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क्या है ध्यान का रहस्य ?कैसे है ध्यान में होने वाले अनुभव ?- PART-02


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ध्यान

जब लोग आकर मुझसे पूछते हैं, 'ध्यान कैसे करें?' मैं उन्हें कहता हूं, ‘यह पूछने की कोई आवश्यकता नहीं है कि ध्यान कैसे करें, बस पूछें कि कैसे स्वयं को खाली रखें। ध्यान सहज घटता है। बस पूछो कि कैसे खाली रहना है, बस इतना ही। यह ध्यान की कुल तरकीब है - कैसे खाली रहना है। तब आप कुछ भी नहीं करेंगे और ध्यान का फूल खिलेगा।

जब तुम कुछ भी नहीं करते तब ऊर्जा केंद्र की तरफ बढ़ती है, यह केंद्र की ओर एकत्रित हो जाती है। जब तुम कुछ करते हो तो ऊर्जा बाहर निकलती है। करना बाहर की ओर जाने का एक मार्ग है। ना करना भीतर की ओर जाने का एक मार्ग है। किसी कार्य को करना पलायन है। तुम बाइबिल पढ़ सकते हो, तुम इसे एक कार्य बना सकते हो। धार्मिक कार्य और धर्मनिरपेक्ष कार्य के बीच कोई अंतर नही है: सभी कार्य, कार्य हैं, और वे तुम्हें तुम्हारी चेतना से बाहर की ओर ले जाने में मदद करते हैं। वे बाहर रहने के लिए बहाने हैं।

मनुष्य अज्ञानी और अंधा है, और वह अज्ञानी और अंधा बने रहना चाहता है, क्योंकि स्वयं के भीतर आना अराजकता में प्रवेश करने की भांती लगता है। और ऐसा ही है; अपने भीतर तुमने एक अराजकता निर्मित कर ली है। तुम्हें इसका सामना करना होगा और इससे होकर गुजरना होगा। साहस की आवश्यकता है – साहस- स्वयं होने का, साहस- भीतर जाने का। ध्यानपूर्वक होने का साहस – इस साहस से बड़ा साहस मैंने नहीं जाना है।

ओशो, Just Like That, Talk #6 अंग्रेजी में पढ़ना जारी रखने के लिए : यहां क्लिक करें

तो ध्यान क्या है? ध्यान है केवल स्वयं की उपस्थिति में आनंदित होना; ध्यान स्वयं में होने का आनंद है। यह बहुत सरल है - चेतना की पूरी तरह से विश्रांत अवस्था जहां तुम कुछ भी नहीं कर रहे होते। जिस क्षण तुम्हारे भीतर कर्ता भाव प्रवेश करता है तुम तनाव में आ जाते हो; चिंता तुरंत तुम्हारे भीतर प्रवेश कर जाती है। कैसे करें? क्या करें? सफल कैसे हों? असफलता से कैसे बचें? तुम पहले ही भविष्य में चले जाते हो।

यदि तुम विचार कर रहे हो, तो तुम क्या विचार कर सकते हो? तुम अज्ञात पर कैसे विचार कर सकते हो? तुम केवल ज्ञात पर विचार कर सकते हो। तुम इसे बार-बार चबा सकते हो, लेकिन यह ज्ञात है। यदि तुम जीसस के बारे में कुछ जानते हो, तो तुम इस पर बार-बार चिंतन कर सकते हो; अगर तुम कृष्णा के बारे में कुछ जानते हो, तो तुम इस पर बार-बार चिंतन कर सकते हो; तुम संशोधन, बदलाहट, सजावट किए जा सकते हो - लेकिन यह तुम्हें अज्ञात की ओर ले जाने वाला नहीं है। और "ईश्वर" अज्ञात है।

