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कौन है ब्रह्मांड की मूल शक्ति ?दस महाविद्या की साधना उपासना कैसे की जाती है?PART 01


ब्रह्मांड की मूल शक्ति दस महाविद्याओं की अलौकिक शक्ति और साधना;-

08 FACTS;-

1-महाविद्या शब्द संस्कृत भाषा के शब्दों "महा" तथा "विद्या" से बना है- "महा" अर्थात महान्, विशाल, विराट ; तथा "विद्या" अर्थात ज्ञान।दशमहाविद्या अर्थात महान विद्या रूपी देवी। महाविद्या, देवी दुर्गा के दस रूप हैं, जो अधिकांश तान्त्रिक साधकों द्वारा पूजे जाते हैं, परन्तु साधारण भक्तों को भी अचूक सिद्धि प्रदान करने वाली है। इन्हें दस महाविद्या के नाम से भी जाना जाता है।महाविद्या विचार का विकास शक्तिवाद के इतिहास में एक नया अध्याय बना जिसने इस विश्वास को पोषित किया कि सर्व शक्तिमान् एक नारी है।

2-प्रकृति की सभी शक्तियों में सारे ब्रह्मांड के मूल में ये दस महाविद्या ही हैं। ये दस महाविद्या है जो प्रकृति के कण कण में समाहित हैं और इनकी साधना से मनुष्य इहलोक ही नहीं परलोक भी सुधार सकता है।ये दसों महाविद्याएं आदि शक्ति माता पार्वती की ही रूप मानी जाती हैं। दस का सबसे ज्यादा महत्व है। संसार में दस दिशाएं स्पष्ट हैं ही, इसी तरह 1 से 10 तक के बिना अंकों की गणना संभव नहीं है।

3-शाक्त दर्शन, दस महाविद्याओं को भगवान विष्णु के दस अवतारों से सम्बद्ध करता है और यह व्याख्या करता है कि महाविद्याएँ वे स्रोत हैं जिनसे भगवान विष्णु के दस अवतार उत्पन्न हुए थे। महाविद्याओं के ये दसों रूप चाहे वे भयानक हों अथवा सौम्य, जगज्जननी के रूप में पूजे जाते हैं।भगवती के इस संसार में आने के और रूप धारण करने के कारणों की चर्चा मुख्यतः जगत कल्याण, साधक के कार्य, उपासना की सफलता तथा दानवों का नाश करने के लिए हुई। ये सारा संसार शक्ति रूप ही है। इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए 4-शक्ति की उपासना कर सिद्धि को ग्रहण करने के इच्छुक तो बहुत लोग हैं, लेकिन पूरे समर्पण और श्रद्धा के साथ तप कर सिद्धि को प्राप्त करने का साहस सभी के पास नहीं होता। शक्ति के विभिन्न स्वरूपों की आराधना कर उन्हें प्रसन्न करने के लिए अघोरी, साधु और भौतिकवाद से दूर हो चुके लोग भी अपना संपूर्ण जीवन झोंक देते हैं।

5- दस महाविद्या के बारे में कुछ भी कहना सूर्य को दीपक दिखाने के समान है। सारी शक्ति एवं सारे ब्रह्मांड की मूल में हैं ये दस महाविद्या। मनुष्य जन्म से लेकर मृत्यु तक जिन जालों में उलझा रहता है और जिस सुख तथा अंतत: मोक्ष की खोज करता है, उन सभी के मूल में मूल यही दस महाविद्या हैं। दस का सबसे ज्यादा महत्व है। संसार में दस दिशाएं स्पष्ट हैं ही, इसी तरह 1 से 10 तक के बिना अंकों की गणना संभव नहीं है। 6-अघोरपंथ में विभिन्न प्रकार की सिद्धियों का उल्लेख किया गया है, जिन्हें ज्ञान और शक्ति प्राप्त करने के लिए हासिल किया जाता है। प्रमुख रूप से 10 सिद्धियों को जाना गया है, जिनमें से 4 को काली कुल और छ: को श्रीकुल में रखा गया है।इन सिद्धियों को कोई भी व्यक्ति प्राप्त कर सकता है। इसमें जाति, वर्ण, लिंग, उम्र आदि का कुछ भी लेना-देना नहीं है। अपनी तन्मयता और समर्पण भाव के साथ शक्ति को प्रसन्न कर सिद्धियों को प्राप्त किया जाता है, लेकिन इसके लिए जिस मार्ग पर चलना होता है वह बेहद कठिन है। 7-सिद्धियों को प्राप्त करने की शुरुआत करने से पूर्व व्यक्ति को अपनी देह को शुद्ध करना होता है। पवित्र मंत्रों के जाप के दौरान स्नान कर देह का शुद्धिकरण संपन्न होता है। इसके पश्चात जिस स्थान पर बैठकर पूजा करनी है उस स्थान का भी शोधन होता है। इसके बाद शक्ति के जिस स्वरूप को प्राप्त करने के लिए सिद्धि करनी है, उस स्वरूप का पूरी एकाग्रता और तन्मयता के साथ ध्यान किया जाता है।

8-नवरात्र में मां दुर्गा के नौ स्वरुपों की पूजा-अर्चना की जाती है. लेकिन किसी खास कार्य की सिद्धि के लिए नवरात्र में 10 महाविद्या की उपासना का विशेष महत्व है।चाहे मां दुर्गा हों या फिर काली ये सभी देवियां शक्ति का ही स्वरुप मानी जाती हैं। इनमें बस अंतर है तो चित्रण का। किसी खास कार्य की सिद्धि या शक्ति साधना में 10 महाविद्याओं की उपासना अहम मानी जाती है।

