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परमात्मा एक व्यक्ति है या एक ऊर्जा / शक्ति या दोनों ? क्या रहस्य है ''ज्ञानियों के शास्त्र


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क्या साधना में सीधे अचानक प्रसाद के उपलब्ध होने पर कभी -कभी दुर्घटना भी घटित हो सकती है ? क्या प्रसाद हमेशा ही कल्याणकारी नहीं होता है?

दो—तीन बातें समझ लेनी जरूरी हैं। एक तो प्रभु कोई व्यक्ति नहीं है, शक्ति है। और शक्ति का अर्थ हुआ कि एक—एक व्यक्ति का विचार करके कोई घटना वहां से नहीं घटती है। जैसे नदी बह रही है। किनारे जो दरख्त होंगे, उनकी जड़ें मजबूत हो जाएंगी; उनमें फूल लगेंगे, फल आएंगे। नदी की धार में जो पड़ जाएंगे, उनकी जड़ें उखड़ जाएंगी, बह जाएंगे, टूट जाएंगे। नदी को न तो प्रयोजन है कि किसी वृक्ष की जड़ें मजबूत हों, और न प्रयोजन है कि कोई वृक्ष उखाड़ दे। नदी बह रही है। नदी एक शक्ति है, नदी एक व्यक्ति नहीं है।

परमात्मा कोई व्यक्ति नहीं, शक्ति है:

लेकिन निरंतर यह भूल हुई है कि हमने परमात्मा को एक व्यक्ति समझ रखा है। इसलिए हम सोचते हैं, जैसे हम व्यक्ति के संबंध में सोचते हैं। हम कहते हैं, वह बड़ा दयालु है, हम कहते हैं, वह बड़ा कृपालु है; हम कहते हैं, वह सदा कल्याण ही करता है। ये हमारी आकांक्षाएं हैं जो हम उस पर थोप रहे हैं।

व्यक्ति पर तो ये आकांक्षाएं थोपी जा सकती हैं; और अगर वह इनको पूरा न करे तो उसको उत्तरदायी ठहराया जा सकता है। शक्ति पर ये आकांक्षाएं नहीं थोपी जा सकतीं। और शक्ति के साथ जब भी हम व्यक्ति मानकर व्यवहार करते हैं तब हम बड़े नुकसान में पड़ते हैं; क्योंकि हम बड़े सपनों में खो जाते हैं। शक्ति के साथ शक्ति मानकर व्यवहार करेंगे तो बहुत दूसरे परिणाम होंगे।

जैसे कि जमीन में ग्रेविटेशन है, कशिश है, गुरुत्वाकर्षण है। आप जमीन पर चलते हैं तो उसी की वजह से चलते हैं। लेकिन वह इसलिए नहीं है कि आप चल सकें। आप न चलेंगे तो गुरुत्वाकर्षण नहीं रहेगा, इस भूल में मत पड़ जाना। आप नहीं थे जमीन पर, तो भी था, एक दिन हम नहीं भी होंगे, तो भी होगा। और अगर आप गलत ढंग से चलेंगे, तो गिर पड़ेंगे, टांग भी टूट जाएगी; वह भी गुरुत्वाकर्षण के कारण ही होगा। लेकिन आप किसी अदालत में मुकदमा न चला सकेंगे, क्योंकि वहां कोई व्यक्ति नहीं है। गुरुत्वाकर्षण एक शक्ति की धारा है। अगर उसके साथ व्यवहार करना है तो आपको सोच—समझकर करना होगा। वह आपके साथ सोच—समझकर व्यवहार नहीं कर रही है।

