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पंच कैलाश यात्रा का क्या महत्व है?PART 01


पंच कैलाश का महत्व (PANCH KAILASH);- 02 FACTS;- 1-मनुष्य के जीवन में पंच कैलाश दर्शन का बहुत बड़ा महत्व है...पूर्ण रूप से महादेव शिव का निवास स्थान 'कैलाश पर्वत' जो तिब्बत में स्थित है को ही माना जाता है | तथा इसके साथ ही महादेव शिव के प्रमुख चार निवास और भी है जिन्हे उप कैलाश भी कहा जाता है 1-1-कैलाश मानसरोवर MOUNT KAILASH AND MANSAROVAR (TIBET - CHINA) 1-2- श्रीखंड SHRIKHAND MAHADEV (HIMACHAL PRADESH) 1-3-किन्नर कैलाश KINNER KAILASH (HIMACHAL PRADESH) 1-4-मणिमहेश, MANIMAHESH KAILASH (HIMACHAL PRADESH) 1-5-ओम पर्वत ADI KAILASH - OM PARBAT (UTTRAKHAND) 2-पंच कैलाश- आदि कैलाश, , कैलाश मानसरोवर, मणिमहेश, श्रीखंड, किन्नर कैलाश.... इन सबकी यात्रा करने से धार्मिक यात्रा पूर्ण मानी जाती है। जिनमे 'श्रीखंड कैलाश' हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में, 'मणिमहेश कैलाश' हिमाचल प्रदेश के चम्बा में, 'किन्नौर कैलाश' हिमाचल के किन्नौर में, तथा 'आदि कैलाश' उत्तराखंड में तिब्बत व् नेपाल की सीमा पर जोंगलीकोंग में विराजमान है | इन पांचो कैलाशों को एक रूप में पंचकैलाश' भी कहते है | 1-कैलाश मानसरोवर;- 10 FACTS;- 1-भगवान शंकर के निवास स्थान कैलाश पर्वत के पास स्थित है कैलाश मानसरोवर। यह अद्भुत स्थान रहस्यों से भरा है। शिवपुराण, स्कंद पुराण, मत्स्य पुराण आदि में कैलाश खंड नाम से अलग ही अध्याय है, जहां की महिमा का गुणगान किया गया है।कैलाश मानसरोवर को शिव-पार्वती का घर माना जाता है। सदियों से देवता, दानव, योगी, मुनि और सिद्ध महात्मा यहां तपस्या करते आए हैं। 2- मान्यता के अनुसार, जो व्यक्ति मानसरोवर (झील) की धरती को छू लेता है, वह ब्रह्मा के बनाये स्वर्ग में पहुंच जाता है और जो व्यक्ति झील का पानी पी लेता है, उसे भगवान शिव के बनाये स्वर्ग में जाने का अधिकार मिल जाता है। 3-पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इसी के पास कुबेर की नगरी है। यहीं से महाविष्णु के कर-कमलों से निकलकर गंगा कैलाश पर्वत की चोटी पर गिरती है, जहां प्रभु शिव उन्हें अपनी जटाओं में भर धरती में निर्मल धारा के रूप में प्रवाहित करते हैं। कैलाश पर्वत के ऊपर स्वर्ग और नीचे मृत्यलोक है। 4-शिव को पहाड़ों का योगेश्वर यानी गिरीश कहा जाता है। और जब तक वे काशी यानी अविमुक्त क्षेत्र नहीं चले गए, कैलाश में निवास करने वाला उनका विलक्षण परिवार पहाड़ों को आनंदित बनाए रखता था, जिसमें उनकी पहाड़ों की पुत्री उनकी संगिनी पार्वती, उनका पुत्र कार्तिकेय और उनके कई परिचित नंदी (बैल) से लेकर सांप-बिच्छु और भूत-पिशाच तक शामिल थे। 5-मानसरोवर झील पांच पवित्र झीलों या पंच सरोवर में से एक है। इस पंच सरोवर में, मानसरोवर, बिंदु, पंपा, नारायण और पुष्कर झीलें शामिल हैं। महाभारत में कैलाश को पर्वतों का राजा, तपस्वियों के आश्रय का शाश्वत स्वर्ण कमल और जीवन अमृत देने वाली नदियों का स्त्रोत कहा गया है। महाभारत में इस पर्वत के विषय में जो कुछ वर्णित है, वह प्रतीकात्मक रूप से सत्य है। कैलाश पर्वत जहां स्थित है, वहीं से पूरे गंगा के पूरे भारतीय मैदानों में नदीक्रम फूटता है। सिंधु, सतलज, ब्रह्मपुत्र और घाघरा, इन चारों नदियों का स्त्रोत हिम आवरण में लिपटा यही पवित्र स्थान है। 6-कैलाश पर्वत का तिब्बती नाम गंग रिन पो चे है, इसका अर्थ उत्कृष्ट मणि या श्रेष्ट रत्न होता है। कैलाश पर्वत का यह तिब्बती नाम इस पर्वत से जुड़ी भावनाओं और मान्यताओं को परिभाषित करता है। यह पर्वत बॉन पो द्वारा बौद्ध धर्म के पहले स्थापित तिब्बती धर्म बॉन पो के अनुयायियों का भी पवित्र तीर्थ रहा है। बॉन पो के अनुयायी ज़ांग जुंग मेरी नाम के देवता की उपासना करते रहे हैं।बौद्ध धर्म के अनुयायियों का मानना है कि बुद्ध (अनवतप्त) ने इस इलाके की कई बार यात्रा की और यहां तप किया। 7-कैलाश पर्वत के नजदीक ही इस इलाके में मीठे पानी की एकमात्र झील मानसरोवर ही है, जिसमें पर्वत के ग्लेशियर से निरंतर जलापूर्ति होती है। 15,060 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस झील की परिधि 410 किलोमीटर है। यह एक अन्य झील राक्षस ताल से जुड़ी हुई है जो कि खारे पाने की झील है। मान्यता है कि राक्षस राज रावण ने इसी स्थान पर भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी। इस झील में को जलीय जीव-जंतु नहीं हैं और स्थानीय लोग इसके पानी को विषाक्त मानते हैं। 