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क्या है रंग और प्रकाश में अन्तर ?क्या प्रकाश में प्रवेश ही अध्यात्म है?


क्या है रंगो का इतिहास?

07 FACTS;-

1-रंग हमारे जीवन का एक अभिन्न हिस्सा हैं। रंगों के माध्यम से ही प्रकृति की हरियाली से लेकर सूरज की सुनहरी रोशनी, आसमान का नीलापन, बादलों की काली घटाएं और चंद्रमा का उजलापन देख पाते हैं। बादलों में खिंचती सात रंगों की इंद्रधनुषी रेखा प्रत्येक रंग की सुंदर कहानी बयां करती है। जिसे देखकर मन रंगीन दुनिया का हिस्सा बन जाता है। आज जो रंग या वर्ण हमारे जीवन को रंगीन बनाये हुए हैं और जिनके होने से रंग-बिरंगी उड़ती तितलियों का सुखद अहसास होता है। इनका जन्म कब कहां और कैसे हुआ इसकी जिज्ञासा हमेशा से बनी रही है।

2-क्या कहता है इतिहास...ऐसा माना जाता है कि रंगों का जन्म लगभग 2000 ईसा पूर्व हुआ। धीरे-धीरे रंगों की छटा पूरे विश्व में फैल गयी। भारत में प्रारंम्भिक काल से ही रंगों का विशेष महत्व रहा है। मोहन जोदड़ों एव हड़प्पा की खुदाई में सिंधु घाटी सभ्यता में बर्तन एवं मूर्तियां पायी गई। साथ ही लाल रंग का कपड़ा भी मिला।

3-इतिहास के जानकारों के मुताबिक इस पर मजीठ या मजीष्ठा की जड़ से तैयार किया गया रंग चढ़ हुआ था। पूर्व में हजारों वर्ष तक मजीठ की जड़ और बक्कम वृक्ष की छाल लाल रंग के स्रोत थे। पीपल, गूलर और पाकड़ जैसे वृक्षों पर लगने वाली लाख कृमियों की लाह से महाउर रंग तैयार किया जाता था। पीला रंग और सिंदुर हल्दी से प्राप्त होता था।

4-प्राचीन मिस्र में रंगो का उपयोग ‘उपचार रंग’ के रूप में भी किया गया। मिस्र निवासी सूर्य की उपासना किया करते थे। जिनका मानना था कि सूर्य के प्रकाश के बिना जीवन असम्भव है। उन्होंने प्रकृति के रंगो के मुताबिक ही अपने मंदिरों को भी रंगा हुआ था। नीले आसमानी रंग से उनको काफी लगाव था। इनके कक्ष भी विभिन्न रंगों से सजे होते थे।

5-न्यूटन ...रंगों की रहस्यमय रंगीन दुनिया को जानने के लिए वैज्ञानिक और दार्शनिक हमेशा से ही जिज्ञासु रहे। परंतु इसका सटीक अध्ययन सबसे पहले न्यूटन ने किया। जिन्होंने यह कहकर सनसनी फैला दी कि रंग एक नहीं सात होते हैं। इसको प्रमाणित करने के लिए उन्होंने एक प्रयोग किया जिसमें एक अंधेरे कमरे में छोटे से छेद द्वारा सूर्य का प्रकाश आता था। यह प्रकाश एक प्रिज्म़ कांच द्वारा अपवर्तित होकर सफेद पर्दे पर पड़ता था।

6-पर्दे पर सफेद प्रकाश के स्थान पर इद्रधनुष के सात रंग दिखाई दिये। ये रंग लाल, नारंगी, पीला, हरा, आसमानी, नीला तथा बैंगनी हैं। जब न्यूटन ने प्रकाश के मार्ग में एक और प्रिज्म़ पहले प्रिज्म़ से उलटा रखा, तो इन सात रंगों का प्रकाश मिलकर पुनः सफेद रंग प्रकाश बन गया। इन्हीं सात रंगों को इन्द्रधनुष नाम से जाना जाता है।

