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ब्रह्म -परब्रह्म तथा अपरब्रह्म में क्या अंतर है ?क्या होता है ब्रह्म ज्ञान? क्या है कर्णातीत ध्वनि ?


ब्रह्म -परब्रह्म तथा अपरब्रह्म में क्या अंतर है ?

05 FACTS;-

1-ब्रह्म की उत्पत्ति होती है और परब्रह्म के कारण उसी में होती है ।इस उत्पत्ति में बनता कुछ भी नहीं है और न कुछ उत्पन्न होता है । उत्पत्ति हमारी अनुभूतियों की देन है। वास्तव में इसमें परब्रह्म की धाराएं ही होती है। इसलिए तत्व रूप में बहुत सारे ऋषियों ने इन दोनों को एक ही माना है। और यह कहा है कि ब्रह्म फिर परब्रह्म में विलीन हो जाता है।

2-परब्रह्म अनादि ,अनंत , अखंड , निर्गुण, सर्व तेजोमय , सर्व चैतन्य , निराकार है। लेकिन प्रत्येक आकृति, गुण , चेतना, आदि की उत्पत्ति इसी से होती है।इसकी पहली उत्पत्ति ब्रह्म के रूप में उत्पन्न होती है। इस उत्पत्ति को बहुत से ऋषियों ने उत्पत्ति माना ही नहीं है । इसे परब्रह्म का ही स्वरुप माना है। परन्तु भौतिकता की उत्पत्ति यही से होती है । यदि हम सापेक्षता के सिद्धांत को भूल जाए , तब तो हम और ये प्रकृति दोनों अजन्मा और अनादि है। क्योंकि जन्म केवल रूप का होता है उस तत्व का नहीं जिससे वह रूप उत्पन्न होता है।

3-ब्रह्म-परब्रह्म, परमात्मा-ईश्वर ,शिव-सदाशिव, इनमें अंतर है – इस अंतर को समझने के बाद ही सनातन धर्म का वास्तविक विज्ञान समझ में आ सकता है। ईश्वर का आधिपत्य ब्रह्माण्ड तक होता है और ब्रह्माण्ड के बाहर भी एक सीमा तक , उसके बाद उसी परमतत्व का अस्तित्त्व होता है । यह दूसरी बात है की चाहे यह ब्रह्माण्ड जितनी बार उत्पन्न हो , ईश्वर के स्वरुप और उसकी संरचना और उसकी गुणों आदि में कोई अन्तर नहीं रहता।

5-चक्रवात हवा में उत्पन्न होता है , उसमें हवा के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता। लेकिन चक्रवात हवा नहीं है वह हवा से बनने वाली एक धारा है। इस अंतर को तो समझना ही होगा।ऋग्वेद का पुरुषसूक्तम इसी ईश्वर का वर्णन है और एक संरचना का वर्णन है। प्रकृति में संचरण करने वाली इस संरचना को ही ईश्वर कहा जाता है। और जो इसके केंद्र में बैठा है वो ब्रह्म है।परमात्मा , विश्वात्मा , आत्मा, जीवात्मा, प्रेतात्मा इन सबमें अंतर है । परन्तु लोगों ने सब को आत्मा के नाम से ही पुकार दिया है। है तो सब आत्मा ही.. लेकिन स्थान भेद से सब अंतर आ जाता है।जब तक हम इस वर्गीकरण को नहीं करेंगे, कुछ समझना ही मुश्किल हो जाएगा।

ब्रह्म क्या है ?-

05 FACTS;-

1-ब्रह्म हिन्दू (वेद परम्परा, वेदान्त और उपनिषद) दर्शन में इस सारे विश्व का परम सत्य है और जगत का सार है। वो दुनिया की आत्मा है। वो विश्व का कारण है, जिससे विश्व की उत्पत्ति होती है , जिसमें विश्व आधारित होता है और अन्त में जिसमें विलीन हो जाता है। वो अद्वितीय है ,वो स्वयं ही परमज्ञान है, और प्रकाश-स्त्रोत की तरह रोशन है। वो निराकार, अनन्त, नित्य और शाश्वत है। ब्रह्म सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी है। वो भूत, भवि‍ष्‍य

