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क्या “विचार'' की त्वरित उत्पत्ति वास्तविक समस्या है?क्या अर्थ है विचार के स्वरूप का? PART 01


विचार क्या है?-

05 FACTS;-

1-विचार कैसे पैदा होते हैं ..यह जानना जरूरी है, तभी उन्हें जन्मने से रोका जा सकता है।साधारणतया उनकी उत्पत्ति के

सत्य को जाने बिना ही साधक उनके दमन, सप्रेशन में लग जाते हैं। इससे कोई विक्षिप्त तो हो सकता है, विमुक्त नहीं हो सकता है। विचार के दमन से कोई अंतर नहीं पड़ता है, क्योंकि वे प्रतिक्षण नये -नये उत्पन्न हो जाते हैं। वे पौराणिक

कथाओं के उन राक्षसों की भांति हैं, जिनके एक सिर को काटने पर दस सिर पैदा हो जाते थे। विचारों को मारने की आवश्यकता नहीं हैं क्योकि वे स्वयं ही प्रतिक्षण मरते रहते हैं। विचार बहुत अल्पजीवी है। कोई भी विचार ज्यादा नहीं टिकता, पर विचार प्रक्रिया /थॉट प्रोसेस टिकती है।एक -एक विचार तो अपने आप मर जाता है, पर विचार- प्रवाह नहीं मरता है।एक

विचार मर भी नहीं पाता है कि दूसरा उसका स्थान ले लेता है। यह स्थानपूर्ति बहुत त्वरित है और यही समस्या है।

2- विचार की मृत्यु नहीं, उसकी त्वरित उत्पत्ति.. वास्तविक समस्या है।जो विचार की उत्पति के विज्ञान को

समझ लेता है, वह उससे मुक्त होने का मार्ग सहज ही पा जाता है।और जो यह नहीं समझता है, वह स्वयं ही

एक ओर विचार पैदा किए जाता है और दूसरी ओर उनसे लड़ता भी है। इससे विचार तो नहीं टूटते, इसके विपरीत वह स्वयं ही टूट जाता है। विचार समस्या नहीं, विचार की उत्पत्ति समस्या है।वह कैसे पैदा होता है, यह सवाल है।यह हम सब जानते हैं

कि चित्त चंचल है। इसका अर्थ है कि कोई भी विचार दीर्घजीवी नहीं ..पलजीवी है। वह तो जन्मता है और मर जाता है। उसके जन्म को रोक लें तो उसकी हत्या की हिंसा से भी बच जाएंगे और वह अपने आप विलीन भी हो जाता है।

3-विचार की उत्पत्ति कैसे होती है?...वास्तवमें,विचार की उत्पत्ति, बाह्य जगत के प्रति हमारी प्रतिक्रिया, रिएक्शन से होता है। बाहर घटनाओं और वस्तुओं का जगत है। इस जगत के प्रति हमारी प्रतिक्रिया ही हमारे विचारों की जन्मदात्री है।विचार से विमुख

और निर्विचार होना ...थॉटलेसनेस के सन्मुख होना है।कोई एक फूल को देखता है तो ‘ देखना’ कोई विचार नहीं है और यदि वह देखता ही रहे तो कोई विचार पैदा नहीं होगा। पर वह देखते ही कहता है कि ‘ फूल बहुत सुंदर है ‘ और विचार का जन्म हो जाता है।मात्र देखने से सौंदर्य की अनुभूति तो होगी, पर विचार का जन्म नहीं होगा। पर अनुभूति होते ही हम उसे शब्द देने

में लग जाते हैं।अनुभूति को शब्द देते ही विचार का जन्म हो जाता है। यह प्रतिक्रिया, यह शब्द देने की आदत, अनुभूति को, दर्शन को ..विचार से आच्छादित कर देती है। अनुभूति दब जाती है, दर्शन /View दब जाता है। और शब्द चित्त में तैरते रह जाते हैं। ये शब्द ही विचार हैं।

4-ये विचार अत्यंत अल्पजीवी हैं और इसके पहले कि एक विचार मरे हम दूसरी अनुभूति को विचार में परिणत कर लेते हैं। फिर यह प्रक्रिया जीवन भर चलती रहती है और हम शब्दों से इतने भर जाते और दब जाते हैं कि स्वयं को ही उनमें खो देते

हैं। दर्शन/Viewको शब्द देने की आदत छोड़ने से विचार का जन्म निषेध हो जाता है।कोई मात्र देखता/जस्ट सीइंग ही रहे और View को कोई शब्द न दे तो जीवन में इतनी बड़ी क्रांति होगी कि उससे बड़ी कोई क्रांति/रिवोल्‍यूशन नहीं हो सकती है।

