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क्या है श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 2) में श्रीकृष्ण की सांख्ययोग की दृष्टि ?PART-03


सांख्ययोग की दृष्टि;-

45 FACTS;-

1-श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं...

''हे पार्थ, यह सब तेरे लिए सांख्य (ज्ञानयोग) के विषय में कहा गया और इसी को अब (निष्काम कर्म) योग के विषय में सुन कि जिस बुद्धि से युक्त हुआ तू, कर्मों के बंधन को अच्छी तरह से नाश करेगा।''

2-श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं, अब तक जो मैंने तुझसे कहा, वह सांख्य की दृष्टि थी।

सांख्य की दृष्टि ..गहरी से गहरी ज्ञान की दृष्टि है। सांख्य का जो मार्ग है, वह परम ज्ञान का

मार्ग है।परन्तु श्रीकृष्ण ने पहले सांख्य की ही बात की ...क्योकि अगर सांख्य काम में आ जाए, तो फिर और कोई आवश्यकता नहीं है। सांख्य काम में न आ सके, तो ही फिर कोई और आवश्यकता है।

3-अनंत हैं सत्य तक पहुंचने के मार्ग। अनंत हैं प्रभु के मंदिर के द्वार। अनंत ही होंगे, क्योंकि अनंत तक पहुंचने के लिए अनंत ही मार्ग हो सकते हैं। जो भी एकांत को पकड़ लेते हैं--जो भी सोचते हैं, एक ही द्वार है, एक ही मार्ग है--वे भी पहुंच जाते हैं। लेकिन जो भी पहुंच जाते हैं, वे कभी नहीं कह पाते कि एक ही मार्ग है, एक ही द्वार है। एक का आग्रह सिर्फ उनका ही है, जो नहीं पहुंचे है और जो पहुंच गए हैं, वे अनाग्रही हैं।

4-जापान में झेन साधना की एक पद्धति है और झेन सांख्य का ही एक रूप है।सांख्य का

कहना यही है कि जानना ही काफी है(KNOWLEDGE IS ENOUGH), करना कुछ भी नहीं है। इस जगत की जो पीड़ा है और बंधन है, वह न जानने से ज्यादा नहीं है। अज्ञान के अतिरिक्त और कोई वास्तविक बंधन नहीं है। कोई जंजीर नहीं है, जिसे तोड़नी है। न ही कोई कारागृह है, जिसे मिटाना है। न ही कोई जगह है, जिससे मुक्त होना है। सिर्फ जानना है। जानना है कि मैं कौन हूं? जानना है कि जो चारों तरफ फैला है, वह क्या है? सिर्फ और सिर्फ 'जानना'।

5- लेकिन सांख्य को समझना कठिन है। कृष्णमूर्ति का सारा विचार सांख्य है।

जैसे एक आदमी दुख में पड़ा है, हम उससे कहें कि ''केवल जान लेना है कि दुख क्या है और तू दुख से बाहर हो जाएगा।'' वह आदमी कहेगा, ''जानता तो मैं भलीभांति हूं कि दुख है। जानने से कुछ नहीं होता; मुझे इलाज चाहिए, औषधि चाहिए। कुछ करो कि मेरा दुख चला जाए।''

6-एक आदमी, जो वस्तुतः चिंतित और परेशान है, विक्षिप्त है, पागल है, उससे हम कहें कि सिर्फ जानना काफी है और तू पागलपन के बाहर आ जाएगा। वह आदमी कहेगा, जानता तो मैं काफी हूं; जानने को अब और क्या बचा है! लेकिन जानने से पागलपन नहीं मिटता। कुछ और करो! जानने के अलावा भी कुछ और जरूरी है।इसलिए श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सबसे पहले

सांख्य की दृष्टि कही, क्योंकि यदि सांख्य काम में आ जाए तो किसी और बात के कहने की कोई जरूरत नहीं है।

7-सुकरात का बहुत ही कीमती वचन है, जिसमें उसने कहा है,'' ज्ञान ही सदगुण है'' (KNOWLEDGE IS VIRTUE)। वह कहते है , ''जान लेना ही ठीक हो जाना है''। उससे लोग पूछते थे कि हम भलीभांति जानते हैं कि चोरी बुरी है, लेकिन चोरी छूटती नहीं! तो सुकरात कहते ,'' तुम जानते ही नहीं कि चोरी क्या है। अगर तुम जान लो कि चोरी क्या है, तो छोड़