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प्राण विद्या का क्या महत्व है?क्या है जैव/ प्राण विद्युत ?क्या प्राण विद्युत ही ''औरा'&#


प्राण विद्या का क्या महत्व है?

20 FACTS;-

1-भारतीय दर्शन में प्राण विद्या का विशेष महत्व है इस विद्या का जितना चिंतन तथा अध्ययन हमारे प्राचीन ऋषि मुनियों ने किया था उतना शायद ही किसी अन्य देश के विद्वानों ने किया होगा । प्राण के वास्तविक महत्व को समझना, इस शरीर तथा बाहरी जगत में उसके सच्चे कार्य तथा व्यापक प्रभाव को परखना, तथा किसी देवता का जप कर उस की उपासना करना । यह सब सिद्धांत इस भारत भूमि पर ही हमारे पूर्वजों की सात्विक बुद्धि तथा उर्वर मस्तिष्क के कारण ही प्राचीन काल में उत्पन्न हुए तथा अब भी हमें किसी न किसी रूप में दृष्टिगोचर होते हैं। 2-हमारी वैदिक संहिताओं में ऋग्वेद व अथर्ववेद की संहिता में सबसे पहले वर्णन किया गया मिलता है ।विद्वानों से यह अपरिचित नहीं कि उपनिषद में प्राण विद्या भरी पड़ी है। परंतु उपनिषदों में नहीं आरण्यक तथा संहिता में इस विद्या का यथेष्ट वर्णन उपलब्ध होता है। इस महत्वपूर्ण प्राण विद्या के प्रथम निर्देश तथा संकेत उपनिषदों से पूर्व वैदिक संहिताओं तथा आरण्यकों में भी मिलते हैं ।राजा दिवोदास के पुत्र प्रतर्दन को एक बार स्वर्ग देखने की इच्छा हुई। पिता की आज्ञा लेकर वे स्वर्ग गये।

3-प्रतर्दन के पुरुषार्थ और रण-चातुर्य से- इन्द्र अत्यन्त प्रभावित थे। उन्होंने प्रतर्दन का आदर-सत्कार किया और कहा- ‘‘मैं आपको क्या वर दूँ?” प्रतर्दन ने कहा- ‘‘भगवन्! मैं धन-धान्य, प्रजा-पुत्र, यश-वैभव-सब प्रकार से परिपूर्ण हूँ। आपसे क्या माँगू मुझे कुछ नहीं

चाहिये।”इन्द्र विहँस कर बोले- ‘‘वत्स, यह मैं जानता हूँ कि पुरुषार्थी व्यक्ति को संसार में कोई अभाव नहीं रहता। अपने सुख-समृद्धि के साधन वह आप जुटा लेता है तो भी उसे विश्व-हित की कामना करनी चाहिये। लोक-सेवा के पुण्य से बढ़कर पृथ्वी में और कोई सुयश नहीं तुम उससे ब्रह्म को प्राप्त होंगे। इसलिये मैं तुम्हें लोक का कल्याण करने वाली प्राण विद्या सिखाता हूँ।”

4-इसके बाद इन्द्र ने प्रतर्दन को प्राण तत्व का उपदेश दिया। उन्होंने कहा- ‘‘प्राण की ब्रह्म है। साधनाओं द्वारा योगी, ऋषि-मुनि अपनी आत्मा में प्राण धारण करते और उससे विश्व का

कल्याण करते हैं।”‘कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद्’ के दूसरे अध्याय में भगवान् इन्द्र ने प्रतर्दन को यह प्राण विद्या सिखाई है, उसका बड़ा ही मार्मिक एवं महत्त्वपूर्ण उल्लेख है।

5-इसी संदर्भ में इन्द्र ने, एक व्यक्ति अपनी असीम प्राण-शक्ति को दूसरों तक कैसे पहुँचाता है, प्राण-शक्ति के माध्यम से दूसरों तक अंतःप्रेरणायें और विचार किस तरह पहुँचाता है, इस रहस्य का उद्घाटन करते हुए बताया है-

''जब मन विचार करता है, तब अन्य सभी प्राण उसके सहयोगी होकर विचारवान् हो जाते हैं, नेत्र किसी वस्तु को देखने लगते हैं तो अन्य प्राण उनका अनुसरण करते हैं। वाणी जब कुछ कहती है, तब अन्य प्राण उसके सहायक होते हैं। मुख्य प्राण के कार्य में अन्य प्राणों का पूर्ण सहयोग होता है।''

6-अन्यत्र श्लोक में बताया है कि मन सहित सभी इन्द्रियों को निष्क्रिय करके आत्म-शक्ति (संकल्प-शक्ति) को प्राणों में मिला देते हैं। ऐसा पुरुष ‘दैवी परिमर’ का ज्ञाता होता है। वह अपनी प्राण-शक्ति से किसी को भी प्रभावित और प्रेरित कर सकता है। उसके संदेश को कहीं भी सुना और हृदयंगम किया जा सकता है। उसके प्राणों में अपने प्राण जागृत कर सकते हैं। जिस पुरुष को दैवी परिमर का ज्ञान होता है। उसकी आज्ञा को पर्वत भी अमान्य नहीं कर सकते। उससे द्वेष रखने वाले सर्वथा नष्ट हो जाते हैं।