और सबमें व्‍यापक है, वो दि‍व्‍यलोक का भी अधि‍ष्‍ठाता है।

2-तैत्तिरीयोपनिषद केअनुसार ..''उस ब्रह्म से प्रकट यह संपूर्ण विश्व है जो उसी प्राण रूप में गतिमान है। उद्यत वज्र के समान विकराल शक्ति ब्रह्म को जो मानते हैं, अमरत्व को प्राप्त होते हैं। इसी ब्रह्म के भय से अग्नि व सूर्य तपते हैं और इसी ब्रह्म के भय से इंद्र, वायु और यमराज अपने-अपने कामों में लगे रहते हैं। शरीर के नष्‍ट होने से पहले ही यदि उस ब्रह्म का बोध प्राप्त कर लिया तो ठीक अन्यथा अनेक युगों तक विभिन्न योनियों में पड़ना होता है।''।।

3-हिंदू धर्म की लगभग सभी विचारधाराएँ (चर्वाक को छोड़कर) यही मानती हैं कि कोई एक परम शक्ति है, जिसे ईश्वर कहा जाता है। वेद, उपनिषद, पुराण और गीता में उस एक ईश्वर

को 'ब्रह्म' कहा गया है।ब्रह्म शब्द बृह धातु से बना है जिसका अर्थ बढ़ना, फैलना, व्यास या विस्तृत होना। ब्रह्म परम तत्व है। वह जगत्कारण है। ब्रह्म वह तत्व है जिससे सारा विश्व उत्पन्न होता है, जिसमें वह अंत में लीन हो जाता है और जिसमें वह जीवित रहता है।

4-ब्रह्मसूत्र में ब्रह्म की उपमा सूर्य की किरणों से की गयी है । सूर्य के समान तेजस्वी, परम पुरुषोत्तम तेज ही निराकार ब्रह्म है। वह 'अणु एवं परमाणु 'में भी विद्यमान हैं, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के कण कण में व्याप्त हैं और हर परमाणु एवं उसके बीच के रिक्त स्थानों में भी वह

उपस्थित हैं ।इतने व्यापक होने के कारण वे कई भागों में बंट जाते हैं और सम्पूर्ण सृष्टि के कण और उनके बीच के रिक्त स्थान के भी एकमात्र उद्गम के रूप में सर्वज्ञ रहते हैं ।

5-हिंदू दर्शन, पुराण और वेदों में मतभेद ईश्वर के होने या नहीं होने में नहीं है। मतभेद उनके साकार या निराकार, सगुण या निर्गण स्वरूप को लेकर है। फिर भी ईश्वर की सत्ता में सभी विश्‍वास करते हैं।

परब्रह्म क्या है?-

02 FACTS;- 1-परब्रह्म, का शाब्दिक अर्थ है 'सर्वोच्च ब्रह्म' - वह ब्रह्म जो सभी वर्णनों और संकल्पनाओं से भी परे है।परब्रह्म या परम-ब्रह्म ब्रह्म का वो रूप है, जो निर्गुण और असीम है। "नेति-नेति" करके इसके गुणों का खण्डन किया गया है, पर ये असल में अनन्त सत्य, अनन्त चित और अनन्त आनन्द है।अद्वैत वेदान्त में उसे ही परमात्मा कहा गया है, ब्रह् ही सत्य है,बाकि सब मिथ्या है।वह ब्रह्म ही जगत का नियन्ता है। 2-अद्वैत वेदान्त का निर्गुण ब्रह्म भी परब्रह्म है। वैष्णव और शैव सम्प्रदायों में भी क्रमशः विष्णु तथा शिव को परब्रह्म माना गया है। वह गुणातीत, भावातीत, माया, प्रक्रति और ब्रह्म से परे और परम है। वह एक ही है दो या अनेक नहीं है। मनीषियों ने कहा है कि ब्रह्म से भी परे एक सत्ता है जिसे वाणी के द्वारा व्यक्त नहीं किया जा सकता। वेदों में उसे नेति -नेति (ऐसा भी नहीं -ऐसा भी नही) कहा है। वह सनातन है, सर्वव्यापक है, सत्य है, परम है। वह समस्त जीव निर्जीव समस्त अस्तित्व का एकमात्र परम कारण सर्वसमर्थ सर्वज्ञानी है। वह वाणी और बुद्धि का विषय नहीं है उपनिषदों ने कहा है कि समस्त जगत ब्रह्म पे टिका हे और ब्रह्म परब्रह्म पे टिका है।

अपरब्रह्म क्या है ?

