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क्या हैं तत्व दर्शन?क्या भूतशुद्धि... एक बुनियादी साधना है?PART-02

CONTD...

क्या है पंच तत्व?-

04 FACTS;-

1-मानव शरीर पांच तत्वों से बना होता है; मिट्टी, पानी, अग्नि, वायु और शून्य। इन्हें पंच महाभूत या पंच तत्व भी कहा जाता है। ये सभी तत्व शरीर के सात प्रमुख चक्रों में बंटे हैं। सात चक्र और पांच तत्वों का संतुलन ही हमारे तन व मन को स्वस्थ रखता है।

2-यदि चेहरे पर धूमिलता छाई हो, आकर्षण क्षमता की कमी हो गयी हो, मोटापा या दुबलापन आ गया हो,ऑफिस में परिस्थितियां अनुकूल नहीं रह रही हो,पति या प्रेमी,प्रेमिका या पत्नी से सम्बन्ध ठीक नहीं रह पा रहे हो तो इसका सीधा अर्थ होता है की अग्नि तत्व न्यून हो गया है.. क्यूंकि समस्त आकर्षण का आधार है अग्नि तत्व। यदि घर में धन नहीं रुक रहा हो,काम बिगड रहे हो,खून पतला हो गया हो ,गर्भ नहीं ठहर रहा हो तो ,ये सभी विकृतियाँ जल तत्व से सम्बंधित होती हैं। इस प्रकार जीवन की सभी स्थिति के लिए इन तत्वों की विकृति ही उत्तरदायी है।

3-भूत अर्थात् जिसकी सत्ता हो या जो विद्यमान रहता हो, उसे भूत कहते हैं।महान् भूतों को

महाभूत कहते हैं ।भूत किसी के कार्य नहीं होते- अर्थात् किसी से उत्पन्न नहीं होते, अपितु

महाभूतों के ये उपादान कारण होते हैं ।किन्तु पंचभूत स्वयं किसी से उत्पन्न नहीं होते,

इसलिए ये नित्य हैं ।महाभूत संसार के सभी चल-अचल वस्तुओं में व्याप्त है, अतः

इन्हें महाभूत कहते हैं ।इस पृथ्वी के समस्त जीवों का शरीर और निजीर्व सभी पदार्थ पंच महाभूतों द्वारा निमिर्त हैं ।

4-यह हमारी सृष्टि भूतों का समुदाय है।पृथ्वी में गति वायु से तथा अवयवों का मेल एवं संगठन जल से और उष्णता अग्नि से आई है। पृथ्वी अंतिम तत्त्व है, अर्थात् उससे किसी नये तत्त्व की उत्पत्ति नहीं होती है ।यह समस्त विश्व पञ्चमहाभूतों की ही खेल है । इन पञ्चमहाभूतों का जो इन्द्रियग्राह्य विषय नहीं है, वही तन्मात्रा महाभूत है और जो इन्द्रियग्राह्य है वे ही भूत है । आत्मा, आकाश अव्यक्त तत्व है और शेष व्यक्त तत्त्व है ।

पञ्चमहाभूतों की उत्पत्ति और मानव जीवन पर प्रभाव ;-

11 FACTS;-

1-सृष्टि का प्रारंभिक विकास क्रम यह है कि यह परमाणुओं में प्रारंभ होती है।ईश्वर जगत् का साक्षी है जिसके सन्निधान मात्र से प्रकृति संसार की रचना में प्रवृत्त होती है। स्वतंत्र अवस्था में रहने के लिये परमाणु द्रव्य का अंतिम अवयव है तथा परमाणु नित्य हैं। उस एक परम तत्व से सत्व, रज और तम की उत्पत्ति हुई। यही इलेक्ट्रॉन, न्यूट्रॉन और प्रोटॉन्स का आधार हैं। इन्हीं से प्रकृति का जन्म हुआ।प्रकृति का पुरुष से सम्पर्क होता है तो उससे सवर्प्रथम महत्तत्त्व या महान् की उत्पत्ति होती है- महत् से अहंकार।प्रकृति से महत्, महत् से अहंकार, अहंकार से मन और इंद्रियां तथा पांच तन्मात्रा और पंच महाभूतों का जन्म हुआ।

2-पृथ्वी, जल, तेज, वायु परमाणुओं के संयोग से बने हैं। सर्वप्रथम इन्हीं परमाणुओं से क्रिया होती है और दो परमाणुओं के संयोग से द्वयणुक उत्पन्न होते हैं। ऐसे ही तीन द्वयणुकों के संयोग से त्रयणुक बनता है, तत्पश्चात् चतुरणुक आदि क्रम से महती पृथ्वी, महत् आकाश, महत् तेज तथा महत् वायु उत्पन्न होता है।महत्त्व या स्थूलत्व आ जाने के कारण ही इनको महाभूत कहते हैं।

3-वैशेषिक दर्शन के अनुसार प्रलय की स्थिति में जब परमात्मा को सृष्टि निर्माण की इच्छा हुई, तब आकाश महाभूत के दो परमाणुओं में परस्पर आकषर्ण के द्वारा संयोग होने लगा । द्वयणुक की रचना हुई तथा तीन द्वयणुक के मिलने से त्रसरेणुकी निर्मित हुई ।द्वयणुक तक गुणों में सूक्ष्मता तथा भूत में अव्यक्त अवस्था रहती है अथार्त स्थूल आँखों से नहीं दिखाई देता है।त्रसरेणु में यह भूत प्रत्यक्ष-योग्यता अथार्त स्थूल आँखों से दिखाई देने वाला हो जाता है।

4-पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार यह प्रकृति के आठ तत्व हैं। जब हम पृथ्वी कहते हैं तो सिर्फ हमारी पृथ्वी नहीं है।प्रकृति के इन्हीं रूपों में सत्व, रज और तम गुणों की साम्यता रहती है। प्रकृति के प्रत्येक कण में उक्त तीनों गुण होते हैं। यह साम्यवस्था भंग होती है तो महत् बनता है।

