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क्या अर्थ है ''समत्व-योग का'' ?क्या अंतर है “साक्षी भाव एवं तटस्थ भाव/ तथाता की स्थ


''समत्व-योग'';-

11 FACTS;-

1-एक छोटे-से मस्तिष्क में कोई तीन अरब स्नायु तंतु हैं। एक छोटा-सा जीवकोश भी कोई सरल घटना नहीं है; अति जटिल घटना है।समत्व-योग की एक दिशा का विवेचन करते हुए

गीता में,श्रीकृष्ण कहते हैं'' अति--चाहे निद्रा में, चाहे भोजन में, चाहे जागरण में--समता लाने में बाधा है। किसी भी बात की अति, व्यक्तित्व को असंतुलित कर जाती है''।

2-प्रत्येक वस्तु का एक अनुपात है; उस अनुपात से कम या ज्यादा हो, तो व्यक्ति को नुकसान पहुंचने शुरू हो जाते हैं। दो-तीन आधारभूत बातें खयाल में ले लेनी चाहिए।

एक बात,व्यक्ति एक बहुत जटिल व्यवस्था (Complex unit) है।व्यक्ति का व्यक्तित्व कितना जटिल है, इसका हमें खयाल भी नहीं होता।इसीलिए प्रकृति खयाल भी नहीं देती, क्योंकि उतनी जटिलता को जानकर जीना कठिन हो जाएगा।एक छोटा-सा व्यक्ति

उतना ही जटिल है, जितना यह पूरा ब्रह्मांड। उसकी जटिलता में कोई कमी नहीं है।और एक लिहाज से ब्रह्मांड से भी ज्यादा जटिल हो जाता है, क्योंकिव्यक्ति का विस्तार बहुत कम है,और जटिलता ब्रह्मांड जैसी है।

3-एक साधारण से शरीर में सात करोड़ जीवाणु हैं। आप एक बड़ी बस्ती हैं, जितनी बड़ी कोई बस्ती पृथ्वी पर नहीं है। सात करोड़ जीवकोशों की एक बड़ी बस्ती हैं आप।इसीलिए सांख्य ने,योग ने आपको जो नाम दिया है,वह दिया है,.. पुरुष।पुरुष एक अर्थ है, एक बहुत

बड़ी पुरी के बीच रहते हैं आप, एक बहुत बड़े नगर के बीच। आप खुद एक बड़े नगर हैं, एक बड़ा पुर।आप छोटी-मोटी घटना नहीं हैं; एक महानगरी आपके भीतर जी रही है। उसके बीच आप जो हैं, उसको पुरुष कहा है।

4-एक छोटे-से मस्तिष्क में कोई तीन अरब स्नायु तंतु हैं। एक छोटा-सा जीवकोश भी कोई सरल घटना नहीं है; अति जटिल घटना है। ये जो सात करोड़ जीवकोश शरीर में हैं, उनमें एक जीवकोश भी अति कठिन घटना है। अभी तक वैज्ञानिक-अभी तक-उसे समझने में समर्थ नहीं थे। अब जाकर उसकी मौलिक रचना को समझने में समर्थ हो पाए हैं। अब जाकर पता चला है कि उस छोटे से जीवकोश, जिसके सात करोड़ संबंधियों से आप निर्मित होते हैं, उसकी रासायनिक प्रक्रिया क्या है।

5-यह सारा का सारा, जो इतना बड़ा व्यवस्था का जाल है आपका, इस व्यवस्था में एक संगीत, एक लयबद्धता, एकतानता(harmony) न हो, तो आप भीतर प्रवेश न कर पाएंगे। अगर यह पूरा का पूरा आपका जो' पुर' है, आपकी जो महानगरी है शरीर की, मन की, अगर यह अव्यवस्थित, अराजक है, अगर यह पूरी की पूरी नगरी विक्षिप्त है, तो आप भीतर प्रवेश

न कर पाएंगे।आपके भीतर प्रवेश के लिए जरूरी है कि यह पूरा नगर संगीतबद्ध, लयबद्ध, शांत, मौन, प्रफुल्लित, आनंदित हो, तो ही..आप इसमें भीतर आसानी से प्रवेश कर पाएंगे।

6-अन्यथा बहुत छोटी-सी चीज आपको बाहर अटका देगी । और इसलिए भी..अटका देती है कि चेतना का स्वभाव ही यही है कि वह ..आपके शरीर में कहां कोई दुर्घटना हो रही है, उसकी खबर देती रहे।तो अगर आपके शरीर में कहीं भी कोई दुर्घटना हो रही है,तो चेतना उस

दुर्घटना में उलझी रहेगी। वह इमरजेंसी, तात्कालिक जरूरत है उसकी, आपातकालीन जरूरत है कि सारे शरीर को भूल जाएगी और जहां पीड़ा है, अराजकता है, लय टूट गई है, वहां ध्यान अटक जाएगा।

