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पञ्च मकार साधन रहस्य क्या है?


पञ्च मकार साधन रहस्य;- 03 FACTS;- 1-2-साधना में पञ्च मकारों का बड़ा महत्व है|पंचमकार तंत्र से सम्बन्धित शब्द है जिसका अर्थ 'म से आरम्भ होने वाली पाँच वस्तुएँ' है, ये पाँच वस्तुएँ तांत्रिक साधना में उपयोग में लायी जाती हैं- पर जितना अर्थ का अनर्थ इन शब्दों का किया गया है उतना अन्य किसी का भी नहीं| इनका तात्विक अर्थ कुछ और है व शाब्दिक कुछ और| इनके गहन अर्थ को अल्प शब्दों में व्यक्त करने के लिए जिन शब्दों का प्रयोग किया गया उनको लेकर दुर्भावनावश कुतर्कियों ने सनातन धर्म को बहुत बदनाम किया है| 2-मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन ये पञ्च मकार हैं जिन्हें मुक्तिदायक बताया गया है| कुलार्णव तन्त्र के अनुसार — “ मद्यपान द्वारा यदि मनुष्य सिद्धि प्राप्त कर ले तो फिर मद्यपायी पामर व्यक्ति भी सिद्धि प्राप्त कर ले| मांसभक्षण से ही यदि पुण्यगति हो तो सभी मांसाहारी ही पुण्य प्राप्त कर लें| हे देवेशि! स्त्री-सम्भोग द्वारा यदि मोक्ष प्राप्त होता है तो फिर सभी स्त्री-सेवा द्वारा मुक्त हो जाएँ|'' 3-तंत्र क्रिया सदेव ही प्रकृति के नियमों के अनुरूप चलती है। यह पूरा संसार ही एक तांत्रिक क्रिया है। तांत्रिक क्रिया पञ्च मकार से मिल कर ही पूरी होती है। पञ्च मकार यानि तंत्र क्रिया के पाँच स्तम्भ। बिना इन पञ्च मकार के सम्मिलन से श्रृष्टि में जीवन का सञ्चालन असंभव है। 1-मॉस:- 02 POINTS;- 1-आगमसार के अनुसार– “ मा शब्द से रसना और रसना का अंश है वाक्य जो रसना को प्रिय है| जो व्यक्ति रसना का भक्षण करते हैं यानी वाक्य संयम करते हैं उन्हें ही मांस साधक कहते हैं| जिह्वा के संयम से वाक्य का संयम स्वत: ही खेचरी मुद्रा में होता है| तालू के मूल में जीभ का प्रवेश कराने से बात नहीं हो सकती और इस खेचरीमुद्रा का अभ्यास करते करते अनावश्यक बात करने की इच्छा ही समाप्त हो जाये ... इसे ही मांसभक्षण कहते हैं| 2-इस श्रृष्टि में प्राणी का जनम ही मॉस के लोथडे के रूप में हुआ है। ऐसा कोई भी प्राणी नही है जो पञ्च मकर के प्रथम " म" मॉस से वंचित रह कर जीवन यापन कर सके। मॉस के रूप में ही मनुष्य एवं जीवों की अपने माँ के गर्भ से उत्पत्ति हुई है। हर प्राणी किसी न किसी प्रकार मॉस का उपयोग अपने दैनिक क्रिया में करता है। चाहे वह भोजन में मॉस का लेना हो या फ़िर किसी को छूना, देखना या महसूस करना सभी में मॉस की प्राथमिकता है। जब माँ के गर्भ में जीवन का विकास होता है तब उसका सबसे पहला वजूद मॉस के रूप में ही होता है। इस से सिद्ध होता है की जीवन की शुरुवात ही पञ्च मकार के प्रथम " म " से होती है। 2-मत्स्य :- 03 POINTS;- 1-आगमसार के अनुसार — '' गंगा यानि इड़ा, और यमुना यानि पिंगला; इन दो नाड़ियों के बीच सुषुम्ना में जो श्वास-प्रश्वास गतिशील है वही मत्स्य है| जो योगी आतंरिक प्राणायाम द्वारा सुषुम्ना में बह रहे प्राण तत्व को नियंत्रित कर लेते हैं वे ही मत्स्य साधक हैं|'' मत्स्य का अभिप्राय साँस के नियन्त्रण से है | इडा ( बायाँ नथुना ) रूप गंगा तथा पिंगला ( दायाँ नथुना ) रूपी यमुना में स्वांस और प्रस्वांस रूप दो मत्स्यों का निवास माना जाता है | श्वांस प्रश्वांस का नियन्त्रण करने वाला और शुष्मना ( दोनों श्वांसों का साथ चलना ) में श्वांस चलाने वाला मत्स्य साधक होता है | 2- मत्स्य का शाब्दिक अर्थ मछली से होता है। परन्तु तंत्र क्रिया में अथवा पञ्च मकार में मत्स्य का मतलब चंचलता या गति से होता है। जिस प्रकार मछली अपने जीवनपर्यंत गतिमान रहती है और पानी के विपरीत दिशा में तैरते हुए अपने लक्ष्य को प्राप्त करती है उसी प्रकार तंत्र साधना के अनुसार बिना गति के कोई भी जीव इस संसार में रह नही सकता। 