01 FACTS;- 1-अपरब्रह्म ब्रह्म का वो रूप है, जिसमें अनन्त शुभ गुण हैं। वो पूजा का विषय है, इसलिये उसे ही ईश्वर माना जाता है। अद्वैत वेदान्त के मुताबिक ब्रह्म को जब इंसान मन और बुद्धि से जानने की कोशिश करता है, तो ब्रह्म माया की वजह से ईश्वर हो जाता है। क्या होता है ब्रह्म ज्ञान?-

05 FACTS;-

1-हर मानव के अंदर देश दुनिया से संबन्धित कुछ न कुछ ज्ञान तो होता है। पर अध्यात्मिक ज्ञान हर किसी के पास नहीं होता है। क्योंकि हम उसे पाने का प्रयास ही नहीं करते है। ब्रह्म ज्ञान होना एक बहुत बड़ी शक्ति होती है। जिसमे आत्मा और परमात्मा का मिलन होता है। व्यक्ति शांत भाव से अपने अंदर परमात्मा के दर्शन कर लेता है। मानव में क्रांति’ और ‘विश्व में शांति’ केवल ‘ब्रह्मज्ञान’ के द्वारा ही संभव है |

2-हर व्यक्ति की आत्मा पवित्र होती है| आत्मा का कोई दोष नहीं होता... दोष तो हमारे मन के गलत विचारों का है.. आत्मा तो दिव्य होती है | कहा जाए तो दुष्ट से दुष्ट व्यक्ति की भी आत्मा पवित्र होती है।खोट तो उसके मन के विचारों में है । ब्रह्म ज्ञान एक ऐसा ज्ञान है.. जिसमे व्यक्ति इस संसार से विरक्त होकर भगवान में लीन हो जाता है ।वह इस संसार को समझ लेता है।

3-इसी के चलते कबीर दास जी ने कहा है –

कबिरा यह जग कुछ नहीं खिन खारा खिन मीठ ।

कल जो देखे मंडपे आज मसाने डीथ ।।

कहने का अर्थ है की यह संसार क्षण भंगुर है कभी अच्छा तो कभी बुरा प्रतीत होता है। क्योंकि जिसे हमने कल दूल्हे के रूप में मंडप पे देखा था। आज वही शमसान पर शव के रूप मे दिखाई दे रहा है।

4-ब्रह्म ज्ञान का परिचय बाहरी साधनों से सम्भव नहीं है | केवल ‘ब्रह्मज्ञान’ की प्रदीप्त अग्नि ही व्यक्ति के हर पहलू को प्रकाशित कर सकती है | यही नहीं बल्कि व्यक्ति के नीचे गिरने की प्रवृति को ‘ब्रह्मज्ञान’ की सहायता लेकर ऊँचे उठने की दिशा में मोड़ा जा सकता है |वह ब्रह्म ज्ञान से एक योग्य व्यक्ति और सच्चा नागरिक बन सकता है |

5-जब मनुष्य एक बार इस ब्रह्म ज्ञान को समझ लेता हैं तथा इसे अपने मन में अच्छी तरह से धारण कर लेता हैं तब उसके मन से इस संसार के बनाये सारे भेद स्वतः ही मिट जाते हैं । फिर उसके लिये कोई ऊँचा नहीं कोई नीचा नहीं होता है । उसके मन से जाति, धर्म, भाषा, नस्ल आदि के सारे भेद मिट जाते है । उसे किसी प्राणी मात्र में फर्क नजर नहीं आता है और प्राणी मात्र से, क्रूरता से स्वतः ही मुक्त हो जाता हैं । उसको सब जगह एक ही ईश्वर नजर आता है और सब उसी के प्रतिरूप दिखाई देने लगते हैं ।

ब्रह्म ज्ञान का उदाहरण;-

07 FACTS;-

1-एक दिन भगवान् कृष्ण के पास नारद जी आये. बोले- ‘‘भगवन्! मैं ब्रह्मज्ञान की बात पूछने आया हूँ। क्या है वह ब्रह्मज्ञान? क्यों हम ब्रह्म का दर्शन नहीं कर पाते''

श्री कृष्ण जी ने कहा-‘‘अभी आये हो। थोड़ी देर बैठो, प्रश्न का उत्तर मिल जायेगा।’’

