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क्या यह जगत भी पूर्ण है?क्या त्रिविध तापों से मुक्ति संभव है?


क्या यह जगत भी पूर्ण है?-

10 FACTS;-

1-ईशावास्य उपनिषद में लिखा है कि प्रत्येक पूर्ण है ..चाहे वह व्यक्ति हो, जगत हो, पत्थर, वृक्ष या अन्य कोई ब्रह्मांड हो, क्योंकि उस पूर्ण से ही सभी की उत्पत्ति हुई है। स्वयं की पूर्णता को प्राप्त करने के लिए ध्यान जरूरी है। जिस तरह एक बीज खिलकर वृक्ष बनकर हजारों बीजों में बदल जाता है, वैसी ही मनुष्य की भी गति है। यह संसार उल्टे वृक्ष के समान है। व्यक्ति के मस्तिष्क में उसकी पूर्णता की जड़ें हैं।

2-''ओम पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।''अर्थात ''वह सच्चिदानंदघन परब्रह्म पुरुषोत्तम परमात्मा सभी प्रकार से सदा सर्वदा परिपूर्ण है।यह जगत भी उस परब्रह्म से पूर्ण ही है, क्योंकि पूर्ण से पूर्ण की ही उत्पत्ति होती है। तथा पूर्ण का पूर्णत्व लेकर पूर्ण ही शेष रहता है''।

3-जीवन का शाश्वत नियम है, जहां से प्रारंभ होता है, वहीं अंत होता है। जो आदि है, वही अंत है। जीवन के इसी शाश्वत नियम के अंतर्गत ईशावास्य जिस सूत्र से शुरू होता है, उसी सूत्र पर पूर्ण होता है।सभी यात्राएं वर्तुल में हैं।पहला कदम.. आखिरी कदम भी है और जो ऐसा समझ लेते हैं, वे व्यर्थ की परेशानी से बच जाते हैं।

4-हम वहीं पहुंचते हैं , जहां से हम चलते हैं। यात्रा का जो पहला पड़ाव है, वही यात्रा की अंतिम मंजिल है।हम वहीं पहुंचेंगे, जहां हम थे। इसलिए बीच में हम बिलकुल आनंद से चल सकते हैं।हम वहां पहुंचने की कितनी ही चेष्टा करें, हम वहां नहीं पहुंचेंगे जहां हम नहीं थे।वास्तव में,हम वही

हो सकते हैं, जो हम हैं...। जो हममें छिपा है, वही प्रगट होगा और जो प्रगट होगा, वह वापस लुप्त हो जाएगा। बीज वृक्ष बनेगा, और वृक्ष फिर बीज बन जागा। ऐसा ही जीवन का शाश्वत नियम है।

5-इस नियम को जो समझ लेते हैं, उनके त्रिविध ताप शांत हो जाते हैं। फिर न कोई दुख का कारण है, न सुख का ;क्योंकि हम अपनी मंजिल अपने साथ लेकर चलते हैं।हमें ऐसा कुछ भी नहीं मिलता, जो हमें सदा से मिला

हुआ ही नहीं है।अर्थ तो केवल वे ही जान पाते हैं , जो शब्द को जानते हैं। लेकिन अभिप्राय केवल वे ही जानते हैं , जो निःशब्द को जान लेते हैं।वास्तव में, अर्थ और अभिप्राय में फर्क होता है;अर्थ प्रगट बात है, और

अभिप्राय गुप्त।अर्थ शरीर है, तो अभिप्राय आत्मा। अर्थ तो बुद्धि से भी समझा जा सकता है,लेकिन अभिप्राय सिर्फ हृदय से।

6-इस सूत्र का अभिप्राय/ इशारा है कि जीवन अतर्क्य/ Illogical है।सूत्र कहता है, पूर्ण से पूर्ण निकलता है।तो पहली बात पूर्ण से पूर्ण निकलेगा कैसे ..क्योंकि पूर्ण के बाहर कोई जगह भी नहीं होती, जिसमें पूर्ण निकल आए। पूर्ण का मतलब ही है एब्लोल्युट, जिसके पार कुछ भी नहीं है। अगर कुछ भी हो, तो इसके भीतर उतना तो अपूर्ण हो जाएगा । पूर्ण के बाहर जगह,आकाश /Space कुछ भी नहीं होता। तो पूर्ण के बाहर पूर्ण निकलने की कोई भी सुविधा नहीं है।

