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भगवान श्रीकृष्ण ,श्री राम की कुंडली और लंकापति रावण की कुंडली का विश्लेषण


भगवान श्रीकृष्ण की कुंडली;-

13 FACTS;-

1-सूरदासजी के पद में भगवान श्रीकृष्ण की कुण्‍डली और फलादेश;- वल्‍लभाचार्य के शिष्‍यों की कथाओं के संकलन के रूप में ब्रज भाषा में रचित पुस्‍तक चौरासी वैष्‍णवों की वार्ता में सूरदासजी के एक पद्य को शामिल किया गया है। इस पद में सूरदासजी ने भगवान श्रीकृष्‍ण के जीवनवृत को उनकी जन्‍मकुण्‍डली के आधार पर बहुत खूबसूरती से उकेरा है। यह इस प्रकार है… नन्‍दजू मेरे मन आनन्‍द भयो, मैं सुनि मथुराते आयो, लगन सोधि ज्‍योतिष को गिनी करि, चाहत तुम्‍हहि सुनायो। सम्‍बत्‍सर ईश्‍वर को भादों, नाम जु कृष्‍ण धरयो है, रोहिणी, बुध, आठै अंधियारी, हर्षन जो परयो है। वृष है लग्‍न, उच्‍च के उडुपति, तनको अति सुखकारी, दल चतुरंग चलै संग इनके, व्हैहैं रसिकबिहारी। चौथी रासि सिंह के दिनमनि, महिमण्‍डल को जीतैं, करिहैं नास कंस मातुल को, निहचै कछु दिन बीतै। पंचम बुध कन्‍या के सोभित, पुत्र बढैंगे सोई, छठएं सुक्र तुला के सुनिजुत, सत्रु बचै नहिं कोई। नीच-ऊंच जुवती बहुत भोगैं, सप्‍तम राहू परयो है, केतू मुरति में श्‍याम बरन, चोरी में चित्त धरयो है। भाग्‍य भवन में मकर महीसुत, अति ऐश्‍वर्य बढैगो, द्विज, गुरुजन को भक्‍त होइकै, कामिनी चित्त हरैगो। नवनिधि जाके नाभि बसत है, मीन बृहस्‍पति केरी, पृथ्‍वी भार उतारे निहचै, यह मानो तुम मेरी। तब ही नन्‍द महर आनन्‍दे, गर्ग पूजि पहरायो, असन, बसन, गज बाजि, धेनु, धन, भूरि भण्‍डार लुटायो। बंदीजन द्वारै जस गावै, जो जांच्‍यो सो पायो, ब्रज में कृष्‍ण जन्‍म को उत्‍सव, सूर बिमल जस गायो। 3-इसमें सूरदासजी ने न केवल ज्‍योतिषीय गणनाएं स्‍पष्‍ट कर दी हैं बल्कि उनके फलादेश भी साथ ही साथ देकर भगवान श्रीकृष्‍ण का जीवनवृत्‍त सजीव कर दिया है। ईश्‍वर संवत्‍सर के भाद्रपद मास के कृष्‍ण पक्ष की अष्‍टमी को, रोहिणी नक्षत्र में नन्‍द बाबा के घर भगवान कृष्‍ण का अवतरण हो रहा है। इस समय हर्ष योग बन रहा है।

4-वृषभ लग्‍न है, लग्‍न में उच्‍च का चंद्रमा मौजूद है, चौथे भाव में सिंह राशि का सूर्य, पंचम में कन्‍या का बुध, छठे भाव में तुला का शुक्र शनि के साथ, सप्‍तम में राहू, लग्‍न में चंद्रमा के साथ केतू, भाग्‍य भाव में उच्‍च का मंगल, मीन का बृहस्‍पति है। इस पद में बस यही स्‍पष्‍ट नहीं हो रहा है कि रोहिणी नक्षत्र के कौनसे चरण में श्रीकृष्‍ण अवतरित हो रहे हैं। अन्‍यथा दशाक्रम भी बहुत अधिक सटीक उभरकर आ जाता। मोटे तौर पर हम मान सकते हैं कि भगवान कृष्‍ण की बाल्‍यावस्‍था चंद्रमा की दशा में, किशोरावस्‍था मंगल की महादशा में और युवावस्‍था राहू की महादशा में बीती होगी। इसके बाद गुरु, शनि और बुध की दशाओं के दौरान भगवान श्रीकृष्‍ण ने महाभारत के सूत्रधार की भूमिका निभाई होगी।

