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क्या अर्थ है अजपा जप-सोऽहम् साधना का?


प्राणायाम की एक विधा विशुद्ध आध्यात्मिक है, जिसे अजपा जप-सोऽहम् साधना या हंस योग कहते हैं। इसका सामान्य प्रयोग बहुत सरल है। स्थिर शरीर और शान्ति चित्त होकर श्वास के आवागमन की क्रिया आरम्भ की जाय। साँस लेते समय ‘सो’ और छोड़ते समय ‘हम’ की ध्वनि श्रवण पर चित्त एकाग्र किया जाय।

इस विधान में कई प्रयोजन एक साथ जुड़ जाते हैं। नादयोग में सूक्ष्म ध्वनियों के श्रवण का अभ्यास किया जाता है और उसके लिए शब्द तन्मात्रा को विकसित करके दिव्य कर्णेन्द्रियों का प्रयोग किया जाता है। अन्यथा खुले कानों से तो आस-पास की हलचलों का कोलाहल ही सुनाई पड़ता है। श्वास के साथ धुली हुई ‘सो’ और ‘हम्’ की ध्वनियों को सुनने के लिए सूक्ष्म कर्णेंद्रियों की साधना करनी पड़ती है। इसलिए इस योगाभ्यास में नादयोग जुड़ा हुआ माना जा सकता है।

इस साधना में ध्यानयोग भी जुड़ा हुआ है। श्वास के आवागमन पर चित्र एकाग्र करना पड़ता है। वह न बन पड़े तो वायु प्रवेश के साथ ‘सो’ की और निकलने साथ ‘हम्’ के श्रवण का तालमेल ही नहीं बैठता। हर साँस की गतिविधि पर ध्यान रखना पड़ता है। इतना ध्यान जम जाने के उपरान्त ही ध्वनि श्रवण का अगला कदम उठता है।

‘सोऽहम्’ वेदान्त मन्त्र है। ‘सो’ का अर्थ वह और ‘हम्’ का अर्थ मैं है। ‘वह परमात्मा मैं हूँ, “मैं परमात्मा के समकक्ष हूँ की भावना का विकसित करना वेदान्त तत्वज्ञान का आधार है। तत्वमसि, शिवोऽहम्, सोऽहम्, सच्चिदानंदोऽहम् अयमात्मा ब्रह्म, आदि सूत्रों में इसी तत्वज्ञान का प्रतिपादन है कि आत्मा और परमात्मा के मध्य अविच्छिन्न एकता है। दोनों के मध्य अंश, अंशी का सम्बन्ध है। चिनगारी और ज्वालमाल जैसा। इस अनुभूति का दर्शन एवं प्रयोग ‘पंचदशी’ आदि ग्रन्थों में विस्तार पूर्वक बताया गया है। उस अद्वैत साधना का अभ्यास भी इस प्रयोग प्रयोजन के साथ जुड़ जाता है।

गायत्री मन्त्र चौबीस अक्षरों का है। उसमें तीन व्याहृतियां भी संयुक्त हैं। किन्तु उस महामन्त्र में अनायास ही अचेतन जप किये जाने से प्रत्येक साँस के साथ ब्रह्म साक्षात्कार का, ईश्वर दर्शन का, प्रयोजन भी सधता है। इसलिए इसे अजपा गायत्री जप भी कहा गया है। गायत्री साधना में उच्चस्तरीय भूमिका में प्रवेश करते हुए साधक को सोऽहम् साधना का भी अभ्यास करना पड़ता है। इसलिए यह जहाँ गायत्री का सार तत्व है वहीं सुसंचालित साधना क्रम भी। अन्य जपों में प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करना होता है, पर यह अनायास ही बन पड़ता है। साँस के साथ स्वसंचालित रीति से यह बिना प्रत्यक्ष प्रयत्न किए हुए ही अनायास होता रहता है। यह श्वसन क्रिया सोते-जागते हर समय होती रहती है और साधना क्रम भी उसके साथ जुड़ा रहता है। इसलिए उसे बिना जप किये जप- “अजपा जाप” भी कहा जाता है।

