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ब्रज भूमि का क्या महत्व है ?क्या है ब्रज के सुप्रसिद्ध वनों के नाम ?


ब्रज भूमि;-

05 FACTS;-

1-ब्रज भूमि केवल तीर्थ क्षेत्र नहींबल्कि संस्कृति की चिरन्तरता का ठोस सत्य है। हजारों सालों का इतिहास अपने अंक में समेटे ब्रज भूमि भारत की गहरी धार्मिक जड़ों का वट वृक्ष है जिसकी कई शाखाएं-प्रशाखाएं फैली हैं। भौगोलिक दृष्टि से मानचित्र धरातल पर ब्रज नाम का कोई क्षेत्र नहीं है मगर सनातन मतावलम्बियों के हृदय में इसका वजूद है।

2-श्रीकृष्ण के जन्म लेने तथा पश्चात् लीलाओं के क्रमिक विकास किये जाने के कारण तत्कालीन क्षेत्र विशेष धार्मिक आस्था से जुड़ गये। कालान्तर में अपने आस-पास के क्षेत्रों को भी वे सांस्कृतिक रूप से प्रभावित करते रहे, फलस्वरूप कृष्ण भक्ति से जुड़े ये क्षेत्र समय अन्तराल पर ब्रज क्षेत्र का हिस्सा बन गये। हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश के कई क्षेत्र ब्रज का अंग माने जाते हैं। इनमें गुडग़ांव, एटा, भरतपुर, डीग, कामवन, मथुरा, वृन्दावन, गोकुल, दाऊजी, गिरिराज पर्वत, रमनरेत्ती, बरसाना, नन्दगांव, ग्वालियर, आगरा, मेरठ आदि प्रमुख हैं।

3-गर्ग संहिता के वृन्दावन खण्ड के प्रथम अध्याय में यह उल्लेखित है कि दिव्य मथुरा में जहां भी श्रीकृष्ण भगवान ने जन्म लेकर लीलाएं की थी, वहां समस्त वनों में वृन्दावन उत्तम है जो बैकुण्ठ से भी पवित्र धाम है। वराह पुराण से ब्रज की पौराणिकता सिद्ध होती है। 4-आदि पुरूष मनु ने भी यमुना के तट को ही अपना तपस्या का स्थल चुना था। बालक ध्रुव ने मधुवन में भगवान विष्णु की आराधना की थी। चैतन्य महाप्रभु, वल्लभाचार्य जी आदि महापुरूषों ने भी ब्रज क्षेत्र को ही अपना आराध्य क्षेत्र मानते हुए परिक्रमाएं की। वस्तुत: ब्रज क्षेत्र सनातन मतावलम्बियों की अगाध आस्था का क्षेत्र है। 5-ब्रज में पद यात्राओं का दौर वर्ष भर चलता रहता है। मान्यता है कि यात्रा में अभाव ग्रस्त होकर रहने पर संन्यास आश्रम का फल मिलता है अगर आस्तिक हाथ में बांस की लाठी लेकर चलता है तो उसे वानप्रस्थ आश्रम का फल मिलता है।

ब्रज क्षेत्र के महत्त्वपूर्ण दर्शनीय स्थल और नानाविध पर्व;-

03 FACTS;-

1-ब्रज क्षेत्र में मथुरा प्रमुख केन्द्र है। मथुरा के अलावा वृंदावन, गोकुल, दाऊजी, बरसाना, नंदगांव, गोवर्धन पर्वत महत्त्वपूर्ण दर्शनीय स्थल हैं। उक्त स्थानों के अलावा भी अन्य अनेक दर्शनीय स्थल हैं जिनका किसी न किसी प्रकार से श्रीकृष्ण कथा-क्रम से जुड़ाव है। ब्रज का मुख्य केन्द्र मथुरा देश के अन्य भागों से रेल एवम् सड़क मार्ग दोनों से सीधा जुड़ा हुआ है।