5-प्रकृति वह अणु है जिसे तोड़ा नहीं जा सकता, किंतु महत् जब टूटता है तो अहंकार का रूप धरता है। अहंकारों से ज्ञानेंद्रियां, कामेद्रियां और मन बनता है। अहंकारों से ही तन्मात्रा भी बनती है और उनसे ही पंचमहाभूत का निर्माण होता है।वास्तव में, महत् ही बुद्धि है। महत् में सत्व, रज और तम के संतुलन टूटने पर बुद्धि निर्मित होती है। महत् का एक अंश प्रत्येक पदार्थ या प्राणी में ‍बुद्धि का कार्य करता है।‍

6-चूँकि प्रकृति त्रिगुणात्मिका होती है अतः उससे उत्पन्न हुए महत् तत्व तथा अहंकार भी त्रिगुणात्मक होते हैं ।बुद्धि से अहंकार के तीन रूप पैदा होते हैं-

6-1-वैकारिक/ सात्विक अहंकार;-

पहला सात्विक अहंकार जिसे वैकारिक भी कहते हैं विज्ञान की भाषा में इसे न्यूट्रॉन कहा जा सकता है। यही पंच महाभूतों के जन्म का आधार माना जाता है। 6-2-तैजस अहंकार ;-

दूसरा तेजस अहंकार इससे तेज की उत्पत्ति हुई, जिसे वर्तमान भाषा में इलेक्ट्रॉन कह सकते हैं।तैजस अहंकार की सहायता से भूतादि अहंकार द्वारा पञ्च तन्मात्राएँ उत्पन्न होती है । 6-3-भूतादि अहंकार;-

तीसरा अहंकार भूतादि है। यह पंच महाभूतों (आकाश, आयु, अग्नि, जल और पृथ्वी) का पदार्थ रूप प्रस्तुत करता है। वर्तमान विज्ञान के अनुसार इसे प्रोटोन्स कह सकते हैं। इससे रासायनिक तत्वों के अणुओं का भार न्यूनाधिक होता है। अत: पंचमहाभूतों में पदार्थ तत्व इनके कारण ही माना जाता है।

7-सात्विक अहंकार और तेजस अहंकार के संयोग से मन और पांच इंद्रियां बनती हैं। तेजस और भूतादि अहंकार के संयोग से तन्मात्रा एवं पंच महाभूत बनते हैं। पूर्ण जड़ जगत प्रकृति के इन आठ रूपों में ही बनता है, किंतु आत्म-तत्व इससे पृथक है। इस आत्म तत्व की उपस्थिति मात्र से ही यह सारा प्रपंच होता है।

8-यह ब्रह्मांड अंडाकार है। यह ब्रह्मांड जल या बर्फ और उसके बादलों से घिरा हुआ है। इससे जल से भी दस ‍गुना ज्यादा यह अग्नि तत्व से ‍आच्छादित है और इससे भी दस गुना ज्यादा यह वायु से घिरा हुआ माना

गया है। वायु से दस गुना ज्यादा यह आकाश से घिरा हुआ है और यह आकाश जहां तक प्रकाशित होता है, वहां से यह दस गुना ज्यादा तामस अंधकार से घिरा हुआ है। और यह तामस अंधकार भी अपने से दस गुना ज्यादा महत् से घिरा हुआ है।

9-महत् उस एक असीमित, अपरिमेय और अनंत से घिरा है। उस अनंत से ही पूर्ण की उत्पत्ति होती है और उसी से उसका पालन होता है और अंतत: यह ब्रह्मांड उस अनंत में ही लीन हो जाता है। प्रकृति का ब्रह्म में लय (लीन) हो जाना ही प्रलय है। यह संपूर्ण ब्रह्मांड ही प्रकृति कही गई है। इसे ही शक्ति कहते हैं।

10-महाभूतों के गुण....

गंधत्व, द्रवत्व, उष्णत्व, चलत्व गुण क्रमशः पृथ्वी, जल, तेज (अग्नि) और वायु के होते हैं ।आकाश का गुण अप्रतिघात(रुकावट) होता है ।महाभूतों का सत्व, रज और तम से भी घनिष्ठ संबंध है ।शास्त्रों में उल्लेख मिलता है...

10-1-सत्व गुण की अधिकता वाला आकाश होता है ।

10-2-रजो गुण की अधिकता वाला वायु होता है ।

10-3-सत्व और रजोगुण की अधिकता वाला अग्नि महाभूत होता है ।

10-4-सत्व और तमोगुण की अधिकता वाला जल महाभूत होता है ।

10-5-तमोगुण की प्रधानता वाला पृथ्वी होती है ।

11-उपरोक्त विश्लेषण से यह निष्कर्ष निकलता है कि पंचतत्व मानव जीवन को अत्यधिक प्रभावित करते हैं।उनके बिना मानव तो क्या धरती पर रहने वाले किसी भी जीव के जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती है। इन पांच तत्वों का प्रभाव मानव के कर्म, प्रारब्ध, भाग्य तथा आचरण पर भी पूरा पड़ता है. जल यदि सुख प्रदान करता है तो संबंधों की ऊष्मा सुख को बढ़ाने का काम करती है और वायु शरीर में प्राण वायु बनकर घूमती है। आकाश महत्वाकांक्षा जगाता है तो पृथ्वी सहनशीलता व यथार्थ का पाठ सिखाती है।यदि देह में अग्नि तत्व बढ़ता है तो जल्की मात्रा बढ़ाने से उसे संतुलित किया जा सकता है।यदि वायु दोष है तो आकाश तत्व को बढ़ाने से यह संतुलित रहेगें।

पंच तत्वों के संतुलन के पाँच प्रकार के अभ्यास ;-

नीचे कुछ ऐसे अभ्यास बताये जाते हैं जिनको करते रहने से शरीर में तत्वों की जो कमी हो जाती है उसकी पूर्ति होती रह सकती है और मनुष्य अपने स्वास्थ्य को अच्छा बनाये रहते हुए दीर्घ जीवन प्राप्त कर सकता है।

