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सांख्‍य दर्शन के अनुसार आत्मा के मूल 25 तत्‍व कौन से है?PART-03


षड्दर्शन उन भारतीय दार्शनिक एवं धार्मिक विचारों के मंथन का परिपक्व परिणाम है जो हजारों वर्षो के चिन्तन से उतरा और हिन्दू (वैदिक) दर्शन के नाम से प्रचलित हुआ। इन्हें आस्तिक दर्शन भी कहा जाता है। दर्शन और उनके प्रणेता निम्नलिखित है। 1-पूर्व मीमांसा: महिर्ष जैमिनी 2-वेदान्त (उत्तर मीमांसा): महिर्ष बादरायण 3-सांख्य: महिर्ष कपिल 4-वैशेषिक: महिर्ष कणाद 5-न्याय: महिर्ष गौतम 6-योग: महिर्ष पतंजलि

सांख्य और योग दर्शन में क्या अंतर है?;–

06 FACTS;-

1-सांख्य के समान दूसरा कोई ज्ञान नहीं है और योग के समान कोई दूसरा बल नहीं है |

चित्त का नाश करने के लिए केवल दो निष्ठाएँ बतलायी गयी हैं- योग और सांख्य | योग चित्तवृत्ति निरोध से प्राप्त किया जाता हैं और सांख्य सम्यक ज्ञान से |सांख्य के प्रवर्तक

श्री कपिलमुनि हुए हैं और योग दर्शन के निर्माता श्री पतञ्जलिमुनि | कपिल मुनि आदि विद्वान और प्रथम् दर्शनकार हैं | यद्यपि ये दोनों फिलासफी अलग अलग नाम से वर्णित की गयी हैं किन्तु वास्तव में दोनों एक ही हैं |

2-सांख्य और योग दोनों आरम्भ में एक ही स्थान से चलते हैं और अन्त में एक ही स्थान पर मिल जाते हैं , किन्तु योग बीच में थोड़े से घुमाववाली पक्की सड़क से चलता हैं और सांख्य

सीधा कठिन रास्ते से जाता है |सांख्य और योग में बहिर्मुख होकर संसारचक्र में घूमने के कारण – अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश, क्लेश तथा सकाम कर्म बतलाये

गए हैं |इसी क्रमानुकर अन्तर्मुख होने के साधन अष्टांग योग ( यम, नियम,आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, और समाधि है |

3-योग द्वारा अन्तर्मुख होना – यम, नियम,आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार ये पांच बहिरंग साधन हैं और धारणा, ध्यान, समाधि अंतरंग साधन हैं | ये तीनों अंतरंग साधन भी , असम्प्रज्ञात समाधि ( स्वरूपास्थिति ) के बहिरंग साधन हैं, उसका अंतरंग साधन नेति-नेतिरूप पर – वैराग्य हैं , जिसके द्वारा चित्त से अलग आत्मा को साक्षात्कार करने वाली ‘विवेक ख्याति रूप’ सात्विक वृत्ति का भी निरोध हो कर ( शुद्ध चैतन्य ) स्वरूपास्थिति का लाभ होता हैं |

4-सांख्य द्वारा अन्तर्मुख होना – अष्टांग योग के पहले पांच बहिरंग साधन.. सांख्य और योग में समान हैं| जहाँ योग में सालम्बन अर्थात धारणा, ध्यान, समाधि द्वारा किसी विषय को ध्येय बना कर अन्तर्मुख होते हैं , वहाँ सांख्य में निरालम्ब अर्थात बिना किसी विषय को ध्येय बना कर अन्तर्मुख होते हैं | उसमे धारणा, ध्यान, समाधि के स्थान में – ” चित्त और उसकी वृत्तियाँ दोनों ही त्रिगुणात्मक हैं इसलिए गुण ही गुणों में बरत रही हैं ” – इस भावना से आत्मा को – “चित्त से पृथक अकर्त्ता” केवल शुद्ध स्वरुप में देखना होता है |

5-''यह आत्मा साक्षात्कार कराने वाली विवेक ख्यातिरूप एक गुणों की ही सात्त्विक वृत्ति है ” इस प्रकार इस वृत्ति का भी निरोध , पर- वैराग्य द्वारा होने पर ( शुद्ध चैतन्य ) स्वरूपास्थिति को प्राप्त होते हैं |अर्थात जो वृत्ति आये उसको हटाना है |अन्त में सब

वृत्तियाँ रुक जाने पर निरोध करने वाली वृत्ति का भी निरोध करके स्वरूपास्थिति को प्राप्त होना हैं |