7-इसी उपनिषद् में यह भी निर्देश है कि जब पिता को अपने अन्तकाल का निश्चय हो जाय तो पुत्र (अथवा गुरु, शिष्य या शिष्यों) में अपनी प्राण-शक्ति को प्रतिष्ठित कर दे। वह वाक् प्राण, धारण, चक्षु, क्षोभ, गतिशक्ति, बुद्धि आदि प्रदान करें और पुत्र उसे ग्रहण करे। इसके बाद पिता या गुरु संन्यासी होकर चला जाये और पुत्र या शिष्य उसका उत्तराधिकारी हो जाये।

8-प्राचीनकाल में यह परम्परा आधुनिक सशक्त यन्त्रों की बेतार-के-तार की भाँति प्रचलित थी। प्राण विद्या के ज्ञाता गुरु अपने प्राण देकर शिष्यों के व्यक्तित्व और उनकी क्षमतायें बढ़ाया करते थे। इसी कारण श्रद्धा विनत होकर लोग ऋषि आश्रमों में जाया करते थे। ऋषि अपने प्राण देकर उन्हें तेजस्वी, मेधावान् और पुरुषार्थी बनाया करते थे। महर्षि धौम्य ने आरुणी को, गौतम ने जाबालि को, इन्द्र ने अर्जुन को, यम ने नचिकेता को, शुक्राचार्य ने कच का इसी तरह उच्च स्थिति में पहुँचाया था।

9-योग्य गुरुओं द्वारा यह परम्परायें, अब भी चलती रहती हैं। परमहंस स्वामी रामकृष्ण ने विवेकानन्द को शक्तिपात किया था। स्वामी विवेकानन्द ने सिस्टर निवेदित में प्राण प्रत्यार्पित किये थे। महर्षि अरविन्द ने प्राण शक्ति द्वारा ही सन्देश भेजकर पाँडिचेरी आश्रम की संचालिका मदिति-सह भारत-माता की सम्पादिका ‘श्री यज्ञ शिखा पां’ को पेरिस से बुलाया था और उन्हें योग विद्या देकर भारतीय दर्शन का निष्णात बनाया था।

10-कहते हैं जब राम वनवास में थे, तब लक्ष्मण अपने तेजस्वी प्राणों का संचालन करके प्रत्येक दिन की स्थिति के समाचार अपना धर्मपत्नी उर्मिला तक पहुँचा देते थे। उर्मिला उन सन्देशों को चित्रबद्ध करके रघुवंश परिवार में प्रसारित कर दिया करती थी और बेतार-के-तार की तरह के सन्देश सबको मिल जाया करते थे।

11-अनुसुइया आश्रम में अकेली थीं। भगवान् ब्रह्मा, विष्णु और महेश वेष बदलकर परीक्षार्थ आश्रम में पहुँचे। अत्रि मुनि बाहर थे। उन्होंने ही भगवान् के त्रिकाल रूप को पहचाना था और वह गुप्त सन्देश अनुसुइया को प्राण-शक्ति द्वारा ही प्रेषित किया था। ऐसी कथा-गाथाओं से सारा हिन्दू-शास्त्र भरा पड़ा है।आज का विज्ञान सुखी समाज इन उपाख्यानों की तर्क की

दृष्टि से देखता है। लोग शक और सन्देह करते हैं, कहते हैं, ऐसा भी कहीं सम्भव है कि एक मनुष्य दूसरे मनुष्य को बिना किसी उपकरण या माध्यम के सन्देश पहुँचा सके।

12-यदि विचारपूर्वक देखें तो विज्ञान भी इसकी पुष्टि ही करेगा। बेतार-के-तार के सिद्धान्त को कौन नहीं जानता? शब्द को विद्युत तरंगों में बदल देते हैं। यह विद्युत तरंगें ईथर तत्त्व में धारायें बनकर प्रवाहित होती हैं। ट्रान्समीटर जितना शक्तिशाली होता है, विद्युत तरंगें उतनी ही दूर तक दरदराती चली जाती हैं। उसी फ्रीक्वेंसी में लगे हुये दूसरे वायरलेस या रेडियो उन ध्वनि तरंगों को पकड़ते हैं और पुनः शब्दों में बदल देते हैं, जिससे वे पास बैठे हुए लोगों को सुनाई देने लगती हैं।अब इस बात में तो कोई अविश्वास कर ही नहीं सकता।

13-जो बात बोली जाती है, वह पहले विचार रूप में आती है, अर्थात् विचारों का अस्तित्व संसार में विद्यमान है। ऊपर बताया गया है कि मन या विचार शक्ति प्राण में मिल जाती है तो सभी प्राण उसके सहायक हो जाते हैं, अर्थात् प्राणों के माध्यम से अपने शरीर की संपूर्ण चेतना को जिसमें हाव-भाव, क्रिया-कलाप, विचार भावनायें सम्मिलित होती हैं, किसी भी दूरस्थ व्यक्ति तक पहुँचाया जा सकता है।

