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चित्त और बुद्धि में क्‍या अंतर है ? क्‍या है चित्त और छह प्रकार के रंगों की धर्म और अधर्म की “छ


''चित्त'' शब्द का सामान्य अर्थ क्या हैं?;-

06 FACTS;-

चित्त का मतलब हुआ विशुद्ध प्रज्ञा व चेतना, जो स्मृतियों से पूरी तरह से बेदाग हो। यहां कोई स्मृति नहीं होती है।मन का अगला आयाम चित्त

कहलाता है।चित्त मन का सबसे भीतरी आयाम है, जिसका संबंध उस चीज से है जिसे हम चेतना कहते हैं। अगर आपका मन सचेतन हो गया, अगर आपने चित्त पर एक खास स्तर का सचेतन नियंत्रण पा लिया, तो आपकी पहुंच अपनी चेतना तक हो जाएगी।

2-हम जिसे चेतना कह रहे हैं, वो वह आयाम है, जो न तो भौतिक है और न ही विद्युतीय और न ही यह विद्युत चुंबकीय है। यह भौतिक आयाम से अभौतिक आयाम की ओर एक बहुत बड़ा परिवर्तन है। यह अभौतिक ही है, जिसकी गोद में भौतिक घटित हो रहा है। भौतिक तो एक छोटी सी घटना है। इस पूरे ब्रह्माण्ड का मुश्किल से दो प्रतिशत या शायद एक प्रतिशत हिस्सा ही भौतिक है, बाकी सब अभौतिक ही है।

3-योगिक शब्दावली में इस अभौतिक को हम एक खास तरह की ध्वनि से जोड़ते हैं। हालांकि आज के दौर में यह समझ बहुत बुरी तरह से विकृत हो चुकी है, इस ध्वनि को हम ‘शि-व’ कहते हैं। शिव का मतलब है, ‘जो है नहीं’। जब हम शिव कहते हैं तो हमारा आशय पर्वत पर बैठे किसी इंसान से नहीं होता। हम लोग एक ऐसे आयाम की बात कर रहे होते हैं, जो है नहीं, लेकिन इसी ‘नहीं होने’ के अभौतिक आयाम की गोद में ही हरेक चीज घटित हो रही है।

4-अंग्रेजी भाषा में माइंड यानी मन बस एक शब्द है, जिससे उम्मीद की जाती है कि वह सब कुछ समेट ले, लेकिन योग में इसके सोलह पहलू होते हैं।हर हिस्से का अपना एक विशेष काम होता है। ऐसे कई अभ्यास और प्रक्रियाएं हैं, जिनकी मदद से कोई इंसान अपने मन के इन सोलह पहलुओं को अपने काबू में कर सकता है।

5-मन के तीन हिस्से..हम मन को तीन हिस्सों में बांट सकते हैं। मन का विवेक-विचार करने वाला आयाम बुद्धि कहलाता है, दूसरा है संग्रह करने वाला हिस्सा जो सूचनाएँ एकत्रित करता है; और तीसरा है, जागरूकता जो प्रज्ञा कहलाती है।

6-चित्त मन के सोलह आयामों में से एक है।मन के ये आयाम पूरी तरह से मस्तिष्क में स्थित नहीं होते, ये पूरे सिस्टम में होते हैं। तो ये आठ तरह की स्मृतियां, बुद्धि के ये पांच आयाम और अहंकार यानी पहचान के दो आयाम व चित्त कुल मिलाकर मन के सोलह हिस्से होते हैं।चित्त चूंकि असीमित होता है, इसलिए यह सिर्फ एक ही होता है।समझने की सहूलियत के लिए इन सोलह हिस्सों को चार समूहों में बांटा जा सकता है। 1-मन 2-बुद्धि

3-चित्त 4- अहंकार

क्या हैं आठ तरह की स्मृतियां?-

08 FACTS;-

बुनियादी तौर पर स्मृति के आठ रूप होते हैं। हम इन्हें तात्विक स्मृति, परमाणविक स्मृति, क्रमिक विकास की स्मृति, जेनेटिक स्मृति, कार्मिक स्मृति, स्पष्ट स्मृति, अस्पष्ट स्मृति और संवेदी स्मृति के तौर पर बांटते हैं।