2-बरसाने की लट्ठमार होली, दाऊजी का हुरंगा, फाल्गुन में पण्डे का जलती हुई होली में प्रवेश, दीपावली के अवसर पर गोवर्धन मानसी गंगा पर दीपदान, अन्नकूट दर्शन, विश्राम घाट मथुरा पर यम-द्वितीया के अवसर पर भाई-बहनों का एक साथ स्नान करना, फाल्गुन मास में ब्रज की सप्तरंगी होली, वृंदावन में रंगजी मन्दिर का रथ यात्रा मेला, बसंती कमरे के दर्शन, सावन-भादों के झूले, हिंडोलों के दर्शन, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी समारोह आदि सहित अन्यान्य पर्व,उत्सव बरबस श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकृष्ट करने से नहीं चूकते और यही कारण है कि नानाविध पर्वों, उत्सवों के कारण, भक्तगणों का ब्रज क्षेत्र में वर्ष-भर आवागमन लगा रहता है। ब्रज वह क्षेत्र है जिसके धूलि कण मस्तक पर लगाने योग्य हैं। 3-ब्रज क्षेत्र के सुप्रसिद्ध १२ बन

(१) मधुबन, (२) तालबन, (३) कुमुदबन, (४) बहुलाबन, (५) कामबन, (६) खिदिरबन, (७) वृन्दाबन, (८) भद्रबन, (९) भांडीरबन, (१०) बेलबन, (११) लोहबन और (१२) महाबन हैं।

इनमें से आरंभ के ७ बन यमुना नदी के पश्चिम में हैं और अन्त के ५ बन उसके पूर्व में हैं। भद्रबन, भांडीरबन, और बेलबन - ये तीनों बन यमुना की बांयी ओर ब्रज की उत्तरी सीमा से लेकर वर्तमान वृन्दाबन के सामने तक थे। वर्तमान काल में उनका अधिकांश भाग कट गया है और वहाँ पर छोटे-बड़े गाँव बस गये हैं। उन गाँवों में टप्पल, खैर, बाजना, नौहझील, सुरीर, भाँट पानी गाँव उल्लेखनीय हैं। इनका संक्षिप्त वृतांत इस प्रकार है -

१२ बनों का संक्षिप्त वृतांत ;-

1-मधुबन;-

04 FACTS;-

1-यह ब्रज का सर्वाधिक प्राचीन वनखंड है। इसका नामोल्लेख प्रगैतिहासिक काल से ही मिलता है। राजकुमार ध्रुव इसी बन में तपस्या की थी। सत्रत्रुध्न ने यहां के अत्याचारी राजा लवणासुर को मारकर इसी बन के एक भाग में मथुरा पुरी की स्थापना की थी। वर्तमान काल में उक्त विशाल बन के स्थान पर एक छोटी सी कदमखंडी शेष रह गई है और प्राचीन मथुरा के स्थान पर महोली नामक ब्रज ग्राम बसा हुआ है, जो कि मथुरा तहसील में पड़ता है। 2-मधुपुरी या मधुरा के पास का एक वन जिसका स्वामी मधु नाम का दैत्य था. मधु के पुत्र

लवणासुर को शत्रुघ्न ने विजित किया था.मथुरा से लगभग साढ़े तीन मील दक्षिण-पश्चिम की ओर स्थित यह ग्राम वाल्मीकि रामायण में वर्णित मधुपुरी के स्थान पर बसा हुआ है.

मधुपुरी को मधु नामक दैत्य ने बसाया था. उसके पुत्र लवणासुर को शत्रुघ्न ने युद्ध में पराजित

कर उसका वध कर दिया था और मधुपुरी के स्थान पर उन्होंने नई मथुरा या मथुरा नगरी बसाई थी.

3-महोली ग्राम को आजकल मधुवन-महोली कहते हैं. महोली मधुपुरी का अपभ्रंश है.