शब्द बीच में आकर उस क्रांति को रोक लेते हैं।मात्र देखने से एक अलौकिक शांति भीतर अवतरित हो जाती है, एक शून्य व्याप्त हो जाता है।क्योंकि शब्द का न होना ही शून्य है, और इस शून्य में चेतना की दिशा परिवर्तित होती है, फिर क्रमश: वह भी उभरने लगता है जो आपको देख रहा है।

5-चेतना -क्षितिज/Consciousness पर एक नया जागरण होता है जैसे कि हम किसी स्वप्न से जाग उठे हों और एक निर्मल आलोक /Pure Prospect और एक अपरिसीम शांति से चित्त भर जाता है।इस आलोक में स्वयं का दर्शन होता है।इस शून्य में सत्य का अनुभव होता है। इस प्रयोग को ही ‘सम्यक स्मृति’ /Right Mindfulness कहा जाता है।यह स्मृति या अवेअरनेस

रखना है कि शब्द का संगठन न हो और शब्द बीच में न आए। यह हो सकता है, क्योंकि शब्द केवल हमारी आदत है।एक नवजात शिशु जगत को बिना शब्द के देखता है। वह शुद्ध प्रत्यक्षीकरण है। फिर धीरे -धीरे वह शब्द की आदत सीखता है, क्योंकि बाह्य जगत और बाह्य जीवन के लिए वह सहयोगी और उपयोगी है।पर जो बाह्य जीवन के लिए सहयोगी है, वही अंतस जीवन को जानने में बाधा हो जाता है। और इसलिए एक बार फिर वृद्धों को भी नवजात शिशु के शुद्ध दर्शन को जगाना पड़ता है, ताकि वे स्वयं को जान सकें। शब्द से जगत को जाना, फिर शून्य से स्वयं को जानना होता है।

क्या अर्थ है विचार के स्वरूप का?-

13 FACTS;-

1- विचार का स्वरूप "नहीं' है। विचार "हां' को जानता ही नहीं और "नहीं' शब्द में विचार की प्रक्रिया समा जाती है।विचार सदा ही अंत में निराशाजनक होता है क्योंकि उसकी उत्पत्ति नेगेटिव है। विचार को उसके तार्किक अंत तक ले जाया जाए तो नास्तिकता के अतिरिक्त और कुछ भी हाथ नहीं लगता। ध्यान पॉजिटिव है; वह अस्तित्व में ले जाता है। विचार निषेध है; वह तुम्हारे भ्रमों को तोड़ देता है।इसलिए विचारक की यह मजबूरी है कि जितना सोचेगा उतना ही उदास होता जाएगा। क्योंकि जितना सोचेगा उतने जीवन के भ्रम टूटेंगे और जीवन के सत्यों का उसे कुछ भी पता नहीं चलेगा। भ्रम टूटने से रिक्तता हाथ लगती है। और रिक्तता वही नहीं है जिसे शून्य कहा गया है क्योकि शून्य तो रस से सरोबोर होता है।लेकिन रिक्तता में कुछ भी नहीं है ...खालीपन है। विचार का उपयोग किया जा सकता है लेकिन ध्यान के सेवक की तरह। अगर किसी ने विचार को मालिक बना लिया तो बहुत पछताएगा।सत्य भी बहुत खतरनाक है क्योंकि जिसके भी जीवन के भ्रम टूट जाते हैं उसका जीना मुश्किल हो जाता है।

2- उदाहरण के लिए कोई व्यक्ति मंदिर में पूजा करता है;और मानता है कि उसकी पूजा परमात्मा तक पहुंच रही है।वह मानता है तो सुखी है। फिर विचार जगे,सोचने लगे कहां परमात्मा, कैसा परमात्मा! कभी देखा तो नहीं। किसने देखा? यह पत्थर की मूर्ति है जिसके सामने मैं पूजा कर रहा हूं। यह मैं ही बाजार से खरीद लाया हूं। यह मनुष्य की बनायी हुई मूर्ति है। परमात्मा तो वह है जिसने मनुष्य को बनाया। और यह कैसा परमात्मा, जिसको मनुष्य ने बनाया? यह परमात्मा नहीं हो

सकता।तब पूजा का थाल हाथ से गिर जाएगा ,फूल बिखर जाएंगे और प्रार्थना खंडित हो जाएगी। इस व्यक्ति के जीवन में अमावस आ गई। चांद तो कभी था ही नहीं,अमावस ही थी, मगर चांद को मान रखा था क्योंकि मानने में भी मजा था और वह