3-पञ्च मकार के दुसरे मकार " मत्स्य " से ही संसार में जीवो को हमेशा आगे बढ़ने की शिक्षा मिलती हैं ।पञ्च मकार के मॉस गुण के प्राणी में आने के बाद मत्स्य गुण का होना एक मॉस को गति प्रदान करता है। मत्स्य गुण ही व्यक्ति को नए कार्यो के प्रति प्रगतिशील बनता है। 3-मुद्रा:- 03 POINTS;- 1-आगमसार के अनुसार -'' सहस्त्रार के महापद्म में कर्णिका के भीतर पारद की तरह स्वच्छ निर्मल करोड़ों सूर्य-चंद्रों की आभा से भी अधिक प्रकाशमान ज्योतिर्मय सुशीतल अत्यंत कमनीय महाकुंडलिनी से संयुक्त जो आत्मा विराजमान है उसे जिन्होंने जान लिया है वे मुद्रासाधक हैं|'' विजय तंत्र के अनुसार दुष्टो की संगती रूपी बंधन से बचे रहना ही मुद्रा है| 2-तंत्र में मुद्रा के दो रूप हैं। 1> मुद्रा यानी किसी प्रकार की क्रिया जो व्यक्त की जा सके। जैसे योनि मुद्रा, लिंग मुद्रा, ज्ञान मुद्रा। 2> मुद्रा का मतलब खाद्य पदार्थ से भी है। जैसे चावल के पिण्ड पञ्च मकार के मॉस, मत्स्य गुण धारण करने के बाद जीव में सही मुद्रा (क्रिया) के ज्ञान का होना अति आवश्यक है। और सही क्रिया को करने के लिए सही मुद्रा ( खाद्द्य पदार्थ ) की भी आवश्यकता है। 3-जब गर्भ में जीव गति प्राप्त कर लेता है तब वह अपने हाथ और पैर को अपने गर्दन के चारो और बाँध कर एक मुद्रा धारण करता है। जैसे ही वह अपनी माता द्वारा ग्रहण किया गया भोजन को अपना आहार बनाता है, उसके हाथ पैर में गति आ जाती है। यह पञ्च मकार के तीसरे " म " का श्रेष्ठ उदाहरण है। 4-मदिरा :- 03 POINTS;- 1-आगमसार के अनुसार ''हे वरानने! ब्रह्मरंध्र यानि सहस्त्रार से जो अमृतधारा निकलती है उसका पान करने से जो आनंदित होते हैं उन्हें ही मद्य-साधक कहते हैं| ब्रह्मा का कमण्डलु तालुरंध्र है और हरि का चरण सहस्त्रार है| सहस्त्रार से जो अमृत की धारा तालुरन्ध्र में जिव्हाग्र पर (ऊर्ध्वजिव्हा) आकर गिरती है वही मद्यपान है| इसीलिए ध्यान साधना हमेशा खेचरी मुद्रा में ही करनी चाहिए''| 2-तंत्र में मदिरा का अर्थ "नशा" है। आम मनुष्य मदिरा पीने वाले नशे को ही तंत्र से जोड़ते हैं। परन्तु सही मायने में पञ्च मकार में मदिरा रुपी नशे को किसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए होने वाली लगन को कहते हैं।ईश्वर की भक्ति को प्राप्त करने का नशा ही तांत्रिक को कठिन से कठिन साधना पूरा करने के लिए प्रेरित करता है। जीव को आगे बढ़ने के लिए स्वयं में मदिरा गुण को लाना अति आवश्यक है। 3-पञ्च मकार के यह चारों गुन जब साथ मिलते हैं तो वह जीव मॉस (शरीर ), मतस्य (गति),मुद्रा (क्रिया,आहार )और मदिरा (नशा) के आने के बाद अपने जीवन में कोई भी लक्ष्य प्राप्त कर सकता है।जब बालक अपने माँ के गर्भ में बड़ा हो रहा होता है तो वह समय उसके लिए बहुत कष्टकारी होता है। माँ के द्वारा ग्रहण किया गया भोजन उसकी कोमल त्वचा को चोट पहुचाता है। गति आने के बाद और माँ से आहार मिलने के बाद वह जीव स्वयं को इस कष्ट से निकलने के लिए ईश्वर से प्रार्थना करता है। 