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कौन है ब्रह्मांड की मूल शक्ति ?दस महाविद्या की साधना उपासना कैसे की जाती है?PART 04


7. देवी धूमावती;-

07 FACTS;-

1-दुर्भाग्य, दरिद्रता, अस्वस्थता, कलह की देवी, महाविद्या धूमावती। महाविद्या धूमावती अकेली स्व: नियंत्रक हैं, इनके स्वामी रूप में कोई नहीं हैं। भगवान शिव की विधवा हैं। दस महाविद्याओं की श्रेणी में देवी धूमावती सातवें स्थान पर अवस्थित हैं। उग्र स्वभाव वाली अन्य देवियों के सामान ही उग्र तथा भयंकर हैं।

2-देवी का सम्बन्ध ब्रह्माण्ड के महाप्रलय के पश्चात उस स्थिति से हैं, जहां वे अकेली होती हैं अर्थात समस्त स्थूल जगत के विनाश के कारण शून्य स्थिति रूप में अकेली विराजमान रहती हैं। महाप्रलय के पश्चात मात्र देवी की शक्ति ही चारों ओर विद्यमान रहती हैं; देवी का स्वरूप धुएं के समान हैं। तीव्र क्षुधा हेतु इन्होंने अपने पति भगवान शिव का ही भक्षण किया था, जिसके पश्चात शिवजी धुएं के रूप में देवी के शरीर से बाहर निकले थे; देवी धुएं के रूप में हैं।

3-देवी दरिद्रों के गृह में दरिद्रता के रूप में विद्यमान रहती हैं तथा अलक्ष्मी नाम से विख्यात हैं। अलक्ष्मी जो कि देवी लक्ष्मी की बहन हैं, परन्तु गुण तथा स्वभाव से पूर्णतः विपरीत हैं। देवी धूमावती की उपस्थिति, सूर्य अस्त पश्चात रहती हैं अर्थात अंधकारमय स्थानों की स्वामिनी हैं। देवी का सम्बन्ध स्थाई अस्वस्थता से भी हैं फिर वह शारीरिक हो या मानसिक। देवी के अन्य नामों में निऋति भी हैं, जिनका सम्बन्ध मृत्यु, क्रोध, दुर्भाग्य, सड़न, अपूर्ण अभिलाषाओं जैसे नकारात्मक विचारों तथा तथ्यों से हैं।

4-देवी कुपित होने पर समस्त अभिलषित मनोकामनाओं, सुख, धन तथा समृद्धि का नाश कर देती हैं, देवी कलह प्रिया हैं, अपवित्र स्थानों में वास करती हैं। रोग, दुर्भाग्य, कलह, निर्धनता, दुःख के रूप में देवी विद्यमान हैं। देवी धूमावती का स्वरूप अत्यंत ही कुरूप हैं, भद्दे एवं विकट दन्त पंक्ति हैं, एक वृद्ध महिला के समान देवी दिखाई देती हैं। विधवा होने के कारण देवी श्वेत वस्त्र धारण करती हैं, श्वेत वर्ण ही इन्हें प्रिय हैं, तीन नेत्रों से युक्त भद्दी छवि युक्त हैं, देवी धूमावती।

5-देवी रुद्राक्ष की माला आभूषण रूप में धारण करती हैं, इनके हाथों में एक सूप हैं; माना जाता हैं देवी जिस पर कुपित होती हैं उसके समस्त सुख इत्यादि अपने सूप पर ही ले जाती हैं। इन्होंने ही अपने शरीर से उग्र-चंडिका को प्रकट किया हैं। असुरों के कच्चे मांस का सेवन करके भी इनकी क्षुधा का निवारण नहीं हो पाया हैं। ये अतृप्त हैं। संसार बंधन से विरक्त होने की शक्ति देवी ही प्रदान करती हैं, जो साधक के योग की उच्च अवस्था तथा मोक्ष प्राप्त करने हेतु सहायक होती हैं।

6-देवी धूमावती धुएं के स्वरूप में विद्यमान है तथा पार्वती के भयंकर और उग्र स्वभाव का प्रतिनिधित्व करती हैं। ज्येष्ठ माह में शुक्ल पक्ष की अष्टमी 'धूमावती जयंती' होती है, इसी तिथि में देवी का प्रादुर्भाव हुआ था। देवी ने एक बार प्रण किया था! कि जो मुझे युद्ध में परास्त करेगा, वही मेरा पति-स्वामी होगा, मैं उसी से विवाह करूँगी परन्तु ऐसा नहीं हुआ कि इन्हें युद्ध में कोई परास्त कर सके, परिणामस्वरूप देवी अकेली हैं।

7-नारद पंचरात्र के अनुसार, देवी धूमावती ने ही उग्र चण्डिका, उग्र तारा जैसे उग्र तथा भयंकर प्रवृति वाली देवियों को अपने शरीर से प्रकट किया; उग्र स्वभाव, भयंकरता, क्रूरता इत्यादि देवी धूमावती ने ही इन देवियों को प्रदान की हैं। देवी की ध्वनि, हजारों गीदड़ों के एक साथ चिल्लाने जैसी हैं, जो महान भय-दायक हैं। देवी धूमावती, भगवान शिव की विधवा के रूप में विद्यमान हैं; अपने पति भगवान शिव को निगल जाने के कारण देवी विधवा हैं। देवी का