7-छोटा-सा कांटा पैर में गड़ गया, तो सारी चेतना कांटे की तरफ दौड़ने लगती है। छोटा-सा कांटा...उसकी बड़ी ताकत नहीं है, लेकिन उस छोटे-से कांटे की बहुत छोटी-सी नोक भी आपके भीतर सैकड़ों जीवकोशों को पीड़ा में डाल देती है और तब चेतना उसकी तरफ दौड़ने लगती है। शरीर का कोई भी हिस्सा अगर जरा-सा भी रुग्ण है, तो चेतना का अंतर्गमन कठिन हो जाएगा। चेतना उस रुग्ण हिस्से पर अटक जाएगी।अगर ठीक से समझें, तो हम ऐसा

कह सकते हैं कि स्वास्थ्य का अर्थ ही यही होता है कि आपकी चेतना को शरीर में कहीं भी अटकने की जरूरत न हो।

8-आपको सिर का पता तभी चलता है, जब सिर में भार हो, पीड़ा हो, दर्द हो। अन्यथा पता नहीं चलता। आप बिना सिर के जीते हैं, जब तक दर्द न हो। अगर ठीक से समझें, तो हेडेक ही हेड है। उसके बिना आपको पता नहीं चलता सिर का। सिरदर्द हो, तो ही पता चलता है। पेट में तकलीफ हो, तो पेट का पता चलता है। हाथ में पीड़ा हो, तो हाथ का पता चलता है।

अगर आपका शरीर पूर्ण स्वस्थ है, तो आपको शरीर का पता नहीं चलता; आप विदेह हो जाते हैं। आपको देह का स्मरण रखने की जरूरत नहीं रह जाती। जरूरत ही स्मरण रखने की तब पड़ती है, जब देह किसी आपातकालीन व्यवस्था से गुजर रही हो, तकलीफ में पड़ी हो, तो फिर ध्यान रखना पड़ता है। और उस समय सारी चेतना..सारे शरीर का ध्यान छोड़कर, आत्मा का ध्यान छोड़कर, उस छोटे-से अंग पर दौड़ने लगती है, जहां पीड़ा है! 9-श्रीकृष्ण का यह समत्व-योग शरीर के संबंध में ,आपको सूचना देता है।श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि यदि ज्यादा आहार लिया, तो भी योग में प्रवेश न हो सकेगा। क्योंकि ज्यादा आहार लेते ही सारी चेतना पेट की तरफ दौड़नी शुरू हो जाती है।इसलिए आपको भोजन के बाद नींद मालूम होने लगती है। नींद का और कोई वैज्ञानिक कारण नहीं है। नींद का विज्ञान यही है कि जैसे ही आपने भोजन लिया, चेतना पेट की तरफ प्रवाहित हो जाती है। और मस्तिष्क चेतना से खाली होने लगता है। इसलिए मस्तिष्क धुंधला, निद्रित, तंद्रा से भरने लगता है।

10-ज्यादा भोजन ले लिया, तो ज्यादा नींद मालूम होने लगेगी, क्योंकि पेट को भी चेतना की इतनी ही जरूरत है कि अब मस्तिष्क काम नहीं कर सकता। इसलिए भोजन के बाद मस्तिष्क का कोई काम करना कठिन है। और अगर आप जबर्दस्ती करें, तो पेट को पचाने में तकलीफ पड़ जाएगी, क्योंकि उतनी चेतना...जितनी पचाने के लिए जरूरी है, पेट को उपलब्ध नहीं होगी।

11-तो अगर अति भोजन किया, तो चेतना पेट की तरफ जाएगी; और अगर कम भोजन किया या भूखे रहे, तो भी चेतना पेट की तरफ जाएगी। दोनो ही स्थितियों में चेतना पेट की तरफ दौड़ेगी। जरूरत से कम भोजन किया, तो भी भूख की खबर पेट देता रहेगा कि ..और, और; और ...जरूरत है। और अगर ज्यादा ले लिया, तो पेट कहेगा, ज्यादा ले लिया; इतने की जरूरत न थी। और पेट पीड़ा का स्थल बन जाएगा। और तब आपकी चेतना पेट में ही अटक जाएगी...गहरे नहीं जा सकेगी।

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क्या अष्टांग योग में एक ही मूल बात है,'' सम्यक समाधि''?-

10 FACTS;-

1-अष्टांग योग में एक ही मूल बात है... सम्यक समाधि, साक्षी जीवन, जो ध्यान से संबंधित है। शेष सात बातें, तो दूसरों से संबंधित हैं, जगत से संबंधित हैं। इन सात बातों में, संक्षेप में प्रेम समाहित है, सम्यक संकल्प, सम्यक वाणी, सम्यक आजीविका, तथाता भाव, स्वीकार भाव, कृतज्ञता, ये सब ''प्रेम'' के एक शब्द में समाहित हैं।क्योंकि हमारे जीवन के ,हम दो

