Recent Posts

Archive

Tags

No tags yet.

क्या हैं त्रिदोष का मूल आधार ?नाड़ी परीक्षण या पल्स चेक करने की क्या प्रक्रिया है?क्या प्रभाव (लाभ -


क्या आयुर्वेद भारतीय आयुर्विज्ञान है?-

04 FACTS;-

1-आयुर्वेद (आयुः + वेद = आयुर्वेद) विश्व की प्राचीनतम चिकित्सा प्रणालियों में से एक है। यह विज्ञान, कला और दर्शन का मिश्रण है। ‘आयुर्वेद’ नाम का अर्थ है, ‘जीवन का ज्ञान’ और यही संक्षेप में आयुर्वेद का सार है।"आयुर्वेद " शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है - "आयुष" और "वेद"। जिस ग्रंथ में - हित आयु (जीवन के अनुकूल), अहित आयु (जीवन के प्रतिकूल), सुख आयु (स्वस्थ जीवन), एवं दुःख आयु (रोग अवस्था) - इनका वर्णन हो उसे आयुर्वेद कहते हैं।)

2-आयुर्वेद भारतीय आयुर्विज्ञान है। आयुर्विज्ञान, विज्ञान की वह शाखा है जिसका संबंध मानव शरीर को निरोग रखने, रोग हो जाने पर रोग से मुक्त करने अथवा उसका शमन करने तथा आयु बढ़ाने से है।जिस शास्त्र में आयु शाखा (उम्र का विभाजन), आयु विद्या, आयुसूत्र, आयु ज्ञान, आयु लक्षण (प्राण होने के चिन्ह), आयु तंत्र (शारीरिक रचना शारीरिक क्रियाएं) - इन सम्पूर्ण विषयों की जानकारी मिलती है वह आयुर्वेद है।

3-इस शास्त्र के आदि आचार्य अश्विनीकुमार माने जाते हैं जिन्होने दक्ष प्रजापति के धड़ में बकरे का सिर जोड़ा था। अश्विनी कुमारों से इंद्र ने यह विद्या प्राप्त की। इंद्र ने धन्वंतरि को सिखाया। काशी के राजा दिवोदास धन्वंतरि के अवतार कहे गए हैं। उनसे जाकर सुश्रुत ने आयुर्वेद पढ़ा। अत्रि और भारद्वाज भी इस शास्त्र के प्रवर्तक माने जाते हैं।

4-आय़ुर्वेद के आचार्य ये हैं— अश्विनीकुमार, धन्वंतरि, दिवोदास (काशिराज), नकुल, सहदेव, अर्कि, च्यवन, जनक, बुध, जावाल, जाजलि, पैल, करथ, अगस्त्य, अत्रि तथा उनके छः शिष्य (अग्निवेश, भेड़, जतुकर्ण, पराशर, सीरपाणि, हारीत), सुश्रुत और चरक। ब्रह्मा ने आयुर्वेद को आठ भागों में बाँटकर प्रत्येक भाग का नाम 'तन्त्र' रखा । ये आठ भाग निम्नलिखित हैं :१) शल्य तन्त्र,२) शालाक्य तन्त्र,३) काय चिकित्सा तन्त्र,४) भूत विद्या तन्त्र,५) कौमारभृत्य तन्त्र,६) अगद तन्त्र,७) रसायन तन्त्र और८) वाजीकरण तन्त्र ।

क्या त्रिदोष आयुर्वेद का मूलाधार हैं?-

07 FACTS;-

1-आयुर्वेद का मूलाधार हैं त्रिदोष तथा पंचमहाभूत जिनसे वे निर्मित हैं।

वात, पित्‍त, कफ इन तीनों को दोष कहते हैं। इन तीनों को धातु भी कहा जाता है। धातु इसलिये कहा जाता है क्‍योंकि ये शरीर को धारण करते हैं। चूंकि त्रिदोष, धातु और मल को दूषित करते हैं, इसी कारण से इनको ‘दोष’ कहते हैं।