नारद जी बैठे, विश्राम कियाऋ बोले-‘‘अब मेरे प्रश्न का उत्तर दे।’’

श्री कृष्ण ने कहा-‘‘आओ, जंगल में घूमने चलें, वहाँ बातें करेंगे।’’

दोनों निकल पड़े सैर को। घूमते-घूमते नारद जी काफ़ी थक गये। 2-प्यास भी सताने लगी। श्री कृष्ण ने मुस्कराते हुए कहा-‘‘नारद जी! आपको शायद प्यास लगी है, मुझे हूँ।’’ आगे गये तो उन्हें एक कुआँ मिला, जिसपर कुछ स्त्रियाँ पानी भर रही थीं। नारद जी ने पानी माँगा। एक युवती ने अपने घड़े से पानी पिला दिया। नारद जी पानी पी रहे थे ओर उसकी ओर देख रहे थे। देखते-देखते मन में मोह जाग उठा। पानी पी लिया तो एक ओर खड़े हो गये। वह लड़की घड़े को लेकरक अपने घर को चली तो नारद जी भी उसके पीछे-पीछे चल पड़े। उसके घर पहुँचे तो लड़की के पिता ने उन्हें पहचानकर कहा-‘‘आइये नारद जी! मेरे सौभाग्य कि आपके दर्शन हुए। अब भोजन किये बिना जाने न दूँगा।’’

3-नारद जी भी यही चाहते थे ...बोले-‘‘भूख तो लगी है।’’

भोजन कर चुके तो बोले-‘‘हम कुछ दिन तुम्हारे घर में रहें तो क्या हो?’’

लड़की के पिता ने कहा-‘‘यह तो मेरा सौभाग्य है।’’

नारद जी वहीं टिक गये। उस लड़की के रूप का मोह ..उन्हें पागल किये देता था। मन में जो गिरावट आ गई थी, वह और भी नीचे लिये जाती थी। एक दिन लड़की के पिता से बोले-‘‘मैं चाहता हूँ कि इस कन्या का विवाह मेरे साथ हो जाय।’’

4-लड़की के पिता ने कहा-‘‘महाराज! कन्या तो पराया धन है। मुझे उसका विवाह तो करना ही हे। आपसे अच्छा वर उसे कहाँ मिलेगा? मैं विवाह कर दूँगा अवश्य, परन्तु मेरी एक शर्त भी माननी होगी और शर्त यह है कि विवाह के पश्चात् आप मेरे ही घर पर रहें, कहीं जायें

नहीं।’’नादरजी को और क्या चाहिए था! रमते राम का कोई घर-घाट था नहीं। चिन्ता कर रहे थे कि पत्नी को लेकर कहाँ जायेंगे? बना-बनाया घर मिल गया। शर्त स्वीकार हो गई। विवाह भी हो गया।

5-नारद जी अपने-आपको भूलकर ससुरालवालों के पशु चराते, उनके खेतों में काम करते। उन्हीं के घर में रहने लगे। इस प्रकार कितने ही वर्ष व्यतीत हो गये। गृहस्थी नारद के दो-तीन बच्चे भी हो गये। तभी एक दिन मूसलाधार वर्षा होने लगी। एक दिन, दो दिन, कई दिन होती रही। सब ओर जल-थल एक हो गया। शेष लोग कहाँ-कहाँ गये, यह नारद जी ने नहीं देखा। वह तो अपनी पत्नी और बच्चों को लेकर मकान की दूसरी मंज़िल में चले गये। वहांँ भी पानी पहुँचा तो छत पर चले गये।

6-परन्तु बाढ़ तो रुकी नहीं। पानी जब छत के निकट पहुँचा तो नारद जी ने समझा कि मकान अब बचेगा नहीं। पत्नी और बच्चों सहित पानी में कूद पड़े कि किसी ऊँचे स्थान पर जाकर प्राण बचायें। परन्तु ऐसा करते ही दो बच्चे डूब गए। पत्नी रोने लगी तो नारद बोले-‘‘भागवान, रोती क्यों है? तू भी है, मैं भी हूँ, बच्चे और हो जायेंगे।’’ परन्तु तभी तीसरा बच्चा भी डूब गया। उसे ढूँढने के लिए नारद जी हाथ-पाँव मार ही रहे थे कि पानी का एक और रेला आया, पत्नी भी डूब गई। बड़ी कठिनता से नारद जी एक ऊँचे स्थान पर पहुँचे। वहांँ भी पानी था। थक बहुत गये थे। तैरने का अब प्रश्न उत्पन्न नहीं होता था, परन्तु धन्यवाद किया कि खड़े हो सकते हैं।

7-पानी छाती तक था। तभी पानी ऊपर बढ़ा, कन्धों तक पहुँच गया, फिर ठोडी भी डूब गई। पानी होठों के पास पहुँचा तो नारद जी चिल्ला उठे-‘‘हे भगवन्, मुझे बचाओ!’’