7-लेकिन यह सूत्र और एक अतर्क्य बात कहता है कि फिर पीछे पूर्ण शेष रह जाता है।एक तो पूर्ण से पूर्ण निकल नहीं सकता, और अगर पूर्ण निकल ही आए, तो पीछे तो सब शून्य हो जाएगा।यह तथ्य तर्क का नहीं है, गणित से कोई सोचेगा, तो यह सूत्र बिलकुल गलत है। यह आत्म साक्षात्कार का सूत्र है जो तर्क की कसौटी पर नहीं कसा जा सकता। जो जीवन को नियम, गणित, तर्क, न्याय, विधि, व्यवस्था से सोचेंगे, वे जीवन के रहस्य /मिस्ट्री से वंचित रह जाएंगे।जीवन को जो लोग गणित की तरह सोचते हैं, वे लोग जीवन को कभी नहीं माप पाते। क्योंकि जीवन मूलत: एक रहस्य है।

8- जितना हम जानते हैं, उतना ही पता चलता है कि मनुष्य का अज्ञान गहन है।जीवन को हम खोल नहीं पाते हैं।खोलते हैं तो और उलझ जाता है।

समय का आपको भलीभांति पता है, तारीखें, कैलेंडर , घड़ियां, मोबाइल,स्मार्ट फ़ोन पास में हैं, सब पता है, फिर भी समय क्या है ..अभी तक कोई उत्तर नहीं दे सका है। और जितने उत्तर दिए गए हैं, वे सब अंधेरे में टटोलने जैसे हैं, जिनसे कुछ हल नहीं होता है।

9-प्रेम की हम खूब बात करते हैं और कोई पूछ ले कि प्रेम क्या है ..क्या प्रेम सीखने का कोई उपाय है।आत्मा क्या है ..क्या आत्मा जानने का कोई

उपाय है। जीवन एक खुला रहस्य है आंख के सामने है, कहीं भी छिपा

नहीं है ,कोई पर्दा नहीं है ;फिर भी रहस्य है।रहस्य और पहेली में फर्क होता है। पहेली का मतलब होता है, जो खुल सकती है।रहस्य का मतलब है, जो बिलकुल खुला हुआ है और फिर भी इतना गहरा है कि तुम अनंत यात्रा के बाद भी पाओगे कि सदा शेष रह गया।

10-पूर्ण से पूर्ण बाहर भी निकल आए, तो भी पीछे पूर्ण शेष रह जाता है। पूर्ण में पूर्ण लीन भी हो जाए, तो भी, तो भी पूर्ण उतना ही रहता है, जितना

था।इस रहस्यमयता/ मिस्टीरियसनेस की सूचना देने वाला यह सूत्र इस बात का इशारा है कि जो इस सूत्र को समझेगा, तो वह जीवन में प्रवेश कर सकता है।जो इस सूत्र को कहेगा कि यह नहीं हो सकता,तो वह दरवाजे के भीतर प्रवेश भी नहीं कर सकता।

11-जीवन रहस्य है अथार्त तर्क से परे।तर्क के नियम कहीं प्रकृति में लिखे हुए नहीं हैं मनुष्य ने अपनी बुद्धि से खोजे हैं। हमारे सब नियम ऐसे ही हैं,

जैसे हमारे खेल के नियम होते हैं ...सब माने हुए नियम हैं... हमने थोपे हैं। हमारे नियम वैसे ही हैं, जैसे सड़क पर चलने के, ट्रैफिक के नियम होते हैं। बाएं चलो, कि दाएं चलो।भारत में लोग बाएं चलते हैं, तो अमरीका में लोग दाएं चलते हैं।दाएं चलो या बाएं ;लेकिन एक नियम बनाना पड़ेगा, क्योंकि रास्ते पर भीड़ है और चलना है।

12-काम चलाने के लिए व्यवस्था जरूरी हैं।लेकिन धीरे -धीरे हम नियम में इतने फंस जाते हैं कि उनको पूरी जिंदगी के रहस्य पर फैलाने की कोशिश करते हैं। इस बात की कोशिश करते हैं कि जिंदगी हमारे नियम मानकर चले।और जिस दिन कोई मनुष्य जिंदगी को अपने नियम मनवाने लगता है, उसी दिन पागल हो जाता है।जो जिंदगी के रहस्य को मानकर चलता

है; तो वो स्वस्थ है और जो अपने नियमों को जिंदगी पर थोपने की कोशिश कर है वो पागल मनुष्य है।फिर कठिनाई खड़ी होनी शुरू होती है।

