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भगवत्गीता में वर्णित पुरूष—प्रकृति—लीला...अध्‍याय—13


अध्‍याय—13..सूत्र 18,19,20;-

''हे अर्जुन, इस प्रकार क्षेत्र तथा ज्ञान अर्थात ज्ञान का साधन और जानने योग्य परमात्मा का स्वरूप संक्षेप से कहा गया, इसको तत्व से जानकर मेरा भक्त मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।

और हे अर्जुन, कृति अर्थात त्रिगुणमयी मेरी माया और पुरुष अर्थात क्षेत्रज्ञ, इन दोनों को ही तू अनादि जान और रागद्वेषदि विकारों को तथा त्रिगुणास्थ्य संपूर्ण यदार्थो को भी प्रकृति से ही उत्पन्न हुए जान।

क्योंकि कार्य और करण के उत्पन्न करने में प्रकृति हेतु कही जाती है और पुरुष सुख— दुखों के भोक्तापन में अर्थात भोगने में हेतु कहा जाता है।''

सूत्र ;-

हे अर्जुन, इस प्रकार क्षेत्र तथा जान अर्थात ज्ञान का साधन और जानने योग्य परमात्मा का स्वरूप संक्षेप से कहा गया। इसको तत्व से जानकर मेरा भक्त मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।

क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संबंध में, ज्ञान और ज्ञान के साधन के संबंध में, कृष्ण कहते हैं, मैंने थोड़ी—सी बातें कहीं। इनको अगर कोई तत्व से जान ले, तो वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।

''तत्व से जानकर''! इसे हमे समझना होगा ।

एक तो जानकारी है सूचना की। कोई कहता है, हम सुन लेते हैं और हम भी जान लेते हैं। वह तत्व से जानना नहीं है। एक जानकारी है अनुभव की, स्वयं के साक्षात की।केवल हम ही जानते हैं ...तब हम तत्व से जानते हैं।

एक आदमी कहता है कि सागर का जल खारा है। हम समझ गए। जल भी हमने देखा है। सागर भी हमने देखा है। खारेपन का भी हमको पता है। समझ गए। वाक्य का अर्थ हमारी समझ में आ गया कि सागर का जल खारा है। लेकिन यह अर्थ शाब्दिक है। हमने सागर के जल को कभी चखा नहीं। और बिना चखे हमें कुछ पता न चलेगा। चखकर जो हमें पता चलेगा, वह तत्व से ज्ञान होगा। अनुभव से अपने जो ज्ञान होता है, वह तत्व है। दूसरे से भी उसके संबंध में खबर मिल सकती है।

खतरा यह है कि हम दूसरे से मिली खबरों को भी अपना ज्ञान समझ लेते हैं। इसी तरह दुनिया में अनेक लोग अज्ञानी के अज्ञानी मर जाते हैं, इस भांति में कि वे जानते हैं, इस भ्रांति में कि उन्हें ज्ञान है।

रोज मुझे ऐसे लोगों से मिलना हो जाता है, जिन्हें शास्त्र कंठस्थ हैं। अगर कृष्ण भी मिल जाएं और फिर से उनसे कहा जाए कि गीता कहो, तो दोहरा न सकेंगे। क्योंकि कृष्ण को कोई यह कंठस्थ नहीं है। बहुत—सी बातें छूट जाएंगी, बहुत—सी नई जुड़ जाएंगी। सब ढांचा बदल जाएगा। लेकिन इनको जिनको गीता कंठस्थ है, इनसे भूल होने का उपाय नहीं है। ये कृष्ण में भी भूलें बता सकते हैं। क्योंकि कृष्ण दुबारा दोहरा न सकेंगे। यह तो सहजस्फूर्त थी। मगर इनको कंठस्थ है।

ये जो कंठस्थ हैं, इनको धीरे— धीरे यह भांति पैदा हो जाती है कि इन्हें पता है।

ऐसा हुआ एक बार कि इंग्लैंड में एक प्रतियोगिता रखी गई। प्रतियोगिता यह थी कि सारी दुनिया से अभिनेता आमंत्रित किए गए थे कि वे चार्ली चैपलिन का अभिनय करें। चार्ली चैपलिन को मजाक सूझा; उसने सोचा मैं भी क्यों न किसी और नाम से अभिनय में सम्मिलित हो जाऊं! मुझे तो पुरस्कार निश्चित है। शक की कोई बात ही नहीं, क्योंकि चार्ली चैपलिन का ही अभिनय करना था दूसरों को।

सारी दुनिया में अनेक जगह प्रतियोगिताएं हुईं और फिर सौ प्रतियोगी लंदन में इकट्ठे हुए; किसी को शक भी नहीं था कि उसमें एक चार्ली चैपलिन भी है। वे सभी चार्ली चैपलिन जैसे लग रहे थे। वैसी ही मूंछ लगाई थी। वैसे ही कपड़े पहने थे। वैसी ही चाल चलते थे। तो उसमें चार्ली चैपलिन भी छिप गया था। वह भी किसी दूसरे नाम से भर्ती हो गया था।

अगर पता चल जाता आयोजकों को, तो उसे निकाल बाहर करते। क्योंकि उसका तो कोई सवाल ही नहीं था। फिर तो प्रतियोगिता खराब ही हो गई। इसलिए वह छिपकर ही सम्मिलित था।