9-तंत्र के क्षेत्र में सबसे प्रभावी हैं दस महाविद्या।ब्रह्मांड की सारी शक्तियों की स्रोत यही दस महाविद्या हैं। इन्हें शक्ति भी कहा जाता है। मान्यता है कि शक्ति के बिना देवाधिदेव शिव भी शव के समान हो जाते हैं। भगवान विष्णु की शक्ति भी इन्हीं में निहित हैं। सिक्के का दूसरी पहलू यह भी है कि शक्ति की पूजा शिव के बिना अधूरी मानी जाती है। इसी तरह शक्ति के विष्णु रूप में भी दस अवतार माने गए हैं। किसी भी महाविद्या के पूजन के समय उनकी दाईं ओर शिव का पूजन ज्यादा कल्याणकारी होता है। अनुष्ठान या विशेष पूजन के समय इसे अनिवार्य मानना चाहिए।शाक्त भक्तों के अनुसार "दस रूपों में समाहित एक सत्य की व्याख्या है - महाविद्या" जिससे जगदम्बा के दस लौकिक व्यक्तित्वों की व्याख्या होती है।

10-दस महाविद्या से ही विष्णु के भी दस अवतार माने गए हैं। उनके विवरण भी निम्न हैं--महाविद्या----------- विष्णु के अवतार

1-काली--------------------कृष्ण

2-तारा---------------------मत्स्य

3-षोडषी--------------------परशुराम

4-भुवनेश्वरी----------------वामन

5-त्रिपुर भैरवी--------------बलराम

6-छिन्नमस्ता--------------नृसिंह

7-धूमावती-----------------वाराह

8-बगला---------------------कूर्म

9-मातंगी--------------------राम

10-कमला-----------------बुद्ध

NOTE;-

विष्णु का 'कल्कि अवतार 'दुर्गा जी का माना गया है। दस महाविद्या उत्पत्ति की पौराणिक कथा;-

12 FACTS;-

1-देवीभागवत पुराण के अनुसार महाविद्याओं की उत्पत्ति भगवान शिव और उनकी पत्नी सती, जो कि पार्वती का पूर्वजन्म थीं, के बीच दक्ष यज्ञ में जाने के एक विवाद के कारण हुई।

शिव जी ने सती से कहा, “तुम्हारा वहां जाना उचित नहीं हैं, वहां तुम्हारा सम्मान नहीं होगा, पिता द्वारा की गई निंदा तुम सहन नहीं कर पाओगी, जिसके कारण तुम्हें प्राण त्याग करना पड़ेगा,क्या तुम अपने पिता काअनिष्ट करोगी?”

2-इस पर सती ने क्रोध युक्त हो, अपने पति भगवान शिव से कहा “अब आप मेरी भी सुन लीजिये, मैं अपने पिता के घर जरूर जाऊंगी, फिर आप मुझे आज्ञा दे या न दे।” जिस से भगवान शिव भी क्रुद्ध हो गए और उन्होंने सती के अपने पिता के यहाँ जाने का वास्तविक प्रयोजन पूछा, ‘अगर उन्हें अपने पति की निंदा सुनने का कोई प्रयोजन नहीं हैं तो वे क्यों ऐसे पुरुष के गृह जा रही हैं? जहाँ उनकी सर्वथा निंदा होती हो।‘

3-इस पर सती ने कहा “मुझे आपकी निंदा सुनने में कोई रुचि नहीं हैं और न ही मैं आपके निंदा करने वाले के घर जाना चाहती हूँ। वास्तविकता तो यह हैं, यदि आपका अपमान कर, मेरे पिताजी इस यज्ञ को सम्पूर्ण कर लेते हैं तो भविष्य में हमारे ऊपर कोई श्रद्धा नहीं रखेगा और न ही हमारे निमित्त आहुति ही डालेगा। आप आज्ञा दे या न दे, मै वहां जा कर यथोचित सम्मान न पाने पर यज्ञ का विध्वंस कर दूंगी।”

4-भगवान शिव ने कहा “मेरे इतने समझाने पर भी आप आज्ञा से बाहर होती जा रही हैं, आप की जो इच्छा हो वही करें, आप मेरे आदेश की प्रतीक्षा क्यों कर रहीं हैं?शिव जी के ऐसा

कहने पर दक्ष-पुत्री सती देवी अत्यंत क्रुद्ध हो गई, उन्होंने सोचा, “जिन्होंने कठिन तपस्या करने के पश्चात मुझे प्राप्त किया था आज वो मेरा ही अपमान कर रहें हैं, अब मैं इन्हें अपना वास्तविक प्रभाव दिखाऊंगी।"

