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भगवान श्रीकृष्ण ,श्री राम की कुंडली और लंकापति रावण की कुंडली का विश्लेषण


भगवान श्रीकृष्ण की कुंडली;-

13 FACTS;-

1-सूरदासजी के पद में भगवान श्रीकृष्ण की कुण्‍डली और फलादेश;- वल्‍लभाचार्य के शिष्‍यों की कथाओं के संकलन के रूप में ब्रज भाषा में रचित पुस्‍तक चौरासी वैष्‍णवों की वार्ता में सूरदासजी के एक पद्य को शामिल किया गया है। इस पद में सूरदासजी ने भगवान श्रीकृष्‍ण के जीवनवृत को उनकी जन्‍मकुण्‍डली के आधार पर बहुत खूबसूरती से उकेरा है। यह इस प्रकार है… नन्‍दजू मेरे मन आनन्‍द भयो, मैं सुनि मथुराते आयो, लगन सोधि ज्‍योतिष को गिनी करि, चाहत तुम्‍हहि सुनायो। सम्‍बत्‍सर ईश्‍वर को भादों, नाम जु कृष्‍ण धरयो है, रोहिणी, बुध, आठै अंधियारी, हर्षन जो परयो है। वृष है लग्‍न, उच्‍च के उडुपति, तनको अति सुखकारी, दल चतुरंग चलै संग इनके, व्हैहैं रसिकबिहारी। चौथी रासि सिंह के दिनमनि, महिमण्‍डल को जीतैं, करिहैं नास कंस मातुल को, निहचै कछु दिन बीतै। पंचम बुध कन्‍या के सोभित, पुत्र बढैंगे सोई, छठएं सुक्र तुला के सुनिजुत, सत्रु बचै नहिं कोई। नीच-ऊंच जुवती बहुत भोगैं, सप्‍तम राहू परयो है, केतू मुरति में श्‍याम बरन, चोरी में चित्त धरयो है। भाग्‍य भवन में मकर महीसुत, अति ऐश्‍वर्य बढैगो, द्विज, गुरुजन को भक्‍त होइकै, कामिनी चित्त हरैगो। नवनिधि जाके नाभि बसत है, मीन बृहस्‍पति केरी, पृथ्‍वी भार उतारे निहचै, यह मानो तुम मेरी। तब ही नन्‍द महर आनन्‍दे, गर्ग पूजि पहरायो, असन, बसन, गज बाजि, धेनु, धन, भूरि भण्‍डार लुटायो। बंदीजन द्वारै जस गावै, जो जांच्‍यो सो पायो, ब्रज में कृष्‍ण जन्‍म को उत्‍सव, सूर बिमल जस गायो। 3-इसमें सूरदासजी ने न केवल ज्‍योतिषीय गणनाएं स्‍पष्‍ट कर दी हैं बल्कि उनके फलादेश भी साथ ही साथ देकर भगवान श्रीकृष्‍ण का जीवनवृत्‍त सजीव कर दिया है। ईश्‍वर संवत्‍सर के भाद्रपद मास के कृष्‍ण पक्ष की अष्‍टमी को, रोहिणी नक्षत्र में नन्‍द बाबा के घर भगवान कृष्‍ण का अवतरण हो रहा है। इस समय हर्ष योग बन रहा है।

4-वृषभ लग्‍न है, लग्‍न में उच्‍च का चंद्रमा मौजूद है, चौथे भाव में सिंह राशि का सूर्य, पंचम में कन्‍या का बुध, छठे भाव में तुला का शुक्र शनि के साथ, सप्‍तम में राहू, लग्‍न में चंद्रमा के साथ केतू, भाग्‍य भाव में उच्‍च का मंगल, मीन का बृहस्‍पति है। इस पद में बस यही स्‍पष्‍ट नहीं हो रहा है कि रोहिणी नक्षत्र के कौनसे चरण में श्रीकृष्‍ण अवतरित हो रहे हैं। अन्‍यथा दशाक्रम भी बहुत अधिक सटीक उभरकर आ जाता। मोटे तौर पर हम मान सकते हैं कि भगवान कृष्‍ण की बाल्‍यावस्‍था चंद्रमा की दशा में, किशोरावस्‍था मंगल की महादशा में और युवावस्‍था राहू की महादशा में बीती होगी। इसके बाद गुरु, शनि और बुध की दशाओं के दौरान भगवान श्रीकृष्‍ण ने महाभारत के सूत्रधार की भूमिका निभाई होगी।

5-अब कुछ फलादेश ऐसे हैं जिनसे हम किसी भी सामान्‍य जातक की कुण्‍डली में लागू कर सकते हैं और आश्‍चर्यजनक परिणाम हासिल कर सकते हैं। इनमें सबसे पहला है चतुर्थ भाव में स्‍वराशि का सूर्य मातुल का नाश करता है। भगवान श्रीकृष्‍ण के छठे भाव में तुला राशि है। यह भाव मामा का भी है। ऐसे में तुला लग्‍न से मामा को देखा जाएगा। भावात भाव सिद्धांत से तुला के ग्‍यारहवें यानी सिंह राशि का अधिपति सूर्य मामा के लिए बाधकस्‍थानाधिपति की भूमिका निभाएगा। करीब 11 साल की उम्र में श्रीकृष्‍ण कंस का वध करते हैं। दशाओं का क्रम देखा जाए तो पहले करीब दस साल चंद्रमा के और उसके बाद छठे साल में मंगल की महादशा में सूर्य का अंतर आता है। यही अवधि होती है जब जातक के मामा का नाश होगा। यही सूरदासजी भी इंगित कर रहे हैं कि चतुर्थ भाव में स्‍वराशि का सूर्य मामा का नाश करवा रहा है।

6-दूसरा बड़ा संकेत पंचम भाव में उच्‍च के बुध की स्थिति है। सामान्‍यतया ज्‍योतिष में पंचम भाव को संतान का घर माना गया है और बुध को संतान का ग्रह। यहां उच्‍च का बुध होने के कारण श्रीकृष्‍ण को बहुत संतान होगी, ऐसा फल कहा गया है। ऐसे में यह फलादेश मान्‍य होगा कि पंचम भाव में उच्‍च का बुध अधिक संतान देता है।

7-छठे भाव के बारे में सूरदासजी कहते हैं यहां स्‍वराशि का शुक्र उच्‍च के शनि के साथ विराजमान है, ऐसे जातक के सभी शत्रुओं का नाश होता है। ज्‍योतिष के अनुसार शनि के पक्‍के घरों में छठा, आठवां और बारहवां माना गया है। छठे भाव का शनि बहुत ही शक्तिशाली और प्रबल शत्रु देता है, लेकिन यहां पर शुक्र स्थित होने से शत्रुओं का ह्रास होता है। कुण्‍डली के अनुसार जातक के बलशाली शत्रु होंगे और अंतत: वे समाप्‍त हो जाएंगे। श्रीकृष्‍ण अपने लीला के अधिकांश हिस्‍से में शत्रुओं से लगातार घिरे रहते हैं। चाहे जन्‍म से लेकर किशोरावस्‍था तक यदुवंशियों के सम्राट की शत्रुता हो या बा