7-"जब भी कोई व्यक्ति अपनी स्वस्फुरणा से जीता है, कवि हो, चित्रकार हो, मूर्तिकार हो, नर्तक हो, या इनमें से कुछ भी न हो, दुनिया पहचान सके ऐसा कुछ भी न हो, बिल्कुल साधारण-सा व्यक्ति हो, फिर भी उसके जीवन में काव्य होता है, सौंदर्य होता है, संवेदनशीलता होती है, क्योंकि उसके भीतर समाधि होती है।"

क्‍या है रंग और प्रकाश में अन्तर?-

07 FACTS;-

1-इस जगत में किसी भी चीज में रंग नहीं है। पानी, हवा, अंतरिक्ष और पूरा जगत ही रंगहीन है। यहां तक कि जिन चीजों को आप देखते हैं, वे भी रंगहीन हैं। रंग केवल प्रकाश में होता है।

2-रंग वह नहीं है, जो वो दिखता है, बल्कि वह है जो वो त्यागता है। आप जो भी रंग बिखेरते हैं, वही आपका रंग हो जाएगा। आप जो अपने पास रख लेंगे, वह आपका रंग नहीं होगा। ठीक इसी तरह से जीवन में जो कुछ भी आप देते हैं, वही आपका गुण हो जाता है। अगर आप आनंद देंगे तो लोग कहेंगे कि आप एक आनंदित इंसान हैं।

3-प्रकाश स्वयं रंगहीन है। सारे रंग प्रकाश के हैं, परंतु प्रकाश का कोई रंग नहीं है। प्रकाश मात्र रंगों का अभाव है। प्रकाश सफेद है। सफेद कोई रंग नहीं होता। जब प्रकाश विभाजित किया जाता है, विश्लेषित, किया जाता है अथवा प्रिज्म में से गुजारा जाता है, तो वह सात रंगों में बंट जाता है। मन भी प्रिज्म की तरह ही काम करता है-एक आंतरिक प्रिज्म की भांति।

4-बाहर का प्रकाश यदि प्रिज्म में से निकाला जाए, तो सात रंगों में बंट जाता है। आंतरिक प्रकाश भी यदि मन से निकाला जाए, तो सात रंगों में बंट जाता है। इसलिए आंतरिक यात्रा में रंगों का अनुभव हो, तो इसका मतलब है कि आप अभी भी मन में ही है।

5-प्रकाश का अनुभव मन से अतीत है, किंतु रंगों का अनुभव मन के भीतर है। यदि आपको अभी भी रंग ही दिखलाई पड़ते हैं, तो आप अभी मन में ही हैं। मन का अतिक्रमण अभी नहीं हुआ। इसलिए, पहली बात जो स्मरण रखने की है, वह यह है कि रंगों का अनुभव मन के भीतर ही है, क्योंकि मन प्रिज्म की तरह काम करता है, जिसमें से कि आंतरिक प्रकाश को बांटा जा सकता है। इसलिए सबसे पहले कोई रंगों को अनुभव करना प्रारंभ करता है। फिर रंग विलीन हो जाते हैं और केवल प्रकाश ही रह जाता है।

6-प्रकाश सफेद होता है। सफेद कोई रंग नहीं है। जब सारे प्रकाश एक हो जाते हैं, जब सारे रंग एक हो जाते हैं, तब सफेद निर्मित होता है।

जब सारे रंग मौजूद हों-अविभाजित, तब आप सफेद का अनुभव करते हैं। जब कोई रंग न हो, तब आप काले का अनुभव करते हैं। काला व सफेद दोनों ही रंग नहीं है। जब कोई रंग नहीं है, तब काला होता है। जब सारे रंग उपस्थित हों तो फिर सफेद है। और बाकी सारे रंग केवल विभाजित प्रकाश हैं।