ध्यान मात्र होना है, बिना कुछ किए - कोई कार्य नहीं, कोई विचार नहीं, कोई भाव नहीं। तुम बस हो। और यह एक कोरा आनंद है। जब तुम कुछ नहीं करते हो तो यह आनंद कहां से आता है? यह कहीं से नहीं आता या फिर हर जगह से आता है। यह अकारण है, क्योंकि अस्तित्व आनंद नाम की वस्तु से बना है। इसे किसी कारण की आवश्यकता नहीं है। यदि तुम अप्रसन्न हो तो तुम्हारे पास अप्रसन्नता का कारण है; अगर तुम प्रसन्न हो तो तुम बस प्रसन्न हो - इसके पीछे कोई कारण नहीं है। तुम्हारा मन कारण खोजने की कोशिश करता है क्योंकि यह अकारण पर विश्वास नहीं कर सकता, क्योंकि यह अकारण को नियंत्रित नहीं कर सकता - जो अकारण है उससे दिमाग बस नपुंसक हो जाता है। तो मन कुछ ना कुछ कारण खोजने में लग जाता है। लेकिन मैं तुम्हें बताना चाहता हूं कि जब भी तुम आनंदित होते हो, तो तुम किसी भी कारण से आनंदित नहीं होते, जब भी तुम अप्रसन्न होते हो, तो तुम्हारे पास अप्रसन्नता का कोई कारण होता है - क्योंकि आनंद ही वह चीज है जिससे तुम बने हो। यह तुम्हारी ही चेतना है, यह तुम्हारा ही अंतरतम है। प्रसन्नता तुम्हारा अंतरतम है।

ओशो, Dang Dang Doko Dang, Talk #5 अंग्रेजी में पढ़ना जारी रखने के लिए : यहां क्लिक करें

ध्यान की शुरुआत खुद को मन से अलग करने से होती है, एक साक्षी बनने से। खुद को किसी भी चीज से अलग करने का यही एकमात्र तरीका है। यदि तुम प्रकाश को देखते हो, स्वाभाविक रूप से एक बात निश्चित है: की तुम प्रकाश नहीं हो, तुम ही वह हो जो इसे देख रहे हो। यदि तुम फूल को देखते हो, तो एक बात निश्चित है: तुम फूल नहीं हो, तुम देखने वाले हो।

देखना कुंजी है ध्यान की:

अपने विचारों को देखो।

कुछ भी मत करो – कोई मंत्र नहीं दोहराना है, भगवान के नाम को नहीं दोहराना है- बस जो भी मन कर रहा है उसे देखो। उसे परेशान मत करो, उसे रोको मत, उसे दबाओ मत; अपनी ओर से कुछ मत करो। तुम केवल द्रष्टा बने रहो, और देखने का चमत्कार ही ध्यान है। जैसे ही तुम देखते हो, धीरे-धीरे मन विचारों से खाली हो जाता है, लेकिन तुम सो नहीं जाते हो, तुम अधिक होशपूर्ण होने लगते हो, और अधिक जागरूक होने लगते हो।

जैसे ही मन पूरी तरह से खाली हो जाता है, तुम्हारी पूरी ऊर्जा जागरण की एक लौ बन जाती है। यह लौ ध्यान का परिणाम है। तो तुम कह सकते हो कि ध्यान बिना किसी भी मूल्यांकन के देखने का, साक्षी का, निरीक्षण का दूसरा नाम है। मात्र देखकर, तुम तुरंत मन से बाहर आ जाते हो।

जो भी महर्षि महेश योगी और उनके जैसे अन्य लोग कर रहे हैं वह अच्छा है, लेकिन वे जिस किसी चीज को भी ध्यान का नाम दे रहें हैं वह ध्यान नहीं है। इसी बात पर वे लोगों को गुमराह कर रहे हैं। अगर वे ईमानदार और प्रामाणिक बने रहते और लोगों से कहते कि इससे आपको मानसिक स्वास्थ्य, शारीरिक स्वास्थ्य, एक बेहतर आरामदायक जीवन, और एक शांतिपूर्ण जीवन मिलेगा, तो यह सही होता। लेकिन एक बार जब उन्होंने इसे 'ट्रान्सेंडैंटल मैडिटेशन' कह कर बुलाना शुरू किया, तो उन्होंने एक बहुत ही तुच्छ सी चीज को परम महत्व का बता दिया है जैसा कि बिलकुल भी नहीं है। लोग वर्षों से ट्रान्सेंडैंटल मैडिटेशन करते आ रहे हैं, और पूर्व में तो हजारों वर्षों से ट्रान्सेंडैंटल मैडिटेशन कर रहे हैं। लेकिन यह उनका आत्म-ज्ञान नहीं बना है, और ना ही इससे वे गौतम बुद्ध हो गए हैं।

अगर तुम समझना चाहते हो कि ध्यान वाकई में क्या है, तो गौतम बुद्ध वे पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने इसकी उचित, सटीक परिभाषा दि है - जो है साक्षी होना

ओशो, The Invitation, Talk #21 अंग्रेजी में पढ़ना जारी रखने के लिए : यहां क्लिक करें

ओशो,

ध्यान क्या है?