योगों के अगणित प्रयोगों और विधानों में एक हंस योग भी है। हंस इसलिए कहा गया है कि ‘सोह’ को उलट देने पर हंस बन जाता है। जैसे लगातार बिना रुके राम-राम कहा जाय तो वह उलटकर अथवा गति चक्र के आधार पर मरा-मरा जैसा प्रतीत होने लगता है। संस्कृत में एक विधा के अनुसार ‘हिंस’ अर्थात् हिंसक शब्द उलटकर सिंह बन गया है। सोऽहम् में भी ऐसी ही बात है। ‘स+अहम्’ इसका वास्तविक रूप है। अ का इस मिश्रण में लोप हो गया है। उसके उलट जाने पर ‘हंस’ शब्द बनता है।

भगवान के चौबीस अवतारों में एक हंसावतार भी हुआ है। इसे उसकी साधना भी कहा जा सकता है। हंसयोग का प्रतिफल ‘राजहंस’ या परमहंस के रूप में प्रकट होता है। यह दोनों ही अध्यात्म क्षेत्र की उच्च स्थितियाँ हैं।

हंस का गुण है- नीर-क्षीर विवेक। वह दूध और पानी के सम्मिश्रण को अलग कर देता है। दूध को ग्रहण करता और पानी को छोड़ देता है। अर्थात् श्रेष्ठ को ग्रहण करने और निकृष्ट को त्याग देने की उसकी प्रवृत्ति होती है। यह प्रवृत्ति साधक में विकसित हो तो समझना चाहिए कि हंस वृत्ति का अवतरण हुआ। हंस श्वेत होता है। साधक का जीवन क्रम वैसा ही हो तो समझना चाहिए कि कबीर की वह उक्ति सार्थक हुई, जिसमें उनने कहा था- ‘दास कबीर जतन सों ओढ़ी, ज्यों की त्यों धरि दीनी चदरिया।”

हंस के सम्बन्ध में कहते हैं कि वह मानसरोवर में रहता है। मोती चुगता है, कीड़े नहीं खाता। यह प्रतिपादन राजहंस स्तर के साधक की मनोवृत्ति का परिचय है। अन्यथा पक्षी हंस तो अन्य जलाशयों में रहते और कीड़े खाते भी देखे गये हैं। मोती ही खाने वाले हंस उस प्रवृत्ति के प्रतीक हैं कि भले ही भूख से प्राण निकले, घोर कठिनाइयाँ सहें पर अपना स्तर नीचे नहीं गिरने देते।

‘सोऽहम्’ की ध्वनि प्रकृति और पुरुष के मिलन से प्रादुर्भूत होती है। कहा गया है कि सृष्टि के आदि में परब्रह्म की इच्छा हुई कि मैं अकेला हूँ। अकेलेपन में क्या आनन्द, इसलिए मुझे एक से बहुत हो जाना चाहिए। यह इच्छा ही प्रकृति बन गई। प्रकृति जड़ थी, पुरुष चेतन। दोनों के संयोग से ही यह विश्व ब्रह्मांड बन सकता था। इसलिए दोनों का मिलना शब्दब्रह्म के रूप में प्रकट हुआ। जिस प्रकार घंटा, घड़ियाल में मोगरी की चोट पड़ने से झंकार थरथराहट जैसी ध्वनि होती है, वैसी ही कुछ प्रकट होने पर उस शब्द ब्रह्म को ओंकार कहा गया। प्रकृति और पुरुष के मिलन से जब जीव की उत्पत्ति हुई तो उसका वाचक शब्द हम् भी मिल गया। परमात्मा ‘स’। जीवन ‘अहम्’। दोनों के मध्यवर्ती प्रकृति का लोप हो गया। आत्मा और परमात्मा दो ही रह गये। उस द्वैत भाव का प्रतीक सोऽहम् है। इस प्रकार यह भी ओंकार का सहचर है। सृष्टि के आदि से ही इसका अस्तित्व है।