भौतिक स्वरूप क्रोध से उत्पन्न दुष्परिणाम तथा पश्चाताप को भी इंगित करता हैं। देवी धूमावती की उत्पत्ति से सम्बंधित कथा ;-

1-देवी धूमावती के प्रादुर्भाव से सम्बंधित दो कथाएँ प्राप्त होती हैं। प्रथम प्रजापति दक्ष के यज्ञ से सम्बंधित हैं। सती अपने पिता दक्ष से उनके यज्ञानुष्ठान स्थल में घोर अपमानित हुई। दक्ष ने अपनी पुत्री सती को स्वामी शिव सहित खूब उलटा सीधा कहा। परिणामस्वरूप, देवी अपने तथा स्वामी (शिव) के अपमान से तिरस्कृत हो, सम्पूर्ण यजमानों के सामने देखते ही देखते अपनी आहुति यज्ञ कुंड में दे दी; जिस कारण देवी की मृत्यु हो गई। यज्ञ स्थल में हाहाकार मच गया, सभी अत्यंत भयभीत हो गए। उस समय यज्ञ-कुंड से देवी सती, धुएं के रूप में बाहर निकली। यज्ञ कुंड से निसर्ग धुएं को ही देवी धूमावती माना जाता हैं|

2-स्वतंत्र तंत्र के अनुसार, एक समय देवी पार्वती भगवान शिव के साथ, कैलाश में बैठी हुई थी।, तीव्र क्षुधा से ग्रस्त होने के कारण उन्होंने शिवजी से भोजन प्रदान करने का निवेदन किया। भगवान शिव ने प्रतीक्षा करने के लिया कहा। कुछ समय पश्चात उन्होंने पुनः भोजन हेतु निवेदन किया परन्तु शिवजी ने उन्हें कुछ क्षण और प्रतीक्षा करने को कहा। बार-बार भगवान शिव द्वारा इस प्रकार आश्वासन देने पर, देवी धैर्य खो, क्रोधित हो गई और अपने पति को ही उठाकर निगल लिया। देवी के शरीर से एक धूम्र राशि निकली, उस धूम्र राशि ने उन्हें पूरी तरह से ढक दिया।

3-भगवान शिव, देवी के शरीर से बाहर आये तथा कहा! आपकी यह सुन्दर आकृति धुएं से ढक जाने के कारण धूमावती नाम से प्रसिद्ध होगी। अपने पति (भगवान शिव) को खा (निगल) लेने के परिणामस्वरूप देवी विधवा हैं। चूंकि देवी ने क्रोध वश अपने ही पति को खा लिया, देवी का सम्बन्ध दुर्भाग्य, अपवित्र, बेडौल, कुरूप जैसे नकारात्मक तथ्यों से हैं। देवी, श्मशान तथा अंधेरे स्थानों में निवास करने वाली है, समाज से बहिष्कृत है तथा अपवित्र स्थानों पर रहने वाली हैं।

4-भगवान शिव ही धुएं के रूप में देवी धूमावती में विद्यमान है तथा अपने पति (भगवान शिव) से कलह करने के कारण देवी कलह प्रिया भी हैं। प्रत्येक कलह में देवी शक्ति ही उत्पात मचाती हैं, क्लेश करती हैं। देवी, चराचर जगत के अपवित्र प्रणाली के प्रतीक स्वरूपा है, चंचला, गलिताम्बरा, विरल-दंता, मुक्त केशी, शूर्प हस्ता, काक ध्वजिनी, रक्षा नेत्रा, कलह प्रिया इत्यादि देवी के अन्य प्रमुख नाम हैं। देवी का सम्बन्ध पूर्णतः अशुभता तथा नकारात्मक तत्वों से हैं, देवी की आराधना अशुभता तथा नकारात्मक विचारो के निवारण हेतु की जाती हैं।

5-देवी धूमावती की उपासना विपत्ति नाश, स्थिर रोग निवारण, युद्ध विजय, एवं घोर कर्म मारण, उच्चाटन इत्यादि में की जाती हैं। देवी के कोप से शोक, कलह, क्षुधा, तृष्णा मनुष्य के जीवन से कभी जाती ही नहीं हैं, स्थिर रहती हैं। देवी, प्रसन्न होने पर रोग तथा शोक दोनों विनाश कर देती है और कुपित होने पर समस्त भोग रहे कामनाओं का नाश कर देती हैं। आगम ग्रंथों के अनुसार, अभाव, संकट, कलह, रोग इत्यादि को दूर रखने हेतु देवी के आराधना की जाती हैं।

