श्रीमद्भागवत में रासलीला के ‘पाँच अध्याय’ उसके ‘ पाँच प्राण’ क्यों माने जाते है?PART 01


21 FACTS;-

1- भगवान श्रीकृष्ण की परम अंतरगलीला, निजस्वरुपभूता गोपिकाओ और हादिनी शक्ति श्रीराधिका जी के साथ होने वाली दिव्यातिदिव्य क्रीडा है.भगवान श्रीकृष्ण आत्मा है, आत्माकार वृति श्रीराधा है और शेष आत्माभिमुख वृत्तियाँ गोपियाँ है. उनका धाराप्रवाह रूप से निरंतर आत्मरमण ही ‘रास’ है. ‘रास’ शब्द का मूल- रस है और रस स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ही है-‘रसो वै स:’ जिस दिव्य क्रीडा में एक ही रस अनेक रसो के रूप में होकर अनंत–अनंत रस का समास्वादन करे उसका नाम रास है. 2-इस पंचाध्यायी में वंशीध्वनि, गोपियों के अभिसार, श्रीकृष्ण के साथ उनकी बातचीत, रमण, श्रीराधाजी के साथ अंतर्धान, पुन: प्राकट्य, गोपियों के द्वारा दिए हुए वसनासन पर विराजना, गोपियों के कूट प्रश्न का उत्तर, रासक्रीडा, जलकेलि, और वनविहार का वर्णन है जो परम दिव्य है.