1-पृथ्वी तत्व( Earth/Skin);-

04 POINTS;- 1-पृथ्वी का स्वामी ग्रह बुध है।इस तत्व का कारकत्व गंध है।इस तत्व के अधिकार क्षेत्र में हड्डी तथा माँस आता है।इस तत्व के अन्तर्गत आने वाली धातु वात, पित्त तथा कफ तीनों ही आती हैं।विद्वानों के मतानुसार पृथ्वी एक विशालकाय चुंबक है।इस चुंबक का दक्षिणी सिरा भौगोलिक उत्तरी ध्रुव में स्थित है।संभव है इसी कारण दिशा सूचक चुंबक का उत्तरी ध्रुव सदा उत्तर दिशा का ही संकेत देता है।पृथ्वी के इसी चुंबकीय गुण का उपयोग वास्तु शास्त्र में अधिक होता है।इस चुंबक का उपयोग वास्तु में भूमि पर दबाव के लिए किया जाता है।वास्तु शास्त्र में दक्षिण दिशा में भार बढ़ाने पर अधिक बल दिया जाता है।इसी कारण दक्षिण दिशा की ओर सिर करके सोना स्वास्थ्य के लिए अच्छा माना गया है।

2-पृथ्वी अथवा भूमि के पाँच गुण शब्द, स्पर्श, रुप, स्वाद तथा आकार माने गए हैं।आकार तथा भार के साथ गंध भी पृथ्वी का विशिष्ट गुण है क्योंकि इसका संबंध नासिका की घ्राण शक्ति से है। पृथ्वी तत्व में विषों को खींचने की अद्भुत शक्ति है।मिट्टी की टिकिया बाँध कर

फोड़े तथा अन्य अनेक रोग दूर किये जा सकते हैं। पृथ्वी में से एक प्रकार की गैस हर समय निकलती रहती है। इसको शरीर में आकर्षित करना बहुत लाभदायक है।प्रतिदिन प्रातःकाल

नंगे पैर टहलने से पैर और पृथ्वी का संयोग होता है। उससे पैरों के द्वारा शरीर के विष खिच कर जमीन में चले जाते हैं और ब्रह्ममुहूर्त में जो अनेक आश्चर्यजनक गुणों से युक्त वायु पृथ्वी में से निकलती है उसको शरीर सोख लेता है।

3-प्रातःकाल के सिवाय यह लाभ और किसी समय में प्राप्त नहीं हो सकता। अन्य समयों में तो पृथ्वी से हानिकारक वायु भी निकलती है जिससे बचने के लिए जूता आदि पहनने की

जरूरत होती है।प्रातःकाल नंगे पैर टहलने के लिए कोई स्वच्छ जगह तलाश करनी चाहिए। किसी बगीचे, पार्क, खेल या अन्य ऐसे ही साफ स्थान में प्रति दिन नंगे पाँवों कम से कम आधा घंटा नित्य टहलना चाहिए।हरी घास भी वहाँ हो तो और भी अच्छा।घास के ऊपर जमी हुई नमी पैरों को ठंडा करती है। वह ठंडक मस्तिष्क तक पहुँचती है। साथ ही यह भावना करते चलना चाहिए “पृथ्वी की जीवनी शक्ति को मैं पैरों द्वारा खींच कर अपने शरीर में भर रहा हूँ और मेरे शरीर के विषों को पृथ्वी खींच कर मुझे निर्मल बना रही है।” यह भावना जितनी ही बलवती होगी, उतना ही लाभ अधिक होगा।

4-हफ्ते में एक दो बार स्वच्छ भुरभुरी पीली मिट्टी या शुद्ध बालू लेकर उसे पानी से गीली करके शरीर पर साबुन को तरह मलना चाहिए। कुछ देर तक उस मिट्टी को शरीर पर लगा रहने देना चाहिए और बाद में स्वच्छ पानी से स्नान करके मिट्टी को पूरी तरह से छुड़ा देना चाहिए। इस मृतिका स्नान से शरीर के भीतरी और चमड़े के विष खिंच जाते हैं और त्वचा कोमल एवं चमकदार बन जाती है।

2-जल तत्व( Water-body);-

05 POINTS;- 1-चंद्र तथा शुक्र दोनों को ही जलतत्व ग्रह माना गया है।इसलिए जल तत्व के स्वामी ग्रह चंद्र तथा शुक्र दोनो ही हैं।इस तत्व का कारकत्व रस को माना गया है।यहाँ रस का अर्थ स्वाद से है। स्वाद या रस का संबंध हमारी जीभ से है।इन दोनों का अधिकार रुधिर अथवा रक्त पर माना गया है क्योंकि जल तरल होता है और रक्त भी तरल होता है।कफ धातु इस तत्व के अन्तर्गत आती है।

2-पृथ्वी पर मौजूद सभी प्रकार के जल स्त्रोत जल तत्व के अधीन आते हैं।जल के बिना जीवन संभ्हव नहीं है।जल तथा जल की तरंगों का उपयोग विद्युत ऊर्जा के उत्पादन में किया जाता है। हम यह भी भली-भाँति जानते हैं कि विश्व की सभी सभ्यताएँ नदियों के किनारे ही विकसित हुई हैं।जल के देवता वरुण तथा इन्द्र को माना गया है। मतान्तर से ब्रह्मा जी को भी जल का देवता माना गया है।मुरझाई हुई चीजें जल के द्वारा हरी हो जाती हैं। जल में बहुत बड़ी सजीवता है।

3-पौधे में पानी देकर हरा भरा रखा जाता है, इसी प्रकार शरीर को स्नान के द्वारा सजीव रखा जाता है। मैल साफ करना ही स्नान का उद्देश्य नहीं हैं वरन् जल में मिली हुई विद्युत शक्ति, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन आदि अमूल्य तत्वों द्वारा शरीर को सींचना भी है। इसलिए ताजे, स्वच्छ, सह्य ताप के जल से स्नान करना कभी न भूलना चाहिए। वैसे तो सवेरे का स्नान ही सर्वश्रेष्ठ है पर यदि सुविधा न हो तो दोपहर से पहले स्नान जरूर कर लेना चाहिए। मध्याह्न के बाद का स्नान लाभदायक नहीं होता। हाँ गर्मी के दिनों में संध्या को भी स्नान किया जा सकता है।