6-देवी धूमावती, लक्ष्मीजी के छोटी बहन अलक्ष्मी या ज्येष्ठा हैं, जो समुद्र मंथन से प्राप्त हुई थीं और जिसका विवाह दुसह ऋषि के साथ हुआ था| मनुष्यों के गृह में स्थिर दरिद्रता तथा दुर्भाग्य के रूप में देवी ज्येष्ठा ही वास करती हैं और अपवित्र तथा अन्धकार में वास करती हैं, अंततः नाश का कारण बनती हैं।

संक्षेप में देवी धूमावती से सम्बंधित मुख्य तथ्य।

मुख्य नाम : धूमावती।

अन्य नाम : चंचला, गलिताम्बरा, विरल-दंता, मुक्त केशी, शूर्प-हस्ता, काक ध्वजिनी, रक्षा नेत्रा, कलह प्रिया।

भैरव : विधवा, कोई भैरव नहीं।

भगवान के २४ अवतारों से सम्बद्ध : भगवान मत्स्य अवतार।

कुल : श्री कुल।

दिशा : आग्नेय कोण।

स्वभाव : सौम्य-उग्र।

कार्य : अपवित्र स्थानों में निवास कर, रोग, समस्त प्रकार से सुख को हरने, दरिद्रता, शत्रुों का विनाश करने वाली।

शारीरिक वर्ण : काला।

साधना;-

हर प्रकार की द्ररिद्रता के नाश के लिए, तंत्र – मंत्र के लिए, जादू – टोना, बुरी नजर और भूत - प्रेत आदि समस्त भयों से मुक्ति के लिए, सभी रोगो के लिए, अभय प्रप्ति के लिए, साधना मे रक्षा के लिए, जीवन मे आने वाले हर प्रकार के दुखो को नष्ट करने वाली देवी है इसे अलक्ष्मी भी कहा जाता है तो इसके निवारण के लिए धूमावती देवी की साधना करनी चाहिए मोती की माला या काले हकीक की माल का प्रयोग मंत्र जप में करें और कम से कम नौ माला मंत्र जप करें

मंत्र- “ॐ धूं धूं धूमावती देव्यै स्वाहा:”

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1-महाविद्याओ में आठवें स्थान पर महाविद्या बगलामुखी, पीताम्बरा नाम से प्रसिद्ध, पीले रंग से सम्बंधित। स्तंभन कर्म की अधिष्ठात्री महाविद्या बगलामुखी।बगलामुखी दो शब्दों के मेल से बना हैं, पहला बगला तथा दूसरा मुखी। बगला से अभिप्राय हैं 'विरूपण का कारण' और मुखी से तात्पर्य हैं मुख।

2-देवी का सम्बन्ध मुख्यतः स्तम्भन कार्य से हैं, फिर वह मनुष्य मुख, शत्रु, विपत्ति हो या कोई घोर प्राकृतिक आपदा। महाविद्या बगलामुखी महाप्रलय जैसे महा-विनाश को भी स्तंभित करने की पूर्ण शक्ति रखती हैं; देवी स्तंभन कार्य की अधिष्ठात्री हैं। स्तंभन कार्य के अनुरूप देवी ही ब्रह्म अस्त्र का स्वरूप धारण कर, तीनों लोकों में किसी को भी स्तंभित कर सकती हैं। शत्रुओं का नाश तथा कोर्ट-कचहरी में विजय हेतु देवी की कृपा अत्यंत आवश्यक हैं, विशेषकर झूठे अभियोगों प्रकरणों हेतु।

3-देवी! पीताम्बरा नाम से त्रि-भुवन में प्रसिद्ध हैं, पीताम्बरा शब्द भी दो शब्दों के मेल से बना हैं, पहला पीत तथा दूसरा अम्बरा; अभिप्राय हैं, पीले रंग का अम्बर धारण करने वाली। देवी को पीला रंग अत्यंत प्रिय हैं। पीले रंग से सम्बंधित द्रव्य ही इनकी साधना-आराधना में प्रयोग होते हैं; वे पीले फूलो की माला धारण करती हैं, देवी पीले रंग के वस्त्र इत्यादि धारण करती हैं, पीले रंग से देवी का घनिष्ठ सम्बन्ध हैं। पञ्च तत्वों द्वारा संपूर्ण ब्रह्माण्ड निर्मित हुआ हैं, जिनमें पृथ्वी तत्व का सम्बन्ध पीले रंग से होने के कारण देवी को पीला रंग प्रिय हैं।

4-देवी की साधना दक्षिणाम्नायात्मक तथा ऊर्ध्वाम्नाय दो पद्धतिओं से की जाती हैं, उर्ध्वमना स्वरूप में देवी दो भुजाओं से युक्त तथा दक्षिणाम्नायात्मक में चार भुजाएं हैं।महाविद्या बगलामुखी समुद्र मध्य स्थित मणिमय मंडप में स्थित रत्न सिंहासन पर विराजमान हैं। देवी तीन नेत्रों से युक्त तथा मस्तक पर अर्ध चन्द्र धारण किये हुए हैं, इनकी दो भुजाएँ हैं। बाईं भुजा से इन्होंने शत्रु की जिह्वा पकड़ रखी हैं तथा दाहिने भुजा से इन्होंने मुगदर धारण कर रखी हैं। देवी का शारीरिक वर्ण सहस्रों उदित सूर्यों के सामान हैं तथा नाना प्रकार के अमूल्य रत्न जड़ित आभूषण से देवी सुशोभित हैं, देवी का मुख मंडल अत्यंत ही सुन्दर तथा मनोरम हैं।