तभी याद आया कि वे तो भगवान् कृष्ण के लिए पानी लेने आये थे। रोकर बोले-‘‘क्षमा करो

भगवन्!’’और तब कहानी है कि आँख खुल गई। नारद जी ने देखा कि कहीं कुछ भी नहीं है। वे जंगल में पड़े हैं। सामने खड़े श्री कृष्ण मुस्करा रहे हैं। मुस्कराते हुए उन्होंने कहा-‘‘नारद जी! आपके प्रश्न का उत्तर मिल गया है या नहीं?’’

माया की वास्तविकता को समझकर इससे छुटकारा पा लेना ही ब्रह्मज्ञान है। इससे मुक्ति पाये बिना ब्रह्मदर्शन नहीं होता। परन्तु यह माया इतनी लुभाने वाली है कि इसके जाल में फँसा व्यक्ति तभी समझता है, जब पानी नाक तक आ जाता है।

ब्रह्म ज्ञान सें समाज में परिवर्तन;-

03 FACTS;-

1-‘ब्रह्मज्ञान’ की प्राप्ति के बाद व्यक्ति साधना करे तो उसकी सांसारिक जिम्मेदारियां दिव्य कर्मों में बदल सकती हैं | जीवन से अंधकार दूर हो सकता है.. सुख दुख की कोई चाह ही नहीं होती |क्या सुख क्या दुख ..वह हर पल शांति के साथ व्यतीत करता है |उसके विचारों में सकारात्मक सोच आती है मन के भाव अच्छे तथा जीवन में दिव्यता आती है |

2-‘ब्रह्मज्ञान’ से व्यक्ति अपने जीवन में उन्नत यानि समत्व, संतुलन और शांति की दिशा में उत्तरोत्तर बढता जाता है | यही ‘ब्रह्मज्ञान’ से प्राप्त होता है, यदि हमें अपने जीवन की वास्तविकता को जानना है तो ब्रह्मज्ञान का होना जरूरी है |इसके लिये हमें सच्चे सदगुरू की शरण में जाना होगा| ब्रह्मज्ञान हमें ब्रह्मधाम तक ले जा सकता है। जहाँ मुक्ति और आनन्द का साम्राज्य है |

3-वास्तव में ब्रह्म ज्ञान ही जीवन जीने का सच्चा ज्ञान है । यदि समाज का हर व्यक्ति इस ज्ञान को अपने जीवन में उतार ले तो विश्व की कितनी ही समस्याओं का समाधान स्वतः ही हो जायेगा । फिर समाज आतंकवाद, जातिवाद, सम्प्रदायवाद, भाषावाद, नस्लवाद, ऊंच-नीच की भावना, युद्ध, संघर्ष इत्यादि से स्वतः ही मुक्त हो जायेगा और समाज में लोग प्रेम तथा भाईचारे के साथ अपना जीवन यापन करेंगे ।

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क्या है ब्रह्म की नाद शक्ति ?-

08 FACTS;-

1-माण्डूक्योपनिषद् में परमात्मा के समग्र रूप का तत्त्व समझाने के लिये उनके चार पादों की कल्पना की गई है। नाम और नामी की एकता प्रतिपादन करने के लिये भी और नाद शक्ति के परिचय रूप में अ, उ , म और इन तीन मात्राओं के साथ और मात्रा रहित उसके अव्यक्त रूप के साथ परब्रह्म परमात्मा के एक-एक पाद की समता दिखलाई गई है।

2-ओंकार को ही परमात्मा का अभिन्न स्वरूप मान कर यह बताया गया

है कि ‘ओम’ अक्षर ही पूर्ण अविनाशी परमात्मा है। यह प्रत्यक्ष दिखाई देने वाला जड़-चेतन का समुदाय रूप जगत् उन्हीं का उपाख्यान है। जो स्थूल ओर सूक्ष्म जगत् पहले उत्पन्न होकर उसमें विलीन हो चुका है, वह सब का सब ओंकार ब्रह्म का नाद-स्वरूप ही है।जो तीनों कालों से अतीत और इससे भिन्न है, वह भी ओंकार ही है।