13-जिंदगी में ऐसा कुछ नहीं है, जो अपने से विपरीत में न बदल जाता हो। जिंदगी में सब कुछ लिक्विड हैं,फिक्स नहीं। रात दिन बन जाती है,और दिन रात ; बचपन जवानी बन जाता और जवानी बुढ़ापा ;जिंदगी मौत बन जाती और जहर अमृत हो जाता है।सारी दवाइयां जहर हैं लेकिन बीमार के लिए अमृत बन जाती हैं।जिंदगी में तरलता/लिक्विडिटी है, लेकिन नियमों में सख्ती होती है क्योंकि नियम तो डेड होते हैं।

14-जिंदगी में तो कहीं कुछ पूर्ण मिलता ही नहीं ...सब अपूर्ण मालूम पड़ता है।वास्तव में अपूर्ण की बात करते, तो वह ज्यादा यथार्थवादी/

रिअलिस्टिक होता। न कोई व्यक्ति पूर्ण दिखाई पड़ता है, न कोई प्रेम , न कोई शक्ति , और न ही कोई आकार। जीवन में तो सब अपूर्ण है। और ईशावास्य के ऋषि पूर्ण से चर्चा शुरू करते है और पूर्ण पर ही चर्चा पूरी करते है।इसलिए यथार्थवादी तो इसे काल्पनिक/अनरियलिस्टिक ही कहेंगे ।

15-लेकिन यह इस बात का इशारा है कि अपूर्ण कहीं भी नहीं है।जहाँ भी आपको अपूर्ण दिखाई पड़ता हो, अपूर्णता आपकी दृष्टि में होगी, अपूर्ण कहीं है ही नहीं। और अपूर्ण हमें सब जगह दिखाई पड़ता है। अपूर्णता हमारी दृष्टि में है।उदाहरण के लिए, कोई आकाश को अपने घर की एक खिड़की से देखे तो आकाश भी खिड़की के आकार में कटा हुआ मालूम होगा; खिड़की की सीमा आकाश की सीमा बन जाएगी।और अगर किसी ने खिड़की के बाहर निकलकर देखा , तो आकाश सदा फ्रेम जैसा दिखाई पड़ता है।

16-वास्तव में,आकाश के ऊपर कोई फ्रेम नहीं है ..फ्रेम तो आपका दिया हुआ है। आकाश तो बिलकुल निराकार है।लेकिन मकान के बाहर जाकर भी आकाश निराकार नहीं दिखाई पड़ता है ; केवल फ्रेम जरा बड़ा.. पूरी पृथ्वी का हो जाता है।इसलिए आकाश चारों तरफ पृथ्वी को घेरे हुए गोल दिखाई पड़ता है ..एक गुंबज की भांति।मंदिरों के गुंबज भी उसी आधार पर बनाए जाते हैं।पूरी पृथ्वी के चारों ओर घूमें, तो भी आकाश कहीं पृथ्वी को नहीं छूता ..कोई क्षितिज / हॉराइजन नहीं है।

17-हॉराइजन बिलकुल वैसा ही भ्रम है, जैसे कि आपकी खिड़की का फ्रेम

,आकाश का फ्रेम नहीं है। आप एक जगह से देखेंगे तो वह जगह ही उसकी सीमा बन जाएगी ;चाहे वह जगह कितनी ही बड़ी हो।फिर कहां से निराकार का, पूर्ण का... दर्शन हो सकता हैं ...वास्तव में, एक ही जगह है, जो अपने भीतर है। वहां कोई खिड़की,कोई फ्रेम नहीं है।लेकिन जहां इंद्रियां रहेंगी, वहां फ्रेम रहेगा।उदाहरण के लिए, आंख के ऊपर चश्मा लगा लो, चश्मे के ऊपर दूरबीन लगा लो, सब कुछ करो, लेकिन खिड़की बड़ी हो जाती है, समाप्त नहीं होती।

18-लेकिन जब आंख बंद कर भीतर चले जाते हो ;आंख ,कान ,हाथ ,पैर रहित हो जाते हो; तब वहां निराकार, पूर्ण का अनुभव होता है। जो पूर्ण की बात कही गयी है, यह भीतर के पूर्ण को जानकर ही पता चलता है कि सही है। और जिसे भीतर का पूर्ण पता चल गया, फिर वह कहीं भी चला जाए ।

जिसने बाहर निकलकर एक बार आकाश देख लिया , वह कैसी ही छोटी खिड़की के पीछे खड़ा हो जाए, वह भलीभांति जानता है कि जो आकाश दिखाई पड़ रहा है, वह मेरी खिड़की का फ्रेम है, आकाश का नहीं ।