14-19 जुलाई 1964 धर्मयुग के पेज 20 में श्री अजीतकृष्ण वसु ने अपने जीवन की एक घटना का उल्लेख किया है। वे लिखते हैं- ‘‘हमारे एक मित्र के घर पार्टी थी। उसमें हमारे अनेक मित्र सम्मिलित थे। हमारे साथ एक जादूगर भी थे। संयोगवश टेलीपैथी पर बात चल पड़ी। गृहस्वामी ने बताया कि उनका टेलीपैथी में कोई विश्वास नहीं। एक साथी ने कहा कि भाई दूर बैठे व्यक्ति को केवल मानसिक शक्ति द्वारा ही संदेश दिया जा सकता है, उन्होंने ईथर में तरंगों वाली बात भी बताई तो भी कोई उसे मानने को तैयार न हुआ।

15-इसी बीच जादूगर मित्र ने कहा- क्यों न प्रत्यक्ष देख लिया जाये कि विचार संचालन और प्रेषण संभव है क्या? उसके लिये सब लोग तैयार हो गये।पहला प्रयोग गृहस्वामी

और उक्त मित्र ने किया जो काफी दिनों से विचार प्रेषण का अभ्यास कर रहे थे। उन्होंने अपने प्रयोग के लिये अपना एक साथी भी चुना था पर वे उस समय उपस्थित न थे। जादूगर ने कहा- ‘‘मैं अपने मन में एक रंग निश्चित करूंगा, फिर संकल्प द्वारा उसे मन-ही-मन में तुम्हें बताऊँगा। मेरा प्रसारण इतना तीव्र होगा कि तुम्हारे मन में भी उसी रंग का नाम और छाया-चित्र आयेगा।”

16-इसके बाद उन्होंने एक चिट में कुछ लिखा और उसे एक मित्र की जेब में डाल दिया। दोनों व्यक्ति 50 गज के फासले पर बैठे। जादूगर ने ध्यान-मग्न होकर सन्देश भेजा। इसके बाद गृहस्वामी से पूछा गया तुम्हारे मन में कौन-सा रंग आया तो उन्होंने कहा- ‘‘हरा” इसके बाद वह चिट निकालकर देखी गई तो लोग आश्चर्य चकित रह गये कि उसमें भी ‘हरा’ ही लिखा है।

17-इतने पर भी गृहस्वामी सन्तुष्ट न हुये उन्होंने कहा- ‘‘संयोग से ही ऐसा हुआ।” इस पर जादूगर ने कहा- ‘‘अब आप लोग मुझे कोई भी गिनती दीजिये। मैं उसे अपने ‘प्रयोग वाले मित्र’ को प्रेषित करूंगा, आप फोन पर पता लगाइये, वह घर हैं या नहीं।” संयोग से वह घर पर ही थे। 9 की संख्या दी गई। इधर जादूगर ने ध्यान मग्न होकर अपने मित्र को वह संख्या विचार संचालन द्वारा मन-ही-मन सुनाई। जब वे उठ बैठे तो फोन से पूछा गया, आपने कौन-सी संख्या सुनी तो उधर से उत्तर आया- ऐसा लगता है 9 की संख्या भेजी गई है। इस पर सभी लोग दंग रह गये और उपस्थित सभी व्यक्तियों ने यह मान लिया कि विचार संचालन विद्या गलत नहीं है।

18-एक ही समय में परस्पर उन्मुख या याद करते हुए व्यक्ति को चलते-फिरते कितनी ही दूरी पर प्राण प्रेषित करने का एक उदाहरण मालवीय जी के परिवार में घटित हुआ। “एक दिन स्वर्गीय मदनमोहन मालवीय जी के पुत्र श्री गोविन्द मालवीय एकाएक बेचैन हो उठे। सर्दी के दिन थे पर उनका शरीर एकाएक आग की तरह गर्म हो उठा। बहुत जाँच की गई पर पता न चला ऐसा क्यों हो रहा है? रात के नौ बजे तक उनकी बेचैनी बढ़ती ही गई।”

19-मालवीय जी की धर्मपत्नी इलाहाबाद में थीं। रात नौ बजे यहाँ से टेलीफोन गया और तब पता चला कि वे (श्री गोविंद मालवीय की माताजी) आग सेंकते हुये बुरी तरह जल गई हैं। दादी जी उन्हें बहुत प्यार करती थीं। इसलिये जलने के बाद से ही वे बराबर इन्हीं का ध्यान करती रहीं। उनकी मृत्यु भी तभी हुई जब श्री गोविन्द मालवीय प्रयाग आ गये। जैसे ही उनकी मृत्यु हुई उनकी जलन और बुखार एकदम समाप्त हो गया। इस घटना से यह पुष्टि होती है कि तीव्र स्मृति और ध्यान के माध्यम से अपने समीपवर्ती वातावरण तक चित्रण किया जा सकता है।

20- जो ऐसी विद्यायें जानते हैं, वह दूर के सन्देश प्राप्त भी कर सकते हैं और लोगों को दे

भी सकते हैं।यह तब ध्यान और प्राण विद्या के छोटे-छोटे चमत्कार हैं। उसकी संपूर्ण और अगाध जानकारी तो किन्हीं योग और साधना-निष्ठ व्यक्तियों को होती है। ऐसे महापुरुष का सान्निध्य उनके समीप्य और ध्यान का लाभ लेकर कोई प्राणवान बन सकता है।

