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JAI JAGDAMBA


ॐ या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरुपेण संस्थिता नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नम:

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरुपेण संस्थिता नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नम:

या देवी सर्वभूतेषु भक्तिरुपेण संस्थिता नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नम:

या देवी सर्वभूतेषु मातृरुपेण संस्थिता नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नम:

या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरुपेण संस्थिता नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नम:

या देवी सर्वभूतेषु दयारुपेण संस्थिता नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नम:

या देवी सर्वभूतेषु तृष्णारुपेण संस्थिता नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नम:

या देवी सर्वभूतेषु निद्रारुपेण संस्थिता नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नम:

या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धारुपेण संस्थिता नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नम:

या देवी सर्वभूतेषु वृतिरुपेण संस्थिता नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नम:

या देवी सर्वभूतेषु स्मृतिरुपेण संस्थिता नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नम:

या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरुपेण संस्थिता नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नम:ll

माँ आदिशक्ती जगत जननी जगदम्बा ....

जिसको सूर्य, चन्द्र और तारागण भी प्रकाशित नहीं कर सकते, विद्युत् की रोशनी भी नहीं, फिर अग्नि तो है ही क्या ? ये सब तो उसी के तेज से

प्रकाशमान हैं|जिस माँ के प्रकाश से समस्त नक्षत्रमंडल और ब्रह्मांड रोशन हैं, उस माँ की महिमा के बारे में लिखना सूर्य को दीपक दिखाने का प्रयास मात्र सा है, जिसके लिए माँ से क्षमा याचना करते है|

सृष्टि कि रचना के पीछे जो आद्यशक्ति है,जिनकी देह से समस्त सृष्टि प्रकाशित है, जो स्वयं अदृश्य रहकर अपने लीला विलास से समस्त सृष्टि का संचालन करती हैं, समस्त अस्तित्व जो कभी था, है, और आगे भी होगा वह शक्ति माँ काली है| सृष्टि, स्थिति और संहार उसकी अभिव्यक्ति मात्र है| यह संहार नकारात्मक नहीं है, यह वैसे ही है जैसे एक बीज स्वयं अपना अस्तित्व खोकर एक वृक्ष को जन्म देता है|

सृष्टि में कुछ भी नष्ट नहीं होता है, मात्र रूपांतरित होता है| यह रूपांतरण ही माँ का विवेक, सौन्दर्य और करुणा है| माँ प्रेम और करुणामयी है|

माँ के वास्तविक सौन्दर्य को तो गहन ध्यान में तुरीय चेतना में ही अनुभूत किया जा सकता है| उसकी साधना जिस साकार विग्रह रूप में की जाती है वह प्रतीकात्मक ही है|

माँ के विग्रह में चार हाथ है| अपने दो दायें हाथों में से एक से माँ सृष्टि का निर्माण कर रही है और एक से अपने भक्तों को आशीर्वाद दे रही है| माँ के दो बाएं हाथों में से एक में कटार है, और एक में कटा हुआ नरमुंड है जो संहार और स्थिति के प्रतीक है| ये प्रकृति के द्वंद्व और द्वैत का बोध कराते हैं| माँ के गले में पचास नरमुंडों कि माला है जो वर्णमाला के पचास अक्षर हैं| यह उनके ज्ञान और विवेक के प्रतीक हैं| माँ के लहराते हुए काले बाल माया के प्रतीक हैं| माँ के विग्रह में उनकी देह का रंग काला है क्योंकि यह प्रकाशहीन प्रकाश और अन्धकारविहीन अन्धकार का प्रतीक हैं, जो उनका स्वाभाविक काला रंग है| किसी भी रंग का ना होना काला होना है जिसमें कोई विविधता नहीं है| माँ की दिगंबरता दशों दिशाओं और अनंतता की प्रतीक है|

उनकी कमर में मनुष्य के हाथ बंधे हुए हैं वे मनुष्य कि अंतहीन वासनाओं और अंतहीन जन्मों के प्रतीक हैं| माँ के तीन आँखें हैं जो सूर्य चन्द्र और अग्नि यानि भूत भविष्य और वर्तमान की प्रतीक हैं| माँ के स्तन समस्त सृष्टि का पालन करते हैं| उनकी लाल जिव्हा रजोगुण की प्रतीक है जो सफ़ेद दाँतों यानि सतोगुण से नियंत्रित हैं| उनकी लीला में एक पैर भगवन शिव के वक्षस्थल को छू रहा है जो दिखाता है कि माँ अपने प्रकृति रूप में स्वतंत्र है पर शिव यानि पुरुष को छूते ही नियंत्रित हो जाती है| माँ का रूप डरावना है क्योंकि वह किसी भी बुराई से समझौता नहीं करती, पर उसकी हँसी करुणा की प्रतीक है|

माँ इतनी करुणामयी है कि उसके प्रेमसिन्धु में हमारी हिमालय सी भूलें भी कंकड़ पत्थर से अधिक नहीं है|माँ कि यह करुणा और अनुकम्पा सब पर बनी रहे|हमारी माता से यही प्रार्थना है कि हम सब पर माँ की कृपा सदा बनी रहे....

..SHIVOHAM....