मजा भी गया।इसके जीवन में भ्रम टूटा, यह आधा काम है। अब इसके आगे विचार की प्रक्रिया समाप्त हो जाती है और ध्यान की प्रक्रिया शुरू होती है।बाहर भगवान नहीं है, मंदिर में भगवान नहीं है, मूर्ति में भगवान नहीं है। यह पूजा का थाल व्यर्थ हुआ। ये सब हीरे नहीं ,केवल पत्थर थे और सब मान्यताएं उखड़ गईं।

3-अगर यहीं कोई रुक गया तो आत्मघात के अतिरिक्त और कुछ बचता नहीं। जिएगा भी तो मरा -मरा जिएगा। ध्यान यहीं से शुरू होता है। अब भीतर मुड़ो बाहर के मंदिर व्यर्थ हो गए, अब भीतर के मंदिर में तलाशो। विचार व्यर्थ हो गया, विचार ने

अपना काम पूरा कर दिया, अब निर्विचार को काम करने दो। पश्चिम विचार से ऊपर नहीं जाता। ध्यान पूरब की महिमा है। हमने भी इतना विचार किया कि विचार बिल्कुल व्यर्थ हो गया।लेकिन हम वहीं नहीं रुके।हमने वहीं से शुरुआत मानी

और असली तीर्थयात्रा वहीं से शुरू हुई है। फिर हमने निर्विचार में झांका... मौन हुए। फिर हमने आंखें बंद कीं और आंखें बंद करके देखा। तर्क छोड़ा, सिर्फ देखा अथार्त भीतर साक्षी बने।लेकिन सोचा नहीं, केवल देखा कि भीतर क्या है ..यह मैं कौन हूं? यह मेरा अस्तित्व क्या है ..मेरा चैतन्य क्या है? विचार भ्रम तोड़ता है, ध्यान सत्य को देता है।

4-वास्तव में, जिस दिन मनुष्य के सारे भ्रम टूट जाएंगे उस दिन वह जी न सकेगा...विक्षिप्त हो जाएगा।इसीलिए उसको अपने भ्रमों में जीने दो ...करने दो उसे पूजा पाठ, जपने दो उसे मंत्र, फेरने दो उसे माला, मानने दो उसे आकाश में किसी परमात्मा को, रहने दो भयभीत नरक से, भरा रहने दो लोभ से ,स्वर्ग के प्रति, करने दो कामना स्वर्ग की। उसके जीवन में उत्साह रहेगा। मिट्टी मिट्टी में मिल जानेवाली है; न कोई स्वर्ग है, न कोई मोक्ष है; न कोई परमात्मा है न कोई आगे जीवन है। मगर कहो मत। मनुष्य के पैर के नीचे की जमीन मत खींच लो।जब उसके सारे भ्रम टूट गए तो विक्षिप्त न होगा तो और क्या करेगा ? धन व्यर्थ है, प्रेम व्यर्थ है, परमात्मा भी व्यर्थ हो गया। पद व्यर्थ है, प्रतिष्ठा व्यर्थ है ..सब कुछ व्यर्थ हो गया, अब कैसे जिये?इसीलिए

मनुष्य बिना भ्रमों के नहीं जी सकता। भ्रम उसका आधार है, उसकी बुनियाद है।

5-लेकिन यह बात अधूरी है और अधूरे सत्य असत्यों से भी ज्यादा भयंकर होते हैं। तुमसे कुछ छीन तो लेते हैं , लेकिन तुम्हें देते कुछ भी नहीं। तुम्हारे हाथ में कांटा था, वह तो छिन जाता है लेकिन फूल नहीं आता। माना कि कांटा दुःख भी दे रहा था तो भी कम से कम कुछ तो हाथ में था! कुछ व्यस्त होने का उपाय तो था ..वह भी गया।वास्तवमें, मनुष्य रिक्तता की बजाय

बीमारियां ,उलझनें पसंद करेगा। कम से कम उलझा तो रहता है ..रिक्तता तो बहुत भयानक है, बहुत घबड़ानेवाली है। रिक्तता में जिसने भी झांका.. वह पागल हो जाएगा। उसने एक ऐसे जगत में देख लिया जहां कोई अर्थ नहीं है। कोई पशु-पक्षी