3-समय के साथ ही मानव मस्तिष्क भी पलटता रहता है कभी अंतर्द्रष्टि की प्रधानता हो जाती है और कभी वहिर्द्रष्टि की आज का युग ही ऐसा है, जिसमे भगवान की दिव्य लीलाओ की बात तो क्या, स्वयं भगवान के अस्तित्व पर ही अविश्वास प्रकट किया जा रहा है ऐसी स्थिति में इस दिव्यलीला का रहस्य न समझकर लोग तरह-तरह की आशंका प्रकट करे इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है. 4-यह बात पहले ही समझ लेनी चाहिये कि भगवान का शरीर जीव-शरीर की भांति जड़ नहीं होता. जड़ की सत्ता केवल जीव की दृष्टि में होती है, भगवान की द्रृष्टि में नहीं, यह देह है, और यह देहि है, इस प्रकार का भेदभाव केवल प्रकृति के राज्य में होता है. अप्राकृत लोक में - जहाँ की प्रकृति भी चिन्मय है 5-सब कुछ चिन्मय ही होता है, वहाँ अचित की प्रतीति तो केवल भगवान की लीला की सिद्धि के लिए होती है .इसलिए जड़ राज्य में रहने वाला मस्तिष्क जब भगवान की अप्राकृत लीलाओ के सम्बन्ध में विचार करने लगता है.तब वह अपनी पूर्व वासनाओ के अनुसार जड़ राज्य की धारणाओं, कल्पनाओं, और क्रियाओ का ही आरोप उस दिव्य राज्य के विषय में भी करता है. जड़ जगत की बात तो दूर रही, ज्ञानरूप जगत में भी यह प्रकट नहीं होता, इस रस की स्फूर्ति तो केवल परम भावमयी श्रीकृष्ण प्रेमस्वरुपा गोपीजनो के मधुर ह्रदय में ही होती है दूसरे लोग तो इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते. 6-भगवान के समान ही गोपियाँ भी परमरसमयी और सच्चिदानंदमयी ही है साधना की द्रृष्टि से भी उन्होंने न केवल जड़ शरीर का ही त्याग कर दिया है बल्कि सूक्ष्म शरीर से प्राप्त होने वाले स्वर्ग, कैवल्य से, अनुभव होने वाले मोक्ष – और तो क्या,जडता की द्रष्टि का ही त्याग कर दिया है उनकी इस अलौकिक स्थिति में स्थूल शरीर, उसकी स्मृति और उसके सम्बन्ध से, होने वाले अंग-संग की कल्पना किसी भी प्रकार नहीं की जा सकती “यह उच्चतम भावराज्य की लीला स्थूल शरीर और स्थूल मन, से परे है. आवरण भंग के अंतरंग चीरहरण करके जब भगवान स्वीकृति देते है तब इसमें प्रवेश होता है.” . 7-भगवान श्रीकृष्ण का भगवत्स्वरूप शरीर तो रक्त, मांस, अस्थिमय है ही नहीं. वह तो सर्वथा चिदानंदमय है उसमे देह-देही, गुण-गुणी, नाम-नामी, लीला और लीलापुरुषोत्तम का भेद नहीं है, श्रीकृष्ण का एक-एक अंग पूर्ण है. श्रीकृष्ण का मुखमंडल, जैसे पूर्ण श्रीकृष्ण है, वैसे ही श्रीकृष्ण का पदनख भी पूर्ण है, श्रीकृष्ण की सभी इन्द्रियों से सभी काम हो सकते है, उनके कान देख सकते है, उनकी आँखे सुन सकती है, उनकी नाक स्पर्श कर सकती है, उनकी रसना सूँघ सकती है, उनके हाथ से देख सकते है, आँखे चल सकती है, श्रीकृष्ण का सब कुछ श्रीकृष्ण होने के कारण वह सर्वथा पूर्णतम है. 8-भगवान का शरीर न तो कर्मजन्य है, न मैथुनी स्रष्टि का है, और न दैवी ही है, इन सबसे परे सर्वथा विशुद्ध भगवत्स्वरूप है उपनिषद् में भगवान को ‘अखंड ब्रह्मचारी’ बताया गया है फिर कोई शंका करे कि उनके सोलह हजार एक सौ आठ रानियों के इतने पुत्र कैसे हुए. तो इसका सीधा उत्तर यही है कि यह सारी भगवती सृष्टि थी. भगवान के संकल्प से हुई थी. भगवान के शरीर में जो रक्त-मांस दिखलाई पड़ते है, वह तो भगवान की योगमाया का चमत्कार है इससे यही सिद्ध होता है कि गोपियों के साथ भगवान श्रीकृष्ण का जो रमण हुआ वह सर्वथा दिव्य भगवतराज्य की लीला है, लौकिक काम-क्रीडा नहीं... 8-साधना के दो भेद है- मर्यादापूर्ण वैध साधना. मर्यादारहित अवैध प्रेम साधना . दोनों के ही अपने अपने स्वतंत्र नियम है........ 8-1-मर्यादापूर्ण वैध साधना - वैध साधना में, जैसे नियमों के बंधन का, सनातन पद्धति का, कर्तव्यों का, और विविध पालनीय कर्मो का त्याग, साधना से भ्रष्ट करने वाला और महान हानिकर है. 8-2-मर्यादारहित अवैध प्रेम साधना- अवैध प्रेम साधना में इनका पालन कलंक रूप होता है, यह बात नहीं कि इन सब आत्मोन्नति के साधनों को वह अवैध प्रेमासाधना का साधक जान बूझकर छोड़ देता है, बात यह है कि वह स्तर ही ऐसा है जहाँ इनकी आवश्यकता नहीं है ये वहाँ अपने–आप वैसे ही छूट जाते है जैसे नदी के पार पहुँच जाने पर स्वाभाविक ही नौका की सवारी छूट जाती है. 9-भगवान ने गीता में कहा है- “ सर्वधर्मान परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ”. ‘हे अर्जुन! तू सारे धर्मो का त्याग करके केवल एक मेरी शरण में आ जा’. श्रीगोपीजन साधना के इसी उच्च स्तर में परम आदर्श थी इसी से उन्होंने देह-गेह, पति-पुत्र, लोक-परलोक, कर्तव्य-धर्म – सबको छोडकर, सबका उल्लघन कर एक मात्र परमधर्मस्वरूप भगवान श्रीकृष्ण को ही पाने के लिए अभिसार किया था उनका यह पति-पुत्रो का त्याग यह सर्वधर्म का त्याग ही उनके स्तर के अनुरूप “स्वधर्म” है. 10-इस सर्वधर्म त्याग रूप स्वधर्म का आचरण गोपियों जैसे उच्च स्तर के साधको में ही संभव है क्योकि सब धर्मो का यह त्याग वही कर सकता है जो इसका यथाविधि पूरा पालन कर चुकने के बाद इसके परमफल अनन्य और अचिन्त्य, देवदुर्लभ, भगवत्प्रेम को प्राप्त कर चुका है. वे भी जान बूझकर त्याग नहीं करते. सूर्ये का प्रखर प्रकाश हो जाने पर तेल दीपक की भांति स्वतः ही ये धर्म, उसे त्याग देते है जिसको भगवान अपनी वंशी ध्वनि सुनाकर – नाम ले-लेकर बुलाये वह भला किसी दूसरे धर्म की ओर ताककर कब और कैसे रुक सकता है 11-भगवान का अंतर्धान होना – वियोग ही संयोग का पोषक है. मान और मद ही भगवान की लीला में बाँधक है भगवान की दिव्यलीला में मान और मद भी, जो कि दिव्य है इसलिए होते है कि उनसे लीला में रस की और भी पुष्टि हो. भगवान की इच्छा से ही गोपियों में लीलानुरूप मान और मद का संचार हुआ और भगवान अंतर्धान हो गये. जिनके ह्रदय में लेशमात्र भी मद अवशेष है नाममात्र भी मान का संस्कार शेष है वे भगवान के सम्मुख रहने के अधिकारी नहीं वे भगवान का, पास रहने पर भी दर्शन नहीं कर सकते .परन्तु गोपियाँ तो, गोपियाँ थी उनसे जगत के किसी प्राणी की तिलमात्र भी तुलना नहीं है 12-वियोग ही संयोग का पोषक है, माद और मद ही भगवान की लीला में बाधक हैं। भगवान की दिव्य लीला में मान और मद भी, जो कि दिव्य हैं, इसीलिये होते हैं कि उनसे लीला में रस की पुष्टि हो। भगवान की इच्छा से ही गोपियों में लीनानुरूप मान और मद का संचार हुआ और भगवान अन्तर्धान हो गये। जिनके ह्रदय में लेशमात्र भी मद अवशेष है, नाममात्र भी मान का संस्कार शेष है, वे भगवान के सम्मुख रहने के अधिकारी नहीं। अथवा वे भगवान का, पास रहने पर भी, दर्शन नहीं कर सकते। 13-परन्तु गोपियाँ गोपियाँ थीं, उनसे जगत् के किसी प्राणी की तिलमात्र भी तुलना नहीं है।भगवान के वियोग में गोपियों की क्या दशा हुई इस बात को रासलीला का प्रत्येक पाठक जानता है... गोपियों के शरीर-मन-प्राण - वे जो कुछ थी, सब श्रीकृष्ण में एकतान हो गये. । उनके प्रेमोन्माद का वह गीत, जो उनके प्राणों का प्रत्यक्ष प्रतीक है, आज भी भावुक भक्तों को भाव मग्न करके भगवान के लीला लोक में पहुँचा देता है। एक बार सरस ह्रदय से ह्रदयहीन होकर नहीं, पाठ करने मात्र से ही यह गोपियों की महत्ता सम्पूर्ण ह्रदय में भर देता है। 14-गोपियों के उस ‘महाभाव’—उस 'अलौकिक प्रेमोन्माद’ को देखकर श्रीकृष्ण भी अन्तर्हित न रह सके, उनके सामने ‘साक्षान्मन्मथमन्मथः’ रूप से प्रकट हुए और उन्होंने मुक्त कण्ठ से स्वीकार किया कि ‘गोपियों! मैं तुम्हारे प्रेमभाव का चिर-ऋणी हूँ। यदि मैं अनन्त काल तक तुम्हारी सेवा करता रहूँ, तो भी तुमसे, उऋण नहीं हो सकता। मेरे अन्तर्धान होने का प्रयोजन तुहारे चित्त को दुखाना नहीं था, बल्कि तुम्हारे प्रेम को और भी उज्ज्वल एवं समृद्ध काना था।’ इसके बाद रासक्रीड़ा प्रारम्भ हुई। 15-जिन्होंने अध्यात्म शास्त्र का स्वाध्याय किया है, वे जानते हैं कि योग सिद्धि प्राप्त साधारण योगी भी कायव्यूह के द्वारा एक साथ अनेक शरीरों का निर्माण कर सकते हैं और अनेक स्थानों पर उपस्थित रहकर पृथक्-पृथक् कार्य कर सकते हैं। इन्द्रादि देवगण एक ही समय अनेक स्थानों पर उपस्थित होकर अनेक यज्ञों में युगपत् आहुति स्वीकार कर सकते हैं। निखिल योगियों और योगेश्वरों के ईश्वर सर्वसमर्थ भगवान श्रीकृष्ण यदि एक ही साथ अनेक गोपियों के साथ क्रीड़ा करें, तो इसमें आश्चर्य की कौन-सी बात है ? जो लोग भगवान को भगवान नहीं स्वीकार करते, वही अनेकों प्रकार की शंका-कुशंकाएँ करते हैं। भगवान की निज लीला में इन तर्कों का सर्वथा प्रवेश नहीं है 16-गोपियाँ श्रीकृष्ण की स्वकीया थीं या परकीया, यह प्रश्न भी श्रीकृष्ण के स्वरुप को भुलाकर ही उठाया जाता है। श्रीकृष्ण जीव नहीं हैं कि जगत् की वस्तुओं में उनका हिस्सेदार दूसरा भी जीव हो। जो कुछ भी था, है और आगे होगा—उसके एकमात्र पति श्रीकृष्ण ही हैं। अपनी प्रार्थना में गोपियों ने और परीक्षित् के प्रश्न के उत्तरों में श्रीशुकदेवजी ने यही बात कही है कि गोपी, गोपियों के पति, उनके पुत्र, सगे-सम्बन्धी और जगत् के समस्त प्राणियों के ह्रदय में आत्मा रूप से, परमात्मा रूप से जो प्रभु स्थित हैं—वही श्रीकृष्ण हैं। कोई भ्रम से, अज्ञान से, भले ही श्रीकृष्ण को पराया समझे; वे किसी के पराये नहीं हैं, सबके अपने हैं, सब उनके हैं। 17-श्रीकृष्ण की दृष्टि से, जो कि वास्तविक दृष्टि है, कोई परकीया है ही नहीं; सब स्वकीया हैं, सब केवल अपना ही लीला विलास हैं, सभी स्वरुप भूता अन्तरंगा शक्ति हैं। गोपियाँ इस बात को जानती थीं और स्थान-स्थान पर उन्होंने ऐसा कहा है।ऐसी स्थिति में ‘जारभाव’ और ‘औपपत्य’ का कोई लौकिक अर्थ नहीं रह जाता। जहाँ काम नहीं है, अंग-संग नहीं है, वहाँ ‘औपपत्य’ और ‘जारभाव’ की कल्पना ही कैसे हो सकती है ? गोपियाँ परकीया नहीं थीं, स्वकीया थीं; परन्तु उनमें परकीया भाव था। परकीया होने में और स्वकीया भाव होने में आकाश-पाताल का अन्तर है। 18-परकीया भाव में तीन बातें बड़े महत्व की होती हैं—अपने प्रियतम का निरन्तर चिन्तन, मिलन की उत्कट उत्कण्ठा और दोष दृष्टि का सर्वथा अभाव। स्वकीया भाव में निरन्तर एक साथ रहने के कारण ये तीनों बातें गौण हो जाती हैं; परन्तु परकीया भाव में ये तीनों भाव बनें रहते हैं। कुछ गोपियाँ जारभाव से श्रीकृष्ण को चाहती थीं, इसका इतना ही अर्थ है कि श्रीकृष्ण का निरन्तर चिन्तन करती थीं, मिलने के लिये उत्कण्ठित रहती थीं और श्रीकृष्ण के प्रत्येक व्यवहार को प्रेम की आँखों से ही देखती थीं। चौथा भाव विशेस महत्व का और है—वह यह कि स्वकीया अपने घर का, अपने और अपने पुत्र एवं कन्याओं का पालन-पोषण, रक्षणावेक्षण पति से चाहती है। 19- वह समझती है कि इनकी देखरेख करना पति का कर्तव्य है; क्योंकि ये सब उसी के आश्रित हैं, और वह पति से ऐसी आशा भी रखती है। कितनी ही पतिपरायणा क्यों न हो, स्वकीया में यह सकाम भाव छिपा रहता ही है। परन्तु परकीया अपने प्रियतम से कुछ नहीं चाहती, कुछ भी आशा नहीं रखती; वह तो केवल अपने को देकर ही उसे सुखी करना चाहती है। श्रीगोपियों में यह भाव भी भलीभाँति प्रस्फुटित था। इसी विशेषता के कारण संस्कृत-साहित्य के कई ग्रन्थों में निरन्तर चिन्तन के उदाहरण स्वरुप परकीया भाव का वर्णन आता है। 20-गोपियों के इस भाव के एक नहीं, अनेक दृष्टान्त श्रीमद्भागवत में मिलते हैं; इसलिये गोपियों पर परकीयापन का आरोप उनके भाव को न समझने के कारण हैं। जिसके जीवन में साधारण धर्म की एक हलकी-सी प्रकाश रेखा आ जाती है, उसी का जीवन परम पवित्र और दूसरों के लिये आदर्श-स्वरुप बन जाता है। फिर वे गोपियाँ, जिनका जीवन-साधना की चरम सीमा पर पहुँच चुका है, अथवा जो नित्य सिद्ध एवं भगवान की स्वरुपभूता हैं, या जिन्होंने कल्पों तक साधना करके श्रीकृष्ण की कृपा से उनका सेवाधिकार प्राप्त कर लिया है, सदाचार का उल्लंघन कैसे कर सकती हैं और समस्त धर्म-मर्यादाओं के संस्थापक श्रीकृष्ण पर धर्मोल्लंघन का लांछन कैसे लगाया जा सकता है ? श्रीकृष्ण और गोपियों के सम्बन्ध में इस प्रकार की कुकल्पनाएँ उनके दिव्य स्वरुप और दिव्य लीला के विषय में अनभिज्ञता ही प्रकट करती हैं। 21-श्रीमद्भागवत पर, दशम स्कन्ध पर और रासपंचाध्यायी पर अब तक अनेकानेक भाष्य और टीकाएँ लिखी जा चुकी हैं जिनके लेखकों में जगद्गुरु श्रीवल्लभाचार्य, श्री श्रीधरस्वामी, श्रीजीवगोस्वामी आदि हैं। उन लोगों ने बड़े विस्तार से रासलीला की महिमा समझायी है। किसी ने इसे काम पर विजय बतलाया है, किसी ने भगवान का दिव्य विहार बतलाया है और किसी ने इसका आध्यात्मिक अर्थ किया है। भगवान श्रीकृष्ण आत्मा हैं, आत्माकार वृत्ति श्रीराधा हैं और शेष आत्माभिमुख वृत्तियाँ गोपियाँ हैं। उनका धाराप्रवाह रूप से निरन्तर आत्म रमण ही रास है। किसी भी दृष्टि से देखें, रासलीला की महिमा अधिकाधिक प्रकट होती हैं। वे ही गोपियाँ कैसे, भगवान के बुलाने पर न जाती. शुकदेव जी ने परीक्षित जी को उत्तर देकर शंकाएँ तो हटा दी परन्तु भगवान की दिव्यलीला का रहस्य नहीं खुलने पाया, संभवतः उस रहस्य को गुप्त रखने के लिए ही ३३वे अध्याय में रासलीला प्रसंग समाप्त कर दिया गया. वस्तुतः इस लीला के गूढ़ रहस्य की प्राकृत जगत में व्याख्या की भी नहीं जा सकती.क्योकि यह इस जगत की क्रीडा ही नहीं है .