हिस्से कर सकते हैं।एक हम स्वयं के साथ संबंधित कैसे हों, वह हुआ ध्यान। दूसरा, हम दूसरों के साथ, जगत के साथ कैसे संबंधित हों, वह हुआ प्रेम।और ध्यान कोई कितना करेगा...दिन भर में कोई एक घण्टा, दो घण्टा या तीन घण्टा कर सकता है ।तो अगर अनुपात निकालें तो प्रेम और ध्यान में तो हमारे जीवन का अधिक हिस्सा तो दूसरों से संबंधित होने में जाता है।

2-तथाता...Acceptance ,का भी दूसरों से ही अधिक संबंध है।अगर हमारी सम्यक दृष्टि होगी तो हम कथामुक्त होंगे। हम दूसरों के साथ, ठीक सत्य के साथ हो सकेंगे... संबंधित हो सकेंगे। यदि हम स्वयं दुःखी हैं तो हम दूसरों को भी दुःख ही देंगे।सम्यक स्मृति में हम जिएंगे तो भीतर का हिस्सा तो उसका ध्यान का हुआ लेकिन सच पूछो तो फिर हम पर वे छः भूत सवार नहीं हो सकेंगे और दूसरों के साथ हम प्रेमपूर्ण व्यवहार कर सकेंगे, क्रोध से बच सकेंगे।

3-आठ घण्टे आप अपनी दुकान में बैठते हैं, व्यापार करते हैं या नौकरी करते हैं फिर घर आकर आप सात-आठ घण्टे अपने परिवार वालों के साथ संबंधित होते हैं। अपने माता-पिता ,बच्चों से, मित्र से,पड़ोसी से। आठ घण्टे आपके नींद में जाते हैं, तो जीवन का बड़ा हिस्सा तो दूसरों के साथ संबंधित होने में ही जाता है। यदि उसमें कोई उलझाव है, उसमें कोई परेशानी खड़ी कर रहे हैं, दूसरों के लिए प्रेमपूर्ण नहीं हैं, क्रोध कर रहे हैं, ईष्र्या से भरे हुए हैं, दूसरों का स्वीकार नहीं कर रहे हैं, तो फिर हम ध्यान में भी न डूब सकेंगे।

4-एक बात याद रखना यदि हम प्रेमपूर्ण नहीं हो पा रहें, जगत के साथ हमारे मधुर संबंध नहीं हैं, तो हम स्वयं से भी संबंधित नहीं हो सकेंगे। ये असंभव बात है, इसलिए दोनों बातें एक साथ साधनी होंगी। और दोनों परस्पर अन्युनायाश्रित हैं, एक-दूसरे के ऊपर निर्भर हैं जितना आप ध्यान में डूब सकेंगे, साक्षी भाव में, उतने ही सुन्दर ढंग से मधुर संबंध आप बाहर बना सकेंगे। इसके विपरीत भी सत्य है, जितने मधुर संबंध आप बाहर बना सकेंगे, स्वयं से भी संबंधित... तो आप उतने ही सरलता से ध्यान में डूब सकेंगे। इन दोनों बातों में कोई विरोध नहीं है।

5-सच पूछो तो प्रेम यानि दूसरे के साथ होशपूर्ण होना।छोटी सी परिभाषा हम कर सकते हैं...प्रेम अर्थात् दूसरों के साथ सजगतापूर्ण संबंध और ध्यान यानि स्वयं के साथ प्रेमपूर्ण संबंध। दोनों में कोई भिन्नता नहीं है। जब आप स्वयं को प्रेम कर रहे हैं तो वह ध्यान है, जब आप दूसरों के साथ ध्यानपूर्ण है तो वह प्रेम है। दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

एक उदाहरण है,..हम सम्यक वाणी के दो हिस्से कर सकते हैं। भीतर है हमारा मन, बीच में है वाणी और बाहर हैं हमारे कर्म। सम्यक वाणी, सम्यक कर्म और भीतर साक्षी, इन तीनों में एक गहरा संबंध है। पहले कोई भी बात आपके भीतर उठती है, वह विचार के रूप में आती है, मन के तल पर आती है। फिर वाणी में आती है, आप उसे वाणी में प्रकट कर सकते हैं, बोलते हैं और फिर वह कर्म का रूप ले लेती है।

6-गौतम बुद्ध भी मध्य मार्ग के प्रवक्ता हैं, मज्झम निकाय की बात करते हैं, इसलिए सम्यक वाणी पर इतना ज़ोर है। क्योंकि जो व्यक्ति अपनी वाणी के प्रति जागरूक हो गया, वह अपने विचारों के प्रति भी जागरूक हो जाएगा, मन के प्रति भी सजग हो जाएगा। सच पूछो तो वाणी हमारे व्यक्त विचार हैं और विचार हमारी अव्यक्त वाणी है। विचार अगर व्यक्त होंगे तो वाणी बन जाएंगे और ठोस रूप में जब आएंगे तो कर्म बन जाएंगे। सब चीजें आपस में जुड़ी हुई हैं।