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05 FACTS;- 1-प्राणियों में काम करने वाली ऊर्जा को वैज्ञानिकों ने जैव विद्युत नाम दिया है। शरीर संचार की समस्त गतिविधियाँ तथा मस्तिष्कीय हलचलें रक्तमाँस जैसे साधनों से नहीं शरीर में संव्याप्त विद्युत प्रवाह द्वारा परिचालित होती है। यही जीवन−तत्व बनकर रोम−रोम में व्याप्त है। मानवी विद्युत की यह मात्रा जिसमें जितनी अधिक होगी वह उतना ही ओजस्वी, तेजस्वी और मनस्वी होगा। प्रतिभाशाली, प्रगतिशील, शूरवीर, साहसी लोगों में इसी क्षमता की बहुलता होती है। शरीर संस्थान में इसकी न्यूनता होने पर विभिन्न प्रकार के रोग शीघ्र ही आ दबोचते हैं। मनःसंस्थान में इसकी कमी होने से अनेकों प्रकार के मनःरोग परिलक्षित होने लगते हैं।

2-मनुष्य शरीर में बिजली का कितना भण्डार है इसकी नाप-तौल अब होने लगी है। देखा गया है कि उससे 60 वाट का बल्ब तक जल सकता है। समस्त शरीर में संव्याप्त और कार्यरत बिजली का यदि पूरा आँकलन किया जा सके तो प्रतीत होगा कि व्यक्ति चलते-फिरते जनरेटर के रूप में गतिशील रहता है। अभी अमेरिका में ऐसे 20 से अधिक मनुष्य जीवित हैं, जिनका शरीर झटके देता है। वस्तुओं को इधर-उधर उठक-पटक कर देता है।

कई व्यक्ति इस भीतरी विद्युत के उबल पड़ने पर अकारण ही जलकर भस्म हो चुके हैं। इससे हर मनुष्य में बिजली जैव विद्युत की एक अच्छी खासी मात्रा होने की सम्भावना देखी जा रही है और यह सोचा जा रहा है कि उसको बढ़ाने या लाभ उठाने का तरीका क्या हो सकता है?

3-जैव विद्युत भौतिक बिजली से सर्वथा भिन्न है जो विद्युत यन्त्रों को चालित करने के लिए प्रयुक्त होती है। मानवी विद्युत का सामान्य उपयोग शरीर को गतिशील तथा मन, मस्तिष्क को सक्रिय रखने में होता है। असामान्य पक्ष मनोबल, संकल्पबल, आत्मबल के रूप में परिलक्षित होता है, जिसके सहारे असम्भव प्रतीत होने वाले काम भी पूरे होते देखे जाते हैं। “ट्रान्सफार्मेशन ऑफ एनर्जी” सिद्धान्त के अनुसार मानवी विद्युत सूक्ष्मीभूत होकर प्राण ऊर्जा और आत्मिक ऊर्जा के रूप में संग्रहित और परिशोधित परिवर्तित हो सकती है। इस ट्रान्सफार्मेशन के लिए ही प्राणानुसन्धान करना और प्राण साधना का अवलम्बन लेना पड़ता है।

4-शरीर में काम करने वाली जैव विद्युत में कभी−कभी व्यतिरेक होने से गम्भीर संकटों का सामना करना पड़ता है। भौतिक बिजली का जैव विद्युत में परिवर्तन असम्भव है, पर जैव विद्युत के साथ भौतिक बिजली का सम्मिश्रण बन सकता है। कईबार ऐसी विचित्र घटनाएँ देखने में आयी हैं जिनमें मानवी शरीरों को एक जेनरेटर−डायनेमो के रूप में काम करते पाया गया है।

5-आयरलैंड की एक युवती जे. स्मिथ के. शरीर को छूते ही बिजली के नंगे तारों की भाँति तेज झटका लगता था। जब तक वह जिन्दा रही , घर के सदस्यों के लिए एक समस्या बनी हुई थी। डॉ. एफ. क्राफ्ट ने उसके शरीर का परीक्षण किया तथा यह बताया कि उक्त युवती की काया से निरन्तर भौतिक बिजली की भाँति विद्युत प्रवाहित होती रहती है।

शरीर से विद्युत भौतिक बिजली की तरह क्यों प्रवाहित होती है?-

11 FACTS;-

1-शरीर से विद्युत भौतिक बिजली की तरह क्यों प्रवाहित होती है, इस सम्बन्ध में अनेकों स्थानों पर खोजबीन हुई है तथा महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकलें हैं। कोलोराडो के डॉ. डब्ल्यू पी. जेन्स और उनके मित्र डॉ. नार्मलोंग ने विस्तृत खोज के बाद बताया कि मनुष्य शरीर की प्रत्येक कोशिका एक छोटी किन्तु सजीव विद्युत घर है। कोशिका के नाभिक में विद्युत की प्रचण्ड मात्रा भरी पड़ी है। किसी अविज्ञात व्यतिरेक के कारण सन्निहित कोशिकाओं की विद्युतधारा फूटकर बाहर निकलने लगती है।

2-‘सोसाइटी ऑफ फिजीकल रिसर्च’ की रिपोर्ट है कि शरीर की कोशाओं के नाभिकों के आवरण ढीले पड़ने के कारण बिजली उसे चीरती हुई बाहर प्रवाहित होने लगती है। शरीर विद्युत पर शोध करने वाले डॉ. ब्राउन का मत है कि मनुष्य शरीर की प्रत्येक कोशिका में विद्युत भण्डार भरा पड़ा है। उनके अनुसार शारीरिक एवं मानसिक गतिविधियों के संचालन के लिए जितनी बिजली खर्च होती है उससे एक बड़ी कपड़ा मिल चल सकता है। छोटे बच्चे के शरीर में संव्याप्त विद्युत शक्ति से रेल इंजन को चलाना सम्भव है।