3-अर्थात् स्थूल सूक्ष्म और कारण जो कुछ भी दृश्य, अदृश्य है, उसका संचालन ‘ओंकार’ की स्फुरणा से ही हो रहा है। यह जो उनका अभिव्यक्त अंश और उससे अतीत भी जो कुछ है, वह सब मिलकर ही परब्रह्म परमात्मा का समग्र रूप है। पूर्ण ब्रह्म की प्राप्ति के लिये उनकी नाद शक्ति का परिचय प्राप्त करना आवश्यक है।

4-परमात्मा के नाद रूप के साक्षात्कार के लिये किये गये ध्यान के सम्बन्ध में नाद-बिंदूपनिषद् के 33 से 49 वें मंत्रों में बड़ी सूक्ष्म अनुभूतियों का भी विवरण मिलता है। इन मंत्रों में बताया गया है, जब पहले पहल अभ्यास किया जाता है। तो ‘नाद’ कई तरह का और बड़े जोर-जोर से सुनाई देता है। आरम्भ में इस नाद की ध्वनि नागरी, झरना, भेरी, मेष और समुद्र की हहराहट की तरह होती है, बाद में भ्रमर, वीणा, वंशी और किंकिणी की तरह गुँजन पूर्ण और बड़ी मधुर होती है।

5-ध्यान को धीरे-धीरे बढ़ाया जाता है और उससे मानसिक ताप का शमन होना भी बताया गया है। तैत्तरीयोपनिषद् के तृतीय अनुवाद में ऋषि ने लिखा है -”वाणी में शारीरिक और आत्म-विषयक दोनों तरह की उन्नति करने की सामर्थ्य भरी हुई है, जो इस रहस्य को जानता है, वह वाक्-शक्ति पाकर उसके द्वारा अभीष्ट फल प्राप्त करने में समर्थ होता है।

6-ओंकार ध्वनि से प्रस्फुटित होने वाला ब्रह्म इतना सशक्त और सर्वशक्तिमान् है कि वह सृष्टि के किसी भी कण को स्थिर नहीं होने देता। समुद्रों को मथ डालने से लेकर भयंकर आँधी-तूफान और ज्वालामुखी पैदा करने तक- परस्पर विचार -विनिमय की व्यवस्था से लेकर ग्रह-नक्षत्रों के सूक्ष्म कम्पनों को पकड़ने तक एक सुविस्तृत विज्ञान किसी समय भारतवर्ष में प्रचलित था।

7-नाद-ब्रह्मा की उपासना के फलस्वरूप यहाँ के साधक इन्द्रियातीत असीम सुख का रसास्वादन करते थे, यही नहीं उस शक्ति को पाकर वे जहाँ चाहते थे, वहीं मनोवाँछित वस्तुएँ पैदा करते थे।नदियों के प्रवाह

रोक देने से लेकर सूर्य की परिक्रमा बदल देने तक के जितने भी चमत्कार सम्भव है, वह परमात्मा की नाद-शक्ति से होता था। उसे परिचालन विद्या भी कह सकते हैं।

8-अपने आशीर्वाद से किसी रोगी को अच्छा कर देना,किसी निर्धन को धनवान् अपंग को शारीरिक क्षमता प्रदान कर देना इसी विज्ञान का अंग था। इन सबमें निश्चित विचार प्रणाली द्वारा निखिल ब्रह्माण्ड की वैसी शक्तियों के सूक्ष्माणु आकर्षित कर उपेक्षित स्थान पर प्रतिरोपित करने से चमत्कार दिखाई देने वाले कार्य संभव हो जाते हैं। यह चर्चा करने में भी सन्देह है कि लोग अत्युक्ति न समझे किन्तु अब विज्ञान ही इन मान्यताओं को प्रमाणित करने लगा है तो कोई उस पूर्णत्य विज्ञान को कैसे इनकार कर सकता है।

क्या है कर्णातीत ध्वनि ?