5-सत्य-युग में सम्पूर्ण पृथ्वी को नष्ट करने वाला वामक्षेप (तूफान) आया, जिस कारण प्राणियों के जीवन पर संकट छा गया। भगवान विष्णु ने देवी बगलामुखी की सहायता से ही उस घोर तूफ़ान का स्तंभन किया तथा चराचर जगत के समस्त जीवों के प्राणों की रक्षा की। देवी का प्रादुर्भाव भगवान विष्णु के तेज से हुआ, जिसके कारण देवी सत्व गुण संपन्न हैं। बगलामुखी शब्द दो शब्दों के मेल से बना है, पहला 'बगला' तथा दूसरा 'मुखी'।

6-बगला से अभिप्राय हैं 'विरूपण का कारण' (सामान्य रूप से वक या वगुला एक पक्षी हैं, जिसकी क्षमता एक जगह पर अचल खड़े हो शिकार करना है) तथा मुखी से तात्पर्य मुख, मुख स्तम्भन या विपरीत मोड़ने वाली देवी।व्यष्टि रूप में शत्रुओं को नष्ट करने वाली तथा समष्टि रूप में परमात्मा की संहार करने वाली देवी बगलामुखी हैं, इनके भैरव महा मृत्युंजय हैं।

देवी शक्ति साक्षात ब्रह्म-अस्त्र हैं, जिसका संधान त्रिभुवन में किसी के द्वारा संभव नहीं हैं। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की शक्ति का समावेश देवी बगलामुखी में हैं।

प्रादुर्भाव से सम्बंधित कथा;-

03 FACTS;-

1-स्वतंत्र तंत्र के अनुसार, सत्य-युग में इस चराचर जगत को नष्ट करने वाला भयानक वातक्षोम (तूफान, घोर अंधी) आया। जिसके कारण समस्त प्राणी तथा स्थूल तत्वों के अस्तित्व पर संकट गहरा रहा था, सभी काल का ग्रास बनने जा रहे थे। संपूर्ण जगत पर संकट आया हुआ देखकर, जगत के पालन कर्ता श्रीहरि भगवान विष्णु अत्यंत चिंतित हो गए और भगवान शिव के पास जाकर समस्या के निवारण हेतु उपाय पूछा। भगवान शिव ने बताया की शक्ति के अतिरिक्त कोई भी इस समस्या का समाधान करने में सक्षम नहीं हैं।

2-भगवान विष्णु सौराष्ट्र प्रान्त में गए तथा हरिद्रा सरोवर के समीप जाकर, अपनी सहायतार्थ देवी श्रीविद्या महा त्रिपुरसुंदरी को प्रसन्न करने हेतु तप करने लगे। उस समय देवी श्रीविद्या, सौराष्ट्र के एक हरिद्रा सरोवर में वास कर रही थी। भगवान विष्णु के तप से संतुष्ट हो श्रीविद्या त्रिपुरसुंदरी, बगलामुखी स्वरूप में उनके सनमुख अवतरित हुई, जो पीत वर्ण से युक्त होकर उनसे साधना करने का कारण ज्ञात किया। भगवान विष्णु के निवेदन करने पर देवी बगलामुखी तुरंत ही अपनी शक्तिओं का प्रयोग कर, विनाशकारी तूफान को शांत किया या कहे तो स्तंभित किया, इस प्रकार उन्होंने सम्पूर्ण जगत की रक्षा की।

3-वैशाख शुक्ल अष्टमी के दिन देवी बगलामुखी का प्रादुर्भाव हुआ था।देवी बगलामुखी के प्रादुर्भाव की दूसरी कथा देवी धूमावती के प्रादुर्भाव के समय से सम्बंधित हैं। क्रोध वश देवी पार्वती ने अपने पति शिव का भक्षण किया था। देवी पार्वती का वह उग्र स्वरूप, जिसने अपने पति का भक्षण किया वह बगलामुखी शक्ति थी तथा भक्षण पश्चात देवी, धूमावती नाम से विख्यात हुई।

संक्षेप में देवी बगलामुखी से सम्बंधित मुख्य तथ्य ;-

मुख्य नाम : बगलामुखी।

अन्य नाम : पीताम्बरा (सर्वाधिक जनमानस में प्रचलित नाम), श्री वगला।

भैरव : मृत्युंजय।

भगवान के २४ अवतारों से सम्बद्ध : कूर्म अवतार।

तिथि : वैशाख शुक्ल अष्टमी।

कुल : श्रीकुल।

दिशा : पश्चिम।

स्वभाव : सौम्य-उग्र।

कार्य : सर्व प्रकार स्तम्भन शक्ति प्राप्ति हेतु, शत्रु-विपत्ति-निर्धनता नाश तथा कचहरी (कोर्ट) में विजय हेतु।