ध्यान अ-मन की अवस्था है। ध्यान बिना किसी विचार के शुद्ध चेतना की स्थिति है। साधारणता, तुम्हारी चेतना, कचरे से बहुत अधिक भरी हुई है, बस धूल से ढके हुए दर्पण की तरह। मन एक निरंतर चलता ट्राफिक है: विचार चल रहे हैं, इच्छाएं चल रही हैं, स्मृतियां चल रही हैं, महत्वाकांक्षाएं चल रही हैं - यह रात-दिन निरंतर चलने वाला एक ट्राफिक है! यहां तक कि जब तुम सो रहे होते हो तो भी मन कोई न कोई काम कर रहा होता है, वह स्वप्न देख रहा होता है। वह अभी भी सोच रहा है; वह अभी भी चिंताओं और तनावों से भरा है। वह अगले दिन की तैयारी कर रहा है; अंदर ही अंदर तैयारी चल रही होती है।

यह गैर-ध्यान की अवस्था है - इसके ठीक विपरीत है ध्यान। जब कोई ट्राफिक नहीं होता और विचार रुक जाते हैं, कोई विचार नहीं चलते हैं, कोई इच्छा तुम्हें डगमगाती नहीं है, तुम पूरी तरह से मौन होते हो - वह मौन ही ध्यान है। और उस मौन में सत्य जाना जाता है, अन्यथा कभी नहीं। ध्यान अ-मन की अवस्था है।

और तुम मन के द्वारा ध्यान को नहीं पा सकते क्योंकि मन स्वयं को टिकाए रखेगा। तुम मन को अलग रखकर ही ध्यान को पा सकते हो, इसके प्रति शांत, उदासीन और स्वयं को उससे दूर हटाकर; मन को गुजरता देखकर, लेकिन इसके साथ बिना कोई तादात्म्य बनाए, बिना यह सोचे कि "यह मैं हूं।"

ध्यान एक बोध है कि "मैं मन नहीं हूं"। जब यह बोध तुम्हारे भीतर गहरा और गहरा हो जाता है, धीरे-धीरे कुछ क्षण आते हैं - मौन के क्षण, शुद्ध रिक्तता के क्षण, पारदर्शिता के क्षण ऐसे क्षण जब तुम्हारे भीतर कोई हलचल नहीं और सब कुछ ठहरा हुआ होता है। उन ठहरे हुए क्षणों में तुम जान लोगे कि तुम कौन हो, और तुम्हें पता चलेगा कि इस अस्तित्व का क्या रहस्य है।

ओशो, Philosophia Perennis, Vol. 2, Talk #5 अंग्रेजी में पढ़ना जारी रखने के लिए : यहां क्लिक करें

ध्यान क्या है? क्या यह कोई तकनीक है जिसका अभ्यास किया जा सकता है? क्या यह कोई प्रयास है जिसे तुम्हें करना है? क्या यह ऐसा कुछ है जिसे मन हासिल कर सकता है? ऐसा नहीं है।

जो कुछ भी मन कर सकता है वह ध्यान नहीं हो सकता - यह कुछ ऐसा है जो मन के पार है, यहां मन बिल्कुल असहाय है।

मन ध्यान में प्रवेश नहीं कर सकता, जहां मन समाप्त होता है, वहां ध्यान आरंभ होता है। इसे स्मरण रखना होगा, क्योंकि हमारे जीवन में, हम जो भी करते हैं, हम मन के द्वारा करते हैं; जो भी हम प्राप्त करते हैं, हम मन के द्वारा करते हैं।

और फिर, जब हम भीतर की ओर मुड़ते हैं, हम फिर से तकनीक, विधि, क्रिया के अनुसार सोचना शुरू कर देते हैं, क्योंकि पूरे जीवन का अनुभव हमें दिखाता है कि सब कुछ मन से किया जा सकता है। हां - ध्यान को छोड़कर, सब कुछ मन के द्वारा किया जा सकता है।