3-प्रसिद्ध ‘टाइम्स’ पत्रिका में ओण्टोरियो (कनाडा) की कैरोलिन क्लेयर नामक एक महिला विस्तृत वृत्तान्त छपा था, जिसमें उल्लेख था कि यह महिला डेढ़ वर्ष तक बीमार पड़ी रही, पर जब स्थिति सुधरी तो उसमें एक नया परिवर्तन यह हुआ कि उसके शरीर से विद्युतधारा बहने लगी। यदि वह किसी धातु से बनी वस्तु को छूती, उसी से चिपक जाती। छुड़ाने में बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ता।

4-फ्रांस से प्रकाशित होने वाले ‘मेडिकल टाइम एण्ड गजट’ में एक ऐसे ही लड़के का विवरण छपा था जिसके शरीर से सतत् विद्युत धाराएँ निकलती थीं। लियोन्स नामक व्यक्ति के घर जन्मा शिशु जब सात माह का हुआ तभी से उसको छूने से झटके लगते थे। माँ जब उसे दूध पिलाने के लिए अपनी छाती से चिपकाती तो उसे तेज झटक लगता था। कितनी बार वे बेहोश हो गयीं। बाद में उन्होंने बच्चे को अपना दूध पिलाना ही बन्द कर दिया। उसके लिए बाहरी दूध की व्यवस्था बनानी पड़ी। माँ−बाप के प्यार से वंचित यह दुर्भाग्यशाली लड़का कमरे के एक कोने में पड़ा रहता। भय वश उसे कोई उठाता नहीं था। इस माह तक यह बालक किसी तरह जीवित रहा, पर मरते समय उसके शरीर से नीले वर्ण का प्रकाश निकलते देखा गया जिसका फोटो भी खींचा गया था।

5-कुमारी जेनी मार्गन को चलते−फिरते पावर हाउस के रूप में ख्याति मिली। 13 वर्ष की आयु के बाद उसके शरीर से विद्युत शक्ति प्रचण्ड रूप से उभर कर प्रकट हुई। एक वैज्ञानिक ने प्रयोग करने के लिए जेनी को छुआ तो इतना तीव्र झटका लगा कि वे घण्टों बेहोश रहे। एक लड़के ने प्रेमवश उसका हाथ पकड़ा तो दूर जा गिरा। स्नेहवश जेनी ने एक बिल्ली को उठाकर अपने हृदय से लगा लिया पर बिल्ली के लिए जेनी का प्रेम अत्यन्त महंगा पड़ा। वह न केवल मूर्च्छित हो गयी बल्कि कुछ ही समय बाद चल बसी। जेनी अपने हाथ के स्पर्श से सौ वाट का बल्ब जला देती थी।

6-आस्ट्रेलिया के एक बाईस वर्षीय युवक को उपचार के लिए न्यूयार्क लाया गया। उसका शरीर विद्युत बैटरी की भाँति काम करता था। छोटे−छोटे बल्ब उसके शरीर से स्पर्श कराके जलाये गये। पर उसके शरीर में विद्युत प्रवाह पूरे दिन एक समान नहीं रहता अपितु सूर्य के ताप की भाँति घटता−बढ़ता रहता था। जब आवेश कम होता तो बेचैनी और थकान महसूस करता। वह प्रायः अधिक फास्फोरस युक्त खाद्य−पदार्थों को खाना पसन्द करता था।

शरीर विद्युत का असन्तुलन कभी−कभी भयंकर विग्रह खड़ा करता देखा गया है तथा जीवन−मरण जैसे संकट प्रस्तुत कर देता है।

7-अमेरिका के सेण्ट पीटर्स (फ्लोरिडा)की रहने वाली महिला श्रीमती मेरीहार्ड रोजर अपने मकान में विचित्र रूप से जली पायी गयीं। दिन के 10 बजे तक दरवाजा न खुलने पर पड़ौसियों ने कमरे का दरवाजा खटखटाना चाहा पर कुन्दा छूते ही एक पड़ौसी छिटककर दूर जा गिरा। उपस्थित लोगों ने समझा सम्भवतः मकान में बिजली का करेंट दौड़ गया हो। मेन स्विच ऑफ किया गया पर विद्युतधारा अभी भी प्रवाहित हो रही थी। बिजली के विशेषज्ञों ने पूरी जाँच−पड़ताल कर ली पर कहीं भी गड़बड़ी नहीं पायी गयी। किसी प्रकार दरवाजा तोड़ा गया। श्रीमती रोजर्स का शरीर राख का ढेर बना फर्श पर पड़ा था। कमरा अभी भी भट्टी जैसा गरम था।