1-तात्विक स्मृति;-

हर मूल तत्व अपनी स्मृति के अनुसार कार्य करता है। तात्विक स्मृति का मतलब है

कि तत्वों की अपनी स्मृति। अगर ऐसा न हो तो वे काम ही नहीं कर पाएंगे। वे अपनी अलग ही स्मृति विकसित कर लेते हैं, ताकि वे एक खास तरह से काम कर पाएं।वही पानी

हमारे भीतर एक तरीके से काम करता है, एक चींटी में दूसरी तरह से काम करता है, आम के पेड़ में अलग तरीके से काम करता है, नीम के पेड़ में अलग तरीके से व्यवहार करता है। जबकि पानी वही एक सा होता है। तो तत्व अपनी याद्दाश्त को विकसित कर एक खास तरीके से काम करते हैं।

2-परमाणविक स्मृति;-

परमाणुओं की अपनी अलग स्मृति होती है। भले ही हर परमाणु में एक जैसे ही तीन सूक्ष्माणु होते हैं, लेकिन अलग-अलग परमाणुओं में वे अलग-अलग तरीके से काम करते हैं। यह परमाणु की स्मृति होती है। वे किसी चीज को कुछ खास तरीके से याद रखते हैं और फिर उस खास गुण को जारी रखते हैं।

3-क्रमिक विकास की स्मृति;-

फिर क्रमिक विकास की स्मृति होती है। ऐसा कभी नहीं होता कि आप अपना खाना अगर कुत्ते को दे दें तो वह आपकी तरह बात करने लगे या अगर आप कुत्ते का खाना खा लें तो आप उसकी तरह भौंकने लगें।ऐसी चीजें कभी नहीं होतीं, क्योंकि एक क्रमिक विकास की स्मृति होती है।

4-जेनेटिक स्मृति;-

इसी तरह से एक जेनेटिक स्मृति होती है। अगर आप अमेरिकी खाना खाते हैं, तो आप अमेरिकी नहीं बन जाते।

5-कार्मिक स्मृति;-

एक कार्मिक स्मृति होती है, जो आपकी समझ से परे अलग-अलग तरीके से काम करती है। या यह अपने ही तरीके से काम करती है।

6-संवेदी स्मृति;-

एक संवेदी स्मृति भी होती है। अलग-अलग संवेदी अंग अलग-अलग चीजों को अलग-अलग तरीके से लेते हैं। मान लीजिए किसी जगह कोई घटना घटती है, हो सकता है कि वही एक घटना अलग-अलग संवेदी अंगों द्वारा अलग-अलग ढंग से ली जाए या फिर अलग-अलग लोगों के संवेदी अंगों द्वारा अलग-अलग तरीकों से ली गई हो। उसी के अनुसार स्मृति इकट्ठी होती है और फिर उसी हिसाब से यह मन में चलती है।

7-स्पष्ट स्मृति;-

इसके अलावा, स्पष्ट स्मृति भी होती है, जिसका मतलब है सचेतन स्मृति, जिससे आप स्पष्टता से शब्दों में कह सकते हैं।

8-अस्पष्ट स्मृति ;-

फिर अस्पष्ट स्मृति भी होती है। यह स्मृति ऐसी है, जो लगभग रोज कौंधती है, लेकिन आप कभी इसका अंदाजा ही नहीं लगा पाते, क्योंकि यह सचेतन नहीं होती। इस तरह से

कुल आठ तरह की स्मृतियां होती हैं।

क्या शरीर और विचारों से परे जाने पर बुद्धि स्थिर हो जाएगी?-

02 FACTS;-

1-मानस एक विशालकाय स्मृतिकोष है, जो बुद्धि को चलाने के लिए लगातार खुराक दे रहा है। अगर आप स्मृति को मिटा देंगे तो बुद्धि भ्रमित हो जाएगी, उसे समझ में ही नहीं आएगा कि वह क्या करे। अगर आपके भीतर कोई भी स्मृति नहीं होगी तो यह एक बेहद महत्वूपर्ण आयाम होगा। अगर आप अपने शरीर व अपने विचार प्रक्रिया की सीमाओं से परे निकल जाएं तो अचानक बुद्धि को समझ नहीं आएगा कि वह क्या करे, यह स्थिर हो जाएगी, क्योंकि बिना स्मृति के यह काम ही नहीं कर सकती।

2-अगर बुद्धि में सभी तरह की स्मृतियों का लगातार प्रवाह बना रहता है तो यह चलती रहती

