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क्या “विचार'' की त्वरित उत्पत्ति वास्तविक समस्या है?क्या अर्थ है विचार के स्वरूप का? PART 01


विचार क्या है?-

05 FACTS;-

1-विचार कैसे पैदा होते हैं ..यह जानना जरूरी है, तभी उन्हें जन्मने से रोका जा सकता है।साधारणतया उनकी उत्पत्ति के

सत्य को जाने बिना ही साधक उनके दमन, सप्रेशन में लग जाते हैं। इससे कोई विक्षिप्त तो हो सकता है, विमुक्त नहीं हो सकता है। विचार के दमन से कोई अंतर नहीं पड़ता है, क्योंकि वे प्रतिक्षण नये -नये उत्पन्न हो जाते हैं। वे पौराणिक

कथाओं के उन राक्षसों की भांति हैं, जिनके एक सिर को काटने पर दस सिर पैदा हो जाते थे। विचारों को मारने की आवश्यकता नहीं हैं क्योकि वे स्वयं ही प्रतिक्षण मरते रहते हैं। विचार बहुत अल्पजीवी है। कोई भी विचार ज्यादा नहीं टिकता, पर विचार प्रक्रिया /थॉट प्रोसेस टिकती है।एक -एक विचार तो अपने आप मर जाता है, पर विचार- प्रवाह नहीं मरता है।एक

विचार मर भी नहीं पाता है कि दूसरा उसका स्थान ले लेता है। यह स्थानपूर्ति बहुत त्वरित है और यही समस्या है।

2- विचार की मृत्यु नहीं, उसकी त्वरित उत्पत्ति.. वास्तविक समस्या है।जो विचार की उत्पति के विज्ञान को

समझ लेता है, वह उससे मुक्त होने का मार्ग सहज ही पा जाता है।और जो यह नहीं समझता है, वह स्वयं ही

एक ओर विचार पैदा किए जाता है और दूसरी ओर उनसे लड़ता भी है। इससे विचार तो नहीं टूटते, इसके विपरीत वह स्वयं ही टूट जाता है। विचार समस्या नहीं, विचार की उत्पत्ति समस्या है।वह कैसे पैदा होता है, यह सवाल है।यह हम सब जानते हैं

कि चित्त चंचल है। इसका अर्थ है कि कोई भी विचार दीर्घजीवी नहीं ..पलजीवी है। वह तो जन्मता है और मर जाता है। उसके जन्म को रोक लें तो उसकी हत्या की हिंसा से भी बच जाएंगे और वह अपने आप विलीन भी हो जाता है।

3-विचार की उत्पत्ति कैसे होती है?...वास्तवमें,विचार की उत्पत्ति, बाह्य जगत के प्रति हमारी प्रतिक्रिया, रिएक्शन से होता है। बाहर घटनाओं और वस्तुओं का जगत है। इस जगत के प्रति हमारी प्रतिक्रिया ही हमारे विचारों की जन्मदात्री है।विचार से विमुख

और निर्विचार होना ...थॉटलेसनेस के सन्मुख होना है।कोई एक फूल को देखता है तो ‘ देखना’ कोई विचार नहीं है और यदि वह देखता ही रहे तो कोई विचार पैदा नहीं होगा। पर वह देखते ही कहता है कि ‘ फूल बहुत सुंदर है ‘ और विचार का जन्म हो जाता है।मात्र देखने से सौंदर्य की अनुभूति तो होगी, पर विचार का जन्म नहीं होगा। पर अनुभूति होते ही हम उसे शब्द देने

में लग जाते हैं।अनुभूति को शब्द देते ही विचार का जन्म हो जाता है। यह प्रतिक्रिया, यह शब्द देने की आदत, अनुभूति को, दर्शन को ..विचार से आच्छादित कर देती है। अनुभूति दब जाती है, दर्शन /View दब जाता है। और शब्द चित्त में तैरते रह जाते हैं। ये शब्द ही विचार हैं।

4-ये विचार अत्यंत अल्पजीवी हैं और इसके पहले कि एक विचार मरे हम दूसरी अनुभूति को विचार में परिणत कर लेते हैं। फिर यह प्रक्रिया जीवन भर चलती रहती है और हम शब्दों से इतने भर जाते और दब जाते हैं कि स्वयं को ही उनमें खो देते

हैं। दर्शन/Viewको शब्द देने की आदत छोड़ने से विचार का जन्म निषेध हो जाता है।कोई मात्र देखता/जस्ट सीइंग ही रहे और View को कोई शब्द न दे तो जीवन में इतनी बड़ी क्रांति होगी कि उससे बड़ी कोई क्रांति/रिवोल्‍यूशन नहीं हो सकती है।

शब्द बीच में आकर उस क्रांति को रोक लेते हैं।मात्र देखने से एक अलौकिक शांति भीतर अवतरित हो जाती है, एक शून्य व्याप्त हो जाता है।क्योंकि शब्द का न होना ही शून्य है, और इस शून्य में चेतना की दिशा परिवर्तित होती है, फिर क्रमश: वह भी उभरने लगता है जो आपको देख रहा है।

5-चेतना -क्षितिज/Consciousness पर एक नया जागरण होता है जैसे कि हम किसी स्वप्न से जाग उठे हों और एक निर्मल आलोक /Pure Prospect और एक अपरिसीम शांति से चित्त भर जाता है।इस आलोक में स्वयं का दर्शन होता है।इस शून्य में सत्य का अनुभव होता है। इस प्रयोग को ही ‘सम्यक स्मृति’ /Right Mindfulness कहा जाता है।यह स्मृति या अवेअरनेस