19-एक बार जिसने भीतर के पूर्ण को देख लिया, उसे सब जगह पूर्ण दिखाई पड़ने लगता है। वह जानता है कि घर, कारागृह ऊपर से हैं, भीतर निराकार मौजूद है।इसलिए ऋषि पूर्ण से बात शुरू करता है और पूर्ण पर

ही समाप्त करता है। जिंदगी कोई प्रश्न /पहेली नहीं है। जो प्रश्न बनाते हैं, उन्हें उत्तर खोजना पड़ता है। वे मुश्किल में पड़ जाते हैं क्योकि उत्तर उलझाते चले जाते हैं।लेकिन हम तो अपूर्ण में ही जीते हैं, अपूर्ण में ही शुरू करते, अपूर्ण में ही समाप्त करते हैं। इसलिए हमारा इस सूत्र से तालमेल नहीं बैठ सकता।

20-यह पूर्ण की बात ठीक ही कही गयी है ;यह सत्य है।सभी कुछ पूर्ण है;सब ओर पूर्ण ही है।अपूर्ण के होने का उपाय नहीं है। अपूर्ण कैसे होगा ,कौन अपूर्ण करेगा जबकि वही अकेला है, कोई दूसरा नहीं है, जो अपूर्ण कर सके।सीमा सदा दूसरे से बनती है।आपके घर की सीमा भी आपके पड़ोसी के घर से बनती है, आपके घर से नहीं।चूंकि परमात्मा अकेला एक

अस्तित्व है,जीवन की एक ही धारा है ..दूसरा कोई भी नहीं है तो कौन बनाएगा सीमा ..कौन करेगा अपूर्ण ।

21-अस्तित्व असीम है, पूर्ण /एब्लोल्युट /निरपेक्ष है। पर इसे हम तभी जान पाएंगे , जब भीतर इस पूर्ण की झलक मिल जाए ..तब इसकी झलक सब जगह मिलने लगती है। उस पूर्णता की एक बूंद को भी जिसने अपने भीतर जान लिया , वह फिर उसके अनंत सागरों के रहस्य को पा जाता है।पूर्ण से पूर्ण ही निकलता है और पूर्ण में ही लीन हो जाता है। अपूर्ण तो बीच में आता है, हमारी बुद्धि और इंद्रियों के कारण।छोड़े उन कारणों को , उनके पार जाये ,ट्रांसेंड करें, और पूर्ण में प्रतिष्ठा हो जाती है।और जिसकी पूर्ण में प्रतिष्ठा है, वही समझ पाएगा कि सब कुछ ईश्वर है, सब कुछ ईश्वर का है ,मैं नहीं ..तू ही तू है।

क्या त्रिविध तापों से मुक्ति संभव है?-

07 FACTS;-

1-इस संसार में जीवधारियों को तीन प्रकार से कष्ट होते हैं जिन्हें त्रिविध ताप कहा जाता है।।सांख्यशास्त्र के अनुसार दुःख तीन प्रकार के माने गए हैं ...आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक।सामान्यतः इन्हें दैहिक, भौतिक तथा दैविक ताप के नाम से भी जाना जाता है।संसार में जन्म लेने वाले सभी मनुष्यों को त्रिविध तापों से दो-चार होना पड़ता है।ये किसी का भी पक्षपात नहीं करते और एक समान रूप से सबको त्रसित करते हैं।

2-तुलसीदास ने श्रीरामचरितमानस में लिखा - ''दैहिक, दैविक, भौतिक तापा।राम राज्य काहू नहीं व्यापा''।राम राज्य में किसी को भी तीनों प्रकार के कष्ट नहीं थे।आध्यात्मिक दुःख के अंतर्गत रोग, व्याधि आदि शारीरिक दुःख और क्रोध, लोभ आदि मानसिक दुःख हैं।आधिभौतिक दुःख वह है जो स्थावर, जंगम (पशु पक्षी साँप, मच्छड़ आदि) भूतों के द्वार पहुँचता है । आधिदैविक जो देवताओं अर्थात् प्राकृतिक शक्तियों के द्वार पहुँचता है, जैसे आँधी, वर्षा, बज्रपात, शीत, ताप इत्यादि ।