मगर कठिनाई तो तब हुई, जब उसको तीसरा नंबर मिला। और जब पता चला कि वह मौजूद था और नंबर तीन आया चार्ली चैपलिन की नकल करने में, तब तो बड़ी हैरानी हुई कि यह बात क्या हो गई! दूसरे लोग हाथ मार ले गए। क्योंकि दूसरे लोगों के लिए सिर्फ नकल थी बंधी हुई! चार्ली चैपलिन को सहज मामला है। उसने कुछ नया कर दिया होगा, जो उसने पहले कभी नहीं किया था। उसी में फंस गया वह। क्योंकि जो उसने पहले नहीं किया था, वह तो निरीक्षकों को भी पता नहीं था, जजेस को भी पता नहीं था। और जो उसने पहले नहीं किया था, वह तो चार्ली चैपलिन का माना ही नहीं जा सकता। और उसे कभी खयाल ही नहीं था कि अपनी नकल कैसे करनी। उसने जिंदगीभर जो भी किया था, वह सहज था। पहली दफा उसने नकल करने की कोशिश की। खुद ही हार गया अपनी ही नकल में! नंबर तीन पर आया।

आप पक्का समझिए कि अगर कृष्ण भी कहीं बिठा दिए जाएं प्रतियोगिता में कंठस्थ गीता वालों से, हारेंगे। इनसे जीतने का कोई उपाय नहीं है। ये हाथ मार ले जाएंगे। क्योंकि इनको बिलकुल कंठस्थ है, यंत्रवत।

ज्ञान को कंठस्थ होने की जरूरत ही नहीं है। सिर्फ अज्ञान कंठस्थ करता है। कंठस्थ का मतलब ही यह है कि तुम्हें पता नहीं है। तुम्हारे भीतर नहीं है। सिर्फ कंठ में है। शब्दों की याददाश्त है। हम सबको शब्द याद हैं। और शब्दों के याद होने से भ्रांति होती है कि हमें मालूम है। शब्द खतरनाक हैं। अगर बार—बार दोहराते रहें, तो आप ही भूल जाते हैं कि पता नहीं है। ईश्वर, ईश्वर, ईश्वर सुनते—सुनते ऐसा लगने लगता है कि हमें मालूम है कि ईश्वर है। आत्मा, आत्मा, आत्मा सुनते—सुनते आप भूल ही जाते हैं कि आत्मा न हमें पता है कि क्या है, न कोई अनुभव है, न कोई स्वाद है।

यह बड़ी खतरनाक स्थिति है। क्योंकि शब्द एक भ्रम पैदा कर देते हैं, एक हवा पैदा कर देते हैं चारों तरफ कि मालूम है।

अगर कोई आपसे पूछे, आत्मा है? आप फौरन कहेंगे, हौ। बिना एक रत्तीभर शक पैदा हुए कि हमें कुछ भी पता नहीं है कि आत्मा है या नहीं है।

और जितने आप विश्वास से कह रहे हैं, है, उतने ही विश्वास से रूस में किसी से पूछो, वह कहता है, नहीं है। क्योंकि बचपन से उसको सिखाया जा रहा है, नहीं है, नहीं है। आपको सिखाया जा रहा है, है, है। आप दोनों एक से हैं। जरा भी फर्क नहीं है। वह भी तोते की तरह दोहराया गया है उसको कि आत्मा नहीं है। और आपको भी तोते की तरह दोहराया गया है कि आत्मा है।

ऊपर से देखने पर कितना फर्क मालूम पड़ता है! आप लगते हैं आस्तिक और वह रूस का आदमी लगता है नास्तिक। आप दोनों एक से हैं। न तो आप आस्तिक हैं, न वह नास्तिक है। वह भी, जो उसने सुना है, दोहरा रहा है। जो आपने सुना है, आप दोहरा रहे हैं। फर्क क्या है? फर्क तो पैदा होगा, जब तत्व से ज्ञान होगा।

सुनी हुई बातचीतों का कोई भी मूल्य नहीं है। और उसी आदमी को मैं बुद्धिमान कहता हूं, जो यह याद रख सके कि सुनी हुई बातें मेरा ज्ञान नहीं है। सुनी हुई बातों को एक तरफ रखे।

मैं यह नहीं कह रहा हूं कि सुनी हुई बातें बुरी हैं। यह भी नहीं कह रहा हूं कि सुनी हुई बातों का कोई उपयोग नहीं है। लेकिन इतना स्मरण होना चाहिए कि क्या है मेरी स्मृति और क्या है मेरा ज्ञान! क्या मैंने सुना है और क्या मैंने जाना है!