5-मैथुन:- 04 POINTS;- 1-यामल तंत्रनुसार..''मूलाधार से उठकर कुंडलिनी रूपी शक्ति का सहस्त्रार स्थित परम ब्रह्म शिव से सायुज्य ही मैथुन है''| मैथुन का गुह्य अर्थ समाधि है जिस अवस्था में योगी ईश्वर की स्तुति तथा सृष्टि और संहार के चिन्तन में अपने को भी भूल जाता है |तन्त्र शास्त्र में सृष्टि और संहार के विषय में चिन्तन करना मैथुन कहलाता है | पराशक्ति और जिव के संयोग को भी मैथुन कहते हैं | मात्र स्त्री के साथ सम्भोग करने वाले को स्त्री निषेवक कहते हैं न की मैथुन साधक | मैथुन परम तत्व है जो सृष्टि स्थिति तथा संहार का कारण है | सुदुर्लभ ब्रह्म ज्ञान की सिद्धि मैथुन से हीं होती है | 2-आगमसार के अनुसार यह पंच मकार की साधना भगवान शिव द्वारा पार्वती जी को बताई गयी है| शास्त्र के अनुसार मैथुन किसे कहते हैं ;इस की व्याख्या नौ श्लोकों में है .. 2-1- ''मैथुन तत्व ही सृष्टि, स्थिति और प्रलय का कारण है| मैथुन द्वारा सिद्धि और ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति होती है| नाभि (मणिपुर) चक्र के भीतर कुंकुमाभास तेजसतत्व ‘र’कार है| उसके साथ आकार रूप हंस यानि अजपा-जप द्वारा आज्ञाचक्र स्थित ब्रह्मयोनि के भीतर बिंदु स्वरुप ‘म’कार का मिलन होता है| ऊर्ध्व में स्थिति प्राप्त होने पर ब्रह्मज्ञान का उदय होता है, उस अवस्था में रमण करने का नाम ही “राम” है| इसका वर्णन मुंह से नहीं किया जा सकता''| 2-2-''जो साधक सदा आत्मा में रमण करते हैं उनके लिए “राम” तारकमंत्र है| हे देवि, मृत्युकाल में राम नाम जिसके स्मरण में रहे वे स्वयं ही ब्रह्ममय हो जाते हैं| यह आत्मतत्व में स्थित होना ही मैथुन तत्व है| अंतर्मुखी प्राणायाम आलिंगन है| स्थितिपद में मग्न हो जाने का नाम चुंबन है| केवल कुम्भक की स्थिति में जो आवाहन होता है वह सीत्कार है| खेचरी मुद्रा में जिस अमृत का क्षरण होता है वह नैवेद्य है''| 3-यामल तंत्र के अनुसार मूलाधार से उठकर कुंडलिनी रूपी महाशक्ति का सहस्त्रार स्थित परम ब्रह्म शिव से सायुज्य ही मैथुन है| अजपा-जप ही रमण है| यह रमण करते करते जिस आनंद का उदय होता है वह दक्षिणा है| संक्षिप्त में आत्मा में यानि राम में सदैव रमण ही तंत्र शास्त्रों के अनुसार मैथुन है न कि शारीरिक सम्भोग| 4-मैथुन का अर्थ "मथना "भी होता है। तंत्र में यह कहा गया है की इस संसार में पाई जाने वाली हर वस्तु को यदि सही प्रकार से मथा जाए तो एक नई वस्तु का जनम होता है। जिसका उदाहरण हमारे शाश्त्रो में समुन्द्र मंथन से दिया गया है। समुन्द्र मंथन के समय सागर के मंथन से विभिन्न प्रकार की वस्तुओं की जनम हुआ था जिसमे विष और अमृत का उल्लेख प्रमुख्य है। NOTE :- यह साधना उन को स्वतः ही समझ में आ जाती है जो नियमित ध्यान साधना करते हैं| योगी अपनी चेतना में साँस मेरुदंड में सुषुम्ना नाड़ी में लेते है| नाक या या मुंह से ली गई साँस तो एक प्रतिक्रया मात्र है उस प्राण तत्व की जो सुषुम्ना में प्रवाहित है| जब सुषुम्ना में प्राण तत्व का सञ्चलन बंद हो जाता है तब साँस रुक जाति है और मृत्यु हो जाती है| इसे ही प्राण निकलना कहते हैं| अतः अजपा-जप का अभ्यास नित्य करना चाहिए|