है।यह कंप्यूटर की तरह है। आप ने उसकी मेमोरी हटा दी तो वह महज एक खाली स्क्रीन भर रह जाएगा। तो अगर आप खुद को स्मृतियों से दूर कर लें, स्मृतियों के उस विशाल कोष से, जिन्हें आप शरीर व मन या मानस कहते हैं तो बुद्धि स्थिर हो जाएगी या पूरी तरह से खाली हो जाएगी।

बुद्धि क्या हैं?-

03 FACTS;-

1-जब हम बुद्धि कहते हैं तो हमारा मतलब मन के तार्किक पक्ष से होता है। दूसरे शब्दों में कहें तो आपकी बुद्धि आपको इस बात को नहीं मानने देगी कि दो और दो छह होते हैं।दो और दो चार ही होने चाहिए, नहीं तो

आप मान लेंगे कि सामने वाला पागल है। तो बुद्धि तथ्यपरक है, यह तथ्यों को समझती है, उन्हें अपने भीतर उतारती है, उनका आकलन करती है और इस दुनिया के कामकाज में हमारी मदद करती है।

2-दूसरे शब्दों में ,यह चाकू की तरह है, जितनी तेज धार, उतना बेहतर। चाकू को चीजों को काटकर खोलने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। तो इस जगत को समझने, उसकी पड़ताल करने का एक तरीका चीरफाड़ है। हाई स्कूल में आपने भी जरूर कोई केंचुआ या फिर कोई मेंढक की चीरफाड़ की होगी। चीरफाड़ के जरिए आप कुछ न कुछ तो जान ही जाते हैं, लेकिन इससे जीवन की मूल प्रकृति को नहीं समझा जा सकता।

3-आपके दिमाग में जितने सारे प्रभाव हैं, वे सिर्फ पाँच ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से ही घुसे हैं और ज्ञानेन्द्रियाँ हर चीज़ का अनुभव सिर्फ तुलना द्वारा ही कर सकती हैं।आपकी बुद्धि आपकी पांचों इंद्रियों के जरिए ही काम करती है। अगर इंद्रियों के जरिये सूचना नहीं मिल रही है, तो आपकी बुद्धि काम नहीं करेगी।

बुद्धि के पांच बुनियादी रूप क्या हैं?-

07 FACTS;-

1-बुद्धि के पांच बुनियादी रूप होते हैं।पांच ज्ञानेन्द्रियाँ अथार्त आकार, ध्वनि, सुगंध, स्वाद और स्पर्श को समझने के लिए बुद्धि के ये पांच अलग-अलग रूप होते हैं। इनमें से आकार को

समझने वाली बुद्धि को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इसी से सृष्टि की ज्यामिति समझ में आती है।यदि जीवन में आपने अंधकार नहीं देखा होता, आप नहीं जान पाते कि प्रकाश क्या है। इंद्रिय ज्ञान आपको यथार्थ का एक विकृत रूप दिखाता है, क्योंकि ज्ञानेन्द्रियाँ हर चीज़ का अनुभव सिर्फ तुलना द्वारा ही कर सकती हैं और जहाँ तुलना होती है वहाँ हमेशा दोहरापन या द्वैत होता है। आप सिर्फ टुकड़ों में ही अनुभव कर सकते हैं। अतः आपका सारा अनुभव छोटे-छोटे अंशों में है और ये अंश कभी पूर्ण तस्वीर नहीं दिखाते।

2-इस विभाजन को यदि आप अपनी जागरूकता से मिटा दें, फिर आपकी बुद्धि यह स्पष्ट कर देगी कि क्या सच है और क्या सच नहीं है। तब आपकी बुद्धि चाक़ू के समान तेज़ हो जाती है और इस पर कुछ भी नहीं चिपकता, यह किसी चीज़ के साथ आसक्त नहीं होती। यह किसी वस्तु से पहचान नहीं बनाती, यह हर चीज़ को वैसी दिखाती है जैसी वह है यह आपके संग्रह से, आपकी पहचानों से, आपकी भावनाओं से प्रभावित नहीं होती।