परमात्मा की शक्ति आपके साथ सोच—समझकर व्यवहार नहीं करती है। परमात्मा की शक्ति कहना ठीक नहीं है, परमात्मा शक्ति ही है। वह आपके साथ सोच—समझकर व्यवहार नहीं है उसका, उसका अपना शाश्वत नियम है। उस शाश्वत नियम का नाम ही धर्म है। धर्म का अर्थ है, उस परमात्मा नाम की शक्ति के व्यवहार का नियम। अगर आप उसके अनुकूल करते हैं, समझपूर्वक करते हैं, विवेकपूर्वक करते हैं, तो वह शक्ति आपके लिए कृपा बन जाएगी— उसकी तरफ से नहीं, आपके ही कारण। अगर आप उलटा करते हैं, नियम के प्रतिकूल करते हैं, तो वह शक्ति आपके लिए अकृपा बन जाएगी। परमात्मा अकृपा नहीं है, आपके ही कारण।

परमात्मा व्यक्ति भी है,और शक्ति भी ।इसलिए परमात्मा के साथ प्रार्थना , पूजा और अपेक्षाओं का भी अर्थ है। यदि चाहते हैं कि परमात्मा, वह शक्ति आपके लिए कृपा बन जाए, तो आपको जो भी करना है वह अपने साथ करना है। इसलिए साधना ध्यान का भीअर्थ है, प्रार्थना का कोई अर्थ नहीं है। का अर्थ है, पूजा का कोई अर्थ नहीं है।

इस फर्क को ठीक से समझ लें।

प्रार्थना में आप परमात्मा के साथ कुछ कर रहे हैं— अपेक्षा, आग्रह, निवेदन, मांग, ध्यान में आप अपने साथ कुछ कर रहे हैं। पूजा में आप परमात्मा से कुछ कर रहे हैं; साधना में आप अपने से कुछ कर रहे हैं। साधना का अर्थ है, अपने को ऐसा बना लेना कि धर्म के प्रतिकूल आप न रह जाएं; और जब नदी की धारा बहे तो आप बीच में न पड़ जाएं—तट पर हों कि नदी की धारा का पानी आपकी जड़ों को मजबूत कर जाए, उखाड़ न जाए। जैसे ही हम परमात्मा को शक्ति के रूप में समझेंगे, हमारे धर्म की पूरी व्यवस्था बदल जाती है।

तो जो मैंने कहा कि यदि आकस्मिक घटना घट जाए, तो दुर्घटना बन सकती है।

प्रसाद से दुर्घटना भी हो सकती है:

शक्ति है निष्पक्ष:

परमात्मा एक शक्ति है और वह तटस्थ नहीं हो सकता, क्योंकि आप उससे कुछ अलग नहीं हो; आप उसके ही फैले हुए विस्तार हो।

आपमें उसकी कोई विशेष रुचि नहीं है।वह शक्ति आपके लिए नियम से बाहर नहीं जाएगी । और अगर आप अपने सिर पर पत्थर मारेंगे, तो लहू बहेगा।शक्ति की रुचि सदा

नियम में होती है। व्यक्ति की रुचि विशेष बन सकती है। व्यक्ति पक्षपाती हो सकता है। शक्ति सदा निष्पक्ष है। निष्पक्षता ही उसकी रुचि है। इसलिए जो नियम में होगा, वह होगा, जो नियम में नहीं होगा, वह नहीं होगा। परमात्मा की तरफ से मिरेकल नहीं हो सकते, चमत्कार नहीं हो सकते।