2-वात, पित्त, कफ - ये तीन शारीरिक दोष माने गये हैं। ये दोष असामान्य आहार-विहार से विकृत या दूषित हो जाते है इसलिए इसे 'दोष' कहा जाता है। शरीरगत् अन्य धातु आदि तत्व इन्हे दोषों के द्वारा दूषित होता है। इन तीनो दोषों को शरीर का स्तम्भ कहा जाता है। इनके प्राकृत अवस्था एवं सम मात्रा ही शरीर को स्वस्थ रखता है, यदि इनका क्षय या वृद्धि होती है, तो शरीर में विकृति या रोग उत्पन्न हो जाती है।

3-दोषों की विषमता ही रोग है और दोषों का साम्य आरोग्य है।

तीनों दोषों में सर्वप्रथम वात दोष ही विरूद्ध आहार-विहार से प्रकुपित होता है और अन्य दोष एवं धातु को दूषित कर रोग उत्पन्न करता है।वातादि दोषों के अधिक क्रियाशील होने से शरीर में दोष वर्ग की प्रधानता रहती है। वात दोष प्राकृत रूप से प्राणियों का प्राण माना गया है।

4-पंचमहाभूतों से दोषों की उत्पत्ति

4-1. सृष्टि में व्याप्त वायु महाभूत से शरीरगत वात दोष की उत्पति होती है,

4-2. अग्नि से पित्त दोष की उत्पत्ति होती है,

4-3. जल तथा पृथ्वी महाभूतों से कफ दोष की उत्पति होती है।

शरीर रक्त आदि धातु से निर्मित होता है एवं मल शरीर को स्तंभ की तरह सम्हाले हुये हैं। शरीर की क्षय, वृद्धि, शरीरगत् अवयवो द्रव्यों की विकृति, आरोग्यता-अनारोग्यता, इन दोष धातु मलों पर ही आधारित है।

5-वात दोष के पांच भेद:

5-1- प्राण वात

5-2- समान वात

5-3- उदान वात

5-4- अपान वात

5-5- व्‍यान वात

6-पित्‍त दोष के पांच भेद

6-1- साधक पित्‍त

6-2- भ्राजक पित्‍त

6-3- रंजक पित्‍त

6-4- आलोचक पित्‍त

6-5- पाचक पित्‍त

7-कफ दोष के पांच भेद

7-1- क्‍लेदन कफ

7-2- अवलम्‍बन कफ

7-3- श्‍लेष्‍मन कफ

7-4- रसन कफ

7-5- स्‍नेहन कफ

त्रिदोष सिद्धान्त क्या हैं?-

02 FACTS;-

1- आयुर्वेद का मूलाधार है- ‘त्रिदोष सिद्धान्त’ और ये तीन दोष है- वात,

पित्त और कफ ।त्रिदोष अर्थात् वात, पित्त, कफ की दो अवस्थाएं होती है -

1- 1. समावस्था (न कम, न अधिक, न प्रकुपित, यानि संतुलित, स्वाभाविक, प्राकृत)

1- 2. विषमावस्था (हीन, अति, प्रकुपित, यानि दुषित, बिगड़ी हुई असंतुलित, विकृत) ।

2-वास्तव में वात, पित्त, कफ, (समावस्था) में दोष नहीं है बल्कि धातुएं है जो शरीर को धारण करती है तभी ये दोष कहलाती है ।‘त्रिदोष-सिद्धांत’ के

‘त्रिदोष-सिद्धांत’ के अनुसार शरीर में वात, पित्त, कफ जब संतुलित या सम अवस्था में होते हैं तब शरीर स्वस्थ रहता है । इसके विपरीत जब ये प्रकुपित होकर असन्तुलित या विषम हो जाते हैं तो अस्वस्थ हो जाता है।इस प्रकार रोगों का कारण वात, पित्त, कफ का असंतुलन होना है ।

दोष और रस:-

05 FACTS;-

1-दोषों के प्रकोप और शमन में रसों का भी बड़ा योगदान है । आयुर्वेद में छह रस माने गये हैं:-

1. अम्ल (खट्टा), 2. मधुर (मीठा), 3. लवण (नमकीन), 4. कटु (कड़वा), 5. तिक्त (चरपरा), 6. कषाय (कसैला)।

2-प्रत्येक व्यक्ति को संतुलित रूप में इन छ: ही रसों के स्वाद का आनन्द लेना चाहिए । यदि अपनी प्रकृति को समझकर इन छ: रसों का मनुष्य उचित उपयोग करे तो उसका आहार सुखदायी भी होगा और वात, पित्त, कफ, को समावस्था में रखने में भी सहायक होगा । इसके विपरीत यदि रसों का अनुचित और मनमाना उपयोग करेगा तो उसका आहार दोषों को कुपित करने वाला होकर अनेकानेक रोगों की उत्पत्ति में सहायक होगा।