जो जाना है, वही तुम्हारा है, वही तत्व है। जो नहीं जाना है, सुना है, वह सिर्फ धारणाएं हैं, प्रत्यय हैं, कंसेप्ट्स हैं। उनसे कोई जीवन बदलेगा नहीं।

तो कृष्ण कहते हैं, जो तत्व से जानता है, वह मेरा भक्त मेरे स्वरूप को उपलब्ध हो जाता है। स्वभावत:, जो तत्व से जानेगा, वह परम ईश्वर के स्वरूप के साथ एक हो ही जाएगा। उसे कोई बाधा नहीं है।

और हे अर्जुन, प्रकृति अर्थात त्रिगुणमयी मेरी माया और पुरुष अर्थात क्षेत्रज्ञ, इन दोनों को ही तू अनादि जान।

यह प्रश्न विचारणीय है और बहुत ऊहापोह मनुष्य इस पर करता रहा है।

हमारे मन में यह सवाल उठता ही रहता है कि किसने बनाया जगत को? किसने बनाया? कौन है स्रष्टा? जरूर कोई बनाने वाला है। हमारा मन यह मान ही नहीं पाता कि बिना बनाए यह जगत हो सकता है। बनाने वाला तो चाहिए ही।

तो हम बच्चों जैसी बातें करते रहते हैं और हम बच्चों जैसी बातें प्रचारित भी करते रहते हैं कि जैसे कुम्हार घडे को बनाता है, ऐसा स्रष्टा है कोई, जो सृष्टि को बनाता है।

कृष्ण कहते हैं, तू दोनों को अनादि जान, प्रकृति को भी और पुरुष को भी।

वे बनाए हुए नहीं हैं, वे सदा से हैं। कभी प्रकट होते हैं, कभी अप्रकट। लेकिन मिटता कुछ भी नहीं है और न कुछ बनता है। कभी दृश्य होते हैं, कभी अदृश्य। लेकिन जो अदृश्य है, वह भी है। जो दृश्य है, वही नहीं है; अदृश्य भी है। आज मौजूद है, कल गैर—मौजूद हो जाता है। यह गैर—मौजूदगी भी अस्तित्व का एक ढंग है। यह न होना भी होने का एक प्रकार है। क्योंकि बिलकुल परिपूर्ण रूप से नहीं तो जो है, वह हो ही नहीं सकता।

इसलिए कृष्ण कहते हैं, प्रकृति भी और पुरुष भी!

वह जो दिखाई पड़ता है वह, और वह जो देखता है वह, वे दोनों अनादि हैं। उनका कोई प्रारंभ नहीं है। उनके प्रारंभ की बात ही बचकानी है।

एक मित्र ने सवाल पूछा है। उन्होंने पूछा है कि विज्ञान तो धर्म से जीत गया संघर्ष में! वह इसीलिए जीत गया कि वह जो भी कहता है, स्पष्ट है। और धर्म जो भी कहता है, वह स्पष्ट नहीं है। और उन मित्र ने यह कहा है कि धर्म अभी तक नहीं बता पाया कि जगत को किसने बनाया? सृष्टि कैसे हुई? क्यों हुई?

उनके प्रश्न में थोड़ा अर्थ है।

धर्म तो वस्तुत: कहता है कि जगत अनादि है; किसी ने बनाया नहीं है। बनाने की बात ही बच्चों को समझाने के लिए है। और इस संबंध में विज्ञान भी राजी है। विज्ञान भी कहता है कि अस्तित्व प्रारंभ—शून्य है।

ईसाइयत से विज्ञान की थोड़ी कलह हुई। और कलह का कारण यह था कि ईसाइयत ने तय कर रखा था कि जगत एक खास तारीख को बना। एक ईसाई पादरी ने तो तारीख और दिन सब निकाल रखा था। जीसस से चार हजार चार साल पहले, फला—फलां दिन, इतने बजे सुबह जगत का निर्माण हुआ!

विज्ञान को अड़चन और कलह शुरू हुई ईसाइयत के साथ। विज्ञान और धर्म का संघर्ष नहीं है। विज्ञान और ईसाइयत में संघर्ष हुआ जरूर, क्योंकि ईसाइयत की बहुत—सी धारणाएं बचकानी थीं। और विज्ञान ने कहा कि यह तो बात एकदम गलत है कि चार हजार साल पहले जीसस के पृथ्वी बनी या जगत बना। क्योंकि पृथ्वी में ऐसे प्रमाण उपलब्ध हैं, जो लाखों—लाखों साल पुराने हैं।

आदमी लेकिन बड़ा बेईमान है। और आदमी अपने लिए जो भी ठीक मानना चाहता है, उसको ठीक मान लेता है। तरकीबें निकाल लेता है। जिस बिशप ने यह सिद्ध किया था कि जीसस के चार हजार चार साल पहले पृथ्वी बनी, उसने एक वक्तव्य जाहिर किया। और उसने कहा कि हम यह मानते हैं कि पृथ्वी में ऐसी चीजें मिलती हैं, जो लाखों साल पुरानी हैं।

अब यह बड़ी कठिन बात है। अगर पृथ्वी में ऐसी चीजें मिलती हैं, जो लाखों साल पुरानी हैं, तो पृथ्वी कैसे बन सकती है चार हजार साल पहले या छ: हजार साल पहले?