ध्यान को छोड़कर सब कुछ मन से किया जाता है। क्योंकि ध्यान एक उपलब्धि नहीं है – ऐसा पहले से ही है, यह तुम्हारा स्वभाव है। इसे हासिल नहीं करना है; इसे समझना ही नहीं, इसे स्मरण भर रखना है। यह तुम्हारे लिए प्रतीक्षारत है – बस भीतर की और लौटना, और यह उपलब्ध है। तुम हमेशा-हमेशा से इसे साथ लिए हुए हो।

ध्यान तुम्हारा आंतरिक स्वभाव है। वह तुम हो, वह तुम्हारी आत्मा है, इसका तुम्हारे कर्मों से कोई लेना-देना नहीं है। इसे तुम हासिल नहीं कर सकते। इस पर कब्जा नहीं हो सकता, यह कोई वस्तु नहीं है।

यह तुम हो। यह तुम्हारा होना हैै।

ओशो, Ancient Music in the Pines, Talk #7 अंग्रेजी में पढ़ना जारी रखने के लिए : यहां क्लिक करें

हम जिस ध्यान की बात कर रहें हैं वह किसी का ध्यान नहीं है: ध्यान की एक अवस्था है। अवस्था का मतलब ये है ध्यान का मतलब किसी को स्मरण में लाना नहीं है। ध्यान का मतलब जो सब हमारे स्मरण में है उनको गिरा देना है। और एक स्थिति लानी है कि केवल चेतना मात्र रह जाए, केवल जागरूकता मात्र रह जाए।

यहां हम एक दिया मात्र जलाएं और यहां से सारी चीजें हटा दें तो भी दिया प्रकाश करता रहेगा। वैसे ही अगर हम चित्त से सारे विचार हटा दें, चित्त से सारी कल्पनाएं हटा दें तो क्या होगा? जब सारे विचार, सारी कल्पनाएं हट जाएंगी तो क्या होगा? चेतना अकेली रह जाएगी। चेतना की वो अकेली अवस्था ध्यान है। ध्यान किसी का नहीं करना होता है, ध्यान एक अवस्था है जब चेतना अकेली रह जाती है।

जब चेतना अकेली रह जाए और चेतना के सामने कोई विषय न हो उस अवस्था का नाम ध्यान है। मैं ध्यान का उसी अर्थ में प्रयोग कर रहा हूं।

जो हम प्रयोग करते हैं वो ठीक अर्थों में ध्यान नहीं धारणा है; ध्यान तो उपलब्ध होगा उसके द्वारा जो हम प्रयोग कर रहे हैं। समझ लें रात्रि में हमने प्रयोग किया चक्रों पर, सुबह हम प्रयोग करते है स्वांस पर ये सब धारणा हैं, ये ध्यान नहीं हैं। इस धारणा के माध्यम से एक घड़ी आएगी की स्वांस भी विलीन हो जाएगी। इस धारणा के माध्यम से एक घड़ी आएगी की शरीर भी विलीन हो जाएगा, विचार भी विलीन हो जाएंगे। जब सब विलीन हो जाएगा तो क्या शेष रहेगा? जो शेष रहेगा उसका नाम ध्यान है।

ओशो, ध्यान सूत्र - The Path of Meditation, Talk #6 अंग्रेजी में पढ़ना जारी रखने के लिए : click here

ध्यान की स्थिति एक निर्दोष, मौन की अवस्था है। तुम आनंदपूर्वक अपनी जागरूकता के प्रति अजागरूक हो। तुम हो, लेकिन तुम पूरी तरह से विश्रांत हो। तुम नींद की अवस्था में नहीं हो; तुम पूरी तरह से सजग हो, पहले से कहीं ज्यादा सजग। बल्कि, तुम सजगता हो।

Osho, Walking in Zen, Sitting in Zen, Talk #1 अंग्रेजी में पढ़ना जारी रखने के लिए : यहां क्लिक करें

जब मैं "आंतरिक यात्रा" शब्द का प्रयोग करता हूं, तो मेरा सरल सा अर्थ यह होता है कि तुमने अपनी जीवन की यात्रा में केवल एक ही पहलू को देखा है जो "बाहरी" कहलाता है, अब उस यात्रा के दूसरे पहलु को देखने का प्रयास करो जो "आंतरिक" है। तुम पैसे के पीछे दौड़ते रहे हो, अब ध्यान के पीछे दौड़ो। तुम सत्ता के पीछे दौड़ते रहे हो, अब ईश्वर के पीछे दौड़ो। दोनों ही दौड़ हैं। एक बार तुम ध्यान के पीछे दौड़ना शुरू करोगे तो एक दिन मैं तुमसे कहूंगा, "अब ध्यान भी छोड़ दो। अब दौड़ना बंद करो।" और जब तुम दौड़ना बंद कर देते हो तो वास्तविक ध्यान घटता है।