8-पुलिस को सूचना मिली। साथ ही शरीर शास्त्रियों का एक विशेष दल अध्ययन के लिए आया। डॉ. विल्टन क्राग ने लम्बी खोजबीन की। उन्होंने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए कहा कि शरीर को भस्मीभूत करने के लिए तीन हजार फारेनहाइट तापमान चाहिए। यह केस ‘स्पान्टेनियस ह्युमन कम्बशन’ (अपने आप जल उठाना) का है। श्रीमती रोजर्स अपनी ही शरीराग्नि से जलकर मरी हैं न कि भौतिक विद्युत से।

9-फ्लोरिडा की सड़क पर जाते समय एक व्यक्ति के शरीर से अचानक आग की–नीली लपटें निकलने लगीं। उसके साथ चलने वालों में से एक ने बाल्टी भर पानी डाल दिया तो आग कुछ क्षणों के लिए थम गयी पर थोड़े ही देर बाद पुनः भभक उठीं और देखते ही देखते कुछ ही मिनटों में वह व्यक्ति राख की ढेर में परिवर्तित हो गया।

10-एक स्थानीय मेडिकल जनरल में छपी इस घटना पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए फ्लोरिडा के वैज्ञानिकों ने कहा कि–शरीर में नब्बे प्रतिशत जल की मात्रा विद्यमान होते हुए भी अपनी ही शरीराग्नि द्वारा कुछ ही क्षणों में जलकर मरना विज्ञान जगत के लिए एक अनोखी घटना है जो यह बताती है कि शरीर शास्त्रियों को शरीर के विषय में जितना ज्ञान है उसकी तुलना में कई गुना अधिक अभी रहस्यमय है।

11-सेनफ्रांसिस्को में 31 जनवरी 1959 को लैगूना होम नामक स्थान पर जहाँ वृद्धों की देखरेख काम एक सरकारी संस्था करती है, कार्यकर्त्ताओं द्वारा शाम को दूध वितरित किया जा रहा था। अचानक लाइन में दूध के लिए लगे वृद्ध जैक लार्चर के शरीर से अग्नि की ज्वालाएं निकलने लगीं। बचाव के लिए ऊपर कम्बल डाला गया पर कुछ ही सेकेंडों में वह भस्मी भूत हो गया। अग्नि बुझाने के अन्यान्य प्रयास भी असफल सिद्ध हुए। मात्र पाँच मिनट में ही जैक लार्चर का शरीर राख की ढेरी में बदल चुका था।

NOTE;-

ये घटनाएँ मानव शरीर में सन्निहित प्रचण्ड−प्राण शक्ति का परिचय देती हैं। जिसके व्यतिरेक द्वारा गम्भीर संकटों का सामना भी करना पड़ सकता है। प्राण पर नियंत्रण–परिशोधन और उसका संचय अभिवर्धन किया जा सके तो मनुष्य असामान्य शक्ति का स्वामी बन सकता है।

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क्या प्राण विद्युत ही ''औरा'' है?-

08 FACTS;-

1-''औरा'' का अर्थ होता है प्राणों का तेजोवलय। ''औरा'' व्यक्ति के आभामंडल को कहते हैं। हर व्यक्ति का अपना एक प्रभाव होता है और उसमें इस औरा का खास महत्व होता है। स्वयं को प्रभावशाली बनाने के लिए ओराऔरा का प्रभावी होना आवश्यक है। बल्ब की रौशनी की तरह स्थूल शरीर के बाहर भी प्राणों का तेजोवलय/औरा होता है। जो आधुनिक औरा उपकरणों के माध्यम से देखा या मापा जा सकता है। जर्मन विद्युत विज्ञानी रीकन वेक इसे एक विशेष प्रकार की ‘अग्नि’ मानते हैं। उसका बाहुल्य वे चेहरे के इर्द-गिर्द मानते हैं। और ‘ओरा’ नाम देते हैं।

2-शरीर में तापमान भी होता है और हलचल भी। इन्हीं के आधार पर जीवनचर्या चलती है। इन दोनों प्रयोजनों को साधने वाली शक्ति का नाम है ''जैव विद्युत''। इसका भण्डार जिसमें जितना अधिक है वह उतना ही ओजस्वी, तेजस्वी माना जाता है। सूक्ष्म शरीर का प्रतीक तेजोवलय/प्राण ऊर्जा/औरा होती है।

3-जीवित व्यक्ति के चारों ओर इसे छाया हुआ देख सकना अब सम्भव हो गया है। यह चेहरे के इर्द-गिर्द अधिक स्पष्ट और घनीभूत होता है।प्रजनन अंगों में उन्होंने इस अग्नि की मात्रा चेहरे से भी अधिक परिमाण में पाई है। दूसरे शोधकर्ताओं ने नेत्रों में तथा उँगलियों के पोरवों में उसका अधिक प्रवाह माना है।

4-देवी देवताओं के चित्रों में उनके चेहरों के इर्द-गिर्द यह तेजस् आभा मण्डल के रूप में देखा जा सकता है। महामानवों- ऋषियों के चेहरे पर एक विशेष ज्योति छाई रहती है। इसका प्रभाव क्षेत्र दूर-दूर तक होता है। वे उसके द्वारा दूसरों को प्रभावित कर लेते हैं, आकर्षित एवं सहमत भी। विरोधियों को सहयोगी बना लेना इनके बाँये हाथ का खेल होता है। आक्रमणकारी उनके निकट पहुँचते-पहुँचते हक्का-बक्का हो जाते हैं।