प्राचीन संस्कृत साहित्य में मधुवन को श्रीकृष्ण की अनेक चंचल बाल-लीलाओं की क्रीड़ास्थली

बताया गया है.यह गोकुल या वृंदावन के निकट कोई वन था. आजकल मथुरा से साढ़े तीन मील दूर महोली मधुवन नामक एक ग्राम है.यह ब्रज के प्रसिद्ध बारह वनों में से एक है..

4-इसी मधुवन में ध्रुव जी ने तप किया..पौराणिक कथा के अनुसार ध्रुव जी ने इसी वन

में तपस्या की थी,इसका वर्णन श्रीमद्भागवत पुराण में मिलता है.जब ध्रुव जी अपनी विमाता

के वचनों से आहत हुए तो रोते रोते अपनी माता के महल में पहुँचे,और सारी बात अपनी माता से कही.

4-1-सुनीति ने कहा – देखो बेटा ध्रुव! तुम्हारी विमाता ने जो कहा वह ठीक ही तो कहा है,

इस संसार में केवल एक ही सार है और वह है केवल हरि की भक्ति.तुम जरा भी देर मत करो तुरंत जंगल में जाओ और तप में लग जाओ.

4-2-माँ का आशीर्बाद लेकर ध्रुव घर से निकल गए रास्ते में उन्हें देवर्षी नारद जी मिले और

ध्रुव से पूछने लगे.तुम कहा जा रहे हो. ध्रुव ने कहा- गुरुदेव में भगबान का तप करने जा रहा हूँ.

नारद जी ने कहा – ध्रुव अभी तुम्हारे खेलने-कूदने के दिन है कहा जंगल में जा रहे हो जाओ

वापस लौट जाओ.पर ध्रुव जी नहीं माने वे अपनी बात से तनिक भी नहीं हटे.नारद जी ने जब देखा की ये बालक तो द्ढसंकल्प वाला है-

तो वे बोले ध्रुव यहाँ से आगे जाने पर तुम्हे मधुवन नाम का एक वन मिलेगा वँहा पर यमुना नदी के किनारे बैठकर पहले अपनी सांसो को प्राणायाम से अपने वश में करना फिर उन्हें मंत्र बताया-

“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नम:”

4-3-इस मंत्र का जप करना,इतना कहकर नारद जी चले गए,और छै माह तक ध्रुव जी ने यही यमुना के किनारे मधुवन में तप किया और भगवान ने उन्हें यही पर दर्शन दिए.

ग्राम के पूर्व में ध्रुव टीला है. जिस पर बालक ध्रुव एवं उनके आराध्य चतुर्भुज नारायण का

श्रीविग्रह विराजमान है.यही ध्रुव की तपस्यास्थली है. उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान

ने उनको दर्शन दिया और छत्तीस हज़ार वर्ष का एकछत्र भूमण्डल का राज्य एवं तत्पश्चात अक्षय ध्रुवलोक प्रदान किया. ध्रुवलोक ब्रह्माण्ड के अन्तर्गत ही श्रीहरि का एक अक्षयधाम है.

2-ताल बन;-

06 FACTS;-

प्राचीन काल में यह ताल के बृक्षों का यह एक बड़ा बन था और इसमें जंगली गधों का बड़ा उपद्रव रहता था। भागवत में वर्णित है, बलराम ने उन गधों का संहार कर उनके उत्पात को शांत किया था। कालान्तर में उक्त बन उजड़ गया और शताब्दियों के पश्चात् वहां तारसी नामक एक गाँव बस गया, जो इस समय मथुरा तहसील के अंतर्गत है। 2-यह वही तालवन है, जहाँ श्री कृष्ण और श्री बलराम जी ने यादवों के हितार्थ और सखाओं के विनोदार्थ धेनुकासुर का वध किया था .मधुवन से दक्षिण पश्चिम में लगभग ढाई

मील की दूरी पर यह तालवन स्थित है . यहाँ ताल वृक्षों पर भरपूर एक बड़ा ही सुहावना एवं रमणीय वन था.

