर महसूस करेंगे। वह आपको इतना ऊपर उठा देगा। इस ध्यान प्रयोग के दूसरे चरण में साधकों को सामने प्रकाश का एक बल्ब तेजी से सतत जलता बुझता रहता है।

पहला चरण;- आंख बंद कर बैठ जाएं। अब नाक से उतनी गहरी श्वास लें, जितनी ले सकते हैं। और इस श्वास के भीतर तब तक रोके रहें, जब तक ऐसा न लगने लगे कि अब अधिक नहीं रोका जा सकता। फिर धीरे-धीरे श्वास को मुंह से बाहर निकाल दें। और फिर तब तक भीतर जाने वाली श्वास न लें, जब तक लेना मजबूरी न हो जाए। यह क्रम पंद्रह मिनट तक जारी रखें। दूसरा चरण;- श्वसन क्रिया को सामान्य हो जाने दें। आखें खोल लें और सतत जलते-बुझते हुए तेज प्रकाश की धीमे-धीमे देखते रहें। दृष्टि को तनाव नहीं देना है। शरीर को पूरी तरह स्थिर रखें।

तीसरा चरण;- खड़े हो जाएं, आंखें बंद कर लें और शरीर को धीरे-धीरे हिलने दें। हिलने की इस प्रक्रिया द्वारा अपने अंतस को शरीर के माध्यम से प्रकट होने दें और उस अभिव्यक्ति में पूरा सहयोग दें चौथा चरण;- लेट जाएं और सर्वथा निष्क्रिय हो जाएं, साक्षी बनें।

;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;