7-जो आप कर्म कर रहे हैं, वह भीतर आपके मन से जुड़ा हुआ है। यदि आप वहाँ साक्षी हो सकते हैं तो आपकी वाणी मधुर हो जाएगी, आप शीलवान ढंग से जीवन जी सकेंगे और आपके कर्म सम्यक हो जाएंगे। इन सबमें आपसी गहरा तालमेल है, तो इस प्रकार अष्टांग योग मार्ग में ध्यान का एक बिंदु है, शेष सात बिंदु तो प्रेम के ही बिंदु हैं। जीवन में ध्यान और

प्रेम,इन आठों हिस्सों को आप सम्भाल कर चल सकते हैं। जैसे तलवार की धार पर चलते हैं, वैसा ही यह जीवन है। जरा बाएं गिरने का डर हो तो दाएं झुक जाये और दाएं गिरने का डर हो तो बाएं झुक जाये।आपने सर्कस में रस्सी पर चलते हुए नट को देखा होगा , कैसे सम्भल-सम्भल कर चलता है। जीवन भी ऐसी ही डोर पर चलना है, जरा भी असम्यक हुए कि गिरे। सम्यक होना होगा... हर चीज में सम्यक होना होगा।

8-गौतम बुद्ध ने तो समाधि के साथ भी सम्यक शब्द जोड़ दिया, ''सम्यक समाधि'' क्योंकि समाधि भी असम्यक हो सकती हैं। अति कहीं नही होना है, बीच में सम्भल के चलना हैं। इन आठों बिन्दुओं में से एक शब्द भी आपको याद रह जाए...सम्यक, तो पर्याप्त है। उसमें फिर सब पीछे से चला आयेगा। बस सम्यक को याद रखें, हमेशा मध्य में हों। न इस अति पर, न उस अति पर।

9-उदाहरण के लिए,एक छोटी सी कहानी है, एक किसान था, एक साधु का प्रवचन सुनने गया। साधु उसे समझा रहा था, प्रवचन दे रहा था। उस किसान को कुछ गलतफहमी हुई। उसे लगा कि जो हम बोएंगे वैसी ही फसल काटेंगे।ऐसा साधु कह रहा था, कर्मों के संबंध में समझा रहा था। किसान नासमझ था, उसने सोचा कि अरे मैं भी कैसा नासमझ हूं... जैसा बोएंगे, वैसी ही फसल काटेंगे, तो मुझे तो अपने जानवरों के लिए, गाय, बैल के लिए भूसे की जरूरत है, तो जा के भूसा बोता हूँ क्योंकि जैसी फसल बोउंगा वैसी ही फसल काटूंगा। उसने अपने खेत में जाकर भूसा बो दिया। इन्तजार करता रहा, पानी दिया, खाद दिया।ऊगा तो कुछ भी नहीं, फसल तो कुछ भी नहीं आई।परन्तु, बदबू आने लगी, वह भूसा भी सड़ गया।

10- किसान बहुत नाराज हुआ, वह साधु के पास गया ..कि जैसा आपने कहा था, मैंने वैसा ही किया, लेकिन भूसा की खेती मैंने करनी चाही थी, भूसा तो पैदा नहीं हुआ। वह साधु उसकी नासमझी पर, उसकी मूढ़ता पर, हँसने लगा। ऐसी ही मूढ़ता हम सब करते हैं, करीब-करीब। गेहूँ बोते हैं तो भूसा आता है, भूसा बाइप्रोडक्ट है, गेहूँ बोना होता है। ध्यान और प्रेम बीज हैं, इनको बोना होगा। और अगर एक शब्द याद रखना हो तो,वो हैं सम्यकत्व। बस इतना ही याद रखना चाहिए ''सम्यकत्व''। इसके बीज बोना चाहिए, और सारी फसल आती रहेगी, उसके बाइप्रोडक्ट सब आते रहेंगे; सम्यक स्मृति, सम्यक दृष्टि और सम्यक कर्म, सम्यक वाणी, सम्यक व्यायाम,सम्यक समाधि।सब साधने की कोशिश करने के लिए एक सूत्र को पकड़ लेना चाहिए। इस एक को साध लेने से सब अपने आप सध जाएगा।

‘एक साधै सब सधे,

सब साधे, सब जाए।’

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07 FACTS;-

1-तथाता का अर्थ है स्वीकार भाव: ''जो है , मैं उसे स्वीकार करता हूं ''।

गौतम बुद्ध कहते हैं ," न अंतरिक्ष में , न समुद्र के गर्भ में ,न पर्वतों के विवर में प्रवेश कर -- संसार में कोई स्थान नहीं है , जहां रहकर प्राणी

पापकर्मों के फल से बच सके ,जहां घुसकर मनुष्य मृत्यु से बच सके ।पाप का फल आएगा ।तुम्हें थोड़ी देर लगेगी पहचानने में "।

2-यह बड़ा कीमती सूत्र है ।गौतम बुद्ध कहते हैं , पाप के फल से बचो मत । पाप के फल को निष्पक्ष भाव से भोग लो ।तुमने कुछ किया ,अब उसका