7-इसलिए यदि आप भीतर रंगों को अनुभव करते हैं, तो फिर आप मन में हैं। अतः रंगों का अनुभव मानसिक है, वह आध्यात्मिक नहीं है। प्रकाश का अनुभव आध्यात्मिक है, किंतु रंगों का नहीं, क्योंकि जब मन नहीं है तो आप रंगों का अनुभव नहीं कर सकते। तब केवल प्रकाश का अनुभव होता है।

इन्द्रधनुषी रंगो के नामः-

विश्व की प्रत्येक सभ्यता ने रंगों का नामकरण अपनी समझ के अनुसार किया है। जिसका विभाजन दो भागों में किया गया है पहला हल्का यानि सफेद, दूसरा काला अर्थात चटक।

1-लालः

लाल रंग को रक्त रंग भी कहा जाता है। लाल रंग प्रकाश का संयोजी प्राथमिक रंग है। यह वर्ण हमारे मन आत्मविश्वास और आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

2-नारंगीः

यह रंग नारंगी फल के छिलके के रंग जैसा दिखता है। भारतीय तिरंगे में इस रंग का प्रयोग किया गया है। इस रंग से हमें त्याग की भावना आती है।

3-पीलाः

इस रंग में लाल और हरे रंग की मात्रा ज्यादा होती है एवं नीला वर्ण कम होता है। पीला रंग शुद्ध एवं सात्विक प्रवृत्ति का परिचायक है। यह रंग शुद्धता एवं निर्मलता का प्रतीक है।

4-हराः

यह इंद्रधनुष का चौथा रंग है। भारतीय तिरंगे में भी इस रंग का उपयोग किया गया है। यह रंग प्रकृति से संबंध और सम्पन्नता को दर्शाता है।

5-आसमानी रंगः

आसमान का रंग होने के कारण इसे आसमानी रंग कहा जाता है। इस रंग में नीले और सफेद रंग का मिश्रण होता है। यह द्वितीयक रंग के नाम से भी जाना जाता है।

6-नीलाः

इस रंग को प्राथमिक रंग भी कहा जाता है। भारत के राष्ट्रीय खेलों में भी नीला रंग प्रयोग किया जाता है। यह धर्म-निरपेक्षता को दर्शाता है।

7-बैंगनी रंगः

इन्द्रधनुष के रंगो का यह सातवां और अंतिम रंग है। जिसका नाम एक सब्जी बैंगन के आधार पर रखा गया है।

क्‍या है रंगों का असर?-

03 FACTS;-

1-रंगों में तीन रंग सबसे प्रमुख हैं- लाल, हरा और नीला। इस जगत में मौजूद बाकी सारे रंग इन्हीं तीन रंगों से पैदा किए जा सकते हैं।हर रंग का आपके ऊपर एक खास प्रभाव होता है ।कुछ लोग रंग-चिकित्सा यानी कलर-थेरेपी भी कर रहे हैं। वे इलाज के लिए अलग-अलग रंगों के पानी की बोतलों का प्रयोग करते हैं, क्योंकि रंगों का आपके ऊपर एक खास किस्म का प्रभाव होता है।

2-यह दुनिया रंग-बिरंगी या कहें कि सतरंगी है। सतरंगी अर्थात सात रंगों

वाली।लेकिन रंग तो मूलत: पांच ही होते हैं- कला, सफेद, लाल, नीला और पीला। काले और सफेद को रंग मानना हमारी मजबूरी है जबकि यह कोई रंग नहीं है। इस तरह तीन ही प्रमुख रंग बच जाते हैं- लाल, पीला और नीला।

3-आपने आग जलते हुए देखी होगी- उसमें यह तीन ही रंग दिखाई देते हैं। हालांकि विज्ञान पीले की जगह हरे रंग को मान्यता देता है।