सप्त चक्र;-

(१) गुदा और लिंग के बीच चार पंखुरियों वाला 'आधार चक्र' है । वहाँ वीरता और आनन्द भाव का निवास है । (२) इसके बाद स्वाधिष्ठान चक्र लिंग मूल में है । उसकी छः पंखुरियाँ हैं । इसके जाग्रत होने पर क्रूरता, गर्व, आलस्य, प्रमाद, अवज्ञा, अविश्वास आदि दुर्गणों का नाश होता है । (३) नाभि में दस दल वाला मणिचूर चक्र है । यह प्रसुप्त पड़ा रहे तो तृष्णा, ईर्ष्या, चुगली, लज्जा, भय, घृणा, मोह, आदि कषाय-कल्मष मन में लड़ जमाये पड़े रहते हैं ‍ (४) हृदय स्थान में अनाहत चक्र है । यह बारह पंखरियों वाला है । यह सोता रहे तो लिप्सा, कपट, तोड़-फोड़, कुतर्क, चिन्ता, मोह, दम्भ, अविवेक अहंकार से भरा रहेगा । जागरण होने पर यह सब दुर्गुण हट जायेंगे । (५) कण्ठ में विशुद्धख्य चक्र यह सरस्वती का स्थान है । यह सोलह पंखुरियों वाला है । यहाँ सोलह कलाएँ सोलह विभतियाँ विद्यमान है ‍ (६) भू्रमध्य में आज्ञा चक्र है, यहाँ 'ॐ' उद्गीय, हूँ, फट, विषद, स्वधा स्वहा, सप्त स्वर आदि का निवास है । इस आज्ञा चक्र का जागरण होने से यह सभी शक्तियाँ जाग पड़ती हैं । कुण्डलिनी के बारे में उनके पर्यवेक्षण का निष्कर्ष है कि वह एक व्यापक चेतना शक्ति है । मनुष्य के मूलाधार चक्र में उसका सम्पर्क तंतु है जो व्यक्ति सत्ता को विश्व सत्ता के साथ जोड़ता है । कुण्डलिनी जागरण से चक्र संस्थानों में जागृति उत्पन्न होती है । उसके फलस्वरूप पारभौतिक (सुपर फिजीकल) और भौतिक (फिजीकल) के बीच आदान-प्रदान का द्वार खुलता है । यही है वह स्थिति जिसके सहारे मानवी सत्ता में अन्तर्हित दिव्य शक्तियों का जागरण सम्भव हो सकता है । चक्रों की जागृति मनुष्य के गुण, कर्म, स्वभाव को प्रभावित करती है । स्वाधिष्ठान की जागृति से मनुष्य अपने में नव शक्ति का संचार हुआ अनुभव करता है उसे बलिष्ठता बढ़ती प्रतीत होती है । श्रम में उत्साह और गति में स्फूर्ति की अभिवृद्धि का आभास मिलता है । मणिपूर चक्र से साहस और उत्साह की मात्रा बढ़ जाती है । संकल्प दृढ़ होते हैं और पराक्रम करने के हौसले उठते हैं । मनोविकार स्वयंमेव घटते हैं और परमार्थ प्रयोजनों में अपेक्षाकृत अधिक रस मिलने लगता है । अनाहत चक्र