4-प्रातःकाल सोकर उठते ही वरुण देवता की उपासना करने का एक तरीका यह है कि कुल्ला करने के बाद स्वच्छ जल का एक गिलास पीया जाए। इसके बाद कुछ देर बिस्तर पर इधर उधर करवटें बदलनी चाहिए। इसके बाद शौच जाना चाहिए। इस उपासना का वरदान तुरन्त मिलता है। खुल कर शौच होता है और पेट साफ हो जाता है। यह ‘उषापान’ वरुण देवता की प्रत्यक्ष आराधना है।

5-जब भी आपको पानी पीने की आवश्यकता पड़े, दूध की तरह घूँट घूँट कर पानी पियें। चाहे कैसी ही प्यास लग रही हो एक दम गटापट न पी जाना चाहिए। हर एक घूँट के साथ यह भावना करते जाना चाहिए-”इस अमृत तुल्य जल में जो मधुरता और शक्ति भरी हुई है, उसे मैं खींच रहा हूँ।” इस भावना के साथ पिया हुआ पानी, दूध के समान गुणकारक होता है। पानी पीने में कंजूसी न करनी चाहिए। भोजन करते समय अधिक पानी न पियें इसका ध्यान रखते हुए अन्य किसी भी समय की प्यास को जल द्वारा समुचित रीति से पूरा करना चाहिए। व्रत के दिन तो खास तौर से कई बार काफी मात्रा में पानी पीना चाहिए।

3-अग्नि तत्व(Fire/Temperature );-

04 POINTS;- 1-सूर्य तथा मंगल अग्नि प्रधान ग्रह होने से अग्नि तत्व के स्वामी ग्रह माने गए हैं।अग्नि का कारकत्व रुप है।इसका अधिकार क्षेत्र जीवन शक्ति है। इस तत्व की धातु पित्त है। हम सभी जानते हैं कि सूर्य की अग्नि से ही धरती पर जीवन संभव है।यदि सूर्य नहीं होगा तो चारों ओर सिवाय अंधकार के कुछ नहीं होगा और मानव जीवन की तो कल्पना ही नहीं की जा सकती है।सूर्य पर जलने वाली अग्नि सभी ग्रहों को ऊर्जा तथा प्रकाश देती है।इसी अग्नि के प्रभाव से पृथ्वी पर रहने वाले जीवों के जीवन के अनुकूल परिस्थितियाँ बनती हैं।

2- रुप को अग्नि का गुण माना जाता है। रुप का संबंध नेत्रों से माना गया है। ऊर्जा का मुख्य स्त्रोत अग्नि तत्व है।सभी प्रकार की ऊर्जा चाहे वह सौर ऊर्जा हो या आणविक ऊर्जा हो या ऊष्मा ऊर्जा हो सभी का आधार अग्नि ही है।अग्नि के देवता सूर्य अथवा अग्नि को ही माना गया है।जीवन को बढ़ाने ओर विकसित करने का काम अग्नि तत्व का है जिसे गर्मी कहते हैं। गर्मी न हो तो कोई वनस्पति एवं जीव विकसित नहीं हो सकता। गर्मी के केन्द्र सूर्य उपासना और अग्नि उपासना एक ही बात है।

3-स्नान करके गीले शरीर से ही प्रातःकालीन सूर्य के दर्शन करने चाहिए और जल का अर्घ्य देना चाहिए। पानी में बिजली का बहुत जोर रहता है। बादलों के जल के कारण आकाश में बिजली चमकती है। इलेक्ट्रिसिटी के तारों में भी वर्षा ऋतु में बड़ी तेजी रहती है। पानी में बिजली की गर्मी को खींचने की विशेष शक्ति है। इसलिए शरीर को तौलिया से पोंछने के बाद नम शरीर से ही नंगे बदन सूर्य नारायण के सामने जाकर अर्घ्य देना चाहिए। यदि नदी, तालाब, नहर पास में हो कमर तक जल में खड़े होकर अर्घ्य देना चाहिए।

4-अर्घ्य लोटे से भी दिया जा सकता है और अंजलि से भी, जैसी सुविधा हो कर लेना चाहिए। सूर्य के दर्शन के पश्चात् नेत्र बन्द करके उनका ध्यान करना चाहिए और मन ही मन यह भावना दुहरानी चाहिए-”भगवान सूर्य नारायण का तेज मेरे शरीर में प्रवेश करके नस नस को दीप्तिमान सतेज और प्रफुल्लित कर रहे हैं और मेरे अंग प्रत्यंग में स्फूर्ति उत्पन्न हो रही है।” स्नान के बाद इस क्रिया को नित्य करना चाहिए।

4--वायु तत्व(Air/Oxygen ) ;-

07 POINTS;- 1-वायु तत्व के स्वामी ग्रह शनि हैं। इस तत्व का कारकत्व स्पर्श है।इसके अधिकार क्षेत्र में श्वांस क्रिया आती है।वात इस तत्व की धातु है।यह धरती चारों ओर से वायु से घिरी हुई है। वायु में मानव को जीवित रखने वाली आक्सीजन गैस मौजूद होती है।जीने और जलने के लिए आक्सीजन बहुत जरुरी है। इसके बिना मानव जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। यदि हमारे मस्तिष्क तक आक्सीजन पूरी तरह से नहीं पहुंच पाई तो हमारी बहुत सी कोशिकाएँ नष्ट हो सकती हैं।व्यक्ति अपंग अथवा बुद्धि से जड़ हो सकता है।