5-भगवान शिव ने देखा कि सती के होंठ क्रोध से फड़क रहे हैं तथा नेत्र प्रलयाग्नि के समान लाल हो गए हैं, जिसे देखकर भयभीत होकर उन्होंने अपने नेत्रों को मूंद लिया। सती ने सहसा घोर अट्टहास किया, जिसके कारण उनके मुंह में लंबी-लम्बी दाढ़े दिखने लगी, जिसे सुनकर शिव जी अत्यंत हतप्रभ हो गए। कुछ समय पश्चात उन्होंने जब अपनी आंखों को खोला तो, सामने देवी का भीम आकृति युक्त भयानक रूप दिखाई दे रहा था, देवी वृद्धावस्था के समान वर्ण वाली हो गई थीं, उनके केश खुले हुए थे, जिह्वा मुख से बहार लपलपा रहीं थीं, उनकी चार भुजाएं थीं। उनके देह से प्रलयाग्नि के समान ज्वालाएँ निकल रही थीं, उनके रोम-रोम से स्वेद निकल रहा था, भयंकर डरावनी चीत्कार कर रहीं थीं तथा आभूषणों के रूप में केवल

मुंड-मालाएं धारण किये हुए थीं।उनके मस्तक पर अर्ध चन्द्र शोभित था, शरीर से करोड़ों प्रचंड आभाएँ निकल रहीं थीं, उन्होंने चमकता हुआ मुकुट धारण कर रखा था। इस प्रकार के घोर भीमाकार भयानक रूप में, अट्टहास करते हुए देवी, भगवान शिव के सम्मुख खड़ी हुई।

6-उन्हें इस प्रकार देख कर भगवान शंकर ने भयभीत हो भागने का मन बनाया, वे हतप्रभ हो इधर उधर दौड़ने लगे। सती देवी ने भयानक अट्टहास करते हुए, निरुद्देश्य भागते हुए भगवान शिव से कहा, ‘ आप मुझसे डरिये नहीं!’ परन्तु भगवान शिव डर के मारे इधर उधर भागते रहें। इस प्रकार भागते हुए अपने पति को देखकर, दसो दिशाओं में देवी अपने ही दस अवतारों में खड़ी हो गई। शिव जी जिस भी दिशा की ओर भागते, वे अपने एक अवतार में उनके सम्मुख खड़ी हो जाती। इस तरह भागते-भागते जब भगवान शिव को कोई स्थान नहीं मिला तो वे एक स्थान पर खड़े हो गए।

7-इसके पश्चात उन्होंने जब अपनी आंखें खोली तो अपने सामने मनोहर मुख वाली श्यामा देवी को देखा। उनका मुख कमल के समान खिला हुआ था, दोनों पयोधर स्थूल तथा आंखें भयंकर एवं कमल के समान थीं। उनके केश खुले हुए थे, देवी करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाशमान थीं, उनकी चार भुजाएं थीं, वे दक्षिण दिशा में सामने खड़ी थीं।

अत्यंत भयभीत हो भगवान शिव ने उन देवी से पुछा, “आप कौन हैं, मेरी प्रिय सती कहा हैं?”

सती ने शिव जी से कहा “आप मुझ सती को नहीं पहचान रहें है, ये सारे रूप जो आप देख रहे है; काली, तारा, त्रिपुरसुंदरी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, बगलामुखी, धूमावती, मातंगी एवं कमला, ये सब मेरे ही नाना नाम हैं।"

8-भगवान शिव द्वारा उन नाना देवियों का परिचय पूछने पर देवी ने कहा, “ये जो आप के सम्मुख भीमाकार देवी हैं इनका नाम ‘काली’ हैं, ऊपर की ओर जो श्याम-वर्ना देवी खड़ी हैं वह ‘तारा’ हैं, आपके दक्षिण में जो मस्तक-विहीन अति भयंकर देवी खड़ी हैं वह ‘छिन्नमस्ता’ हैं, आपके उत्तर में जो देवी खड़ी हैं वह ‘भुवनेश्वरी’ हैं, आपके पश्चिम दिशा में जो देवी खड़ी हैं वह शत्रु विनाशिनी ‘बगलामुखी’ देवी हैं, विधवा रूप में आपके आग्नेय कोण में ‘धूमावती’ देवी खड़ी हैं, आपके नैऋत्य कोण में देवी 'त्रिपुरसुंदरी' खड़ी हैं, आप के वायव्य कोण में जो देवी हैं वह 'मातंगी' हैं, आपके ईशान कोण में जो देवी खड़ी हैं वह ‘कमला’ हैं तथा आपके सामने भयंकर आकृति वाली जो मैं ‘भैरवी’ खड़ी हूँ। अतः आप इनमें किसी से भी न डरें। यह सभी देवियाँ महाविद्याओं की श्रेणी में आती हैं, इनके साधक या उपासक पुरुषों को चतुर्वर्ग (धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्षतथा मनोकामनाएँ पूर्ण करने वाली हैं। आज मैं अपने पिता का अभिमान चूर्ण करने हेतु जाना चाहती हूँ, यदि आप न जाना चाहें तो मुझे ही आज्ञा दें।"

9-भगवान शिव ने सती से कहा, “मैं अब आप को पूर्ण रूप से जान पाया हूँ, अतः पूर्व में प्रमाद या अज्ञान वश मैंने आपके विषय में जो भी कुछ अनुचित कहा हो, उसे क्षमा करें। आप आद्या परा विद्या हैं, सभी प्राणियों में आप व्याप्त हैं तथा स्वतंत्र परा-शक्ति हैं, आप का नियन्ता तथा निषेधक कौन हो सकता हैं? आप को रोक सकूँ मुझमें ऐसा सामर्थ्य नहीं हैं, इस विषय में आपको जो अनुचित लगे आप वही करें।”