शारीरिक वर्ण : पीला।

साधना;-

02 FACTS;-

1-वाक शक्ति से तुरंत परिपूर्ण करने वाली, शत्रुनाश, कोर्ट कचहरी में विजय, हर प्रकार की प्रतियोगिता परीक्षा में सफलता के लिए, सरकारी कृपा के लिए माँ बगलामुखी की साधना करें। इस विद्या का उपयोग केवल तभी किया जाना चाहिए जब कोई रास्ता ना बचा हो। हल्दी की माला से कम से कम 8, 16, 21 माला का जप करें। इस विद्या को ब्रह्मास्त्र भी कहा जाता है और यह भगवान विष्णु की संहारक शक्ति है।

2-मन्त्र – “ॐ ह्लीं बगलामुखी देव्यै ह्लीं ॐ नम:”

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9- माँ मातंगी;-

05 FACTS;-

1-महाविद्या मातंगी, महाविद्याओं में नवें स्थान पर अवस्थित हैं। देवी निम्न वर्ग एवं जनजातिओ से सम्बंधित हैं। देवी का एक अन्य नाम उच्छिष्ट चांडालिनी भी हैं। देवी तंत्र क्रियाओं की अधिष्ठात्री हैं। इंद्रजाल या जादुई शक्ति से देवी परिपूर्ण हैं। वाक् सिद्धि, संगीत और अन्य ललित कलाओं में निपुण, सिद्ध विद्या हैं। महाविद्या मातंगी, केवल मात्र वचन द्वारा त्रि-भुवन में समस्त प्राणिओं तथा अपने घनघोर शत्रु को भी वश करने में समर्थ हैं, जिसे सम्मोहन क्रिया या वशीकरण कहा जाता हैं; देवी सम्मोहन विद्या की स्वामिनी हैं।

2-इनका सम्बन्ध प्रकृति, पशु, पक्षी, जंगल, वन, शिकार इत्यादि से भी है। जंगल में वास करने वाले आदिवासिओ, जनजातिओ द्वारा देवी पूजिता हैं। ऐसा माना जाता हैं कि! देवी की ही कृपा से वैवाहिक जीवन सुखमय होता हैं।देवी गृहस्थ के समस्त कष्टों का निवारण करती हैं। 3-महाविद्या मातंगी, मतंग मुनि की पुत्री रूप से भी जानी जाती हैं। देवी का घनिष्ठ सम्बन्ध उच्छिष्ट भोजन पदार्थों से हैं। देवी तभी उच्छिष्ट चांडालिनी नाम से विख्यात हैं, देवी की आराधना हेतु उपवास की भी आवश्यकता नहीं होती। देवी की आराधना हेतु उच्छिष्ट सामाग्रीओं की आवश्यकता होती हैं क्योकि देवी की उत्पत्ति शिव तथा पार्वती के उच्छिष्ट भोजन से हुई थी। देवी की आराधना सर्वप्रथम विष्णुजी द्वारा की गई, माना जाता हैं! तभी से विष्णुजी सुखी, सम्पन्न, श्रीयुक्त तथा उच्च पद पर विराजित हैं। देवी की आराधना बौद्ध धर्म में भी की जाती हैं। देवी बौद्ध धर्मं में "मातागिरी" नाम से विख्यात हैं। 4-महाविद्या मातंगी श्याम वर्णा या नील कमल के समान कांति युक्त हैं। तीन नेत्र तथा अर्ध चन्द्र को अपने मस्तक पर धारण करती हैं। देवी चार भुजाओं से युक्त हैं। अपने दाहिने भुजा में वीणा तथा मानव खोपड़ी धारण कर रखी हैं और बायें भुजाओं में खड़ग एवं अभय मुद्रा। देवी, लाल रंग की रेशमी साड़ी तथा अमूल्य रत्नों से युक्त नाना अलंकार धारण करती हैं। देवी के संग सर्वदा तोता पक्षी रहता हैं तथा 'ह्रीं 'बीजाक्षर का जप करता रहता हैं। 5-देवी मातंगी के चंडालनी रूप का सम्बन्ध मृत शरीर-शव तथा श्मशान भूमि से हैं। देवी अपने दाहिने हाथ पर महा-शंख (मनुष्य खोपड़ी) या खोपड़ी से निर्मित खप्पर, धारण करती हैं। पारलौकिक या इंद्रजाल, मायाजाल से सम्बंधित रखने वाले सभी देवी-देवता श्मशान, शव, चिता, चिता-भस्म, हड्डी इत्यादि से सम्बंधित रहते हैं। इन पारलौकिक शक्तियों का वास मुख्यतः इन्हीं स्थानों पर होता हैं। तंत्र विद्या के अनुसार देवी तांत्रिक सरस्वती नाम से जानी जाती हैं एवं श्रीविद्या महा त्रिपुरसुंदरी के रथ की सारथी तथा मुख्य सलाहकार हैं। प्रादुर्भाव ;- 05 FACTS;- 1-शक्ति-संगम तंत्र के अनुसार, एक बार विष्णुजी और लक्ष्मीजी सहित शिव- पार्वती से मिलने हेतु कैलाश शिखर पर गये। विष्णुजी अपने साथ कुछ खाने की सामग्री ले गए थे। उन्होंने वह खाद्य पदार्थ शिवजी को भेट किया। भगवान शिव और पार्वती ने, प्राप्त वस्तुओं को खाया। भोजन करते हुए खाने का कुछ अंश धरती पर गिर गया। उस गिरे हुए भोजन से एक श्याम वर्ण वाली दासी ने जन्म लिया, जो मातंगी नाम से विख्यात हुई। देवी का प्रादुर्भाव उच्छिष्ट भोजन से हुआ, परिणामस्वरूप देवी का सम्बन्ध उच्छिष्ट भोजन सामग्रियों से हैं तथा उच्छिष्ट वस्तुओं से देवी की आराधना होती हैं। देवी उच्छिष्ट मातंगी नाम से इसीलिए जानी भी जाती हैं। 2-प्राणतोषिनी तंत्र के अनुसार, एक बार पार्वती देवी ने, शिव से अपने पिता हिमालय राज के यहाँ जाने की अनुमति मांगी। भगवान शिव नहीं चाहते थे कि वे अकेले रहें। भगवान शिव से बार-बार प्रार्थना करने पर, उन्होंने पार्वती को पिता हिमालय राज के यहाँ जाने की अनुमति दे दी। साथ ही उन्होंने एक शर्त भी रखी कि वे शीघ्र ही माता-पिता से मिलकर वापस आ जाएगी। अपनी पुत्री पार्वती को कैलाश से लेने हेतु, उनकी माता मेनका ने एक बगुला वाहन स्वरूप भेजा था।