6-सांख्य और योग का व्यवहार –साधारण अयोगी लोगों के कर्म पाप से ,पुण्य से और पाप-

पुण्य से मिश्रित तीन प्रकार केहोते हैं |योगियों का कर्म न पापमय होता हैं न पुण्यमय क्योंकि योगी के लिए पापकर्म सर्वथा त्याज्य ही हैं |और कर्तव्यरूप पुण्य कर्म भी वह आसक्ति, लगाव, ममता, और अहंता को छोड़कर कर्म और उसके फल को ..ईश्वर को समर्पण करके निष्काम भाव से करता हैं इसलिए बंधन रूप न होने से अकर्मरूप ही हैं |

संख्या योगी गुण गुणों में ही बरत रहे हैं , आत्मा अकर्ता हैं , इस प्रकार इसके लगाव से मुक्त रहते हैं | आत्मा इनका द्रष्टा , इनसे पृथक निर्लेप है |

सांख्‍य दर्शन क्या है?-

05 FACTS;-

1-गीता में सांख्य को ज्ञान योग तथा संन्यास योग के नाम से भी वर्णन किया गया है |सांख्य नाम रखने का यह कारण भी हो सकता है कि इसमें गिने हुए पच्चीस तत्त्व माने गएहै |सांख्य नामकरण का रहस्य इसके एक विशिष्ट सिद्धांत में भी छिपा हुआ है जिसका दूसरा नाम “सम्यक विवेक ज्ञान” है | किसी वास्तु के विषय में तद्गत दोषों तथा गुणों की छानबीन करना भी ‘संख्या’ कहलाता है |

2-जगत् का मूल कारण.. सांख्य में 25 तत्व माने गए हैं । मूल प्रकृत्ति से शोष तत्वों की उत्पत्ति का क्रम इस प्रकार है—प्रकृति से महत्तत्व (बुद्धि), महत्तत्व से अहंकार, अहंकार से ग्यारह इंद्रियाँ (पाँच ज्ञानेंद्रियाँ, पाँच कर्मेंद्रियाँ और मन) और पाँच तन्मात्र, पाँच तन्मात्रों से पाँच महाभूत (पृथ्वी, जल, आदि) । प्रलय काल में ये सब तत्व फिर प्रकृति में क्रमश: विलीन हो जाते हैं ।

3-'सांख्य' का शाब्दिक अर्थ है - 'संख्या सम्बन्धी'। सांख्य दर्शन के रचयिता कपिल मुनि माने जाते हैं। सांख्य दर्शन में सृष्टि की उत्पत्ति

'भगवान' के द्वारा नहीं मानी गयी है बल्कि इसे एक विकासात्मक प्रक्रिया के रूप में समझा गया है और माना गया है कि सृष्टि अनेक परिवर्तनों से गुजरने के बाद अपने वर्तमान स्वरूप को प्राप्त हुई है।जीव की दुर्गति

का कारण है --- आध्‍यात्मिक, अधिदैविक एवं अधिभौतिक पाप। कपिल मुनि ने इन तीनों दुःखों से मुक्ति का उपाय बतलाया है। सांख्य का अर्थ होता है ज्ञान।

4-सांख्‍य के अनुसार मूल तत्‍व 25 है। ये है...

1- प्रकृति

2-महत्

3-अंहकार

4-11 इन्द्रियां

5-पांच तन्मात्राएं

6-पांच महाभूत

7-पुरूष

5-भारतीय दर्शन के छ प्रकारों योग, पूर्व मीमांसा, उत्तर मीमांसा, न्याय एवं वैशेषिक में से एक है सांख्य। योग में ईश्वर को और मिलाकर कुल 26 तत्व माने गए हैं । न्याय में 16, वैशेषिक में 6, शैवदर्शन में 36; इसी प्रकार अनेक दर्शनों की भिन्न भिन्न मान्यताएँ तत्व के संबंध में हैं ।

प्रकृति का क्या अर्थ है?-

जीव और जगत अव्यक्त रूप में प्रकृति में विद्यमान रहते हैं। इसी कारण से प्रकृति का एक और नाम “अव्यक्त” है। सृष्टि आदि क्रिया में प्रकृति ही प्रधान है। वह प्रकृतरूप में काम करती है। प्रकृति बना है प्र और कृति के संयोग से। प्र का अर्थ है प्रकर्ष और कृति का अर्थ है निर्माण करना। जिन मूल तत्वों से मिलकर बाकी सब कुछ बनता है, उसे प्रकृति कहते हैं। इसी कारण से “प्रकृति” नाम पड़ा।

प्रकृति के त्रिगुण ..सत्व, रजः, तमः–

07 FACTS;-

1-सत (सत्व), रज, तम ये तीन गुण प्रकृति में रहते हैं। इन तीनों गुणों की साम्यावस्था का नाम प्रकृति है।इन्हीं का नाम त्रिगुण है। अत: सत, रज, तम ये मूल द्रव्य प्रकृति के उपादान द्रव्य हैं। ये गुण इसलिए कहलाते हैं कि ये रस्सी के रेशों की तरह आपस में मिलकर पुरुष के लिए बंधन का कार्य करते हैं।