10-इस प्रकार भगवान शिव के कहने पर देवी उनसे बोली, “हे महेश्वर! सभी प्रमथ गणो के साथ आप यही कैलाश में ठहरे, मैं अपने पिता के यहाँ जा रही हूँ।” शिव जी को यह कह वह ऊपर खड़ी हुई तारा अकस्मात् एक रूप हो गई तथा अन्य अवतार अंतर्ध्यान हो गए, देवी ने प्रमथों को रथ लाने का आदेश दिया। वायु वेग से सहस्रों सिंहों से जुती हुई मनोरम देवी-रथ, जिसमें नाना प्रकार के अलंकार तथा रत्न जुड़े हुए थे, प्रमथ प्रधान द्वारा लाया गया। वह भयंकर रूप वाली देवी उस विशाल रथ में बैठ कर आपने पितृ गृह को चली, नंदी उस रथ के सारथी थे। 11-यज्ञ का विध्वंसहोने के पश्चात बकरे के मस्तक से युक्त दक्ष ने भगवान शिव से क्षमा याचना की तथा नाना प्रकार से उनकी स्तुति की, अंततः उन्होंने शिव-तत्व को ससम्मान

स्वीकार किया।शिव अब पूर्ण रूप से तपस्वियों के पूर्ण अवतार थे। कुछ वर्ष बाद वे दिगम्बरों के समाज में पहुँचे। शिव वहाँ भिक्षाटन करते, पर दिगम्बरों की पत्नियाँ उनके प्रति आसक्त हो गयीं। अपनी पत्नियों का यह हाल देखकर दिगम्बर देवताओं ने शाप दिया - इस व्यक्ति का लिंगम् धरती पर गिर जाए! शिव लिंगम धरती पर गिर गया। प्रेम तत्काल नपुंसक हो गया - पर देवताओं ने यह नहीं चाहा था। उन्होंने शिव से प्रार्थना की कि वे लिंगम् को धारण करें। शिव ने कहा, ‘अगर नश्वर और अनश्वर मेरे लिंगम् की पूजा करना स्वीकार करें, तो मैं इसे धारण करूँगा अन्यथा नहीं!”

12-दोनों प्रजातियों ने ये स्वीकार नहीं किया, यद्यपि प्रजनन का वह एक मात्र माध्यम था, इसलिए वह वहीं बर्फ में पड़ा रहा और शिव ने दुख की अन्तिम श्रृंखला पार की और उस पार

चले गये।और तब धरती पर 3,600 वर्षों के लिए शान्ति और अत्याकुल युग का अवतरण हुआ - जोकि शायद इस युग तक चलता, अगर तारक नाम का आत्मसंयमी कट्टर राक्षस पैदा न हुआ होता। क्योंकि उसका आत्मनिषेध देवताओं के लिए खतरा बन गया। जरूरत थी दुनिया को पवित्र रखने की, दूसरे शब्दों में अपने लिए सुरक्षित रखने की।भविष्यवाणी यह

थी कि तारक का वध एक सात दिवसीय शिशु द्वारा किया जा सकता है, जो शिव और देवी के सम्मिलन से होगा, जो एक वन में जन्म लेगा और कार्तिकेय नाम से जाना जाएगा। कार्तिकेय अर्थात् युद्ध का देवता - वह ग्रह जो सब देशों को दिशा देता है।अब एक नई प्रेमकथा का प्रारम्भ होना था ! दस महाविद्या के तीन समूह और दो कुल;-

08 FACTS;-

1-दस महाविद्या की पूजा-अर्चना करने में चतुवर्ग अर्थात- धर्म, भोग, मोक्ष और अर्थ की प्राप्ति होती है। इन्हीं की कृपा से षटकर्णों की सिद्धि तथौ अभिष्टि की प्राप्ति होती है।साक्षात आदि शक्ति महामाया ही शिव की अर्धाग्ङिनी पार्वती एवं सती हैं और तामसी संहारक शक्ति होने के फल स्वरूप समय-समय पर भयंकर रूप धारण करती हैं। उनका भयंकर रूप, केवल दुष्टों हेतु ही भय उत्पन्न करने वाला तथा विनाशकारी हैं। देवी! सौम्य, सौम्य-उग्र तथा उग्र तीन रूपों में अवस्थित हैं तथा स्वभाव के अनुसार दो कुल में विभाजित हैं, काली कुल तथा श्री कुल।

2-अपने कार्य तथा गुण के अनुसार देवी अनेकों अवतारों में प्रकट हुई, ऐसा नहीं हैं कि इनके सभी रूप भयानक हैं; सौम्य स्वरूप में देवी कोमल स्वभाव वाली हैं, सौम्य-उग्र स्वरूप में देवी कोमल और उग्र (सामान्य) स्वभाव वाली हैं तथा उग्र रूप में देवी अत्यंत भयानक हैं। 2-1-पहला- सौम्य कोटि त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, मातंगी और कमला 2-2-दूसरा- उग्र कोटि काली, छिन्नमस्ता, धूमावती और बगलामुखी) 2-3-तीसरा- सौम्य-उग्र कोटि तारा और त्रिपुर भैरवी

3-कहीं-कहीं 24 विद्याओं का वर्णन भी आता है। परंतु मूलतः दस महाविद्या ही प्रचलन में है। इनके दो कुल हैं। कुछ ऋषियों ने इन्हें तीन रूपों में माना है। उग्र, सौम्य और सौम्य-उग्र। उग्र में काली, छिन्नमस्ता, धूमावती और बगलामुखी है। सौम्य में त्रिपुरसुंदरी, भुवनेश्वरी, मातंगी और महालक्ष्मी (कमला) है।