मौन में बैठे हुए,

कुछ न करते हुए,

वसंत आता है,

और घास स्वयं ही उगती है।

तो ध्यान के दो अर्थ हैं। यही कारण है कि भारत में हमारे पास इसके लिए दो शब्द हैं: ध्यान और समाधि। ध्यान कुछ समय के लिए होता है, ध्यान कभी किया कभी नहीं किया; समाधि का अर्थ है कि अब तुम घर पहुंच गए, अब ध्यान करने की आवश्यकता नहीं रही। जब ध्यान करने की भी आवश्यकता नहीं होती, तो व्यक्ति ध्यानमय होता है - इससे पहले कभी नहीं। जब कोई ध्यान में जीता हो, ध्यान में चलता हो, ध्यान में सोता हो, जब व्यक्ति के होने का ढंग ही केवल ध्यान हो, तो व्यक्ति पहुंच गया।

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क्या है ध्यान ?-

10 FACTS;-

ध्यान कोई भारतीय विधि नहीं है और यह केवल एक विधि मात्र भी नहीं है। तुम इसे सीख नहीं सकते। तुम्हारी संपूर्ण जीवन चर्या का, तुम्हारी संपूर्ण जीवन चर्या में यह एक विकास है। ध्यान कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे, जैसे कि तुम हो, उसमें जोड़ा जा सके। यह एक मौलिक रूपांतरण है जो कि तुम्हारे स्वयं के उपर उठने के द्वारा ही आ सकता है। यह एक खिलावट है, यह विकसित होना है। विकास सदा ही पूर्ण होने से होता है, यह कुछ और जोड़ना नहीं है। तुम्हें ध्यान की ओर विकसित होना पड़ेगा।

व्यक्ति की इस समग्र खिलावट को ठीक से समझ लेना चाहिए। अन्यथा कोई अपने साथ खेल, खेल सकता है, वह अपने ही मन की तरकीबों में उलझ सकता है। और बहुत सी तरकीबें है। उनके द्वारा न केवल तुम मूर्ख बनोगे, उनके द्वारा न केवल तुम कुछ नहीं पाओगे, बल्कि वास्तविक अर्थ में तुम्हें उनसे नुकसान ही होगा। यह मान लेना कि ध्यान की कोई तरकीब है- ध्यान की एक विधि के रूप में कल्पना करना- आधारभूत रूप से गलत है। और जब कोई व्यक्ति मन की चालाकियों में रस लेने लगता है तब मन की गुणवत्ता नष्ट होने लगती है।

जैसे कि मन है, यह गैर-ध्यान पूर्ण है। ध्यान के घटित होने से पूर्व संपूर्ण मन का रूपांतरण होना चाहिए। मन सदा व्याख्या करता है। तुम शब्दों को जान सकते हो, तुम भाषा को जान सकते हो, तुम विचार की प्रक्रिया को, उसकी संरचना को जान सकते हो, लेकिन यह विचारणा नहीं है। बल्कि इसके विपरीत यह विचारणा से पलायन है। तुम एक फूल देखते हो, और तुम इसकी व्याख्या करते हो। मन प्रत्येक आकार को, वस्तु को शब्दों में रूपांतरित कर सकता है। तब शब्द एक कारागृह, एक अवरोध बन जाते हैं।वस्तुओं का शब्दों में,उनके

होने का ; उनके अस्तित्व का, शब्दों में निरंतर बंध जाना ध्यान पूर्ण चित्त के लिए बाधा है।

इसलिये ध्यान पूर्ण चित्त के लिए प्रथम आवश्यकता है, चीजों की व्याख्या करने की इस आदत के प्रति सतत जागरुकता और इसको रोक सकने की योग्यता।