अपनी जाति को नहीं मारते।सारी पृथ्वी पर, सिर्फ मनुष्य अकेला प्राणी है, जो मनुष्य को मारता है। कोई पशु -पक्षी दूसरी जातियों को भी मारते हैं ..तो सिर्फ भोजन की दृष्टि से --भूख के कारण।वे शिकार खेलने नहीं जाते। मनुष्य अकेला है जो शिकार खेलता है।

9-कोई सिंह शिकार नहीं खेलता और तभी मारता है जब भूखा हो। सिर्फ मनुष्य खेल में भी मारता है; मारने में भी रस लेता

है। मारने में ,ध्वंस में एक कुत्सित रस है। मनुष्य बस, बातें करने में कुशल हो गया है लेकिन भीतर...।ऊपर सम्हला

दिखता है, भीतर बिल्कुल पागल है।इसलिए उसको सपना देखने दो ..उसका सपना तोड़ दोगे,तो फिर उसे सुलाना मुश्किल

हो जाएगा। एक बार नींद टूट गई तो फिर कोई उपाय उसे सुलाने का नहीं है।मगर यह बात अधूरी है। हमने और आगे भी तलाश की है। जहां विचार के पार .ध्यान में झांकते हो ..तो रिक्तता मिट जाती है, वहां पूर्ण का अवतरण होता है। ध्यान परम

आलोक से भर जाता है। शाश्वत जीवन की प्रतीति होने लगती है।लेकिन सुबह होने के पहले रात खूब काली हो जाती है ।यह

निराशा एक बड़ी आशा का जन्म बन सकती है।इसलिए ध्यान की तलाश शुरू हुई है। विचार ले आया ..आखिरी कगार पर।

अब लौटने का कोई उपाय नहीं है।जीवन की सारी मान्यताएं उखड़ गईं।लेकिन भारत अभी भी इतना दरिद्र है कि विचार

भी नहीं कर पाया, ध्यान कैसे करें? अभी तो भारत अपनी मान्यताओं में डूबा हुआ सपने देख रहा है।संत -महात्मा की पिटी -पिटायी पुरानी बातें दोहराए चले जा रहा हैं।अभी भी करोड़ों रुपए विश्वशांति के लिए यज्ञ में खर्च किए जाते हैं।

10- ध्यान भीतरी घटना है, बाहर से देखने का कोई उपाय नहीं है।इसलिए भारत की उत्सुकता ध्यान में नहीं बल्कि धन में है। और तुम लाख कहो कि भारत धार्मिक देश है ..कभी रहा होगा, अभी तो नहीं है। और तुम सदा यही दोहराते

रहते हो कि हम धार्मिक हैं।तुमने धार्मिक होने को मान्यता की , विश्वास की बात बना ली है। धार्मिक होना विश्वास की बात नहीं है, बल्कि एक जीवंत रूपांतरण है। जब तक तुम्हारे सारे विश्वास और तुम्हारी सब धारणाएं न गिर जाएं तब तक तुम जानने के

मार्ग पर कदम नहीं उठा सकते।हीरे तुम्हारे भीतर हैं ..कंकड़ पत्थर बाहर हैं।बाहर जो है, सब पाखंड है। अगर परमात्मा को खोजना है तो भीतर खोजो। अकेले ,अपने भीतर चलो ..जहां कोई न रह जाए, कोई दूसरा , दूसरे की छाया भी न रह जाए। जहां सब निर्विचार हो, उसी निर्विचार चैतन्य में तुम जानोगे कि ईश्वर है और फिर वह ईश्वर न हिंदुओं का , न मुसलमानों का और न ईसाइयों का ईश्वर है ..वह मात्र ईश्वर है।

11-और तब श्रद्धा का आविर्भाव होता है जो ज्ञान से उपलब्ध होती है। विश्वास अज्ञान में उत्पन्न होता है और विश्वास को श्रद्धा मत समझ लेना क्योकि वह धोखा है। विश्वास झूठा सिक्का है;जो श्रद्धा जैसा लगता है .. तभी तो बाजार में चल

सकता है। है।विश्वास ने व्यक्ति को बहुत भरमाया है, भटकाया है और अगर विश्वास छीन लोगे,तो व्यक्ति घबड़ा जाएगा। इसलिए केवल सद्गुरु ही केवल विश्वास छीन सकता है। क्योंकि उसे भरोसा है कि जब तुम रिक्त हो जाओगे तो वह तुम्हें