ज्ञानियों के शास्त्र, अज्ञानियों के हाथ::-

अष्‍टावक्र महागीता में पहला सूत्र है...जनक ने कहा, ‘हे प्रभो, पुरुष ज्ञान को कैसे प्राप्त होता है। और मुक्ति कैसे होगी और वैराग्य कैसे प्राप्त होगा? यह मुझे कहिए..तो देखा होगा अष्‍टावक्र ने गौर से, जनक में झांक कर : यह व्यक्ति ज्ञानी तो नहीं है। यह ध्यान को तो उपलब्ध नहीं हुआ है। अन्यथा इसकी जिज्ञासा मौन होती; उसमें शब्द न होते। जनक भी जानता था। जो किताबों में भरा पड़ा है, वह ज्ञान नहीं; वह केवल ज्ञान की धूल है, राख है! ज्ञान की ज्योति जब जलती है तो पीछे राख छूट जाती है। राख इकट्ठी होती चली जाती है, शास्त्र बन जाती है। वेद राख हैं—कभी जलते हुए अंगारे थे। ऋषियों ने उन्हें अपनी आत्मा में जलाया था। फिर राख रह गये। फिर राख संयोजित की जाती है, संगृहीत की जाती है, सुव्यवस्थित की जाती है। जैसे जब आदमी मर जाता है तो हम उसकी राख इकट्ठी कर लेते हैं—उसको फूल कहते हैं। बड़े मजेदार लोग हैं! जिंदगी में जिसको फूल नहीं कहा, उसकी हड्डिया—वड्डिया इकट्ठी कर लाते हैं—कहते हैं, ‘फूल संजो लाये’!जनक भी जानता था कि शास्त्रों में सूचनाएं भरी पड़ी हैं। लेकिन उसने पूछा, ‘कथं ज्ञानम्? कैसे होगा ज्ञान?’ क्योंकि कितना ही जान लो, ज्ञान तो होता ही नहीं। जानते जाओ, जानते जाओ, शास्त्र कंठस्थ कर लो, तोते बन जाओ, एक—एक सूत्र याद हो जाये, पूरे वेद स्मृति में छप जायें—फिर भी ज्ञान तो होता नहीं।

जनक ने पूछा, ‘कैसे होगी मुक्ति और कैसे होगा वैराग्य? हे प्रभु, मुझे समझा कर कहिए!’ अष्टावक्र ने गौर से देखा होगा जनक की तरफ; क्योंकि गुरु के लिए वही पहला काम है कि जब कोई जिज्ञासा करे तो वह गौर से देखे. ‘जिज्ञासा किस स्रोत से आती है? पूछने वाले ने क्यों पूछा है?’ उत्तर तो तभी सार्थक हो सकता है जब प्रश्न क्यों किया गया है, वह समझ में आ जाये, वह साफ हो जाए।

ध्यान रखना, सदज्ञान को उपलब्ध व्यक्ति, सदगुरु तुम्हारे प्रश्न का उत्तर नहीं देता—तुम्हें उत्तर देता है! तुम क्या पूछते हो, इसकी फिक्र कम है; तुमने क्यों पूछा है, तुम्हारे पूछने के पीछे अंतरचेतन में छिपा हुआ जाल क्या है, तुम्हारे प्रश्नों की आड़ में वस्तुत: कौन—सी आकांक्षा छिपी है..!

दुनियां में चार तरह के लोग हैं—ज्ञानी, मुमुक्षु, अज्ञानी, मूढ़। और दुनियां में चार ही तरह की जिज्ञासाए होती हैं। ज्ञानी की जिज्ञासा तो नि:शब्द होती है। कहना चाहिए, ज्ञानी की जिज्ञासा तो जिज्ञासा होती ही नहीं—जान लिया, जानने को कुछ बचा नहीं, पहुंच गये, चित्त निर्मल हुआ, शांत हुआ, घर लौट आये, विश्राम में आ गये! तो ज्ञानी की जिज्ञासा तो जिज्ञासा जैसी होती ही नहीं। इसका यह अर्थ नहीं कि ज्ञानी सीखने को तैयार नहीं होता। ज्ञानी तो सरल, छोटे बच्चे की भांति हो जाता है—सदा तत्पर सीखने को।