उस बिशप ने कहा कि भगवान के लिए सभी कुछ संभव है। उसने चार हजार साल पहले पृथ्वी बनाई और पृथ्वी में ऐसी चीजें रख दीं जो लाखों साल पुरानी मालूम पड़ती हैं; लोगों की भक्ति की परीक्षा के लिए! कि लोग अगर सच में निष्ठावान हैं, तो वे कहेंगे, हमारी तो निष्ठा है। यह भगवान हमारी परीक्षा ले रहा है।

ये आदमी के बेईमान होने के ढंग इतने हैं कि वह अपनी बेईमानी में ईश्वर तक को भी फंसा लेता है। ईश्वर ने बनाई तो चार हजार साल पहले ही चीजें, लेकिन ईश्वर के लिए क्या असंभव है! सर्व शक्तिशाली है। उसने उसको इस ढंग से बनाया कि वैज्ञानिक धोखा खा जाते हैं कि लाख साल पुरानी है। सिर्फ छांटने के लिए कि जो असली आस्तिक हैं, वे राजी रहेंगे, और जो नकली आस्तिक हैं, वे नास्तिक हो जाएंगे। उसने यह तरकीब बिठाई।

लेकिन कृष्ण की धारणा बहुत वैज्ञानिक है। वे कहते हैं कि प्रकृति और पुरुष का कोई आदि—प्रारंभ नहीं है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि इस जगत का प्रारंभ नहीं है।

इसका फर्क समझ लें।

प्रकृति का कोई प्रारंभ नहीं है, पुरुष का कोई प्रारंभ नहीं है। आपके शरीर का कोई प्रारंभ नहीं है और आपकी आत्मा का भी कोई प्रारंभ नहीं है। लेकिन आपका प्रारंभ है। आपकी आत्मा भी अनादि है और आपका शरीर भी अनादि है। क्योंकि शरीर में क्या है जो आपके पहले नहीं था! सभी कुछ था। मिट्टी थी, हड्डी—मांस, जो भी आपके भीतर है, वह सब था; किसी रूप में था।

अगर आपके शरीर की सब चीजें निकाली जाएं, तो वैज्ञानिक कहते हैं, कोई चार, साढ़े चार रुपए का सामान उसमें निकलता है। अल्युमिनियम, तांबा, पीतल सब है। बहुत थोड़ा— थोड़ा है। सब निकाल लिया जाए, तो कोई सस्ते जमाने में साढ़े चार रुपए का होता था, अब कुछ महंगा होता होगा। लेकिन यह सब था।

शरीर भी आपका अनादि है। और आपके भीतर जो छिपी हुई आत्मा है, वह भी अनादि है। लेकिन आप अनादि नहीं हैं। आपका तो जन्म हुआ। आपका तो म्युनिसिपल के दफ्तर में सब हिसाब—किताब है। कब आप पैदा हुए, कहां पैदा हुए, कैसे पैदा हुए, वह सब है।

आप पैदा हुए, आप एक जोड हैं। आप तत्व नहीं हैं, आप एक कंपाउंड हैं। इलिमेंट नहीं हैं, संयोग हैं। संयोग का जन्म होता है; और संयोग का वियोग होता है, विनाश होता है। लेकिन जो तत्व है, उसका विनाश नहीं होता। जब आप मरेंगे, तो शरीर अपनी दुनिया में लौट जाएगा मिट्टी—पत्थर की। और आपकी चेतना चेतना की दुनिया में लौट जाएगी। वे दोनों पहले भी थे।

आप? आप एक संयोग हैं दो के। आपका जन्म होता है, आपका अंत होता है।

भारतीय मनीषा कहती है कि न तो प्रकृति का कोई आदि है, न कोई अंत है। और न पुरुष का कोई आदि है और अंत है। लेकिन संसार का आदि और अंत है।

संसार ऐसे ही है, जैसे आपका शरीर और आत्मा के मिलने से आपका व्यक्तित्व। ऐसे ही इतने सारे पुरुषों और इस प्रकृति के मिलने से जो प्रकट होता है संसार, वह प्रारंभ होता है और उसका अंत होता है।

हम जिस संसार में रह रहे हैं, वह सदा नहीं था। वैज्ञानिक कहते हैं कि हमारा सूरज कोई चार हजार साल में ठंडा हो जाएगा। अरबों वर्ष से गरमी दे रहा है। उसकी गरमी चुकती जा रही है। चार हजार साल और, और वह ठंडा हो जाएगा। उसके ठंडे होते ही पृथ्वी भी ठंडी हो जाएगी। फिर पौधा यहां नहीं फूटेगा; फिर बच्चे यहां पैदा नहीं होंगे, फिर श्वास यहां नहीं चलेगी, फिर यहां जीवन शून्य हो जाएगा।

आदमी ही नहीं मरता, पृथ्वियां भी मरती हैं। अभी हमारी पृथ्वी जीवित है, लेकिन वह भी बुढ़ापे के करीब पहुंच रही है। अभी कई पृथ्वियां मृत हैं। अभी कई पृथ्वियां जन्मने के करीब हैं। अभी कई पृथ्वियां जवान हैं। अभी कई पृथ्वियां बचपन में हैं।

वैज्ञानिक कहते हैं, कम से कम पचास हजार ग्रहों पर जीवन है। पचास हजार पृथ्वियां हैं कम से कम, जिन पर जीवन है। उसमें कोई बिलकुल बच्चों जैसी है। अभी— अभी उसमें काई फूट रही है और घास उग रहा है, अभी और बड़ा जीवन नहीं आया है। कोई बिलकुल की हो गई है; सब सूख गया है। आदमी भी जा चुके हैं, प्राणी भी जा चुके हैं; आखिरी काई भी सूखती जा रही है। कोई बिलकुल बंजर हो गई है, मृत। कोई अभी गर्भ में है; अभी तैयारी कर रही है। जल्दी ही जीवन का अंकुर उस पर फूटेगा।