की महिमा ईसाई धर्म के योगी भी बताते हैं । हृदय स्थान पर गुलाब से फूल की भावना करते हैं और उसे महाप्रभु ईसा का प्रतीक 'आईचीन' कनक कमल मानते हैं । भारतीय योगियों की दृष्टि से यह भाव संस्थान है । कलात्मक उमंगें-रसानुभुति एवं कोमल संवेदनाओं का उत्पादक स्रोत यही है । बुद्धि की वह परत जिसे विवेकशीलता कहते हैं । आत्मीयता का विस्तार सहानुभूति एवं उदार सेवा सहाकारिता क तत्त्व इस अनाहत चक्र से ही उद्भूत होते हैं ‍कण्ठ में विशुद्ध चक्र है । इसमें बहिरंग स्वच्छता और अंतरंग पवित्रता के तत्त्व रहते हैं । दोष व दुर्गुणों के निराकरण की प्रेरणा और तदनुरूप संघर्ष क्षमता यहीं से उत्पन्न होती है । शरीरशास्त्र में थाइराइड ग्रंथि और उससे स्रवित होने वाले हार्मोन के संतुलन-असंतुलन से उत्पन्न लाभ-हानि की चर्चा की जाती है । अध्यात्मशास्त्र द्वारा प्रतिपादित विशुद्ध चक्र का स्थान तो यहीं है, पर वह होता सूक्ष्म शरीर में है । उसमें अतीन्द्रिय क्षमताओं के आधार विद्यमान हैं । लघु मस्तिष्क सिर के पिछले भाग में है । अचेतन की विशिष्ट क्षमताएँ उसी स्थान पर मानी जाती हैं । मेरुदण्ड में कंठ की सीध पर अवस्थित विशुद्ध चक्र इस चित्त संस्थान को प्रभावित करता है । तदनुसार चेतना की अति महत्वपूर्ण परतों पर नियंत्रण करने और विकसित एवं परिष्कृत कर सकने सूत्र हाथ में आ जाते हैं । नादयोग के माध्यम से दिव्य श्रवण जैसी कितनी ही परोक्षानुभूतियाँ विकसित होने लगती हैं । सहस्रार की मस्तिष्क के मध्य भाग में है । शरीर संरचना में इस स्थान पर अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथियों से सम्बन्ध रैटिकुलर एक्टिवेटिंग सिस्टम का अस्तित्व है । वहाँ से जैवीय विद्युत का स्वयंभू प्रवाह उभरता है । वे धाराएँ मस्तिष्क के अगणित केन्द्रों की ओर दौड़ती हैं । इसमें से छोटी-छोटी चिनगारियाँ तरंगों के रूप में उड़ती रहती हैं । उनकी संख्या की सही गणना तो नहीं हो सकती, पर वे हैं हजारों । इसलिए हजार या हजारों का उद्बोधक 'सहस्रार' शब्द प्रयोग में लाया जाता है । सहस्रार चक्र का नामकरण इसी आधार पर हुआ है सहस्र फन वाले शेषनाग की परिकल्पना का यही आधार है ।