शून्य होने की कला भी सिखा देगा।परन्तु रिक्तता और शून्यतापर्यायवाची शब्द नहीं हैं। केवल भाषाकोश में पर्यायवाची हैं, जीवन के कोष में नहीं हैं।रिक्तता का मतलब है, कुछ भी नहीं है। शून्य का मतलब है ...सब कुछ का स्रोत । शून्य पॉजिटिव शब्द है और शून्य में ''पूर्ण ''समाया हुआ है, सोया हुआ है। रिक्त में कुछ भी नहीं है .. सिर्फ खाली है।अगर व्यक्ति रिक्त हो गया तो फिर अपना ही सत्य मार डालेगा; फिर उससे छुटकारा पाना मुश्किल है। 12- वास्तवमें, असत्य का छूटना सत्य का हो जाना नहीं है। पैर से कांटा निकल गया, इसका यह मतलब नहीं है कि तुम्हारे हाथ में फूल आ गए। पैर से कांटा निकल गया, वह अच्छा हुआ। कांटा चुभा रहता तो फूल को खोजना मुश्किल था। अब पैर स्वस्थ हैं, अब तुम चल सकते हो .. फूल की खोज हो सकती है। विचार का कांटा निकल जाए तो ध्यान का फल खोजा जा सकता है। इसलिए समस्त ध्यानियों ने निर्विचार को समाधि कहा है।सत्य तो मुक्त करता है।तुमने जिसे सत्य मान रखा है वह सत्य नहीं है। इसलिए जब तुम थोड़े जागोगे, थोड़ा सोचोगे तो पहले तो घबड़ाहट आएगी।विश्वास तो छीनने ही पड़ेंगे। जगह खाली करनी पड़ेगी कचरे से, तभी परमात्मा आएगा; तभी विराजेगा तुम्हारे भीतर।

13-जैसे छोटे बच्चे के खिलौने छीन लो तो छोटा बच्चा जिएगा कैसे? लेकिन कभी ऐसी प्रौढ़ता आती है ..जब खिलौने बच्चा खुद ही छोड़ देता है। एक दिन ऐसा लगता था कि बच्चा बिना खिलौनों के नहीं जी सकता। रात भी अपने खिलौने अपने साथ छाती से लगाकर सोता है। सुबह होते ही पहले अपने खिलौने को तलाशता है। पर हम जानते हैं कि कल प्रौढ़ हो जाएगा, यह खिलौना आज जो इतना प्यारा है, किसी दिन कोने में पड़ा रह जाएगा, कचरे में फेंक दिया जाएगा। फिर इस पर ध्यान भी न आएगा।ऐसे ही तुम्हारे विश्वास बचपन के खिलौने हैं। उन्हें तो छोड़ना ही होगा ..जो पीड़ादायी भी है ।जब कांटा निकाला जाता है तो भी तो तकलीफ होती है। मवाद भरी हो और उसे देह से निकालना हो ..तो भी तो तकलीफ होती है। सभी तरह की सर्जरी तकलीफ की होती है। और यह तो देह की ही सर्जरी नहीं है, आत्मा की सर्जरी है। लेकिन एक बार सारी मवाद निकल जाए, सारे भ्रम गिर जाएं तो तुम तैयार हो जाओगे उड़ान भरने को। हां, वहां रुकना नहीं है उससे आगे जाना है ... जब तक शून्य न मिल जाए, समाधि न मिल जाए। समाधि है; और उसमें तुम्हारा जन्मसिद्ध अधिकार है।

‘सम्यक स्मृति’ का प्रयोग;-

07 POINTS;-

1-इस प्रयोग में हम शांत बैठेंगे। शरीर को शिथिल, रिलैक्स और रीढ़ को सीधा रखेंगे।

2-शरीर के सारे मूवमेंट को छोड़ देंगे। शांत, धीमी, पर गहरी श्वास लेंगे। और मौन, अपनी श्वास को देखते रहेंगे और बाहर की जो ध्वनियां सुनाई पड़े, उन्हें सुनते रहेंगे। कोई प्रतिक्रिया नहीं करेंगे। उन पर कोई विचार नहीं करेंगे।

3-शब्द न हों और हम केवल साक्षी हैं, जो भी हो रहा है, हम केवल उसे दूर खड़े जान रहे हैं ऐसे भाव में अपने को छोड़ देंगे। 4-कहीं कोई एकाग्रता, कनसनट्रेशन नहीं करनी है। बस चुप जो भी हो रहा है उसके प्रति जागरूक बने रहना है।

5-आंखें बंद कर लो और चुपचाप मौन में सुनो।चिड़ियों की आवाज ,हवाओं की वृक्षों को हिलाते थपेड़े की आवाज, किसी बच्चे का रोना और बस अपने भीतर श्वास का स्पंदन और हृदय की धड़कन सुनते रहो और फिर एक अभिनव शांति और सन्नाटा उतरेगा और आप पाओगे कि बाहर ध्वनि है पर भीतर निस्तब्धता है ...एक नये शांति के आयाम में प्रवेश हुआ है।