3-आयुर्वेद के अनुसार प्रभाव की दृष्टि से तीन-तीन रस वात, पित्त और कफ को बढ़ाने वाले होते है और तीन-तीन ही तीनों को शान्त करने वाले होते हैं

3-1-कफवर्धक;-

मीठे, खट्टे, नमकीन।

3-2-कफशामक;-

कडवे, चरपरे, कसैले।

3-3-पित्तवर्धक;-

कडवे, नमकीन, खट्टे।

3-4-पित्तशामक;-

मीठे, चरपरे, कसैले।

3-5-वातवर्धक;-कड़वे, चरपरे, कसैले।

3-6-वातशामक-मीठे, खट्टे, नमकीन।

4-मीठे, खट्टे, और नमकीन जितने पदार्थ हैं वे कफ को बढ़ाते हैं । नमकीन और मीठे, खट्टे, पदार्थ पित्त को बढ़ाने वाले हैं । कड़वे चरपरे, कसैले पदार्थ वायु को बढ़ाने वाले हैं । जो रस कफ को बढ़ाते हैं । वे (मीठे, खट्टे, नमकीन) ही वायु को शान्त करते हैं । मीठी, चरपरी, कसैली चीजें पित्त को शान्त करती है । कड़वी चरपरी, कसैली चीजें पित्त को शान्त करती है ।

5-उदाहरणार्थ - कफ-प्रकृति के व्यक्ति को मीठे, खट्टे, नमकीन चीजों को कम मात्रा में लेना चाहिए और कड़वी चरपरी और कसैली चीजों को अधिक मात्रा में खाना चाहिए ताकि कफ बढ़ने न पाए ।

दोष और धातुएं:-

04 FACTS;-

1-वात, पित्त, कफ का प्रकोप आहार-विहार के अतिरिक्त धातुओं के प्रभाव से भी होता है । जैसे, वात-ग्रीष्म ऋतु में संचित होता है, वर्षा ऋतु में कुपित रहता है और शरद ऋतु में शान्त रहता है । पित्त-वर्षा ऋतु में संचित, शरद ऋतु में कुपित और हेमन्त ऋतु में शान्त रहता है । कफ- शिशिर ऋतु में संचित, बसन्त में कुपित और ग्रीष्म-ऋतु में शान्त होता है।

दोष>>>संचय>>>प्रकोप>>>शमन

1-वात>>>ग्रीष्म(ज्येष्ठ-आषाढ़)>>>वर्षा>>>शरद

2-पित्त>>> वर्षा(सावन-भादों)>>>शरद(आश्विन-कार्तिक)>>>हेमन्त(मार्गशीष-पौष)

3-कफ>>> शिशिर(माघ-फाल्गुन)>>> बसन्त(चैत्र-बैसाख)>>> ग्रीष्म

2-अत: ऋतुओं के लक्षण जानकर उसके अनुसार आचरण करने से व्यक्ति स्वस्थ, सुखी और दीर्घायु रह सकता है । वर्षा ऋतु में प्रकुपित वात का, शरद ऋतु में पित्त का और बसन्त ऋतु में कफ का शमन हो, ऐसा आहार-विहार होना चाहिए ।

3-ऋतुओं के अलावा जीवन-काल के अनुसार भी दोष प्रकुपित होते है जैसे बाल्यावस्था में कफ का प्रकोप, युवावस्था में पित्त का प्रकोप और वृद्धावस्था में वात का प्रकोप होता है । इसी प्रकार दिन किस-किस समय किस दोष का जोर रहता है, यह बताते हुए कहा गया है कि दिन के प्रथम प्रहर में वात का, दोपहर में पित्त का और रात्रि में कफ का जोर रहता है । 4-किन-किन दशाओं में त्रिदोष प्रकुपित होते है इस बात की सूक्ष्मता से छानबीन करते हुए, आयुर्वेद में यह भी कहा गया है कि भोजन करने के तुरन्त बाद ही कफ की उत्पत्ति होती है, भोजन पचते समय पित्त का प्रकोप होता है और भोजन के पाचन के बाद वायु का प्रकोप आरम्भ होता है । इसीलिए भोजन के तुरन्त बाद कफ की शन्ति के लिए पान खाने की प्रथा का प्रचलन है ।