सोऽहम् साधना में आत्म बाध तत्व बोध का मिश्रित समावेश है। मैं कौन हूँ? उत्तर- ‘परमात्मा। इसे जीव और ईश्वर का मिलना, आत्म -दर्शन ब्रह्मदर्शन भी कह सकते हैं और आत्मा परमात्मा की एकता भी। यही ब्रह्मज्ञान है। ब्रह्मज्ञान के उदय होने पर ही आत्मज्ञान सद्ज्ञान, तत्वज्ञान, व्यवहार ज्ञान आदि सभी की शाखाएँ, प्रशाखाएं फूटने लगती हैं।

सोऽहम् साधना को अतीव उच्चकोटि की बताया गया है। उसे अद्वैत ब्रह्म की उपासना और वेदान्त दर्शन का सार संक्षेप भी कह सकते हैं।

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उपासना की समग्रता में जप, ध्यान और भाव इन तीनों के समन्वय की आवश्यकता होती है। पूजा अर्चा को प्रतीक परिचर्या माना जाता है। प्रतिमा की दर्शन झाँकी एवं नमन वन्दन के अतिरिक्त धूप, दीप, नैवेद्य, अक्षत, जल आदि के समर्पण को स्मरण प्रक्रिया के अंतर्गत लिया जाता है। लोग भगवान को भूले रहते हैं। यह स्मरण नहीं रखते कि सर्वव्यापी और न्यायकारी भगवान सर्वत्र समाया हुआ है वह हमारे चरित्र और चिन्तन को बारीकी से देखता है और इसी आधार पर आक्रोश एवं उपहार जन्य प्रतिक्रिया व्यक्त करता रहता है। भगवान है। इतना मान लेना पर्याप्त नहीं। उसकी प्रतिमा का दर्शन करने या नाम जपने भर से उद्धार हो जाता है यह मान्यता भी अपूर्ण है। आस्तिकता तभी सार्थक होती है जब भगवान को अपनी जीवनचर्या में स्थान दिया जाय। अपने गुण, कर्म, स्वभाव में उसकी प्रेरणा के अनुरूप गतिविधियों का समन्वय किया जाय। यह कार्य नाम लेने या प्रतिभा की झाँकी करने भर से पूरा नहीं होता। चिन्तन और मनन में यह तथ्य भी समाविष्ट रहना चाहिए कि व्यक्तित्व का निर्धारण एवं विकास इस प्रकार किया जाय, जिससे उसका अनुशासन निभे और प्रसन्नता भरा अनुग्रह हस्तगत हो। देवालयों, तीर्थ स्थानों की दर्शन झाँकी इस तथ्य की स्मृति पटल पर गहराई के साथ जमाये रहने के लिए की जाती है। यह सामान्य क्रम है जिसे उसे जितनी अधिक बार चरितार्थ कर सकना सम्भव हो उतना करना चाहिए।

इससे अगला कदम उपासना का है। उसमें नाम जप, ध्यान और भाव का समन्वय होना चाहिए। इसके निमित्त विभिन्न धर्म समुदायों में भिन्न-भिन्न प्रकार के उपाय उपचार बताये गये हैं, पर एक साधना ऐसी है जिसे मत-मतान्तरों से ऊपर सार्वभौम अथवा सर्वजनीन कहा जा सकता है।

वही सोहम् साधना। इसे हंसयोग भी कहा गया है। यह अनायास ही सधता रहता है, किंतु लोग इसे भूले रहते हैं। इसे स्मृति पटल पर जागृत कर लिया जाय और अभ्यास में उतार लिया जाय तो बिना किसी अतिरिक्त कर्मकाण्ड के यह साधना स्वयमेव चल पड़ती है।