3-दुष्ट कंस ने अपने एक अनुयायी धेनुकासुर को उस वन की रक्षा के लिए नियुक्त कर रखा

था.वह दैत्य बहुत सी पत्नियों और पुत्रों के साथ बड़ी सावधानी से इस वन की रक्षा करता था,

अत: साधारण लोगों के लिए यह वन अगम्य था. केवल महाराज कंस एवं उसके अनुयायी ही मधुर तालफलों का रसास्वादन करते थे.

4-यह सुनकर कृष्ण और बलदेव सखाओं को साथ लेकर तालवन पहुँचे,उन्होंने यह भी बतलाया कि कहीं पास से ही पके हुए मधुर तालफलों की सुगन्ध आ रही है.

बलदेवजी ने पके हुए फलों से लदे हुए एक पेड़ को नीचे से हिला दिया, जिससे पके हुए फल थप-थप कर पृथ्वी पर गिरने लगे.

5-ग्वाल बाल आनन्द से उछलने लगे. इतने में ही फलों के गिरने का शब्द सुनकर धेनुकासुर ने अपने अनुचारों के साथ कृष्ण और बलदेव पर अपने पिछले पैरों से जोरों से आक्रमण किया.

बलदेव प्रभु ने महापराक्रमी धेनुकासुर के पिछले पैरों को पकड़कर उसे आकाश में घुमाया तथा एक बृहत ताल वृक्ष के ऊपर पटक दिया.साथ ही साथ वह असुर मल–मूत्र त्याग करता

हुआ मारा गया. इधर कृष्ण ने भी धेनुकासुर अनुचरों का वध करना आरम्भ कर दिया.

इस प्रकार सारा तालवन गधों के मल-मूत्र और रक्त से दूषित हो गया.ताल के सारे वृक्ष भी एक दूसरे पर गिरकर नष्ट हो गये.

6-पीछे से तालवन शुद्ध होने पर सखाओं एवं सर्वसाधारण के लिए सुलभ हो गया.

यहाँ बलभद्र कुण्ड और बलदेवजी का मन्दिर है.

3-कुमुदवन;-

03 FACTS;- 1-तालवन से दो मील पश्चिम में कुमुदवन स्थित है. इसका वर्तमान नाम कुदरवन है. यहाँ

एक कुण्ड है,जिसे कुमुदिनी कुण्ड या विहार कुण्ड भी कहते हैं. श्री कृष्ण एवं श्रीबलराम जी सखाओं के साथ गोचारण करते हुए इस रमणीय स्थान पर विचरण करते थे.

सखाओं के साथ श्रीकृष्ण स्वयं इसमें जलविहार करते तथा गऊओं को भी मधुर शब्दों से बुलाकर चूँ–चूँ कहकर जल पिलाते, तीरी तीरी कहकर उन्हें तट पर बुलाते.

कमुदिनी फूलों के हार बनाकर एक दूसरे को पहनाते, कभी–कभी कृष्ण सखाओं से छिपकर राधिका ,ललिता, विशाखा आदि प्रिय सखियों के साथ जल–विहार करते थे.

2-प्राचीन काल में इस बन में कुमुद पुष्पों की बहुलता थी, जिसके कारण इस बन का नाम 'कुमुद बन' पड़ गया था। वर्तमान काल में इसके समीप एक पुरानी कदमखड़ी है, जो इस बन की प्राचीन पुष्प-समृद्धि का स्मरण दिलाती है।आजकल यहाँ कुण्ड के तट पर श्री कपिल देव जी की मूर्ति विराजमान है.भगवान कपिल ने यहाँ स्वयं भगवान श्री कृष्ण की आराधना

की थी. यहाँ से ब्रजयात्रा शान्तनु कुण्ड से होकर बहुलावन की ओर प्रस्थान करती है.

आसपास में गणेशरा (गन्धेश्वरी वन) दतिहा, आयोरे, गौराई, छटीकरा, गरुड़ गोविन्द, ऊँचा गाँव आदि दर्शनीय लीला–स्थलियाँ हैं.