5-अब कुछ फलादेश ऐसे हैं जिनसे हम किसी भी सामान्‍य जातक की कुण्‍डली में लागू कर सकते हैं और आश्‍चर्यजनक परिणाम हासिल कर सकते हैं। इनमें सबसे पहला है चतुर्थ भाव में स्‍वराशि का सूर्य मातुल का नाश करता है। भगवान श्रीकृष्‍ण के छठे भाव में तुला राशि है। यह भाव मामा का भी है। ऐसे में तुला लग्‍न से मामा को देखा जाएगा। भावात भाव सिद्धांत से तुला के ग्‍यारहवें यानी सिंह राशि का अधिपति सूर्य मामा के लिए बाधकस्‍थानाधिपति की भूमिका निभाएगा। करीब 11 साल की उम्र में श्रीकृष्‍ण कंस का वध करते हैं। दशाओं का क्रम देखा जाए तो पहले करीब दस साल चंद्रमा के और उसके बाद छठे साल में मंगल की महादशा में सूर्य का अंतर आता है। यही अवधि होती है जब जातक के मामा का नाश होगा। यही सूरदासजी भी इंगित कर रहे हैं कि चतुर्थ भाव में स्‍वराशि का सूर्य मामा का नाश करवा रहा है।

6-दूसरा बड़ा संकेत पंचम भाव में उच्‍च के बुध की स्थिति है। सामान्‍यतया ज्‍योतिष में पंचम भाव को संतान का घर माना गया है और बुध को संतान का ग्रह। यहां उच्‍च का बुध होने के कारण श्रीकृष्‍ण को बहुत संतान होगी, ऐसा फल कहा गया है। ऐसे में यह फलादेश मान्‍य होगा कि पंचम भाव में उच्‍च का बुध अधिक संतान देता है।

7-छठे भाव के बारे में सूरदासजी कहते हैं यहां स्‍वराशि का शुक्र उच्‍च के शनि के साथ विराजमान है, ऐसे जातक के सभी शत्रुओं का नाश होता है। ज्‍योतिष के अनुसार शनि के पक्‍के घरों में छठा, आठवां और बारहवां माना गया है। छठे भाव का शनि बहुत ही शक्तिशाली और प्रबल शत्रु देता है, लेकिन यहां पर शुक्र स्थित होने से शत्रुओं का ह्रास होता है। कुण्‍डली के अनुसार जातक के बलशाली शत्रु होंगे और अंतत: वे समाप्‍त हो जाएंगे। श्रीकृष्‍ण अपने लीला के अधिकांश हिस्‍से में शत्रुओं से लगातार घिरे रहते हैं। चाहे जन्‍म से लेकर किशोरावस्‍था तक यदुवंशियों के सम्राट की शत्रुता हो या बाद में महाभारत में पाण्‍डुपुत्रों के सहायक होने के कारण पाण्‍डुओं के सभी शत्रुओं से शत्रुता हो। एक के बाद एक प्रबल शत्रु उभरता रहा और श्रीकृष्‍ण उनका शमन करते गए।

8-कोई भक्‍त अपने ईष्‍ट के केवल गुणों का ही वर्णन कर सकता है, लेकिन वही भक्‍त जब ज्‍योतिषीय विश्‍लेषण के स्‍तर पर आता है तो ईष्‍ट के साथ भी कोई नरमी बरतता दिखाई नहीं देता है। सूरदासजी अपने पद में कह रहे हैं कि सप्‍तम भाव में राहू होने के कारण गोपाल का ऊंच नीच हर प्रकार की स्त्रियों से संबंध रहा। ज्‍योतिष के अनुसार सप्‍तम भाव में पाप ग्रह बैठा होने पर जातक के एक से अधिक संबंध बन सकते हैं, लेकिन यहां राहू होने के कारण गोपाल से संबंध करने वाली स्त्रियों का स्‍तर भी अनिश्चित ही था, कोई ऊंचे कुल की थी तो कोई नीचे कुल की, योगीराज ने सभी से एक समान प्रेम किया।