5-इस तेजस् को अध्यात्मवादी साधक अपनी खुली आँखों से भी देख सकते हैं और उसका स्तर देखकर किसी के व्यक्तित्व एवं मनोभावों का पता लगा लेते हैं। अब नई वैज्ञानिक खोजों के आधार पर इस तेजोवलय के आधार पर मनुष्य की शारीरिक और मानसिक रुग्णता का पता लगाने और तद्नुरूप उपचार करने लगे हैं। अध्यात्मवादी इसी तेजोवलय को देखकर उसके चिन्तन, चरित्र एवं स्तर का पता लगा लेते हैं।

6-प्राण विश्वव्यापी है। उसी का एक अंश जब जीवधारी को मिल जाता है तो वह प्राणियों की तरह अपनी क्षमता का परिचय देने लगता है। यह प्राण प्रत्यक्ष शरीर में तो होता ही है उसे यन्त्र उपकरणों से जैव विद्युत के रूप में आँका और मापा जा सकता है। इसकी घट-बढ़ भी विदित होती रहती है। घटने पर दुर्बलता आ दबोचती है। इन्द्रियों में तथा उत्साह में शिथिलता प्रतीत होती है। इसकी पर्याप्त मात्रा रहने पर मन और बुद्धि अपना काम करती है। उत्साह और साहस- पराक्रम और पुरुषार्थ- अपनी प्रदीप्त गतिविधियों का परिचय देने लगता है।

7-शरीर जल, अग्नि, वायु, आकाश, पृथ्वी से बना है। अतः प्राण के तेजोवलय में वृद्धि इनमें से किसी भी माध्यम से किया जा सकता है...

7-1- पहाड़ो की शुद्ध वायु स्नान से तेजोवलय बढ़ता है।

7-2- खुले आकाश को निहारने से उसके नीचे बैठने से भी यह चार्ज होता है।

7-3- स्वच्छ जल में स्नान या शॉवर से स्नान पर भी तेजोवलय स्थिर होता है, अच्छा महसूस होता है। गंगा नदी जैसी पवित्र और औषधीय गुण सम्पन्न नदियों में स्नान से भी प्राणों का तेजोवल बढ़ता है।

7-4- शुद्ध मिट्टी से स्नान से भी प्राण के तेजोवलय में वृध्दि होती है।

8- लेकिन उपरोक्त में से सबसे ज्यादा प्रभावी और प्राण विद्युत चार्ज करने का माध्यम अग्नि है। इसलिए यज्ञ में सम्मिलित होने से औषधीय धूम्र वायु स्नान और अग्नि के ताप का स्नान और घी का ऑक्सीकरण स्नान और मन्त्र तरंगों का प्रभाव प्राण का तेजोवलय रिचार्ज करता है। इसलिए यज्ञ एक समग्र उपचार के साथ साथ प्राण के तेजोवलय को बढ़ाने और शुद्ध करने का उत्तम माध्यम है। ;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;

क्या प्राण विद्युत चमत्कारी है ? 14 FACTS;- 1-शरीर के अवयवों के संचालन एवं क्रिया-कलाप में आमतौर से रक्त की प्रधान भूमिका मानी जाती है। यदि थोड़ी गहराई में घुसकर देखा जाय तो प्रतीत होता है कि समूचे काय तन्त्र की अनेकानेक गतिविधियों का उत्तेजन एवं नियमन एक विशेष प्रकार की बिजली के सहारे होता है जो मस्तिष्क में उत्पन्न होता और नाड़ी तन्तुओं द्वारा समस्त अवयवों के भीतर तथा बाहर छाई रहती है। बिजली की शरीर में वही भूमिका होती है जो मोटर में बैटरी डायनेमो की। रक्त पैट्रोल है, तो जैव विद्युत। दोनों के संयोग से ही जीवन धारण बन पड़ता है।

2-यह कायिक बिजली मशीनी बिजली से भिन्न है। यन्त्र विद्युत झटका मारती और मशीनें चलाती है। कायिक बिजली शरीर और मस्तिष्क के अवयवों को सम्भालती है। बाहरी क्षेत्र में अपने प्रभाव का परिचय देती है। इसे प्राण कहते हैं। वह ब्रह्माण्डव्यापी महाप्राण का एक अंश है जो मनुष्य शरीर में काम करता है। इसे घटाया बढ़ाया जा सकता है। संकल्प बल एवं अभ्यास से जिस प्रकार अनेक कला-कौशलों की प्रवीणता प्राप्त होती है, उसी प्रकार प्राण विद्युत को भी योग साधनों के सहारे समुन्नत किया जा सकता है।

3-यों छोटी बैटरी भी विद्युत भाण्डागार का एक घटक ही है और टार्च जलाने जैसे छोटे काम वह भी कर सकती है पर यदि किसी नगर या कारखाने की मशीनें चलानी हों तो बड़ा जनरेटर चाहिए। इसी प्रकार सामान्य प्राण से शरीर निर्वाह एवं उपार्जन की आवश्यकता पूरी होती रहती है। पेट प्रजनन के लिए अनिवार्य साधन सधते रहते हैं किन्तु यदि उच्चस्तरीय क्रिया कलाप सम्पादित हों तो उसके लिए महाप्राण स्तर की प्राण-शक्ति चाहिए और वह साधनात्मक विशेष उपाय उपचारों से ही अर्जित करनी पड़ती है।