क्या है पांच गीत ?-

03 FACTS;-

1-श्रीमद भागवत महापुराण के दशम स्कन्ध के अंतर्गत पांच गीत आते हैं ...प्रणय गीत, वेणु गीत, गोपी गीत, युगल गीत, भ्रमर गीत ये पांच गीत भगवान् के पांच प्राण कहे गये हैं !! रास पंचाध्यायी को भगवान् का ह्रदय कहा गया है !! जो साधक नित्यप्रति इनका पाठ व् ध्यान करता है उसके जीवन में आनंद ही आनंद भर जाता है !!

.2-....क्या रस है ....दिमाग को एक दम झझकोर वाला ... दिल में जो विषय वासनाओ व् धनासक्ति का जो भूसा भरा होता है वो कैसे छूमंतर होता है .... प्रणय गीत जैसा कि नाम से ही ज्ञात हो रहा है इस पर संकोच से विस्तार किया गया है अगर इसके अन्तरंग भावों को कोई समझ ले तो वासनाओं का, कामनाओं का ..बीज ही नष्ट हो जाए ...पहले ही गीत में। ..... पाँचों गीत का रोज़ पाठ कीजिये स्वास्थ्य व् अध्यात्मिक उन्नति की तरफ बहुत तेज़ी से आगे बढ़ पायेंगे !!नारायण !!

3-श्रीमद भागवत के अन्तर्गत आने वाले गोपियों के पंञ्ञ प्रेम गीत (वेणुगीत, युगल गीत, प्रणय गीत, गोपीगीत और भ्रमर गीत) इनमें से वेणु गीत का वर्णन आगे है-श्रीशुकदेव जी महाराज ने सुन्दर ग्रीष्म ऋतु का वर्णन किया हैं, इसके बाद वर्षा ऋतु का वर्णन किया हैं और फिर वर्षा ऋतु की दिव्यता का अति सुंदर वर्णन किया। वर्षा ऋतु के बाद शरद ऋतु का वर्णन शुकदेव जी महाराज ने किया हैं। और गोपियों ने सुंदर वेणु गीत गाया हैं। जिसके केवल ये ही भाव हैं की अगर संसार में कोई देखने योग्य हैं तो वे केवल भगवान श्री कृष्ण हैं। 3-A-अगर आँखे भगवान को छोड़कर और किसी को देखती हैं तो वो आँखे जल जानी चाहिए। गोपियाँ एक क्षण के लिए भी परमात्मा श्री कृष्ण से दूर नही होना चाहती। अपनी पलकों तक को झपकने नही देना चाहती। गोपियाँ कह रही हैं भगवान के अवतार लेने से चेतन और जड़ सभी उनके रूप रस का माधुर्य का पान कर रहे हैं। ये गऊ, ये वेणु(वंशी), ये नदियां और ये ग्वाल बाल, ये गिरिराज सभी बड़भागी हैं। जिन्हे भगवान का सानिध्य प्राप्त हो रहा हैं।

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वे उसके वर्णन में असमर्थ हो गयी ।।4।। बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारं, बिभ्रद्वासः कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम् । रन्ध्रान्वेणोरधरसुधयापूरयन्गोपवृन्दैर्- वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद्गीतकीर्तिः ।।५।। अर्थ:- (वे मन ही मन देखने लगीं, कि) श्रीकृष्ण ग्वाल-बालों के साथ वृन्दावन में प्रवेश कर रहे हैं । उनके सिरपर मयूरपिच्छ है और कानों पर कनेर के पीले-पीले पुष्प शरीर पर सुनहला पीताम्बर और गले में पाँच प्रकार के सुगन्धित पुष्पों की बनी बैजयन्ती माला है । रंगमंच पर अभिनय करते हुए श्रेष्ठ नट जैसा क्या सुन्दर वेश है । बाँसुरी के छिद्रों को वे अपने अधरामृत से भर रहे हैं । उनके पीछे-पीछे ग्वालबाल उनकी लोकपावन कीर्ति का गान कर रहे हैं । इस प्रकार वैकुण्ठ से भी श्रेष्ठ वह वृन्दावन धाम उनके चरण चिन्हों से और भी रमणीय बन गया है ।।5।। इति वेणुरवं राजन् सर्वभूतमनोहरम् ।। श्रुत्वा व्रजस्त्रियः सर्वा वर्णयन्त्योऽभिरेभिरे ।।६।। अर्थ:- परीक्षित ! यह वंशीध्वनि जड़-चेतन समस्त भूतों का मन चुरा लेती है । गोपियों ने उसे सुना और सुनकर उसका वर्णन करने लगीं । वर्णन करते-करते वे तन्मय ही गयीं और श्रीकृष्ण को पाकर आलिंगन करने लगीं ।।6।। श्रीगोप्य ऊचुः – अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः , सख्यः पशूननविवेशयतोर्वयस्यैः ।। वक्त्रं व्रजेशसुतयोरनवेणुजुष्टं, यैर्वा निपीतमनुरक्तकटाक्षमोक्षम् ।।७।। अर्थ:- गोपियाँ आपस में बातचीत करने लगी – अरी सखीं ! हमने तो आँखवालों के जीवन की और उनकी आँखों की बश यही इतनी ही सफलता समझी है, और तो हमें कुछ मालूम ही नहीं है । वह कौन सा लाभ है ? वह यही है, कि जब श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण और गौरसुन्दर बलराम ग्वालबालों के साथ गायों को हाँककर वन में ले जा रहे हों या लौटाकर ला रहे हों, उन्होंने अपने अधरों पर मुरली धर रखी हो और प्रेमभरी तिरछी चितवन से हमारी ओर देख रहे हों, उस समय हम उनकी मुख माधुरी का पान करती रहें ।।7।। चूतप्रवालबर्हस्तबकोत्पलाब्ज, मालानुपृक्तपरिधानविचित्रवेशौ ।। मध्ये विरेजतुरलं पशुपालगोष्ठ्यां, रङ्गे यथा नटवरौ क्वच गायमानौ ।।८।। अर्थ:- अरी सखी ! जब वे आम की नयी कोपलें, मोरों के पंख, फूलों के गुच्छे, रंग-विरंगे कमल और कुमुद की मालाएँ धारण कर लेते हैं, श्रीकृष्ण के साँवरे शरीर पर पीताम्बर और बलराम के गोरे शरीर पर नीलाम्बर फहराने लगता है, तब उनका वेष बड़ा ही विचित्र बन जाता है । ग्वालबालों की गोष्ठी में वो दोनों बीचोबीच बैठ जाते हैं और मधुर संगीत की तान छेड़ देते हैं । मेरी प्यारी सखी ! उस समय ऐसा जान पड़ता है मानों दो चतुर नट रंगमंच पर अभिनय कर रहे हों । मैं क्या बताऊँ कि उस समय उनकी कितनी शोभा होती है ।।8।। गोप्यः किमाचरदयं कुशलं स्म वेणुर्- दामोदराधरसुधामपि गोपिकानाम् ।। भुङ्क्ते स्वयं यदवशिष्टरसं ह्रदिन्यो, हृष्यत्त्वचोऽश्रु मुमुचुस्तरवो यथार्यः ।।९। अर्थ:- अरी गोपियों ! यह वेणु पुरुष जाति का होनेपर भी पूर्वजन्म में न जाने ऐसा कौन सा साधन-भजन कर चुका है, कि हम गोपियों की अपनी संपत्ति दामोदर के अधरों की सुधा स्वयं ही इस प्रकार पिये जा रहा है कि हमलोगों के लिए थोडा सा भी रस शेष नहीं रह जायेगा ।जिन सरोवरों के जल मे यह पुष्ट हुई वे सरोवर भी खिले हुए कमलसमूहों के बहाने रोमांचयुक्त दिखते है और जिन वृक्षोंके कुल में यह पैदा हुई वे वृक्ष भी मधु की धाराओं के रूपसे आनंदके आँसू बहाते हुए दिखते है, जैसे कि कुलवृद्ध पुरुष यह सुनते ही अश्रुपात करते है कि हमारे वंश मे कोई भगवद्भक्त हुआ है, वैसे ही उपर्युक्त सरोवर और वृक्षों की दशा हो रही है || ।।9।। वृन्दावनं सखि भुवो वितनोति कीर्तिं, यद्देवकीसुतपदाम्बुजलब्धलक्ष्मि ।। गोविन्दवेणुमनु मत्तमयूरनृत्यं, प्रेक्ष्याद्रिसान्ववरतान्यसमस्तसत्त्वम् ।।१०।। धन्याः स्म मूढगतयोऽपि हरिण्य एता, या नन्दनन्दनमुपात्तविचित्रवेशम् ।। आकर्ण्य वेणुरणितं सहकृष्णसाराः , पूजां दधुर्विरचितां प्रणयावलोकैः ।।११। अर्थ:- अरी सखी ! यह वृन्दावन वैकुण्ठलोक तक पृथ्वी की कीर्ति का विस्तार कर रहा है । क्योंकि यशोदानन्दन श्रीकृष्ण के चरण कमलों के चिन्हों से यह चिन्हित हो रहा है । सखी ! जब श्रीकृष्ण अपनी मुनिजन मोहिनी मुरली बजाते हैं,तब मोर मतवाले होकर उसकी ताल पर नाचने लगते हैं । यह देखकर पर्वत की चोटियों पर विचरण करने वाले सभी पशु पक्षी चुपचाप शान्त होकर खड़े रह जाते हैं ।