13 FACTS;-

1-ध्वनि (Sound) एक प्रकार का कम्पन या विक्षोभ है जो किसी ठोस, द्रव या गैस से होकर संचारित होती है। किन्तु मुख्य रूप से उन कम्पनों को ही ध्वनि कहते हैं जो मानव के कान (Ear) से सुनायी पडती हैं।बहुत कम लोग जानते होंगे कि ऐसी ध्वनि-तरंगें (साउण्ड-वेब्स) जिनको हम सुन नहीं सकते, आज वैज्ञानिक शोध कार्यों एवं व्यवसायिक जगत् में क्राँति मचायी हुईं है। कर्णातीत ध्वनि (साउण्ड व्हिच कैन नाट बी हर्ड बाई इयर) पर नियंत्रण करके अब चिकित्सा, शल्य, कीट और कीटाणुओं का संहार, धुँआ और कोहरा दूर करना, कपड़े, कम्बल और बहुमूल्य गलीचों को धोकर साफ करना, घड़ी आदि के पुर्जे चमकाना, साफ करना जैसे छोटे-मोटे काम ही नहीं धातुओं को क्षण भर में काट डालना, छेद डालना, गला देना, एक दूसरे में जोड़ देना आदि से ऐसे काम होने लगे हैं, जिनको बड़ी-बड़ी मशीनें कम समय में कर सकती है।

2-ध्वनि की इस करामात पर आज सारा संसार आश्चर्य चकित है, लोग समझ नहीं पा रहे कि इतनी सूक्ष्म गतिविधि से इतने भारी कार्य कैसे सम्पन्न हो जाते है। विद्युत से भी अधिक तीक्ष्ण और सर्वव्यापी कर्णातीत नाद-शक्ति की वैज्ञानिक बड़ी तत्परतापूर्वक शोध कर रहे हैं।

3-कर्णातीत ध्वनि जो साधारणतया कानों से सुनाई नहीं देती है- वह क्या है, थोड़ा इस पर विचार करना आवश्यक है। शब्द या ध्वनि तरंग वस्तुओं के कम्पन (वाइब्रेशन्स) से पैदा होती है। यह तरंगें क्रम से और विचारों की चुम्बकीय शक्ति के रूप में गमन करती है। उदाहरणार्थ सितार के तार छेड़ने पर उनमें कम्पन पैदा होता है, यह कम्पन लहरों के रूप में हवा में पैदा होते और आगे बढ़ते हैं, जहाँ तक ध्वनि तरंगें प्रखर होती है, वहाँ तक वह कानों से सुन ली जाती है, पर कम्पन की शक्ति जितनी घटती जाती है, उतना ही सुनाई नहीं पड़ती और कई बार तो वह दूसरे शक्तिशाली कम्पनों में खो जाती हैं ।

4-कम्पित वस्तु से ध्वनि-तरंगें सब दिशाओं में चलती और फैलती है, यही कारण है कि जो भी बोला जाता है, उसे उत्तर, पूर्व दक्षिण या पश्चिम किसी भी कोने में बैठा हुआ आदमी सुन लेता है। सुनने की क्रिया कान की झिल्ली से ध्वनि-तरंगें टकराने के कारण होती है। जो वस्तुएँ नियत समय में जितना अधिक कम्पन करती हैं, उनकी ध्वनि उतनी ही पैनी-पतली और सीटी की आवाज की तरह होती है।

5-विद्युत तरंगों में उभारा जाय तो हर ध्वनि की फोटो अलग बनेगी, आज इस आधार पर पुलिस को अपराधियों को पकड़ने में 97 प्रतिशत सफलता मिली है, न्यूयार्क के वैज्ञानिक लारेन्स केर्स्टा ने यह खोज की थी और यह पाया कि मनुष्य चाहे कितना ही बदल कर, छिपकर या आवाज को हल्का और भारी करके बोले ध्वनि तरंगें हर बार एक सी होंगी। वैसे हर व्यक्ति की तरंगों के फोटो अलग-अलग होंगे। वैज्ञानिक इन ध्वनि-तरंगों के आधार पर व्यक्ति के गुणों का भी पता लगाने के प्रयास में हैं, यह सफल हो गया तो किसी की आवाज सुनकर ही उसके अच्छे-बुरे चरित्र का पता लगा लिया जाया करेगा।