रोग से बचने और स्वस्थ रहने के उपाय;-

03 FACTS;-

1-रोग से बचने और स्वस्थ रहने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को ऐसा आहार-विहार अपनाना चाहिए जिससे त्रिदोष की विषमावस्था अर्थात् वात-प्रकोप, पित-प्रकोप और कफ-प्रकोप से बचा जा सकें और यदि गलत आहार-विहार के कारण किसी एक या अधिक दोष के प्रकुपित हो जाने से किसी रोग की उत्पति हो ही जाए तो पहले यह जानने का प्रयास करना चाहिए कि रोगी में किस दोष का प्रकोप हुआ है ।

2-रोगी की प्रकृति कौन सी है? अर्थात वात (बादी) प्रकृति है या पित्त (गर्म) प्रकृति या कफ (ठंडी) प्रकृति? इसके अतिरिक्त निदान करने समय रोगी की आयु, मानसिक दशा, शारीरिक बल, रोग की अवस्था, देश, ऋतु काल, मानसिक आदि पर भी विचार कर लेना चाहिए । रोग की जड़ से समाप्त करने के लिए या स्थायी रूप से दूर करने के लिए यह आवश्यक है ।

3-फिर जिस दोष का प्रकोप हुआ है उस प्रकृति वात, पित्त, कफ दोष के शमन के लिए रोगी की प्रकृति को शान्त करने वाले आहार-विहार को अपनाना चाहिए । जैसे यदि कफ-प्रकोप जान पड़े जो कफवर्धक आहार से बचना चाहिए, साथ ही कफशामक आहार-विहार को अपनाना चाहिए ।

1-वात दोष;-

02 FACTS;-

1-वात का स्वरूप..वात रूखा, शीतल, सूक्ष्म, चंचल, हल्का, घाव भरने वाला, और रजोगुण वाला है ।तीनों दोषों में सर्वाधिक बलवान वात है जिसके बिना पित्त और कफ अपने आप में लूले-लंगड़े हैं । वास्तव में वायु हद्य और वात नाड़ी की चालक है और इनके कारण ही आयु और जीवन हैं ।

2-आयुर्वेदानुसार वात के पांच प्रकार है - उदानवायु, प्राणवायु, समानवायु, अपानवायु, व्यानवायु ।

वात प्रकोप के लक्षण:-

12 FACTS;-

1- शरीर का रूखा-सूखा होना ।त्वचा का, खासकर पैरों की बिवाइयां, हथेलियां, होंठ, आदि का फटना ।

2-धातुओं का क्षय होना या तन्तुओं के अपर्याप्त पोषण के कारण

शरीर का सूखा या दुर्बला होते जाना।

3-अंगों की शिथिलता,हाथ, पैरों, गर्दन, आदि का कांपना और फड़कना ।

4-अंगों में कठोरता और उनका जकड़ जाना।जोड़ों में दर्द होना, जोड़ों का चट-चट करना ।

5- नाखून, केश आदि का कड़ा और रूखा होना ।

6- अंगों और नाड़ियों में खिंचाव होना, सुइंया चुभने, तोड़ने या झटका लगने, मसलने, काटने जैसी पीड़ाएं होना ।

7- अंगों में वायु का भरा रहना ।

8- पेट का गैस से फूलना और अपानवायु का अधिक निकलना । डकार या हिचकी आना ।

9- भूख- प्यास अनियमित अर्थात् कभी ज्यादा, कभी कम लगना ।

10- मुख का सूखना, स्वर का कर्कश होना ।

11- स्वाद का कसैला होना ।

12- कब्जियत रहना ।

वात-प्रकोप के कारण;-

06 FACTS;-

1- कड़वे, कैसेले, चरपरे रसवाले पदार्थो का अधिक सेवन ।

2-रुक्ष, हल्का और अल्प भोजन करना ।

3- उपवास या भूखा रहना ।

4- ठंडे बासी, गैस करने वाले, फास्टफूड, डिब्बेबंद व सत्वहीन

और प्रदूषित खाद्य पदार्थो का सेवन ।

5-अनावश्यक रूप से रातों में देर तक जागना या स्वाभाविक निद्रा में बाधा डालना ।

6- वातवर्धक आहार का सेवन, जैसे : चावल, जौ, चने का

शाक, सूखे भुने हुए चने, मोठ, मसूर, अरहर, चीनी, फूलगोभी,

मटर, सेम, कच्चा

वात वर्धक आहार :-

चावल, चने की भाजी, भूने हुए चने, मोठ, मसूर, तुवर, शक्कर, फूलगोभी, मटर, सेम, पालक सूखे मेवे, चाय, कॉफी, शराब और सिगरेट आदि वातवर्धक आहार होते हैं ।