वस्तुओं को मात्र देखो, उनकी व्याख्या मत करो। उनकी उपस्थिति के प्रति बोध पूर्ण रहो; किंतु उनको शब्दों में मत बदलो। वस्तुओं को होने दो, भाषा के बिना, व्यक्तियों को होने दो, भाषा के बिना, परिस्थितियों को होने दो, भाषा के बिना। यह असंभव नहीं है, यह स्वाभाविक है। अभी जो स्थिति है कृत्रिम तो वह है, लेकिन हमारी ऐसी आदत पड़ गई है, यह सब इतना यांत्रिक हो गया है, कि हमें इसका बोध भी नहीं रहता कि हम निरंतर अनुभवों को शब्दों में रूपांतरित कर रहे हैं।

सूर्योदय है, तुम कभी इसको ‘देखने’ और ‘इसकी व्याख्या करने’ के अंतराल के प्रति जागरुक नहीं होते। तुम सूर्य को देखते हो, तुम इसे अनुभव करते हो और तुरंत ही तुम इसकी व्याख्या कर देते हो। देखने और व्याख्या के बीच का अंतराल खो जाता है। यह तथ्य; एक उपस्थिति है। मन स्वतः ही अनुभवों को शब्दों में रूपांतरित कर लेता है। तब ये शब्द, तुम्हारे और अनुभव के मध्य में आ जाते हैं।

ध्यान का अर्थ है- शब्दों के बिना जीना, भाषा रहित होकर जीना। कभी-कभी यह सहज स्फूर्त रूप से घटित हो जाता है। जब तुम प्रेम में होते हो, उपस्थिति अनुभव होती है, भाषा नहीं। जब दो प्रेमी एक दूसरे के प्रति आत्मीयता से भरे होते हैं, तो मौन हो जाते हैं। ऐसा नहीं है कि वहां अभिव्यक्त करने को कुछ नहीं है। इसके विपरीत इस समय अभिव्यक्ति के लिए बहुत कुछ उद्वेलित होता है। किंतु शब्द वहां कभी नहीं होते, वे हो भी नहीं सकते। वे सिर्फ तब आते हैं, जब प्रेम जा चुकता है।

यदि दो प्रेमी कभी मौन न हों, तो यह एक संकेत है कि प्रेम मर चुका है। अब वे उस अंतराल को शब्दों से भर रहे हैं। जब प्रेम जीवित होता है, शब्द वहां नहीं होते, क्योंकि प्रेम की उपस्थिति इतनी उद्वेलित करने वाली, इतनी पैनी होती है कि भाषा और शब्दों का अवरोध पार हो जाता है और सामान्यतः यह सिर्फ प्रेम में ही पार होता है।ध्यान प्रेम की पराकाष्ठा

है। किसी एक व्यक्ति के प्रति प्रेम नहीं, वरन समग्र अस्तित्त्व के प्रति जीवंत संबंध है, जो तुम्हें घेरे हुए है।

यदि तुम किसी भी परिस्थिति में प्रेममय रह सको तो तुम ध्यान में हो।और यह कोई मन की तरकीब नहीं है। यह कोई मन को स्थिर करने की विधि नहीं है। बल्कि इसके लिए मन की यंत्रवत होने की गहन समझ अनिवार्य है। जिस पल तुम व्याख्या की, अस्तित्त्व को शब्दों में बदलने की, अपनी यांत्रिक आदत को समझते हो, एक अंतराल उत्पन्न हो जाता है। यह सहज स्फूर्त आता है। यह समझ का एक छाया की भांति अनुगमन करता है।वास्तविक

समस्या यह नहीं है, कि ध्यान में कैसे हों, बल्कि यह जानना है कि ध्यान में तुम क्यों नहीं हो।ध्यान की पूरी प्रक्रिया निषेधात्मक है। यह तुममें कुछ जोड़ना नहीं है, यह कुछ घटाता है जो पहले से ही जोड़ दिया गया है।

समाज भाषा के बिना नहीं रह सकता, इसे भाषा चाहिए ही। किंतु अस्तित्त्व को इसकी जरूरत नहीं है। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि तुम्हें भाषा के बिना रहना चाहिए। तुम्हें इसका प्रयोग तो करना ही पड़ेगा। किंतु तुम्हें इस योग्य होना चाहिए कि व्याख्या करने की यांत्रिक आदत को रोक सको और जीना शुरू कर सको। जब तुम एक सामाजिक प्राणी के रूप में होते हो, तो भाषा की यांत्रिक आदत आवश्यक है; किंतु जब तुम अस्तित्त्व के साथ अकेले हो तो तुम्हें इस योग्य होना पड़ेगा कि इसे रोक सको। यदि तुम इसे बंद नहीं कर सकते तो यह लगातार चलती चली जाती है, और तुम इसे रोकने में असमर्थ हो, तब तुम इसके गुलाम बन गये हो।