इन सप्त चक्रों के ध्यान करने की विधि-

मूलाधार चक्र-

इसके अभ्यास के लिए पहले किसी भी ध्यानात्मक आसन में बैठ जाएं। अपने दोनों हाथों को ज्ञान मुद्रा व अंजलि मुद्रा में रखें तथा अपनी आंखों को बन्द करके रखें। अपनी गर्दन, पीठ व कमर को सीधा करके रखें। सप्तचक्र ध्यान का अभ्यास शवासन में भी किया जा सकता है। अब सबसे पहले अपने ध्यान को गुदा से 4 अंगुली ऊपर मूलाधार चक्र पर ले जाएं। फिर मूलाधार चक्र पर अपने मन को एकाग्र व स्थिर करें और अपने मन में चार पंखुड़ियों वाले बन्द लाल रंग वाले कमल के फूल की कल्पना करें। फिर अपने मन को एकाग्र करते हुए उस फूल की पंखुड़ियों को एक-एक करके खुलते हुए कमल के फूल का अनुभव करें। इसकी कल्पना के साथ ही उस आनन्द का अनुभव करने की कोशिश करें। उसकी पंखुड़ियों तथा कमल के बीच परागों से ओत-प्रोत सुन्दर फूल की कल्पना करें। इस तरह कल्पना करते हुए तथा उसके आनन्द को महसूस करते हुए अपने मन को कुछ समय तक मूलाधार चक्र पर स्थिर रखें। इसके बाद स्वाधिष्ठान चक्र पर मन को एकाग्र करें।

स्वाधिष्ठान चक्र-

पहली विधि के बाद अपने ध्यान को उपस्थ में स्थित स्वाधिष्ठ चक्र पर ले जाएं और 6 पंखुड़ियों वाले कमल के पीले रंग के फूल की कल्पना करें। साथ ही कल्पना करें कि इसकी सभी पंखुड़ियां आपस में कली की तरह मिली हुई है। इस कमल के फूल को अपनी आंतरिक दृष्टि से देखने तथा मन को वहां केन्द्रित करते हुए एक के बाद एक पंखुड़ियों को खिलाएं। जब पूर्ण रूप से पीले रंग का कमल खिल जाए तो उसके सौन्दर्य को महसूस करें और उसके आनन्द का भी अनुभव करें। इस तरह कुछ समय अपने मन को वहां स्थिर करके उस चक्र पर ध्यान को केन्द्रित करें।

मणिपूर चक्र-

स्वाधिष्ठ चक्र के बाद अपने मन को नाभि के पास स्थित मणिपूर चक्र में केन्द्रित करें। मन में कल्पना करें कि नाभि में पीले रंग का 10 दल वाला कमल का फूल है, जिसकी पंखुड़ियां आपस में मिली हुई है। ध्यान चक्र का अभ्यास करने वाले को चाहिए कि अपने मन को एकाग्र कर अपनी कल्पना के द्वारा उस फूल को खिलाएं और उससे मिलने वाले आनन्द का अनुभव करें। इस तरह नीले रंग के खिले हुए कमल के फूल पर अपने मन को कुछ देर तक केन्द्रित करें। इसके बाद अनाहत चक्र पर स्थिर करें।

अनाहद चक्र-

मणिपूर चक्र पर ध्यान लगाने के बाद अपने ध्यान को अनाहत चक्र अर्थात हृदय के पास स्थित चक्र पर लगाएं। मन को एकाग्र व शांत रखते हुए 12 पंखुड़ियों वाले कमल के फूल की कल्पना करें। कल्पना करें कि हृदय के पास चक्र में 12 पंखुड़ियों वाला कमल का फूल है, जिसका रंग सफेद हैं और इस फूल की सभी पंखुड़ियां आपस में बन्द है। इसके बाद अपनी आंतरिक दृष्टि से कमल की सभी पंखुड़ियों को खिलाएं और कुछ समय तक इस पर ध्यान को केन्द्रित करें। इसके बाद विशुद्धि चक्र पर ध्यान केन्द्रित करें।