2-सतोगुण का स्वरूप... सत गुण लघु, प्रकाशक और इष्ट (आनंददायक) होता है। ज्ञान में जो विषय प्रकाशकत्व होता है, इन्द्रियों में जो विषय ग्रहिता होती है, वह सब सत्व गुण के कारण होता है। मन, बुद्धि, तेज का प्रकाश, दर्पण या कांच की प्रतिबिम्ब शक्ति आदि सभी सत गुण के कार्य हैं। इसी तरह जहां-जहां लघुता (हल्कापन) के कारण उर्ध्व दिशा में गमन का दृष्टांत मिलता है, जैसे जैसे अग्नि ज्वाला का ऊपर उठना या मन की शांति, वह सब सत गुण के कारण होता है। इसी तरह सभी प्रकार के आनंद जैसे हर्ष, संतोष, तृप्ति, उल्लास आदि और विषय मन में अवस्थित सत गुण के कारण होते हैं।

3-रजोगुण का स्वरूप.... रजोगुण क्रिया का प्रवर्तक होता है। यह स्वयं चल होता है और अन्य वस्तुओं को चलाता है। यह चल होने के साथ-साथ उत्तेजक भी होता है। रजोगुण के कारण हवा बहती है, इंद्रिया विषयों की तरफ दौड़ती हैं और मन चंचल हो उठता है। सत व तम दोनों स्वत: निष्क्रिय होते हैं। वे रजोगुण की सहायता से ही प्रवर्तित होते हैं। रजोगुण दु:खात्मक होता है। जितने प्रकार के दु:खात्मक (शारीरिक या मानसिक कष्ट) होते हैं, वे रजोगुण के कारण होते हैं।

4-तमोगुण का स्वरूप... तमोगुण गुरु (भारी) और अवरोधक होता है। यह सतगुण का उलटा है। यह प्रकाश का आवरण करता है। यह रजोगुण की क्रिया का भी अवरोध करता है जिसके कारण वस्तुओं की गति नियंत्रित हो जाती है। तत्व जड़ता व निष्क्रियता का प्रतीक है। इसी के कारण बुद्धि, तेज आदि का प्रकाश फीका पड़ने से मूर्खता या अंधकार की उत्पत्ति होती है। यह मोह या अज्ञान का जनक है। यह क्रिया की गति अवरोध करता है, निद्रा, तंद्रा या आलस्य उत्पन्न करता है। यह अवसाद या औदासिन्य का कारण है।

5-सम्पूर्ण सृष्टि सत्व, रज व तम तीन गुण से बनी हुई है, इनमें रज गुण चंचल होता है जिसके कारण हमारे शरीर, इन्द्रियों व मन में चंचलता बनी रहती है। इस रज गुण की चंचलता के कारण ही ध्यान लगना कठिन होता है। साधना के द्वारा तीनों गुणों से ऊपर उठा जाता है क्योंकि गुणों से ऊपर उठने के लिए आत्म भाव में आना ज़रूरी है, फिर साधक जिस समय आत्म भाव में आता है उस समय गुणों का प्रभाव नहीं रहता। क्योंकि तीनों गुण प्रकृति में हैं आत्मा में नहीं।

6-फिर जैसे ही साधक आत्म भाव में आता है वैसे ही उसका रजोगुण भी शांत हो जाता है व मन भी शांत हो जाता है और चित्त में पड़े हुए सारे पापों का नाश हो जाता है उस समय साधक को उत्तम सुख की प्राप्ति होती है और वह ब्रह्म में लीन होकर ब्रह्मभूत हो जाता है।

7-इन तीन गुणों की साम्यावस्था को प्रकृति कहा जाता है। इस अवस्था में प्रकृति निष्क्रिय रहती है। इन तीनों गुणों में जब कभी कमी आती है या बढोत्तरी होती है, तब उस विषमता से प्रकृति का संतुलन बिगड़ता है। उसमें विकृति आती है। प्रकृति की विकृति से ही जीव और जगत की सृष्टि होती है।

भगवद्गीता के (चौदहवाँ अध्याय )अनुसार माया के तीन गुण ;-

09 FACTS;-

1-सत्त्व, रज, तम का जन्म...प्रकृति अर्थात ज्ञान शक्ति और क्रिया शक्ति के भिन्न भिन्न मात्रा में कार्य करने से गुण उत्पन्न होते हैं। इन्हें तीन भागों में विभाजित किया है। यह हैं सत्त्व, रज, तम। सत्त्व में ज्ञान शक्ति अधिक होती है, रज में क्रिया शक्ति अधिक होती है और तम में ज्ञान शक्ति लगभग लुप्त होती है, क्रिया शक्ति अति अल्प होती है। यह तीनों गुण अविनाशी अव्यक्त आत्मतत्व परमात्मा को इस शरीर में मोहित कर बांधते हैं। प्रकृति के गुणों के कारण ही आत्मा में जीव भाव उत्पन्न होता है।