संसार में चार प्रकार के पुरुष हैं –एक ज्ञानी, दूसरा मुमुक्षु, तीसरा अज्ञानी और चौथा मूढ़ ।चारों में से राजा तो ज्ञानी नहीं है क्योंकि जो संशय और विपर्यय से रहित होता है और आत्मानंद करके आनंदित होता है वही ज्ञानी होता है परंतु राजा ऐसा नहीं है, किन्तु यह संशय से युक्त है ।एवं अज्ञानी भी नहीं है क्योंकि जो विपर्यय ज्ञान और असंभावना आदि को करके युक्त होता है उसका नाम अज्ञानी है परंतु राजा ऐसा भी नहीं है । तथा जिसके चित्त में स्वर्गादिक फलों कि कामनाएँ भरी हों उसका नाम अज्ञानी है परंतु राजा ऐसा भी नहीं है । यदि ऐसा होता तो यज्ञादिक कर्मों के विषय में विचार करता, सो तो इसने नहीं किया है एवं मूढ़बुद्धि वाला भी नहीं है क्योंकि जो मूढ़बुद्धि वाला होता है वह कभी भी महात्मा को दंडवत प्रणाम नहीं करता है किन्तु वह अपनी जाति और धनादिकों के अभिमान में ही मरा जाता है, सो ऐसा भी राजा नहीं क्योंकि हमको महात्मा जानकर हमारा सत्कार कर अपने भवन में लाकर संसार बंधन से छूटने कि इच्छा करके जिज्ञासुओं कि तरह राजा ने प्रश्नों को किया है । इसी से सिद्ध होता है कि राजा जिज्ञासु अर्थात मुमुक्षु है और आत्मविद्या का पूर्ण अधिकारी है, और साधनों के बिना आत्मविद्या कि प्राप्ति नहीं होती, इस वास्ते अष्टावक्रजी प्रथम राजा के प्रति साधनों को कहते हैं ॥१॥

ज्ञान—ज्ञान को संगृहीत नहीं करता; ज्ञानी सिर्फ ज्ञान की क्षमता को उपलब्ध होता है। इस बात को ठीक से समझ लेना, क्योंकि पीछे यह काम पड़ेगी। ज्ञानी का केवल इतना ही अर्थ है कि जो जानने के लिए बिलकुल खुला है; जिसका कोई पक्षपात नहीं, जानने के लिए जिसके पास कोई परदा नहीं; जिसके पास जानने के लिए कोई पूर्व—नियोजित योजना, ढांचा नहीं। ज्ञानी का अर्थ है ध्यानी जो ध्‍यान पूर्ण है।

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ज्ञानियों ने जो कहा, वह शास्त्र है और अज्ञानियों को उन्हें मानना ही चाहिए।

पहली बात, न तो शास्त्र अनेक हैं और न उनके वचन अनंत। एक ही बात को अनेक—अनेक रूपों से जरूर कहा गया है। लेकिन बात एक ही है।

उस एक को ही जानने वालों ने बहुत—बहुत भाति से कहा है। कुरान का एक ढंग है, गीता का दूसरा ढंग है, बाइबिल का तीसरा। पर बात वही है। और अगर तुम वस्तुत: अज्ञानी हो, तो कठिनाई न होगी यह बात समझने में कि तीनों शास्त्रों ने एक ही बात कही है। कठिनाई तो तब होती है, जब तुम झूठे ज्ञानी होते हो; जब पांडित्य तुम्हारे सिर पर सवार होता है, तब कठिनाई होती है।

अज्ञानी तो सरल होता है। अज्ञानी के पास शब्दों का कोई बोझ नहीं होता, न आख अंधी होती है, निर्मल होती है। ज्ञानी, तथाकथित ज्ञानी उपद्रव खड़ा करता है। वह तथाकथित ज्ञानी कहता है, जो गीता में कहा है, वह कुरान में नहीं है। क्योंकि इस तथाकथित ज्ञानी की पकड़ शब्दों पर है, सार पर नहीं; भाषा पर है, भाव पर नहीं। इसे शास्त्र की लकीरें घेर लेती हैं; शास्त्र के शून्य रिक्त स्थान इसे दिखाई नहीं पड़ते।

दुनिया में जो कलह है, वह पंडितों के कारण है, अज्ञानियों के कारण नहीं। मौलवी लड़ता है, लडवाता है; पंडित लड़ता है, लडवाता है। अज्ञानी का क्या झगड़ा है!