जब कोई रंग बहुत फेड हो जाता है तो वह सफेद हो जाता है और जब कोई रंग बहुत डार्क हो जाता है तो वह काला पड़ जाता है। लाल रंग में अगर पीला मिला दिया जाए, तो वह केसरिया रंग बनता है। नीले में पीला मिल जाए, तब हरा रंग बन जाता है। इसी तरह से नीला और लाल मिलकर जामुनी बन जाते हैं। आगे चलकर इन्हीं प्रमुख रंगों से हजारों रंगो की उत्पत्ति हुई।

क्‍या है सात चक्र के रंग?-

05 FACTS;-

1-शास्त्र अनुसार हमारे शरीर में स्थित है सात प्रकार के चक्र। यह सातों चक्र हमारे सात प्रकार के शरीर से जुड़े हुए हैं। सात शरीर में से प्रमुख है तीन शरीर- भौतिक, सूक्ष्म और कारण। भौतिक शरीर लाल रक्त से सना है जिसमें लाल रंग की अधिकता है। सूक्ष्म शरीर सूर्य के पीले प्रकाश की तरह है और कारण शरीर नीला रंग लिए हुए है।

2-चक्रों के नाम ...मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्धि, आज्ञा और सहस्रार। मूलाधार चक्र हमारे भौतिक शरीर के गुप्तांग, स्वाधिष्ठान चक्र उससे कुछ ऊपर, मणिपुर चक्र नाभि स्थान में, अनाहत हृदय में, विशुद्धि चक्र कंठ में, आज्ञा चक्र दोनों भौंओ के बीच जिसे भृकुटी कहा जाता है और सहस्रार चक्र हमारे सिर के चोटी वाले स्थान पर स्थित होता है। प्रत्येक चक्र का अपना रंग है।

3-कहते हैं कि आत्मा का कोई रंग नहीं होता वह तो पानी की तरह रंगहीन है। लेकिन नहीं ... 'आत्मा' का भी रंग होता है। यह शोध और शास्त्र कहते हैं कि आत्मा का भी रंग होता है! -कुछ ज्ञानीजन मानते हैं कि नीला रंग आज्ञा चक्र का एवं आत्मा का रंग है। नीले रंग के प्रकाश के रूप में आत्मा ही दिखाई पड़ती है और पीले रंग का प्रकाश आत्मा की उपस्थिति को सूचित करता है।संपूर्ण जगत में नीले रंग की अधिकता है। धरती पर 75

प्रतिशत फैले जल के कारण नीले रंग का प्रकाश ही फैला हुआ है तभी तो हमें आसमान नीला दिखाई देता है। कहना चाहिए ‍कि कुछ-कुछ आसमानी है आत्मा।

4-ध्यान के द्वारा आत्मा का अनुभव किया जा सकता है। शुरुआत में ध्यान करने वालों को ध्यान के दौरान कुछ एक जैसे एवं कुछ अलग प्रकार के अनुभव होते हैं। पहले भौहों के बीच आज्ञा चक्र में ध्यान लगने पर अंधेरा दिखाई देने लगता है। अंधेरे में कहीं नीला और फिर कहीं पीला रंग दिखाई देने लगता है।

5-यह गोलाकार में दिखाई देने वाले रंग हमारे द्वारा देखे गए दृश्य जगत का रिफ्‍लेक्शन भी हो सकते हैं और हमारे शरीर और मन की हलचल से निर्मित ऊर्जा भी। गोले के भीतर गोले चलते रहते हैं जो कुछ देर दिखाई देने के बाद अदृश्य हो जाते हैं और उसकी जगह वैसा ही दूसरा बड़ा गोला दिखाई देने लगता है। यह क्रम चलता रहता है।जब नीला रंग आपको

अच्छे से दिखाई देने लगे तब समझे की आप स्वयं के करीब पहुंच गए हैं।

क्‍या है रंगो का महत्व?-

1-लाल रंग;-

03 FACTS;-

1-जो रंग सबसे ज्यादा आपका ध्यान अपनी ओर खींचता है वो है लाला रंग, क्योंकि सबसे ज्यादा चमकीला लाल रंग ही है।बहुत सी चीजें जो आपके लिए महत्वपूर्ण होती हैं, वे लाल ही होती हैं। रक्त का रंग लाल होता