9-आगे सूरदासजी एक महत्‍वपूर्ण सूत्र छोड़ते हैं, उनके अनुसार लग्‍न में बैठा केतू श्रीकृष्‍ण का ध्‍यान चौर्य कर्म में लगाए रखता है। अब चितचोर के लिए यह बात तो सही है, लेकिन मेरा निजी अनुभव है कि लग्‍न में केतू होने पर जातक का रंग बहुत ही गोरा चिट्टा होता है। सामान्‍य तौर पर केतू लग्‍न के साथ जातक काला नहीं होता है। केतू कुजवत होता है, यानी मंगल का ही एक रूप होता है। लग्‍न का मंगल अथवा केतू रंग को काला किसी भी सूरत में नहीं करते हैं। यहां पद को बार बार पढ़ने पर पता चलता है कि सूरदासजी स्‍पष्‍ट कर रहे हैं कि केतू लग्‍न और रंग काला का संयोग बनने पर चितचोर का मन चोरी में लगा रहता है। ऐसे में हम यह धारणा बना सकते हैं कि अगर किसी जातक की कुण्‍डली में लग्‍न में केतू बैठा हो और जातक का रंग काला हो, तो जातक चौर्य कर्म में निपुण हो सकता है। हालांकि ऐसी स्थिति लाखों या करोड़ों में ही एकाध बार बनेगी, परंतु जहां बनेगी, वहां स्‍पष्‍ट होगा कि लग्‍न का केतू लिए काले रंग का जातक चोर हो सकता है।

11-सामान्‍य तौर पर माना जाता है कि क्रूर ग्रह केन्‍द्र में और सौम्‍य ग्रह त्रिकोण में शुभ होते हैं, लेकिन यहां सूरदासजी ज्‍योतिष की इस मान्‍यता का खण्‍डन करते हुए बता रहे हैं कि भाग्‍य भाव यानी नवम भाव में बैठा उच्‍च का मंगल श्रीकृष्‍ण को नौ निधि यानी हर प्रकार का सुख उपलब्‍ध करा रहा है। यह देखा भी गया है कि सामान्‍य तौर पर त्रिकोण में अशुभफल प्रदान करने वाले क्रूर ग्रह भी अपनी उच्‍च अथवा सहज अवस्‍था में होने पर शुभदायी परिणाम देने लगते हैं। 12-कृष्ण की जन्म तिथि : भाद्र कृष्ण अष्टमी की गणित करने पर श्री कृष्ण का जन्म काल 21 जुलाई, 3228 ईसा पूर्व प्राप्त होता है.......21 जुलाई, -3228......... इस तरह कृष्ण ने ईसा पूर्व 3228 में मथुरा में जन्म लिया था। भगवान श्रीकृष्ण ने विष्णु के 8वें अवतार के रूप में जन्म लिया था। 8वें मनु वैवस्वत के मन्वंतर के 28वें द्वापर में भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की रात्रि के जब 7 मुहूर्त निकल गए और 8वां उपस्थित हुआ तभी आधी रात के समय सबसे शुभ लग्न में देवकी के गर्भ से भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म लिया। उस लग्न पर केवल शुभ ग्रहों की दृष्टि थी। रोहिणी नक्षत्र तथा अष्टमी तिथि के संयोग से जयंती नामक योग में लगभग 3112 ईसा पूर्व (अर्थात आज जनवरी 2016 से 5128 वर्ष पूर्व) श्रीकृष्‍ण का जन्म हुआ। ज्योतिषियों के अनुसार रात 12 बजे उस वक्त शून्य काल था। 13-कृष्ण की कुण्डली बताती है कि इनका जन्म भाद्र मास कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में महानिशीथ काल में वृषभ लगन में हुआ था।उस समय बृषभ लग्न की कुंडली में लग्न में चन्द्र और केतु, चतुर्थ भाव में सूर्य, पंचम भाव में बुध एवं छठे भाव में शुक्र और शनि बैठे हैं।