पृथ्वियां आती हैं, खो जाती हैं। संसार बनते हैं, विनष्ट हो जाते हैं। लेकिन मूल तत्व दो हैं, प्रकृति और पुरुष, प्रकृति और परमात्मा, पदार्थ और चैतन्य, वे दोनों अनादि हैं।

तब एक सवाल उठेगा मन में, तो फिर हम कहते हैं कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश—ब्रह्मा बनाता है, विष्णु सम्हालते हैं, महेश मिटाते हैं—इनका क्या अर्थ?

ये भी सम्हालते, मिटाते, बनाते हैं संसारों को, अस्तित्व को नहीं। ये भी एक संसार को बनाते हैं। इसलिए बौद्धों ने तो अनेक ब्रह्मा माने हैं। क्योंकि जितने संसार हैं, उतने ब्रह्मा। क्योंकि हर संसार को बनाने की शक्ति का नाम ब्रह्मा है; ब्रह्मा कोई व्यक्ति नहीं हैं। सम्हालने की शक्ति का नाम विष्णु है; विष्णु कोई व्यक्ति नहीं हैं। विनष्ट हो जाने की संभावना का नाम शिव है; शिव कोई व्यक्ति नहीं हैं।

तो जहां—जहां जीवन है, जीवन का विस्तार है, और जहां—जहां जीवन का अंत है, वहा—वहां ये तीन शक्तियां काम करती रहेंगी। लेकिन इन सबका संबंध संसारों से है।

इसलिए बहुत मजेदार घटना बौद्ध कथाओं में है। वह यह कि जब बुद्ध को ज्ञान हुआ, तो जो पहला व्यक्ति जिज्ञासा करने आया, वह था ब्रह्मा। ब्रह्मा ने आकर सिर टेक दिया बुद्ध के चरणों में और कहा कि मुझे ज्ञान दें। हमें तो बड़ी घबड़ाहट होगी। क्योंकि ब्रह्मा बनाने वाला संसार का, वह बुद्ध के चरणों में आया पूछने कि मुझे ज्ञान दें!

ब्रह्मा संसार को बनाने वाला जरूर है, लेकिन संसार को वह बनाता ही इसलिए है कि उसमें संसार को बनाने की वासना है। बुद्ध वासना—मुक्त हो गए। इसलिए बुद्ध’ ब्रह्मा से ऊपर हो गए। बुद्ध शुद्ध पुरुष हो गए। ब्रह्मा उनसे नीचे रह गया। क्योंकि ब्रह्मा भी बनाता है। बनाने का अर्थ ही है कि कामवासना है। जहां वासना नहीं है, वहां कोई सृजन न होगा। इसलिए हम ब्रह्मा को मुक्त नहीं मानते। ब्रह्मा को भी हम मानते हैं कि वह भी बंधन में है, क्योंकि बनाने का…।

स्वभावत:, आप एक छोटी—सी दुकान चलाते हैं, कितनी मुसीबत है! अगर ब्रह्मा को हम समझें और इतने सारे संसार को चलाता है, तो उसकी मुसीबत का हम अंदाज लगा सकते हैं। उसकी मुसीबत का हम खयाल कर सकते हैं। इतना बड़ा संसार अगर किसी को चलाना पड़ रहा है, तो उसके पीछे एक तो प्रगाढ़ कामना होनी चाहिए, अंतहीन वासना होनी चाहिए। और फिर उसका उपद्रव और जाल भी होगा ही।

वह बुद्ध से कहता है ब्रह्मा—यह कथा मीठी है—कि मुझे भी कुछ जान दें, मैं भी उलझा हूं अभी, मेरा मन भी शात नहीं है। आप जहां पहुंच गए हैं, वहां से कुछ अमृत मेरे लिए भी!

लेकिन बुद्ध चुप हैं। और बुद्ध को जब ज्ञान हुआ, तो उन्हें लगा कि अब बोलने की क्या जरूरत। जो जाना है, वह कहा नहीं जा सकता। और जो सुनने वाले हैं, उनमें कोई समझ भी न पाएगा। इसलिए व्यर्थ की मेहनत नहीं करनी है।

तो ब्रह्मा उनके पैर पर सिर रख—रखकर बार—बार कहता है कि आप लोगों से कहें, क्योंकि हम हजारों—हजारों साल तक प्रतीक्षा करते हैं कि कोई बुद्ध हो, तो हमें कुछ ज्ञान मिले। हम भी कुछ जान पाएं। हमें भी कुछ पता चले कि क्या है।

ब्रह्मा का यह पूछना बड़ा मजेदार है। उसे भी पता नहीं कि क्या है। वह भी अपनी वासना में जी रहा है।

हम सब छोटे—छोटे ब्रह्मा हैं, जब हम बनाते हैं। और हम सब छोटे—छोटे विष्णु हैं, जब हम सम्हालते हैं। और हम सब छोटे—छोटे शिव हैं, जब हम मिटाते हैं। इसी को विराट करके देखें, तो पूरे संसार का खयाल आ जाएगा।