थोड़ी देर को सोचो, अगर दुनिया में पंडित न हों, तो दुनिया में हिंदू मुसलमान, ईसाई होंगे? अगर होंगे भी, तो बड़े सरल होंगे। चर्च पड़ जाएगा, तो तुम वहा भी नमस्कार कर लोगे, और मस्जिद आ जाएगी पास, तो कभी वहा भी प्रार्थना कर लोगे, क्योंकि कोई तुम्हें समझाने वाला न होगा कि मंदिर अलग है, मस्जिद अलग है। यह तो समझाने वालों ने उपद्रव खड़ा किया है।

सरल आदमी का कोई भी झगड़ा नहीं है। और अज्ञान में बड़ी सरलता है।

तो तुम जब पूछते हो कि अज्ञानी कैसे तय करे कि कौन—सा शास्त्र ठीक है, तुम काफी ज्ञानी हो गए; अज्ञानी तुम हो नहीं। यह काफी ज्ञान की बात हो गई; यह तो बड़ी समझदारी आ गई। अन्यथा तुम पहचान लोगे। तुम पहचान लोगे कि फर्क शब्दों का हो सकता है, लेकिन फर्क सत्य का नहीं है।

कोई एक ढंग से प्रार्थना करता है, कोई दूसरे ढंग से प्रार्थना करता है। कोई पूरब की तरफ सिर करके प्रार्थना करता है, कोई पश्चिम की तरफ सिर करके प्रार्थना करता है। लेकिन प्रार्थना का भाव, वह समर्पण, उस अनंत के चरणों में सिर रखने की वह धारणा, वह तो एक ही है।

अगर पंडित—मौलवी न हों, तो कोई झगड़ा नहीं है। तुम सभी जगह उस एक ही ध्वनि को सुनते हुए पाओगे, सभी जगह वही सार तुम्हें समझ में आ जाएगा।

इसलिए पहली तो बात, शास्त्र अनेक नहीं हैं, दिखाई पड़ते हैं। हो नहीं सकते अनेक। सत्य अनेक नहीं है, तो शास्त्र कैसे अनेक हो सकते हैं? भाषाएं तो अनेक होंगी, क्योंकि जमीन पर कोई तीन सौ भाषाएं हैं। तो जो आदमी अरबी जानता है, जब सत्य को उपलब्ध होगा, तो संस्कृत नहीं बोलेगा, अरबी ही बोलेगा। उसमें जो गीत पैदा होगा, वह अरबी भाषा को ही पकड़कर तरंगित होगा, तुम तक आएगा। कुरान ऐसा ही गीत है।

गीत को देखो, शब्द को छोड़ो, छंद को पकड़ो। तो उपनिषद में जो छंद है, वही कुरान में है। उपनिषद में जो गीत है, वही कुरान में है। धुन को पकड़ो, मस्ती को पकड़ो, तो उपनिषद जिन्होंने गाया है, तुम उन्हें उसी मस्ती में, उसी नशे में डोलते पाओगे, जिस नशे। में मोहम्मद को डोलते हुए पाया गया है।

क्या तुम समझते हो कि फर्क दिखाई पड़ेगा मस्ती में? नहीं, मस्ती में कोई फर्क न दिखाई पड़ेगा। ही, चोटी न बढ़ी होगी मोहम्मद की। चोटी कोई शास्त्र है? जनेऊ न पड़ा होगा गले में। जनेऊ कोई शास्त्र है?

तुमने अगर व्यर्थ को देखा, तो फर्क पाओगे, अगर सार्थक को देखा, तो जरा भी फर्क न पाओगे।

और दूसरी बात कि उपद्रव तुम्हारे ज्ञान के कारण है, अज्ञान के कारण नहीं। अज्ञान की बड़ी मधुरिमा है। काश, तुम अज्ञानी हो सको, तो तुम्हारे ज्ञानी होने का द्वार खुल जाए।

लेकिन तुम ज्ञानी होने के पहले ज्ञान से भर जाते हो। वे शब्द तुम्हारे चारों तरफ इकट्ठे हो जाते हैं। फिर वे शब्द द्वार नहीं खुलने देते, फिर तुम शब्दों में जीते हो। तुम्हारे असली प्रश्न भी खो जाते हैं, वे भी नकली हो जाते हैं। तुम जीवन के साक्षात्कार की आकांक्षा नहीं करते, तुम सिद्धांतों को समझने की आकांक्षा करने लगते हो। मेरे पास कोई आता है, दुखी है, अशांत है। और पूछता है, संसार परमात्मा ने बनाया या नहीं?