2-सत्त्व का प्रभाव ... सतोगुण सुख और ज्ञान के माध्यम में अविनाशी आत्मा को फंसाता है अर्थात वह ज्ञान देता है और ज्ञान का अहंकार भी उत्पन्न करता है और ज्ञानी होने का अहंकार उसे मिथ्या सुख से भ्रमित कर देता है। वह सच्चे ज्ञान व सच्चे आनन्द को भूल जाता है।

3-रज का प्रभाव...रजोगुण सदा आत्मा को बहलाता है क्योंकि राग रूप रजोगुण का जन्म कामना और आसक्ति से होता है और संसार के विभिन्न रूपों की कामना उनमें आसक्ति प्राप्त होने पर बढ़ती ही जाती है। पहले थोड़ा मिला उसका सुख उठाया, फिर ज्यादा की इच्छा हुयी, आसक्ति बढ़ी, उसके लिए कार्य बढ़े (कर्म की इच्छा बढ़ी) और फल से सम्बन्ध बढ़े , इस प्रकार देह स्थित आत्मा को जीव भाव की प्राप्ति होती है और वह जीवात्मा शरीर से बंध जाता है।

4-तम का प्रभाव..तमोगुण अज्ञान से उत्पन्न होता है, यह आत्मा को पूर्ण रूपेण भ्रम में डाल देता है, वह अपना स्वरूप पूर्णतया भूल कर जीव भाव को प्राप्त इस शरीर को ही अपना स्थान, अपना स्वरूप मान बैठती है। प्रमाद, आलस्य और नींद इस तमोगुण के हथियार हैं, इनके द्वारा मन मूढ़ बन जाता है, बुद्धि भ्रमित हो जाती है, कर्म की इच्छा नहीं होती। उसकी बुद्धि कुम्भकर्ण जैसी हो जाती है जिसने तपस्या का फल छह माह की नींद मांगी। नीद को ही वह जीवन की सर्वोत्तम निधि मानता है। इसी में आनन्द अनुभव करता है।

5-सतोगुण जीव में सुख का भाव उत्पन्न करता है। रजोगुण भी कामना और आसक्ति के माध्यम से सुख प्रदान करते हुए उसे अधिक-अधिक कर्म में लगाता है और तमोगुण उसके ज्ञान को ढक कर प्रमाद में लगाता है, उसे अज्ञान में सुख मिलता है। परन्तु यह सभी मिथ्या सुख क्रमशः अहंकार वश, आसक्ति वश और अज्ञान वश उत्पन्न होते हैं।सभी जीवों में तीनों

गुण भिन्न भिन्न मात्रा में होते हैं। कर्म प्रारब्ध और परिस्थिति वश गुणों की मात्रा में अन्तर भी आता है। जब देह में समस्त इन्द्रियों और मन में ज्ञान और विवेकशक्ति उत्पन्न होती है तो सतोगुण बढ़ा होता है।

6-जब रजोगुण बढ़ा होता है तो उस समय लोभ और सकाम कर्म करने की इच्छा उत्पन्न होती है और जीव कर्म में लग जाता है। फिर इच्छा पूरी हुयी तो उसकी पूर्ति के लिए अधिक से अधिक कर्म और विषय भोग की लालसा भी उत्पन्न होती है और इच्छा पूरी नहीं हुयी या भोग प्राप्त नही हुए तो अशान्ति उत्पन्न होती है। तमोगुण के बढ़ने पर मन, बुद्धि में अज्ञान छा जाता है, कर्म करने की भी इच्छा नहीं होती। प्रमाद, आलस्य, निद्रा यह सब उत्पन्न होते हैं।

7- सत्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है (विशुद्ध आत्मतत्व सतोगुण के पाश में बंधा जीवात्मा अहंकार युक्त रहता है) रजोगुण लोभ को जन्म देता है और तमोगुण से प्रमाद, मोह और मूढ़ता उत्पन्न होते हैं।सत्वगुण में स्थित पुरुष ऊर्ध्व गति को प्राप्त होते हैं अर्थात

योगभ्रष्ट और विद्या विनय सम्पन्न घरों में जन्म लेता है। रजोगुण में स्थित पुरुष मध्य गति को प्राप्त होते हैं अर्थात सकामी, लोभी, सांसारिक लोगों के घर में जन्म लेते हैं और तमोगुणी पुरुष नीच गति को प्राप्त होते हैं अर्थात मूढ़ योनियों में जन्म लेते हैं।