कृष्ण कहते हैं, लेकिन दो मौलिक तत्व, प्रकृति और पुरुष अनादि हैं। और राग—द्वेष आदि विकारों को तथा त्रिगुणात्मक संपूर्ण

पदार्थों को भी प्रकृति से ही उत्पन्न हुआ जान।

और जो कुछ भी तुझे दिखाई पड़ता है इस जगत में पैदा होता हुआ—राग—द्वेष, विकार, त्रिगुण—यह संपूर्ण पदार्थ, इनको तू प्रकृति के ही रूप जान। ये प्रकृति से ही पैदा हुए हैं।

तत्व दो हैं, प्रकृति और पुरुष। बाकी जितना फैलाव दिखाई पड़ता है, वह दो में से किसी से जुड़ा होगा। तो कृष्ण कहते हैं, यह जितना विस्तार है माया का, त्रिगुण का; ये जो भी दिखाई पड़ रहे हैं पदार्थ, इतने रूप, इतने रंग, इतना परिवर्तन; ये सब प्रकृति से ही उत्पन्न हुए जान। ये प्रकृति में ही उत्पन्न होते हैं और प्रकृति में ही लीन होते रहते हैं। जिससे ये उत्पन्न होते हैं और जिसमें लीन होते हैं, उसी का नाम प्रकृति है।

यह प्रकृति शब्द हमारा बड़ा अदभुत है। ऐसा शब्द दुनिया की किसी भी भाषा में नहीं है। अंग्रेजी में अक्सर हम प्रकृति को नेचर या क्रिएशन से अनुवादित करते हैं। दोनों ही गलत हैं। प्रकृति शब्द का अर्थ है, कृति के पहले। उसका अर्थ है, प्रि—क्रिएशन। शब्द बहुत अनूठा है। प्रकृति का अर्थ है कि कृति के पहले। जब कुछ भी नहीं था, तब भी जो था। जब कुछ भी नहीं बना था, तब भी जो था, प्रि—क्रिएशन। पहले जो था, सृजन के भी पहले जो था, उसका नाम प्रकृति है।

इसलिए प्रकृति को क्रिएशन तो अनुवाद किया ही नहीं जा सकता। नेचर भी अनुवाद नहीं किया जा सकता। क्योंकि नेचर तो, जो हमें दिखाई पड़ रहा है, वह है।

प्रकृति सांख्यों का बड़ा अनूठा शब्द है। उसका अर्थ है, जो कुछ दिखाई पड़ रहा है, यह जब नहीं था और जिसमें छिपा था, उसका नाम प्रकृति है। जो कुछ दिखाई पड़ रहा है, जब यह सब मिट जाएगा और उसी में डूब जाएगा जिससे निकला है, उसका नाम प्रकृति है। तो प्रकृति है वह, जिससे सब निकलता है और जिसमें सब लीन हो जाता है। प्रकृति है मूल उदगम सभी रूपों का।

क्योंकि कार्य और कारण के उत्पन्न करने में हेतु प्रकृति कही जाती है। और पुरुष सुख—दुखों के भोक्तापन में अर्थात भोगने में हेतु कहा जाता है।

इन दो बातों को बहुत गौर से समझ लेना चाहिए। जिनकी साधना की दृष्टि है, उनके लिए बहुत काम की है।

कार्य और कारण के उत्पन्न करने में हेतु प्रकृति कही जाती है। और पुरुष सुख—दुखों के भोक्तापन में अर्थात भोगने में हेतु कहा जाता है। घटनाएं घटती हैं प्रकृति में, भोग की कल्पना और मुक्ति की कल्पना घटती है पुरुष में।

एक फूल खिला। फूल का खिलना प्रकृति में घटित होता है। और अगर कोई आदमी न हो पृथ्वी पर, तो फूल न तो सुंदर होगा और न कुरूप। या होगा? कोई आदमी नहीं है जगत में, एक फूल खिला एक पहाड़ के किनारे। वह सुंदर होगा कि कुरूप होगा? वह सुखद होगा कि दुखद होगा? वह किसी को आनंदित करेगा कि किसी को पीडित करेगा? कोई है ही नहीं पुरुष।

सिर्फ फूल खिलेगा। न सुंदर होगा, न असुंदर; न सुखद, न लेकिन फूल खिलेगा, फूल अपने में पूरी तरह से खिलेगा।

फिर एक पुरुष प्रकट होता है। फूल के पास खड़ा हो जाता है। फूल तो प्रकृति में खिल रहा है। पुरुष के मन में, पुरुष के भाव में, कल्पना खिलनी शुरू हो जाती है फूल के साथ—साथ समानांतर। पुरुष कहता है, सुंदर है। यह सुंदर का जो फूल खिल रहा है, यह पुरुष के भीतर खिल रहा है। फूल बाहर खिल रहा है। यह जो सुंदर होने का भाव खिल रहा है, यह पुरुष के भीतर खिल रहा है। और अगर पुरुष कहता है सुंदर है, तो सुख पाता है, सुख भोगता है। अगर पुरुष कहता है असुंदर है, तो दुख पाता है।