अरी सखी ! जब प्राणवल्लभ श्रीकृष्ण विचित्र वेश धारण करके बाँसुरी बजाते हैं, तब मूढ़ बुद्धिवाली ये हरिनियाँ भी वंशी की तान सुनकर अपने पति कृष्णसार मृगों के साथ नन्दनन्दन के पास चली आती है और अपनी प्रेमभरी बड़ी-बड़ी आँखों से उन्हें निरखने लगती है । निरखती क्या हैं, अपनी कमल के समान बड़ी-बड़ी आँखें श्रीकृष्ण के चरणों पर निछावर कर देती हैं और श्रीकृष्ण की प्रेमभरी चितवन के द्वारा किया हुआ अपना सत्कार स्वीकार करती है । वास्तव में उनका जीवन धन्य है । (हम वृन्दावन की गोपी होनेपर भी इस प्रकार अपने-आप को निछावर नहीं कर पातीं, हमारे घरवाले कुढ़ने लगते हैं, कितनी विड़म्बना हैl ।।10-11।। कृष्णं निरीक्ष्य वनितोत्सवरूपशीलं, श्रुत्वा च तत्क्वणितवेणुविचित्रगीतम् ।। देव्यो विमानगतयः स्मरनुन्नसारा, भ्रश्यत्प्रसूनकबरा मुमुहुर्विनीव्यः ।।१२।। अर्थ:- अरी सखी! हरिनियों की तो बात ही क्या हैं- स्वर्ग की देवियाँ जब युवतियों को आनंदित करने वाले सौंदर्य और शील के खजाने श्रीकृष्ण को देखती हैं, तब उनके चित्र-विचित्र आलाप सुनकर वे अपने विमान पर ही सुध-बुध खो बैठती हैं—मुर्छित हो जाती हैं। यह कैसे मालूम हुआ सखी? सुनो तो, जब उनके ह्रदय में श्रीकृष्ण से मिलने की तीव्र आकांक्षा जग जाती है तब वे अपना धीरज खो बैठती हैं, बेहोश हो जाती हैं। उन्हें इस बात का भी पता नहीं चलता कि उनकी चोटियों में गुँथे हुए फूल पृथ्वी पर गिर रहे हैं। यहाँ तक कि उन्हें अपनी साड़ी का भी पता नहीं रहता, वह कमर से खिसककर जमीन पर गिर जाती है।।।12।। गावश्च कृष्णमुखनिर्गतवेणुगीत, पीयूषमुत्तभितकर्णपुटैः पिबन्त्यः ।। शावाः स्नुतस्तनपयःकवलाः स्म तस्थुर्- गोविन्दमात्मनि दृशाश्रुकलाः स्पृशन्त्यः ।।१३।। अर्थ:- अरी सखी! तुम देवियों की बात क्या-क्या कह रही हो, इन गौओं को नहीं देखती ? जब हमारे कृष्ण-प्यारे अपने मुख से बाँसुरी में स्वर भरते हैं और गौएँ उनका मधुर संगीत सुनती हैं, तब ये अपने दोनों कानों के दोने सम्हाल लेती हैं—खड़े कर लेती हैं और मानो उनसे अमृत पी रही हों, इस प्रकार उस संगीत का रस लेने लगती हैं ?

ऐसा क्यों होता है सखी ? अपने नेत्रों के द्वार से श्यामसुन्दर को ह्रदय में जाकर वे उन्हें वहीँ विराजमान कर देती हैं और मन-ही-मन उनका आलिंगन करती हैं। देखती नहीं हो, उनके नेत्रों से आनन्द के आँसू छलकने लगते हैं! और उनके बछड़े, बछड़ों की तो दशा ही निराली हो जाती है। यद्यपि गायों के थनों से अपने-आप दूध झरता रहता है, वे जब दूध पीते-पीते अचानक ही वंशीध्वनि सुनते हैं तब मुँह में लिया हुआ दूध का घूँट न उगले पाते हैं और न निगल पाए हैं। उनके ह्रदय में भी होता है भगवान का संस्पर्श और नेत्रों में छलकते होते हैं आनन्द के आँसू। वे ज्यों-के-त्यों ठिठके रह जाते हैं ।।।13।। प्रायो बताम्ब विहगा मुनयो वनेऽस्मिन् , कृष्णेक्षितं तदुदितं कलवेणुगीतम् ।। आरुह्य ये द्रुमभुजान्रुचिरप्रवालान् , शृण्वन्ति मीलितदृशो विगतान्यवाचः ।।१४।। अर्थ:- अरी सखी! गौएँ और बछड़े तो हमारी घर की वस्तु हैं। उनकी बात तो जाने ही दो। वृन्दावन के पक्षियों को तो पक्षी कहना ही भूल है! सच पूछो तो उनमें से अधिकांश बड़े-बड़े ऋषि-मुनि हैं। वे वृन्दावन के सुन्दर-सुन्दर वृक्षों की नयी और मनोहर कोंपलों वाली डालियों पर चुपचाप बैठ जाते हैं और आँखें बंद नहीं करते, निर्निमेष नयनों से श्रीकृष्ण की रूप-माधुरी तथा प्यार-भरी चितवन देख-देखकर निहाल होते रहते हैं, तथा कानों से अन्य सब प्रकार के शब्दों को छोड़कर केवल उन्हीं की मोहनी वाणी और वंशी का त्रिभुवन मोहन संगीत सुनते रहते हैं। मेरी प्यासी सखी! उनका जीवन कितना धन्य है!।।14।। नद्यस्तदा तदुपधार्य मुकुन्दगीतम् , आवर्तलक्षितमनोभवभग्नवेगाः ।। आलिङ्गनस्थगितमूर्मिभुजैर्मुरारेर्- गृह्णन्ति पादयुगलं कमलोपहाराः ।।१५।। अर्थ:- अरी सखी! देवता, गौओं और पक्षियों की बात क्यों करती हो ? वे तो चेतन हैं। इन जड़ नदियों को नहीं देखतीं ? इसमें जो भँवर दीख रहे है, उनसे इनके ह्रदय से श्यामसुन्दर से मिलने की तीव्र आकांक्षा का पता चलता है ? उसके वेग से ही तो इनका प्रवाह रुक गया है। इन्होंने भी प्रेमस्वरूप श्रीकृष्ण की वंशीध्वनि सुन ली है। देखो, देखो! ये अपनी तरंगों के हाथों से उनके चरण पकड़कर कमल के फूलों का उपहार चढ़ा रही हैं, और उनका आलिंगन कर रही हैं; मानो उसके चरणों पर अपना ह्रदय ही निछावर कर रही हैं ।।15।। दृष्ट्वातपे व्रजपशून्सह रामगोपैः , सञ्चारयन्तमनु वेणुमुदीरयन्तम् ।। प्रेमप्रवृद्ध उदितः कुसुमावलीभिः , सख्युर्व्यधात्स्ववपुषाम्बुद आतपत्रम् ।।१६।। अर्थ:- अरी सखी! ये नदियाँ ये हमारी पृथ्वी की, हमारे वृन्दावन की वस्तुएँ हैं; तनिक इन बादलों को भी देखो! जब वे देखते हैं कि व्रजराजकुमार श्रीकृष्ण और बलरामजी ग्वालबालों के साथ धूप में गौएँ चरा रहे हैं और साथ-साथ बाँसुरी भी बजाते जा रहे हैं, तब उनके ह्रदय में प्रेम उमड़ आता है। वे उनके ऊपर मँडराने लगते हैं और वे श्यामघन अपने सखा घनश्याम के ऊपर अपने शरीर को ही छाता बनाकर तान देते हैं। इतना ही नहीं सखी! वे जब उनपर नन्हीं-नन्हीं फुहियों की वर्षा करने लगते हैं तब ऐसा जान पड़ता है कि वे उनके ऊपर सुन्दर-सुन्दर श्वेत कुसुम चढ़ा रहे हैं। नहीं सखी, उनके बहाने वे तो अपना जीवन ही निछावर कर देते हैं!।।16।। पूर्णाः पुलिन्द्य उरुगायपदाब्जराग, श्रीकुङ्कुमेन दयितास्तनमण्डितेन ।। तद्दर्शनस्मररुजस्तृणरूषितेन, लिम्पन्त्य आननकुचेषु जहुस्तदाधिम् ।।१७।। अर्थ:- अरी भटू! हम तो वृन्दावन की इन भीलनियों को ही धन्य और कृतकृत्य मानती हैं। ऐसा क्यों सखी ? इसलिये कि इनके ह्रदय में बड़ा प्रेम है। जब ये हमारे कृष्ण-प्यारे को देखती हैं, तब इनके ह्रदय में भी उनसे मिलने की तीव्र आकांक्षा जाग उठती है। इनके ह्रदय में भी प्रेम की व्याधि लग लग जाती है। उस समय ये क्या उपाय करती हैं, यह भी सुन लो। हमारे प्रियतम की प्रेयसी गोपियाँ अपने वक्षःस्थलों पर जो केसर लगाती हैं, वह श्यामसुन्दर के चरणों में लगी होती है और वे जब वृन्दावन के घास-पात पर चलते हैं, तब उनमें भी लग जाती है। ये सौभाग्यवती भीलनियाँ उन्हें उन तनिकों पर से छुड़ाकर अपने स्तनों और मुखों पर मल लेतीं हैं और इस प्रकार अपने ह्रदय की प्रेम-पीड़ा शान्त करती हैं ।।।१७ ।। हन्तायमद्रिरबला हरिदासवर्यो, यद्रामकृष्णचरणस्परशप्रमोदः ।। मानं तनोति सहगोगणयोस्तयोर्यत् , पानीयसूयवसकन्दरकन्दमूलैः ।।१८।। अर्थ:- अरी गोपियों! यह गिरिराज गोवर्धन तो भगवान के भक्तों में बहुत ही श्रेष्ठ है। धन्य हैं इसके भाग्य! देखती नहीं हो, हमारे प्राणवल्लभ श्रीकृष्ण और नयनाभिराम बलराम के चरणकमलों का स्पर्श प्राप्त करके यह कितना आनन्दित रहता है। इसके भाग्य की सहारना कौन करे ? यह तो उन दोनों का—ग्वालबालों और गौओं का बड़ा ही सत्कार करता है। स्नान-पान के लिये झरनों का जल देता है, गौओं के लिये सुन्दर हरी-हरी घास प्रस्तुत करता है, विश्राम करने के लिये कन्दराएँ और खाने के लिये कन्द-मूल फल देता है। वास्तव में यह धन्य है!।।१८ ।। गा गोपकैरनुवनं नयतोरुदार, वेणुस्वनैः कलपदैस्तनुभृत्सु सख्यः ।। अस्पन्दनं गतिमतां पुलकस्तरुणां, निर्योगपाशकृतलक्षणयोर्विचित्रम् ।।१९।। अर्थ:- अरी सखी! इन सांवरे-गोरे किशोरों की तो गति ही निराली हैं। जब वे सर पर नोवना(दुहते समय गाय के पैर पर बाँधने की रस्सी) लपेटकर और कंधो पर फंदा रखकर गायों को एक वन से दूसरे वन में हांककर ले जाते हैं, साथ में ग्वालबाल भी होते हैं और मधुर मधुर संगीत गाते हुए बांसुरी की तान छेड़ते हैं, उस समय मनुष्यों की तो बात ही क्या, अन्य शरीरधारियों में भी चलने वाले चेतन पशु-पक्षी और जड़ नदी आदि तो स्थिर हो जाते हैं तथा अचल-वृक्षों को भी रोमांच आ जाता हैं। जादूभरी वंशी का और क्या चमत्कार सुनाऊँ?।।१९ ।। एवंविधा भगवतो या वृन्दावनचारिणः ।। वर्णयन्त्यो मिथो गोप्यः क्रीडास्तन्मयतां ययुः ।।२०।। अर्थ:- परीक्षित्! वृन्दावनविहारी श्रीकृष्ण की ऐसी-ऐसी एक नहीं, अनेक लीलाएँ हैं। गोपियाँ प्रति-दिन आपस में उनका वर्णन करतीं और तन्मय हो जातीं। भगवान लीलाएँ उनके ह्रदय में स्फुरित होने लगतीं । ।। इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे वेणुगीतं नामैकविंशोऽध्यायः।।२१।।