3-शांतनु कुंड -महाराजा शांतनु का निवास स्थल यह स्थान महाराज शांतनु की तपस्या–स्थली है. इसका वर्तमान नाम सतोहा है.

मथुरा से लगभग तीन मील की दूरी पर गोवर्धन राजमार्ग यह स्थित है. महाराज शान्तनु ने पुत्र कामना से यहाँ पर भगवद आराधना की थी.भीष्म पितामह इनके पुत्र थे. भीष्म पितामह की माता का नाम गंगा था. किन्तु गंगा जी महाराज शान्तनु को छोड़कर चली गई थी.

महाराज की राजधानी हस्तिनापुर होने पर भी शान्तनु कुण्ड में भी उनका एक निवास स्थल

था.यहाँ शान्तनु कुण्ड है,जहाँ संतान की कामना करने वाली स्त्रियाँ इस कुण्ड में स्नान करती हैं तथा मन्दिर के पीछे गोबर का सतिया बनाकर पूजा करती हैं. शान्तनु कुण्ड के बीच

में ऊँचे टीले पर शान्तनु के आराध्य श्री शान्तनु बिहारी जी का मन्दिर है .

4-बहुलावन

10 FACTS;-

1-द्वादश वन (बारह वनों में) में बहुला नामक वन पंचम वन है. जो लोग इस वन में आते है वे मृत्यु पश्चात अग्निलोक को प्राप्त होते हैं.इस बन का नामकरण यहाँ की एक बहुला गाय के नाम पर हुआ है। इस गाय की कथा 'पदम पुराण' में मिलती है। वर्तमान काल में इस स्थान पर झाड़ियों से घिरी हुई एक कदम खंड़ी है, जो यहां के प्राचीन बन-वैभव की सूचक है। इस बन का अधिकांश भाग कट चुका है और आजकल यहां बाटी नामक ग्राम बसा हुआ है।

2-बहुलावन कुण्ड में स्थित पद्मवन में स्नान पान करने वाले व्यक्ति को बहुत पुण्य प्राप्त होता है क्योंकि भगवान विष्णु लक्ष्मी जी सहित यहाँ निवास करते हैं.

आजकल यहाँ “वाटी”नाम का गांव बसा है बहुला नामक गांव की पौराणिक गाथा इसी वन से

सम्बन्धित है.बहुलावन एक परम सुन्दर और रमणीय वन है. यह स्थान बहुला नामक श्रीहरि की सखी (गोपी) का निवास स्थल है.

3-इसका वर्तमान नाम बाटी है. यह स्थान मथुरा से पश्चिम में सात मील की दूरी पर राधाकुंड एवं वृंदावन के मध्य स्थित है.यहाँ संकर्षण कुण्ड तथा मानसरोवर नामक दो कुण्ड हैं.

कभी राधिका मान करके इस स्थान के एक कुंज में छिप गई.कृष्ण ने उनके विरह में कातर

होकर सखियों के द्वारा अनुसंधान कर बड़ी कठिनता से उनका मान भंग किया था.

जनश्रुति है कि जो लोग जैसी कामना कर उसमें स्नान करते हैं, उनके मनोरथ सफल हो जाते हैं.

4-कुण्ड के तट पर स्थित श्रीलक्ष्मी-नारायण मन्दिर, बहुला नामक गाय का स्थान, सुदर्शनचक्र का चिह्न, श्री कुण्डेश्वर महादेव एंव श्री वल्लभाचार्य जी की बैठक दर्शनीय है.

5-बहुला गाय की कथा – एक बार इस स्थान पर बहुला नामक एक गाय को शेर ने घेर लिया

था.वह उसे मारना चाहता था लेकिन गाय ने शेर को आश्वासन दिया कि वह अपने बछड़े को

दूध पिलाकर लौट आयेगी.इस पर विश्वास कर सिंह वहाँ खड़ा रहा. कुछ समय पश्चात जब गाय अपने बछड़े को दूध पिलाकर लौट आई तो शेर गाय के सत्यव्रत से बहुत प्रभावित हुआ,

उसने गाय को छोड़ दिया. इसलिए इस वन का नाम बहुलावन पड़ा.