और ऐसा नहीं है। सुंदर और असुंदर धारणाओं पर निर्भर करते हैं। आज से सौ साल पहले कोई सोच भी नहीं सकता था कि कैक्टस के पौधे को घर में रखेगा। सौ साल पहले कोई रख लेता, तो हम उसका पागलखाने में इलाज करवाते। कैक्टस का पौधा गांव के बाहर लोग अपने खेत के चारों तरफ बागुड़ लगाने के काम में लाते रहे हैं। सुंदर है, ऐसा कभी किसी ने सोचा नहीं था।

अब हालत ऐसी है कि जिनको भी खयाल है सौंदर्य का थोड़ा—बहुत, वे गुलाब वगैरह को निकाल बाहर कर रहे हैं घरों से, कैक्टस के पौधे लगा रहे हैं! जिनको कहें अवांगार्द जो बहुत आभिजात्य हैं, जिनको सौंदर्य का बड़ा बोध है, या जो अपने समय से बहुत आगे हैं, वे सब तरह के ऐड़े—तिरछे काटो वाले पौधे घरों में इकट्ठे कर रहे हैं। उनमें ऐसे पौधे भी हैं कि अगर काटा लग जाए, तो जहर हो जाए खून में। लेकिन उसकी भी चिंता नहीं है। पौधा इतना सुंदर है यह कि मौत भी झेली जा सकती है।

कोई सोच नहीं सकता था सौ साल पहले कि ये कैक्टस के पौधे सुंदर होते हैं। अभी हो गए है। ज्यादा दिन चलेंगे नहीं। सब फैशन है। अभी गुलाब के सौंदर्य की चर्चा करना बड़ा आर्थोडाक्स, पुराना, दकियानूसी मालूम पड़ता है। कोई कहने लगे, बड़ा सुंदर गुलाब है। तो लोग कहेंगे, क्या फिजूल की बातें कर रहे हो! सारा संसार गुलाब की चर्चा करके थक गया। अब हटाओ गुलाब को। आउट आफ डेट है। बिलकुल तिथिबाह्य है। कैक्टस की कुछ बात हो।

पिकासो ने अपनी एक डायरी में लिखा है कि मैं एक स्त्री के प्रेम में पड़ गया हूं। स्त्री सुंदर नहीं है। लेकिन उस स्त्री में एक धार है। सुंदर तो नहीं है। लेकिन फिर वह लिखता है कि सुंदर की भी क्या बकवास! यह तो बहुत पुरानी धारणा है। धार है, जैसे कि काट दे, जैसे तलवार में धार होती है। उस धार में मुझे रस है।

यह कैक्टस का प्रेम ही होगा, जो स्त्री तक फैल रहा है। धार, काट दे! सौंदर्य भी मुरदा—मुरदा लगता है पुराना। अगर कालिदास का सौंदर्य हो, पिकासो को बिलकुल न जंचेगा। वह जो कालिदास जिस सौंदर्य की चर्चा करता है, कुंदन जैसे सुंदर शरीर की, स्वर्ण—काया की, वह पिकासो को नहीं जंचेगा।

आदमी के भीतर वह जो चैतन्य है, वह भाव निर्मित करता है। भोक्ता, फिर भाव से भोगता है।

ध्यान रहे, अगर आप भाव से भोगते हैं, तो भाव से दुख भी पाएंगे, सुख भी पाएंगे, दोनों पाएंगे। और मजा यह है कि फूल बाहर है। न सुंदर है, न कुरूप है। और यह भाव आपका है।

तो कृष्ण कहते हैं कि सब कार्य—कारण उत्पन्न करने में प्रकृति है हेतु और पुरुष सुख—दुखों के भोक्तापन में अर्थात भोगने में हेतु कहा जाता है।

सुख—दुख तुम पैदा करते हो, वह प्रकृति पैदा नहीं करती। प्रकृति निष्पक्ष है। कहना चाहिए, प्रकृति को पता ही नहीं है कि तुम नाहक सुख—दुख भोग रहे हो।

एक फूल को पता चलता होगा कि तुम बड़े आनंदित हो रहे हो कि तुम बड़े दुखी हो रहे हो? फूल को कुछ पता नहीं चलता। फूल को कुछ लेना—देना नहीं है। फूल अपने तईं खिल रहा है। तुम्हारे लिए खिल भी नहीं रहा है। तुमसे कोई संबंध ही नहीं है। तुम असंगत हो। लेकिन तुम एक भाव ‘पैदा कर रहे हो। उस भाव से तुम डावाडोल हो रहे हो। वह भाव तुम्हारे भीतर है।

सांख्य की धारणा है, वही कृष्ण कह रहे हैं, कि तुम जो भी भोग रहे हो, वह तुम्हारे भीतर उठ रहा है। बाहर प्रकृति निष्पक्ष है। उसे तुम्हारा कुछ लेना—देना नहीं है। तुम चाहे सुख पाओ, तुम चाहे दुख पाओ, तुम ही जिम्मेवार हो।