3-अगर आप किसी चीज को देखते हैं और सबसे पहले उसके आकार पर आप गौर करते हैं, तो इसका मतलब है कि आकार को समझने वाली आपकी बुद्धि दूसरे तरह की बुद्धियों से ज्यादा प्रभावशाली है। अगर रंग की समझ ज्यादा प्रभावशाली है, तो आपको पूरा का पूरा जगत ही रंगीन और खूबसूरत नजर आएगा, लेकिन आपके तर्क इतने प्रबल नहीं होंगे। अगर ध्वनि की समझ ज्यादा शक्तिशाली है, तो आप पाएंगे कि अपने आसपास के जीवन को लेकर आपके पास एक खास तरह की समझ है। एक खास सीमा से परे ध्वनि खूबसूरत बन जाती है, जिसका आप आनंद तो लेते हैं, लेकिन तर्क का इस्तेमाल करने के लिए आपके पास कोई मजबूत आधार नहीं होगा।

4-अगर आपके पास स्पर्श या भावों को समझने की बुद्धि है तो इससे भी आपको आनंद की अनुभूति होगी, लेकिन एक बार फिर आपके पास कोई मजबूत तार्किक आधार नहीं होगा।

इस तरह आकार को समझने वाली बुद्धि सबसे अच्छी मानी जाती है, क्योंकि यह हर चीज को ज्यामितीय तरीके से देखती है। इसका मतलब है कि यह हर चीज के साथ संरेखित यानी ‘अलाइन’ या एक सीध में आ सकती है।

5-बाकी पहलू हमें अलग-अलग विशेषताएं देते हैं, लेकिन इस जगत के साथ अलाइन होने की काबिलियत इसी के साथ आती है। अलाइनमेंट इसलिए अहम है, क्योंकि एक बार अगर आपका अलाइनमेंट ठीक हो जाए तो घर्षण सबसे कम होगा। किसी मशीन को अच्छा तभी कहा जाता है, जब उसमें कम-से-कम घर्षण हो। प्रभावशाली काम का मतलब है आपके साथ हर चीज सबसे कम घर्षण के साथ हो रही है।

6-आनंद में होना, प्रफुल्लित होना, ब्रह्माण्ड की खोज करने की चाह होना, ये सब इसके स्वाभाविक नतीजे हैं। अगर दो विचार उठते ही आपको अपने भीतर एक टकराव महसूस होता हो, तो ऐसी स्थिति में आपका किसी चीज की खोज करने का मन नहीं होगा। अपने आप में यह बात आपको जीवन भर व्यस्त रखेगी।

7-हमारे जीवन की सबसे बुनियादी क्षमता विचार, भाव और संवेदनाएं हैं और इन्हें ही संभालने का तरीका लोग जीवन भर नहीं सीख पाते। कुत्ते, बिल्ली जैसे सारे जानवर अपनी सभी क्षमताओं को अपनी खुशहाली के लिए इस्तेमाल करने का तरीका अच्छी तरह जानते हैं, लेकिन इंसान यह सब नहीं सीख पाता। किसी भी दूसरे प्राणी की तुलना में इंसान के पास कहीं ज्यादा उच्च स्तरीय क्षमताएं और योग्यताएं हैं।परंतु वह इन्हें अपनी खुशहाली के लिए इस्तेमाल करने का तरीका नहीं सीखता ।

क्‍या है बुद्धि के पांच प्रकार ?-

बुद्धि पांच प्रकार की होती है-

1) बुद्धि

2)विवेक

3) मेधा बुद्धि

4) ऋतम्भरा बुद्धि

5) प्रज्ञा बुद्धि ।

1-बुद्धि ;-

बुद्धि वह होती है जो यथार्थ निर्णय देने वाली हो । हमारे नेत्र के पिछले विभाग में पीला पटल है , इस पीले पटल में तन्मात्राएँ लगी है । तन्मात्राओं के पश्चात मन है । मन का सम्बन्ध बुद्धि से है । इस प्रकार जो पदार्थ नेत्रों के समक्ष आता है वह मन के द्वारा बुद्धि तक पहुचता है और हम यथार्थ निर्णय लेते है । इन्द्रिय जो भी कार्य करती है तो यह सब विषय मन के द्वारा बुद्धि तक पहुँचते है और बुद्धि उनका निर्णयात्मक उत्तर देती है ।