8-गुणातीत...जिस समय मनुष्य दृष्टा भाव से स्थित रहता है और सत्त्व, रज, तम इन तीन गुणों को कर्ता देखता है, उस समय साक्षी भाव से कर्मों के कर्तापन से निर्लिप्त अर्थात अहंकार से मुक्त होकर परम स्थिति को तत्व से जानता है।

9-गुणातीत पुरुष के लक्षण;-

9-1-आत्म स्वरूप में स्थित, सदा साक्षी भाव से देखता हुआ सतोगुण रूपी ज्ञान और उसके अहंकार, रजोगुण की कार्य प्रवृत्ति और तमोगुण के भ्रम व मूढ़ता भाव यदि आते हैं तो उनमें यदि प्रवृत्त होता है तो बिना किसी आसक्ति के और द्वेष के और यदि उन त्रिगुण भावों से अलग होता है तो उनकी कोई कामना नहीं करता क्योंकि उसे कर्म का अथवा अपने गुणों का कोई अभिमान नहीं होता, समुद्र के जल की तरह स्थित रहता है।

9-1-वह उदासीनवत् अर्थात सुख-दुःख, हानि-लाभ में समान रहता हुआ किसी भी गुण से विचलित नहीं किया जाता है क्योंकि वह जानता है कि प्रकृति के गुण ही, गुण और कर्म का कारण हैं, वह यह जानकर गुणों के खेल को देखता रहता है। जिस प्रकार आकाश, वायु से प्रभावित नहीं होता उसी प्रकार वह आत्मरत पुरुष गुणों से प्रभावित नहीं होता और सदा आत्म स्थित रहता है और इस परम स्थिति से कभी भी विचलित नहीं होता।

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2-महत्तत्व का क्या अर्थ है?-

12 FACTS;-

1-"जो प्रकृति) से ही परा श्रेष्ठ ,अन्तरात्मा में स्थित परमात्मा,रूप, नाम वर्ण, और विशेषण आदि से रहित है : जिसमें जन्म, वृद्धि, परिणाम, क्षय ,नाश इन छ: विकारों का सर्वथा अभाव है : जिसको सर्वदा चकित भाव से केवल है ,इतना ही कह सकते हैं। वही नित्य ,अजन्मा,अक्षय, अव्यय,एकरस और हेय गुणों से रहित होने के कारण निर्मल परमात्मा है। बही इन सब व्यक्त तथा अव्यक्त जगत के रूप से ,साक्षी रूप से पुरूष तथा महाकारण काल रूप से स्थित है।

2-परम सत्ता का प्रथम रूप पुरूष है अव्यक्त(प्रकति) और व्यक्त (महत्तत्व आदि तत्व) उसके अन्य रूप है।तथा काल जो सबको क्षोभित करता है उसका परम रूप है।उन मूल परमेश्वर सर्व भूतेश्वर परमात्मा ने अपनी इच्छा से विकारी प्रधान और अविकारी पुरूष में प्रविष्ट होकर उनको क्षोभित किया। प्रकृति का प्रथम परिणाम महत्तत्व या बुद्धितत्व

है।गुणों की साम्यावस्था रूप प्रधान जव विष्णु के क्षेत्रज्ञ रूप से अधिष्टित हुआ तव उससे महत् तत्व की उत्पत्ति हुई ,उत्तपन्न हुए महत् को प्रधान ने आवृत किया।

3-महत् तत्व सात्विक, राजस तथा तामस तीन प्रकार का है किन्तु जिस प्रकार बीज छिलके से समभाव से ढका रहता है वैसे ही त्रिविध महत तत्व सब ओर से प्रधान द्वारा घिरा हुआ है। फिर इसी से तीन प्रकार (सात्विक, राजस तथा तामस) का अहंकार उत्पन्न हुआ ।यह त्रिगुणमय होने से इन्द्रिय तथा भूतादि एवं उनके अधिष्ठात देवता सवका कारण है।

प्रधान से जैसे महत तत्व व्याप्त है वैसे ही यह अहंकार चारों ओर से महत तत्व से व्याप्त है।

4-भूतादि नामक तामस अहंकर ने विकृत होकर शब्द तन्मात्रा और उससे शब्द गुण वाले आकाश की रचना की।उस भूतादि नामक तामस अहंकर ने शब्द तन्मात्रा रूप आकाश को व्याप्त किया। फिर शब्द तन्मात्रा रूप आकाश ने विकृत होकर स्पर्श तन्मात्रा की रचना की। उससे बलवान वायु की उत्पत्ति हुई ।उसका गुण स्पर्श हुआ।