बहुलावन के अंतर्गत – “श्रीराधा कुंड – श्रीकृष्ण कुंड”, “शकना” (शकना से आगे जाने पर गणेशराक,दतिया,फेचरी गाँव) “तोष गाँव”, “जखिन ग्राम”, “बिहारवन”, “बसौती और राल ग्राम”, “अडींग”, “माधुरी कुंड”, “मयूर ग्राम”, “छकना ग्राम”,आदि आते है.

6-शूक-सारी संवाद सुनकर महाप्रभु भाव विभोर हो गए जिस समय श्रीचैतन्य महाप्रभु ने इस बहुलावन में प्रवेश किया उस समय वहाँ पर चरती हुई सुन्दर-सुन्दर गायों ने चरना छोड़कर उन्हें घेर लिया.वे प्रेम में भरकर हूँकार करने

लगी तथा उनके अंगों को चाटने लगीं.गऊओं के प्रेम-भरे वात्सल्य को देखकर महाप्रभुजी प्रेम की तरंग बहाते हुए, भावाविष्ट हो गये.कुछ स्वस्थ होने पर उनकी लोरियों को

सहलाने लगे. गऊएँ भी उनका संग नहीं छोड़ना चाहती थी.

7-किन्तु चरवाहों ने बड़े कष्ट से उन्हें किसी प्रकार रोका. उस समय महाप्रभु ‘कोथाय कृष्ण, कोथाय कृष्ण’ कहकर भावाविष्ट हो रोदन कर रहे थे.झुण्ड के झुण्ड हिरण और हिरणियाँ

एकत्रित हो गई और निर्भय होकर प्रेम से महाप्रभुजी के अंगों को चाटने लगीं.

शुक–सारी, कोयल, पपीहे, भृड पञ्चमस्वर में गाने लगे. मयूर महाप्रभु के आगे–आगे नृत्य करने लगे.

8-वृक्ष और लताएँ पुलकित हो उठीं– अंकुर, नव-किशलय पुष्पों से भरपूर हो गयी.

वे प्रेमपूर्वक अपनी टहनी रूपी करपल्लवों से महाप्रभु के चरणों में पुष्प और फलों का उपहार

देने लगीं.महाप्रभु वृन्दावन के स्थावर और जंगम सभी के उच्छ्वलित भावों को देखकर और भी अधिक भावविष्ट हो गये.

9-जब महाप्रभु जी भावाविष्ट होकर कृष्ण बोलो! कहकर उच्च स्वर में रोदन करते, ब्रज के स्थावन–जंगम सभी प्रतिध्वनि के रूप में उनको दोहराते.महाप्रभुजी कभी-कभी हिरण और

हिरणियों के गले को पकड़कर बहुत ही कातर स्वर से रोदन करते.वे भी अश्रुपूरित नेत्रों से

उनके मुखारविन्द को प्रणय भरी दृष्टि से निहारने लगतीं.

10-कुछ आगे बढ़ने पर महाप्रभुजी ने देखा आमने–सामने वृक्षों को डालियों पर शुक–सारी परस्पर प्रेम–कलह करते हुए श्री राधाकृष्ण युगल का गुणवान कर रहे हैं.

सौन्दर्यम् ललनालिधैर्यदलनं लीला रमास्तम्भिनी तीर्याम् कन्दुकिताद्रि–वर्यममला: पारे–पराद्धं गुणा:. शीलं सर्वजनानुरञ्जनमहो यस्यायमस्मत प्रभुर्विश्वं विश्वजनीनकीर्तिरवतात् कृष्णे जगन्मोहन: (गोविन्दलीलामृत)

अनुवाद- शूक ने कहा – जिनका अनुपम सौन्दर्य असंख्य रमणीसमूह के धैर्य धन को

अपहरण कर लेता है,जिनकी विश्वविख्यात कीर्ति लक्ष्मी देवी को भी स्तम्भित कर देती है,जिनके गुण अनन्त हैं, जिनका सरल स्वभाव सर्वसाधारण का मनोरंजन करता है,

जिनकी कीर्ति अखिल ब्रह्मण्ड का कल्याण साधन करती है वे हम लोगों के प्रभु जगमोहन समस्त विश्व की रक्षा करें.