8-कैलाश मानसरोवर तीर्थ यात्रा का मूल क्रम पर्वत की एक दिन में परिक्रमा करना होता है। यह एक दुश्कर कृत्य होता है क्योंकि ऊंचाई वाले इलाके में दुर्गम पथ वाली यह परिक्रमा 52 किलोमीटर की होती है। कुछ स्थानीय श्रद्धालु तो इस परिक्रमा को साष्टांग करते हुए पूरी करते हैं, लेकिन ज्यादातर लोगों के लिए यह दो दिनों की एक कठिन यात्रा है जिसके बौद्ध, हिंदू और जैन धर्म में अलग-अलग अर्थ हैं। बौद्ध और हिंदू परंपरा में कैलाश को मेरू पहाड़ के रूप में पहचाना जाता है, एक मिथकीय पहाड़ जो पृथ्वी का केंद्र है और ईश्वर और दानव जिस दूधिया या क्षीर सागर का मंथन करते थे। 9-हिंदू तीर्थयात्रियों के लिए यह इलाका आज भी शिव और उनके आनंदित परिवार का है। उसके नजदीक के पहाड़ उनके परिवार के सदस्यों के नाम पर रखे गए हैं: पार्वती, स्कंद, गणेश और शिव की सवारी और रक्षक पवित्र बैल नंदी। ऐसा कहा जाता है कि कैलाश शिवलिंग की रोशनी का भौतिक स्वरूप है जो पृथ्वी के आवरण में समय की शुरूआत तक जाता है। 10-कैलाश पर्वतमाला कश्मीर से लेकर भूटान तक फैली हुई है और ल्हा चू और झोंग चू के बीच कैलाश पर्वत है जिसके उत्तरी शिखर का नाम कैलाश है। इस शिखर की आकृति विराट् शिवलिंग की तरह है। पर्वतों से बने षोडशदल कमल के मध्य यह स्थित है। यह सदैव बर्फ से आच्छादित रहता है। इसकी परिक्रमा का महत्व कहा गया है। तिब्बती (लामा) लोग कैलाश मानसरोवर की तीन अथवा तेरह परिक्रमा का महत्व मानते हैं और अनेक यात्री दंड प्रणिपात करने से एक जन्म का, दस परिक्रमा करने से एक कल्प का पाप नष्ट हो जाता है। जो 108 परिक्रमा पूरी करते हैं उन्हें जन्म-मरण से मुक्ति मिल जाती है। 11-कैलाश शिव का घर कहा गया है। वहॉ बर्फ ही बर्फ में भोले नाथ शंभू अंजान (ब्रह्म) तप में लीन शालीनता से, शांत ,निष्चल ,अघोर धारण किये हुऐ एकांत तप में लीन है। शिव एक आकार है जो इस संपदा व प्रकृति के व हर जीव के आत्मा स्वरूपी ब्रह्म है क्यों की हम अभी तक यही ही जानते है। शिव का अघोर रूप वैराग व गृहस्थ का संभव संपूर्ण मेल है जिसे शिव व शक्ति कहते है ।कैलास पर्वत भगवान शिव एवं भगवान आदिनाथ के कारण ही संसार के सबसे पावन स्थानों में है । 12-मान्यता है कि यह पर्वत स्वयंभू है। कैलाश-मानसरोवर उतना ही प्राचीन है, जितनी प्राचीन हमारी सृष्टि है। इस अलौकिक जगह पर प्रकाश तरंगों और ध्वनि तरंगों का समागम होता है, जो ‘ॐ’ की प्रतिध्वनि करता है। इस पावन स्थल को भारतीय दर्शन के हृदय की उपमा दी जाती है, जिसमें भारतीय सभ्यता की झलक प्रतिबिंबित होती है। कैलाश पर्वत की तलछटी में कल्पवृक्ष लगा हुआ है। कैलाश पर्वत के दक्षिण भाग को नीलम, पूर्व भाग को क्रिस्टल, पश्चिम को रूबी और उत्तर को स्वर्ण रूप में माना जाता है। 13-कैलाश पर्वत का महत्व इसकी ऊंचाई की वजह से नहीं, बल्कि इसके विशेष आकार की वजह से है। माना जाता है कि कैलाश पर्वत आकार चौमुखी दिशा बताने वाले कम्पास की तरह है। कैलाश पर्वत को धरती का केंद्र मानने की कई वजह है। माना जाता है कि कैलाश पर्वत में पृथ्वी का भौगोलिक केंद्र है ।दूसरा, यहां आसमान और धरती का मिलन होता है। तीसरा, यहां चारों दिशाओं का केंद्र बिंदु है।चौथा, ईश्वर और उनकी बनाई सृष्टि के बीच संवाद का केंद्र बिंदु होना है। कैलाश-मानसरोवर यात्रा;- 1-यह पर्वत कुल मिलाकर 48 किलोमीटर में फैला हुआ है। कैलाश मानसरोवर की यात्रा अत्यधिक कठिन यात्राएं में से एक यात्रा मानी जाती है। इस यात्रा का सबसे अधिक कठिन मार्ग भारत के पडोसी देश चीन से होकर जाता है। यहां की यात्रा के विषय में यह कहा जाता है, कि इस यात्रा पर वही लोग जाते हैं, जिसे भगवान भोलेनाथ स्वयं बुलाते हैं। कैलाश मानसरोवर यात्रा की अवधि 28 दिन की होती है। कैलाश-मानसरोवर जाने के अनेक मार्ग हैं किंतु Uttarakhand के पिथौरागढ़ जिले के अस्कोट,धारचूला, खेत, गर्ब्यांग,कालापानी, लिपूलेख, खिंड, तकलाकोट होकर जानेवाला मार्ग अपेक्षाकृत सुगम है। 