मन को एक उपकरण होना चाहिए, मालिक नहीं। जब मन मालिक होता है, यह एक गैर ध्यान पूर्ण अवस्था होती है। जब तुम मालिक होते हो, तुम्हारी चेतना मालिक होती है, तब यह एक ध्यान पूर्ण अवस्था होती है। इसलिये ध्यान का अर्थ है, मन की यांत्रिक आदत का मालिक हो जाना। मन और मन की भाषा संसार में उपयोगी है लेकिन परम सत्य को जानने में बाधा है। तुम इसके पार हो, अस्तित्त्व इसके पार है। चेतना भाषा से परे है, अस्तित्त्व भाषा से परे है। जब चेतना और अस्तित्त्व एक हों, वे संवाद में होते हैं। यह संवाद ही ध्यान है।

भाषा को छोड़ना पड़ेगा। मेरा अर्थ यह नहीं है कि तुम्हें इसे दमित या फेंक देना पड़ेगा। मेरा अर्थ सिर्फ इतना है कि यह तुम्हारे लिए दिन के चौबीसो घंटो की आदत न बनी रहे। जब तुम चलते हो तो तुम अपने पांवो को गतिमान करते हो। किंतु यदि तुम बैठे हो और तब भी वे गतिमान रहें तो तुम पागल हो। तुम्हें इस योग्य होना पड़ेगा कि उन्हें रोक सको। ठीक इसी तरह जब तुम किसी से बातचीत नहीं कर रहे हो भाषा को वहां नहीं होना चाहिए। यह तो संवाद का माध्यम है। जब तुम किसी के साथ संवाद नहीं कर रहे हो, तो यह वहां नहीं होनी चाहिए।

यदि तुम ऐसा करने में समर्थ हो तो तुम ध्यान में विकसित हो सकते हो। ध्यान एक विकसित होने की सतत प्रक्रिया है, कोइ ठहरी हुइ स्थिती या विधी नहीं। विधी सदा ही मृत होती है, इसलिये यह तुममें जोड़ी जा सकती है, किंतु प्रक्रिया सदा जीवंत है। यह विकसित होती है, इसका विस्तार होता है।भाषा आवश्यक है, किंतु तुम्हें सदा इसमें नहीं रहना

चाहिए। कुछ पल ऐसे होने चाहिए, जब कोई व्याख्या न हो, बस तुम हो। इसका अर्थ यह नहीं है कि तुम मात्र पौधों की तरह हो। चेतना तो वहां है ही और यह अधिक पैनी, अधिक जीवंत होती है, क्योंकि भाषा इसे मंद कर देती है। भाषा पुनरूक्त होने के लिए बाध्य है, इसलिये यह ऊब पैदा करती है। तुम्हारे लिए भाषा जितनी अधिक महत्त्व पूर्ण होगी, उतना ही तुम अधिक ऊबोगे।

इसलिये मेरे लिए ध्यान कोई विधि नहीं बल्कि एक प्रक्रिया है; ध्यान कोई विधि नहीं , बल्कि एक समझ है। यह सिखाया नहीं जा सकता, इसका मात्र संकेत दिया जा सकता है। तुम्हें इसके बारे में सूचित नहीं किया जा सकता क्योंकि कोई सूचना, वास्तविक रूप से सूचना नहीं है। क्योंकि यह बाहर से है, और ध्यान तुम्हारी अपनी भीतरी गहराइयों से आता है।

इसलिये खोजो, खोजी हो जाओ, और शिष्य मत बनो। तब तुम किसी एक गुरु के शिष्य नहीं होगे बल्कि समस्त जीवन के शिष्य होगे। तब तुम मात्र शब्दों को नहीं सीख रहे होगे। आध्यात्मिक सीख शब्दों से नहीं आ सकती, बल्कि अंतरालों से, उस मौन से जो तुम्हें सदा घेरे हुए है, आती है। वे भीड़ में, हाट में, बाजार में भी हैं। मौन को खोजो, अंदर और बाहर अ