नासिका मार्ग से श्वास प्रश्वास क्रिया अनायास ही चलती रहती है। पर इसकी ओर किसी का ध्यान विशेष रूप से नहीं जाता है। जब उसे व्यवस्थित कर लिया जाता है तो वह भगवद् भक्ति की सर्वांगपूर्ण साधना बन जाती है। श्वास-प्रश्वास के साथ एक सूक्ष्म ध्वनि होती है, वह सहज ही सुनने में नहीं आती। ध्यान एकाग्र करने पर कुछ समय में तीन शब्द उभरने लगते हैं। साँस खींचते समय ‘सो’ और छोड़ते समय ‘हम्’ की ध्वनि होती है। थोड़े अभ्यास से ही कुछ दिनों में इन ध्वनियों की अनुभूति होने लगती है।

प्राणायाम के तीन पक्ष हैं (1) साँस खींचने को- पूरक (2) साँस रोकने को- कुम्भक और साँस छोड़ने को- रेचक कहते हैं। सोहम् साधना में यह तीनों ही क्रियाएं होती रहती हैं और ‘शब्दब्रह्म’ की साधना भी। साँस लेने समय ‘सो’। रोकते समय (अ-इ) अर्ध आधार और छोड़ते समय ‘हम्’ की ध्वनि होती है उसे कुछ समय के अभ्यास से अनुभव में प्रत्यक्ष उतरने लगते हैं।

बाँस की पोली नली में होकर हवा भीतर जाती है सो सीटी बजने जैसी ध्वनि होती है उसी को ‘सो’ समझना चाहिए और नाक के साँस छोड़ते समय सभी जीवधारियों की नासिका में ‘हम्’ शब्द स्पष्ट होता है। साँप की फुसकार में- यह शब्द अधिक स्पष्ट होता है। जिसे फुसकार कहते हैं। साँस खींचने और निकालने के बीच में एक स्वल्प अवधि का विराम होता है। उसे (अ)(ऽ) आधा अ कहा जा सकता है। छोड़ते समय की ध्वनि’ “हम” जैसी प्रतीत होती है। इस प्रकार तीनों क्रियाओं को मिलकर ‘सोऽहम्’ शब्द बन जाता है। सोहम् को उल्टा कर देने पर हंस बन जाते हैं इसलिए इसे हंसयोग भी कहते हैं।

‘सः’ का अर्थ है- वह। अहम् का अर्थ होता है- मैं। पूरे सोहम् शब्द का अर्थ होता है। “वह में हूँ” वेदान्त का सार इन्हीं शब्दों में सन्निहित है। सोऽहम् शिवोऽहम् सच्चिदानंदोऽहम्’ आदि शब्द इसी के पर्यायवाची हैं। तत्त्वमसि-अयमात्मा ब्रह्म-प्रज्ञा-‘ब्रह्म’ शब्दों में उद्बोधन कराया गया है कि तू ही ब्रह्म है। यह आत्मा ही ब्रह्म है। मैं शिव हूँ- मैं सच्चिदानन्द हूँ। यह शब्दकार मात्र है। सबका अर्थ एक ही है- “मैं वह (परब्रह्म) हूँ। इसमें आत्मा और परमात्मा ही एकता का भाव सन्निहित है। इसे अद्वैत भाव भी कह सकते हैं।

भक्त और भगवान को दो मानते हुए की जाने वाली प्रार्थना को द्वैत कहते हैं। पूजा प्रयोजन में प्रयुक्त होने वाले कर्मकाण्ड एवं वस्तु विनियोग को अलग मानने से त्रैत सिद्धान्त बन जाता है। अद्वैत भाव में अपने आपको भगवत् समर्पण करना होता है और जिस प्रकार आग ईंधन- नदी नाला मिलकर एक हो जाते हैं उसी प्रकार अद्वैत भाव की साधना में भक्त और भगवान दोनों मिलकर एकत्व का अनुभव करते हैं। जिस प्रकार नमक या शकर पानी में घुलकर एक रूप हो जाता है यह समर्पण भाव अद्वैत है।