2-यह भाग 544 किमी (338 मील) लंबा है और इसमें अनेक चढ़ाव उतार है। जाते समय सरलकोट तक 70 किमी (44 मील) की चढ़ाई है, उसके आगे 74 किमी (46 मील) उतराई है। मार्ग में अनेक धर्मशाला और आश्रम है जहाँ यात्रियों को ठहरने की सुविधा प्राप्त है। गर्विअंग में आगे की यात्रा के निमित्त याक, खच्चर, कुली आदि मिलते हैं। तकलाकोट तिब्बत स्थित पहला ग्राम है जहाँ प्रति वर्ष ज्येष्ठ से कार्तिक तक बड़ा बाजार लगता है। तकलाकोट से तारचेन जाने के मार्ग में मानसरोवर पड़ता है। 2-कैलाश की परिक्रमा तारचेन से आरंभ होकर वहीं समाप्त होती है। तकलाकोट से 40 किमी (25 मील) पर मंधाता पर्वत स्थित गुर्लला का दर्रा 4,938 मीटर (16,200 फुट) की ऊँचाई पर है। इसके मध्य में पहले बाइर्ं ओर मानसरोवर और दाइर्ं ओर राक्षस ताल है। उत्तर की ओर दूर तक कैलाश पर्वत के हिमाच्छादित धवल शिखर का रमणीय दृश्य दिखाई पड़ता है। दर्रा समाप्त होने पर तीर्थपुरी नामक स्थान है जहाँ गर्म पानी के झरने हैं। इन झरनों के आसपास चूनखड़ी के टीले हैं। प्रवाद है कि यहीं भस्मासुर ने तप किया और यहीं वह भस्म भी हुआ था। इसके आगे डोलमाला और देवीखिंड ऊँचे स्थान है, उनकी ऊँचाई 5,630 मीटर (18,471 फुट) है। इसके निकट ही गौरीकुंड है। मार्ग में स्थान स्थान पर तिब्बती लामाओं के मठ हैं। इस प्रदेश में एक सुवासित वनस्पति होती है जिसे कैलास धूप कहते हैं। लोग उसे प्रसाद स्वरूप लाते हैं। कैलाश मानसरोवर के12 रहस्य;- 1-धरती का केंद्र :- धरती के एक ओर उत्तरी ध्रुव है, तो दूसरी ओर दक्षिणी ध्रुव। दोनों के बीचोबीच स्थित है हिमालय। हिमालय का केंद्र है कैलाश पर्वत। वैज्ञानिकों के अनुसार यह धरती का केंद्र है। कैलाश पर्वत दुनिया के 4 मुख्य धर्मों- हिन्दू, जैन, बौद्ध और सिख धर्म का केंद्र है। 2-अलौकिक शक्ति का केंद्र :- यह एक ऐसा भी केंद्र है जिसे एक्सिस मुंडी (Axis Mundi) कहा जाता है। एक्सिस मुंडी अर्थात दुनिया की नाभि या आकाशीय ध्रुव और भौगोलिक ध्रुव का केंद्र। यह आकाश और पृथ्वी के बीच संबंध का एक बिंदु है, जहां दसों दिशाएं मिल जाती हैं। रशिया के वैज्ञानिकों के अनुसार एक्सिस मुंडी वह स्थान है, जहां अलौकिक शक्ति का प्रवाह होता है और आप उन शक्तियों के साथ संपर्क कर सकते हैं। 3-पिरामिडनुमा क्यों है यह पर्वत :- कैलाश पर्वत एक विशालकाय पिरामिड है, जो 100 छोटे पिरामिडों का केंद्र है। कैलाश पर्वत की संरचना कम्पास के 4 दिक् बिंदुओं के समान है और एकांत स्थान पर स्थित है, जहां कोई भी बड़ा पर्वत नहीं है। 4- शिखर पर कोई नहीं चढ़ सकता :- कैलाश पर्वत पर चढ़ना निषिद्ध है, परंतु 11वीं सदी में एक तिब्बती बौद्ध योगी मिलारेपा ने इस पर चढ़ाई की थी। रशिया के वैज्ञानिकों की यह रिपोर्ट 'यूएनस्पेशियल' मैग्जीन के 2004 के जनवरी अंक में प्रकाशित हुई थी। हालांकि मिलारेपा ने इस बारे में कभी कुछ नहीं कहा इसलिए यह भी एक रहस्य है। 5-दो रहस्यमयी सरोवरों का रहस्य :- 04 POINTS;- 1-हिंदू मान्यता के मुताबिक मानसरोवर झील सर्वप्रथम भगवान ब्रह्मा के मन में उत्पन्न हुई थी इसलिए मानसरोवर कहते हैं क्योंकि ये मानस और सरोवर से मिलकर बनी है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है - मन का सरोवर। यहां देवी सती के शरीर का दांया हाथ गिरा था। इसलिए यहां एक पाषाण शिला को उसका रूप मानकर पूजा जाता है। 2-ऐसा माना जाता है कि महाराज मानधाता ने मानसरोवर झील की खोज की और कई वर्षों तक इसके किनारे तपस्या की थी, जो कि इन पर्वतों की तलहटी में स्थित है। बौद्ध धर्मावलंबियों का मानना है कि इसके केंद्र में एक वृक्ष है, जिसके फलों के चिकित्सकीय गुण सभी प्रकार के शारीरिक व मानसिक रोगों का उपचार करने में सक्षम हैं। मानसरोवर पहाड़ों से घिरी झील है जो पुराणों में 'क्षीर सागर' के नाम से वर्णित है। क्षीर सागरकैलाश से 40 किमी की दूरी पर है व इसी में शेष शैय्‌या पर विष्णु व लक्ष्मी विराजित हो पूरे संसार को संचालित कर रहे है। 3-यहां 2 सरोवर मुख्य हैं- पहला, मानसरोवर जो दुनिया की शुद्ध पानी की उच्चतम झीलों में से एक है और जिसका आकार सूर्य के समान है। दूसरा, राक्षस नामक झील, जो दुनिया की खारे पानी की उच्चतम झीलों में से एक है और जिसका आकार चन्द्र के समान है। ये दोनों झीलें सौर और चन्द्र बल को प्रदर्शित करती हैं जिसका संबंध सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जा से है। जब दक्षिण से देखते हैं तो एक स्वस्तिक चिह्न वास्तव में देखा जा सकता है। यह अभी तक रहस्य है कि ये झीलें प्राकृतिक तौर पर निर्मित हुईं या कि ऐसा इन्हें बनाया गया? 