2-वायु का गुण हैं ..स्पर्श।स्पर्श का संबंध त्वचा से माना गया है।संवेदनशील नाड़ी तंत्र और मनुष्य की चेतना श्वांस प्रक्रिया से जुड़ी है और इसका आधार वायु है। वायु के देवता भगवान विष्णु माने गये हैं।उत्तम वायु का जितना स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है उतना भोजन का नहीं। डॉक्टर लोग क्षय आदि असाध्य रोगियों को पहाड़ों पर जाने की सलाह देते हैं क्योंकि वे समझते हैं कि बढ़िया दवाओं की अपेक्षा उत्तम वायु में अधिक पोषक तत्व मौजूद हैं।

3-शरीर को पोषण करने वाले तत्वों का थोड़ा भाग भोजन से प्राप्त होता है, अधिकाँश भाग की पूर्ति वायु द्वारा होती है। जो वस्तुएं स्थूल हैं वे सूक्ष्म रूप से वायु मंडल में भी भ्रमण करती रहती हैं। बीमार तथा योगी बहुत समय तक बिना खाये पिये भी जीवित रहते हैं। उनका स्थूल भोजन बन्द है तो भी वायु द्वारा बहुत सी खुराकें मिलती रहती हैं। यही कारण है कि वायु द्वारा प्राप्त होने वाले ऑक्सीजन आदि अनेक प्रकार के भोजन बन्द हो जाने पर मनुष्य की क्षण भर में मृत्यु हो जाती है। बिना वायु के जीवन संभव नहीं।

4-अनन्त आकाश में से वायु द्वारा प्राणप्रद तत्वों को खींचने के लिए भारत के तत्व दर्शी ऋषियों ने प्राणायाम की बहुमूल्य प्रणाली का निर्माण किया है। मोटी बुद्धि से देखने में प्राणायाम एक मामूली सी फेफड़ों की कसरत मालूम पड़ती है किन्तु सूक्ष्म दृष्टि से इस क्रिया द्वारा अनिर्वचनीय लाभ प्रतीत हुए हैं। प्राणायाम द्वारा अखिल आकाश में से अत्यन्त बहुमूल्य पोषक पदार्थों को खींचकर शरीर को पुष्ट बनाया जा सकता है।

5-स्नान करने के उपरान्त किसी एकान्त स्थान में जाइए। समतल भूमि पर आसन बिछा कर पद्मासन से बैठ जाइए। मेरुदंड बिलकुल सीधा रहे। नेत्रों को अधखुला रखिए। अब धीरे धीरे नाक द्वारा साँस खींचना आरम्भ कीजिए और दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ भावना कीजिए कि “विश्वव्यापी महान प्राण भण्डार में से मैं स्वास्थ्यदायक प्राणतत्व साँस के साथ खींच रहा हूँ और वह प्राण मेरे रक्त प्रवाह तथा समस्त नाड़ी तन्तुओं में प्रवाहित होता हुआ सूर्यचक्र में (आमाशय का वह स्थान जहाँ पसलियाँ और पेट मिलते हैं) इकट्ठा हो रहा है। इस भावना को ध्यान द्वारा चित्रवत् मूर्तिमान रूप से देखने का प्रयत्न करना चाहिए।

6-जब फेफड़ों को वायु से अच्छी तरह भर लो तो दस सैकिण्ड तक वायु को भीतर रोके रहो। रोकने के समय ऐसा ध्यान करना चाहिए कि “प्राणतत्व मेरे अंग प्रत्यंगों में पूरित हो रहा है।” अब वायु को नासिका द्वारा ही धीरे धीरे बाहर निकालो और निकालते समय ऐसा अनुभव करो कि “शरीर के सारे दोष, रोग और विष वायु के साथ साथ निकाल बाहर किये जा रहे हैं।”

7-उपरोक्त प्रकार से आरम्भ में दस प्राणायाम करने चाहिए फिर धीरे धीरे बढ़ाकर सुविधानुसार आधे घंटे तक कई बार इन प्राणायामों को किया जा सकता है। अभ्यास पूरा करने के उपरान्त आपको ऐसा अनुभव होगा कि रक्त की गति तीव्र हो गई है और सारे शरीर की नाड़ियों में एक प्रकार की स्फूर्ति, ताजगी और विद्युत शक्ति दौड़ रही है। इस प्राणायाम को कुछ दिन लगातार करने से अनेक शारीरिक और मानसिक लाभों का स्वयं अनुभव होगा।

4-आकाश तत्व ( Space/ Thought);-

06 POINTS;- 1-आकाश तत्व का स्वामी ग्रह गुरु है।आकाश एक ऎसा क्षेत्र है जिसका कोई सीमा नहीं है।पृथ्वी के साथ्-साथ समूचा ब्रह्मांड इस तत्व का कारकत्व शब्द है।इसके अधिकार क्षेत्र में आशा तथा उत्साह आदि आते हैं।वात तथा कफ इसकी धातु हैं।वास्तु शास्त्र में आकाश शब्द का अर्थ रिक्त स्थान माना गया है।आकाश का विशेष गुण “शब्द” है और इस शब्द का संबंध हमारे कानों से है।कानों से हम सुनते हैं और आकाश का स्वामी ग्रह गुरु है इसलिए ज्योतिष शास्त्र में भी श्रवण शक्ति का कारक गुरु को ही माना गया है।

2-शब्द जब हमारे कानों तक पहुंचते है तभी उनका कुछ अर्थ निकलता है।वेद तथा पुराणों में शब्द, अक्षर तथा नाद को ब्रह्म रुप माना गया है। वास्तव में आकाश में होने वाली गतिविधियों से गुरुत्वाकर्षण, प्रकाश, ऊष्मा, चुंबकीय़ क्षेत्र और प्रभाव तरंगों में परिवर्तन होता है।इस परिवर्तन का प्रभाव मानव जीवन पर भी पड़ता है। इसलिए आकाश कहें या अवकाश कहें या रिक्त स्थान कहें, हमें इसके महत्व को कभी नहीं भूलना चाहिए।आकाश का देवता भगवान शिवजी को माना गया है।