6-तब विचार नहीं रह जाते हैं, केवल चेतना रह जाती है।और इस शून्य के माध्यम में ध्यान, अटेंशन उस ओर मुड़ता है

जहां हमारा आवास है अथार्त हम बाहर से घर की ओर मुड़ते हैं।

7-दर्शन/View बाहर लाता है और वही भीतर ले जाता है। केवल विचार को, श्वास को, नाभि -स्पंदन को देखते रहो ...देखते रहो और कोई प्रतिक्रिया मत करो। और फिर कुछ होता है, जो हमारे चित्त की सृष्टि नहीं है जो हमारी सृष्टि नहीं है। वह जो हमारा होना है, हमारी सत्ता है, जो धर्म है, जिसने हमें धारण किया है ...वह उदघाटित हो जाता है और हम आश्चर्यों के आश्चर्य अथार्त स्वयं के समक्ष खड़े हो जाते हैं।

CONTD,

...SHIVOHAM...

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"एक शांत मन को कैसे पाया जाए?"-

मन कभी शांत नहीं होता; अ-मन शांत होता है। मन अपने आप में कभी भी शांत, मौन नहीं होता। क्योंकि मन का स्वभाव ही है तनावग्रस्त होना, उलझन में पड़ रहना। मन कभी भी स्पष्ट नहीं होता, उसे स्पष्टता नहीं मिल सकती, क्योंकि मन स्वभाव से उलझन है, अस्पष्टता है। स्पष्टता तभी संभव है जब मन ना हो; मौन तभी संभव है जब मन ना हो, इसलिय कभी भी शांत मन को पाने की चेष्ठा ना करें। यदि तुम ऐसा करते हो, तो तुम आरम्भ से ही एक असंभव आयाम में जा रहे हो।

सदा स्मरण रखें कि जो कुछ भी तुम्हारे आस-पास घट रहा है उन सब की जड़े तुम्हारे मन में निहित है। मन ही सदा कारण होता है। वह एक प्रक्षेपण करने वाला यंत्र है, और बाहर केवल पर्दे ही पर्दे हैं--तुम उन पर्दों पर अपने आप को प्रक्षेपित कर लेते हो। यदि तुम्हे यह भद्दा प्रतीत होता है तो अपने मन को परिवर्तित कर लो। यदि तुम्हेप्रतीत होता है कि जो कुछ भी मन से आ रहा है वह नारकीय है और भयानक है, तो मन को गिरा दो। मन पर कार्य करना है, परदे पर नहीं; उस पर बार-बार चित्रकारी कर के उसे बदलते मत रहो। मन पर कार्य करो।

परंतु एक समस्या है, क्योंकि तुम सोचते हो कि तुम मन हो । तो तुम इसे गिरा कैसे सकते हो? तो तुम्हे लगता है कि तुम सब-कुछ गिरा सकते हो, सबकुछ बदल सकते हो, उसे फिर से रंग सकते हो, फिर से संवारसकते हो, पुनर्व्यवस्थित कर सकते हो, किन्तु तुम खुद को कैसे गिरा सकते हो? यही सारे उपद्रव की जड़ है।

तुम मन नहीं हो, तुम मन के पार हो। यह सत्य है कि तुमने उसके साथ तादात्म बना लिया है, किन्तु तुम मन हो नहीं।

और यही ध्यान का उद्देश्य है: तुम्हे छोटी झलकियां दिखाना कि तुम मन नहीं हो। यदि कुछ क्षण के लिए भी मन ठहर जाए, तुम तब भी वहीँ के वहीँ हो! इसके विपरीत, तुम और भी ज्यादा उपस्थित होते हो, तुम्हारी उपस्थिति और भी ज्यादा प्रवाहमान हो जाती है।

मन का ठहर जाना ऐसा होता है जैसे एक जल-निकास जोलगातार तुम्हे खाली कर था, रुक जाये। अचानक तुम ऊर्जा से भर गए। तुम और संवेदनशील हो गए।

यदि तुम क्षण भर के लिए भी इस बात के प्रति सचेत हो जाओ कि मन नहीं है, केवल "मैं हूँ", तुम सत्य के भीतरी केंद्र तक पहुँच गए। तब मन को गिरा देना सरल हो जाएगा। तुम मन नहीं हो अन्यथा तुम अपने आप को गिराओगे कैसे? पहले तादात्म को गिराना होगा, तब मन को गिराया जा सकता है।