4-दोनों झीलें विपरीत शक्तियों का केंद्र हैं, जो दो भिन्न परिस्थितियों (सुख और दुख) की प्रतीक मानी जाती हैं। इसके माध्यम से भगवान शिव यह संदेश देना चाहते हैं कि जीवन में सम और विषम दोनों परिस्थितियां आ सकती हैं, लेकिन जो मनुष्य दोनों परिस्थितियों में एक समान बना रहे, वही ईश्वर के नजदीक है। दोनों के संतुलन से ही जीवन चलता है। कैलास जाने वाले श्रद्धालु मानस और राकस दोनों झीलों का पानी अपने साथ ले जाते हैं। 6-यहीं से क्यों सभी नदियों का उद्गम :- इस पर्वत की कैलाश पर्वत की 4 दिशाओं से 4 नदियों का उद्गम हुआ है- ब्रह्मपुत्र, सिन्धु, सतलज व करनाली। इन नदियों से ही गंगा, सरस्वती सहित चीन की अन्य नदियां भी निकली हैं। कैलाश की चारों दिशाओं में विभिन्न जानवरों के मुख हैं जिसमें से नदियों का उद्गम होता है। पूर्व में अश्वमुख है, पश्चिम में हाथी का मुख है, उत्तर में सिंह का मुख है, दक्षिण में मोर का मुख है। 7-सिर्फ पुण्यात्माएं ही निवास कर सकती हैं :- यहां पुण्यात्माएं ही रह सकती हैं। कैलाश पर्वत और उसके आसपास के वातावरण पर अध्ययन कर चुके रशिया के वैज्ञानिकों ने जब तिब्बत के मंदिरों में धर्मगुरुओं से मुलाकात की तो उन्होंने बताया कि कैलाश पर्वत के चारों ओर एक अलौकिक शक्ति का प्रवाह है जिसमें तपस्वी आज भी आध्यात्मिक गुरुओं के साथ टेलीपैथिक संपर्क करते हैं। 9-येति मानव का रहस्य :- हिमालयवासियों का कहना है कि हिमालय पर यति मानव रहता है। कोई इसे भूरा भालू कहता है, कोई जंगली मानव तो कोई हिम मानव। यह धारणा प्रचलित है कि यह लोगों को मारकर खा जाता है। कुछ वैज्ञानिक इसे निंडरथल मानव मानते हैं। विश्वभर में करीब 30 से ज्यादा वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि हिमालय के बर्फीले इलाकों में हिम मानव मौजूद हैं। 10- कस्तूरी मृग का रहस्य :- दुनिया का सबसे दुर्लभ मृग है कस्तूरी मृग। यह हिरण उत्तर पाकिस्तान, उत्तर भारत, चीन, तिब्बत, साइबेरिया, मंगोलिया में ही पाया जाता है। इस मृग की कस्तूरी बहुत ही सुगंधित और औषधीय गुणों से युक्त होती है, जो उसके शरीर के पिछले हिस्से की ग्रंथि में एक पदार्थ के रूप में होती है। कस्तूरी मृग की कस्तूरी दुनिया में सबसे महंगे पशु उत्पादों में से एक है। 11- डमरू और ओम की आवाज :- यदि आप कैलाश पर्वत या मानसरोवर झील के क्षेत्र में जाएंगे, तो आपको निरंतर एक आवाज सुनाई देगी, जैसे कि कहीं आसपास में एरोप्लेन उड़ रहा हो। लेकिन ध्यान से सुनने पर यह आवाज 'डमरू' या 'ॐ' की ध्वनि जैसी होती है। वैज्ञानिक कहते हैं कि हो सकता है कि यह आवाज बर्फ के पिघलने की हो। यह भी हो सकता है कि प्रकाश और ध्वनि के बीच इस तरह का समागम होता है कि यहां से 'ॐ' की आवाजें सुनाई देती हैं। 12- आसमान में लाइट का चमकना :- दावा किया जाता है कि कई बार कैलाश पर्वत पर 7 तरह की लाइटें आसमान में चमकती हुई देखी गई हैं। नासा के वैज्ञानिकों का ऐसा मानना है कि हो सकता है कि ऐसा यहां के चुम्बकीय बल के कारण होता हो। यहां का चुम्बकीय बल आसमान से मिलकर कई बार इस तरह की चीजों का निर्माण कर सकता है। ;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;; 2-श्रीखंड कैलाश;- श्रीखंड कैलाश का महात्मय; - 07 FACTS; 1-पवित्र स्थल श्रीखंड कैलाश की समुद्रतल से ऊंचाई लगभग 17200 फुट आंकी गयी है यह पवित्र स्थान हिमाचल के पर्वतों में बसा है | श्रीखंड कैलाश में महादेव शिव को एक लिंग जैसी आकृति वाल पत्थर जिसका आकार लगभग 75 फुट ऊँचा और 45 फुट के घेराव में है के रूप में पूजा जाता है | यह 75 फुट ऊँचा पाषाण लिंग 17200 फुट ऊँचे पर्वत पर स्वछंद विध्यमान है| 2-इस लिंग में एक दरार है जो लिंग के मध्य भाग में तिरछी दिशा के संकेत के रूप में विराजमान है , इस दरार में श्रद्धालुओं द्वारा भेंटे अर्पण की जाती है इस दरार में श्रद्धालुओं द्वारा अनगिनत भेंटे चढ़ाई गयी है लेकिन यह चमत्कार माना गया है की यह दरार कभी भरती ही नहीं है | 3-एक जनश्रुति के अनुसार महा पंडित रावण महादेव के दर्शनों के लिए रोज श्रीखंड कैलाश आता था और भक्तिभाव से अपना सिर भोले महादेव को भेंट स्वरुप अर्पण करता था | यही पर रावण ने महादेव के दर्शन किये थे | परिणामस्वरूप इस स्थान को सिर खंडन के नाम से अतीत में जाना जाता था , जो वर्तमान में श्रीखंड के नाम से अस्तित्व में आया | 4-श्रीखंड कैलाश भी कई पौराणिक कथाओं एवंम मान्यताओं