2-विवेक बुद्धि;-

विवेक का शाब्दिक अर्थ तो भेद करना ही है; अंतर करना।विवेक का अर्थ होता है ये देखना कि कौन सी चीज़ है जो मन के आयाम की है, और कौन सी चीज़ है जो मनातीत है| इनमें अंतर कर पाए तो विवेक है| जगतगुरु आदिशंकर,के अनुसार ''नित्य और अनित्य में भेद करना विवेक है ''।'नित्य' माने वो जो है भी, होगा भी, जिसका समय से कोई लेना ही देना नहीं है, जो समय के पार है| और दूसरी चीज़ें, वस्तुएं, व्यक्ति, विचार होते हैं, जो समय में आते हैं और चले जाते हैं, उनको 'अनित्य' कहते हैं| 'नित्य' वो जिसका समय से कोई लेना देना नहीं है, जो कालातीत सत्य है, वो नित्य है| और वो सब कुछ जो समय की धार में है, अभी है, अभी नहीं होगा, यानि कि मानसिक है; वो सब अनित्य है|

3- मेधा बुद्धि;-

02 FACTS;-

1-मेधावी बुद्धि उसको कहते है जिसके आने के पश्चात मानव के जन्म जन्मान्तरों के संस्कार जाग्रत हो जाते है । मेधावी बुद्धि का सम्बन्ध अंतरिक्ष से होता है । जो वाणी अंतरिक्ष में रमण करती है , मेधावी बुद्धि प्राप्त होने पर उसको जान लिया जाता है । मेधावी बुद्धि अंतरिक्ष में संसार के ज्ञान विज्ञान को देखा करती है कि यह संसार का विज्ञान और कौन कौन से वाक्य अंतरिक्ष में रमण कर रहे है । मेधावी बुद्धि उस विवेक का नाम है जब मानव संसार से विवेकी होकर परमात्मा के रचाये हुए तत्वों पर विवेकी होकर जाता है ।

2-इस मेधावी बुद्धि का क्षेत्र है , पृथ्वी के गर्भ में नाना प्रकार कि धाराए तथा खनिज , समुद्रो की तरंगो में रमण करने वाली धातुए तथा प्राणी, वायुमंडल में रमण करने वाले, रजोगुणी, तमोगुणी तथा सतोगुणी परमाणु , इन परमाणुओ तथा वाणी का मंथन करना इसका क्षेत्र है । मानव मेधावी बुद्धि का विवेकी बनकर परमात्मा के रचाये हुए विज्ञान को जानता हुआ यह आत्मा ऋतम्भरा बुद्धि के द्वार पर चला जाता है ।

4-ऋतम्भरा बुद्धि;-

03 FACTS;-

1-ऋतम्भरा बुद्धि उसको कहते है जब मानव योगी और जिज्ञासु बनने के लिए परमात्मा की गोद में जाने के लिए लालयित होता है तो वही मेधावी बुद्धि , ऋतम्भरा बुद्धि बन जाती है । पांचो प्राण ऋतम्भरा बुद्धि के अधीन हो जाते है । योगी जब इन पांचो प्राण को अपने अधीन करके उनसे मिलान कर लेता है तो आत्मा इन प्राणो पर सवार हो जाता है और सर्वप्रथम मूलाधार में रमण करता है ।

2- मूलाधार में लगभग 4 ग्रन्थियां,स्वाधिष्ठान में लगभग 6 ग्रन्थियां,लगी है। आत्मा के यहाँ पहुचने पर ये ग्रन्थियां स्पष्ट हो जाती है , इस आत्मा का प्राणो के सहित आगे को उत्थान हो जाता है ।आगे चलकर यह आत्मा नाभि चक्र में आता है ,जिसमे 10 ग्रथियां

होती है। इसके आगे यह आत्मा गंगा , यमुना, सरस्वती में स्नान करता हुआ ह्रदय चक्र में पहुचता है । इसको अविनाश चक्र भी कहते है ।

3-आगे यह आत्मा कंठ चक्र में जाता है जिसे उदान चक्र या ब्राह्यी चक्र भी कहते है ।

इसके आगे यह आत्मा घ्राण चक्र में जाता है , आत्मा के यहाँ पहुचने पर ये भी स्पष्ट हो

जाती है । आगे वह स्थान आता है जहाँ इड़ा, पिंगला , सुषुम्ना नाम की नाड़ियों , जिन्हे गंगा, यमुना, सरस्वती भी कहते है, का मिलन होता है , इसे त्रिवेणी या आज्ञाचक्र भी कहते है ।आत्मा प्राणो सहित त्रिवेणी में स्नान करता हुआ ब्रह्मरंध्र में पहुँचता है , उस स्थान पर सूर्य का प्रकाश भी फीका पड़ जाता है ।इतने प्रबल प्रकाश से आगे चलकर आत्मा रीढ़ में जाता है जहाँ कुंडली जाग्रत हो जाती है । इस कुंडली के जाग्रत होने का नाम ही परमात्मा से मिलन होना है ।