6-कानों की ग्रहण शक्ति बहुत स्थूल और थोड़ी हैं जो ध्वनियाँ एक सेकेण्ड में कुल 20 कम्पन से अधिक अधिक और 20 हजार कम्पनों से कम में पैदा होती है, हमारे कान केवल उन्हें ही सुन सकते हैं, यदि कम्पन गति (वेलासिटी ऑफ वाइब्रेशन) 20 हजार प्रति सेकेण्ड से अधिक होगी तो हम उसे नहीं सुन सकेंगे। ऐसी ध्वनियाँ ही कर्णातीत कहलाती हैं ।

कुत्ते और चमगादड़ इतने से भी अधिक कम्पनों वाली ध्वनियाँ सुन लेते हैं। कुत्ते कई बार कान उठाकर चौकन्ने से होकर कुछ जानने का प्रयास करते दीखते हैं, वह इन सूक्ष्म कम्पनों को पकड़ने का ही प्रयास होता है। वह इससे भी अधिक सूक्ष्म ध्वनि तरंगों को सुन सकता है।

7-इसीलिये जब कुछ लोगों के मन में कोई वीभत्स कार्य (हत्या, कत्ल, चोरी, डकैती आदि) के विचार और योजनाएँ बनती हैं, कुत्तों की कर्णातीत ध्वनि पहचानने की क्षमता उसे उसी समय से सुनने लगती है, इसलिये वे पहले ही रोकर या भौंक कर सावधान करने का प्रयत्न करते हैं। चमगादड़ 40000 प्रति सेकेण्ड कम्पन वाली ध्वनियाँ भी आसानी से सुन लेता है। जो जितनी अधिक सूक्ष्म ध्वनियाँ सुन सकता है, वह दूसरों के मन की बातें भविष्य ज्ञान उतनी ही शीघ्र और स्पष्टता से पकड़ लेता है।

8-आज के विज्ञान की दृष्टि में भी स्थूल ध्वनि कोई महत्व नहीं रखती, क्योंकि सुन ली जाने वाली ध्वनि (औडिबल साउण्ड) की शक्ति बहुत थोड़ी होती है। यदि डेढ़ सौ वर्ष तक निरन्तर ऐसी ध्वनि उत्पन्न की जाय तो उससे केवल एक कप चाय गरम करा लेने जितनी ही शक्ति पैदा होगी। किन्तु श्वाँस या विचार तरंगों के रूप में शब्द का जो मानसिक स्फोट होता है, वह बड़ा शक्तिशाली होता है।

9-यद्यपि वह ध्वनि सुनाई नहीं देती पर वह इतनी प्रखर होती है कि अपनी एक ही तन्मात्रा से वह परमाणुओं का विखण्डन कर सकती है और उससे उतनी ऊर्जा पैदा कर सकती है, जिससे विश्व के किसी भी भू-भाग यहाँ तक कि चन्द्रमा और सूर्य तक में भी क्राँति पैदा कर दी जा सकती है। इस शक्ति को मन्त्र-विज्ञान से जाना जाता है और उसकी ब्रह्मा शक्ति या कुण्डलिनी शक्ति के रूप में प्रतिष्ठा की गई है।

10-उदाहरण के लिए,एक बार कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के भूगर्भ तत्त्ववेत्ता डा. गैरी लेन को लाखों वर्ष पूर्व की एक ऐसी हड्डी मिली, जो बहुत खस्ता हालत में थी, उस पर मिट्टी जमी थी। विस्तृत अध्ययन के लिये मिट्टी साफ करना जरूरी था किन्तु ऐसा करने के लिये यदि कोई चाकू से सहायता ली जाती तो हड्डी टूट-फूट जाती ऐसी स्थिति में उनका ध्यान ‘कर्णातीत ध्वनि’ शक्ति की ओर गया। तब से इस दिशा में अब तक आश्चर्यजनक उपलब्धियाँ हुई है।

11-कर्णातीत ध्वनि का उत्पादन षट्कोणीय (हैम्सागनल) स्फटिक कणों द्वारा किया जाता है। रुपये की आकार के स्फटिक के टुकड़े को काटकर यंत्रों की सहायता से विद्युत आवेश (इलेक्ट्रिक शाक) देकर कम्पन की स्थिति उत्पन्न की जाती है। उससे 10 लाख से लेकर एक हजार करोड़ कम्पन प्रति सेकेण्ड की कर्णातीत ध्वनि तक तैयार कर ली गई है और उससे दूर–दूर तक सन्देश भेजने धातुओ