में प्रचलित है | एक कथा के अनुसार - पौराणिक युग में भस्मासुर नामक एक राक्षस ने भगवान् शिवशंकर की तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया और वरदान में भस्म कंगन प्राप्त किया की वो जिसके भी सर के ऊपर हाथ रखे वह भस्म हो जाये | राक्षस महान तपस्वी होने साथ महान मूर्ख, जड़बुद्धि , पशु-आचरण के भी थे | कथा के अनुसार भस्मासुर राक्षस ने भगवान् शिव को भस्म कर माता पार्वती एवं कैलाश पर अधिपत्य का निर्णय ले लिया , भगवान् शिव उसकी इस मंशा को भांप गए और डेवढ़ांक स्थान पर एक गुफा में अंतरध्यान हो गए | 5-कहा जाता है की भगवान् शिव सूक्षम रूप में डेवढ़ांक से होते हुए श्रीखण्ड पर्वत पर प्रकट हुए तथा एक विशाल पत्थर के रूप में समाधिस्थ हो गए | भस्मासुर भगवान् शिव का पीछा करते हुए श्रीखंड तक पहुँच गया ,यह बात जब भगवान् विष्णु जी को पता चली तो भगवान् विष्णु जी ने मोहिनी रूप धर भस्मासुर के वध का निश्चय लिया और भस्मासुर को नृत्य की लीला में मोहित कर उसे उसी के हाथो भस्म कर दिया | इसके बाद इसी पर्वत पर माता पार्वती , गणेश जी व् कार्तिकेय जी ने घोर तपस्या की तब भगवान् शंकर पाषाण समाधी को खंडित कर बाहर आए | डेवढ़ांक गुफा यात्रा का पहला पड़ाव है यही से यात्रा की शुरुवात होती है लोकमान्यताओं में कहा जाता है तथा शिव के भक्तों का भी यही दृढ़ विश्वास है की भस्मासुर राक्षस को भस्म कंगन का वरदान देने के बाद महादेव शिव इसी स्थान पर अंतर्ध्यान हो गए थे | 6-इस स्थान के श्रीखण्ड कैलाश के इतिहास को पांडवो जोड़ा जाता है , कहा जाता है हस्तिनापुर ( इद्रप्रस्थ ) से १४(14 ) वर्ष के वनवास के दौरान पांडवों को हिमालय की घाटियों व् पहाड़ों की कन्दराओं में समय गुजारना पड़ा था इसी दौरान माता कुंती भी पांडवों के साथ थी | वनवास के दौरान पांडवों ने हिमाचल में बहुत स्थानों पर अपना समय गुजारा यहाँ पर कई स्थानों पर मंदिर भी स्थापित किये | इसी दौरान श्रीखंड कैलाश में महाराज युधिष्ठिर ने भीम व् माता कुंती सहित वनवास के कई वर्ष बिताये | 7-इसके कुछ साक्ष्य भीमबही (पाण्डुलिपि में भीम के शिला लेख ) के रूप में 17000 फ़ीट ऊँचे पर्वत श्रीखंड कैलाश पर मिले है ,लोक मान्यताओं में कहा जाता है की पांडव भीम ने श्रीखंड कैलाश में एक स्थान पर ( जिसे अब भीमडवार भी कहते है) बकासुर नाम के एक राक्षस का वध किया था | बकासुर श्रीखंड कैलाश के बुग्यालों में चरवाहों की भेड़ -बकरीओं व् अन्य पशुओं को खा जाता था जिस कारण उस राक्षस को बकासुर कहा जाता था, यहाँ के गद्दी व् चरवाहों के पशु धन की रक्षा के लिए भीम ने यहाँ पर बकासुर राक्षस का वध किया... इस मिटटी का रंग आज भी लाल है | श्रीखंड महादेव पर्वत यात्रा;- 14 FACTS;- 1-श्रीखंड महादेव पर्वत हिमाचल के कुल्लू में ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क से सटा है| श्रीखंड कैलाश की समुद्रतल से ऊंचाई लगभग 17200 फुट आंकी गयी है स्थानीय लोगो के अनुसार, इस चोटी पर भगवान् शिव का वास है | वैदिक दृष्टि से हिमालय श्रृंखलाओं को पुरे भारतवर्ष एवं विश्व के कई अन्य देशो में में बहुत पवित्र समझा जाता है तथा इसके साथ ही इसमें कई ऐसे पर्वत एवं स्थान है जिन्हे भगवन शिव के चिन्ह स्वरुप उनकी पूजा की जाती है | भगवान् शिव को अधिकांश तौर पर शिवलिंग स्वरुप में ही पूजा जाता है श्रीखंड कैलाश उन पर्वतों में एक है जिसे लोग भगवन शिव के चिन्ह स्वरुप में उनकी पूजा करते है | 2-पंच कैलाशों की इन यात्राओं में श्री खण्ड कैलाश की यात्रा को पूर्ण करना सबसे कठिन समझा जाता है | श्रीखण्ड कैलाश पर्वत श्रृंखला मध्य हिमालय की पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है | श्रीखंड कैलाश हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिला में समुद्रतल से लगभग 17200 फ़ीट की ऊंचाई पर स्तिथ है | श्रीखंड कैलाश की यात्रा हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिला में जाओं ( निरमंड ) गावं से शुरू होती है, जाओं गांव तक शिमला - रामपुर व् विभिन्न स्थानों से बस , कार अथवा जीप द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है | जाओं से श्रीखंड कैलाश की दूरी 26 किलोमीटर के लगभग है | होकर ब्राटिनाला होते हुए थाचडू -काली घाटी की भयंकर चढ़ाई समाप्त करने के बाद मनो स्वर्ग से होते हुए भीमडवार और भीमद्वार से पार्वती बाग़ होते हुए श्रीखंड की चोटी तक पहुँचती है | 3-यात्रा के तीन पड़ाव है - सिंहगाड-थाचड़ू और भीम डवार।