4-शक्ति के अपरम्पार रुप है। दस महाविद्या असल मे एक ही आदि शक्ति के अवतार है। वो क्रोध मे काली, सम्हारक क्रोध मे तारा आदि रुप धारण कर लेती है। दयाभाव मे प्रेम और पोषण मे वो भुवनेश्वरी, मतंगी और महालक्ष्मी का रुप धारण कर लेती है। शक्ति साधना में कुल दस महाविद्याओं की उपासना होती है। यह सब महाविद्या ज्ञान और शक्ति प्राप्त करने की कामना रखनेवाले उपासक करते है। ध्यान रहे, सिर्फ मंत्रजाप से कुछ नही होता साधक के कर्म भी शुद्ध होने जरुरी है

5-महा-देवियाँ, दस महाविद्या, योगिनियाँ, डाकिनियाँ, पिसाचनियाँ, भैरवी इत्यादि महामाया आदि शक्ति के नाना अवतार हैं। सभी केवल गुण एवं स्वभाव से भिन्न-भिन्न हैं। काली कुल की देवियाँ प्रायः घोर भयानक स्वरूप तथा उग्र स्वभाव वाली होती हैं तथा इन का सम्बन्ध काले या गहरे रंग से होता हैं; इसके विपरीत श्री कुल की देवियाँ सौम्य तथा कोमल स्वभाव की तथा लाल रंग या हलके रंग से सम्बंधित होती हैं। 6-इनकी साधना 2 कुलों के रूप में की जाती है। श्री कुल और काली कुल। इन दोनों में नौ- नौ देवियों का वर्णन है। इस प्रकार ये 18 हो जाती है। चार साधाना काली कुल की है और छः साधाना श्री कुल की होती है। 7-काली कुल की देवियों में महाकाली, तारा, छिन्नमस्ता, भुवनेश्वरी हैं, जो स्वभाव से उग्र हैं। (परन्तु, इनका स्वभाव दुष्टों के लिये ही भयानक हैं) श्री कुल की देवियों में महा-त्रिपुरसुंदरी, त्रिपुर-भैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला हैं, देवी धूमावती को छोड़ कर सभी सुन्दर रूप तथा यौवन से संपन्न हैं। काली तारा महाविद्या षोडशी भुवनेश्वरी। भैरवी छिन्नमस्ता च विद्या धूमावती तथा। बगला सिद्धविद्या च मातंगी कमलात्मिका। एता दश महाविद्या: सिद्धविद्या: प्राकृर्तिता। एषा विद्या प्रकथिता सर्वतन्त्रेषु गोपिता।।

"काल (मृत्यु) का भी भक्षण करने में समर्थ, घोर भयानक स्वरूप वाली प्रथम महा-शक्ति महा-काली, साक्षात योगमाया भगवान विष्णु के अन्तः करण की शक्ति"हैं।

8-क्रम से इनका विवरण :-

1. काली 2. तारा 3. त्रिपुरसुंदरी 4. भुवनेश्वरी 5. त्रिपुर भैरवी 6. धूमावती 7. छिन्नमस्ता 8. बगला 9. मातंगी 10. कमला....इस प्रकार, मिलकर दस महाविद्या समूह का निर्माण करती हैं, इनमें से प्रत्येक देवियाँ भिन्न-भिन्न प्रकार की शक्तियों तथा ज्ञान से परिपूर्ण हैं, शक्तियों की अधिष्ठात्री हैं।

दस महाविद्या की साधना उपासना;-

1-महाविद्या साधना करने के लिए किसी व्यक्ति का ब्रह्मण होना अनिवार्य नही। महाविद्या की साधना कोई भी कर सकता है। इसमे जाति, वर्ग, लिंग आदि का कोई भेद नही है और सभी प्रकार के बन्धन से मुक्त है। सभी महाविद्या मे भैरव की उपासना भी कर लेनी चाहिए। क्योकि यह महाविद्याए है तो इनकी क्रिया भी थोडी सी जटिल तो होगी ही इसलिए इनकी साधना शुरु करने से पहले आपको पंच शुद्धियों करनी ही चाहिए है।

1-1.स्थान शुद्धि:-

पूजन स्थान का शोधन भी करना चाहिए है।जहा पर साधना के लिये बैठते है उस जगह को शुद्ध कर लिजिये.पहले जमाने मे लोग गौमाता के गोबर से एवम गौमूत्र से सम्पूर्ण जगह को शुद्ध करते थे। आज मॉडर्न लाईफ स्टाईल मे कम से कम धुला हुआ आसन ले लिजिये। मंगलमय वातावरण के लिये अगरबत्ती जलाइये।

1-2.देह शुद्धि:-

देह का शोधन करने हेतु आसन पर आसीन होकर प्राणायाम तथा भूत शुद्धि की क्रिया से अपने शरीर का शोधन करना चाहिए।पहले स्वयं की देह को शोधन किया जाता है।सात्विक भोजन का सेवन करे, ब्रम्हचर्य का पालन करे। साधना मे बैठने से पहले नहा कर, शौचादि शारीरिक क्रिया से निवृत्त हो जाये। बद्ध कोष्ठता गेसेस आदि की समस्या साधना मे भयंकर बाधा पैदा कर आपके लिये समस्या पैदा कर सकती है। शरीर जब व्याधी ग्रस्त हो, मतलब जुकाम ,बुखार इत्यादि ...तब साधना ना करे। प्राणायाम, योग इत्यादि के प्रयोग से देह शुद्धि मे मदद मिलती है ।