4-पार्वती की शीघ्र वापसी न होने पर एक दिन शिवजी ने अपना भेष एक आभूषण के व्यापारी के रूप में बदला तथा हिमालय राज के घर पहुच गए। इस भेष में देवी पार्वती की भी परीक्षा लेना चाहते थे। वे पार्वती के सनमुख गए और अपनी इच्छा अनुसार आभूषणों का चुनाव करने के लिया कहा। पार्वती ने जब कुछ आभूषणों का चुनाव कर लिया और उनसे मूल्य जानना चाहा, तब व्यापारी रूपी भगवान शिव ने देवी से आभूषणों के मूल्य के बदले, उनसे प्रेम की इच्छा प्रकट की। देवी पार्वती अत्यंत क्रोधित हुई किन्तु तत्क्षण ही अपनी अलौकिक शक्तिओं से उन्होंने पहचान भी लिया।व्यापारी रूपी शिवजी कुछ दिनों पश्चात कैलाश लौट आये।

5-कुछ अंतराल में देवी पार्वती भी भेष बदल कर कैलाश पर्वत पर आई। भगवान शिव अपने नित्य संध्योपासना की तैयारी कर रहे थे। देवी पार्वती लाल वस्त्र धारण किये हुए, बड़ी-बड़ी आँखें, श्याम वर्ण तथा दुबले शरीर से युक्त अपने पति के सन्मुख प्रकट हुई। भगवान शिव ने देवी से उनका परिचय पूछा, देवी ने उत्तर दिया कि वह एक चांडाल की कन्या हैं तथा तपस्या करने आई हैं। भगवान शिव ने देवी को पहचान लिया तथा कहाँ “वे तपस्वी को तपस्या का फल प्रदान करने वाले हैं।“ यह कहते हुए उन्होंने देवी का हाथ पकड़ लिया। देवी ने भगवान शिव से वर देने का निवेदन किया। भगवान शिव ने उनके इसी रूप को चांडालिनी वर्ण से अवस्थित होने का वरदान दिया साथ ही कई अलौकिक शक्तियां प्रदान की। संक्षेप में देवी मातंगी से सम्बंधित मुख्य तथ्य ; मुख्य नाम : मातंगी। अन्य नाम : सुमुखी, लघुश्यामा या श्यामला, उच्छिष्ट-चांडालिनी, उच्छिष्ट-मातंगी, राज-मातंगी, कर्ण-मातंगी, चंड-मातंगी, वश्य-मातंगी, मातंगेश्वरी, ज्येष्ठ-मातंगी, सारिकांबा, रत्नांबा मातंगी, वर्ताली मातंगी। भैरव : मतंग। भगवान के २४ अवतारों से सम्बद्ध : बुद्ध अवतार। तिथि : वैशाख शुक्ल तृतीया। कुल : श्रीकुल। दिशा : वायव्य कोण। स्वभाव : सौम्य स्वभाव। कार्य : सम्मोहन एवं वशीकरण, तंत्र विद्या पारंगत, संगीत तथा ललित कला निपुण। शारीरिक वर्ण : काला या गहरा नीला।

साधना;-

02 FACTS;-

1-यह देवी घर ग्रहस्थी मे आने वाले सभी विघ्नो को हरने वाली है, जिसकी शादी ना हो रही, संतान प्राप्ति, पुत्र प्राप्ति के लिए या किसी भी प्रकार का ग्रहस्थ जीवन की समस्या के दुख हरने के लिए देवी मातंगी की साधना उत्तम है। इनकी कृपा से स्त्रीयो का सहयोग सहज ही मिलने लगता है। चाहे वो स्त्री किसी भी वर्ग की स्त्री क्यो ना हो। इसके लिए आप स्फटिक की माला से मंत्र जप करें और और कम से कम बारह माला का जाप करना चाहिए.