3-साँख्य दुःख को रजोगुण का कार्य और चित्त का एक धर्म मानता है, आत्मा को उससे अलग रखता है।पर न्याय और वैशेषिक दुःख को आत्मा का धर्म मानते हैं।त्रिविध दुःखों की निवृत्ति को साँख्य ने पुरुषार्थ कहा है और शास्त्र जिज्ञासा का उद्देश्य बतलाया है।प्रधान दुःख जरा और मरण है जिनसे लिंगशरीर की निवृत्ति के बिना चेतन या पुरुष छुटकारा नहीं पा सकता है।इस प्रकार की मुक्ति प्रकृति और पुरुष के भेदज्ञान द्वारा ही संभव है। वेदांत ने सुख दुःख ज्ञान को अविद्या कहा है।इसकी निवृत्ति ब्रह्माज्ञान द्वारा हो जाती है।

4-योग की परिभाषा में चित्त के राजस कार्य को दुःख कहा गया है। दुःख एक प्रकार का चित्तविक्षेप है।जब किसी विषय से चित्त में जो खेद या कष्ट होता है; उसी दुःख सें द्वेष उत्पन्न होता है ...जिससे समाधि में विध्न पड़ता है । योग परिणाम, ताप और संस्कार ...तीन प्रकार के दुःख मानकर सब वस्तुओं को दुःखमय कहता है। परिणाम दुःख वह है जो भविष्य में अवश्य पहुँचेगा, ताप दुःख वह है जो वर्तमान काल में कोई भोग रहा हो और जिसका प्रभाव या स्मरण बना हो ।

5-चार ’पुरुषार्थों’ है ...धर्म’, अर्थ’, काम, मोक्ष।परन्तु काम’ तीसरी सीढ़ी है जिस पर मनुष्य अनंत काल तक रुके रहना चाहता है।कामदेव’ अर्थात् अपने जैसे जीवों की उत्पत्ति के लिए जिस देवता से प्रेरणा प्राप्त होती है उसे 'कामदेव' कहा जाता है ।कुछ इसे ’भोग’ के दृष्टिकोण से देखते हैं तो कुछ इसे संतानोत्पत्ति के लिए प्रदत्त नैसर्गिक वरदान की तरह भी देख सकते हैं। जब ’काम’ को देवता की तरह स्वीकार कर, उसके प्रति आदर और कृतज्ञता व्यक्त करते हैं तो वह जीवन में सुख, शान्ति और उल्लास की सृष्टि करता है ।

6-उसका उपहास कर या उस प्रवृत्ति का बलपूर्वक दमन कर मनुष्य बस अपने अन्तर्द्वन्द्व में फँसा ही रहता है। किन्तु मृत्यु आने पर ’क्या होता है' .. इसका अनुमान न होने से वह सोचने लगता है कि भौतिक अस्तित्व से परे भी कोई ’लोक’ है, जहाँ मनुष्य मृत्यु के बाद जा सकता है।सभी संस्कृतियों में मृत्यु के बाद भी किसी न किसी रूप में ’मनुष्य’ के ’अस्तित्व’ में बने रहने की संभावना को सत्य मानते हैं।वे ’अशरीरी’/आधिदैविक शक्ति और उसके ’लोक’ को भी सत्य मानते हैं ।

7-जो शुद्धतः नास्तिक हैं और अनुमान करते हैं कि इस शरीर के नष्ट होने पर सब समाप्त हो जाता है, वे भी मृत्यु से डरते हैं। मनुष्य की मृत्यु के बाद उसके शरीर को जला देने का, या जल में प्रवाहित करने का प्रचलन है, वे मनुष्य की आत्मा को निराकार और अनश्वर मानते हैं और उन्हें विश्वास होता है कि मृत्यु के पश्चात् उस मृतक की आत्मा अपने अच्छे बुरे कर्मों के अनुसार नए शरीर धारण करती हुई अंततः परम तत्व से एकीभूत होकर शाश्वत शान्ति की भागी होगी ।जीवन के हर पल का सदुपयोग करते हुए मनुष्य को परमपिता परमात्मा की शरण में जाना चाहिए। वही सबको उनके कष्ट और परेशानियों से मुक्ति दिलाने वाला है।उसकी से ही मनुष्य के त्रिविध तापों के कष्टों का शमन होता है।