जबकि सप्तम भाव में राहू, भाग्य स्थान में मंगल तथा ग्यारहवें यानी लाभ स्थान में गुरु बैठे हैं। कुंडली में राहु को छोड़ दें तो सभी ग्रह अपनी उच्च अवस्था में हैं। कुंडली देखने से ही लगता है कि यह किसी महामानव की

कुंडली है।ग्रहों की इन शुभ स्थितियों के कारण ही श्री कृष्ण ने अपनी अद्भुत शक्तियों का प्रदर्शन किया। ऐसी कुंडली बड़ी दुर्लभ मानी जाती है। इनकी कुंडली की तरह अगर किसी व्यक्ति की कुंडली हो तो वह भी बड़े कारनामे कर सकता है।

NOTE;-

भगवान श्रीकृष्‍ण की कुण्‍डली को मैं भी अपने स्‍तर पर एक विद्यार्थी की भांति देखता हूं तो ज्‍योतिष के कई सूत्र स्‍पष्‍ट होते हैं। पहला तो यह कि द्वितीय भाव निष्किलंक हो यानी किसी ग्रह की दृष्टि अथवा दुष्‍प्रभाव न हो और द्वितीयेश उच्‍च का हो तो जातक ऊंचे स्‍तर का वक्‍ता होता है। वृषभ लग्‍न में द्वितीयेश बुध उच्‍च का होकर पंचम भाव में बैठता है तो कृष्‍ण को ऐसा वक्‍ता बनाता है कि भरी सभा में जब कृष्‍ण बोल रहे हों तो कोई उनकी बात को काटता नहीं है। शिशुपाल जैसा मूर्ख अगर मूर्खतापूर्ण तरीके से टोकता भी है तो उसका वध भी निश्चित …आर्यभट्‍ट के अनुसार महाभारत युद्ध 3137 ईपू में हुआ। इस युद्ध के 35 वर्ष पश्चात भगवान कृष्ण ने देह छोड़ दी थी तभी से कलियुग का आरंभ माना जाता है। उनकी मृत्यु एक बहेलिए का तीर लगने से हुई थी। तब उनकी उम्र 119 वर्ष थी।

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श्री राम की कुंडली;-

07 FACTS;- 1- श्रीराम की कुंडली -वाल्मीकि रामायण के अनुसार श्रीराम का जन्म चैत्र शुक्ल नवमी तिथि एवं पुनर्वसु नक्षत्र में जब पांच ग्रह अपने उच्च स्थान में थे तब हुआ था। इस प्रकार सूर्य मेष में 10 डिग्री, मंगल मकर में 28 डिग्री, ब्रहस्पति कर्क में 5 डिग्री पर, शुक्र मीन में 27 डिग्री पर एवं शनि तुला राशि में 20 डिग्री पर था। (बाल कांड 18/श्लोक 8, 9)।