2-मंत्र – “ॐ ह्रीं ऐं भगवती मतंगेश्वरी श्रीं स्वाहा:”

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06 FACTS;-

1-यह देवी धूमावती की ठीक विपरीत है। जब देवी कमला की कृपा नही होगी तब देवी धूमावती तो जमी रहेगी। इसलिए दीपावली पर भी इनका पुजन किया जाता है। इस संसार मे जितनी भी सुन्दरता है, सुन्दर वस्तु, पुष्प आदि है यह सब इनका ही तो सौन्दर्य है। हर प्रकार की साधना मे रिद्धि सिद्धि दिलाने वाली, अखंड धन धान्य प्राप्ति, ऋण का नाश और महालक्ष्मी जी की कृपा के लिए कमल पर विराजमान देवी की साधना करें। इन्ही साधना करके इन्द्र ने स्वर्ग को आज तक समभाले रखा है।

2-तांत्रिक लक्ष्मी, धन-संपत्ति, सुख, सौभाग्य प्रदाता! महाविद्या कमला। महाविद्या कमला या कमलात्मिका, महाविद्याओं में दसवें स्थान पर हैं। देवी का सम्बन्ध सम्पन्नता, खुशहाल-जीवन, समृद्धि, सौभाग्य और वंश विस्तार जैसे समस्त सकारात्मक तथ्यों से हैं। देवी पूर्ण सत्व गुण सम्पन्न हैं। स्वच्छता तथा पवित्रता, देवी को अत्यंत प्रिय हैं और देवी ऐसे स्थानों में ही वास करती हैं। प्रकाश से देवी कमला का घनिष्ठ सम्बन्ध हैं। देवी उन्हीं स्थानों को अपना निवास स्थान बनती हैं, जहां अँधेरा न हो; इसके विपरीत देवी की बहन अलक्ष्मी, ज्येष्ठा, निऋति जो निर्धनता, दुर्भाग्य से सम्बंधित हैं, अंधेरे एवं अपवित्र स्थानों को ही अपना निवास स्थान बनती हैं।

3-कमल के पुष्प के नाम वाली देवी कमला, कमल या पद्म पुष्प से सम्बंधित हैं। कमल पुष्प दिव्यता का प्रतीक हैं, कमल कीचड़ तथा मैले स्थानों पर उगता हैं, परन्तु कमल की दिव्यता मैल से कभी लिप्त नहीं होती हैं। कमल अपने आप में सर्वदा दिव्य, पवित्र तथा उत्तम रहता हैं। देवी कमला के स्थिर निवास हेतु अन्तःकरण की पवित्रता तथा स्थान की स्वच्छता अत्यंत आवश्यक हैं। देवी की आराधना तीनों लोकों में दानव, दैत्य, देवता तथा मनुष्य सभी द्वारा की जाती हैं, क्योंकि सभी सुख तथा समृद्धि प्राप्त करना चाहते हैं। देवी आदि काल से ही त्रि-भुवन के समस्त प्राणिओं द्वारा पूजित हैं।

4-देवी की कृपा के बिना, निर्धनता, दुर्भाग्य, रोग इत्यादि मनुष्य से सदा लगे रहते हैं। देवी ही समस्त प्रकार के सुख, समृद्धि, वैभव इत्यादि सभी को प्रदान करती हैं।स्वरूप से देवी कमला अत्यंत ही दिव्य, मनोहर एवं सुन्दर हैं। इनकी प्राप्ति समुद्र मंथन के समय हुई थीं तथा इन्होंने भगवान विष्णु को पति रूप में वरण किया था। देवी कमला! तांत्रिक लक्ष्मी के नाम से भी जानी जाती हैं। , श्रीविद्या त्रिपुरसुन्दरी की आराधना कर देवी, श्री पद से युक्त हुई तथा महा-लक्ष्मी नाम से विख्यात भी।

5-देवी की अंग-कांति स्वर्णिम आभा लिए हुए हैं, तीन नेत्रों से युक्त हैं एवं सुन्दर रेशमी साड़ी तथा नाना अमूल्य रत्नों से युक्त अलंकारों से सुशोभित हैं। देवी कमला चार भुजाओं से युक्त हैं, अपनी ऊपर की दोनों भुजाओं में पद्म पुष्प धारण कर रखा हैं तथा शेष दोनों भुजाओं में वर तथा अभय मुद्रा प्रदर्शित कर रहीं हैं। देवी को कमल का सिंहासन अति प्रिय हैं तथा वे सर्वदा कमल पुष्प से ही घिरी रहती हैं। हाथियों का समूह देवी का अमृत से भरे स्वर्ण कलश से अभिषेक करते रहते हैं।

