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क्या अर्थ है ''समत्व-योग का'' ?क्या अंतर है “साक्षी भाव एवं तटस्थ भाव/ तथाता की स्थ


''समत्व-योग'';-

11 FACTS;-

1-एक छोटे-से मस्तिष्क में कोई तीन अरब स्नायु तंतु हैं। एक छोटा-सा जीवकोश भी कोई सरल घटना नहीं है; अति जटिल घटना है।समत्व-योग की एक दिशा का विवेचन करते हुए

गीता में,श्रीकृष्ण कहते हैं'' अति--चाहे निद्रा में, चाहे भोजन में, चाहे जागरण में--समता लाने में बाधा है। किसी भी बात की अति, व्यक्तित्व को असंतुलित कर जाती है''।

2-प्रत्येक वस्तु का एक अनुपात है; उस अनुपात से कम या ज्यादा हो, तो व्यक्ति को नुकसान पहुंचने शुरू हो जाते हैं। दो-तीन आधारभूत बातें खयाल में ले लेनी चाहिए।

एक बात,व्यक्ति एक बहुत जटिल व्यवस्था (Complex unit) है।व्यक्ति का व्यक्तित्व कितना जटिल है, इसका हमें खयाल भी नहीं होता।इसीलिए प्रकृति खयाल भी नहीं देती, क्योंकि उतनी जटिलता को जानकर जीना कठिन हो जाएगा।एक छोटा-सा व्यक्ति

उतना ही जटिल है, जितना यह पूरा ब्रह्मांड। उसकी जटिलता में कोई कमी नहीं है।और एक लिहाज से ब्रह्मांड से भी ज्यादा जटिल हो जाता है, क्योंकिव्यक्ति का विस्तार बहुत कम है,और जटिलता ब्रह्मांड जैसी है।

3-एक साधारण से शरीर में सात करोड़ जीवाणु हैं। आप एक बड़ी बस्ती हैं, जितनी बड़ी कोई बस्ती पृथ्वी पर नहीं है। सात करोड़ जीवकोशों की एक बड़ी बस्ती हैं आप।इसीलिए सांख्य ने,योग ने आपको जो नाम दिया है,वह दिया है,.. पुरुष।पुरुष एक अर्थ है, एक बहुत

बड़ी पुरी के बीच रहते हैं आप, एक बहुत बड़े नगर के बीच। आप खुद एक बड़े नगर हैं, एक बड़ा पुर।आप छोटी-मोटी घटना नहीं हैं; एक महानगरी आपके भीतर जी रही है। उसके बीच आप जो हैं, उसको पुरुष कहा है।

4-एक छोटे-से मस्तिष्क में कोई तीन अरब स्नायु तंतु हैं। एक छोटा-सा जीवकोश भी कोई सरल घटना नहीं है; अति जटिल घटना है। ये जो सात करोड़ जीवकोश शरीर में हैं, उनमें एक जीवकोश भी अति कठिन घटना है। अभी तक वैज्ञानिक-अभी तक-उसे समझने में समर्थ नहीं थे। अब जाकर उसकी मौलिक रचना को समझने में समर्थ हो पाए हैं। अब जाकर पता चला है कि उस छोटे से जीवकोश, जिसके सात करोड़ संबंधियों से आप निर्मित होते हैं, उसकी रासायनिक प्रक्रिया क्या है।

5-यह सारा का सारा, जो इतना बड़ा व्यवस्था का जाल है आपका, इस व्यवस्था में एक संगीत, एक लयबद्धता, एकतानता(harmony) न हो, तो आप भीतर प्रवेश न कर पाएंगे। अगर यह पूरा का पूरा आपका जो' पुर' है, आपकी जो महानगरी है शरीर की, मन की, अगर यह अव्यवस्थित, अराजक है, अगर यह पूरी की पूरी नगरी विक्षिप्त है, तो आप भीतर प्रवेश

न कर पाएंगे।आपके भीतर प्रवेश के लिए जरूरी है कि यह पूरा नगर संगीतबद्ध, लयबद्ध, शांत, मौन, प्रफुल्लित, आनंदित हो, तो ही..आप इसमें भीतर आसानी से प्रवेश कर पाएंगे।

6-अन्यथा बहुत छोटी-सी चीज आपको बाहर अटका देगी । और इसलिए भी..अटका देती है कि चेतना का स्वभाव ही यही है कि वह ..आपके शरीर में कहां कोई दुर्घटना हो रही है, उसकी खबर देती रहे।तो अगर आपके शरीर में कहीं भी कोई दुर्घटना हो रही है,तो चेतना उस

दुर्घटना में उलझी रहेगी। वह इमरजेंसी, तात्कालिक जरूरत है उसकी, आपातकालीन जरूरत है कि सारे शरीर को भूल जाएगी और जहां पीड़ा है, अराजकता है, लय टूट गई है, वहां ध्यान अटक जाएगा।

7-छोटा-सा कांटा पैर में गड़ गया, तो सारी चेतना कांटे की तरफ दौड़ने लगती है। छोटा-सा कांटा...उसकी बड़ी ताकत नहीं है, लेकिन उस छोटे-से कांटे की बहुत छोटी-सी नोक भी आपके भीतर सैकड़ों जीवकोशों को पीड़ा में डाल देती है और तब चेतना उसकी तरफ दौड़ने लगती है। शरीर का कोई भी हिस्सा अगर जरा-सा भी रुग्ण है,