जब मन के साथ सारे तादात्म गिरा दिए जाये, जब तुम पर्वत पर बैठे एक द्रष्टा रह जाते हो और मन अँधेरी घाटियों कि गहराइयों में छूट जाता है। जब तुम सूर्य से प्रकाशित शिखरों पर होते हो, बस शुद्ध साक्षी, द्रष्टा मात्र, देखते हुए, परंतु किसी भी चीज़ से कोई तादात्म्य ना बनाते हुए--अच्छा या बुरा, पापी या पुण्यात्मा, यह या वह, केवल एक शुभ उपस्तिथी—एक श्वांस, एक धड़कता हुआ ह्रदय, उस द्रष्टा भाव में सब प्रश्न मिट जातें हैं। मन मिट जाता है, पिघल जाता है, भाप बन कर उड़ जाता है। तुम बस एक शुद्ध आत्मा की तरह रह जाते हो, एक शुद्ध अस्तित्व--एक श्वास, एक ह्रदय की धड़कन, पूर्णता क्षण में, ना अतीत, ना भविष्य इसलिए वर्तमान भी नहीं ।

मन भ्रामक है--जो होता तो नहीं है पर दिखता है, और इतना दिखता है कि तुम सोचते हो कि तुम मन हो। मन माया है, मन मात्र एक स्वप्न है, मन एक प्रक्षेपण है...एक पानी का बुलबुला--जिस में कुछ भी नहीं है, परन्तु ये एक पानी का बबूला नदी में तैरता प्रतीत होता है । सूरज बस उग ही रहा है, किरने बुलबुले में प्रवेश करती हैं और इंद्रधनुष निर्मित हो जाता है और उस में कुछ भी नहीं है। जब तुम बुलबुले को छूते हो तो वहटूट जाता है और सब-कुछ मिट जाता है—वो इंद्रधनुष, वो सौन्दर्य--कुछ भी नहीं बचता। केवल शुन्यता ही अनंत शून्य के साथ एक हो जाती है। वहां बस एक दीवार थी, एक बुलबुले कि दीवार। तुम्हारा मन एक बस एक बुलबुले कि दीवार है—भीतर, तुम्हारा शून्य है; बाहर, मेरा शून्य। यह मात्र एक बुलबुला है: छेद दो, और मन विदा हो जाएगा।

तुम कहते हो, "आप मन के इतने विरुद्ध क्यों हैं?" मैं मन के विरुद्ध में नहीं हूँ; मैं केवल एक तथ्यगत बात कह रहा हूँ--मन क्या है। यदि तुम देख लो कि मन क्या है तो, तुम इसे गिरा दोगे। जब मैं कहता हूँ कि "मन को गिरा दो," तब मैं यह मन के विरोध में नहीं कह रहा। मैं तुम्हे केवल यह स्पष्ट कर रहा हूँ कि मन है क्या, इसने तुम्हारे साथ क्या किया है, कैसे यह एक बंधन बन गया है।

इसे प्रयोग या दुरूपयोग में लाने का प्रश्न नहीं है। मन अपने आप में एक समस्या है, न कि इसका प्रयोग या दुरूपयोग। और स्मरण रहे, तुम मन का प्रयोग तब तक नहीं कर सकते जब तक कि तुम्हे यह न पता चल जाए कि मन के बिना कैसे हुआ जाए। केवल वे ही लोग जो मन के बिना होना जान लेते हैं, मन का उपयोग करने में सक्षम हो जाते हैं, नहीं तो मन ही उनका उपयोग करता है। यह मन ही है जो तुम्हारा उपयोग कर रहा है, परन्तु मन बहुत चालाक है, वह तुम्हे धोका दिए चला जाता है। वह कहे चला जाता है, "तुम मेरा उपयोग कर रहे हो।"

यह मन है जो तुम्हारा उपयोग कर रहा है। तुम्हारा उपयोग हो रहा है; मन तुम्हारा मालिक बन गया है, तुम उसके गुलाम, परन्तु मन बहुत चालाक है, वह तुम्हारी खुशामद करता चला जाता है। वह कहता है "मैं केवल एक उपकरण हूं, तुम मेरे मालिक हो।" लेकिन देखो, दिमाग की व्यवस्था पर गौर करो, यह कैसे आपका इस्तेमाल करते जाता है। तुम्हे लगता है कि तुम इसका उपयोग कर रहे हो। तुम उसका उपयोग तभी कर सकते हो जब तुम्हे पता हो कि तुम इससे पृथक हो; वर्ना तुम इसका उपयोग कैसे करोगे? तुम इससे तादात्म बनाए हुए हो।

क्या मन और चेतना दो अलग वस्तुएं हैं? या फिर वो शांत मन, या एकाग्र मन, "चेतना" किसे कहतें हैं?

