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क्या है विशुद्ध प्रेम की परिभाषा ?क्या है,''श्री राधा कृपा कटाक्ष स्रोत'' ॥


विशुद्ध प्रेम;-

07 FACTS;- 1-''वास्तव में प्रेम देना ही जानता है ..लेना नहीं.उसमें लेन-देन का सौदा नहीं है''. एक बार किसी ने श्रीराधा के पास आकर श्रीकृष्ण में स्वरुप सौंदर्य का और सद्गुणों का अभाव बतलाया और कहा कि – वे तुमसे प्रेम नहीं करते.विशुद्ध प्रेम रूप, गुण और बदले में सुख प्राप्त करने की अपेक्षा नहीं करता,…और वह बिना किसी हेतु के ही प्रतिक्षण सहज ही बढता रहता है – “गुणरहितं कामना रहितम...प्रतिक्षण वर्धमानम्”.. 2-श्री राधा जी सर्वश्रेष्ठ विशुद्ध प्रेम की सम्पूर्ण प्रतिमा है अतः वे बोली – ''हमारे प्रियतम श्री कृष्ण असुंदर हो या सुन्दरशिरोमणि हो, गुणहीन हो या गुणियों में श्रेष्ठ हो, मेरे प्रति द्वेष रखते हो या करुणावरुणालय रूप से कृपा करते हो, वे श्यामसुंदर ही मेरी एकमात्र गति है.'' 3-महाप्रभु ने भी कहा है -वे चाहे मुझे ह्रदय से लगा ले या चरणों में लिपटी हुई, मुझको पैरों तले रौद डाले अथवा दर्शन से वंचित रख मर्मार्हत कर दे ,वे जैसे चाहे वैसे करे, मेरे प्राणनाथ तो वे ही है दूसरा कोई नहीं ...जैसे चातक होता है वह केवल एक मेघ से ही स्वाति की बूंद चाहता है, न दूसरे की ओर ताकता है, न दूसरा जल ही स्पर्श करता है. चातक कहता क्या है – चाहे तुम ठीक समय पर बरसो, चाहे जीवन भर कभी न बरसो, परन्तु इस चित्त चातक को तो केवल तुम्हारी ही आशा है. 4-अपने प्यारे मेघ का नाम् रटते-रटते चातक की जीभ लट गई और प्यास के मारे अंग सूख गए, तो भी चातक के प्रेम का रंग तो नित्य नवीन और सुंदर ही होता जाता है, समय पर मेघ बरसता तो है नहीं, उलटे कठोर पत्थर, ओले बरसाकर, उसने चातक की पंखो के टुकड़े-टुकड़े कर दिए, इतने पर भी उस प्रेम टेकी चतुर चातक के प्रेम प्रण में कभी चूक नहीं पड़ती. 5-मेघ... बिजली गिराकर,ओले बरसाकर, कड़क-कड़ककर वर्षा की झड़ी लगाकर,और तूफ़ान के झकोरे देकर, चातक पर चाहे जितना बड़ा भारी रोष प्रकट करे, पर चातक को प्रियतम का दोष देखकर क्रोध नहीं आता, उसे दोष दीखता ही नहीं है.गर्मियों के दिन थे, चातक शरीर से थका था, रास्ते में जा रहा था, शरीर जल रहा था, इतने में कुछ वृक्ष दिखायी दिए, दूसरे पक्षियों ने कहा इन पर जरा विश्राम कर लो. 6-परन्तु अनन्य प्रेमी चातक को यह बात अच्छी नहीं लगी.क्योकि वे वृक्ष दूसरे जल से सीचे हुए थे.एक चातक उड़ा जा रहा था किसी बहेलिये ने उसे बाण मारा, वह नीचे गंगाजी में गिर पड़ा, परन्तु गिरते ही उस अनन्य प्रेम चातक ने चोच को उलटकर ऊपर की ओर कर लिया,चातक के प्रेम रूपी वस्त्र पर मरते दम तक भी खोच नहीं लगी (वह जरा भी कही से नहीं फटा)प्रेम वास्तव में देना ही जानता है लेना जानता ही नहीं है उसमें लेन-देन का सौदा नहीं है, 7-प्रेमास्पद के दोष प्रेमी को दीखते ही नहीं, उसे तो केवल गुण ही दीखते है.और निरंतर देते रहने पर भी, देने का भान न हो, अपने को केवल लेने वाला ही माना जाए,केवल माना ही न जाए,ऐसा अनुभव भी हो,त्याग की ऐसी पराकाष्ठा जहाँ हो, वही विशुद्ध प्रेम है.