यात्रा मे सिंहगाड, थाचरू, कालीजोत , भीमतलाई , ढंकद्वार , भीमडवारी, बकासुर वध स्थली , पार्वती झरना , पार्वती बाग, नयनसरोवर व भीमबही आदि स्थान आते हैं। सिंहगाड यात्रा का बेस कैंप है। जहां से नाम दर्ज करने के बाद श्रद्धालुओं को यात्रा की अनुमति दी जाती है। श्रीखण्ड कैलाश की पहली चढ़ाई शरू होती है, कालीघाटी तक की इस चढ़ाई को कैलाश यात्रा की सबसे कठिन व् सबसे महत्वपूर्ण चढ़ाई माना जाता है , इस प्रथम चढ़ाई में कैलाश यात्रियों की कड़ी परीक्षा हो जाती है यह सीधी चढ़ाई ब्राटिनाला से शुरू होती है जिसे डण्डीधार के नाम से जाना जाता है इस कठिन चढ़ाई को पार करने के लिए यात्री डंडे का सहारा लेते जिस कारण इसे डण्डीधार कहा जाता है 4-कालीघाटी से भीम द्वार श्रीखंड कैलाश का दूसरा पड़ाव शुरू होता है कालीघाटी के बाद ट्रेक कभी नीचे कभी ऊपर बदलता रहता है कालीघाटी के बाद ऐसा प्रतीत होता है जैसे प्रकृति की दूसरी परत में प्रवेश हो रहा हो | डण्डीधार की चढ़ाई में कुदरती पानी का कोई निशान नहीं मिलता किन्तु कालीघाटी के के बाद प्राकृतिक पानी के चश्मों की भरमार है यात्रियों में ऐसी मान्यता है की जो भी इन वादियों का पानी पि लेता है वो जिंदगी भर के लिए स्वस्थ हो जाता है क्योंकि कैलाश के पानी में विभिन्न प्रकार की जड़ी-बूटियों से मिश्रित होता है | 5-कालीघाटी उतरने के बाद भीम तलाई नमक स्थल आता है भीम तलाई में काली कुंड नमक एक पवित्र स्थल है जनश्रुति के अनुसार पांडव भीम ने यंहा यह कुंड माता कुंती के लिए बनाया था| लोक मान्यताओं के अनुसार, अज्ञातवास के दौरान काली कुंड स्थल पर पांडवों की माता तथा युधिष्ठिर ने तपस्या की थी माता कुंती इसी कुंड से जल लेती थी तथा वियोग का अर्पण करती थी| ऐसा माना जाता है की काली कुंड से भीम द्वार तथा श्रीखंड कैलाश तक पांडवों ने अपना रास्ता तैयार किया था जिसे पांडव गोसर भी कहा जाता है इस आस्था व् प्रमाण से यह पुष्टि होती है की पांडव इस पवित्र स्थल की यात्रा के दौरान कुछ समय के लिए उनका निवास स्थान यंहा रहा हो| 6-भीमडवार एक खुली घाटी है भीमडवार में ही पांडव भीम का निवास स्थान माना जाता था इसी स्थान पर भीम ने महादेव की तपस्या की थी भीमडवार में भीम एक बड़ी सी शिला के निचे रहते थे जिसे यंहा की स्थानिय भाषा में ड्वार कहते है | डवार - एक बड़े पत्थर के निचे कमरा नुमा खोल होता है जिसमे पहाड़ों में प्राकृतिक सरायं के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है| 7-भीमडवार में रात्रि विश्राम करना अब अनिवार्य है | यात्रा के पिछले वर्षों में अंतिम पड़ाव पार्वती बाग़ होता था किन्तु हर साल यात्रिओ की संख्या बढ़ने के कारण पार्वती बाग़ की पवित्रता ख़तम होने लगी यंहा उगने वाले पवित्र ब्रह्मकमल व् अन्य दुर्लभ जड़ी-बूटियां जो केवल इस ऊंचाई पर ही पायी जा सकती है कम मात्रा में उगने लगे | पवित्र पार्वती बाग़ की सुंदतरता को बचाये रखने के लिए अब पार्वती बाग़ के पड़ाव को भीमडवार तक ही सीमित रखा गया है भीमडवार के बाद पार्वती बाग़ में किसी यात्री को रुकने की अनुमति नहीं है केवल मेडिकल व् रेस्क्यू टीमें ही उपलब्ध रहती है | 8-यात्रा का अंतिम चरण भीमडवार से पार्वती बाग़ से नयनसरोवर से भीमबही से श्रीखंड कैलाश महादेव के दर्शन करना है | भीमडवार से श्रीखंड कैलाश की दुरी ३-४ किमि.के लगभग है इस स्थल से यात्रा की शुरुवात सुबह जल्दी करनी होती है इसके बाद आपको रुकने की मनाही है आपको कैलाश महादेव के दर्शन कर वापिस पड़ाव पर आना होता है | सुबह के समय पहाड़ों की सूंदर छठा देखते ही बनती है | सुबह -सुबह यात्रा शुरू करने से स्फूर्ति आती है व् मन भी पवित्र आता है यात्री महादेव , भोले बाबा , जय शंकर , हर-हर महादेव के आगाज़ के साथ कैलाश की और बढ़ते जाते है भीमडवार से थोड़ी दूर चलने के बाद पवित्र पार्वती झरने के दर्शन होते है इसके साथ ही आप पवित्र पार्वती बाग़ में प्रवेश करते है | 9-भीमडवार से पार्वती बाग़ की दुरी करीब 2 किमी. यह यात्रा का अंतिम स्थल है जंहा यात्रिओं की सुविधा के लिए मेडिकल, रेस्क्यू एवं चाय-पानी की व्यवस्था होती है | श्रीखंड कैलाश की यात्रा महादेव की सभी यात्राओं में सबसे कठिन मानी जाती है | इस यात्रा के लिए स्वयं को शारीरिक व् मानसिक तौर पर