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कौन है ब्रह्मांड की मूल शक्ति ?दस महाविद्या की साधना उपासना कैसे की जाती है?PART 03


4-माता भुवनेश्वरी;-

मन्त्र –“ॐ ऐं ह्रीं श्रीं नमः”

माताभुवनेश्वरी स्तुति;-

उद्यद्दिनद्युतिमिन्दुकिरीटां तुंगकुचां नयनवययुक्ताम् । स्मेरमुखीं वरदाङ्कुश पाशभीतिकरां प्रभजे भुवनेशीम् ॥

07 FACTS;-

1-तीनों लोकों का पालन पोषण करने वाली ईश्वरी महाविद्या भुवनेश्वरी। तीनों लोक स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल की ईश्वरी महाविद्या भुवनेश्वरी नाम की शक्ति हैं। महाविद्याओं में देवी चौथे स्थान पर अवस्थित हैं। अपने नाम के अनुसार देवी त्रिभुवन या तीनों लोकों की स्वामिनी हैं, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को धारण करती हैं। सम्पूर्ण जगत के पालन पोषण का दायित्व भुवनेश्वरी देवी का होने से जगत-माता तथा जगत-धात्री नाम से भी विख्यात हैं।

2-पंच तत्व १. आकाश, २. वायु ३. पृथ्वी ४. अग्नि ५. जल, जिनसे चराचर जगत के प्रत्येक जड-चेतन का निर्माण होता हैं, वह सब इन्हीं देवी की शक्तिओं से संचालित होता हैं। पञ्च तत्वों को इन्हीं देवी भुवनेश्वरी ने निर्मित किया हैं। देवी की इच्छानुसार ही चराचर ब्रह्माण्ड (तीनों लोक) के समस्त तत्वों का निर्माण होता हैं। महाविद्या भुवनेश्वरी साक्षात् प्रकृति स्वरूपा हैं तथा देवी की तुलना मूल प्रकृति से भी की जाती हैं। 3-देवी भुवनेश्वरी, भगवान शिव की समस्त लीला विलास की सहचरी हैं। देवी नियंत्रक भी हैं तथा भूल करने वालों के लिए दंड का विधान भी करती हैं। इनकी भुजा में सुशोभित अंकुश नियंत्रक का प्रतीक हैं। जो विश्व को वामन करने हेतु वामा, शिवमय होने से ज्येष्ठा तथा कर्मा नियंत्रक, जीवों को दण्डित करने के परिणामस्वरूप रौद्री, प्रकृति निरूपण करने के कारण मूल-प्रकृति कही जाती हैं। भगवान शिव का वाम भाग देवी भुवनेश्वरी के रूप में जाना जाता हैं तथा शिव को सर्वेश्वर होने की योग्यता इन्हीं के संग होने से प्राप्त हैं। 4-देवी भुवनेश्वरी सौम्य तथा अरुण के समान अंग-कांति युक्त हैं; देवी के मस्तक पर अर्ध चन्द्र सुशोभित हैं, तीन नेत्र हैं, मुखमंडल मंद-मंद मुस्कान की छटा युक्त हैं। देवी चार भुजाओं से युक्त हैं। दाहिने भुजा से देवी अभय तथा वर मुद्रा प्रदर्शित करती हैं और बाएं भुजा में पाश तथा अंकुश धारण करती हैं। देवी नाना प्रकार के अमूल्य रत्नों से युक्त विभिन्न अलंकार धारण करती हैं। 5-दुर्गम नामक दैत्य के अत्याचारों से त्रस्त हो समस्त देवता तथा ब्राह्मणों ने हिमालय पर जाकर इन्हीं भुवनेशी देवी की स्तुति की थीं। सताक्षी रूप में इन्होंने ही पृथ्वी के समस्त नदियों-जलाशयों को अपने अश्रु जल से भर दिया था, शाकम्भरी रूप में देवी ही अपने हाथों में नाना शाक-मूल इत्यादि खाद्य द्रव्य धारण कर प्रकट हुई तथा सभी जीवों को भोजन प्रदान किया। अंत में देवी ने दुर्गमासुर दैत्य का वध कर, तीनों लोकों को उसके अत्याचार से मुक्त किया और दुर्गा नाम से प्रसिद्ध हुई। 6-देवी, ललित के नाम से भी विख्यात हैं, परन्तु यह देवी ललित, श्री विद्या-ललित नहीं हैं। भगवान शिव द्वारा दो शक्तियों का नाम ललिता रखा गया हैं, एक ‘पूर्वाम्नाय तथा दूसरी ऊर्ध्वाम्नाय’ द्वारा। ललिता जब त्रिपुरसुंदरी के साथ होती हैं तो वह श्री विद्या-ललिता के नाम से जानी जाती हैं, इनका सम्बन्ध श्री कुल से हैं। ललिता जब भुवनेश्वरी के साथ होती हैं तो भुवनेश्वरी-ललित के नाम से जानी जाती हैं। 7-देवी भुवनेश्वरी की खास बात यह है कि यह अत्यंत भोली है. जिसके कारण वह बहुत ही कम समय मे प्रसन्न हो जाती है. लेकिन माता का यह रूप अत्यंत कोपिष्ठ भी है. और किसी कारण से माता रूठ गयी तो मनाने के लिये दो गुनी साधना करनी पडती है. देवी माँ से कभी भी झूठ या स्वार्थ पूर्ण वचन ना करे.देवी के अन्य नाम.१. मूल प्रकृति, २. सर्वेश्वरी या सर्वेशी, ३. सर्वरूपा, ४. विश्वरूपा, ५. जगन- ६. जगत-धात्री इत्यादि। देवी भुवनेश्वरी के प्रादुर्भाव से सम्बंधित कथा;-

13 FACTS;- 1-सृष्टि के प्रारम्भ में केवल स्वर्ग ही विद्यमान था, सूर्य केवल स्वर्ग लोक में ही दिखाई देता था, किरणें स्वर्ग लोक तक ही सीमित थी। समस्त ऋषियों तथा सोमदेव ने सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के निर्माण हेतु, सूर्य देव की आराधना की। जिससे प्रसन्न हो सूर्यदेव ने, देवी भुवनेश्वरी की प्रेरणा से संपूर्ण ब्रह्माण्ड का निर्माण किया। उस काल में देवी ही सर्व-शक्तिमान थी, देवी षोडशी ने सूर्यदेव को वह शक्ति प्रदान कर मार्गदर्शन किया, जिससे सूर्य देव ने संपूर्ण ब्रह्माण्ड की रचना की।

2-देवी षोडशी की वह प्रेरणा उस समय से भुवनेश्वरी (सम्पूर्ण जगत की ईश्वरी) नाम से प्रसिद्ध हुई। देवी का सम्बन्ध इस चराचर दृष्टि-गोचर समस्त ब्रह्माण्ड से हैं, इनके नाम दो शब्दों के मेल से बना हैं भुवन + ईश्वरी, जिसका अभिप्राय हैं समस्त भुवन की ईश्वरी। देवी का प्राकट्य।