है।उगते सूरज का रंग भी लाल होता है। मानवीय चेतना में अधिकतम कंपन लाल रंग ही पैदा करता है। जोश और उल्लास का रंग लाल ही है।

2-आप कैसे भी व्यक्ति हों, लेकिन अगर आप लाल कपड़े पहनकर आते हैं तो लोगों को यही लगेगा कि आप जोश से भरपूर हैं, भले ही आप हकीकत में ऐसे न हों। इस तरह लाल रंग के कपड़े आपको अचानक जोशीला बना देते है।

3-देवी (चैतन्य का नारी स्वरूप) इसी जोश और उल्लास का प्रतीक हैं। उनकी ऊर्जा में भरपूर कंपन और उल्लास होता है। देवी से संबंधित कुछ खास किस्म की साधना करने के लिए लाल रंग की जरूरत होती है।

2-नीला रंग;-

02 FACTS;-

1-नीला रंग सबको समाहित करके चलने का रंग है। आप देखेंगे कि इस जगत में जो कोई भी चीज बेहद विशाल और आपकी समझ से परे है, उसका रंग आमतौर पर नीला है, चाहे वह आकाश हो या समुंदर।

जो कुछ भी आपकी समझ से बड़ा है, वह नीला होगा, क्योंकि नीला रंग सब को शामिल करने का आधार है।

2- श्रीकृष्ण के शरीर का रंग नीला माना जाता है। इस नीलेपन का मतलब जरूरी नहीं है कि उनकी त्वचा का रंग नीला था। हो सकता है, वे श्याम रंग के हों, लेकिन जो लोग जागरूक थे, उन्होंने उनकी ऊर्जा के नीलेपन को देखा और उनका वर्णन नीले वर्ण वाले के तौर पर किया। श्रीकृष्ण की प्रकृति के बारे में की गई सभी व्याख्‍याओं में नीला रंग आम है, क्योंकि उनका स्वभाव सभी को साथ लेकर चलने वाला था।

3-काला रंग;-

02 FACTS;-

1- काला रंग कुछ भी परावर्तित नहीं करता , सब कुछ सोख लेता है।

अगर आप लगातार लंबे समय तक काले रंग के कपड़े पहनते हैं और तरह-तरह की स्थितियों के संपर्क में आते हैं तो आप देखेंगे कि आपकी ऊर्जा कुछ ऐसे घटने-बढऩे लगेगी कि वह आपके भीतर के सभी भावों को सोख लेगी और आपकी मानसिक हालत को बेहद अस्थिर और असंतुलित कर देगी।

2-लेकिन अगर आप किसी ऐसी जगह हैं, जहां एक विशेष कंपन और शुभ ऊर्जा है तो आपके पहनने के लिए सबसे अच्छा रंग काला है क्योंकि ऐसी जगह से आप शुभ ऊर्जा ज्यादा से ज्यादा आत्मसात करना चाहेंगे। शिव को हमेशा काला माना जाता है क्योंकि उनमें खुद को बचाए रखने की भावना नहीं है, इसलिए वह हर चीज को ग्रहण कर लेते हैं, किसी भी चीज का विरोध नहीं करते। यहां तक कि जब उन्हें विष दिया गया तो उसे भी उन्होंने सहजता से पी लिया।

4-सफेद रंग;-

02 FACTS;-

1-सफेद यानी श्वेत दरअसल कोई रंग ही नहीं है। कह सकते हैं कि अगर कोई रंग नहीं है तो वह श्वेत है। लेकिन साथ ही श्वेत रंग में सभी रंग होते हैं। तो जो लोग आध्यात्मिक पथ पर हैं और जीवन के तमाम दूसरे पहलुओं में भी उलझे हैं, वे अपने आसपास से कुछ बटोरना नहीं चाहते।