5-कामबन;-

यह ब्रज का अत्यन्त प्राचीन और रमणीक बन था, जो पुरातन वृन्दाबन का एक भाग था। कालांतर में वहां बस्ती बस गई थी। इस समय यह राजस्थान के भरतपुर जिला की ड़ीग तहसील का एक बड़ा कस्बा है। इसके पथरीले भाग में दो 'चरण पहाड़िया' हैं, जो धार्मिक स्थली मानी जाती हैं।

6-खिदिरबन;-

यह ब्रज के १२ वनों में से एक है। यहाँ श्री कृष्ण-बलराम सखाओं के साथ तर-तरह की लीलाएं करते थे। यहाँ पर खजूर के बहुत वृक्ष थे। यहाँ पर श्री कृष्ण गोचारण के समय सभी सखाओं के साथ पके हुए खजूर खाते थे। श्री कृष्ण जी ने यहाँ वकासुर नामक असुर का वध किया था।यह प्राचीन बन भी अब समाप्त हो चुका है और इसके स्थान पर अब खाचरा नामक ग्राम बसा हुआ है। यहां पर एक पक्का कुंड और एक मंदिर है।

7-वृन्दाबन;-

09 FACTS;-

1-प्राचीन काल में यह एक विस्तृत बन था, जो अपने प्रकृतिक सौंदर्य और रमणीक बनश्री के लिये विख्यात था। जब मथुरा के अत्याचारी राजा कंस के आतंक से नंद आदि गोपों को वृद्धबन (महाबन) स्थित गोप-बस्ती (गोकुल) में रहना असंभव हो गया, तब वे सामुहिक रूप से वहां से हटकर अपने गो-समूह के साथ वृन्दाबन में जा कर रहे थे।

2-भागवत् आदि पुराणों से और उनके आधार पर सूरदास आदि ब्रज-भाषा कावियों की रचनाओं से ज्ञात होता है कि उस वृन्दाबन में गोबर्धन पहाड़ी थी और उसके निकट ही यमुना प्रवाहित होती थी। यमुना के तटवर्ती सघन कुंजों और विस्तृत चारागाहों में तथा हरी-भरी गोबर्धन पहाड़ी पर वे अपनी गायें चराया करते थे।वह वृन्दाबन पंचयोज अर्थात बीस कोस परधि का तथा ॠषि मुनियों के आश्रमों से युक्त और सघन सुविशाल बन था।

3- वहाँ गोप समाज के सुरक्षित रूप से निवास करने की तथा उनकी गायों के लिये चारे घास की पर्याप्त सुविधा थी। उस बन में गोपों ने दूर-दूर तक अने बस्तियाँ बसाई थीं। उस काल का वृन्दाबन गोबर्धन-राधाकुंड से लेकर नंदगाँव-वरसाना और कामबन तक विस्तृत था।

4-संस्कृत साहित्य में प्राचीन वृंदाबन के पर्याप्त उल्लेख मिलते हैं, जिसमें उसके धार्मिक महत्व के साथ ही साथ उसकी प्राकृतिक शोभा का भी वर्णन किया गया है। महाकवि कालिदास ने उसके वन-वैभव और वहाँ के सुन्दर फूलों से लदे लता-वृक्षों की प्रशंसा की है। उन्होंने वृन्दाबन को कुबेर के चैत्ररथ नामक दिव्य उद्यान के सदृश वतलाया है।