1-3.द्रव्य शुद्धि:-

द्रव्य शुद्धि के दो अर्थ है. पाप से कमाया गया धन इसमे इस्तेमाल ना करे। दूसरा, साधना के लिये जिन साधनोंका इस्तेमाल करे उनका स्वच्छ एवम पर्याप्त होना जरूरी है। पर्याप्त मतलब, टूटा प्याला, फटी चादर, टूटा फ्रेम, फटे नोट, टूटा फर्निचर ....इनका प्रयोग ना करे।

1-4.देव शुद्धि:-

02 POINTS;-

1-ईष्ट देवता की शरीर मे प्रतिष्ठा कर नाना प्रकार के न्यास इत्यादि कर अपने शरीर को देव-भाव से अभिभूत कर अपने ईष्ट देवता का अन्तर्यजन करता है। शास्त्रो मे इसलिए कहा जाता है कि 'देवम्‌ भूत्वा देवम्‌ यजेत' अर्थात्‌ देवता बनकर ही देवता कर ही किया जाता है। ईष्ट देवता बहिर्याग पूजन का मतलब यह है कि अन्दर तो देवता स्थापित है ही परंतु उसको बाहर लाकर बाहर भी पूजा करी जाती है। जैसे यंत्र आदि मे स्थापित देवता की पूजा करना।

2-सिर्फ साधना के ही नही, घर की दूसरी मूर्तिया और तस्वीरोंको भी साफ कर ले ।आह्वान कर मंत्र द्वारा संस्कार करना चाहिए इसके पश्चात पंचोपचार, षोडषोपचार अथवा चौसठ उपचारों के द्वारा महाविद्या यंत्र में स्थित देवताओं का पूजन कर, उसमें स्थापित देवता की ही अनुमति प्राप्त कर पूजन करना चाहिए। फिर अंतिम समय मे तर्पण करके, हवन वेदी को देवता मानकर अग्नि रूप में पूजन कर विभिन्न प्रकार के बल्कि द्रव्यों को भेंट कर उसे पूर्ण रूप से संतुष्ट करता है। इसके बाद देवता की आरती कर पुष्पांजलि प्रदान करता है।

1-5.मंत्र शुद्धि: -

03 POINTS;-

1-किसी भी महाविद्या मे न्यास और कुछ मुद्राओ का ज्ञान और चैतन्य यंत्र और माला की अवश्यकता रहती है। किसी ऋर्षि ने मंत्र को कहा, बीज, शक्ति, कीलकं, देवता आदि पूजन क्यो किया जा रहा है ..वो कारण भी पता होना चाहिए।

2-किसी योग्य गुरु से दीक्षा ग्रहण करनी चाहिए। दीक्षा शब्द का अर्थ मात्र यही होता है कि “एक व्यक्ति ने सिखाया और दूसरे ने सही से सीख लिया” हो तो इसे दीक्षा कह जाता है। एक दिन मे ना जाने कितनी दीक्षाए हम सब के बीच मे समप्न्न होती रहती है।दीक्षा भी ठीक ऐसे

ही होती है जैसे किसी ने, अपनी मेहनत से कमाई सम्पति को किसी दूसरे व्यक्ति के नाम कर दिया। अब यह बात अलग है कि कितने प्रतिशत।

3-गुरु दीक्षा के दौरान सभी क्रिया को समझाते है। यह किसी भी माध्यम से किया जा सकता है। किसी भी साधना की मुद्राएँ न्यास, यंत्र पुजन, माला पूजन , प्राण प्रतिष्ठा, पंचोपचार आदि की जानकारी गुरु करवाते है।साथ ही वो विधि प्रदान करते है जिससे साधना होगी और आवश्यकता होने पर यंत्र, माला भी आदि प्रदान करते है।

NOTE;-

1-पंचोपचार, षोडषोपचार अथवा चौसठ उपचारों के द्वारा महाविद्या यंत्र में स्थित देवताओं का पूजन करे. उसमें स्थापित देवताओं की अनुमति प्राप्त कर पूजन कीजिये। तर्पण, हवन कर वेदी को ही देवता मानकर अग्नि रूप में पूजन करे. द्रव्यों को भेंट कर उसे संपूर्ण संतुष्ट करे।फिर देवता की आरती कर पुष्प अर्पण करे।

2-कवच-सहस्रनामं स्त्रोत्र का पाठ करके स्वयं को शक्ति के चरणों में समर्पित करे।पश्चात, देवता के विसर्जन की भावना कर ;देवता को स्वयं के हृदयकमल में प्रतिष्ठित कर लेते है और शेष सामग्रीयो को नदी , तालाब, समुंदर मे समर्पित करने के लिये कहा गया है। लेकिन धरती मा और पर्यावरण का ध्यान रखते हुये सामग्री के उपर जल का छिड्काव करके प्रतिमात्मक विसर्जन की भावना रखकर देवताओं से माफी मांगते हुये कहीं भी निकास करे।

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पहलीदस महाविद्या माँ काली ;-

07 FACTS;-

1-मंत्र

!! ॐ क्रीं क्रीं क्रीं दक्षिणे कालिके क्रीं क्रीं क्रीं स्वाहा !!