वे जीवन में हिस्सा लेना चाहते हैं, लेकिन कुछ भी इकट्ठा करना नहीं चाहते। आप इस दुनिया से निर्लिप्त होकर निकल जाना चाहते हैं। इस काम में श्वेत रंग आपकी मदद करता है, क्योंकि सफेद रंग सब कुछ बाहर की ओर बिखेरता है, कुछ भी पकडक़र नहीं रखता है।

2-ऐसे बन कर रहना अच्छी बात है। इसलिए जब आप आध्यात्मिक पथ पर आगे बढ़ते हैं और कुछ खास तरह से जीवन के संपर्क में आते हैं, तो सफेद वस्त्र पहनना सबसे अच्छा होता है। पहनावे के मामले में या आराम के मामले में, आप पाएंगे कि अगर एक बार आप सफेद कपड़े पहनने के आदी हो गए, तो दूसरे रंग के कपड़े पहनने में कहीं न कहीं अंतर आ ही जाएगा।

5-गेरुआ रंग;-

02 FACTS;-

1-यह रंग एक प्रतीक है। सुबह-सुबह जब सूर्य निकलता है, तो उसकी किरणों का रंग केसरिया होता है या जिसे भगवा, गेरुआ या नारंगी रंग भी

कह सकते हैं ।यही दिखाने के लिए आप गेरुआ रंग पहनते हैं कि आपके जीवन में एक नया सवेरा हो गया है। दूसरी चीज है बाहरी दुनिया। जब आप यह रंग पहनते हैं तो लोग जान जाते हैं कि यह सन्यासी है। ऐसे में आप से क्या बात करनी है और क्या बात नहीं करनी है, इसे लेकर भी वे थोड़े सावधान रहते हैं, तो इस तरह दुनिया से आपको मदद मिलती है।

2- हर चक्र का एक रंग होता है। हमारे शरीर में मौजूद सातों चक्रों का अपना एक अलग रंग है। भगवा या गेरुआ रंग आज्ञा चक्र का रंग है और आज्ञा ज्ञान-प्राप्ति का सूचक है। तो जो लोग आध्यात्मिक पथ पर होते हैं, वे उच्चतम चक्र तक पहुंचना चाहते हैं इसलिए वे इस रंग को पहनते हैं। साथ ही आपके आभामंडल का जो काला हिस्सा होता है, उसका भी इस रंग से शु़द्धीकरण हो जाता है।

क्या है वैराग्य -जो रंगों से परे है?

03 FACTS;-

1-। 'वैराग्य', वि+राग से व्युत्पन्न है, जिसका अर्थ राग से विलग होना है।वैराग्य का अर्थ है, खिंचाव का अभाव।राग का अर्थ है रंग। रंग से जो परे है, वह रंगहीन नहीं है, वह पारदर्शी है।

वैराग्य का मतलब है कि आप न तो कुछ रखते हैं और न ही कुछ परावर्तित करते हैं, यानी आप पारदर्शी हो गए हैं। अगर आप पारदर्शी हो गए हैं तो आपके पीछे की कोई चीज अगर लाल है, तो आप भी लाल हो जाते हैं। अगर आपके पीछे मौजूद कोई चीज नीली है, तो आप भी नीले हो जाते हैं। आपके भीतर कोई पूर्वाग्रह होता ही नहीं। आप जहां भी होते हैं, उसी का हिस्सा हो जाते हैं, लेकिन किसी भी चीज में फंसते नहीं हैं। 2-अगर आप लाल रंग के लोगों के बीच हैं, तो आप पूरी तरह से लाल हो सकते हैं, क्योंकि आप पारदर्शी हैं लेकिन वह रंग एक पल के लिए भी आपसे चिपकता नहीं। इसीलिए अध्यात्म में वैराग्य पर इतना जोर दिया जाता है।दुनिया के रंगमंच पर शानदार अभिनय के लिए इंसान को खुद को उच्चतर आयामों में विकसित करना होगा। हम जीवन की संपूर्णता को, जीवन के असली आनंद को तब तक नहीं जान पाएंगे जब तक हम उस आयाम तक न पहुंच जाएं जो राग व रंगों से परे है।

3-वैराग्य-महल की बुनियादी ईंट निष्काम चित्त है। कामना-शून्य होना एक कठिन काम है। हर आदमी कामनाओं की एक हरीभरी फसल होता है।

गीता में दो मार्ग है...

