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क्या सूक्ष्म शरीर की अनुभूति—प्राणायाम से हो सकती है?


प्राणायाम क्या है?-

09 FACTS;-

1-प्राणायाम साधारणतया श्वास-प्रश्वास का एक व्यायाम प्रतीत होता है।परन्तु प्राणायाम

का प्रयोजन तो निखिल ब्रह्माण्ड में से प्राणतत्व की अभीष्ट मात्रा को आकर्षित करने की तथा उस उपलब्धि को अभीष्ट संस्थानों में पहुंचाने की विशिष्ट कला के रूप में ही समझा जाना चाहिए। सांस के सहारे प्राणतत्व को आकर्षित कर सकना एक बात है और मात्र श्वास-प्रश्वास क्रिया करना सर्वथा दूसरी।श्वसन क्रिया के साथ-साथ प्रचण्ड मनोबल का समावेश करने से ...उसी के चुम्बकत्व से व्यापक प्राणत्व को आकाश से खींच सकने में सफलता मिलती है।

2-प्राणायाम की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए स्वामी विवेकानन्द ने एक बार एक कथा सुनाई। एक राजा ने किसी बात पर अप्रसन्न होकर अपने मंत्री को बंदी बनाकर किले में कैद कर दिया। मंत्री किसी तरह किले से भाग निकलता चाहता था, अपनी इच्छा उसने भेंट के लिये आई अपनी धर्म पत्नी से प्रकट की। कठोर पहरे के कारण कोई उक्ति समझ में नहीं आ रही थी।

3-मंत्राणी ने तब एक युक्ति खोज निकाली। एक गोबरैली की पीठ पर एक तिनके को इस तरह चिपकाया कि उसका एक किनारा गोबरैले के मुंह की ठीक सामने आ जाता था तिनके के सिरे पर शहद लगा कर उसे किले की दीवार पर रख दिया गया उसकी पूंछ में रेशम का धागा बांध दिया। शहद देखकर गोबरैले के मुंह में पानी भर आया वह शहद चाटने के लिये चल पड़ा शहद उतना ही आगे बढ़ता जाता इस तरह कीड़ा लगातार ऊपर चढ़ता चला गया। दीवार की ऊंचाई चढ़ जाने के बाद उतरने का क्रम प्रारम्भ हुआ कीड़ा किले के नीचे उतर गया इधर मंत्राणी रेशम के धागे को क्रमशः मोटा और मजबूत लगाती गई जब धागा मंत्री के हाथ पहुंच गया तब उसने मोटा रस्सा बांध दिया। मंत्री ने रस्सा खींच लिया और पहरा लगा रहा, वह उस रस्से के सहारे बाहर निकल गया।

4-प्राण इस ब्रह्मांड में सर्वत्र संव्याप्त है। वह मनुष्य के साथ संकल्प बल के सहारे जुड़ता है। शरीर में उसका प्रवेश वायु के साथ होता है। विज्ञानी आक्सीजन को प्राण कहते थे और सोचते थे कि रक्त उसी के कारण शुद्ध रहता है और वही जीवनी शक्ति है। पर जब यह सोचा गया कि साँस में ऑक्सीजन घुली रहने और फेफड़े ठीक काम करने पर भी मनुष्य मर क्यों जाता है तो समझ में आया कि प्राण और आक्सीजन दो पृथक वस्तुएँ हैं। प्राण के निकल जाने पर शरीर में आक्सीजन सिलेंडरों के माध्यम से साँस पहुँचाई जाती रहे तो भी उसे जीवित नहीं किया जा सकता। 5-इतने पर भी गहरी साँस का अपना महत्व है। आक्सीजन जीवनी शक्ति बढ़ाती है, रक्त को शुद्ध करती है, तापमान बनाये रखती है आदि बातें सही हैं। इसलिए यह भी सही है कि मनुष्य को गहरी साँस लेने की आदत डालनी चाहिए। फेफड़ों को पूरी तरह हवा से भरना चाहिए और उन्हें पूरी तरह खाली करना चाहिए। इस प्रकार फेफड़ों में एक बार में 200 से सी.सी. तक हवा शरीर में भरी जा सकती है और उसमें समाविष्ट आक्सीजन का लाभ उठाया जा सकता है, किन्तु देखा गया है कि लोग आलस्य वश उथली साँस लेते हैं और एक बार में प्रायः 500 सी.सी. ही हवा भीतर ले जा पाते हैं।

6-इसका परिणाम यह होता है कि फेफड़ों का मध्य भाग ही क्रियाशील रहता है और इर्द-गिर्द के कोष्ठक निष्क्रिय पड़े रहते हैं, जिनमें क्षय आदि के जीवाणु-विषाणु आसानी से टिक जाते हैं और वंश वृद्धि करते हुए जीवन के लिए संकट बन जाते हैं। कुछ दिन पूर्व तक भारतीय

योग पद्धति के महत्वपूर्ण अंश प्राणायाम का लाभ ‘डीप ब्रीदिंग’ के आधार पर माना जाता था और जो लाभ मिलते थे उन्हें गहरी साँस लेने का प्रतिफल माना जाता था।पर अब समझा

जाने लगा है कि प्राण एक जीवन्त विद्युत है, जो शरीर से भी अधिक मनःक्षेत्र को प्रभावित करती है। मनुष्य को साहनी, पराक्रमी, तेजस्वी और स्फूर्तिवान बनाती है।

7-शरीर और मस्तिष्क में बिजली के असाधारण आवेश पाये गये हैं।यह विद्युत शक्ति

आक्सीजन से सर्वथा भिन्न है। वह अनन्त आकाश से मस्तिष्कीय केन्