दुख आया ,इस दुख को तटस्थ भाव से भोग लो !अब आनाकानी मत करो ।अब बचने का उपाय मत खोजो ।क्योंकि तुम बच न सकोगे ।बचने की कोशिश में तुम प्रक्रिया को और लंबा कर दोगे।तुम इसे भोग लो..यह जानकर कि मैंने किया था ,अब फल आ गया ।

3-फसल बो दी थी ,अब काटनी है ; तुम तटस्थ भाव से इसे काट लो।हाथ लहूलुहान हों , पीड़ा हो , होने दो ।अगर तुमने इस फल के प्रति कोई

भाव बनाया ,तुमने यह कहा कि ''मैं नहीं भोगना चाहता ,यह कैसे आ गया मेरे ऊपर , यह तो जबर्दस्ती है , अन्याय है'' .. तुमने ऐसी कोई भी प्रतिक्रिया की... तो तुमने आगे के लिए फिर नया कर्म बो दिया । वास्तव में,तुम्हे कुछ नहीं कहना चाहिए ।तुम इतना ही कहो कि ''मैंने किया था ,उसका फल मुझे मिल गया , निपटारा हुआ।सौभाग्यशाली हूं ...बात खतम हुई ''।

4-उदाहरण के लिए,गौतम बुद्ध के ऊपर एक आदमी थूक गया ।उन्होंने पोंछ लिया । दूसरे दिन क्षमा मांगने आया ।बुद्ध ने कहा , ''तू फिक्र मत कर । मैं तो खुश हुआ था कि चलो निपटारा हुआ ।किसी जन्म में तेरे ऊपर थूका था , राह देखता था कि जब तक तू थूक न जाए ,छुटकारा नहीं है । तेरी प्रतीक्षा कर रहा था।तू आ गया , तेरी बड़ी कृपा ! बात खतम हो गयी

।अब मुझे इस सिलसिले को आगे नहीं ले जाना है।अब तू यह बात ही मत उठा । हिसाब-किताब पूरा हो गया । तेरी बड़ी कृपा है ।''

5-जो भी आए , उसे शांत भाव से स्वीकार कर लो ।उसे गुजर जाने दो । अब कोई नया संबंध मत बनाओ ,कोई नयी प्रतिक्रिया मत करो , ताकि छुटकारा हो ,ताकि तुम वापस बाहर निकल आओ ।धीरे-धीरे ऐसे एक-एक कर्म से व्यक्ति बाहर आता जाता है । और एक ऐसी घड़ी आती है कि सब हिसाब पूरा हो जाता है । तुम पार उठ जाते हो ,तुम्हें पंख लग जाते हैं । तुम उस परम दशा की तरफ उड़ने लगते हो । जब तक कर्मों का जाल होगा ,तुम्हारे पंख बंधे रहेंगे जमीन से । तुम आकाश की तरफ यात्रा न कर सकोगे ।

6-मृत्यु से भी बचने का कोई उपाय नहीं है ,इसलिए बचने की चेष्टा छोड़ो । जिससे बचा न जा सकेउससे बचने की कोशिश मत करो ।उसे स्वीकार करो । स्वीकार बड़ी क्रांतिकारी घटना है।बुद्ध ने इसके लिए खास

शब्द उपयोग किया है ---तथाता । तथाता का अर्थ है : ''जो है , मैं उसे स्वीकार करता हूं ।मेरी तरफ से कोई इनकार नहीं ।मौत है , मौत सही ।मेरी तरफ रत्तीभर भी इनकार नहीं कि ऐसा न हो , या अन्यथा होता ।जैसा हो रहा है , वैसा ही होना था , वैसा ही होगा ।मुझे स्वीकार है । मेरी तरफ से कोई विरोध नहीं ,कोई प्रतिरोध नहीं । मेरी तरफ से कोई निर्णय नहीं ।मेरी तरफ से कोई निंदा , प्रशंसा नहीं ''।

7-ऐसी शांत दशा में जो जीवन के सुख-दुखों को स्वीकार कर लेता है , जीवन-मृत्यु के पार हो जाता है ।आवागमन उसे वापस नहीं खींच पाता ।

वह आकाश का हो जाता है।इस परम वीतराग दशा को हमने लक्ष्य माना था।जीवन का लक्ष्य है , जीवन और मृत्यु के पार हो जाना ।वही सुख सुख है , जो दुख और सुख दोनों के पार है ।ऐसी दशा ही अमृत है , जहां न तो मृत्यु आती है,और न ही जीवन आता है।

क्या अंतर है..साक्षी भाव एवं तटस्थ भाव/तथाता की स्थिति में ?-

06 FACTS;-

1-साधना क्षेत्र में साक्षी भाव एवं तटस्थ भाव/तथाता की स्थिति... दोनों अलग-अलग व्यवहार हैं। सामान्यतः लोग साधना में गहराई न होने के कारण इन दोनों प्रत्ययों में एकरूपता स्थापित करने का प्रयास करते हैं। वस्तुतः साक्षी भाव परम जागरण की शुरुआती अवस्था है जबकि तथाता इस जागरण की पराकाष्ठा।