2-माँ काली स्तुति

रक्ताsब्धिपोतारूणपद्मसंस्थां पाशांकुशेष्वासशराsसिबाणान्।शूलं कपालं दधतीं कराsब्जै रक्तां त्रिनेत्रां प्रणमामि देवीम् ॥

3-काली कुल की सर्वोच्च दैवीय शक्ति महा-काली, कर्म-फल प्रदाता, अभय प्रदान करने वाली महा-शक्ति है महा-काली। अपने भैरव महा-काल की छाती पर प्रत्यालीढ़ मुद्रा में खड़ी, घनघोर-रूपा महाशक्ति, महा काली के नाम से विख्यात हैं। वास्तव में देवी महा-काली साक्षात महा-माया आदि शक्ति ही हैं; ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति से पूर्व सर्वत्र अंधकार ही अंधकार से उत्पन्न शक्ति! आद्या शक्ति या आदि शक्ति काली नाम से विख्यात हैं।

4-अंधकार से जन्म होने के कारण देवी, काले वर्ण वाली तथा तामसी गुण सम्पन्न हैं। इन्हीं की इच्छा शक्ति ने ही इस संपूर्ण चराचर जगत उत्पन्न किया हैं तथा समस्त शक्तियां प्रत्यक्ष तथा परोक्ष रूप से इन्हीं की नाना शक्तियां हैं। देवताओं द्वारा प्रताड़ित हो सहायतार्थ महामाया की स्तुति करने पर साक्षात आदि शक्ति ही पार्वती के शरीर से कौशिकी रूप में प्रकट हुई थीं। 5-प्रलय काल में देवी स्वयं मृत्यु के देवता महा-काल का भी भक्षण करने में समर्थ हैं; देखने में महा-शक्ति महाकाली अत्यंत भयानक एवं डरावनी हैं, असुर जो स्वभाव से ही दुष्ट थे, उनके रक्त से युक्त हाल ही में कटे हुए मस्तकों की माला देवी धारण करती हैं। इनकी दंत-पंक्ति अत्यंत विकराल हैं, मुंह से निकली हुई जिह्वा को देवी ने अपने भयानक दन्त पंक्ति से दबा रखा हैं; अपने भैरव या स्वामी के छाती में देवी वस्त्रहीन अवस्था में खड़ी हैं, कुछ-एक रूपों में देवी, दैत्यों के कटे हुए हाथों की करधनी धारण करती हैं।

6-देवी महा-काली चार भुजाओं से युक्त हैं। अपने दोनों बाएँ हाथों में खड़ग तथा दुष्ट दैत्य का हाल ही कटा हुआ सिर धारण करती हैं, जिससे रक्त की धार बह रहीं हो तथा बाएँ भुजाओं से सज्जनों को अभय तथा आशीर्वाद प्रदान करती हैं। इनके बिखरे हुए लम्बे काले केश हैं, जो अत्यंत भयानक प्रतीत होते हैं, जैसे कोई भयानक आँधी के काले विकराल बादल समूह हो। देवी तीन नेत्रों से युक्त हैं तथा बालक शव को देवी ने कुंडल रूप में अपने कान में धारण कर रखा हैं। देवी रक्त प्रिया तथा महा-श्मशान में वास करने वाली हैं, देवी ने ऐसा भयंकर रूप रक्तबीज के वध हेतु धारण किया था। 7-भगवान विष्णु जो इस चराचर जगत के पालन कर्ता एवं सत्व गुण सम्पन्न हैं, उनके अन्तः कारण की संहारक शक्ति साक्षात् महा-काली ही हैं; जो नाना उपद्रवों में उनकी सहायता कर दैत्यों-राक्षसों का वध करती हैं। प्रकारांतर से देवी के दो भेद हैं एक दक्षिणा काली तथा द्वितीय महा-काली। देवी का नाम 'काली' पड़ने का कारण;-

03 FACTS;- 1-कालिका पुराण के अनुसार, सभी देवता एक बार हिमालय में मतंग मुनि के आश्रम में गए और आद्या शक्ति या महामाया की स्तुति करने लगे। सभी देवताओं द्वारा की गई वंदना तथा स्तुति से देवी अत्यंत प्रसन्न हुई तथा एक काले रंग की विशाल पहाड़ जैसी स्वरूप वाली दिव्य स्त्री देखते ही देखते सभी देवताओं के सन्मुख प्रकट हुई। वह स्त्री देखने में अमावस्या के अंधकार जैसी थी, इस कारण उस शक्ति का नाम 'काली' पड़ा। 2-वास्तव में देवी, शिव पत्नी पार्वती के देह से उत्पन्न हुई थीं, जिनका पूर्व में सर्वप्रथम घोर अन्धकार से उत्पत्ति होने के कारण आद्या काली नाम पड़ा था।मार्गशीर्ष मास की कृष्ण अष्टमी कालाष्टमी कहलाती हैं, इस दिन सामान्यतः महा-काली की पूजा, आराधना की जाती हैं या कहे तो पौराणिक काली की आराधना होती हैं, जो दुर्गा जी के नाना रूपों में से एक हैं। परन्तु तांत्रिक मतानुसार, दक्षिणा काली या आद्या काली की साधना कार्तिक अमावस्या या दीपावली के दिन होती हैं।