तुम अपनी गृहस्थी से ही काफी परेशान हो रहे हो, इतनी बड़ी गृहस्थी का बोझ मत लो। संसार किसने बनाया या नहीं बनाया, यह तुम्हारे प्राणों का प्रश्न भी कहा है! इससे तुम्हें लेना—देना क्या है? और बनाया हो किसी ने, यह जान लेने से तुम्हारे जीवन के। प्रश्न कहां हल होंगे? न बनाया हो किसी ने, तो भी क्या फर्क पड़ेगा; तुम तो तुम ही रहोगे।

ये व्यर्थ के प्रश्न हैं। सार्थक प्रश्न हमेशा वास्तविक होता है। तुम पूछते हो कि मैं अशांत क्यों हूं? तुम पूछते हो कि शांत होने का उपाय क्या है? तुम पूछते हो कि मैं दुख से भरा हूं आनंद की एक किरण नहीं जानी, कैसे जानूं? कैसे खोलूं वातायन? कैसे आख खुले? कैसे अंधेरे के बाहर आऊं? टटोलता हूं. दीए को, पाता हूं लेकिन कैसे जलाऊ? ज्योति कैसे जले?

और तुम्हारी ज्योति जले आनंद की, और शांति की बरखा होने लगे तुम्हारे आस—पास, तो तुम जानोगे। वे सब प्रश्नों के उत्तर भी जान लोगे, जो तुमने इसके पहले पूछे होते, तो व्यर्थ ही पूछे होते। और उन प्रश्नों के उत्तर जानने तुम्हें किसी के पास न जाना होगा। जो शांत हुआ, उसे परमात्मा दिखाई पड़ने लगता है। असली सवाल परमात्मा नहीं है, असली सवाल शांति है।

शास्त्रों से तुम परमात्मा को मत पूछो, शास्त्रों से तुम शांति सीखो। और सभी शास्त्र शाति सिखाते हैं। सभी शास्त्र ध्यान की विधियां बताते हैं। सभी शास्त्र इशारे करते हैं कि कैसे तुम आनंदित हो जाओगे। फिक्र छोड़ो, कुरान से सीखते हो कि गीता से सीखते हो! किस घाट से पीते हो पानी; सारा पानी गंगा का है। कहीं से भी पी लो; घाटों के नाम पर बहुत ध्यान मत दो; उनका कोई भी मूल्य नहीं है।

उपद्रव लेकिन ज्ञान के कारण हो रहा है। तुम हिंदू हो, मुसलमान हो, ईसाई हो, जैन हो, यह अड़चन है। अज्ञानी हो, यह अड़चन नहीं है। अज्ञानी हो, तब तो बिलकुल भले हो; कोई अड़चन नहीं है। सरल हो, सीधे हो; मन की पट्टी खाली है, उस पर कुछ लिखा जा सकता है। भरे नहीं हो, जगह है तुम्हारे भीतर; सत्य को निमंत्रण दिया जा सकता है।

मैं तो अज्ञान की महिमा के गीत गाता हूं। अगर तुम अज्ञानी ही हो सको, तो तुम पाओगे, ज्ञान तुम पर बरसने लगा। अज्ञान को जान लेना ज्ञान का पहला कदम है।

लेकिन अड़चन कहा से आ रही है? अड़चन यहां से आ रही है, अज्ञान तो मिटा नहीं और तुमने कूड़ा—कचरा इकट्ठा कर लिया। शास्त्र से तुमने साधना नहीं सीखी, शास्त्र से तुमने सिद्धांत सीखे।