और अगर यह बात खयाल में आ जाए कि मैं ही जिम्मेवार हूं, तो मुक्त होना कठिन नहीं है। तो फिर ठीक है, जब मैं ही जिम्मेवार हूं? और प्रकृति न तो सुख पैदा करती है और न दुख, मैं ही आरोपित करता हूं। सुख और दुख मेरा आरोपण है प्रकृति के ऊपर; सुख और दुख मेरे सपने हैं, जिन्हें मैं फैलाता हूं, और फैलाकर फिर भोगता हूं। अपने ही हाथ से फैलाता हूं और खुद ही फंसता हूं और भोगता हूं। अगर यह बात खयाल में आनी शुरू हो जाए, तो बड़ी अदभुत क्रांति घट सकती है।

जब आपके भीतर सुख का भाव उठने लगे, तब जरा चौंककर खड़े हो जाना और देखना कि प्रकृति कुछ भी नहीं कर रही है, मैं ही कुछ भाव पैदा कर रहा हूं। आपके चौंकते ही भाव गिर जाएगा। आपके होश में आते ही भाव गिर जाएगा। प्रकृति वहा रह जाएगी, सुख—दुखरहित, पुरुष भीतर रह जाएगा, सुख—दुखरहित।

पुरुष जब प्रकृति की तरफ दौड़ता है और आरोपित होता है, तो सुख—दुख पैदा होते हैं। और जो उस सुख—दुख में पड़ा है, वह द्वंद्व में और अज्ञान में है।

सुख—दुख के बाहर है आनंद। आनंद है पुरुष का स्वभाव; सुख—दुख है आरोपण प्रकृति पर। सुख—दुख है, पुरुष अपने को देख रहा है प्रकृति में, प्रकृति का उपयोग कर रहा है दर्पण की तरह। अपनी ही छाया को देखकर सुखी या दुखी होता है।

कभी—कभी आप भी अपने बाथरूम में अपने को ही आईने में देखकर सुखी—दुखी होते हैं। कोई भी वहां नहीं होता। आईना ही होता है। अपनी ही शक्ल होती है। उसको ही देखकर कभी बड़े सुखी भी होते हैं, गुनगुनाने लगते हैं गीत। जिनके पास गले जैसी कोई चीज नहीं है, वे भी बाथरूम में गुनगुनाने से नहीं बच पाते। अगर कोई ऐसा आदमी मिल जाए, जो बाथरूम में नहीं गुनगुनाता, तो समझना कि योगी है।

बाथरूम में तो लोग गुनगुनाते ही हैं। वे किसको देखकर गुनगुनाने लगते हैं? कौन—सी छवि उनको ऐसा आनंद देने लगती है? अपनी ही। अपने ही साथ मौज लेने लगते हैं।

करीब—करीब प्रकृति के साथ हम जो भी खेल खेल रहे हैं, वह दर्पण के साथ खेला गया खेल है। फिर कभी दुखी होते हैं, कभी सुखी होते हैं, और वह सब हमारा ही खेल है, हमारा ही नाटक है। इसे थोडा बोध में लेना शुरू करें। घटनाएं प्रकृति में घटती हैं, भावनाएं भीतर घटती हैं। और भावनाओं के कारण हम परेशान हैं, घटनाओं के कारण नहीं। और बड़ा मजा यह है कि अगर हम कभी इस परेशानी से मुक्त भी होना चाहते हैं, तो हम घटनाएं छोड्कर भागते हैं, भावनाओं को नहीं छोड़ते।

एक आदमी दुखी है घर में, गृहस्थी में। वह संन्यास ले लेता है, हिमालय चला जाता है। मगर उसे पता ही नहीं है कि वह दुखी इसलिए नहीं था कि वहा पत्नी है, बच्चा है, दुकान है। उसके कारण कोई दुखी नहीं था। वे तो घटनाएं हैं प्रकृति में। दुखी तो वह अपनी भावनाओं के कारण था। भावनाएं तो साथ चली जाएंगी हिमालय में भी। और वहा भी वह उनका आरोपण कर लेगा।

मैंने सुना है, एक आदमी शांति की तलाश में चला गया जंगल। बड़ा परेशान था कि बाजार में बड़ा शोरगुल है, बड़ा उपद्रव है। जंगल में जाकर वृक्ष के नीचे खड़ा ही हुआ था कि एक कौए ने बीट कर दी। सिर पर बीट गिरी। उसने कहा कि सब व्यर्थ हो गया। जंगल में भी शांति नहीं है!

जंगल में भी कौए तो बीट कर ही रहे हैं। और कौआ कोई आपकी खोपड़ी देखकर बीट नहीं कर रहा है। न बाजार में कोई आपकी खोपड़ी देखकर कुछ कर रहा है। कहीं कोई आपकी फिक्र नहीं कर रहा है। घटनाएं घट रही हैं। आप भावनाग्रस्त होकर घटनाओं को पकड़ लेते हैं और जकड़ जाते हैं।

और यह तो दूर कि असली घटनाएं पकड़ती हैं, लोग सिनेमा में बैठकर रोते रहते हैं। लोगों के रूमाल देखें सिनेमा के बाहर निकलकर, गीले हैं। आंसू पोंछ रहे हैं! वह तो सिनेमा में अंधेरा रहता है, इससे बड़ी सुविधा है। सबकी नजर परदे पर रहती है, तो पड़ोस में कोई नहीं देखता। और लोग झांक लेते हैं कि कोई नहीं देख रहा है, अपना आंसू पोंछ लेते हैं।