5-आकाश ने वायु को आवृत किया। फिर स्पर्श तन्मात्रा रूप वायु ने विकृत होकर रूप तन्मात्रा की रचना की। उस से तेज उत्पन्न हुआ ,उसका गुण रूप कहा जाता है।फिर तेज ने भी विकृत होकर रस तन्मात्रा की सृष्टी की।उससे रस गुण वाला जल बना।रस तन्मात्रा रूप जल ने विकृत होकर गन्ध तन्मात्रा की रचना की तथा उससे पृथ्वी की सृष्टी हुई ।उन उन आकाश आदि भूतों में तन्मात्रा है अर्थात उनके गुण शब्द आदि ही हैं।इसलिए वे गुण रूप या तन्मात्रा ही हैं।

6-तन्मात्राओ में विशेष भाव नहीं है इसलिए उनकी अविशेष संज्ञा है। यह तन्मात्रा शांत घोर अथवा मूड़ नही हैं। इस प्रकार यह तामस अहंकार की सृष्टी कही गई ।दस इन्द्रियाँ राजस अहंकार से तथा उनके अधिष्ठात देवता सात्विक अहंकार से उत्पन्न कहे जाते हैं ..सात्विक मन भी।त्वक, चक्षु,नासिका, जिव्हा, क्षोत्र-'ये पाँचों बुद्धि की सहायता से शब्द आदि विषयों को ग्रहण करती हैं।पायु(गुदा),उपस्थ,हस्त,पाद और वाक्-ये सभी कर्म इन्द्रियाँ है।

7-आकाश, वायु,तेज, जल,धरती यह उत्तरोत्तर क्रमशः शब्द ,स्पर्श आदि गुणों से युक्त हैं।ये पाँचों भूत शांत, घोर तथा मूड़ हैं ।अतः ये विशेष कहलाते हैं।इन सभी भूतों में प्रथक्क- 2 शक्तियाँ हैं ।अतः वे परस्पर पूर्णतः मिले विना सृष्टि नहीं कर सकते।इसलिए एक दूसरे के आश्रय रहने वाले और एक ही संघात की उत्पत्ति के लक्ष्य वाले महत तत्व से लेकर विशेष पर्यंत प्रधान के इन सभी विकारों ने पुरूष से अधिष्टित होने के कारण परस्पर मिलकर सर्वथा एक होकर प्रधान तत्व के अनुग्रह से अण्ड की उत्पत्ति की।

8-जल के वुलवुले के समान क्रमशः भूतों से बड़ा हुआ वह गोलाकार और जल पर स्थित अण्डा हिरण्यगर्भ श्री भगवान का महा अति उत्तम प्राकृत आधार हो गया।उसमें वे अव्यक्त जगत पति श्रीभगवान विष्णु ही व्यक्त रूप से हिरण्यगर्भ रूप होकर विराजमान हुए । उन हिरण्यगर्भ का सुमेरू अल्प (गर्भ को ढकने वाली झिल्ली),अन्य पर्वत, जरायु(गर्भाशय),समुद्र गर्भ -स्थ रस था।

9-उस अण्ड में ही पर्वत, द्वीप आदि के साथ धरती ,समस्त लोक,ग्रह,नक्षत्र, देव,मनुष्य, समस्त जीव प्रकट हुए ।।वह अण्ड पूर्व पूर्व की अपेक्षा दस दस गुण अधिक जल , अग्नि,वायु तत्व और आकाश तथा तामस अहंकर आदि से व्याप्त है। यह अण्ड मूल परा से व्याप्त है और यह अनन्त है,इसमे ऐसे ऐसे कोटि कोटि अण्ड स्थित हैं ।

10-इस प्रकार नारियल के फल का भीतरी बीज बाहर से कितने ही छिलकों से व्याप्त है ,वैसे ही यह अण्ड इन सात प्राकृतिक आवरण से ढका है। उसमें स्थित हुए परमेश्वर श्रीभगवान स्वयं ही ब्रह्मा होकर (रजोगुण विशिष्ट) जगत को रचते हैं, विष्णु होकर(सत्व गुण) संसार का पालन करते हैं तथा अंत में रूद्र रूप धारण कर संहार करते हैं और समस्त विश्व को जलमय करके शेषशैय्या पर शयन करते हैं।

11-काल रूप भगवान अनादि है,इनका अन्त नहीं है इसलिए संसार की उत्पत्ति,पालन एवं संहार भी कभी नहीं रूकते।प्रलयकाल में प्रधान के साम्यावस्था में स्थित हो जाने पर और पुरूष के प्रकृति से प्रथक्क स्थित हो जाने पर श्री भगवान का काल रूप इन दोनों को धारण करने के लिए प्रवृत्त होता है।