वात शामक आहार :-

गेहूँ की चपाती, कुल्थी, उड़द, सरसों, तिल्ली का तेल, गाय का दूध, छाछ, घी, मिश्री, अदरक, पोदीना, प्याज, परवल, बथुआ, लौकी, मूली, गाजर, चौलाई, अंगूर, नारंगी, फालसा, शहतूत, पपीता, पके आम, मीठा अनार, अखरोट, बादाम, अंजीर, मुनक्का आदि पदार्थ वात का शमन अर्थात शरीर में बढ़ी हुई वायु को कम करने वाले होते हैं ।

NOTE;-

जैसे दूध के साथ मूली व दही के साथ खीर लेना अहितकारी है परन्तु केले के साथ छोटी इलाइची एवं चावल के साथ नारियल की गिरी लाभप्रद है इसी प्रकार भोजन ऋतु के अनुकूल हो । उदाहरण के लिए ग्रीष्म ऋतु में गेहूॅं के साथ जौ लाभप्रद रहता है क्योंकि जौ की प्रकृति शीतल होती है परन्तु वर्षा ऋतु में गेहूॅं के साथ चना पिसवाना आवश्यक है वर्षा ऋतु में वात कुपित होता है जिसको रोकने के लिए चना बहुत लाभप्रद रहता है।

2-पित्त दोष;-

पित्त दोष अग्नि तत्व प्रधान वाला होता है । शरीर में दाह और ऊष्मा पैदा करने वाला होता है ।

पित्त प्रकोप के सामान्य लक्षण :-

शरीर में जलन, आँखों में लाली और पीलापन, अधिक गरमी लगना, त्वचा छुने में गरम महसूस होना, फोड़े फुन्सी होना, त्वचा, मल मूत्र, व आँखों में पीलापन, गले में जलन, प्यास ज्यादा लगना, मुँह में कड़वापन और खट्टापन महसूस होना और अक्सर पतले दस्त लग जाना आदि पित्त दोष के प्रकोप के सामान्य लक्षण होते हैं ।

पित्त वर्धक आहार :-

उड़द की दाल, सरसों, खट्टा दही, छाछ, आइसक्रीम, गुड़, मेथी, हींग, खट्टे फल, तले हुए खाद्य पदार्थ, और गर्म प्रकृति के आहार आदि के सेवन से शरीर में पित्त दोष की वृद्धि होती है ।

पित्त शामक आहार :-

चावल, जौ, गेहूँ, ज्वार, सत्तू, मसूर, तुवर, दलिया, गाय का दूध, मलाई, पनीर, घी, मक्खन, मीठा दही, खीर, मिश्री, परवल, बथुआ, करेला, टिंडा, तुरई, धनिया, पत्ता गोभी, खीरा, प्याज, मीठा अनार, तरबूज, ऑवला, मुनक्का, केला, नारियल, शहतूत, सेब, और आलू बुखारा आदि ।

3-कफ दोष;-

कफ दोष मृदुता कारक और शरीर को शांत बनाने वाला होता है ।

कफ प्रकोप के सामान्य लक्षण :-

शरीर में भारीपन, शरीर में थकावट और आलस्य बना रहना, ठंड की अधिकता बनी रहना, त्वचा में चिकनापन, मुँह में मीठा मीठा सा स्वाद बना रहना, लार का अधिक बनना, भूख कम लगना, अरुचि, मंदाग्नि बनी रहना और मल आँव युक्त आना आदि कफ दोष के प्रकोप के सामान्य लक्षण हैं ।