स्वस्थ व् दृढ़ होना आवश्यक है पार्वती बाग़ से कैलाश की और बढ़ने पर ऊंचाई लगभग 15000 फुट के पार होती है यंहा से आगे एक निर्जन इलाके की शुरुवात होती है कोई भी पेड़-पौधा नहीं हे केवल अति पवित्र जड़ी-बूटियां जैसे ब्रह्मकमल ही पाया जाता है अब रस्ते में केवल पत्थर व् बर्फ ही मिलतेहै जिस कारण ऑक्सीजन की उपलब्धता काम होने लगती है| आगे ऑक्सीजन की कमी के कारण चलने में मुश्किल आने लगती है इसलिए छोटे कदम धीरे -धीरे आगे की यात्रा को पूरा करना चाहिए | 10-पार्वती बाग़ माता पार्वती को समर्पित है मान्यताओं के अनुसार इस पवित्र स्थल पर माता पार्वती ने भगवान् शिव की कठोर तपस्या की थी पारवती बाग़ से थोड़ी चलने के बाद नयनसरोवर है कहा जाता है की माता पार्वती की कठोर तपस्या के कारण उनके नैनो से अश्रु गिरने के कारण ही इस सरोवर का निर्माण हुआ था | पार्वती बाग़ में माता की पूजा करने के बाद यात्री हर-हर महादेव के जयकारो के कैलाश की ओर बढ़ते जाते है |पार्वती बाग़ के बाद पहाड़ों में हरी -भरी घास ख़त्म हो जाती है इसके बाद केवल पथरीला रास्ता रह जाता है पारवती बाग़ से नयनसरोवर की दुरी 2 किमी. लगभग है | 11-सूर्य देव की पहली किरण के साथ ही यात्री नयन सरोवर पहुँचते है | मान्यता अनुसार माता पार्वती के नयन से गिरे अश्रु के कारन निर्मित हुई ये झील बहुत ही पवित्र समझी जाती है | यह बर्फीली झील कैलाश में लगभग 16000 फुट की ऊंचाई पर स्तिथ है तथा लगभग पुरे वर्ष बर्फ से ढकी रहती है | यात्री नयन सरोवर पहुंचकर सरोवर के जल से अपने तन-मन को पवित्र कर एवं सरोवर के पवित्र जल को साथ लेकर महादेव के अभिषेक हेतु कैलाश की और बढ़ते है | 12-नयन सरोवर से श्रीखंड कैलाश की यात्रा कठिन व् लगातार चढ़ाई वाली है यह दुरी 2-3 किमी. के लगभग है , नयन सरोवर के बाद कैलाश के लिए रास्ता कठिन होता जाता है केवल बहुत ज्यादा बर्फ और बड़े-बड़े पत्थर ही दिखाई पड़ते है नयन सरोवर के बाद ऑक्सीजन की कमी होना शुरू हो जाती है सांस फूलने लगती है , और शरीर जवाब देने लगता है कहते है श्री खंड कैलाशकी यात्रा शरीर का खंड-खंड कर देने वाली यात्रा है, महादेव इस यात्रा में भक्तों की कड़ी परीक्षा लेते है | श्रीखंड कैलाश की यात्रा इतनी कठिन है की कई बार या लगभग हर वर्ष श्रीखंड कैलाश यात्रा के दौरान कुछ यात्री अपनी जान से हाट धो बैठते है | श्रीखंड कैलाश की यात्रा में हमेशा शारीरिक व् मानसिक संतुलन बनाये रखना होता है | 13-भीमबही स्थल समुद्रतल से लगभग 16500 फुट की ऊंचाई पर स्थित है यंहा पर आपको विशाल आयताकार गड़े हुए पत्थर मिलेंगे जिसे किसी प्राचीन लिपि में तराशा गया है जिसे पाण्डु लिपि का नाम भी दिया जाता है यह स्थल महायोद्धा भीम के नाम से जाना जाता है इस स्थान पर पाण्डु भीम द्वारा तराशे गए विशालकाय आयताकार पत्थर पाये जाते है जो भीम का एक भोजा माना गया है | बही शब्द तात्पर्य यंहा भोजा से है इन विशाल पत्थरों में पाण्डुलिपि के प्रतीक मिलते है पत्थरों की परत थाली के आकर की तरह बड़ाई गयी है इन विशाल व् भरी पत्थरों को स्थान पर लाना व् तराशना केवल महाबली पाण्डु भीम का ही कार्य माना जा सकता है | किवदंतियों के अनुसार जाता है की भीम यंहा से स्वर्ग के लिए सीढ़ियों का निर्माण करना चाहते थे लेकिन समय की बाधा के कारण पूरा नहीं कर पाए थे | 14-भीम बही स्थल को पार करने के बाद एक बेहद सूंदर दृश्य सामने होता है श्रीखंड महादेव आपके सामने होते है | यात्री इस कठिन यात्रा की सारी तकलीफे भूल श्रीखंड कैलाश के नतमस्तक हो जाते है की सुंदरता अद्भुत व् अकल्पनीय है | श्रीखंड कैलाश से हिमालय पर्वतों का अप्रतिम नज़ारा देखने को मिलता है | श्रीखंड कैलाश पहुँच कर नयन सरोवर से लाये जल से महादेव का अभिषेक करते है |इस स्थान पर पूर्ण रूप से महादेव का राज्य चलता है महादेव कैलाश के राजा है हर वर्ष महादेव दर्शन के अभिलाषी श्रीखं कैलाश पहुँचते है | श्रीखंड कैलाश यात्रा एक रूहानी एहसास है जो एक बार कैलाश की यात्रा कर लेता है वो जीवन भर महादेव का कृपापात्र बन जाता है | 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से हो कर किन्नर कैलाश पहुचते हैं। किन्नर कैलाश की यात्रा शुरू करने के लिए भक्तों को जिला मुख्यालय से करीब सात किलोमीटर दूर राष्ट्रीय राजमार्ग-5 स्थित पोवारी से सतलुज नदी पार कर तंगलिंग गाव से हो कर जाना पडता है। 