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भ्रमरगीत का वर्णन;-

03 FACTS;-

1-भ्रमर गीत में सूरदास ने उन पदों को समाहित किया है जिनमें मथुरा से कृष्ण द्वारा उद्धव को ब्रज संदेस लेकर भेजा जाता है और उद्धव जो हैं योग और ब्रह्म के ज्ञाता हैं उनका प्रेम से दूर दूर का कोई सरोकार नहीं है। जब गोपियाँ व्याकुल होकर उद्धव से कृष्ण के बारे में बात करती हैं और उनके बारे में जानने को उत्सुक होती हैं तो वे निराकार ब्रह्म और योग की बातें करने लगते हैं तो खीजी हुई गोपियाँ उन्हें काले भँवरे की उपमा देती हैं। बस इन्हीं करीब १०० से अधिक पदों का संकलन भ्रमरगीत या उद्धव-संदेश कहलाया जाता है। 2-कृष्ण जब गुरु संदीपन के यहाँ ज्ञानाजर्न के लिये गए थे तब उन्हें ब्रज की याद सताती थी। वहाँ उनका एक ही मित्र था उद्धव, वह सदैव रीत-िनीति की, निगुर्ण ब्रह्म और योग की बातें करता था। तो उन्हें चिन्ता हुई कि यह संसार मात्र विरिक्तयुक्त निगुर्ण ब्रह्म से तो चलेगा नहीं, इसके लिये विरह और प्रेम की भी आवश्यकता है। और अपने इस मित्र से वे उकताने लगे थे कि यह सदैव कहता है, कौन माता, कौन पिता, कौन सखा, कौन बंधु। वे सोचते इसका सत्य कितना अपूर्ण और भ्रामक है। भला कहाँ यशोदा और नंद जैसे माता-पिता होने का सुख और राधा के साथ बीते पलों का आनंद। और तीनों लोकों में ब्रज के गोप-गोपियों के साथ मिलकर खेलने जैसा सुख कहाँ? ऐसा नहीं है कि उद्धव द्वारा ब्रज को संदेस लेकर भेजते समय कृष्ण संशय में न थे, वे स्व्यं सोच रहे थे यह कैसे संदेस ले जाएगा जो कि प्रेम का मर्म ही नहीं समझता, कोरा ब्रह्मर्ज्ञान झाड़ता है।

3-तभी उपंग के पुत्र उद्धव आ जाते हैं। कृष्ण उन्हें गले लगाते हैं।दोनों सखाओ

में खास अन्तर नहीं। उद्धव का रंग-रूप कृष्ण के समान ही है। पर कृष्ण उन्हें देख कर पछताते हैं कि इस मेरे समान रूपवान युवक के पास काश, प्रेमपूर्ण बुद्धि भी होती। तब कृष्ण मन बनाते हैं कि क्यों न उद्धव को ब्रज संदेस लेकर भेजा जाए, संदेस भी पहुँच जाएगा और इसे प्रेम का पाठ गोपियाँ भली भाँत पढ़ा देंगी। तब यह जान सकेगा प्रेम का ममर्।

उधर उद्धव सोचते हैं कि वे विरह में जल रही गोपियों को निगुर्ण ब्रह्म के प्रेम की शिक्षा दे कर उन्हें इस सांसारिक प्रेम से की पीड़ा मुक्ति से मुक्ति दिला देंगे। कृष्ण मन ही मन मुस्कराकर उन्हें अपना पत्र थमाते हैं कि देखते हैं कि कौन किसे क्या सिखा कर आता है।

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क्या है भ्रमरगीत ?-

मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं

ऊधौ मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं।

हंस सुता की सुंदर कगरी अरु कुंजनि की छांहीं॥

वै सुरभी वै बच्छ दोहनी खरिक दुहावन जाहीं।

ग्वालबाल मिलि करत कुलाहल नाचत गहि गहि बाहीं॥

यह मथुरा कंचन की नगरी मनि मुक्ता हल जाहीं।

जबहिं सुरति आवति बा सुख की जिय उमगत तन नाहीं॥

अनगन भांति करी बहु लीला जसुदा नंद निबाहीं।

सूरदास प्रभु रहे मौन ह्वै यह कहि कहि पछिताहीं॥

राग सारंग में निबद्ध सूरदास जी का यह पद भाव प्रधान है। श्रीकृष्ण जब ब्रज छोडकर मथुरा आ गये तो वहाँ गोपियाँ उनके वियोग में बहुत व्याकुल हो गयीं। कृष्ण ने अपने सखा उद्धव को उन्हें समझाने के लिये ब्रज भेजा। ब्रज से लौटकर उद्धव जी ने सारा हाल सुनाया। उद्धव ने जब श्रीकृष्ण को ब्रज की दशा का हाल सुनाया तो श्रीकृष्ण भाव विभोर होकर बोले, हे सखा! ब्रज को मैं भुला नहीं सकता। हंससुता (यमुना) का वह तट, लताओं से आच्छादित मार्गो की वह छाया का सुख मैं कैसे भूल सकता हूं? मैं उन गायों व बछडों को भी नहीं भूल सकता और न ही उस गोशाला को जहाँ मैं गायों का दूध दूहता था।

हम सब ग्वाल बाल एक दूसरे की बांहों में बांहें डालकर कोलाहल मचाते हुए नाचा करते थे। उस सुख को भी मैं कैसे भुला दूं? हे उद्धव! यह मथुरा नगरी यद्यपि स्वर्ण, मणि-मुक्ताओं से बनी हुई है, लेकिन जब भी मुझे ब्रज के उस सुख की याद आती है तब मन भर आता है और मुझे तन की भी सुधि नहीं रहती। मैंने अनेक प्रकार की अनंत लीलाएं कीं, जिन्हें मैया यशोदा ने बहुत ही निभाया है। सूरदास कहते हैं कि श्रीकृष्ण जब उद्धव से ब्रज के उस सुख की बात बतला रहे थे तब बात कहते-कहते बीच में ही मौन हो जाते थे। ऐसा कहकर मन ही मन पश्चाताप भी करने लगते थे।