6-हिन्दू, बौद्ध और जैन धर्म में कमल पुष्प को पवित्र और महत्त्वपूर्ण माना जाता हैं। बहुत से देवी देवताओं की साधना, आराधना में कमल पुष्प आवश्यक हैं ,सभी देवताओं को कमल पुष्प समर्पित कर सकते हैं।

प्रादुर्भाव;-

04 FACTS;-

1-श्रीमद भागवत के आठवें स्कन्द में देवी कमला के उद्भव की कथा हैं। देवी कमला का प्रादुर्भाव समुद्र मंथन से हुआ। एक बार देवताओं तथा दानवों ने समुद्र का मंथन किया, जिनमें अमृत प्राप्त करना मुख्य था। दुर्वासा मुनि के श्राप के कारण सभी देवता, लक्ष्मी / श्री हीन हो गए थे, यहाँ तक की भगवान विष्णु को भी लक्ष्मीजी ने त्याग कर दिया था। पुनः श्री सम्पन्न होने हेतु या नाना प्रकार के रत्नों को प्राप्त कर समृद्धि हेतु, देवताओं तथा दैत्यों ने समुद्र का मंथन किया था।

2-समुद्र मंथन से प्राप्त 14 रत्नों में देवी 'कमला' भी थी। जिनमें, देवी कमला भगवान विष्णु को प्राप्त हुई। देवी, भगवान विष्णु से विवाह के पश्चात, लक्ष्मी नाम से विख्यात हुई।देवी लक्ष्मी ने'श्रीविद्या महा त्रिपुरसुंदरी' की आराधना कर श्री की उपाधि प्राप्त की और महाविद्याओं में स्थान मिला। देवी कमला से सम्बंधित अन्य तथ्य। भगवान विष्णु से विवाह होने के कारण देवी का सम्बन्ध सत्व-गुण से हैं तथा वे वैष्णवी शक्ति की अधिष्ठात्री हैं। भगवान विष्णु,, देवी कमला के भैरव हैं। शासन, राजपाट, मूल्यवान धातु तथा रत्न जैसे पुखराज, पन्ना, हीरा इत्यादि, सौंदर्य से सम्बंधित सामग्री, जेवरात इत्यादि देवी से सम्बंधित हैं, और देवी इन भोग-विलास की वस्तुओं की प्रदाता हैं।

3-देवी की उपस्थिति तीनों लोकों को सुखमय तथा पवित्र बनाती हैं अन्यथा इनकी बहन अलक्ष्मी या निऋति ..निर्धनता तथा अभाव के स्वरूप में वास करती हैं। व्यापारी वर्ग, शासन से सम्बंधित कार्य करने वाले देवी की विशेष तौर पर आराधना, पूजा इत्यादि करते हैं। देवी हिन्दू धर्म के अंतर्गत सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं तथा समस्त वर्गों द्वारा पूजिता हैं, तंत्र के अंतर्गत देवी की पूजा तांत्रिक-लक्ष्मी रूप से की जाती हैं; तंत्रों के अनुसार देवी समृद्धि, सौभाग्य और धन प्रदाता हैं।

4-देवी का घनिष्ठ सम्बन्ध देवराज इन्द्र तथा कुबेर से हैं, इन्द्र देवताओं तथा स्वर्ग के अधिपति हैं तथा कुबेर देवताओं के कोषागार अध्यक्ष के पद पर आसीन हैं। देवी लक्ष्मी ही इंद्र तथा कुबेर को वैभव, राजसी सत्ता प्रदान करती हैं।

संक्षेप में देवी कमला से सम्बंधित मुख्य तथ्य;-

मुख्य नाम : कमला।

अन्य नाम : लक्ष्मी, कमलात्मिका।

भैरव : श्री विष्णु।

भगवान के २४ अवतारों से सम्बद्ध : मत्स्य अवतार।

तिथि : कोजागरी पूर्णिमा, अश्विन मास पूर्णिमा।

कुल : श्री कुल।

दिशा : उत्तर-पूर्व।

स्वभाव : सौम्य स्वभाव।

कार्य : धन, सुख, समृद्धि की अधिष्ठात्री देवी।

शारीरिक वर्ण : सूर्य की कांति के समान।

साधना;-

2 FACTS;-

1-मंत्र – “ॐ हसौ: जगत प्रसुत्तयै स्वाहा:”

इस मंत्र का जाप करने के लिए कमलगट्टे की माला का इस्तेमाल करें और कम से कम दस या इक्कीस माला का जाप करना चाहिए. 2-नवरात्र के अलावा दीपावली के खास मौके पर भी माता कमला का पूजन किया जाता है. हर प्रकार की साधना में रिद्धी-सिद्धी पाने के लिए, अखंड धन-धान्य प्राप्ति के लिए, ऋण का नाश और महालक्ष्मी की कृपा पाने के लिए कमल पर विराजमान इस देवी की उपासना करें.

.....SHIVOHAM....