विशुद्धि चक्र-

हृदय के पास स्थित चक्र पर ध्यान केन्द्रित करने के बाद अपने ध्यान को कंठमूल में स्थित विशुद्धि चक्र पर केन्द्रित करें। इस चक्र पर ध्यान करते हुए भूरे रंग के 15 दलों वाले कमल के फूल की कल्पना करें। इसके बाद अपनी आंतरिक दृष्टि को केन्द्रित करते हुए अपने मन में कमल की एक-एक पंखुड़ियों को खिलाते हुए स्थिति की कल्पना करें। फिर खिले हुए फूल की सुन्दरता के आनन्द को प्राप्त करते हुए कुछ समय तक अपने मन को वहीं स्थिर रखें।

आज्ञा चक्र-

अपने ध्यान को दोनों भौंहों के बीच भ्रूमध्य में स्थित आज्ञा चक्र पर लाएं। इस चक्र में 2 पंखुड़ियों वाले कमल के फूल की कल्पना करें जिसका रंग सुनहरा है। इसकी भी दोनों पंखुड़ियां आपस में मिली हुई है। आंतरिक दृष्टि से उस कमल के फूल को स्पष्ट करने की कोशिश करें और अपने मन को केन्द्रित करते हुए कमल की पंखुड़ियों को खिलाते हुए चित्र की कल्पना करें। खिले हुए कमल के फूल को देखें और कुछ समय तक अपने मन को उस चक्र पर केन्द्रित करें। इसके बाद ध्यान को सहस्त्रार चक्र पर केन्द्रित करें।

सहस्त्रार चक्र-

कंठमूल के पास स्थित चक्र पर ध्यान केन्द्रित करने के बाद सहस्त्रार चक्र पर अपने ध्यान को केन्द्रित करें। यह ध्यानाभ्यास पहले के सभी अभ्यास से अलग है। अपने ध्यान को एक-एक कर सभी चक्रों पर केन्द्रित करते हुए ऊपर के स्थित सहस्त्रार चक्र पर स्थिर किया जाता है। पहले सभी चक्रों का ध्यान करते हुए कमल के बन्द फूल की कल्पना की जाती है और उसे अपनी आंतरिक दृष्टि से स्पष्ट करने की कोशिश की जाती है। परन्तु इस चक्र में अपने ध्यान को केन्द्रित करते हुए अधोमुख अर्थात आधे खुले हुआ कमल के फूल की कल्पना की जाती है। इसमें अपने ध्यान को सहस्त्रार चक्र में लगाते हुए कल्पना करें कि अधोखुले कमल के फूल है। सातवें चक्र पर ध्यान केन्द्रित करना ध्यान का सबसे अंतिम ध्यानाभ्यास है। इसका ध्यान करने से मन में सुख, शांति और सत्य का ज्ञान का अनुभव होता है। ध्यान की यात्रा मूलाधार चक्र से शुरू होकर सहस्त्रार चक्र में समाप्त हो जाती है।

अंतिम चक्र पर ध्यान का अभ्यास करते समय अपने मन को मस्तिष्क के बीच वाले भाग में स्थित सहस्त्रदल कमल के फूल पर स्थिर करें। मन को उस पर केन्द्रित कर कल्पना करें कि उस फूल में सभी रंग मौजूद है और वह नीचे की ओर खिला हुआ है। ध्यान करें कि यह चक्र प्रतिबिम्बों का सागर, सभी चेतनाओं का केन्द्र, यह वर्तमान, भूत और भविष्य है तथा मानव जीवन का यही आदि और अंत है। कुछ देर मन को एकाग्र करने के बाद मूलाधार चक्र के ठीक विपरीत ध्यान का त्याग सहस्त्रार चक्र में करें।