क्या है वे त्रिविध ताप?-

03 FACTS;-

1-आधिदैहिक ताप(Caused by Supernatural/ Spirituality);-

शरीर से, मन से होने वाली बीमारियाँ आधिदैहिक ताप के अन्तर्गत आती हैं। इस शरीर को स्वतः अपने ही कारणों से जो कष्ट होता है उसे दैहिक ताप (physical/ self generated sufferings) कहा जाता है। इसे आध्यात्मिक ताप भी कहते हैं क्योंकि इसमें आत्म या अपने को अविद्या, राग, द्वेष, मू्र्खता, बीमारी आदि से मन और शरीर को कष्ट होता है। मनुष्य इस पर भी पूर्ण नियंत्रण नहीं कर पाया है।आध्यात्मिक ताप अज्ञान जनित कष्ट होते हैं। मनुष्य जब तक ज्ञानार्जन नहीं करता तब तक वह संसार में तिरस्कृत होता रहता है।

2-आधिभौतिक ताप(Caused by created beings);-

02 POINTS;-

1-आस-पास के वातावरण से प्राप्त अशान्ति को, दुःख आधिभौतिक ताप ( worldly sufferings) कहते हैं।जो कष्ट भौतिक जगत के बाह्य कारणों से या आस-पास के वातावरण से प्राप्त अशान्ति से होता है उसे आधिभौतिक या भौतिक ताप कहा जाता है।शत्रु आदि स्वयं से परे वस्तुओं या जीवों के कारण ऐसा कष्ट उपस्थित होता है।इस संसार में रहने वाले हर जीव का स्वभाव भिन्न होता है।वह कब और किस समय अपनी कोई भी क्या प्रतिक्रिया दे दे, इस विषय में कहा नहीं न सकता।

2-प्राणी विशेष के द्वारा दिया जाने वाला कष्ट आधिभौतिक है।आधिभौतिक ताप सांसारिक वस्तुओं अथवा जीवों से प्राप्त होने वाला कष्ट होता है।आधिभौतिक दु:खों पर भी पूर्ण नियंत्रण मनुष्य के द्वारा नहीं हो पाता है।

3-आधिदैविक ताप(Caused by destiny);-

04 POINTS;-

1-अज्ञात स्रोत के कारण होने वाली दुःखद घटनाओं से प्राप्त ताप को आधिदैविक ताप (act of god) कहते हैं।जो कष्ट दैवीय कारणों से उत्पन्न होता है उसे आधिदैविक या दैविक ताप कहा जाता है। अत्यधिक गर्मी, सूखा, भूकम्प, अतिवृष्टि आदि अनेक कारणों से होने वाले कष्ट को इस श्रेणी में रखा जाता है। आधिदैविक, आधिभौतिक व आध्यात्मिक। दैवीय शक्तियों के रुष्ट होने से जो दु:ख होता है उससे अतिवृष्टि, अनावृष्टि, राष्ट्र विप्लव, भूकंप, सुनामी आदि,होता है। इस पर मनुष्य का कोई नियंत्रण नहीं है। 2-आधिदैविक वह ’सत्यता’ है जिसे प्रकृति की सूक्ष्म किन्तु अत्यन्त शक्तिशाली ’सत्ताएँ’ संचालित करती हैं।जैसे अग्नि, वायु, पृथ्वी, जल तथा अकाश एक ओर भौतिक रूप में ग्रहण किए जाते हैं, वैसे ही उनकी ’आधिदैविक’ सत्ता भी है जो मनुष्य और जगत् के जीवन को निर्धारित करती हैं ।

3-आधिदैविक ताप दैवी शक्तियों द्वारा दिये गये या पूर्वजन्मों में स्वयं के किए गये कर्मों से प्राप्त कष्ट कहलाता है।मनुष्य जब जन्म लेता है तो उसका भाग्य उसके साथ ही इस धरा पर आ जाता है। इस सृष्टि के प्रारम्भ से इस वर्तमान जन्म तक न जाने कितने ही जन्म उसने लिए होते हैं। उन सभी जन्मों में किए गए उसके सुकर्मो और दुष्कर्मो के फल का भुगतान तो उसे करना ही पड़ता है।उन सब शुभाशुभ कर्मो का फल भोगते हुए कई प्रकार के उतार-चढावों को पार करना मानो उसकी नियति बन जाती है।

4-इसके साथ-साथ अतिवृष्टि, अनावृष्टि, ओलावृष्टि, सुनामी, बाढ़, भूकम्प आदि दैविक तापों उसे सताते रहते हैं, मनुष्य को उनसे मुक्ति नहीं मिलती जब तक वह इन सब को भोग नहीं लेता।सांसारिक विघ्न-बाधाएँ भी उसे कदम-कदम पर डराती रहती हैं और तब मनुष्य विवश होकर इसे ही अपने भाग्य का फैसला मानकर अपना सिर झुका लेता है।

.....SHIVOHAM...