3-गणेश पार्क से करीब पाच सौ मीटर की दूरी पर पार्वती कुंड है। इस कुंड के बारे में मान्यता है कि इसमें श्रद्धा से सिक्का डाल दिया जाए तो मुराद पूरी होती है। भक्त इस कुंड में पवित्र स्नान करने के बाद करीब 24 घटे की कठिन राह पार कर किन्नर कैलाश स्थित शिवलिंग के दर्शन करने पहुचते हैं। वापस आते समय भक्त अपने साथ ब्रह्मा कमल और औषधीय फूल प्रसाद के रूप में लाते हैं।1993 से पहले इस स्थान पर आम लोगों के आने-जाने पर प्रतिबंध था। 1993 में पर्यटकों के लिए खोल दिया गया, जो 24000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यहां 40 फीट ऊंचे शिवलिंग हैं। यह हिंदू और बौद्ध दोनों के ‍लिए पूजनीय स्थल है। इस शिवलिंग के चारों ओर परिक्रमा करने की इच्‍छा लिए हुए भारी संख्‍या में श्रद्धालु यहां पर आते हैं। पौराणिक महत्व;- 03 FACTS;- 1-किन्नर कैलाश के बारे में अनेक मान्यताएं भी प्रचलित हैं। कुछ विद्वानों के विचार में महाभारत काल में इस कैलाश का नाम इन्द्रकीलपर्वत था, जहां भगवान शंकर और अर्जुन का युद्ध हुआ था और अर्जुन को पासुपातास्त्रकी प्राप्ति हुई थी। यह भी मान्यता है कि पाण्डवों ने अपने बनवास काल का अन्तिम समय यहीं पर गुजारा था। किन्नर कैलाश को वाणासुर का कैलाश भी कहा जाता है। क्योंकि वाणासुरशोणित पुरनगरी का शासक था जो कि इसी क्षेत्र में पडती थी। कुछ विद्वान रामपुर बुशैहररियासत की गर्मियों की राजधानी सराहन को शोणितपुरनगरी करार देते हैं। कुछ विद्वानों का मत है कि किन्नर कैलाश के आगोश में ही भगवान कृष्ण के पोते अनिरुध का विवाह ऊषा से हुआ था। 2-रंग बदलता है शिवलिंग;- शिवलिंग की एक चमत्कारी बात यह है कि दिन में कई बार यह रंग बदलता है। सूर्योदय से पूर्व सफेद, सूर्योदय होने पर पीला, मध्याह्न काल में यह लाल हो जाता है और फिर क्रमश:पीला, सफेद होते हुए संध्या काल में काला हो जाता है। क्यों होता है ऐसा, इस रहस्य को अभी तक कोई नहीं समझ सका है। किन्नौर वासी इस शिवलिंगके रंग बदलने को किसी दैविक शक्ति का चमत्कार मानते हैं, कुछ बुद्धिजीवियों का मत है कि यह एक स्फटिकीय रचना है और सूर्य की किरणों के विभिन्न कोणों में पडने के साथ ही यह चट्टान रंग बदलती नजर आती है। 3-हिमाचल का बदरीनाथ किन्नर कैलाश को हिमाचल का बदरीनाथ भी कहा जाता है और इसे रॉक कैसल के नाम से भी जाना जाता है। इस शिवलिंगकी परिक्रमा करना बडे साहस और जोखिम का कार्य है। कई शिव भक्त जोखिम उठाते हुए स्वयं को रस्सियों से बांध कर यह परिक्रमा पूरी करते हैं। पूरे पर्वत का चक्कर लगाने में एक सप्ताह से दस दिन का समय लगता है। ऐसी मान्यता भी है कि किन्नर कैलाश की यात्रा से मनोकामनाएं तो पूरी होती ही हैं। यहां से दो किलोमीटर दूर रेंगरिकटुगमा में एक बौद्ध मंदिर है। यहां लोग मृत आत्माओं की शान्ति के लिए दीप जलाते हैं। यह मंदिर बौद्ध व हिन्दू धर्म का संगम भी है। भगवान बुद्ध की अनेक छोटी-बडी मूर्तियों के बीच दुर्गा मां की भव्य मूर्ति भी स्थित है। ऐसे शुरू होती है यात्रा ;- 1-सबसे पहले सभी यात्रियों को इंडो तिब्‍बत बार्डर पुलिस पोस्‍ट पर यात्रा के लिए अपना पंजीकरण कराना होता है। यह पोस्‍ट 8,727 फीट की ऊंचाई पर है। यह किन्‍नौर जिला मुख्‍यालय रेकांग प्‍यो से 41 किमी की दूरी पर है। उसके बाद लांबार के लिए प्रस्‍थान करना होता है। यह 9,678 फीट की ऊंचाई पर है। जो 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां जाने के लिए खच्‍चरों का सहारा लिया जा सकता है। 2-इसके उपरांत 11,319 फीट की ऊंचाई पर स्थित चारांग के लिए चढ़ाई करनी होती है। जिसमें कुल 8 घंटे लगते हैं। लांबार के बाद ज्‍यादा ऊंचाई के कारण पेड़ों की संख्‍या कम होती जाती है। चारांग गांव के शुरू होते ही सिंचाई और स्‍वास्‍थ्‍य विभाग का गेस्‍ट हाउस मिलता है, जिसके आसपास टेंटों में यात्री विश्राम करते हैं। इसके बाद 6 घंटे की चढ़ाई वाला ललांति (14,108) के लिए चढ़ाई शुरू हो जाती है 3-चारांग से 2 किलोमीटर की ऊंचाई पर रंग्रिक तुंगमा का मंदिर स्थित है। इसके बारे में यह कहा जाता है कि बिना इस मंदिर के दर्शन किए हुए परिक्रमा अधूरी रहती है। इसके बद 14 घंटे लंबी चढ़ाई की शुरूआत हो जाती है।चौथा दिन एक ओर जहां ललांति दर्रे से चारांग दर्रे के लिए करनी होती है, वहीं दूसरी ओर चितकुल देवी की दर्शन हेतु लंबी दूरी तक उतरना होता है।क्रमशः .....SHIVOHAM...