4-यों मन शरीर में एक प्रथम सत्ता की भाँति दिखाई देता है, पर वैज्ञानिक जानते हैं कि शरीर के प्रत्येक कोश में एक पृथक मन होता है। कोशों के मनो का समुदाय ही अवयव समग्र मन का निर्माण करता है। प्रत्येक अवयव का क्रिया क्षेत्र अलग-अलग है, पर वह सब मन अवयव के अधीन है। मान लीजिए यौन केन्द्रों के समीपवर्ती न जीवकोश (सैल्स) अपनी तरह के रासायनिक पदार्थ ढूँढ़ते और ग्रहण करते हैं। उनकी उत्तेजना काम वासना को भड़काने का काम करती है, किन्तु समग्र मन नहीं चाहता कि इन यौनावस्थित जीवकोशों की इच्छा को पूरा किया जाय, तो वह काम वासना पर नियन्त्रण कर लेगा।

5-इसी प्रकार शरीर के हर अंग के मन अपनी-अपनी इच्छाएं प्रकट करते हैं। पर समग्र मन उन सबको काटता-छाँटता रहता है। जो इच्छा पूर्ण नहीं होने की होती, उसे दबाता रहता है और दूसरों को सहयोग देकर वैसा काम करने लगता है।यह जीवकोशों के मन ही मिलकर

समग्र मन का निर्माण करते हैं, इसीलिए मन को एक वस्तु न मानकर अध्यात्म शास्त्र में उसे ‘मनोमय कोश’ कहा गया है। एक अवस्था ऐसी होती है जब शरीर के सब मन उसके आधीन काम करते हैं, जब यह अनुमान स्थापित हो जाता है तो मन की क्षमता बड़ी प्रचण्ड हो जाती है और उसे जिस ओर लगा दिया जाय वहीं तूफान की सी तीव्र हलचल पैदा कर देता है।

6-प्रत्युत्पन्न मन जब एकाग्र और संकल्पशील होता है तो सभी कोश स्थित मन जो विभिन्न गुणों और स्थानों की सुरक्षा करने वाले होते हैं, उसी के आधीन होकर कार्य करने में लग जाते हैं, फिर उस संग्रहित शक्ति से किसी भी स्थान के जीवकोशों को किसी दूसरे के शरीर में पहुँचा कर उस व्यक्ति की किसी भी रोग से रक्षा की जा सकती है, सुनने-समझने वाले मनों में हलचल पैदा करके उन्हें सन्देश दिया जा सकता है, किसी को पीड़ित या परेशान भी किया जा सकता है।

7-चौथी सदी में एक युवक जिसे प्रेतबाधा थी उसके पिता उसे अच्छा करने के लिए सन्त मकारियस के पास ले गये जो मिश्र के मरुस्थल में रहते थे। उन्होंने एक हाथ युवक के सिर पर और एक छाती पर रखा और प्रार्थना करने लगे। धीरे-धीरे युवक का शरीर फूलने लगा और इतना फूला कि ऐसा लगने लगा कि युवक अधर में लटका हो। फिर अचानक युवक चीखा और उसके शरीर से पानी निकला। इसके बाद युवक अपनी स्वाभाविक अवस्था में आ गया और रोग मुक्त होकर अच्छा हो गया।

8-सन्त आगस्टाइन, मिलान के सन्त एम्ब्रोज, टूर के सन्त मार्टिन, विशिष्ट हस्तियाँ थीं, जिन्होंने प्रार्थना एवं सिर पर हाथों के स्पर्श द्वारा रोगोपचार की परम्परा को जीवित रखा।

शताब्दियों तक ऐसे अनेक सन्त होते रहे हैं। जिनके पास अपने हाथों के स्पर्श एवं प्रार्थना के द्वारा रोगमुक्त करने की ईश्वरी शक्ति रही है। इन सन्तों की वजह से लोगों में धर्म के प्रति झुकाव बना रहा।

9-बारहवीं सदी में असीसी के सन्त फ्रान्सिस और क्लेअर बाक्स के सन्त बरनार्ड ने अनेकों को अपनी रोगमुक्त करने का शक्ति से अच्छा किया। चौदहवीं सदी में सियेना के सन्त केथराइन तथा सन्त फ्राँसिस जेवियर, सोलहवीं शताब्दी में अपनी रोगमुक्त करने की शक्तियों के लिए बहुत प्रख्यात रहे और अनेकों को इसका लाभ पहुँचाया। जार्ज फाक्स जिसने सत्रहवीं सदी में ‘सोसायटी ऑफ फ्रैन्डस” की स्थापना की थी, ने इंग्लैंड और अमेरिका में अनेक रोगियों को अपनी रोगमुक्त करने की शक्ति से अच्छा किया। इन्होंने अपने द्वारा आध्यात्मिक उपचार से रोगमुक्त करने के अनुभवों का वर्णन, अप्रकाशित पुस्तक ‘बुक आफ निरकेल्स” में किया है।

10-सेंटपाल के समय से ही प्रसिद्ध सन्तों, आत्म बलिदानियों, अथवा शहीदों के द्वारा उपयोग में लाये गये रुमालों और एप्रनों को रोगी के अंगों पर रखकर उन्हें दबाया जात