यह तुम्हारी परिभाषा पर निर्भर करता है। पर मेरे अनुसार मन वह हिस्सा है जो तुम्हे दिया गया है। वह तुम्हारा नहीं है। मन का अर्थ है उधार लिया गया, मन का अर्थ है वह जो बनाया गया हो, मन का अर्थ है वह जो समाज ने तुम में भर दिया है। वह तुम नहीं हो।

चैतन्य तुम्हारा स्वभाव है; मन बस एक परिधि है, समाज द्वारा तुम्हारे आस-पास निर्मित की हुई, तुम्हारी संस्कृति द्वारा, तुम्हारी शिक्षा द्वारा।

मन का अर्थ है संस्कार। तो तुम्हारे पास एक हिन्दू मन हो सकता है, पर तुम्हारे पास एक हिन्दू चेतना नहीं हो सकती। तुम्हारे पास एक ईसाई मन हो सकता है, पर तुम्हारे पास एक ईसाई चेतना नहीं हो सकती। चेतना एक होती है: वह बंट नहीं सकती। मन अनेक होतें हैं। समाज अनेक होतें हैं, संस्कृतियाँ, धर्म अनेक होतें हैं, और हर संस्कृति हर समाज, एक अलग मन निर्मित करता है। मन समाज का उपोत्पाद है। और जब तक यह मन मिट नहीं जाता तुम भीतर प्रवेश नहीं कर सकते; तुम मूलतया अपने स्वभाव को नहीं जान सकते, प्रमाणिक रूप से तुम्हारा क्या आस्तित्व है, तुम्हारा चैतन्य क्या है तुम नहीं जान सकते। ध्यान के लिए संघर्ष करना मन के विरुद्ध संघर्ष करना है। मन कभी ध्यानपूर्ण नहीं होता और न ही मन कभी शांत होता है, तो "शांत-मन" कहना एक निरर्थक बात है, और बेतुकी भी। यह ऐसा कहना है जैसे कि "एक स्वस्थ रोग।" यह अर्थहीन है। क्या कभी कोई स्वस्थ रोग जैसी भी चीज़ हो सकती है? रोग तो रोग है, और स्वास्थ्य रोग का आभाव है।

शांत मन जैसी कोई चीज़ नहीं होती। जब शान्ति होती है तब मन नहीं होता। जब मन होता है तब शान्ति नहीं होती। मन, एक तरह से उपद्रव है, एक रोग। ध्यान है अ-मन की चित्त-दशा, मौन मन की नहीं, स्वस्थ मन की नहीं, एकाग्र मन की नहीं, नहीं। ध्यान अ-मन की स्थिति है: तुम्हारे भीतर कोई समाज नहीं, कोई संस्कृति नहीं- बस तुम, तुम्हारी शुद्ध चेतना के साथ।

उदासी

उदासी उतना उदास नहीं करती, जितना उदासी आ गई, यह बात उदास करती है। उदासी की तो अपनी कुछ खूबियां हैं, अपने कुछ रहस्य हैं। अगर उदासी स्वीकार हो तो उदासी का भी अपना मजा है। मुझे कहने दो इसी तरह, कि उदासी का भी अपना मजा है। क्योंकि उदासी में एक शांति है, एक शून्यता है। उदासी में एक गहराई है। आनंद तो छिछला होता है। आनंद तो ऊपर-ऊपर होता है। आनंद तो ऐसा होता है जैसे नदी भागी जाती है और उसके ऊपर पानी का झाग। उदासी ऐसी होती है जैसी नदी की गहराई--अंधेरी और काली। आनंद तो प्रकाश जैसा है। उदासी अंधेरे जैसी है। अंधेरी रात का मजा देखा? अमावस की रात का मजा देखा? अमावस की रात का रहस्य देखा? अमावस की रात की गहराई देखी? मगर जो अंधेरे से डरता है, वह तो आंख ही बंद करके बैठ जाता है, अमावस को देखना ही नहीं चाहता। जो अंधेरे से डरता है, वह तो अपने द्वार-दरवाजे बंद करके खूब रोशनी जला लेता है। वह अंधेरे को झुठला देता है। अमावस की रात आकाश में चमक