शास्त्र से अनुशासन सीखो! शास्त्र का मतलब ही यही होता है कि जिससे अनुशासन मिले, वह शास्त्र। जो तुम्हें जीवन की विधि दे, वह शास्त्र। लेकिन वह तुम्हें सुनाई नहीं पड़ती।

और तुम अपने शब्दों से इतने भरे हो कि मैं भी तुमसे जब बोल रहा हूं तब पक्का नहीं है कि तुम वही सुनते हो, जो मैं तुमसे कहता हूं। तुम्हारे शब्द उसमें बाधा डालते होंगे, रंग बदल देते होंगे, धुन बदल देते होंगे, अर्थ बदल देते होंगे।

आदमी वही सुनता है, जो सुनना चाहता है। आदमी वही सुनता है, जो वह पहले ही सुन चुका है। आदमी उसको छोड़ देता है, जो उसके भीतर न पच सकेगा। उसको पचा लेता है, जो पहले से पचा हुआ है।

तम मेरे पास आकर, अगर हिंदू हो, तो वही सुन लोगे जो हिंदू एन सकता है। अगर मुसलमान हो, तो वही सुन लोगे जो मुसलमान सुन सकता है। मुसलमान और मुसलमान होकर चला जग़ागा; हिंदू और हिंदू होकर चला जाएगा। और मैं चाहता था कि हिंदु, मुसलमान मिट जाएं।

मैं एक वैद्यजी के घर में ठहरा हुआ था। पंडित आदमी हैं। वे स्नान कर रहे थे सुबह—सुबह। मैं अखबार पढ़ रहा था बाहर बैठकर। उनका लड़का एक कोने में बैठकर अपने स्कूल का काम कर रहा था। वह जोर—जोर से कुछ रट रहा था। वह रट रहा था, अलंकार के भेद चार होते हैं, लाटानुप्रास, वृत्यानुप्रास, छेकानुप्रास, अंत्यानुप्रास...।

वह रट रहा था। मैंने उस पर कोई ज्यादा ध्यान भी नहीं दिया था। ध्यान तो तब दिया जब वैद्यजी, जो स्नान कर रहे थे अंदर स्नानगृह में, वहीं से चिल्लाए, अरे नालायक, कहां की दवाइयों के नाम रट रहा है! अपना च्यवनप्राश! उसकी तो विदेशों तक में मांग है। रख नंबर एक पर, च्यवनप्राश। यह कहां का छेकानुप्रास, अंत्यानुप्रास......।

लड़का भी चौंका, मैं भी चौंका। लेकिन तभी पत्नी, जो चौके में काम कर रही थी, जोर से भन्नाई। उसनै कहा, तुम अपना स्नान करो और दूसरों को अपना काम करने दो। यह तुम्हारे च्यवनप्राश की वजह से इस घर में कोई बीमार तक नहीं पड़ सकता। च्यवनप्राश! च्यवनप्राश! कोई बीमारी आ जाए, तो डर लगता है बताने में कि तुम फिर वह च्यवनप्राश ले आओगे!

कोई किसी की सुनता हुआ मालूम नहीं पड़ता। पत्नी शांत हो गई। मैं अपना अखबार पढ़ने लगा। लडका फिर देखकर कि उपद्रव जा चुका, फिर याद करने लगा, अलंकार चार प्रकार के होते हैं......। ऐसा वर्तुल है। कोई किसी की सुन नहीं रहा है। अपनी— अपनी सुन रहे हैं लोग।