इस तरह सहस्त्रार चक्र पर कुछ समय तक ध्यान को केन्द्रित रखें। फिर सहास्त्रार चक्र से अपने ध्यान को हटा लें और अपने ध्यान को भौंहों के बीच स्थित आज्ञा चक्र पर लाएं। भौंहों के बीच स्थित कमान पर अपने ध्यान को एकाग्र कर खुले हुए कमल की पंखुड़ियों को बन्द करें। इसके बाद कंठमूल में स्थित विशुद्धि चक्र पर ध्यान करें और खिली हुए पंखुड़ियों को बन्द कर दें। फिर हृदय के पास स्थित अनाहत चक्र पर ध्यान को लाकर फूल की खिली हुई पंखुड़ियों को बन्द करें। इसके बाद नाभि में स्थित मणिपूर चक्र पर ध्यान को लाएं और खिले हुए फूल को बन्द करें। फिर अपने ध्यान को स्वाधिष्ठान चक्र पर लाएं और फूल की पंखुड़ियों को बन्द करें। इसके बाद अपने ध्यान को नीचे स्थित मूलाधार चक्र पर लाएं और खिले हुए फूल की पंखुड़ियों को बन्द कर अपने मन को आंतरिक चेतना से बाहर निकालें अर्थात ध्यानावस्था से बाहर निकाले और अपने शरीर का ज्ञान करें। जिस आसन में बैठे है या लेटे हैं उस आसन का ज्ञान करें। फिर आसन को त्यागकर सामान्य स्थिति में आ जाएं। पैरों के पंजों को ऊपर नीचे चलाएं तथा सिर को दाएं-बाएं घुमाएं। मुट्ठी को 4 से 5 बार बन्द करें और खोलें। दोनों हाथों को आपस में रगड़ें और अपनी आंखों व मुंह पर सहलाएं। हाथों से कुछ देर तक आंखों को बन्द करके रखें और 4 से 5 बार आंखों को खोले व बन्द करें। कुछ समय तक मौन व शांत स्थिति में बैठे रहें और फिर अभ्यास की स्थित का त्याग करें। 10 से 15 मिनट बाद अपने प्रतिदिन के कार्य के लिए चले जाएं।

;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;

ध्यान में होने वाले अनुभव दो शरीरों का अनुभव होना :- अनाहत चक्र (हृदय में स्थित चक्र) के जाग्रत होने पर, स्थूल शरीर में अहम भावना का नाश होने पर दो शरीरों का अनुभव होता ही है. कई बार साधकों को लगता है जैसे उनके शरीर के छिद्रों से गर्म वायु निकर्लर एक स्थान पर एकत्र हुई और एक शरीर का रूप धारण कर लिया जो बहुत शक्तिशाली है. उस समय यह स्थूल शरीर जड़ पदार्थ की भांति क्रियाहीन हो जाता है. इस दूसरे शरीर को सूक्ष्म शरीर या मनोमय शरीर कहते हैं. कभी-कभी ऐसा लगता है कि वह सूक्ष्म शरीर हवा में तैर रहा है और वह शरीर हमारे स्थूल शरीर की नाभी से एक पतले तंतु से जुड़ा हुआ है. कभी ऐसा भी अनुभव अनुभव हो सकता है कि यह सूक्ष्म शरीर हमारे स्थूल शरीर से बाहर निकल गया मतलब जीवात्मा हमारे शरीर से बाहर निकल गई और अब स्थूल शरीर नहीं रहेगा, उसकी मृत्यु हो जायेगी. ऐसा विचार आते ही हम उस सूक्ष्म शरीर को वापस स्थूल शरीर में लाने की कोशिश करते हैं परन्तु यह बहुत मुश्किल कार्य मालूम देता है. "स्थूल शरीर मैं ही हूँ" ऐसी भावना करने से व ईश्वर का स्मरण करने से वह सूक्ष्म शरीर शीघ्र ही स्थूल शरीर में पुनः प्रवेश कर जाता है. कई बार संतों की कथाओं में हम सुनते हैं कि वे संत एक साथ एक ही समय दो जगह देखे गए हैं, ऐसा उस सूक्ष्म शरीर के द्वारा ही संभव होता है. उस सूक्ष्म शरीर के लिए कोई आवरण-बाधा नहीं है, वह सब जगह आ जा सकता है. दिव्य ज्योति दिखना :- सूर्य के सामान दिव्य तेज का पुंज या दिव्य ज्योति दिखाई देना एक सामान्य अनुभव है. यह कुण्डलिनी जागने व परमात्मा के अत्यंत निकट पहुँच जाने पर होता है. उस तेज को सहन करना कठिन होता है. लगता है कि आँखें चौंधिया गईं हैं और इसका अभ्यास न होने से ध्यान भंग हो जाता है. वह तेज पुंज आत्मा व उसका प्रकाश है. इसको देखने का नित्य अभ्यास करना चाहिए. समाधि के निकट पहुँच जाने पर ही इसका अनुभव होता है.