उद्धव पत्र गोपियों को दे देते हैं और कहते हैं कि कृष्ण ने कहा है कि –

सुनौ गोपी हिर कौ संदेस। किर समाधि अंतर गति ध्यावहु, यह उनको उपदेस।। वै अविगत अविनासी पूरन, सब घट रहे समाई। तत्वज्ञान बिनु मुक्ति नहीं, वेद पुराननि गाई।। सगुन रूप तिज निरगुन ध्यावहु, इक चित्त एक मन लाई। वह उपाई किर बिरह तरौ तुम, मिले ब्रह्म तब आई।। दुसह संदेस सुन माधौ को, गोपि जन बिलखानी। सूर बिरह की कौन चलावै, बूड़ितं मनु बिन पानी॥3॥

हे गोपियों, अपने प्रिय का संदेस सुनो। उनका यही उपदेस है कि समाधि लगा कर अपने मन में निगुर्ण निराकार ब्रह्म का ध्यान करो। यह अज्ञेय, अविनाशी पूर्ण सबके मन में बसा है। वेद पुराण भी यही कहते हैं कि तत्वज्ञान के बिना मुक्ति संभव नहीं। इसी उपाय से तुम विरह की पीड़ा से छुटकारा पा सकोगी। अपने कृष्ण के सगुण रूप को छोड़ उनके ब्रह्म निराकार रूप की अराधना करो। उद्धव के मुख से अपने प्रिय का उपदेश सुन प्रेममार्गी गोपियाँ व्यथित हो जाती हैं। अब विरह की क्या बात वे तो बिन पानी पीड़ा के अथाह सागर डूब गईं।

तभी एक भ्रमर वहाँ आता है तो बस जली-भुनी गोपियों को मौका मिल जाता है और वह उद्धव पर काला भ्रमर कह कर खूब कटाक्ष करती हैं।

रहु रे मधुकर मधु मतवारे। कौन काज या निरगुन सौं, चिरजीवहू कान्ह हमारे।। लोटत पीत पराग कीच में, बीच न अंग सम्हारै। भारम्बार सरक मदिरा की, अपरस रटत उघारे।। तुम जानत हो वैसी ग्वारिनी, जैसे कुसुम तिहारे। घरी पहर सबहिनी बिरनावत, जैसे आवत कारे।। सुंदर बदन, कमल-दल लोचन, जसुमति नंद दुलारे। तन-मन सूर अरिप रहीं स्यामह,ि का पै लेहिं उधारै॥4॥

गोपियाँ भ्रमर के बहाने उद्धव को सुना-सुना कर कहती हैं.. हे भंवरे। तुम अपने मधु पीने में व्यस्त रहो, हमें भी मस्त रहने दो। तुम्हारे इस निरगुण से हमारा क्या लेना-देना। हमारे तो सगुण साकार कान्हा चिरंजीवी रहें। तुम स्वयं तो पराग में लोट लोट कर ऐसे बेसुध हो जाते हो कि अपने शरीर की सुध नहीं रहती और इतना मधुरस पी लेते हो कि सनक कर रस के विरुद्ध ही बातें करने लगते हो। हम तुम्हारे जैसी नहीं हैं कि तुम्हारी तरह फूल-फूल पर बहकें, हमारा तो एक ही है कान्हा जो सुन्दर मुख वाला, नीलकमल से नयन वाला यशोदा का दुलारा है। हमने तो उन्हीं पर तन-मन वार दिया है अब किसी निरगुण पर वारने के लिये तन-मन किससे उधार लें?

उधौ जोग सिखावनि आए। सृंगी भस्म अथारी मुदर्ा, दै ब्रजनाथ पठाए।। जो पै जोग लिख्यौ गोपिन कौ, कत रस रास खिलाए। तब ही क्यों न ज्ञान उपदेस्यौ, अधर सुधारस लाए।। मुरली शब्द सुनत बन गवनिं, सुत पितगृह बिसराए। सूरदास संग छांिड स्याम कौ, हमहिं भये पछताए॥5॥

गोपियाँ कहती हैंर् हे सखि! आओ, देखो ये श्याम सुन्दर के सखा उद्धव हमें योग सिखाने आए हैं। स्वयं ब्रजनाथ ने इन्हें श्रृंगी, भस्म, अथारी और मुद्रा देकर भेजा है। हमें तो खेद है कि जब श्याम को इन्हें भेजना ही था तो, हमें अदभुत रास का रसमय आनंद क्यों दिया था? जब वे हमें अपने अथरों का रस पिला रहे थे तब ये ज्ञान और योग की बातें कहाँ गईं थीं? तब हम श्री कृष्ण की मुरली के स्वरों में सुधबुध खो कर अपने बच्चों और पिता के घर को भुला दिया करती थीं। श्याम का साथ छोड़ना हमारे भाग्य में था ही तो हमने उनसे प्रेम ही क्यों किया अब हम पछताती हैं।

मधुबनी लोगि को पितयाई। मुख औरै अंतरगति औरै, पितयाँ लिख पठवत जु बनाई।। ज्यौं कोयल सुत काग जियावै, भाव भगति भोजन जु खवाई। कुहुकि कुहुकि आएं बसंत रितु, अंत मिलै अपने कुल जाई।। ज्यौं मधुकर अम्बुजरस चाख्यौ, बहुरि न बूझे बातें आई। सूर जहाँ लगि स्याम गात हैं, तिनसौं कीजै कहा सगाई॥6॥

कोई गोपी उद्धव पर व्यंग्य करती है।मथुरा के लोगों का कौन विश्वास करे? उनके तो मुख में कुछ और मन में कुछ और है। तभी तो एक ओर हमें स्नेहिल पत्र लिख कर बना रहे हैं दूसरी ओर उद्धव को जोग के संदेस लेके भेज रहे हैं। जिस तरह से कोयल के बच्चे को कौआ प्रेमभाव से भोजन करा के पालता है और बसंत रितु आने पर जब कोयलें कूकती हैं तब वह भी अपनी बिरादरी में जा मिलता है और कूकने लगता है। जिस प्रकार भंवरा कमल के पराग को चखने के बाद उसे पूछता तक नहीं। ये सारे काले शरीर वाले एक से हैं, इनसे सम्बंध बनाने से क्या लाभ?

निरगुन कौन देस को वासी। मधुकर किह समुझाई सौंह दै, बूझतिं सांिच न हांसी।। को है जनक, कौन है जननि, कौन नारि कौन दासी। कैसे बरन भेष है कैसो, किहं रस मैं अभिलाषी।। पावैगो पुनि कियौ आपनो, जो रे करेगौ गांसी। सुनत मौन हवै रहयौ बावरो, सूर सबै मति नासी॥6॥

अब गोपियों ने तर्क किया... हाँ तो उद्धव यह बताओ कि तुम्हारा यह निगुर्ण किस देश का रहने वाला है? सच सौगंध देकर पूछते हैं, हंसी की बात नहीं है। इसके माता-पिता, नारी-दासी आखिर कौन हैं? कैसा है इस निरगुण का रंग-रूप और भेष? किस रस में उसकी रूचि है? यदि तुमने हमसे छल किया तो तुम पाप और दंड के भागी होगे। सूरदास कहते हैं कि गोपियों के इस तकर् के आगे उद्धव की बुद्धि कुंद हो गई। और वे चुप हो गए। लेकिन गोपियों के व्यंग्य खत्म न हुए वे कहती रहीं –

जोग ठगौरी ब्रज न बिकैहे। मूरि के पातिन के बदलै, कौ मुक्ताहल देहै।। यह ब्यौपार तुम्हारो उधौ, ऐसे ही धरयौ रेहै। जिन पें तैं लै आए उधौ, तिनहीं के पेट समैंहै।। दाख छांिड के कटुक निम्बौरी, कौ अपने मुख देहै। गुन किर मोहि सूर साँवरे, कौ निरगुन निरवेहै॥8॥

हे उद्धव ये तुम्हारी जोग की ठगविद्या, यहाँ ब्रज में नहीं बिकने की। भला मूली के पत्तों के बदले माणक मोती तुम्हें कौन देगा? यह तुम्हारा व्यापार ऐसे ही धरा रह जाएगा। जहाँ से ये जोग की विद्या लाए हो उन्हें ही वापस सिखा दो, यह उन्हीं के लिये उिचत है। यहाँ तो कोई ऐसा बेवकूफ नहीं कि किशमिश छोड़ कर कड़वी निंबौली खाए! हमने तो कृष्ण पर मोहित होकर प्रेम किया है अब तुम्हारे इस निरगुण का निवार्ह हमारे बस का नहीं।

काहे को रोकत मारग सूधो। सुनहु मधुप निरगुन कंटक तै, राजपंथ क्यौं रूंथौ।। कै तुम सिखि पठए हो कुब्जा, कहयो स्यामघनहूं धौं। वेद-पुरान सुमृति सब ढूंढों, जुवतिनी जोग कहूँ धौं।। ताको कहां परैंखों की जे, जाने छाछ न दूधौ। सूर मूर अक्रूर गयौ लै, ब्याज निवैरत उधौ॥9॥

गोपियां चिढ़ कर पूछती हैं कि कहीं तुम्हें कुबजा ने तो नहीं भेजा? जो तुम स्नेह का सीधा साधा रास्ता रोक रहे हो। और राजमार्ग को निगुर्ण के कांटे से अवरुद्ध कर रहे हो! वेद-पुरान, स्मृति आदि गर्ंथ सब छान मारो क्या कहीं भी युवतियों के जोग लेने की बात कही गई है? तुम जरूर कुब्जा के भेजे हुए हो। अब उसे क्या कहें जिसे दूध और छाछ में ही अंतर न पता हो। सूरदास कहते हैं कि मूल तो अक्रूर जी ले गए अब क्या गोपियों से ब्याज लेने उद्धव आए हैं?