शोधकर्ता डॉ. वर्तक पीवी वर्तक के अनुसार ऐसी स्थिति 7323 ईसा पूर्व दिसंबर में ही निर्मित हुई थी, लेकिन प्रोफेसर तोबयस के अनुसार जन्म के ग्रहों के विन्यास के आधार पर श्रीराम का जन्म 7130 वर्ष पूर्व अर्थात 10 जनवरी 5114 ईसा पूर्व हुआ था। उनके अनुसार ऐसी आका‍शीय स्थिति तब भी बनी थी। तब 12 बजकर 25 मिनट पर आकाश में ऐसा ही दृष्य था जो कि वाल्मीकि रामायण में वर्णित है। 2-ज्यातादर शोधकर्ता प्रोफेसर के शोध से सहमत हैं। इसका मतलब यह कि राम का जन्म 10 जनवरी को 12 बजकर 25 मिनट पर 5114 ईसा पूर्व हुआ था। शोध संस्था आई सर्व के मुताबिक वाल्मीकि रामायण में जिक्र अनुसार श्रीराम के जन्म के वक्त ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति का सॉफ्टवेयर से मिलान करने पर जो दिन मिला, वो दिन है 10 जनवरी 5114 ईसा पूर्व। उस दिन दोपहर 12 बजे अयोध्या के आकाश पर सितारों की स्थिति वाल्मीकि रामायण और सॉफ्टवेयर दोनों में एक जैसी है। लिहाजा, रिसर्चर इस नतीजे पर पहुंचे कि रामलाला का जन्म 10 जनवरी 5114 ईसा पूर्व को हुआ।

3-गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस के अनुसार चैत्र शुक्ल की नवमी तिथि तथा पुनर्वसु नक्षत्र के चतुर्थ चरण एवं कर्क लग्न में भगवान श्रीराम का जन्म हुआ। गुरु और चन्द्र लग्न में हैं। पाँच ग्रह- शनि, मंगल, गुरु, शुक्र तथा सूर्य अपनी-अपनी उच्च राशि में स्थित हैं। गुरु कर्क राशि में उच्च का होता है। गुरु लग्न में चन्द्र के साथ स्थित है जिससे प्रबल कीर्ति देने वाला गजकेसरी योग बनता है। लेकिन शनि चतुर्थ भाव में अपनी उच्च राशि तुला में स्थित होकर लग्न को पूर्ण दृष्टि से देख रहा है।

4-मंगल सप्तम भाव में अपनी उच्च राशि मकर में स्थित होकर लग्न को पूर्ण दृष्टि से देख रहा है। इस कुंडली में दो सौम्य ग्रहों- गुरु एवं चन्द्र को दो पाप ग्रह शनि एवं मंगल अपनी-अपनी उच्च राशि में स्थित होकर देख रहे हैं। ऐसी स्थिति में प्रबल राजभंग योग बनता है। फलस्वरूप श्रीराम के राज्याभिषेक से लेकर जीवनपर्यंत सभी कार्यों में बाधाएँ पैदा होती रहीं। जिस समय श्रीराम का राज्याभिषेक होने जा रहा था, उस समय शनि महादशा में मंगल का अंतर चल रहा था। 5-श्रीरामजी मंगली थे। सप्तम (पत्नी) भाव में मंगल है। राहु अगर 3, 6 या 11वें भाव में स्थित हो तो अरिष्टों का शमन करता है। ग्रह स्थितियों के प्रभाववश श्रीराम को दाम्पत्य, मातृ, पितृ एवं भौतिक सुखों की प्राप्ति नहीं हो सकी।इस तरह शनि एवं मंगल ने श्रीराम को अनेक संघर्षों के लिए विवश किया। राहु अगर 3, 6 या 11वें भाव में स्थित हो तो अरिष्टों का शमन करता है। इन ग्रह स्थितियों के प्रभाववश श्रीराम को दाम्पत्य, मातृ, पितृ एवं भौतिक सुखों की प्राप्ति नहीं हो सकी। यद्यपि दशम भाव में उच्च राशि मेष में स्थित सूर्य ने श्रीराम को एक ऐसे सुयोग्य शासक के रूप में प्रतिष्ठित किया कि उनके अच्छे शासनकाल रामराज्य की आज भी दुहाई दी जाती है।

6-पौराणिक आख्यानों के अनुसार रामराज्य ग्यारह हजार वर्ष तक चला। राम का जन्म लगभग 1 करोड़ 25 लाख 58 हजार 98 वर्ष पूर्व हुआ था।