ध्यान में कभी ऐसे लगता है जैसे पूरी पृथ्वी गोद में रखी हुई है या शरीर की लम्बाई बदती जा रही है और अनंत हो गई है, या शरीर के नीचे का हिस्सा लम्बा होता जा रहा है और पूरी पृथ्वी में व्याप्त हो गया है, शरीर के कुछ अंग जैसे गर्दन का पूरा पीछे की और घूम जाना, शरीर का रूई की तरह हल्का लगना, ये सब ध्यान के समय कुण्डलिनी जागरण के कारण अलग-अलग चक्रों की प्रतिभाएं प्रकट होने के कारण होता है. परन्तु साधक को इनका उपयोग नहीं करना चाहिए, केवल परमात्मा की प्राप्ति को ही लक्ष्य मानकर ध्यान करते रहना चाहिए. इन प्रतिभाओं पर ध्यान न देने से ये पुनः अंतर्मुखी हो जाती हैं. कभी-कभी साधक का पूरा का पूरा शरीर एक दिशा विशेष में घूम जाता है या एक दिशा विशेष में ही मुंह करके बैठने पर ही बहुत अच्छा ध्यान लगता है अन्य किसी दिशा में नहीं लगता. यदि अन्य किसी दिशा में मुंह करके बैठें भी, तो शरीर ध्यान में अपने आप उस दिशा विशेष में घूम जाता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि आपके ईष्ट देव या गुरु का निवास उस दिशा में होता है जहाँ से वे आपको सन्देश भेजते हैं. कभी-कभी किसी मंत्र विशेष का जप करते हुए भी ऐसा महसूस हो सकता है क्योंकि उस मंत्र देवता का निवास उस दिशा में होता है, और मंत्र जप से उत्पन्न तरंगें उस देवता तक उसी दिशा में प्रवाहित होती हैं, फिर वहां एकत्र होकर पुष्ट (प्रबल) हो जाती हैं और इसी से उस दिशा में खिंचाव महसूस होता है. संसार (दृश्य) व शरीर का अत्यंत अभाव का अनुभव :- साधना की उच्च स्थिति में ध्यान जब सहस्रार चक्र पर या शरीर के बाहर स्थित चक्रों में लगता है तो इस संसार (दृश्य) व शरीर के अत्यंत अभाव का अनुभव होता है. यानी एक शून्य का सा अनुभव होता है. उस समय हम संसार को पूरी तरह भूल जाते हैं (ठीक वैसे ही जैसे सोते समय भूल जाते हैं). सामान्यतया इस अनुभव के बाद जब साधक का चित्त वापस नीचे लौटता है तो वह पुनः संसार को देखकर घबरा जाता है, क्योंकि उसे यह ज्ञान नहीं होता कि उसने यह क्या देखा है? वास्तव में इसे आत्मबोध कहते हैं. यह समाधि की ही प्रारम्भिक अवस्था है अतः साधक घबराएं नहीं, बल्कि धीरे-धीरे इसका अभ्यास करें. यहाँ अभी द्वैत भाव शेष रहता है व साधक के मन में एक द्वंद्व पैदा होता है. वह दो नावों में पैर रखने जैसी स्थिति में होता है, इस संसार को पूरी तरह अभी छोड़ा नहीं और परमात्मा की प्राप्ति अभी हुई नहीं जो कि उसे अभीष्ट है. इस स्थिति में आकर सांसारिक कार्य करने से उसे बहुत क्लेश होता है क्योंकि वह परवैराग्य को प्राप्त हो चुका होता है और भोग उसे रोग के सामान लगते हैं, परन्तु समाधी का अभी पूर्ण अभ्यास नहीं है. इसलिए साधक को चाहिए कि वह धैर्य रखें व धीरे-धीरे समाधी का अभ्यास करता रहे और यथासंभव सांसारिक कार्यों को भी यह मानकर कि गुण ही गुणों में बारात रहे हैं, करता रहे और ईश्वर पर पूर्ण विश्वास रखे. साथ ही इस समय उसे तत्त्वज्ञान की भी आवश्यकता होती है जिससे उसके मन के समस्त द्वंद्व शीघ्र शांत हो जाएँ. इसके लिए योगवाशिष्ठ (महारामायण) नामक ग्रन्थ का विशेष रूप से अध्ययन व अभ्यास करें. उमें बताई गई युक्तियों "जिस प्रकार समुद्र में जल ही तरंग है, सुवर्ण ही कड़ा/कुंडल है, मिट्टी ही मिट्टी की सेना है, ठीक उसी प्रकार ईश्वर ही यह जगत है." का बारम्बार चिंतन करता रहे तो उसे शीघ्र ही परमत्मबोध होता है, सारा संसार ईश्वर का रूप प्रतीत होने लगता है और मन पूर्ण शांत हो जाता है. चलते-फिरते उठते बैठते यह महसूस होना कि सब कुछ रुका हुआ है, शांत है, "मैं नहीं चल रहा हूँ, यह शरीर चल रहा है", यह सब आत्मबोध के लक्षण हैं यानि परमात्मा के अत्यंत निकट पहुँच जाने पर यह अनुभव होता है.