2-साक्षित्व की अवस्था में एक साधक घटित घटनाओं को बिना परिवर्तित किये ठीक उसी प्रकार देखता है, जैसा कि वे घट रही हैं। उदाहरण स्वरुप श्वास का आना जाना, विचारों का प्रवाह एवं मन की स्थिति आदि को लिया जा सकता है। इन अवस्थाओं में तटस्थ होकर घटित घटनाओं का दर्शन करने की प्रधानता होती है, जबकि तटस्थ भाव/ तथाता की स्थिति में स्वीकार भाव मुख्य होता है।

3-सामान्यतः ऊपरी दृष्टि से साक्षित्व एवं तथाता की स्थिति में एकरूपता दिखाई पड़ती है, किन्तु व्यवहारिक दृष्टि से दोनों में अंतर को सहज ही समझा जा सकता है। साक्षी भाव

साधना क्षेत्र में साधक की शुरुआती अवस्था है, जिसमें दृढ़ता आने पर साधक धीरे-धीरे तथाता स्थिति की ओर अग्रसर होता है।वस्तुतः एक साधक जब साधना की शुरुआत करता है तो प्रारम्भिक अवस्था में उसे तरह-तरह की क्रियाओं प्रतिक्रियाओं से होकर गुजरना पड़ता है। साधना क्षेत्र में विस्तार न होने के कारण यहाँ किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति प्रकट होती है जिससे साधक की साधना पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। किन्तु साक्षी भाव में दृढ़ता आने पर इन नकारात्मक स्थितियों का प्रभाव कम होने लगता है, और अंततः तटस्थ भाव/तथाता की स्थिति में पहुँचने पर अन्दर-बाहर प्रकट स्थितियों का रहस्य सहज ही समझ में आने लगता है।

4-यही तटस्थ भाव/ तथाता की स्थिति स्वीकार भाव, अहोभाव एवं समर्पण की पराकाष्ठा के रूप में जानी जाती है।गौतम बुद्ध को तथागत नाम से भी जाना जाता है, उनसे सम्बंधित दृष्टांत से वस्तुस्थिति को और अच्छी तरह स्पष्ट किया जा सकता है। एक बार उनका एक प्रिय शिष्य जो कि साधना क्षेत्र में विस्तार को उपलब्ध हो गया था, आतंरिक प्रेरणा से प्रेरित होकर एक निषिद्ध स्थान जहां अपराधी एवं उग्र प्रवृत्ति के नास्तिक लोगों की संख्या ज्यादा थी, वहां स्वतः जाकर उन्हें उपदेशित करने की इच्छा व्यक्त करता है। तथागत ने उस प्रतिष्ठित शिष्य की बात ध्यान से सुनने के बाद उसकी योग्यता की परिक्षा लेने के उद्देश्य से प्रश्न किया कि हे शिष्य! तुम जिस स्थान पर जाकर उपदेश देने की बात कर रहे हो वहां के लोग घोर अपराध वृत्ति में लगे हुए हैं, संभावना है उपहास स्वरुप उपदेश के बदले वे तुम्हे गालियाँ सुना सकते हैं!

5-शिष्य ने बड़ी विनम्रता से तथागत की वाणी को सुना और उत्तर दिया कि भगवन् आप के इस नेक काम के लिए वे ज्यादा से ज्यादा गाली ही तो देगें, ईंट-पत्थर तो नहीं मारेंगे! प्रत्युत्तर में गौतम बुद्ध नें कहा.. वे ऐसा भी कर सकते हैं। शिष्य ने फिर से उसी कथन को दुहराया कि हे तथागत! आप के इस नेक काम के लिए ज्यादा से ज्यादा ईंट-पत्थर ही तो मारेंगे, जान से तो नहीं मार देंगे! बुद्ध नें पुनः दुहराया कि वे ऐसा भी कर सकते हैं! यहाँ भी शिष्य ने बड़ी सहजता एवं स्थिरता से अपनी बात को दुहराया कि' हे भगवन् आपके इस नेक कार्य के लिए वे ज्यादा से ज्यादा मेरी जान ही तो ले सकते हैं जिसे मैं आपके उद्देश्य के लिए सहर्ष अर्पित करने के लिए तैयार हूँ'।

6- तब गौतम बुद्ध नें प्रसन्न मुद्रा में निर्देश दिया कि ''हे शिष्य तुम्हारी दृढ़ता एवं स्थिरता से स्पष्ट है कि अब तुम विस्तार को उपलब्ध हो चुके हो, इस लिए इच्छित स्थान पर जाकर उपदेश दे सकते हो।'' आशय यह है कि तथाता की स्थिति में स्वीकार भाव मुख्य होता है। इसलिए विना किसी संशय के साधना क्षेत्र में साक्षी भाव से यात्रा शुरू करके तटस्थ भाव/तथाता भाव में.. स्थिर होकर अपनी परम स्थिति को उपलब्ध हों सकते हैं!