शास्त्र की तुम कहां सुनते हो! शास्त्र के पास भी अगर तुम अज्ञानी होकर जाओ—अज्ञानी होकर जाओ मतलब, बालक की तरह होकर जाओ—तों शास्त्र भी तुम्हें जगा देगा। लेकिन तुम तो जीवित शास्त्रों के पास भी, गुरुओं के पास भी ज्ञानी होकर आते हो। वे भी तुम्हें नहीं जगा पाते।। शास्त्र तो मुरदा है, कागज पर खींची आड़ी—तिरछी लकीरें हैं। लेकिन वह भी जगा देगा, अगर तुम पंडित की तरह न गए, प्यासे की तरह गए, तो शास्त्र भी जगा देगा। और अगर पंडित की तरह तुम आए सदगुरु के पास भी, तो सदगुरु भी तुम्हें जगा नहीं पाएगा। तुम सदगुरु से भी अपनी नींद के बहाने खोजकर वापस लौट जाओगे।

इस बात को तय करने की जरूरत ही नहीं कि क्या मानने योग्य है, क्या मानने योग्य नहीं है। तुम कैसे तय करते हो, क्या खाने योग्य है, क्या खाने योग्य नहीं है? जो पच जाता है, जो स्वस्थ करता है, शक्तिवर्धक है, उसे तुम खाने योग्य समझ लेते हो। पत्थर—कंकड नहीं खाते। अज्ञानी से अज्ञानी नहीं खाता पत्थर—कंकड़। क्यों? जानता है, वे पचेंगे नहीं; दुख देंगे, पीड़ा देंगे।

जीवन जिससे रसपूर्ण हो जाए, वही चुनने योग्य है। जीवन में जिससे स्वास्थ्य बढ़े, सौरभ बढ़े, वही चुनने योग्य है। जीवन जिससे उत्सव बने, वही चुनने योग्य है। जिससे उदास हो जाए; टूट जाए, खंडहर हो जाए, वही छोड़ देने योग्य है।

मैं तुम्हें सिद्धांत चुनने की बात ही नहीं कर रहा; जीवन तुम्हारे पास है, वही कसौटी है। तुम उस पर ही कसे चलो।

जब तुम झूठ बोलते हो, तो जीवन में आनंद बढ़ता है? बस, इसको ही देखो। अगर बढ़ता हो, तो मैं कहता हूं झूठ ही बोलो। मैं तुमसे कभी न कहूंगा कि सच बोलो। अगर धोखा देने से, बेईमानी करने से, दूसरों को कष्ट देने से तुम्हारे जीवन में आनंद की वर्षा होती हो, तो वही धर्म है। तुम वही करो। किसी की मत सुनो। लेकिन ऐसा कभी होता नहीं। ऐसा हो नहीं सकता। वह जीवन का विधान नहीं है।

शास्त्र केवल इतना ही कहते हैं, वह जो अनंत— अनंत बार जाना गया है, उसी को दोहराते हैं, हर जानने वाले ने जो अनुभव किया ' है, उसी को दोहराते हैं। वे इतना ही कहते हैं, कंकड़—पत्थर मत खाओ। झूठ दुख देगा; सुख का कितना ही आश्वासन दे ,, दुख देगा। दूसरे को दुख दोगे, दुख लौटेगा। दूसरे को सताओगे, सताए जाओगे। अशांति पैदा करोगे लोगों के जीवन में, तुम्हारे जीवन में अशांति की प्रतिध्वनि होगी। और कुछ भी न होगा। क्योंकि संसार तो दर्पण है। तुम्हें अपना ही चेहरा सब तरफ दिखाई पड़ने लगेगा। तुम अपने ही चेहरों से घिर जाओगे।

बस, शास्त्र इतना ही कहते हैं। शास्त्र सीधे—साफ हैं। उलझाया है तो पंडितों ने। वे एक एक शब्द की इतनी बाल की खाल निकालते रहते हैं कि यह भूल ही जाता है कि शास्त्र भोजन की तरह है। वह चर्चा करने के लिए नहीं है बैठकर वह पचाने के लिए है। वह तुम्हारा खून बने, हड्डी—मांस—मज्जा बने।

बोधिधर्म चीन गया। जब वह वापस लौटने लगा नौ वर्ष के बाद, तो उसने अपने चार शिष्य, जो कि श्रेष्ठत