श्रीराम की कुंडली का विवेचन करने से यह तो पता चला कि किन-किन ग्रहों के कारण उनको भौतिक सुखों की प्राप्ति नहीं हुई। लेकिन हमें स्मरण रखना चाहिए कि श्रीराम ने त्याग और संघर्ष जैसे कष्टमय मार्ग पर चलकर स्वयं को मर्यादा पुरुषोत्तम के स्वरूप में प्रस्तुत किया। सत्य के मार्ग पर हमेशा चलते रहे, अनेक कष्ट सहे मगर फिर भी लोक कल्याण के लक्ष्य से डिगे नहीं, हरदम आगे बढ़ते रहे। इसका कारण लग्न में गुरु एवं चन्द्र की युति का होना है। 7-वनगमन तिथि :- वाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड (2/4/18) के अनुसार दशरथ भगवान श्रीराम का राज्याभिषेक करना चाहते थे क्योंकि उस समय उनका नक्षत्र सूर्य, मंगल और राहु से घिरा हुआ था। ज्योतिषियों के अनुसार ऐसी खगोलीय स्थिति में या तो राजा मारा जाता हैं या वह किसी षड़यंत्र का शिकार हो जाता है। राजा दशरथ मीन राशि के थे और उनका नक्षत्र रेवती था। ये सभी तथ्य कम्प्यूटर में डाले गए तो पाया कि 5 जनवरी वर्ष 5089 ईसा पूर्व अर्थात आज (2016) से 7105 वर्ष पूर्व सूर्य, मंगल और राहु तीनों मीन राशि के रेवती नक्षत्र पर स्थित थे। यह सर्वविदित है कि राजतिलक वाले दिन ही श्रीराम को वनवास जाना पड़ा था। इसी प्रकार यह वही दिन था जब श्रीराम को अयोध्या छोड़कर 14 वर्ष के लिए वन में जाना पड़ा था। इस हिसाब से उस समय श्रीराम की आयु 25 वर्ष (5114-5089) थी।

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04 FACTS;- 1-रावण की कुंडली में लग्न में सूर्य बैठा हुआ है. ज्योतिष में सूर्य को ग्रहों का राजा माना जाता है. लग्न में सूर्य अपनी स्वराशि में होने से उसकी स्थिति और मजबूत है. ऐसे लोग राजा के समान जीवन जीते हैं और इनका अत्मविश्वास बहुत प्रबल होता है. लेकिन लग्न में बैठे सूर्य पर मंगल की दृष्टि होने के कारण व्यक्ति के अंदर अहंकार पैदा होता है और आगे चलकर परेशानी का कारण बन सकता है. और यही रावण के साथ हुआ उसका अहंकार उसके अंत का कारण बना. 2-रावण की कुंडली में दूसरे भाव में बुद्ध अपनी खुद की राशि में बैठा हुआ है. दूसरा भाव धन भाव माना जाता है. उसका स्वामी खुद वही बैठा है साथ ही बुध ग्यारवें भाव का स्वामी भी है जिसे ज्योतिष में लाभ स्थान कहा जाता है. यानि धनेश और लाभेश बुध के होने से रावण के पास खूब धन होना ही था. और हम सब जानते हैं की रावण के पास सोने की लंका थी. 3-रावण की कुंडली में गुरु ग्रह की एक राशि आठवें घर में यानि आठवें घर का स्वामी गुरु अपने घर से छठे स्थान लग्न में बैठा हुआ है. शनि पांचवें घर, नवें घर और बारवें घर में बैठे चंद्रमा को देख रहा है. चंद्रमा बारवें घर में यानि व्यय स्थान में बैठा है. ज्योतिष में चंद्रमा को स्त्री का प्रतीक माना जाता है. और स्त्री या यानि सीता जी के कारण राम और रावण का युद्ध हुआ. छठे घर को शत्रु का घर भी माना जाता है जहां मंगल उच्च का बैठा हुआ. ये ग्रहों का समीकरण रावण के विनाश का कारण बना. कुंडली के बारह भावों में कौन सा ग्रह कहां बैठा और क्या रोल अदा कर सकता है, ये हम सब श्रीराम और रावण की कुंडली से समझ सकते हैं. 4-इन सब के अलावा श्रीराम और रावण में कुछ और समानताएं थी. राम और रावण का नाम 'रा' अक्षर से शुरु होता है. रा अक्षर का संबंध चित्रा नक्षत्र से है. ऐसे लोग संवेदनशील होते हैं. राम और रावण दोनों संवेदनशील थे. दोनों के जीवन में एक और समानता थी- दोनों शिव भक्त थे. श्री राम ने युद्ध से पहले शिवजी की पूजा की थी. रामेश्वरम इसका प्रमाण है. रावण भी बहुत बड़ा शिवभक्त था. रावण की वजह से ही भगवान शिव का एक ज्योतिर्लिंग देवघर में बाबा बैद्यनाथ के नाम से आज भी प्रसिद्ध है. दोनों कुंडली में समानता :-