भगवान के प्रति “त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव” की भावना रखकर आराध्य प्रभु के सम्मुख प्रार्थना करने की प्रक्रिया द्वैत है और धूप, दीप, नैवेद्य, चन्दन, पुष्प का समर्पण करते हुए आत्म निवेदन करने की प्रक्रिया त्रैत है। प्रकृति पदार्थों का पूजा में समावेश हो जाने से वह त्रैत भावना बन जाती है। उपासना के सही तीन उपचार हैं। भक्त अपनी-अपनी भावना के अनुरूप इसमें से किसी का भी चयन कर सकते हैं।

‘सोहम्’ उपासना को यों अद्वैत कहा जाता है। क्योंकि उसमें [स- वह] अहम् (मैं) होने के समन्वय का समर्पण का एकाकार होने के भाव हैं। किन्तु तत्व दर्शन के तीनों प्रयोजनों के अनुरूप भी इसका अर्थ हो सकता है। स- वह अहम्- मैं, मैं और वह दोनों की स्थिति अलग-अलग मान लेने पर यह द्वैत हो जाएगा और इस ध्वनि के साथ साँस का आवागमन प्रकृति पदार्थ है इसलिए यह त्रैत भी हो सकता है। भक्त को अपनी मान्यता और भावना के अनुरूप इनमें से किसी को भी अपनी लेने की गुँजाइश है।

जब साँस भीतर जा रही हो तब ‘सो’ का व्रत, भीतर रुक रही हो वह (अ) का और जब उसे बाहर निकाला हो जब ‘हम’ ध्वनि का ध्यान करना चाहिए। इन शब्दों को मुख से बोलने की आवश्यकता नहीं है। मात्र श्वास के आवागमन पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है और साथ ही यह भावना की जाती है कि इस आवागमन के साथ दोनों शब्दों की ध्वनि हो रही है।

साँस पूरी ली जाय। जितनी फेफड़ों में गुंजाइश है उतनी साँस भरी जाए। पूरी साँस भरने से पेट भी फूलने लगता है। साँस रोकने का समय-खींचने की तुलना में आधा होना चाहिए। इसके बाद साँस निकाली जाय तो समय उतना लगना चाहिए जितना कि खींचने में लगाया था। इस स्थिति में जहाँ फेफड़े- सीना सरकना है वहाँ पेट भी भीतर घुस जाता है। इसे पूरी साँस लेना कह सकते हैं। यह प्रक्रिया श्वासोच्छवास की दृष्टि से भी एक उपयोगी व्यायाम जैसी है। आमतौर से लोग अधूरी साँस लेते हैं इससे फेफड़े का थोड़ा ही अंश काम में आता है और शेष निष्क्रिय पड़ा रहता है। उसमें क्षय आदि के कीटाणु जमा हो जाते हैं कड़ी मेहनत करने पर दमफूल जाता है, साँस अधूरी जाने से उनके साथ शरीर को समग्र मात्रा में मिलने वाली ऑक्सीजन भी नहीं मिलती है। यह कई हानियाँ हैं जो गहरा साँस लेने से दूर होती हैं। शारीरिक दृष्टि से सोहम् साधना एक अच्छा श्वास व्यायाम है इसके अतिरिक्त वह उपासना तो है ही।

श्वास के आवागमन के साथ-साथ ध्वनि का ध्यान करना, एकाग्रता साधने का योगाभ्यास है। साँस के आवागमन पर और उसके साथ आने वाली ध्वनि पर मन को एकाग्र करने से ध्यान योग की साधना हो जाती है। ध्यान से मन का बिखराव दूर होता है और प्रकृति को एक केन्द्र पर केन्द्रित करने से उससे एक विशेष मानसिक शक्ति उत्पन्न होती है। उससे जिस भी प्रयोजन के लिए- जिस भी केन्द्र पर केन्द्रित किया जाय उसी में जागृति-स्फुरणा उत्पन्न होती है। मस्तिष्कीय प्रसुप्त क्षमताओं को- षट्चक्रों को- तीन ग्रन्थियों को- जिस भी केन्द्र पर केन्द्रित किया जाय वही सजग हो उठता है और उसके अंतर्गत जिन सिद्धियों का समावेश है उनमें तेजस्विता आती है।