3-आकाश का अर्थ शून्य या पोल समझा जाता है। पर यह शून्य या पोल खाली स्थान नहीं है। ईथर तत्व (Ethar) हर जगह व्याप्त है। इस ईथर को ही आकाश कहते हैं। रेडियो /टी.वी. द्वारा ब्रॉडकास्ट किये हुए शब्द ईथर तत्व में लहरों के रूप में चारों ओर फैल जाते हैं और उन शब्दों को दूर दूर स्थानों में भी सुना जाता है। केवल शब्द ही नहीं विचार और विश्वास भी आकाश में (ईथर में) लहरों के रूप में बहते रहते हैं। जैसी ही हमारी मनोभूमि होती है उसी के अनुरूप विचार इकट्ठे होकर हमारे पास आ जाते हैं। हमारी मनोभूमि, रुचि, इच्छा जैसी होती हैं उसी के अनुसार आकाश में से विचार, प्रेरणा और प्रोत्साहन प्राप्त होते हैं।

4-सृष्टि के आदि से लेकर अब तक असंख्य प्राणियों द्वारा जो असंख्य प्रकार के विचार अब तक किये गये हैं वे नष्ट नहीं हुए वरन् अब तक मौजूद हैं, आकाश में उड़ते फिरते हैं। यह विचार अपने अनुरूप भूमि जहाँ देखते हैं वहीं सिमट सिमट कर इकट्ठे होने लगते हैं। कोई व्यक्ति बुरे विचार करता है तो उसी के अनुरूप असंख्य नई बातें उसे अपने आप सूझ पड़ती हैं, इसी प्रकार भले विचारों के बारे में भी है हम जैसी अपनी मनोभूमि बनाते हैं उसी के अनुरूप विचार और विश्वासों का समूह हमारे पास इकट्ठा हो जाता है और यह तो निश्चित ही है कि विचारो की प्रेरणा से ही कार्य होते हैं। जो जैसा सोचता है वह वैसे ही काम भी करने लगता है।

5-आकाश तत्व में से लाभदायक सद्विचारों को आकर्षित करने के लिए प्राणायाम के बाद का समय ठीक है। एकान्त स्थान में किसी नरम बिछाने पर चित्त होकर लेट जाओ, या दीवार का सहारा लेकर शरीर को बिलकुल ढीला कर दो। नेत्रों को बन्द करके अपने चारों ओर नीले आकाश का ध्यान करो। नीले रंग का ध्यान करना मन को बड़ी शान्ति प्रदान करता है।

जब नीले रंग का ध्यान ठीक हो जाए तब ऐसी भावना करनी चाहिए कि ‘निखिल नील आकाश में फैले हुए सद्विचार, सद्विश्वास, सत्प्रभाव चारों ओर से एकत्रित होकर मेरे शरीर में विद्युत किरणों की भाँति प्रवेश कर रहे हैं और उनके प्रभाव से मेरा अन्तःकरण दया, प्रेम, परोपकार, कर्तव्यपरायणता, सेवा, सदाचार, शान्ति, विनय, गंभीरता, प्रसन्नता, उत्साह, साहस, दृढ़ता, विवेक आदि सद्गुणों से भर रहा है।”

6-यह भावना खूब मजबूती और दिलचस्पी के साथ मनोयोग तथा श्रद्धा पूर्वक होनी चाहिए। जितनी ही एकाग्रता और श्रद्धा होगी उतना ही इससे लाभ होगा।आकाश तत्व की

इस साधना के फलस्वरूप अनेक सिद्ध, महात्मा, सत्पुरुष, अवतार तथा देवताओं की शक्तियाँ आकर अपने प्रभाव डालती हैं और मानसिक दुर्गुणों को दूर करके श्रेष्ठतम सद्भावनाओं का बीज जमाती हैं।

NOTE;-

उपरोक्त पाँच तत्वों की साधनाएं देखने में छोटी और सरल हैं तो भी इनका लाभ अत्यन्त विषद है। नित्य पाँचों तत्वों का जो साधन कर सकते हैं। वे इन सबको करें जो पाँचों को एक साथ न कर सकते हों वे एक -एक दो -दो करके किया करें। जिन्हें प्रतिदिन करने की सुविधा न हो वे सप्ताह में एक दो दिन के लिए भी अपना कार्यक्रम निश्चित रूप से चलाने का प्रयत्न करें। रविवार के दिन भी इन पाँचों साधनों को पूरा करते रहें तो भी बहुत लाभ होगा। नित्य प्रति नियमित रूप से अभ्यास करने वालों को तो शारीरिक और मानसिक लाभ इससे बहुत अधिक होता है।