कफ वर्धक आहार :-

चावल, उड़द, नया गेहूँ, तिल, जैतून, बादाम, दूध से बने पदार्थ, आईसक्रीम, गन्ने के रस से बने पदार्थ ( सिरका छोड़कर ) आलू, अरबी, बैंगन, लोकी, तुरई, मटर, केला, सिंघाड़ा, अमरूद और मीठे फल आदि के सेवन सए कफ दोष की वृद्धि होती है ।

कफ शामक आहार :-

पुराना गेहूँ, जौ, मूंग, मोठ, मसूर, चना, कुल्थी, बथुआ, टिंडे, करेले, अदरक, गाजर, खीरा, लहसुन, प्याज, अनार, सेब, तरबूज, बेल, व सूखे मेवे आदि का सेवन करने से बढ़े हुए कफ दोष का नाश होता है ।

;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;

नाडी परीक्षा क्या है?

शरीर में वात, पित्त व कफ त्रिधातु पाई जाती है। इनमें दोष की वजह से व्याधि होती है। जिस स्पंदन की गति व बल के आधार पर धातु और मल की विकृति की पहचान करते हैं वह नाड़ी कहलाती है।शरीर में वात, पित्त व कफ त्रिधातु पाई जाती है। इनमें दोष की वजह से व्यक्ति रोगग्रस्त हो जाता है। कलाई की धमनी की जगह नाड़ी देखी जाती है। जिस स्पंदन की गति व बल के आधार पर त्रिधातु और मल की विकृति की पहचान करते हैं वह नाड़ी कहलाती है।

नाड़ी की दर से पता लगाये आपको कौन सा रोग है : -

नाडी परीक्षा के बारे में शारंगधर संहिता, भावप्रकाश, योगरत्नाकर आदि ग्रंथों में वर्णन है. महर्षि सुश्रुत अपनी योगिक शक्ति से समस्त शरीर की सभी नाड़ियाँ देख सकते थे. ऐलोपेथी में तो पल्स सिर्फ दिल की धड़कन का पता लगाती है. पर ये इससे कहीं अधिक बताती है. आयुर्वेद में पारंगत वैद्य नाडी परीक्षा से रोगों का पता लगाते है. इससे ये पता चलता है की कौन सा दोष शरीर में विद्यमान है.

ये बिना किसी महँगी और तकलीफदायक डायग्नोस्टिक तकनीक के बिलकुल सही निदान करती है. जैसे की शरीर में कहाँ कितने साइज़ का ट्यूमर है, किडनी खराब है या ऐसा ही कोई भी जटिल से जटिल रोग का पता चल जाता है. दक्ष वैद्य हफ्ते भर पहले क्या खाया था ये भी बता देतें है. भविष्य में क्या रोग होने की संभावना है ये भी पता चलता है.

कैसे देखनी चाहिए नाड़ी :-

पुरुष के दाहिने हाथ की तो स्त्री के बांए हाथ की नाड़ी देखने का चलन अधिक है. वैद्य पुरुष के दाहिने हाथ की नाड़ी देखकर और स्त्री के बाएं हाथ की नाड़ी देखकर रोग की पहचान करते हैं. हालांकि कुछ वैद पुरुष स्त्री के दोनों हाथ की नाड़ी भी देखकर रोगों का ज्ञान प्राप्त करते हैं.

आखिर कब देखनी चाहिए नाड़ी :-

किसी व्यक्ति को कौन सा रोग है यह जानने के लिए सबसे सही समय सुबह माना जाता है और इस समय रोगी को खाली पेट रहकर ही वैद के पास जाना होता है.

नाडिय़ों के प्रकार व दोष वात नाड़ी दोष - इससे सर्वाइकल, ऑस्टियो आर्थराइट्सि और स्पॉन्डिलाइसिस की दिक्कत जयादा होती है।

पित्त नाड़ी दोष - गालब्लैडर में सूजन, लिवर संबंधी बीमारियां, पीलिया, सिरोसिस की पहचान होती है।

कफ नाड़ी दोष - इससे अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, ट्यूबरोकलोसिस, रक्त, एलर्जी, सांस संबंधी बीमारियों व बुखार आने पर जांच करते हैं।

पंचात्मक नाड़ी दोष - वात-पित्त-कफ की नाड़ी क्रमश: पांच-पांच प्रकार की होती है। पहला प्राणवायु, दूसरा उदान वायु, तीसरा समान वायु, चौथा अपान वायु व पांचवां