सोहम् साधना के लिए किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं है। न समय का न स्थान का। स्नान जैसा भी कोई प्रतिबन्ध नहीं है। जब भी अवकाश हो, सुविधा हो, भाग दौड़ का काम न हो, मस्तिष्क चिन्ताओं से खाली हो। तभी इसे आरम्भ कर सकते हैं। यों हर उपासना के लिए स्वच्छता, नियत समय, स्थिर मन के नियम हैं। सुगन्धित वस्तुओं से वातावरण को प्रसन्नतादायक बनाने की विधि है। वे अगर सुविधापूर्वक बन सकें तो श्रेष्ठ। अन्यथा रात्रि को आँख खुलने पर बिस्तर पर पड़े-पड़े भी इसे किया जा सकता है। यों मेरुदण्ड को सीधा रखकर पद्मासन से बैठना हर साधना में उपयुक्त माना जाता है, पर इस हंसयोग में उन सबका अनिवार्य प्रतिबन्ध नहीं है।

एकाग्रता के लिए हर साँस पर ध्यान और उससे भी गहराई में उतर कर सूक्ष्म ध्वनि का श्रवण इन दो प्रयोजनों के अतिरिक्त तीसरा भाव पक्ष है जिसमें यह अनुभूति जुड़ी हुई है कि “मैं वह हूँ” अर्थात् आत्मा, परमात्मा के साथ एकीभूत हो रही है, इसके निमित्त वह सच्चे मन से आत्मसमर्पण कर रही है। यह समर्पण इतना गहरा है कि दोनों के मिलन से एक ही सत्ता मिट जाती है और दूसरे की ही रह जाती है। दीपक जलता है तो लौ के प्रज्ज्वलन में मात्र बत्ती ही दृष्टिगोचर होती है तेज तो नीचे पैंदे में पड़ा अपनी सत्ता बत्ती के माध्यम से प्रकाश के रूप में समाप्त ही करता चला जाता है।

सोऽहम् साधना को हंसयोग कहते हैं। इसमें शब्दों को उलटकर सोहम् का हंस तो बना ही है। साथ ही भगवान के 24 अवतारों में एक अवतार हंस भी है जिसका रहस्य ही नीर क्षीर विवेक। कहते हैं कि दूध और पानी मिलाकर सामने रखने पर हंस उसमें से पानी का अंश छोड़ देता है और मात्र दूध ही ग्रहण करता है। इस उदाहरण में साधक के लिए प्रेरणा है कि मात्र औचित्य को ही ग्रहण करें। संसार में भला-बुरा कुछ मिला-जुला है। विवेक के अभाव में लोग सब कुछ अपनाते रहते हैं। जिससे भी स्वार्थ सिद्ध होता है उसी को कर गुजरते हैं। छोड़ने और ग्रहण करने में औचित्य की कसौटी लगाना आवश्यक नहीं समझते। हंसयोग की साधना में साधक को हर कदम फूँक-फूँक कर धरना होता है और मात्र उचित ही अंगीकृत करना होता है। अनुचित चाहे कितना ही आकर्षक क्यों न हो, उससे कितना ही लाभ क्यों न दिख पड़ता हो, पर उसे विषवत् त्यागना होता है। ‘सोहम्’ साधना को अजपा जप या अजपा गायत्री कहा जाता है। इसे जीवात्मा अनायास ही अहिर्निशि जपता रहता है। श्वास-प्रश्वास द्वारा। किन्तु वह ध्यान एवं भाव के अभाव में प्रसुप्त स्तर की रहती है और उनका कोई प्रतिफल नहीं मिलता जिस भूमि पर भ्रमण कर रहे हैं उसके नीचे भले ही बहुमूल्य खजाना दबा पड़ा हो, पर जानकारी के अभाव में उसे न तो निकालने का प्रयत्न बन पड़ता है और न सदुपयोग की योजना के अभाव को कोई लाभ मिलता है।