12-जिस प्रकार क्रियाशील न होने पर भी गन्ध अपनी सन्निधिमात्र से मन को क्षोभित कर देता है उसी प्रकार परमेश्वर भी अपनी सन्निधिमात्र से ही प्रधान और प्रकृति को प्रेरित करते हैं।।बह पुरूषोत्तम ही इनको क्षोभित करने वाले हैं और वे ही क्षुब्ध होते हैं। संकोच और विकास वाली प्रकृति भी इन्ही की शक्ति है। विष्णु आदि ईश्वरो के भी ईश्वर वे श्रीभगवान ही समष्टि-व्यष्टि रूप,विधाता आदि जीव रूप तथा महत् तत्व आदि रूप से स्थित हैं ।

3-अहंकार का क्या अर्थ है?-

03 FACTS;-

महत्तव की विकृति अहंकार तत्व है।अहंकार तीन प्रकार का है...

1-तामसिक अहंकार - क्रूर और अँधा होता है| इसका स्वभाव है कि यह स्वयं को ही हानि पहुंचाता है|

2-राजसिक अहंकार - स्वार्थी होता है| यह खुद को भी कष्ट देता है और दूसरों को भी|

3-सात्विक अहंकार - रचनात्मक होता है और रक्षा करना इसका स्वभाव है| यदि आप समर्पण नहीं कर सकते, तो कम से कम सात्विक अहंकार रखिये, क्योंकि सात्विक अहंकार सदैव त्याग करने के लिए तैयार रहता है|

4- ग्‍यारह इन्द्रियां क्या है?-

अंहकार तत्‍व के परिणाम हैं इन्द्रिय तथा उनके विषय।

इन्द्रियां दो प्रकार की है; –

(क) बाह्य इन्द्रियां ;–

दो प्रकार की होती है –

(अ) ज्ञानेन्‍द्रियां

1 चक्षु(Eye)

2 कर्ण (Ear)

3 नासिका (Nose)

4 जिह्वा(Tongue)

5 त्‍वक् (Skin)

(आ) कर्मेन्द्रियां

(1) वाणी

(2) हाथ

(3) पैर

(4) जननेन्द्रिय

(5) गुदा

(ख) अन्‍तरेन्द्रिय – मन

(5) पंच मात्राएं;-

पंच तन्‍मात्रा अहंकार तत्‍व का एक परिणाम है। पांच तन्‍मात्राएं है --

1- रूप (See)

2 -रस (Taste)

3- गन्‍ध (Smell)

4- स्‍पर्श (Touch)

5- शब्‍द (Hear)

(6) पंच महाभूत क्या है?-

06 FACTS;-

1-उपर्युक्‍त वर्णित पंचतमात्रओं से ही पांच स्‍थूल त‍त्‍वों की उत्‍पति होती है। ये हैं –

1-1- क्षिति(मिटटी )

1-2- अप् (जल)

1-3 -तेज (पावक)

1-4- व्‍योम (गगन , आकाश )

1-5- मरूत् (समीर)

2-प्रकृति में जो कुछ पद्धार्थ आदि पाया जाता है वह इन्हीं पांच तत्वों से बना है ।पंचमहाभूतों में सब से पहले आकाश की ही उत्पत्ति होती है । आकाश का मुख्य गुण ‘शब्द’ है तथा शरीर में कर्णेन्द्रीय (कान) आकाश की ही अभिव्यक्ति है । जिन पद्धार्थों में मृदु, लघु, सूक्ष्म, श्लक्ष्ण, शब्द गुण बहुतायत से हों, उन्हें आकाशीय द्रव्य जानें ।

3-दूसरा पंचमहाभूत है वायु, इसकी उत्पत्ति आकाश से होती है अतःएव् इसमें आकाश के गुण भी पाये जाते हैं । वायु का मुख्य गुण ‘स्पर्श’ है तथा शरीरस्थ त्वगेन्द्रीय (त्वचा) वायु की ही अभिव्यक्ति है । जिन पद्धार्थों में लघु, सूक्ष्म, शीत, रूक्ष, खर, विशद, स्पर्श गुण बहुतायत से हों, उन्हें, वायव्य द्रव्य जानें ।

4-तीसरा पंचमहाभूत अग्नि है, इसकी उत्पत्ति वायु से होती है अतःएव् इसमें वायु एवं आकाश के गुण भी पाये जाते हैं । अग्नि का मुख्य गुण ‘रूप’ है तथा शरीरस्थ नेत्रेन्द्रीय (आंख) अग्नि की ही अभिव्यक्ति है । जिन पद्धार्थों में लघु, सूक्ष्म, उष्ण, रूक्ष, विशद, रूप गुण बहुतायत से हों, उन्हें आग्नेय द्रव्य जानें ।