क्या हैं तत्व दर्शन? --

1-जल तत्व;-

04 FACTS;- 1-जल तत्व की उत्पत्ति अग्नि तत्व के बाद मानी गयी है। जल हमारे जीवन में सबसे महत्वपूर्ण है। वायु और अग्नि तत्व मिल कर इस का निर्माण करते है। जहा हम भोजन के बिना महीनो जीवित रह सकते है तो पानी के बिना सिर्फ कुछ दिन ।चन्द्रमा की आकर्षण शक्ति से जल आवेशित हो कर सैकड़ो फुट ऊपर उठ जाता है। हमारे शरीर में भी जल की अधिकता है। तो सोचिये ये जल आवेशित हो कर हमें कितना प्रभावित करता होगा । जब हम तत्व के रूप में जल को जानने की कोसिस करते है तो हम पाते है की यही वो तत्व है जो की स्रष्टि के निर्माण के बाद जीवन की उत्पत्ति का कारण है। 2-जल तत्व की उत्त्पत्ति वायु और अग्नि से मानी गयी है। वायु के घर्षण से अग्नि उत्पन्न हुई और अग्नि ने वायु से जल का निर्माण किया ।इसे हम विज्ञानं के जरिये समझ सकते है... एक बीकर में हाईड्रोजन और एक बीकर में आक्सीजन ले कर उन्हें एक नली से जोड़े। अब हम जैसे ही बेक्ट्री के जरिये स्पार्क करेंगे हईड्रोजन के दो अणु आक्सीजन के एक अणु से मिल कर जल के एक अणु का निर्माण कर देते है। जल का निर्माण तब तक नही होता जब तक की अग्नि न हो। 3-इस तत्व को जानने वाला अपनी भूख और प्यास पर नियंत्रण पा लेता है।इस कारण ही हमारे ऋषियो को लम्बे समय तक ध्यान में रहने पर भी भूख और प्यास नही लगती थी। ये स्वयं पर विजय का प्रतीक है। . 4-1-रंग एव आकृति .. इस की आकृति अर्ध चाँद जैसी और रंग चांदी के समान माना गया है ध्यान में इसी आकृति और रंग का ध्यान करते है । 4-2-श्वास द्वारा पहचान - इस समय श्वास बारह अंगुल तक चल रही होती है।इस समय स्वर भीगा चल रहा होता है। 4-3-दर्पण विधि द्वारा पहचान - इस की आकृति अर्ध चाँद जैसी बनती है। 4-4-स्वाद द्वारा पहचान - जब यह स्वर चल रहा हो मुख का स्वाद कसैला प्रतीत होता है। 4-5-रंग द्वारा पहचान - इस का रंग ध्यान में चांदी जैसा प्रतीत होता है । 4-6-बीज मंत्र - वं 4-7-ध्यान विधि - सिद्धआसन में अर्ध चाँद जैसी आकृति को देखे.. जिस का रंग चांदी जैसा हो और बीज मंत्र ''वं ''का जप करे।

2-अग्नि तत्व;-

04 FACTS;- 1-हमारी सनातन या वैदिक संस्कृति यज्ञ संस्कृति रही है। हम सतयुग से ही अग्नि के उपासक रहे है ।अग्नि में सदैव ऊपर उठने का गुण होता है । यदि हम अपने वैदिक ध्वज पर ध्यान दे जो उस का रंग और और उस की आकृति अग्नि का प्रतीक है। हमारा तेज जिसे वैज्ञानिक भाषा में हम अपनी इलेक्ट्रो मैग्नटिक फिल्ड भी कहते है अग्नि तत्व पर निर्भर करता है। यह असीम ऊर्जा का स्रोत है। इसे हम शिव तत्व के नाम से भी जानते है। 2-किसी भी कार्य में चाहे वो अध्यात्मिक हो या सांसारिक.. हमें ऊर्जा की आवश्यकता होती है और स्थूल से सूक्ष्म ऊर्जा अधिक प्रभावी होती है। अग्नि तत्व न सिर्फ हमें प्रभावशली बनाता है ;अपितु हमारी अध्यात्मिक और सांसारिक उन्नति भी करता है । 3-वायु तत्व के बाद अग्नि की उत्त्पत्ति वायु के घर्षण से मानी जाती है। जितने भी भी तारे है वो सब वायु के गोले है और उनके घर्षण ( नाभिकीय संलयन या विखंडन ) से ही अग्नि की उत्पत्ति हुई। शरीर में दोनों कंधे अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व करते है। जव सूर्य स्वर ( दाहिना स्वर ) चल रहा हो और उस में अग्नि तत्व हो तो ;यह मंगल ग्रह का प्रतिनिधित्व करता है।जब चन्द्र स्वर चल रहा और अग्नि तत्व हो तो ;यह शुक्र ग्रह का प्रतिनिधित्व करता है।

4-1-पहचान ..श्वास द्वारा -- जब साँस 4 अंगुल तक चल रही तो तो अग्नि तत्व होता है । 4-2-पहचान..स्वाद द्वारा -- सूक्ष्म विश्लेषण करने पर मुख का स्वाद तीखा प्रतीत होता है। 4-3-पहचान..रंग द्वारा -- इस का रंग लाल होता है . ध्यान विधि द्वारा इसे हम जान सकते है। 4-4-दर्पण विधि द्वारा पहचान-- दर्पण विधि में में हम साँस का प्रवाह ऊपर की तरफ पाएंगे और आकृति त्रिकोण होगी।

4-5-आकृति -- इस की आकृति त्रिकोण होती है। 4-6-बीज मंत्र -- 'रं' 4-7-लाभ ..लाल रंगके प्रयोग से भूख बढती है ,प्यास लगती है । जिनको भूख न लगती हो तो इसका प्रयोग करे।ये प्राकृतिक प्रयोग है जो निश्चित ही लाभ प्रदान करता है। युद्ध में या अन्य साहसिक कार्य में सफलता दिलाता है।जब आप को कभी काफी जोर से क्रोध आये.. उस वक्त यदि आप गौर करेंगे; तो अग्नि तत्व ही चल रहा होगा। 4-8-प्रयोग -- अपने सिद्ध आसन में इसके बीज मंत्र 'रं' का जाप करते हुए.. ध्यान में एक त्रिकोण आकृति देखे ..जिसका रंग लाल हो ।

3-वायु तत्व;-

04 FACTS;-

1-सृष्टि निर्माण क्रम में space अर्थात आकाश तत्व के बाद वायु तत्व आया। ब्रह्माण्ड में जितने भी तारे है वो गैस के गोले है और उस के बाद ग्रह , उपग्रह आदि उन के टूटे हुए भाग है।जहां वायु के घर्षण से अग्नि उत्त्पन्न होती और तो वही जल भी वायु के एक निश्चित अनुपात में बना मिश्रण मात्र है।इस तत्व को साधना बेहद कठिन है।इस की महत्ता इस बात से ही समझ में आती है कि हमारा सूक्ष्म शरीर 5 प्रकार की वायु आपान , उदान, व्यान, समान और प्राण में और 10 प्रकार की उपवायु में वर्णित है। शरीर में नाभि में इस का स्थान माना जाता है। 2-इस तत्व की पहचान निम्न तरीको से कर सकते है ... श्वास द्वारा ;--