मशहूर चातक पक्षी की खास विशेषताएं ;- 04 FACTS;- 1-चातक लगभग 15 इंच लंबा काले रंग का पक्षी है, जिसका निचला भाग सफेद होता है । इसके सिर पर चोटीनुमा रचना होती है। स्वाति नक्षत्र का पानी चातक के लिए जीवन उपयोगी सिद्ध होता है ।भारतीय साहित्य में चातक को प्रतीक्षारत विरही के रूप में प्रस्तुत किया है । उसका वर्षा जल से अटूट रिश्ता बताया जाता है । इसके बारे में ऐसा माना जाता है कि यह वर्षा की पहली बूंदों को ही पीता है। अगर यह पक्षी बहुत प्यासा है और इसे एक साफ़ पानी की झील में डाल दिया जाए तब भी यह पानी नहीं पिएगा और अपनी चोंच बंद कर लेगा ताकि झील का पानी इसके मुहं में न जा सके। 2-यह पक्षी मुख्यतः एशिया और अफ्रीका महाद्वीप पर पाया जाता है। इसे मारवाडी भाषा में 'मेकेवा' और 'पपीया' भी कहा जाता हैं।इसके सिर पर चोटीनुमा रचना होती है. चातक ‘कुक्कू’ कुल का प्रसिद्ध पक्षी है, जो अपनी चोटी के कारण इस कुल के दूसरे पक्षियों से अलग रहता है.शरद ऋतु और वर्षा के समय यह पक्षी अपनी मधुर आवाज़ के साथ बोलता हुआ दिखाई देता है. मेघदूत में यक्ष मेघ से कहता है, ‘तेरा यह स्वभाव है कि तू बिना गरजे भी उन चातकों को जल देता है, जो तुझसे इसकी याचना करते हैं।’ शायद महाकवि कालीदास को पता था, चातक वर्षा का संदेश लाते हैं।. 3-इस कुल के पक्षी सभी गरम देशों में पाए जाते हैं. इन पक्षियों की पहली और चौथी उँगलियाँ पीछे की ओर मुड़ी रहती हैं.गौरतलब है कि चातक की यही विशेषताएं उसे दूसरे पक्षियों से खास बनाती हैं.चातक नाम के ये पक्षी दिन भर एक जोड़े के रूप में साथ रहते हैं लेकिन शाम को ये दोनों बिछड़कर ही रात बिताते हैं, जिसके बाद अगली सुबह इनका मिलन होता है. 4-स्वाति नक्षत्र का करता है इंतज़ार...कहते हैं कि चातक स्वाति नक्षत्र में अपनी प्यास बुझाता है. इसके लिए वो आसमान से पानी के बरसने का इंतज़ार करता है और बारिश की पहली बूंदों से ही अपनी प्यास बुझाता है. स्वाति नक्षत्र का पानी इस पक्षी के लिए जीवन उपयोगी सिद्ध होता है,वह तो स्वाती-मेघ के दर्शन का ही प्रेमी है। इसलिए यदि स्वाती की बूँदें भी तिरछी गिरती हैं, तो उन्हें पाने के लिये अपने मुख को टेढ़ा नहीं करता। दर्शन करते समय यदि एक-आध स्नेह-बिन्दु उसके मुख में गिर जाए तो वही उसके लिये बहुत है। दर्शन से वंचित होकर उसे स्वाति का जल भी नहीं चाहिए...वाकई यह हैरत की बात है कि पानी में रहते हुए भी यह अपनी प्यास आसमान से गिरे बारिश के बूंदों से ही बुझाता है. चाहे बारिश के लिए लंबा इंतज़ार ही क्यों न करना पड़े. NOTE;- केले में स्वाति नक्षत्र के समय बारिश की बूंद गिरे , तो उसमें क