07 FACTS;-

राम और रावण दोनों में कुछ बाते समान थी दोनों की कुंडली में कुछ ग्रहों की स्थिति समान थी. जिसके कारण दोनों ही महाविद्वान और शिव के निकट थे. लेकिन कुछ ऐसी असमानता भी थी, जो एक को देवता तो दूसरे को दानव बना देती है. आइए राम और रावण कि कुंडली पर नजर डालते हैं. 1- श्री राम और रावण दोनों की कुडंली में लग्न में बृहस्पति यानि गुरु ग्रह बैठे हुए हैं, लग्न में बैठा गुरु ज्ञानवान और विद्वान बनाता है. ये गुण दोंनों में था. श्री राम और रावण दोनों ही ज्ञानी और विद्वान थे. 2- श्री राम और रावण दोनों की कुंडली में मंगल मकर राशि में बैठा हुआ है. ज्योतिष में मकर राशि में मंगल उच्च का माना जाता है और पराक्रम को बढ़ाने वाला और निडर बनाने वाला होता है. श्री राम और रावण दोनों ही पराक्रमी थे. 3- श्रीराम और रावण दोनों की कुंडली में शनि तुला राशि में है. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार तुला में शनि उच्च का माना जाता है. 4- श्रीराम के कुंडली में चंद्रमा कर्क राशि में है और रावण की कुंडली में भी चंद्रमा कर्क राशि में है, कर्क राशि चंद्रमा की स्वयं की राशि मानी जाती है. श्री राम और रावण की कुंडली में इतनी समानता होने के बाद भी दोनों में शत्रुता हुई. और अंत में भगवान राम ने रावण का वध किया. 5-चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी त‌िथ‌ि में अभ‌िज‌ित मुहूर्त में भगवान श्री राम का जन्म हुआ। इस आधार पर भगवान राम की जो कुंडली बनती है उसके अनुसार भगवान राम का जन्मलग्न कर्क आता है। 6-भगवान श्री राम की कर्क लग्न की कुंडली है लग्न का स्वामी चंद्रमा अपने ही घर में बैठा हुआ है, ये स्थिति व्यक्ति को न्यायप्रिय और क्षमाशील बनाती है. लग्न में चंद्रमा के साथ बृहस्पति यानि गुरु भी बैठे हुए हैं. कर्क में बृहस्पति को उच्च का माना जाता है. उच्च का गुरु व्यक्ति को भावुक और विद्वान और साधु स्वभाव प्रदान करता है. ऐसे लोग मर्यादित जीवन जीना पसंद करते हैं. भगवान राम में भी ऐसे गुण थे. 7-भगवान राम की कुंडली में सातवें घर में मंगल उच्च का है. सातवें घर का संबंध जीवनसाथी यानि पत्नी से भी होता है. ज्योतिष में सातवें घर का कारक शुक्र को माना जाता है. श्री राम की कुंडली में सातवें घर का कारक शुक्र है, जिस पर राहु की दृष्टि है और केतू साथ बैठा हुआ है. और सातवें घर में मंगल है. इन दोनों के प्रभाव की वजह से माता सीता से श्री राम को अलग होना पड़ा और वियोग भरा जीवन जीना पड़ा.

...SHIVOHAM..