इस की पहचान हम अपनी श्वास द्वारा कर सकते है।यदि श्वास 8 अंगुल तक चल रही हो वायु तत्व चल रहा होता है। इस की लिए आप अपने सिर को सीधा रख कर अपनी श्वास की गति अपने हाथ से (हथेली के ठीक विपरीत ) महसूस करे ।

स्वाद द्वारा; --

सूक्ष्म अध्यन करने पर मुख का स्वाद खट्टा प्रतीत होता है।

दर्पण विधि द्वारा; --

यदि वायु तत्व चल रहा हो तो इस की गति तिरछी होती है। इस का आकार गोल होता है।

3- इस का रंग हरा या गहरा भूरा होता है। कुंडली जागरण में जो लाभ है उस की सम्पूर्ण लौकिक सिद्धियाँ इस तत्व में प्राप्त हो जाती है और इन का त्याग कर आकाश तत्व सिद्ध कर साधक परालौकिक शक्तिया प्राप्त कर लेता है।स्पष्ट है की बाकि के तीन तत्व तत्व भी इसी से बनते है अतः वे स्वयं ही सिद्द हो जाते है।तंत्र शास्त्र में आकाश में आवागमन की अनेक विधियाँ दी हुई है। जो साधक वायु में चिड़िया की तरह उड़ने की तथा दूसरो के मन की बात अपने आप जानने की इच्छा रखता हो वह श्रद्धा पूर्वक इस बीज मंत्र -- ''यं'' को सिद्ध करे। 4-साधना विधि -- इस मंत्र की साधना के लिए आप आसान लगा कर बैठ जाये और हवा में स्थिर एक हरा या भूरा गोले का ध्यान करे और इसके बीज मंत्र ''यं'' का उच्चारण करे ।

4-आकाश तत्व ;-

03 FACTS;- 1-बिग बैंग थ्योरी से हजारो वर्ष पूर्व हमारे ऋषि खोज चुके थे कि सबसे पहले space बनाया गया जिसे हम आकाश तत्व से संबोधित करते है। यही एक मात्र तत्व है जो परलौकिक शक्ति प्रदान करता है। बाकि के 4 तत्व लौकिक शक्तियां प्रदान करते है।इस तत्व को तभी जाना जा सकता है जब की बाकि के 4 तत्व ज्ञात हो। हमारे शरीर में इस का स्थान सहस्त्रार चक्र में माना गया है। सारे तत्व बारी बारी से हमारे शरीर में प्रधान होते रहते है अर्थात कुछ घंटो के अंतराल पर तत्व बदलते रहते है।

2-आकाश तत्व की प्रधानता;-

03 POINTS;-

1-आकाश तत्व कब हमारे शरीर में प्रधान है ये हम संध्या काल के द्वारा ज्ञात कर सकते है। दो प्रकार के संध्या काल होते है..पहला वह संध्या काल है जिसे हम प्रभात तथा संध्या के नाम से जानते है ।इस समय हमारा मन शांत होता है और हम ईश्वर तत्व के निकट होते है। . हमारा मन क्यों शांत होता है इसका भी कारण है।वास्तव में प्रकति में उपस्थित हर कण की अपनी आवृत्ति होती है।

2-उदाहरण के लिए सबसे छोटे कण परमाणु है और प्रत्येक परमाणु अपनी मध्य स्थिति के दोनों तरफ कम्पन करता रहता है अर्थात उस की अपनी आवृत्ति होती है। इन की आवृत्ति क्रमशः बढती और घटती रहती है। रात और दिन के 12 बजे इसकी आवत्ति अधिकतम होती है ।यही कारण है कि इस समय हमारा मन विचलित होता है। इसी प्रकार प्रभात और संध्या में इनकी आवृत्ति न्यूनतम होती है इसलिए हमारा मन शांत होता है। 3-दूसरा वह संध्या काल है जिसमें दोनों नथुनों के वायु का प्रवाह एक साथ हो।प्राणायाम तथा अन्य जगह इसी संध्या काल का वर्णन है।इस समय तत्व बदल रहे होते है और वायु का प्रवाह इडा से पिंगला या पिंगला से इडा की ओर स्थानांतरण हो रहा होता है।यह सुषुम्ना 'नाड़ी' का समय होता है।इस समय किया गया कोई भी भौतिक कार्य सफल नही होता।सिर्फ आध्यात्मिक कार्य ही सफल होते है। इस तत्व का ज्ञान होने पर भूत , भविष्य और वर्त्तमान में झांकने की शक्ति प्राप्त हो जाती है .. 3-पहचान के अन्य लक्षण;- रंग;- अन्य सभी तत्वों के 4 रंगों का मिश्रण , काला रंग स्वाद;- मुख का स्वाद कडुआ प्रतीत होता है

आकृति;- सबकी मिश्रित स्थान;- सहस्त्रार चक्र बीज मंत्र; - ''हं'' 5-पृथ्वी तत्व;-

04 FACTS;-

1-पृथ्वी तत्व सबसे आरम्भिक तत्व है ।इस की सहायता से बाकी तत्व सिद्ध करना सरल हो जाता है। यह तत्व आप की सहनसक्ति को अकल्पनीय स्तर तक ले जाता है। हर संसारिक सुख का यह स्रोत भी है।यही कारण है की अधिकाँश साधक यही भटक जाते है और संसारिक सुुखो मे लिप्त हो कर वही रह जाते हैं।यह तत्व अन्य की अपेक्षा जल्दी सिद्ध होता है और यदि थोडा भी मार्ग से विचलित हुए लालसा भी जाग सकती है। चाहे कितनी भी थकान क्यो न हो इस तत्व से वो क्षण भर मे समाप्त हो जाती है।

2-पहचान ;- जब यह तत्व चल रहा होता है तो श्वास 12 अंगुल तक होती है।

3-ध्यान;-

इस तत्व का ध्यान करने के लिए चौकोर आकृति का ध्यान लगाए जिस का रंग पीला है और कस्तूरी जैसी मंद मंद गंध आ रही हो।

4-बीज मंत्र; - 'लं'

..SHIVOHAM... सारणी ;-