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शिवत्व को पाने के तीन प्रयोग;-

06 FACTS;-

1-मनुष्य के जीवन के ,पश्चिम में , और मुल्कों में , और संस्कृतियों -सभ्यताओं ने हजार-हजार लक्ष्य खोजे हैं लेकिन जीवन के पार हो जाने का लक्ष्य सिर्फ भारत का अनुदान है।भारत की इस खोज को अनूठी कहा जा सकता है।इस पर थोड़ा और ध्यान करोगे , तो समझ में आएगा कि जिसने जीवन का उपयोग इस तरह कर लिया कि सीढ़ी बना ली ..तो जीवन के भी पार हो गया ।मृत्यु पर भी पैर रखा ,जीवन पर भी पैर रखा , द्वंद्व के पार हो गया --निर्द्वन्द्व हो गया।

2-एक तरफ से लगेगा कि यह तो शून्य की दशा होगी --है।और जब

इसका अनुभव करोगे , तो पता चलेगा कि यही ब्रह्म की भी दशा है।

शून्य और पूर्ण एक के ही नाम हैं। एक तरफ से देखो ,तो ब्रह्म

शून्य जैसा मालूम होता है।बुद्धों की तरफ से देखो , तो शून्य ब्रह्म

जैसा मालूम होता है।क्योंकि शून्य इस जगत में सबसे बड़ा सत्य है।

और इस शून्य की तरफ जाना हो ,तो शांति को साधना पड़ेगा।

3-शांति धीरे-धीरे तुम्हारे भीतर शून्य को सघन करेगी।तुम्हारे भीतर अनंत आकाश उतर आएगा।तुम खोते जाओगे।सीमाएं विलीन होती

जाएंगी।कोरे दर्पण रह जाओगे।उस कोरे दर्पण का नाम शिवत्व है,बुद्धत्व

है ...'तथाता के इस जगत में न तो कोई स्व है और न ही स्व के अतिरिक्त कोई और।'एक बार जब मनुष्य विलीन हो जाता है-तथाता में,समझ में विलीन हो जाता है-वहां विलीन होने वाले की तरह कोई नहीं है और न ही विलीन होने वाले के अतिरिक्त कोई है;न स्व है और न स्व के अतिरिक्त कोई है।

4-तथाता में वस्तुओं के स्वभाव की गहरी समझ में सीमाएं मिट जाती हैं।मन हमेशा विभाजन करता है दूसरा और मैं और जिस क्षण विभाजित हुए कि मैं और दूसरा...तो दूसरा शत्रु बन जाता है;दूसरा मित्र नहीं हो सकता है,इस बुनियादी सत्य को गहराई से समझ लेना आवश्यक है।दूसरा होने में ही शत्रुता है,कुछ अधिक शत्रुतापूर्ण होते हैं ;तो कुछ कम,लेकिन दूसरा शत्रु ही रहता है।

5-मित्र कौन है....शत्रुओं में कम शत्रु।मित्र वो है जो कम शत्रुतापूर्ण है और शत्रु वो है जो कम मित्रतापूर्ण है।दूसरा मित्र नहीं हो सकता,ये असम्भव है क्योंकि दूसरे के साथ ईर्ष्या और संघर्ष अवश्य होगा।सभी मित्रों के साथ भी लड़ रहे हैं-निस्संदेह मित्रतापूर्ण ढंग से लड़ रहे हैं,मित्रों में भी प्रतियोगिता है क्योंकि उनकी आकांक्षाएं एक ही हैं।सभी प्रतिष्ठा और शक्ति पाना चाहते हैं।सभी इसके लिए संघर्ष कर रहे हैं और केवल कुछ ही इसे प्राप्त कर पाते हैं।

6-परन्तु उस शिवत्व/बुद्धत्व को पा लेने का उपाय है।जब भी मृत्यु का स्मरण आए, कोई भी मौका आए, उससे कुछ न कुछ अनुभव लें। इसके लिए पांच-पांच मिनट के तीन प्रयोग बताए हैं।आप कल्पना के सहारे उन्हें करते रहें, कुछ ही दिन में आप दूसरे व्यक्ति हो जाएंगे। प्रयोग खतरनाक प्रतीत हो सकते हैं परन्तु भय न लें और प्रयोग जारी रखें। पहला प्रयोग:-

बहना (5 मिनट);-

02 POINTS;-

1-तैरना व बहना दोनों में जमीन-आसमान का अंतर है। तैरना यानी पानी के साथ संघर्ष करना, बहना यानी पानी के प्रति समर्पण भाव। संघर्ष अहंकार की भाषा है। समर्पण यानी निरहंकार। लेट जाएं, आंखें बंद कर लें और कल्पना करें कि आप तेज बहाव के साथ बहती नदी के किनारे खड़े हैं, पत्ते, लकड़ी बहे जा रहे हैं। आप भी बहती हुई नदी में उतर गए हैं..और बहे जा रहे हैं।