5-प्रज्ञा बुद्धि;-

05 FACTS;-

1-प्रज्ञा अंग्रेजी भाषा के शब्द wisdom के समतुल्य होती है और बुद्धि, intelligence के समतुल्य। अधिकांश लोग यह समझ ही नहीं पाते कि कहां बुद्धि का दायरा खत्म होता है और कहां से प्रज्ञा का आयाम शुरू होता है।बुद्धि हमें प्राप्त एक उपहार है अगर ये हमारे पास है तो हम बुद्धिमान हैं परन्तु यदि हम जानते हैं की इसका उपयोग किस दिशा में कितना करना और कैसे करना है तो हम प्रज्ञावान हैं |

2-योगसूत्र के अनुसार ज्ञान की पराकाष्टा वैराग्य है..जबकि प्रज्ञा – तीन तरह से प्राप्त हो सकती है..

2-1-आगम (श्रुति ) :वैदिक साहित्य के पठन अर्थात पढने से

2-2-ज्ञान से अनुमान : मनन अर्थात सोचने से

2-3-निर्विचार समाधि के उपरान्त

3-योगसूत्र के अनुसार , अंतिम प्रकार की प्रज्ञा – सर्वश्रेष्ठ होती है क्योंकि यह आत्म साक्षात्कार से प्राप्त होती है । स्मृति परिशुद्ध होने पर स्वरुप शून्य होकर अर्थमात्र दिखाई देने वाली, सब समाप्त करनेवाली अवस्था अचानक मिल जाती है – जिसका सतत प्रवाह – अध्यात्म रुपी प्रसाद है- ''प्रज्ञा'' । प्रज्ञा बुद्धि उस ऋषि को प्राप्त होती है जो मुक्ति को प्राप्त कर लेता है ।

4-हमारे कंठ के निचले भाग में ह्रदय चक्र होता है , उस चक्र में मेधावी बुद्धि का संक्षेप रमण करता है । उसमे ब्रह्माण्ड के सारे के सारे ज्ञान और विज्ञानं रमण करने लगता है । जैसे अंतरिक्ष में हमारे वाक्य रमण करते है , उस विद्या से जो वाक्य हम उच्चारण करना चाहते है , वही वाक्य अंतरिक्ष से हमारे समीप आने लगते है । उसी वाक्य के आरम्भ होने को मेधावी बुद्धि का ” ऋद्धि भूषणम ” कहा जाता है । इस भूषण को धारण करने से मानव का जीवन विकासदायक बनता है । वह नाना प्रकार के छल , दम्भ, आडम्बर आदि से दूर हो जाता है । और वह योगी त्रिकालदर्शी यानि भूत, भविष्यत् और वर्तमान तीनो कालों का ज्ञाता हो जाता है।

5-प्रज्ञावान का अर्थ है जो आत्मज्ञानी होकर ब्रह्मँ में लीन होकर मात्र ब्रह्मँकार्य समझकर ही सारा कार्य करता है,इसलिए उसे दिव्यदृष्टी के साथ परब्रह्मँ से वो परमज्ञान स्वत: ही प्राप्त होने लगता है जिसके लिए लाखों रिषी-मुनी युगों युगों तक तपस्या करते रहते हैं।

और जब एक बार कोई भी जीवात्माँ, आत्माँस्वरुप परमात्माँ में स्थिर हो जाता है,तो स्वत: ही आत्माँ में स्थिर होकर परमात्माँ का परम-ज्ञान प्राप्त कर लेता है।उसे फिर और कुछ

जानने को शेष नहीं रहता,वो महा-ज्ञानी महाँत्माँ हो जाता है,एैसे ही योगी को प्रज्ञावान सन्त कहते हैं।

क्‍या है "वृत्ति" शब्द का सामान्य अर्थ?-

"वृत्ति" शब्द का सामान्य अर्थ होता है-व्य''वहार ''।सामान्य रूप से किया गया व्यवहार ही 'वृत्ति' कहलाता है।वृत्ति, योग से सम्बन्धित एक शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ 'भँवर' है।