उधौ मन ना भए दस बीस। एक हुतौ सौ गयौ स्याम संग, को आराधे ईस।। इंदर्ी सिथिल भई केसव बिनु, ज्यौं देही बिनु सीस। आसा लागि रहित तन स्वासा, जीवहिं कोटि बरीस। तुम तौ सखा स्याम सुंदर के, सकल जोग के ईस। सूर हमारै नंद-नंदन बिनु, और नहीं जगदीस॥10॥

अब थक हार कर गोपियाँ व्यंग्य करना बंद कर उद्धव को अपने तन मन की दशा कहती हैं। उद्धव हतप्रभ हैं, भक्ति के इस अदभुत स्वरूप से।कृष्ण के अगाध प्रेम में डूबी विरहाकुल गोपियों की हालत का सांगोपांग वर्णन किया है सूरदास जी ने इस पद के माध्यम से। राग सारंग में आबद्ध यह पद सूरदास की कल्पनाशीलता की अद्भुत उडान है।

गोपियां बोलीं कि हे उद्धव! यदि हम तुम्हारी बात मान भी लें तो यह संभव कैसे होगा, क्योंकि मन कोई दस-बीस तो हैं नहीं, एक ही है। वह मन भी हमारे श्यामसुंदर अपने साथ ले गए हैं। हमारी सभी शारीरिक इंद्रियां भी केशव के बिना शिथिल हो गई हैं, वैसे ही जेसे शीशविहीन देह होती है। इस शरीर में जो श्वास चल रहे हैं वह केवल कृष्ण से मिलने की आशा में ही हैं। इस प्रकार हम कृष्ण मिलन की आस में करोडों वर्षो तक जी सकती हैं। हे उद्धव! आप तो हमारे श्यामसुंदर के सखा हैं और योग विद्या के सर्वज्ञ भी। तुम कृष्ण के बिना भी योग के सहारे अपना उद्धार कर लोगे। हमारा तो नंद कुमार कृष्ण के सिवा कोई ईश्वर नहीं है।सूरदास के शब्दों में गोपियों ने उद्धव को आभास करा दिया कि श्रीकृष्ण ही उनके सर्वस्व हैं। उनके बिना और किसी को वे हृदय में धारण नहीं कर सकतीं।

गोपी उद्धव संवाद के ऐसे कई कई पद हैं जो कटाक्षों, विरह दशाओ, राधा के विरह और निरगुण का पिरहास और तर्क -कुतर्क व्यक्त करते हैं। सभी एक से एक उत्तम हैं पर लेख की सीमा है।

अंततः गोपियाँ राधा के विरह की दशा बताती हैं, ब्रज के हाल बताती हैं। अंततः उद्धव का निरगुण गोपियों के प्रेममय सगुण पर हावी हो जाता है और उद्धव कहते हैं –

अब अति चकितवंत मन मेरौ।

सदा रहति बरषा रितु हम पर जब तें स्याम सिधारे॥

दृग अंजन न रहत निसि बासर कर कपोल भए कारे।

कंचुकि पट सूखत नहिं कबहूं उर बिच बहत पनारे॥

आंसू सलिल भई सब काया पल न जात रिस टारे।

सूरदास प्रभु यहै परेखो गोकुल काहें बिसारे॥

यह पद विरह वेदना की अद्भुत कृति है। राग मल्हार में आबद्ध इस पद में सूरदास जी ने कृष्ण से विलग हुई गोपियों की विरह वेदना का सजीव चित्रण किया है। अक्रूरजी जब बलराम के साथ श्रीकृष्ण को भी मथुरा ले गए तब गोपियां विरहग्रस्त हो गई। सूरदास के पदों में गोपियों का विरह भाव स्वष्ट झलकता है। इस प्रसिद्ध पद में कृष्ण के वियोग में गोपियों की क्या दशा हुई, उसी का वर्णन सूरदास ने किया है।

कृष्ण को संबोधन देते हुए गोपियां कहती हैं कि हे कन्हाई! जब से तुम ब्रज को छोडकर मथुरा गए हो, तभी से हमारे नयन नित्य ही वर्षा के जल की भांति बरस रहे हैं अर्थात् तुम्हारे वियोग में हम दिन-रात रोती रहती हैं। रोते रहने के कारण इन नेत्रों में काजल भी नहीं रह पाता अर्थात् वह भी आंसुओं के साथ बहकर हमारे कपोलों (गालों) को भी श्यामवर्णी कर देता है। हे श्याम! हमारी कंचुकि (चोली या अंगिया) आंसुओं से इतनी अधिक भीग जाती है कि सूखने का कभी नाम ही नहीं लेती। फलत: वक्ष के मध्य से परनाला-सा बहता रहता है। इन निरंतर बहने वाले आंसुओं के कारण हमारी यह देह जल का स्त्रोत बन गई है, जिसमें से जल सदैव रिसता रहता है। सूरदास के शब्दों में गोपियां कृष्ण से कहती हैं कि हे श्याम! तुम यह तो बताओ कि तुमने गोकुल को क्यों भुला दिया है।

बिथा बिरह जुर भारी

जब ते बिछुरे कुंज बिहारी।

नींद न परै घटै नहिं रजनी बिथा बिरह जुर भारी॥

सरद रैनि नलिनी दल सीतल जगमग रही उजियारी।

रवि किरनन ते लागति ताती इहि सीतल ससि जारी॥

स्त्रवननि सबद सुहाइ न सखि री पिक चातक द्रुम डारी।

उर तें सखी दूर करि हारहिं कंकन धरहिं उतारी॥

सूर स्याम बिनु दुख लागत है कुसुम सेज करि न्यारी।

बिलखि बदन बृषभानु नंदिनी करि बहु जतन जु हारी॥

राग केदार में आबद्ध इस पद के माध्यम से सूरदास जी ने वृषभानुनंदिनी राधा की विरह वेदना का वर्णन किया है। गोकुल से कृष्ण के चले जाने पर राधा बहुत व्याकुल हो जाती हैं। जब से कृष्ण मथुरा गए हैं तभी से राधा को नींद नहीं आती। रात जैसे समाप्त होने का नाम ही नहीं लेती। इतना ही नहीं विरह के कारण ज्वर पीडा भी हो गई है। शरद् ऋतु की रात्रि कृष्ण के सान्निध्य काल में जगमगाती अच्छी लगती थी और कमलिनी के पुष्प भी अच्छे लगते थे, वही सब वियोग काल में सूर्य किरणों के समान दग्ध करने वाली प्रतीत होती हैं।

यही स्थिति चंद्रमा की है, वह भी अग्नि समान प्रतीत हो रहा है। राधा अपनी सखी से कहती है कि अरी सखी! अब तो वृक्षों की शाखा पर बैठकर कुहकने वाली कोयल व चातक की स्वर लहरी भी नहीं सुहाती। राधा और कहती है कि सखी मैंने तो गले के हार भी उतारकर अलग रख दिया है क्योंकि प्रियतम के बिना यह सब अच्छा नहीं लगता। सूरदास कहते हैं कि राधा को पुष्पों से सुसज्जित शय्या भी श्याम के बिना काटने को दौडती है। इतने पर भी राधा अपने शरीर को अथक प्रयास कर जैसे-तैसे संभाले हुए हैं।

स्याम हमारे चोर

मधुकर स्याम हमारे चोर।

मन हरि लियो तनक चितवनि में चपल नैन की कोर॥

पकरे हुते हृदय उर अंतर प्रेम प्रीति के जोर।

गए छंडाइ तोरि के बंधन दै गए हंसनि अकोर॥

चौंक परीं जानत निसि बीती दूत मिल्यो इक भौंर।

सूरदास प्रभु सरबस लूट्यो नागर नवलकिसोर॥

यह राग सारंग पर आधारित पद है। गोपियां उद्धव से बोलीं, हमारे चित्त को चुराने वाले हमारे श्यामसुंदर ही हैं। उन्होंने टेढी दृष्टि से हमारे चित्त को चुरा लिया है। हमने अपने हृदय में उन्हें भलीभांति जकडकर रखा था। लेकिन उन्होंने तनिक मुस्कान बिखेरकर सारे बंधन तोड डाले और स्वयं को मुक्त करा लिया। इस प्रकार श्यामसुंदर हमारे हृदय से निकल गए, तब हम गोपियां चौंककर जाग गई और रात्रि का सारा समय इन आंखों में ही काट डाला अर्थात रातभर जागती रहीं। जब सवेरा हुआ तो आपके (उद्धव) रूप में एक संदेशवाहक से हमारी भेंट हुई। सूरदास कहते हैं कि गोपियों ने उद्धव को स्पष्ट कर दिया कि कृष्ण ने हमारा सर्वस्व छीन लिया।

हरि दर्शन की प्यासी

अंखिया हरि दरसन की प्यासी।

देख्यो चाहतिं कमलनैन कों निसि दिन रहतिं उदासी॥

आए ऊधौ फिरि गए आंगन डारि गए गर फांसी।

केसरि तिलक मोतिनि की माला बृंदावन के बासी॥

काहू के मन की कोउ जानति लोगनि के मन हांसी।

सूरदास प्रभु तुम्हारे दरस को करबत लैहौं कासी॥

श्रीकृष्ण के विरह में व्याकुल गोपियों की मनोदशा का अद्भुत चित्रण है इस पद में। राग घनाक्षरी पर आधारित सूरदास जी का यह पद भगवान् से मिलने के लिये भक्त की आतुरता दर्शाता है। गोपियां श्रीकृष्ण के विरह में व्याकुल होकर कहती हैं कि हे हरि! हमारी आंखें तुम्हारे दर्शनों को प्यासी हैं। हे कमल नयन! ये आखें आप ही के दर्शनों की इच्छुक हैं, आपके बिना यह दिन-रात उदास रहती हैं। इस पर भी उद्धव यहां आकर हमें ब्रह्म ज्ञान का उपदेश ग्रहण करने की बात कहकर दुविधा में डाल गए हैं।