2-औघड़ (संस्कृत रूप अघोर) शक्ति का साधक होता है। चंडी, तारा, काली यह सब शक्ति के ही रूप हैं, नाम हैं। यजुर्वेद के रुद्राध्याय में रुद्र की कल्याण्कारी मूर्ति को शिवा की संज्ञा दी गई है, शिवा को ही अघोरा कहा गया है। शिव और शक्ति संबंधी तंत्र ग्रंथ यह प्रतिपादित करते हैं कि वस्तुत: यह दोनों भिन्न नहीं, एक अभिन्न तत्व हैं। रुद्र अघोरा शक्ति से संयुक्त होने के कारण ही शिव हैं।

3-बाबा किनाराम ने इसी अघोरा शक्ति की साधना की थी। ऐसी साधना के अनिवार्य परिणामस्वरूप चमत्कारिक दिव्य सिद्धियाँ अनायास प्राप्त हो जाती हैं, ऐसे साधक के लिए असंभव कुछ नहीं रह जाता। वह परमहंस पद प्राप्त होता है। कोई भी ऐसा सिद्ध प्रदर्शन के लिए चमत्कार नहीं दिखाता, उसका ध्येय लोक कल्याण होना चाहिए। औघड़ साधक की भेद बुद्धि का नाश हो जाता है। वह प्रचलित सांसारिक मान्यताओं से बँधकर नहीं रहता। सब कुछ का अवधूनन कर, उपेक्षा कर, ऊपर उठ जाना ही अवधूत पद प्राप्त करना है.

क्या अर्थ हैं ''औघड़ ''का?-

03 FACTS;- 1-सहज ही प्रश्न उठता है कि औघड़ कौन हैं ?जो सहज है सरल है वह अघोर है.अर्थात जो घोर ना हो, कठिन ना हो,कडवा ना हो.. वह अघोर है.अघोर से बने शब्द अघोरी एवं औघड़ शब्द को एक दुसरे का पर्याय भी समझा जाता है.इन साधकों को देश-काल अनुसार सरभंग ,कापालिक,ब्र्म्हनिष्ठ के नाम से भी जाना जाता है.

2-इस मत में गुरु-परंपरा द्वारा ही साधकों का परिचय जाना जाता है.भारत में प्रमुख दो परम्परायें कीनारामी और गोरखनाथ की परम्परा जानी जाती हैं. अघोर-पथ को अवधूत-मत का पर्यायवाची माना है.शिवजी के पांच मुखों में एक मुख अघोर का भी है .