3-शक्ति तथा शैव समुदाय इस दिन आद्या शक्ति काली के भिन्न-भिन्न स्वरूपों की आराधना करता हैं। जबकि वैष्णव समुदाय का अनुसरण करने वाले इस दिन, धन-दात्री महा लक्ष्मी की आराधना करते हैं। देवी काली के प्रादुर्भाव से सम्बंधित कथा ;- 10 FACTS;- 1-कालिका पुराण के अनुसार, देवी काली के दो स्वरूप हैं, प्रथम 'आद्या शक्ति काली' तथा द्वितीय केवल पौराणिक 'काली या महा-काली'।दक्षिणा काली जो साक्षात् आद्या शक्ति ही हैं, अजन्मा तथा सर्वप्रथम शक्ति हैं, जिनसे पूर्व में इस चराचर जगत की उत्पत्ति हुई थी, देवी ही चराचर जगत की स्वामिनी हैं। 2-द्वितीय 'देवी दुर्गा या शिव पत्नी सती, पार्वती' से सम्बंधित हैं तथा देवी के भिन्न-भिन्न अवतारों में से एक हैं, यह वही हैं, जिनका प्रादुर्भाव मतंग मुनि के आश्रम में देवताओं द्वारा स्तुति करने पर अम्बिका के ललाट से हुआ था तथा जो तमोगुण की स्वामिनी हैं। परन्तु, वास्तविक रूप से देखा जाये तो दोनों शक्तियाँ एक ही हैं। 3-दुर्गा सप्तशती (मार्कण्डये पुराण के अंतर्गत एक भाग, आद्या शक्ति के विभिन्न अवतारों की शौर्य गाथा से सम्बंधित पौराणिक पाठ्य पुस्तक), के अनुसार एक समय समस्त त्रि-भुवन (स्वर्ग, पाताल तथा पृथ्वी) शुम्भ और निशुम्भ नामक दो दैत्य भाइयों के अत्याचार से त्रस्त थे। दोनों समस्त देवताओं के अधिकारों को छीनकर, स्वयं ही भोग करते थे। देवता स्वर्गहीन होकर भटकने वाले हो गए थे। समस्या के समाधान हेतु, सभी देवता एकत्र हो हिमालय में गए और देवी आद्या-शक्ति, की स्तुति, वंदना करने लगे।

4-परिणामस्वरूप, 'कौशिकी' नाम की एक दिव्य नारी शक्ति जो कि भगवान शिव की पत्नी 'गौरी या पार्वती' में समाई हुई थी, लुप्त थी, समस्त देवताओं के सन्मुख प्रकट हुई। शिव अर्धाग्ङिनी के देह से विभक्त हो, उदित होने वाली वह शक्ति घोर काले वर्ण की थी तथा काली नाम से विख्यात हुई। 5-पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी दुर्गा (जिन्होंने दुर्गमासुर दैत्य का वध किया था), ने शुम्भ और निशुम्भ नाम के दो महा राक्षसों को युद्ध में परास्त किया तथा तीनों लोकों को उन दोनों भाइयों के अत्याचार से मुक्त कराया। चण्ड और मुंड नामक दैत्यों ने जब देवी दुर्गा से युद्ध करने का आवाहन किया, देवी उन दोनों से युद्ध करने हेतु उद्धत हुई। आक्रमण करते हुए देवी, क्रोध के वशीभूत हो अत्यंत उग्र तथा भयंकर डरावनी हो गई, उस समय उनकी सहायता हेतु उन्हीं के मस्तक से एक काले वर्ण वाली शक्ति का प्राकट्य हुआ, जो देखने में अत्यंत ही भयानक, घनघोर तथा डरावनी थी।

6-वह काले वर्ण वाली देवी, 'महा-काली' ही थी, जिन का प्राकट्य देवी दुर्गा की युद्ध भूमि में सहायता हेतु हुई थी। चण्ड और मुंड के संग हजारों संख्या में वीर दैत्य, देवी दुर्गा तथा उनके सहचरियों से युद्ध कर रहे थे, उन महा-वीर दैत्यों में 'रक्तबीज' नाम के एक राक्षस ने भी भाग लिया था। युद्ध भूमि पर देवी ने रक्तबीज दैत्य पर अपने समस्त अस्त्र-शस्त्रों से आक्रमण किया, जिससे कारण उस दैत्य रक्तबीज के शरीर से रक्त का स्राव होने लगा। परन्तु, दैत्य के रक्त की टपकते हुए प्रत्येक बूंद से, युद्ध स्थल में उसी के सामान पराक्रमी तथा वीर दैत्य उत्पन्न होने लगे तथा वह और भी अधिक पराक्रमी तथा शक्तिशाली होने लगा।

7-देवी दुर्गा की सहायतार्थ, देवी काली ने दैत्य रक्तबीज के प्रत्येक टपकते हुए रक्त बूंद को, जिह्वा लम्बी कर अपने मुंह पर लेना शुरू किया। परिणामस्वरूप, युद्ध क्षेत्र में दैत्य रक्तबीज शक्तिहीन होने लगा, अब उसके सहायता हेतु और किसी दैत्य का प्राकट्य नहीं हो रहा था, अंततः रक्तबीज सहित चण्ड और मुंड का वध कर देवी काली तथा दुर्गा ने तीनों लोकों को भय मुक्त किया।

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