2-नदी भागी जा रही है, आप भी लाश की भांति बहे जा रहे हैं।बह रहे हैं यह अनुभव करते रहें, हाथ पैर नहीं चलाने हैं, सिर्फ बहना है। कुछ करना नहीं है केवल शरीर को बहने दें। हम केवल बह रहे हैं..सूखे पत्ते की भांति, सूखी लकड़ी की भांति। नदी हमें लिए जा रही है, ठीक से देख लें, अनुभव में ले लें। दूसरा प्रयोग:-

मिटना (5 मिनट);-

03 POINTS;-

1-एक व्यक्ति सोचता हुआ, विचार करता हुआ जा रहा है, एक व्यक्ति अपने से बातें करता हुआ जा रहा है।एक व्यक्ति प्रसादपूर्ण चल रहा है और एक व्यक्ति की चाल में अहंकार झलकता है। हम इन सबको उनकी चाल से, मुद्रा से पहचान सकते हैं। ऐसे व्यक्ति यदि मर जाए तो हम लाश को पहचान सकते हैं कि कैसा व्यक्ति था। केवल प्रसादपूर्ण व्यक्ति का चेहरा ही इन सब से भिन्न होगा।

2-मिटना अर्थात मर जाना ...अहंकार का विसर्जन, अपने को खो देना, ऐसा व्यक्ति ही प्रसादपूर्ण हो सकता है। पहला प्रयोग था आप बह रहे हैं, लाश की भांति, अब अनुभव करना है जल रहे हैं चिता पर लाश की भांति। आंख बंद कर लेट जाएं और कल्पना करें कि श्मशान में किसी की चिता जलते हुए देख रहे हैं। पहचानें वह लाश आपकी तो नहीं है। आप ही की है। आप चिता पर चढ़े, आपके दोस्त, मित्र, रिश्तेदार आपके चारो ओर खड़े हैं। आप चिता पर अपनी लाश को जलते हुए देख रहे हैं। चिता की अग्नि की लपटें आकाश की तरफ उठती हैं और खो जाती हैं।

3-लकड़ियों के साथ आप भी जल रहे हैं। आपका अहंकार जल रहा है। आपकी वासनाएं जल रही हैं। आपको कुछ नहीं करना है और न कर ही सकते हैं। आप जल रहे हैं, उठ नहीं सकते, पांच मिनट तक कल्पना करें कि चिता पर आपकी लाश जल रही है, लपटें भागी जा रही हैं, सब समाप्त हो रहा है। हवाएं लपटों को बढ़ा रही हैं। मित्र, रिश्तेदार विदा हो गए हैं, लाश राख का एक ढेर होकर रह गई है। ठीक से देख लें, अनुभव कर लें कि राख ही पड़ी रह गई है। तीसरा प्रयोग:-

तटस्थ भाव/तथाता (5 मिनट);-

03 POINTS;- 1-हमें क्रोध क्यों आता है? हमें क्रोध आता है...जब चीजें हमारे अनुकूल नहीं होतीं। जैसा हम चाहते थे वैसे नहीं होतीं।पति/ पत्नी हमारे अनुसार नहीं करते , बेटा/बेटी हमारा कहना नहीं मानते, दफ्तर में कोई हमारी नहीं सुनता। पिछले दो प्रयोगों में आपने अनुभव किया कि मेरी लाश नदी में बह रही है, मेरी लाश चिता पर जल रही है।

2-इन्हीं दो प्रयोगों को ध्यान में रखते हुए अनुभव करें कि घर पर आंख बंद कर लेटे हुए हैं। पांच मिनट तक यह प्रयोग करें। आपके बच्चे चिल्ला रहे हैं,पति/ पत्नी भी लड़-झगड़ रहे/रही है, बाहर वाहनों का शोर भी है। कुत्ते भौंक रहे हैं, टीवी-रेडियो तेज आवाज में चल रहा है। आपका प्रिय मित्र आपसे मिलने आया है। परन्तु आप आंख बंद कर लेटे रहे, आप मर गए हैं, राख के ढेर हो गए हैं ...तो कोई प्रतिक्रिया कैसे कर सकते हैं।

3-कोई प्रतिक्रिया नहीं करनी है, जो हो रहा है सब स्वीकार है। जो भी हो रहा है उससे हम राजी हैं। आसपास जो भी घटित हो रहा है उसे बदलने का कोई भाव मन में न उठे।

NOTE;-

तीनों प्रयोग एक साथ करें, पंद्रह मिनट के इस प्रयोग का ..चाहें तो समय बढ़ा सकते हैं, यदि नहीं भी बढ़ाएं और करते रहे तो तीन महीने में आपके भीतर एक सकारात्मक परिवर्तन आना शुरू हो जाएगा।

..SHIVOHAM....