Recent Posts

Archive

Tags

No tags yet.

मंत्र साधना में संकल्प विनियोग और न्यास का क्या महत्त्व हैं?कैसे जागृति होती हैं मंत्रों में न


मन्त्र विज्ञान ;-

03 FACTS;-

1-साधना का एक ऐसा शब्द और विज्ञान है कि उसका उच्चारण करते ही किसी चमत्कारी शक्ति का बोध होता है। ऐसी धारणा है कि प्राचीन काल के योगी, ऋषि और तत्त्वदर्शी महापुरुषों ने मन्त्रबल से पृथ्वी, देवलोक और ब्रह्माण्ड की अनन्त शक्तियों पर विजय पाई थी। मन्त्र शक्ति के प्रभाव से वे इतने समर्थ बन गये थे कि इच्छानुसार किसी भी पदार्थ का हस्तान्तरण, पदार्थ को शक्ति में बदल देते थे।

2-शाप और वरदान मन्त्र का ही प्रभाव माना जाता है। एक क्षण में किसी का रोग अच्छा कर देना एक पल में करोड़ों मील दूर की बात जान लेना, एक नक्षत्र से दूसरे नक्षत्र की जानकारी और शरीर की 72 हजार नाड़ियों के एक- एक जोड़ की ही अलौकिक शक्ति थी। इसलिए भारतीय तत्त्वदर्शन में मन्त्र शक्ति पर जितनी शोधें हुई हैं, उतनी और किसी पर भी नहीं हुई। मन्त्रों के आविष्कार होने के कारण ही ऋषि मन्त्र- दृष्टा कहलाते थे।

3-वेद और कुछ नहीं, एक प्रकार के मन्त्र विज्ञान है जिनमें विराट् ब्रह्माण्ड की उन अलौकिक सूक्ष्म और चेतन सत्ताओं और शक्तियों तक से सम्बन्ध स्थापित करने के गूढ़ रहस्य दिये हुए हैं, जिनके सम्बन्ध में विज्ञान अभी ‘क ख ग’ भी नहीं जानता।किसी भी धार्मिक कृत्य, पूजा-पाठ

व मंत्र आदि के जप से पूर्व होने वाली सूक्ष्म क्रियाओं संकल्प, विनियोग, न्यास व ध्यान आदि से आम जन सामान्यतः अनभिज्ञ होता है।आखिर ये सब जानने की हमें आवश्यकता क्यों हैं ..इसका उत्तर तो यही हैं की जब तक साधना क्षेत्र के बारे में ज्ञान का वह आवश्यक भाव भूमि हमारे जीवन में ना आ जाये सफलता कैसे प्राप्त होगी।हाँ सामान्य साधना में सफ़लत संभव हो सकती हैं पर उच्च स्तरीय साधना में सफलता पर प्रश्न वाचक चिन्ह ही हैं ।

मंत्र किस शक्ति को जागृत करता है?-

05 FACTS;-

1-मंत्रों में शक्ति कहाँ से आती है? कौन- सा मंत्र किस शक्ति को जागृत करता है? उसका प्रभाव परिचय किस प्रकार उत्पन्न होता है? इसका एक सुनिश्चित विज्ञान है। सामान्य दृष्टि में मंत्र कुछ अक्षरों या शब्दों का समुच्चय मात्र दिखाई देते हैं, परन्तु वस्तुतः मन्त्र वहीं तक सीमित नहीं है। उनका निर्माण एक विशेष प्रभाव उत्पन्न करने के लिए किया गया है और उनके उपयोग से, साधन से साधक में एक विशेष शक्ति जागृत होती है। यह बात अलग है कि उस शक्ति को देखा नहीं जा सकता है ।गर्मी- सर्दी, सुख- दुःख आदि की केवल अनुभूति होती है। पदार्थ के रूप में न तो उन्हें प्रत्यक्ष देखा जा सकता है और न ही पदार्थ की तरह अनुभव किया जा सकता है। यही बात मंत्रों के सम्बन्ध में भी लागू होती है।

2- किसी सोते हुए व्यक्ति का हाथ पकड़ कर, झकझोर कर उसे जगाया तो जा सकता है परन्तु हाथ पकड़ना या झकझोरना जागृति नहीं है। अधिक से अधिक इस प्रक्रिया को जगाने की निमित्त होने का श्रेय दिया जा सकता है। मंत्रोच्चार भी अन्तरंग में और अन्तरिक्ष में भरी पड़ी अगणित चेतना शक्तियों में से कुछ को जागृत करने का निमित्त मात्र है।मन्त्रों में शक्ति कहाँ से आती है? या किस प्रकार मंत्रोच्चार के अन्तरंग में निहित शक्ति जागृत होती है तथा उसमें अन्तरिक्ष में भरी हुई शक्तियों से सम्पर्क सान्निध्य स्थापित होता है? इसका एक सुनिश्चित विज्ञान है।

3- किस मंत्र से, किस शक्ति को, किस आधार पर जगाया जाये इसका संकेत हर मंत्र के साथ जुड़े हुए विनियोग में बताया गया है। मन्त्र चाहे वैदिक हो या तांत्रिक,दक्षिण मार्गी हो या वाममार्गी, सभी में विनियोग होता है और मंत्र साधन के विधान के साथ ही उनका उल्लेख भी रहता है। जप तो केवल मंत्र का ही किया जाता है, किन्तु नियम है कि जप आरम्भ करते समय इस विनियोग का स्मरण कर लिया जाये। इस स्मरण में मंत्र के स्वरूप और लक्ष्य के प्रति साधना काल में जागरूकता बनी रहती है और साधना सह