3-अघोरियों के स्थान... पुराने समय में इनके केंद्र आबू,गिरनार ,कामख्या ,बोधगया,बनारस तथा हिंगलाज थे .इस पथ के पवर्तक किनाराम जी के गुरु कालूराम जी गिरनार के कापालिक थे.इस मत के साधुओं की आजीविका का आधार खेती तथा भिक्षाटन है.इस मत में स्त्रियों को भी दीक्षा देने की पद्धति अपनाई गयी है. लक्ष्मी देवी ने अवधूतों में स्त्रियों को दीक्षा देने की पद्धति अपनाई.समाधि पूजा अघोरियों में प्रचलित रही है.कुछ दिग्भ्रमित साधकों ने घृणित-आचारों को इसमें समाहित कर अघोर को विद्रूप रूप में प्रस्तुत करने की चेष्टा की है..

क्या है अघोरियों के सिद्धांत एवं दर्शन ?-

08 FACTS;-

1-औघड़ का दूसरा नाम प्राणवायु है.औघड़ ही अज्ञात है ,जो हम सबके अभ्यंतर में व्याप्त है.. उस अज्ञात को पहचान लेने से ज्यादा आनंद उसे खोजने में है.औघड़ ही आत्माराम एवं अनन्त का दूसरा नाम है.औघड़ अंतर्मुखी होते हैं,औघड़ों की देह-बुद्धि नहीं होती आत्म-बुद्धि होती है.वह स्वयं प्राण-वायु है.वह न ही नर है ना नारी है ,दोनों है और दोनों से अलग है.

2-औघड़ एक ऐसी स्थिति को प्राप्त करता है,विभूषित करता है और साधना के शिखर पर पहुंचा होता है. अघोर का धार्मिक सम्प्रदाय स्वरूप की प्रस्तुति “शिव” से है.सरल शब्दों में यह निराकार है किन्तु शरीर है तब साकार है.औघड़ को उसकी कृपा से ही जाना जा सकता है.

3-अघोर मत की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और प्रेरणा-स्त्रोत मब वेद,उपनिषद और तंत्र-शास्त्र शामिल रहे हैं.औघड़ों के अनुसार मन्त्र में बहुत बड़ी शक्ति है.औघड़ साधुओं को सिद्ध समझा जाता है जनता का सामान्यतः यह विश्वास होता है की वे अपनी सिद्धि के प्रभाव से रोगों का निवारण कर सकते हैं.औघड़,तंत्र और तंत्रशास्त्र -तंत्रशास्त्र को आगम भी कहते हैं.यह आगम मार्ग,निगम (वेद-मार्ग) से भिन्न माना जाता है.

4-तांत्रिकों की यह धारणा है की कलियुग में बिना तंत्र -प्रतिपादित मार्ग का निस्तार नहीं है.”रूद्यामल तंत्र” में अनेक श्लोक ऐसे हैं जिनसे यह स्पष्ट होता है की तंत्रशास्त्र एवं अथर्ववेद में घनिष्ठ सम्बंध है.तंत्रशास्त्र एक सम्पूर्ण शास्त्र है,जिसमें मस्तिष्क,ह्रदय तथा कर्मेन्द्रियों (ज्ञान,इच्छा तथा क्रिया ) तीनों के लिए प्रचुर सामग्री मिलती है.तंत्र -मार्ग सहज एवं स्वाभाविक होने के कारण सुगम भी है.इसमें अन्य शास्त्रों की भाँती अध्ययन-अध्यापन,तर्क-वितर्क आदि की अपेक्षा नहीं होती.कभी-कभी तंत्र -शास्त्र को मन्त्र-शास्त्र भी कहते हैं .साधन-प्रधान होने के कारण इसे साधन तंत्र भी कहते हैं.

5-तंत्रशास्त्र की मान्यता है की देह ही सभी पुरुषार्थों का साधन है.अतः देह -धन की रक्षा करनी चाहिए,जिससे पुण्य कर्मों के आचरण में सुविधा हो.तांत्रिकों का विशवास है की जब तक वैदिक रीति से साधना रुपी वृक्षों में फूल उगेंगे तब तक तांत्रिक पद्धति से उसमें फल लगने लगेंगे.

.....SHIVOHAM....