हे वृंदावन वासी, केसर का तिलक लगाने वाले व मोतियों की माला धारण करने वाले श्रीकृष्ण! किसीके मन की कौन जाने! लोग तो हंसी उडाना ही जानते हैं। सूरदास कहते हैं कि गोपियां श्रीकृष्ण के दर्शन करके ही स्वयं को धन्य करना चाहती हैं। ठीक वैसे ही जैसे काशी, प्रयाग आदि स्थानों में प्राण देने पर लोग समझते हैं कि उनकी मुक्ति हो गई। गोपियां भी कृष्ण दर्शनों में ही स्वयं को मुक्त समझती हैं।

मन माने की बात

ऊधौ मन माने की बात।

दाख छुहारा छांडि अमृत फल विषकीरा विष खात॥

ज्यौं चकोर को देइ कपूर कोउ तजि अंगार अघात।

मधुप करत घर कोरि काठ मैं बंधत कमल के पात॥

ज्यौं पतंग हित जानि आपनौ दीपक सौं लपटात।

सूरदास जाकौ मन जासौं सोई ताहि सुहात॥

राग घनाक्षरी पर आधारित सूरदास जी का यह पद बहुत लोकप्रिय है। इस पद का भावार्थ है कि मन पर नियंत्रण मुश्किल है। यह जिस पर भा जाए वही अच्छा लगने लगता है। गोपियां कहती हैं कि हे उद्धव! यह तो मन के मानने की बात है। किसी को कुछ अच्छा लगता है तो किसी को कुछ। अब सर्प को ही लो.. उसे दाख-छुआरा व अमृत (रस से परिपूर्ण) फल अच्छे नहीं लगते। इसीलिए वह विष का सेवन करता है।

इसी तरह यदि चकोर को कपूर दिया जाए तो वह उसका परित्याग कर अंगार को ही ग्रहण करता है। भ्रमर काठ को विदीर्ण कर उसमें अपना घर बना लेता है लेकिन स्वयं कमल दल में बंद हो जाता है। पतंगा दीपक को प्राणपण से चाहने के कारण ही उस पर अपने प्राणों को न्योछावर कर देता है। सूरदास कहते हैं कि जिसको जो रुचता है वह उसी को पाता है।

सदा बसै उर माहीं

ज्ञान बिना कहुं वै सुख नाहीं।

घट घट ब्यापक दारु अगिनि ज्यों सदा बसै उर माहीं॥

निरगुन छांडि सगुन को दौरति सुधौं कहौं किहिं पाहीं।

तत्व भजौ जो निकट न छूटै ज्यों तनु ते परछाहीं॥

तिहि तें कहौ कौन सुख पायो हिहिं अब लौं अवगाही।

सूरदास ऐसें करि लागी ज्यों कृषि कीन्हें पाही॥

सूरदास जी का यह पद राग घनाक्षरी में आबद्ध है। उद्धव गोपियों को ज्ञान मार्ग से भक्ति का उपदेश दे रहे हैं तथा निर्गुण एवं सगुण में भेद बता रहे हैं। लेकिन श्रीकृष्ण का साक्षात् दर्शन कर चुकी गोपियाँ भला उद्धव से कैसे सहमत होतीं? उद्धव गोपियों से कहते हैं, ज्ञान के बिना कहीं भी सुख नहीं है। पूर्णब्रह्म परमात्मा सबके घट-घट में वैसे ही व्याप्त हैं जैसे लकडी में अग्नि व्याप्त रहती है अर्थात् लकडी को जब तक जलाया न जाए तब तक उसमें से अग्नि नहीं निकलती। वैसे ही जब तक योग साधन नहीं किया जाता तब तक घट-घट में व्याप्त पूर्णब्रह्म (आत्म तत्त्‍‌व) का ज्ञान नहीं होता।

तुम निर्गुण को छोडकर सगुण की ओर दौडती हो। निर्गुण के बिना सगुण की प्राप्ति कैसे होगी? तुम उस परम तत्त्‍‌व का स्मरण करो जो शरीर की परछाई की भांति है और कभी भी विलग होने वाला नहीं है। गोपियां निर्गुण का विरोध करती हुई कहती हैं कि अब तक तो हमने सगुण का ध्यान कर बहुत सुख पाया लेकिन निर्गुण से हमें क्या सुख मिलेगा-जिसका न आकार है, न स्वरूप-न हम जिसे जानती हैं। सूरदास कहते हैं कि गोपियों ने निर्गुण साधना की उपमा मेड पर खेती करने के समान दी है अर्थात् गोपियों ने अनुसार निर्गुण साधना वैसी ही है जैसे मेड पर खेती करना। उनकी दृष्टि में निर्गुण साधना या भक्ति व्यर्थ की बात है।

मुरली सब्द सुनावन

कहा दिन ऐसे ही चलि जैहैं।

सुनि सखि मदन गुपाल आंगन में ग्वालनि संग न ऐहैं॥

कबहूं जात पुलिन जमुना के बहु विहार बिधि खेलत।

सुरति होत सुरभी संग आवत पुहुप गहे कर झेलत॥

मृदु मुसुकानि आनि राख्यो जिय चलत कह्यो है आवन।

सूर सुदिन कबहूं तौ ह्वै है मुरली सब्द सुनावन॥

राग सोरठा पर आधारित इस पद में सूरदास जी ने गोपियों की भावनाओं को व्यक्त किया है। एक सखी दूसरी सखी से पूछती है कि क्या यह दिन ऐसे ही व्यतीत हो जाएंगे? क्या मदन गोपाल अब ग्वालों के संग हमारे आंगन में नहीं आएंगे? क्या अब यमुना के किनारे वह नाना प्रकार की क्रीडाएं नहीं करेंगे? उनकी वह चेष्टाएं बार-बार स्मरण हो आती हैं, जब वह गायों के साथ हाथों में पुष्पों को उछालते हुए आते थे। उनकी वह मधुर मुस्कान अब भी मेरे मानस-पटल पर है। हे सखी! मेरा मन तो कहता है कि श्यामसुंदर एक दिन अवश्य आएंगे। सूरदास कहते हैं कि वह सखियां विचार कर रही हैं कि वह शुभ दिन कब आएगा जब हम श्रीकृष्ण की मुरली का मधुर स्वर सुन पाएंगी।

भाव भगति है जाकें

रास रस लीला गाइ सुनाऊं।

यह जस कहै सुनै मुख स्त्रवननि तिहि चरनन सिर नाऊं॥

कहा कहौं बक्ता स्त्रोता फल इक रसना क्यों गाऊं।

अष्टसिद्धि नवनिधि सुख संपति लघुता करि दरसाऊं॥

हरि जन दरस हरिहिं सम बूझै अंतर निकट हैं ताकें।

सूर धन्य तिहिं के पितु माता भाव भगति है जाकें॥

विहाग राग पर आधारित इस पद में सूरदास कहते हैं कि मेरा मन चाहता है कि मैं भगवान् श्रीकृष्ण की रसीली रास लीलाओं का नित्य ही गान करूं। जो लोग भक्तिभाव से कृष्ण लीलाओं को सुनते हैं तथा अन्य लोगों को भी सुनाते हैं उनके चरणों में मैं शीश झुकाऊं। वक्ता व श्रोता अर्थात् कृष्ण लीलाओं का गान करने व अन्य को सुनाने के फल का मैं और क्या वर्णन करूं। इन सबका फल एक जैसा ही होता है। तब फिर इस जिह्वा से क्यों न कृष्ण लीलाओं का गान किया जाए। जो दीनभाव से इसका गान करता है, उसे अष्टसिद्धि व नव निधियां तथा सभी तरह की सुख-संपत्ति प्राप्त होती है। जिनका मन निर्मल है या जो हरिभक्त हैं, वह सबमें ही हरि स्वरूप देखते हैं। सूरदास कहते हैं कि वे माता-पिता धन्य हैं जिनकी संतानों में हरिभक्ति का भाव विद्यमान है। आयौ हो निरगुण उपदेसन, भयौ सगुन को चैरौ।। जो मैं ज्ञान गहयौ गीत को, तुमहिं न परस्यौं नेरौ। अति अज्ञान कछु कहत न आवै, दूत भयौ हिर कैरौ।। निज जन जानि-मानि जतननि तुम, कीन्हो नेह घनेरौ। सूर मधुप उिठ चले मधुपुरी, बोरि जग को बेरौ॥11॥

कृष्ण के प्रति गोपियों के अनन्य प्रेम को देख कर उद्धव भाव विभोर होकर कहते हैंर् मेरा मन आश्चयर्चकित है कि मैं आया तो निगुर्ण ब्रह्म का उपदेश लेकर था और प्रेममय सगुण का उपासक बन कर जा रहा हूँ। मैं तुम्हें गीता का उपदेश देता रहा, जो तुम्हें छू तक न गया। अपनी अज्ञानता पर लज्जित हूँ कि किसे उपदेश देता रहा जो स्वयं लीलामय हैं। अब समझा कि हरी ने मुझे यहाँ मेरी अज्ञानता का अंत करने भेजा था। तुम लोगों ने मुझे जो स्नेह दिया उसका आभारी हूँ। सूरदास कहते हैं कि उद्धव अपने योग के बेड़े को गोपियों के प्रेम सागर में डुबो के, स्वयं प्रेममार्ग अपना मथुरा लौट गए।

.....राधे राधे.....