5-वृन्दाबन का महत्व सदा से श्रीकृष्ण के प्रमुख लीला स्थल तथा ब्रज के रमणीक बन और एकान्त तपोभूमि होने के कारण रहा है। मुसलमानी शासन के समय प्राचीन काल का वह सुरम्य वृन्दाबन उपेक्षित और अरक्षित होकर एक बीहड़ बन हो गया था। पुराणों में वर्णित श्रीकृष्ण-लीला के विविध स्थल उस विशाल बन में कहाँ थे, इसका ज्ञान बहुत कम था।

6-जव वैष्णव सम्प्रदायों द्वारा राधा-कृष्णोपासना का प्रचार हुआ, तब उनके अनुयायी भक्तों का ध्यान वृन्दाबन और उसके लीला स्थलों की महत्व-वृद्धि की ओर गया था। वे लोग भारत के विविध भागों से वहाँ आने लगे और शनै: शनै: वहाँ स्थाई रूप से बसने लगे।इस प्रकार वृन्दाबन का वह बीहड़ वन्य प्रदेश एक नागरिक बस्ती के रूप में परणित होने लगा। वहाँ अनेक मन्दिर-देवालय वनाये जाने लगे। बन को साफ कर वहाँ गली-मुहल्लों और भवनों का निर्माण प्रारम्भ हुआ तथा हजारों व्यक्ति वहाँ निवास करने लगे। इससे वृन्दाबन का धार्मिक महत्व तो बढ़ गया, किन्तु उसका प्राचीन वन-वैभव लुप्त प्रायः हो गया।

7-यद्यपि प्राचीन बनों में से अधिकांश कट गये हैं और उनके स्थान पर बस्तियाँ बस गईहैं, तथापि उनके अवशेषों के रूप में कुछ बनखंड और कदम खंडियाँ विधमान हैं, जो ब्रज के प्राचीन बनों की स्मृति को बनाये हुए हैं।वर्तमान वृन्दाबन में निधिबन और सेवाकुंज दो ऐसेस्थल हैं, जिन्हें प्राचीन वृन्दाबन के अवशेष कहा जा सकता है। ये संरक्षित बनखंडों के रूप में वर्तमान वृन्दाबन नगर के प्रायः मध्य में स्थित हैं। इनमें सघन लता-कुंज विधमान हैं, जिनमें बंदर-मोर तथा अन्य पशु-पक्षियों का स्थाई निवास है। इन स्थलों में प्रवेश करते ही प्राचीन वृन्दाबन की झाँकी मिलती है ।

8-निधिबन यह स्वामी हरिदास जी पावन स्थल है स्वामी जी ने वृन्दाबन आने पर यहाँ जीवन पर्यन्त निवास किया और इस स्थान पर उनका देहावसान भी हुआ था। मुगल सम्राट अकबर ने तानसेन के साथ इसी स्थान पर स्वामी जी के दर्शन किये थे और उनके दिव्य संगीत का रसास्वादन किया था। स्वामी जी के उपरान्त उनकी शिष्य-परम्परा के आचार्य ललित किशोरी जी तक इसी स्थल में निवास करते थे। इस प्रकार यह हरिदासी संम्प्रदाय का प्रधान स्थान बन गया। यहाँ पर श्री विहारी जी का प्राकट्य स्थल, रंगमहल और स्वामी जी सहित अनेक आचार्यों की समाधियाँ हैं।

9-सेवा कुंज -

यह श्री हित हरिवंश जी का पुण्य स्थल है हित जी ने वृन्दाबन आने पर अपने उपास्य श्री राधाबल्लभ जी का प्रथम पाटोत्सव इसी स्थान पर स. १५९१ में किया था। बाद में मन्दिर बन जाने पर उन्हें वहाँ विराजमान किया गया था। इस समय इसके बीचों-बीच श्री जी का छोटा सा संगमर का मन्दिर है, जिसमें नाम सेवा होती है। इसके निकट ललिता कुंड है। भक्तों का विश्वास है, कि इस स्थान पर अब भी पर अब भी श्री राधा-कृष्ण का रात्रि-विलास होता है, अत