चित्त की वृत्तियां कौन कौन सी हैं?-

"मन की पांच तरह की वृत्तियाँ हैं- प्रमाण, विपर्याय, विकल्प, निद्रा एवं स्मृति। मन इन्हीं पांचों वृत्तियों में से किसी न किसी में उलझा रहता है।" (1)प्रमाण, अर्थात् प्रत्यक्ष अनुमान और आगम (2) विपर्यय, अर्थात् मिथ्याज्ञान (3) विकल्प, अर्थात् वस्तु शून्य कल्पित नाम (4) निद्रा (सोना) (5) स्मृति, अर्थात् पूर्व श्रुत और दृष्ट पदार्थ का स्मरण चित्त में आना।

1-पहली वृत्ति प्रमाण ;-

04 FACTS;-

1-मन प्रमाण खोजता रहता है, मन को निरंतर स्पष्ट ठोस प्रमाण की चाह रहती है, यह मन की गतिविधि का एक तरीका है।

प्रमाण तीन तरह के हैं-

1-1-प्रत्यक्ष

1-2-अनुमान

1-3-आगम

2-प्रत्यक्ष अर्थात जो स्पष्ट है, आपके अनुभव में है।जो भी अभी आप देख रहे हैं, वही सब प्रमाण है...किसी से आपको पूछने की भी जरुरत नहीं, यह प्रत्यक्ष है।

दूसरा है अनुमान, अर्थात जो उतना स्पष्ट नहीं है, आप उसे मान लेते है, विश्वास कर लेते है।

फिर है आगम, अर्थात शास्त्र, क्योंकि कहीं कुछ लिखा है इसीलिए आप उसे मान लेते है। लोग कहते हैं, देखो लिखा हुआ है और लोग उसका अनुसरण भी करते हैं। कई बार ऐसे भी मान लेते हैं क्योंकि कोई वैसा कहते हैं या कई सारे लोग वैसा करते हैं या कहते हैं- मन इसी तरह चलता है।

3-प्रमाण से मुक्ति ...आप निरंतर कुछ न कुछ प्रमाण ढूंढ़ते रहते हैं, यह मन की गतिविधि है, योग है इससे मुक्त हो जाना, योग है मन को इस वृत्ति से पुनः स्वयं में वापिस ले आना।

सत्य प्रमाण से परे है ..सत्य को प्रमाण से नहीं समझ सकते, जो भी प्रमाणित किया जा सकता है वो अप्रमाणित भी किया जा सकता है। सत्य प्रमाण और अप्रमाण के परे है ।ईश्वर प्रमाण के परे है- तुम न ईश्वर के होने का प्रमाण दे सकते हो न उनके न होने का। प्रमाण तर्क से जुड़ा हुआ है और तर्क का दायरा बहुत सीमित है। ऐसे ही प्रेम है,आत्मज्ञान है, … न तुम उसे प्रमाणित कर सकते हो न ही अप्रमाणित।

4-किसी के क्रियाकलाप उसके प्रेम का प्रमाण नहीं है, तुम्हें सब कुछ का प्रमाण चाहिए, कोई तुम्हें प्रेम करता है की नहीं, तुम्हें सबसे स्वीकृति चाहिए। प्रमाण मन की प्रमुख वृत्ति है, संसार में प्रमाण ही मुख्य है, जिसमे तुम फंस सकते हो।आत्मा इस सब के परे है।

आत्मा का संसार प्रमाण से परे है।

2-विपर्यय;-

02 FACTS;-

1-प्रमाण में मन तर्क वितर्क और जानकारियों में लगा रहता है अथवा मन मिथ्या ज्ञान

अथवा गलत समझ में उलझ जाता है।इस क्षण यदि आप सजगतापूर्वक परखें तो पाएंगें कि , वह ऐसा कुछ मान बैठता है जो वास्तविक नहीं होता है। अधिकतर समय हम अपने विचार, भावनाएं और राय दूसरों पर थोपते रहते हैं, हमें ऐसा लगता है कि वह इस तरह के हैं, मन की इसी वृत्ति को विपर्यय कहते हैं।

2-एकदम से कभी लोगों को लगता है कि उन्हें कोई प्रेम नहीं करता, कई बार बच्चो (बच्चों) को ऐसा लगता है कि उनके माता - पिता उनसे प्रेम नहीं करते, ऐसे में माता पिता परेशान