(1) प्रवृत्ति मार्ग (2)निवृत्ति मार्ग

प्रवृत्ति मार्ग में इन्द्रियों में मन लगाकर कर्मेन्द्रियों से कार्य करता रहता है-'भोगी' ,निवृत्ति मार्ग में प्राण की गति उलटी करके इन्द्रियों में मन न लगाकर कर्म करते रहता है-'योगी'।हमें श्रेय व प्रेय मार्ग वाले जीवनों में से से किसी एक का चयन करना है। दोनों का सन्तुलन ही सामान्य मनुष्य के लिए उत्तम है। जिनमें इस संसार को जानकर वैराग्य उत्पन्न हो जाता है।

क्या है रंगों का मनोविज्ञान ?-

10 FACTS;-

1-प्रकाश का अनुभव एक जैसा है, किंतु रंगों का अनुभव भिन्न-भिन्न है और श्रंखला भी भिन्न है।रंगों की कोई निश्चित श्रंखला नहीं है। हो भी नहीं सकती, क्योंकि प्रत्येक मन भिन्न है। किंतु प्रकाश का अनुभव भिन्न नहीं हो सकता,बिल्कुल एक जैसा है। प्रकाश का अनुभव चाहे बुद्ध करते हों,या जीसस, अनुभव वही है।

2-मन ही भेद निर्मित करता है ।हम सब अलग-अलग हैं-हमारे मन के कारण। यदि मन नहीं है तो वह जो कि बांटता है जो कि भिन्नता पैदा

करता है, नहीं है। प्रत्येक धर्म में अलग-अलग श्रंखला दी गई है। कोई विश्वास करते हैं कि यह रंग पहले आता है और वह रंग आखिर में आता है। दूसरे बिल्कुल ही अलग विश्वास करते हैं। वह भेद वस्तुतः मनों का भेद है।

3-उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति जो कि भयभीत है, जो कि गहराई से जड़ों तक भयातुर है, वह पीले रंग का सबसे पहले अनुभव करेगा। पहला जो रंग आएगा वह पीला होगा, क्योंकि पीला मृत्यु का रंग है-प्रतीकात्मक

रूप से नहीं, वरन वस्तुतः भी।यदि आप तीन बोतलें लें-एक लाल, एक पीली, और एक सफेद बिना किसी रंग की-और इसमें खाली पानी भर दें, तो पीले रंग की बोतल का पानी सब से पहले सड़ेगा, फिर बाद में दूसरी बोतलों का सड़ेगा। लाल रंग की बोतल का पानी सबसे अंत में सड़ेगा।

4-पीला मृत्यु का रंग है। इसीलिए बुद्ध ने अपने भिक्षुओं के लिए पीले रंग के वस्त्र चुने, क्योंकि बुद्ध कहते हैं कि इस अस्तित्व से बिल्कुल मर जाना ही निर्वाण है। इसलिए पीला रंग मृत्यु-रंग की तरह चुना गया।हिंदुओं

ने अपने संन्यासियों के लिए गेरुए रंग को चुना जो कि लाल का ही शेड (प्रकार) है, क्योंकि लाल अथवा गेरुआ प्रकाश का रंग है, जो कि पीले के विपरीत है। यह आपको अधिक जीवंत, अधिक चमकीला होने में मदद करता है।

