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क्या यह जगत भी पूर्ण है?क्या त्रिविध तापों से मुक्ति संभव है?


क्या यह जगत भी पूर्ण है?-

10 FACTS;-

1-ईशावास्य उपनिषद में लिखा है कि प्रत्येक पूर्ण है ..चाहे वह व्यक्ति हो, जगत हो, पत्थर, वृक्ष या अन्य कोई ब्रह्मांड हो, क्योंकि उस पूर्ण से ही सभी की उत्पत्ति हुई है। स्वयं की पूर्णता को प्राप्त करने के लिए ध्यान जरूरी है। जिस तरह एक बीज खिलकर वृक्ष बनकर हजारों बीजों में बदल जाता है, वैसी ही मनुष्य की भी गति है। यह संसार उल्टे वृक्ष के समान है। व्यक्ति के मस्तिष्क में उसकी पूर्णता की जड़ें हैं।

2-''ओम पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।''अर्थात ''वह सच्चिदानंदघन परब्रह्म पुरुषोत्तम परमात्मा सभी प्रकार से सदा सर्वदा परिपूर्ण है।यह जगत भी उस परब्रह्म से पूर्ण ही है, क्योंकि पूर्ण से पूर्ण की ही उत्पत्ति होती है। तथा पूर्ण का पूर्णत्व लेकर पूर्ण ही शेष रहता है''।

3-जीवन का शाश्वत नियम है, जहां से प्रारंभ होता है, वहीं अंत होता है। जो आदि है, वही अंत है। जीवन के इसी शाश्वत नियम के अंतर्गत ईशावास्य जिस सूत्र से शुरू होता है, उसी सूत्र पर पूर्ण होता है।सभी यात्राएं वर्तुल में हैं।पहला कदम.. आखिरी कदम भी है और जो ऐसा समझ लेते हैं, वे व्यर्थ की परेशानी से बच जाते हैं।

4-हम वहीं पहुंचते हैं , जहां से हम चलते हैं। यात्रा का जो पहला पड़ाव है, वही यात्रा की अंतिम मंजिल है।हम वहीं पहुंचेंगे, जहां हम थे। इसलिए बीच में हम बिलकुल आनंद से चल सकते हैं।हम वहां पहुंचने की कितनी ही चेष्टा करें, हम वहां नहीं पहुंचेंगे जहां हम नहीं थे।वास्तव में,हम वही

हो सकते हैं, जो हम हैं...। जो हममें छिपा है, वही प्रगट होगा और जो प्रगट होगा, वह वापस लुप्त हो जाएगा। बीज वृक्ष बनेगा, और वृक्ष फिर बीज बन जागा। ऐसा ही जीवन का शाश्वत नियम है।

5-इस नियम को जो समझ लेते हैं, उनके त्रिविध ताप शांत हो जाते हैं। फिर न कोई दुख का कारण है, न सुख का ;क्योंकि हम अपनी मंजिल अपने साथ लेकर चलते हैं।हमें ऐसा कुछ भी नहीं मिलता, जो हमें सदा से मिला

हुआ ही नहीं है।अर्थ तो केवल वे ही जान पाते हैं , जो शब्द को जानते हैं। लेकिन अभिप्राय केवल वे ही जानते हैं , जो निःशब्द को जान लेते हैं।वास्तव में, अर्थ और अभिप्राय में फर्क होता है;अर्थ प्रगट बात है, और

अभिप्राय गुप्त।अर्थ शरीर है, तो अभिप्राय आत्मा। अर्थ तो बुद्धि से भी समझा जा सकता है,लेकिन अभिप्राय सिर्फ हृदय से।

6-इस सूत्र का अभिप्राय/ इशारा है कि जीवन अतर्क्य/ Illogical है।सूत्र कहता है, पूर्ण से पूर्ण निकलता है।तो पहली बात पूर्ण से पूर्ण निकलेगा कैसे ..क्योंकि पूर्ण के बाहर कोई जगह भी नहीं होती, जिसमें पूर्ण निकल आए। पूर्ण का मतलब ही है एब्लोल्युट, जिसके पार कुछ भी नहीं है। अगर कुछ भी हो, तो इसके भीतर उतना तो अपूर्ण हो जाएगा । पूर्ण के बाहर जगह,आकाश /Space कुछ भी नहीं होता। तो पूर्ण के बाहर पूर्ण निकलने की कोई भी सुविधा नहीं है।

7-लेकिन यह सूत्र और एक अतर्क्य बात कह