5-चौथा पंचमहाभूत जल है, इसकी उत्पत्ति अग्नि से होती है अतःएव् इसमें अग्नि, वायु एवं आकाश के गुण भी पाये जाते हैं । जल का मुख्य गुण ‘रस’ है तथा शरीरस्थ जिह्वा (जीभ) जल की ही अभिव्यक्ति है । जिन पद्धार्थों में द्रव, स्निग्ध, शीत, मन्द, मृदु, पिच्छिल, रस गुण बहुतायत से हों, उन्हें आप्य (जलीय) द्रव्य जानें ।

6-पांचवां पंचमहाभूत पृथ्वी है, इसकी उत्पत्ति जल से होती है अतःएव् इसमें जल, अग्नि, वायु एवं आकाश के गुण भी पाये जाते हैं । पृथ्वी का मुख्य गुण ‘गंध’ है तथा शरीरस्थ घ्राण (नाक) पृथ्वी की ही अभिव्यक्ति है । जिन पद्धार्थों में गुरू, खर, कठिन, मन्द, स्थिर, विशद, सान्द्र, स्थूल, गंध गुण बहुतायत से हों, उन्हें पार्थिव द्रव्य जानें ।मनुष्य जिस प्रकार के गुणों वाले पद्धार्थ का भोजन आदि में प्रयोग करता है वैसे ही गुणों की शरीर में वृद्धि होती है ।

(7) पुरूष का क्या अर्थ है?-

10 FACTS;-

1-परम सत्ता का प्रथम रूप पुरूष है, अव्यक्त(प्रकति) और व्यक्त (महद आदि तत्व) उसके अन्य रूप है।तथा काल जो सबको क्षोभित करता है उसका परम रूप है।वो काल रूप से सदा ही संसार की रचना ,पालन तथा संहार करने मेंं समर्थ हैं ।वो विश्व के अधिष्ठान हैं ,अतिसूक्ष्म से भी सूक्ष्म हैं ,सभी प्राणियों मेंं स्थित पुरुषोत्तम एवं अविनाशी हैं जो वास्तव मेंं अति निर्मल ज्ञानस्वरूप हैं किन्तु अज्ञानतावश नाना पदार्थ रूप से प्रतीत होते हैं।

2-सांख्‍य मत के अनुसार इन 25 तत्‍वों का सम्‍यक ज्ञान ही पुरूषार्थ है। सांख्‍य मत में, जीव और जगत की सृष्टि में ईश्‍वर को प्रमाणरूप में नहीं माना जाता।जगत के दो भाग हैं -पुरुष और प्रकृति।पुरूष और प्रकृति के अविभक्‍त संयोग से सृष्टि की क्रिया निष्‍पन्‍न होती है। 3-पुरूष और प्रकृति दोनों ही अनादि है।पुरूष चेतन है, प्रकृति जड़। पुरुष मनुष्य का चेतन तत्व है।प्रकृति शेष जगत है।पुरूष निष्क्रिय है, प्रकृति क्रियाशील।चेतन पुरूष के सान्निध्‍य से प्रकृति भी चैतन्‍यमयी लगती है। 4-पुरूष केवल भोक्‍ता है, कर्ता नहीं।पुरुष का यह भोग औपचारिक है। पुरूष सर्वदा ही दुखवर्जित है।दुःख तो बुद्धि का विकार है।दुख का कारण अज्ञानतावश पुरुष और प्रकृति में भेद नहीं कर पाना है।दुःखबुद्धि पुरूष में प्रतिबिम्‍बित मात्र होती है। 5-सांख्‍य मत ईश्वर की सत्ता को नहीं मानता है।शरीर के भेद में आत्‍मा और पुरूष बहु है। पुरूष और प्रकृति 24 तत्‍व से स्‍वतन्‍त्र है। संसार के दुखों और सुखोंका विश्लेषण इन्हीं चौबीस तत्वों और पुरुष के संयोग के आधार पर किया जाता है। 6-अज्ञानतावश, न जानने के कारण ही जीव को बन्‍धन में बंधना पड़ता है। अर्थात दुख और संसार में आवागमन के चक्र में फंसना पड़ता है। प्रकृति पुरूष को अपने हाव-भाव छल-कौशल द्वारा बांधकर रखती है। प्रकृति मानों नाटक की नर्तकी है।इसके कारण ही वह भोग की वस्तुओं को ही अपना लक्ष्य मान लेता है और काम, क्रोध, मद, मोह आदि में ही आनंद प्राप्त करता है। यही दुख का कारण है। 7-इसी भेद को ठीक-ठीक नहीं समझ पाने के कारण पुरुष अपने को प्रकृति ही समझ लेता है। यही मिथ्या ज्ञान है।मनमोहिनी उसके इस हाव-भाव, नाच-नृत्‍य, छल कौशल