5-गेरुआ रंग ज्यादा ऊर्जा पैदा करता है-प्रतीकात्मक रूप से नहीं बल्कि वास्तव में, भौतिक रूप से तथा रासायनिक रूप से भी। इसलिए जो व्यक्ति ज्यादा शक्तिशाली जीवंत व जीवन के प्रति अधिक प्रेम से भरा हो, वह सर्वप्रथम लाल रंग का अनुभव करेगा, क्योंकि उसका मन लाल के प्रति ज्यादा खुला होगा। एक भय-केंद्रित व्यक्ति पीले के प्रति ज्यादा खुला होगा। इसलिए श्रंखला भिन्न-भिन्न होगी। एक बहुत शांत आदमी, जो कि बहुत कुछ स्थिर है वह नीले रंग का सर्वप्रथम अनुभव करेगा। अतः यह सब निर्भर करेगा मन की वृत्ति पर, स्थिति पर।

6-यह कोई निश्चित श्रंखला नहीं है, क्योंकि तुम्हारे मन की कोई निश्चित श्रंखला नहीं है। प्रत्येक चित्त भिन्न है अपने केंद्र में, अपनी प्रवृत्तियों में, अपनी बनावट में, अपने चरित्र में। प्रत्येक मन अलग-अलग है। इन भिन्नताओं के कारण, श्रंखला भी भिन्न होगी। किंतु एक बात तय है कि प्रत्येक रंग का एक निश्चित अर्थ है।

7-श्रंखला निश्चित नहीं है; वह हो भी नहीं सकती। लेकिन रंग का अर्थ निश्चित है। उदाहरण के लिए, पीला मृत्यु का रंग है। इसलिए जब कभी वह पहला हो, तो उसका अर्थ होता है कि आप भय-केंद्रित व्यक्ति हैं। आपके मन का प्रथम द्वार भय के लिए है। अतः आप जब भी चल रहे होंगे, तो पहली चीज जो आपके ध्यान में आएगी वह भय होगा, अथवा आपके मन की पहली प्रतिक्रिया जो कि किसी भी नई स्थिति में होगी, वह भय की होगी। जब कभी कुछ भी विचित्र होगा, तो प्रथम संवेदन उसके प्रति भयपूर्ण होगा।

8-यदि लाल रंग प्रथम है आपकी अंतर्यात्रा में, तो आप जीवन के प्रति अधिक प्रेम से भरे हैं, और आपकी प्रतिक्रियाएं भिन्न होंगी। आप अधिक जीवंत होंगे, और आपकी प्रतिक्रियाएं जीवन के प्रति अधिक सहमति की

होंगी।एक व्यक्ति जिसका कि प्रथम अनुभव पीले का है, वह प्रत्येक चीज की मृत्यु के अर्थों में विवेचना करेगा, और जो व्यक्ति लाल रंग का प्रथम अनुभव करेगा, वह सदैव अपने अनुभवों को जीवन के अर्थों में बतलाएगा। 9-यहां तक कि यदि एक आदमी मर भी रहा हो, तो भी वह सोचेगा कि वह कहीं न कहीं फिर से पैदा होगा। मृत्यु में भी वह पुनर्जन्म की विवेचना करेगा। परंतु जिस व्यक्ति का पहला अनुभव पीले का होगा, यदि कोई जन्म भी ले रहा होगा, तो भी वह सोचने लगेगा कि वह एक दिन मर रहा होगा..ये रुख होंगे। अतः लाल रंग-केंद्रित व्यक्ति मृत्यु में भी प्रसन्न रह सकता है, किंतु पीला रंग-केंद्रित व्यक्ति जन्म में भी प्रसन्न नहीं हो सकता। वह निषेधात्मक होगा।

10-भय निषेधात्मक भाव है। सब जगह वह कुछ न कुछ ऐसा खोज लेगा, जो कि उदासीनता पूर्ण व निषेधात्मक हो।उदाहरण के लिए,एक बहुत शांत

व्यक्ति नीले रंग का अनुभव करेगा, किंतु इसका अर्थ है एक शांत व्यक्ति जो ..निष्क्रिय भी है।परंतु एक और शांत व्यक्ति जो सक्रिय भी है, वह हरे रंग का अनुभव पहले करेगा।

11-मोहम्मद साहब