कई साधकों को किसी व्यक्ति की केवल आवाज सुनकर उसका चेहरा, रंग, कद, आदि का प्रत्यक्ष दर्शन हो जाता है और जब वह व्यक्ति सामने आता है तो वह साधक कह उठता है कि, "अरे! यही चेहरा, यही कद-काठी तो मैंने आवाज सुनकर देखी थी, यह कैसे संभव हुआ कि मैं उसे देख सका?" वास्तव में धारणा के प्रबल होने से, जिस व्यक्ति की ध्वनि सुनी है, साधक का मन या चित्त उस व्यक्ति की भावना का अनुसरण करता हुआ उस तक पहुँचता है और उस व्यक्ति का चित्र प्रतिक्रिया रूप उसके मन पर अंकित हो जाता है. इसे दिव्या दर्शन भी कहते हैं. आँखें बंद होने पर भी बाहर का सब कुछ दिखाई देना, दीवार-दरवाजे आदि के पार भी देख सकना, बहुत दूर स्थित जगहों को भी देख लेना, भूत-भविष्य की घटनाओं को भी देख लेना, यह सब आज्ञा चक्र (तीसरी आँख) के खुलने पर अनुभव होता है. अपने संपर्क में आने वाले व्यक्तियों के मन की बात जान लेना या दूर स्थित व्यक्ति क्या कर रहा है (दु:खी है, रो रहा है, आनंद मना रहा है, हमें याद कर रहा है, कही जा रहा है या आ रहा है वगैरह) इसका अभ्यास हो जाना और सत्यता जांचने के लिए उस व्यक्ति से उस समय बात करने पर उस आभास का सही निकलना, यह सब दूसरों के साथ अपने चित्त को जोड़ देने पर होता है. यह साधना में बाधा उत्पन्न करने वाला है क्र्योकि दूसरों के द्वारा इस प्रकार साधक का मन अपनी और खींचा जाता है और ईश्वर प्राप्ति के अभ्यास के लिए कम समय मिलता है और अभय कम हो पाता है जिससे साधना दीरे-धीरे क्षीण हो जाती है. इसलिए इससे बचना चाहिए. दूसरों के विषय में सोचना छोड़ें. अपनी साधना की और ध्यान दें. इससे कुछ ही दिनों में यह प्रतिभा अंतर्मुखी हो जाती है और साधना पुनः आगे बदती है. ईश्वर के सगुण स्वरुप का दर्शन :- ईश्वर के सगुण रूप की साधना करने वाले साधानकों को, भगवान का वह रूप कभी आँख वंद करने या कभी बिना आँख बंद किये यानी खुली आँखों से भी दिखाई देने का आभास सा होने लगता है या स्पष्ट दिखाई देने लगता है. उस समय उनको असीम आनंद की प्राप्ति होती है. परन्तु मन में यह विश्वास नहीं होता कि ईश्वर के दर्शन किये हैं. वास्तव में यह सवितर्क समाधि की सी स्थिति है जिसमे ईश्वर का नाम, रूप और गुण उपस्थित होते हैं. ऋषि पतंजलि ने अपने योगसूत्र में इसे सवितर्क समाधि कहा है. ईश्वर की कृपा होने पर (ईष्ट देव का सान्निध्य प्राप्त होने पर) वे साधक के पापों को नष्ट करने के लिए इस प्रकार चित्त में आत्मभाव से उपस्थित होकर दर्शन देते हैं और साधक को अज्ञान के अन्धकार से ज्ञान के प्रकाश की और खींचते हैं. इसमें ईश्वर द्वारा भक्त पर शक्तिपात भी किया जाता है जिससे उसे परमानन्द की अनुभूति होती है. कई साधकों/भक्तों को भगवान् के मंदिरों या उन मंदिरों की मूर्तियों के दर्शन से भी ऐसा आनंद प्राप्त होता है. ईष्ट प्रबल होने पर ऐसा होता है. यह ईश्वर के सगुन स्वरुप के साक्षात्कार की ही अवस्था है इसमें साधक कोई संदेह न करें.

कई सगुण साधक ईश्वर के सगुन स्वरुप को उपरोक्त प्रकार से देखते भी हैं और उनसे वार्ता भी करने का प्रयास करते हैं. इष्ट प्रबल होने पर वे बातचीत में किये गए प्रश्नों का उत्तर प्रदान करते हैं, या किसी सांसारिक युक्ति द्वारा साधक के प्रश्न का हल उपस्थित कर देते हैं. यह ईष्ट देव की निकटता व कृपा प्राप्त होने पर होता है. इसका दुरुपयोग नहीं करना चाहिए. साधना में आने वाले विघ्नों को अवश्य ही ईश्वर से कहना चाहिए और उनसे सदा मार्गदर्शन के लिए प्रार्थना करते रहना चाहिए. वे तो हमें सदा राह दिखने के लिए ही तत्पर हैं परन्तु हम ही उनसे राह नहीं पूछते हैं या वे मार्ग दिखाते हैं तो हम उसे मानते नहीं हैं, तो उसमें ईश्वर का क्या दोष है? ईश्वर तो सदा सबका कल्याण ही चाहते हैं.

......SHIVOHAM....